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बुधवार, 7 दिसंबर 2011

गायत्री वाला थानेदार ---- ललित शर्मा

कार्तिक स्नान को आते-जाते धर्माथी
रिद्वार में तीर्थयात्रियों का मेला-रेला लगा हुआ था, गाड़ियों की तो क्या कहें, ट्रेनों के इंजन पर भी लोग चढ कर आ रहे थे। एक रेला आता था और एक रेला जाता है। लोग कार्तिक पूर्णिमा के अवसर स्नान-दान करने आते हैं। जब हरिद्वार पहुंचा था तो ट्रेन में मिली माता जी (जिसने चौरसिया जी 21 रुपए की दक्षिणा दी थी) प्लेट फ़ार्म पर बैठ कर टी टी को ढूंढ रही थी। मेरे पूछने पर कहने लगी कि - बेटा उसे दक्षिणा देनी है, मैं बहुत खुश हूँ कि वह मुझे ट्रेन में बैठा कर लाया। उसे ही देख रही हूँ मिले तो कुछ रुपए उसे दूँ।" माता जी गद गद होकर टी टी को ढूंढ रही थी। ट्रेन में भीड़ होने के कारण जिसने टिकिट नहीं ली वे भी तर गए। मतलब गंगा नहा लिए बिना टिकिट भी, धर्म कर्म करने के लिए भी सौ-पचास की टिकिट की चोरी कर लेते हैं लोग। बिना टिकिट ही धर्मयात्रा करना है तो तीर्थ करने का क्या मतलब?

पुलिस (चित्र गुगल के सौजन्य से)
धर्म आध्यात्म की ओर ले जाता है, अध्यात्म= अध्य+आत्म, स्वयं को जानना। जिसने स्वयं को जान लिया उसने सब कुछ जान लिया। यही अध्यात्म है, अपने को जानने की बजाए लोग दुसरों को जानने के लिए भटकते हैं। एक थानेदार हैं गोमती नगर थाने में लखनऊ के। जिनका नाम राजकु्मार प्रजापति है। उनके बारे में चर्चा चल रही थी परिजनों के बीच, तो मैने भी कान लगा लिए उधर। कहते हैं कि उनके सामने कोई लेन-देन की बात तक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। गलत काम कराने का इच्छुक कोई व्यक्ति ऐसा करना भी चाहे तो लोग उसे पहले ही चेता देते हैं, गायत्री वाले दरोगा हैं क्यों मुसीबत मोल लेते हो। खुद के व्यक्तित्व में आए बदलाव का श्रेय राजकुमार प्रजापति आचार्य श्री राम शर्मा जी को देते हैं। राजकुमार प्रजापति 1987 में शांतिकूंज आए और फ़िर आचार्य के विराट व्यक्तित्व और कृतित्व के होकर रह गए।

नशामुक्ति प्रचार (गायत्री परिवार के सौजन्य से)
आचार्य के विचारों से प्रभावित होकर जब वे घर गए तो उन्होने नशा मुक्ति और जनसेवा का बीड़ा उठा लिया, अभी तक वे अपने सम्पर्क में आने वाले 300 से अधिक युवाओं की नशे की लत छुड़वा चुके हैं। उनके लिए आगत की सेवा ही सबसे बड़ा मकसद है। राजकुमार के पास आए किसी पीड़ित को अधिकारियों के पास चक्कर नहीं काटने पड़ते। वर्तमान भ्रष्ट्राचार के पंक में डूबी व्यवस्था में ईमानदारी से नौकरी करना भी कठिन कार्य है। लेकिन राजकुमार इससे वास्ता नहीं रखते, उनकी ईमानदारी और सेवाभाव को आला अफ़सर भी सम्मान देते हैं। उनका आत्मबल ही उन्हे ईमानदारी से कार्य करने की प्रेरणा देता है। यह शक्ति सिर्फ़ आध्यात्म से ही आ सकती है। इसीलिए कहा गया है कि अध्यात्म में बड़ा बल है। इसका चमत्कार मैने भी देखा है। आत्मबल हो तो बड़ी बड़ी कठिनाईयों पर व्यक्ति विजय पा लेता है। ऐसे कर्तव्य के धनी व्यक्तित्व के विषय में सुन कर अच्छा लगा। पुलिस जैसे महकमें ऐसे लोग भी हैं, यह गर्व की बात है। 

हरिद्वार में अपना बोझा लादे ब्लॉगर
हरिद्वार की खट्टी मीठी यादों को संजो रहे थे बैठकर स्टेशन में ट्रेन की प्रतिक्षा करते हुए। घुमने गए साथी भी धीरे-धीरे पहुंच रहे थे। तभी एक ट्रेन आकर लगी, नाम कुछ दूसरा लिखा हुआ था। लेकिन नम्बर सही था, यह हरिद्वार आकर एक घंटे खड़ी रहती है। फ़िर इंजन बदल कर इलाहाबाद के लिए रवाना होती है। कई बोगियों अलग-अलग रिजर्वेशन होने के कारण सामान जमाने में तकलीफ़ तो हुई। कुछ लोगों का इसमें भी रिजर्वेशन कन्फ़र्म नहीं हुआ था। उन्हे भी सीट दिलाई गयी। जिनके नाम का रिजर्वेशन हो गया था, उन्होने अपनी सीट संभाल ली, किसी दुसरे के बैठने लिए जगह न देनी पड़े। थोड़ा बहुत भी सब्र नहीं रहता लोगों को। रात तक सभी के लिए जगह बन गयी थी। मेरे बगल वाली साईड लोवर बर्थ पर 4 लोग टंगे थे। एक ने मुफ़्त में ही कब्जा कर रखा था। जब टी टी आया तो पता चला उसकी सीट नहीं है। फ़िर भी उन लोगों में आपस में हो हल्ला, जूतम पैजार होता रहा।

रेल में संध्या पाठ -आरती
दो महिलाएं हमारे साथ गयी महिला की सीट के नीचे बैठ गयी। काफ़ी रात हो गयी थी, उनके पास कोई सामान नहीं था। साथी महिला के कहने पर मैने उन्हे वहाँ से उठ जाने कहा। दो बार कहने बाद वे उठी तो सही पर बड़बड़ाने लगी कि "हम लोग कोइ चोर तो नहीं है, तुम्हारा कोई सामान उठाकर ले जाएगें।" किसी में माथे पर थोड़ी लिखा होता है कि वह चोर है। जब मौका मिला और माल पार हो गया, हम तो तुम्हारी ईमानदारी के भरोसे लुट पिट जाएगें। टीटी आकर उन्हे चिल्लाने लगा-"रिजर्वेशन हो तो बैठो गाड़ी में, नहीं तो जनरल में जाओ। तुम्हारे पास तो टिकिट भी नहीं है। कहाँ जा रहे हो? तो वो बोली आश्रम जा रहे हैं। "जब मरना ही है तो आश्रम में मरो, ट्रेन में क्यों आते हो? टीटी उन्हे धमका कर चला गया और वे बिना टिकिट सफ़र करती रही। पता नहीं कितने लोग रोज बिना टिकिट सफ़र करते हैं ट्रेन में। रेल्वे के कर्मचारी तो जेब में युनियन का कार्ड डाले किसी की सीट पर भी कब्जा जमा लेते हैं। जबकि उन्हे सामान्य टिकिट पर स्लीपर में यात्रा करने अनुमति नहीं है। चल रहा है तो चलाए जाओ किसने मना किया है, रेलगाड़ी तुम्हारे बाप की है।

लखनऊ में मुख्यमंत्री मायावती जी के साथ मंत्रणा
हम जा रहे थे लखनऊ की ओर, लखनऊ में एक दिन का विश्राम करने का ईरादा था। इस विषय पर पहले ही लिख चुका था। मोबाईल की बैटरी बार-बार लो बता रही थी। अब कितनी बार बैटरी लूँ, इसको  भी  बीमारी लगी हुई थी। बैटरी लो बताने की। इसलिए रात को मोबाईल बंद कर दिया कि लखनऊ पहुंचने पर महफ़ूज मियां को फ़ोन लगाने लायक तो जान रहे फ़ोन में। रात 2 बजे हम लखनऊ पहुंचे, याद आया एक बार मायावती बहन जी ने हमें लखनऊ की सैर कराई थी। अब महफ़ूज मियां के गले पड़ना था। स्टेशन में उतर कर उन्हे फ़ोन लगाने लगे तो मोबाईल में नम्बर ही नहीं था, मैने सेव नहीं किया था और नम्बर भूल चुका था। अब मोबाईल रखने का भी कोई मतलब नहीं निकला। स्टेशन पर चाय पीते टहलते रहे। हमारे साथी दैनिक क्रिया की जगह की तलाश कर रहे थे। कहीं सामान रख कर स्नान ध्यान करके लखनऊ घूमा जाए। प्लेट फ़ार्म के भीतर बाहर हमने खूब चक्कर लगा लिया। महफ़ूज मियां दिखाई नहीं दिए। आखिर मैने सोचा कि क्यों कोई अपनी रात खराब करेगा? सुबह पता करेगें स्वामी महफ़ूजानंद को। अभी तो अयोध्या चला जाए। जारी है........ आगे पढें

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

ब्लॉगर सबसे बड़ा मौन का साधक --- ललित शर्मा

प्रारंभ से पढें
सुबह जब सो कर उठे तो सुरज की किरणें कनात की झिरियों से आकर मुंह पर पड़ रही थी। रात नदी की रेत पर ही अच्छी नींद आयी। काफ़ी साथी लोग नहा धोकर तैयार हो गए थे। मौनी बाबा आदतन मौन थे, ये तो सिर्फ़ दो घंटे ही मौन रहते हैं। ब्लॉगर तो जब तक कम्पयुटर पर रहता है तब तक मौन रहता है। ब्लॉगर से बड़ा साधक कौन है? सारी विद्याएं ही हैं जैसे त्राटक (एक टक मानीटर को देखना) मौन, धारणा, ध्यान, समाधि। वैसे ब्लॉगर को ॠषि तुल्य ही मानना चाहिए। ॠषि का कार्य है कि गुरुओं से मिले हुए ज्ञान को प्रचारित एवं प्रसारित करना। यही काम ब्लॉगर भी मनोयोग से कर रहे हैं। आँख खुली ही थी कि तुरकने जी ने एक विषय छेड़ दि्या और हमने पकड़ लिया। सुबह-सुबह ही एक घंटे का लेक्चर हो गया। अब तैयार होना था, हरिद्वार में तो कल से अफ़रातफ़री का माहौल था।

भगदड़ की घटनाओं को लेकर अफ़वाहों का बाजार गर्म था। जो वहां नहीं था वह भी प्रत्यक्षदर्शी बना हुआ था। कोई कह रहा था कि आतंकवादी घुस गए थे। कोई कह रहा था कि पुलिस वालों ने भगदड़ मचा दी तो कोई कह रहा था कि दंगा हो गया। गंगा तीर से स्नान कर आई महिलाओं ने बताया कि वहां स्नान कर रही दो महिलाएं कह रही थी कि वे यज्ञशाला में थी। वहां यज्ञ की अग्नि में एक महिला जल गयी और उन्होने अपनी आँखों से देखा है। मैने कहा कि इतना बड़ा झूठ, उनकी कनपटी में बजाना था दो, तुम लोग सुन कर कैसे आ गयी। भीड़ की अधिकता से भगदड़ में 16 लोगों के मृत होने की सूचना अवश्य आ रही थी। किसी वृद्ध के बेहोश होकर गिरने के बाद भगदड़ मची। जिसे धुंए की अधिकता से बेहोश होना बताया जा रहा है। उसमें ही लोग घायल हुए हैं और कुछ मरे हैं। पता नहीं लोगों को अफ़वाह फ़ैला कर क्या मिलता है? अफ़वाहें ही सारा माहौल खराब करती है और इन पर लगाम लगाना किसी के बस का नहीं।

भगदड़ होने का एक कारण मेरी समझ में आया कि इतनी भीड़ को संभालना प्रशासन के बस की बात नहीं। स्वअनुशासन की आवश्यकता होती है। ऐसा भी नहीं है कि गायत्री परिवार के कार्यकर्ताओं में अनुशासन की कमी है। पर अधिक भीड़ लाने के चक्कर में कुछ सैलानी भी मात्र घूमने एवं देखने चले आए। इसके कारण अनुशासन कायम नहीं रह सका। भीड़ को कोई नहीं संभाल सकता। गायत्री परिवार का आयोजन उम्दा था। किसी संस्थान के द्वारा किया गया आज तक का सबसे बड़ा आयोजन था। कुंभ में भी सरकार करोड़ों रुपए खर्च करके ऐसा आयोजन नहीं कर सकती, यह तो मानना ही पड़ेगा। भीड़ के कारण कुंभ में भी भगदड़ मची है। नासिक कुंभ इसका ताजा तरीन उदाहरण है। वहाँ भी भगदड़ में काफ़ी लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। हादसों को रोका जाना चाहिए, भीड़ पर नियंत्रण न होने के कारण हादसे होते हैं।

हमारे कुछ साथी चंडी देवी मंदिर और कुछ शांतिकूंज जाना चाहते है। पर मैने अपना रुख अडिग रखा, क्योंकि हमारी ट्रेन 2.40 बजे दोपहर को थी। अगर भीड़ के कारण ट्रेन निकल गयी तो हरिद्वार में ही हरे राम भजना पड़ता। मैने हांका लगा दिया कि जिसको भी स्टेशन चलना है वह मेरे साथ चले। पैदल ही जाना होगा क्योंकि कहीं पर भी सवारी मिलने की संभावना नहीं है और मुसीबतों का एकमात्र पुल भी पार करना है। आधे सहयात्री मेरे साथ चलने को तैयार हो गए। हम अपना सामान लाद कर गौरीशंकर के यात्री स्वागत पंडाल तक पहुंच गए। वहाँ रुक कर साथियों का इंतजार किया। सभी के साथ आने पर गंगा को प्रणाम करके हम आगे बढ गए। महिलाओं ने अपना बैग सिर पर रख लिया। क्योंकि आज तो लगभग 10 किलोमीटर के अधिक चलना था। इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं था।

कुछ मास्टरिन भी साथ थी, रास्ते में कहती थी -"रेंगत नई बनत हे महाराज, सुखियार होगे हन गा", तो मैं कहता - "आज तो सुखियारी चले नहीं, रेंगे ला परबेच करही। धीरे बांधे चलव, टैम में पहुंच जाबो।" कुछ साथियों को ऑटो मिल गए, पर ऑटो वालों का पुल पर प्रवेश बंद था, वे भी हमें पुल पर ही इंतजार करते मिले। कुछ महिलाओं ने रास्ते में एक रिक्शा किया 50 रुपए में, जो उनके बैग पुल के प्रवेश द्वार तक पहुंचा दे। इस रिक्शे में प्रताप सेन बैठ गया पुल तक। किसी भी तीर्थ यात्री को यह ध्यान रखना चाहिए कि मेले, स्नान, या कुंभ इत्यादि जैसे पर्वों पर 11 नम्बर की ही सवारी काम आएगी। मतलब पैदल ही चलना पड़ेगा। क्योंकि भीड़ चलने वाले रास्तों पर रिक्शा इत्यादि वाहनों का प्रवेश वर्जित कर दिया जाता है। इसलिए तीर्थ पर जाने से पहले लगभग 15 दिनों की रोज 5 किलोमीटर चलने का अभ्यास कर लेना चाहिए।

पुल पार करके हमने उसके मुहाने पर कुछ देर विश्राम किया। उत्तराखंड पुलिस की महिला विंग की ड्युटी पुल के पास वाले चौराहे पर लगी थी। कभी-कभी मोबाईल पर मुस्कुरा कर बात कर लेती थी फ़िर अपने काम में लग जाती थी। मोबाईल भी मन बहलाने का उम्दा साधन है। बस उपयोग सही होना चाहिए। एक मिस कॉल दो और घंटे भर बात करो। धन धनिए का, माल बनिए। अपना तो हवा हवाई में ही काम चल जाता है। खिरामा खिरामा टहलते टहलते हम स्टेशन तक पहुंच गए।पैदल चलते चलते हरिद्वार की कई बातें और यादें जेहन में चल रही थी। कुछ चित्रों के रुप में यादें संजो ली थी। हरिद्वार के प्लेटफ़ार्म पर जनसुविधा का न होना आश्चर्य चकित कर गया। क्योंकि कुछ महिला सहयात्रियों को आवश्यकता पड़ गयी थी। उन्हे स्टेशन के बाहर जाना पड़ा। जारी है................।

शनिवार, 26 नवंबर 2011

तेरे बाप का राज है क्या? -- ललित शर्मा

आराम के मोड में
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टो वाले भी मुफ़्त का फ़ायदा उठाना चाहते थे। मेरे साथ हृदयलाल गिलहरे, पंकज नामदेव, चौरसिया जी, बीएस ठाकुर गुरुजी और उनके साथ 3 महिलाएं थी। ॠषिकेश जाने के 1500 रुपए देना मुझे बहुत अखर रहा था। लेकिन साथियों की जिद के आगे झुकना पड़ा। ॠषिकेश पहुंच कर ऑटोवाले ने युनियन में मुझसे 1500 रुपए जमा कराने को कहा और जब पर्ची काटने के 10रुपए और मांगे तो खोपड़ी घुम गयी। मैने जोर से गरिया दिया उसे। तो ड्राईवर ने पर्ची के 10रुपए अपनी जेब से दिए। पर्ची लेकर उसने हमें लक्ष्मण झूला मार्ग पर छोड़ दिया और 6 बजे बस स्टैंड पर मिलने कहा। हरिद्वार और ॠषिकेश में 500 का नोट तुड़वाना भी एक समस्या ही है। कोई भी छुट्टे देने को तैयार नहीं। हम सबके पास बड़े नोट ही थे। एक जगह पानी की दो बोतल लेने के बाद भी छुट्टे नहीं मिले। हम पानी की बोतल ले रहे थे तभी एक गाईड आ गया। बोला की 40 रुपए लूंगा और सारी जगह दिखाऊंगा। हमने उसे साथ रख लिया।

पंकज, चौरसिया जी, गुरुजी, बी एस ठाकुर
।वह सबसे पहले एक मंदिर में ले गया। कोई नया मंदिर ही था, उसके विषय में बताने लगा। फ़िर एक जेम्स की दुकान में ले जाकर घुसा दिया। दुकान का नाम Uttrakhand Handicraft Gems Centre था और साईन बोर्ड से लग रहा था कि उत्तराखंड सरकार के हैंडीक्राफ़्ट विभाग का शो रुम है। लेकिन हकीकत में ऐसा था नहीं। उसने लिख रखा था Directorate fo industries Govt. of Uttrakhanad) मैने उससे कई बार कहा कि - आप तो ऐसा लिख रहे हैं जैसे यह उत्तराखंड सरकार का ही शो रुम हैं। तो उसने अपना नाम आर सी चतुर्वेदी बताया और इस शो रुम को उत्तराखंड सरकार का ही बताया। मैने उसका विजिटिंग कार्ड ले लिया। वह हमें पत्थर दिखाने लगा। स्फ़टिक के कई सैम्पल दिखाए। तब तक मैने उसकी दुकान में मोबाईल चार्ज किया। थोड़ा बहुत चार्ज हो जाए तो बात हो जाए लोगों से। 15मिनट तक हम उसका सामान देखते रहे। फ़िर आगे बढ लिए।

लक्ष्मण झूला
ठाकुर गुरुजी को आगे चलने की आदत है। वे सपाटे से चलते हैं, पीछे मुड़ कर भी नहीं देखते। उनकी बहन पत्नी और सास पीछे छूट गयी। मुझे बार बार कह रही थी कि वे दिख नहीं रहे हैं। मैने उन्हे कहा कि लक्ष्मण झूले के पास मिल जाएगें। आप चिंता न करें। जब हम लक्ष्मण झूले के पास पहुंचे तो वे वहीं खड़े मिले। मेले मे लोग इसी तरह छूटा करते थे। लक्ष्मण झूला पर हमने फ़ोटो खींचे। फ़ोन चालु होते ही सबसे पहले संगीता पुरी जी का फ़ोन आया। उन्होने हाल चाल पता किया, फ़िर संध्या शर्मा जी का मैसेज मिला। अभनपुर एवं रायपुर से मित्रों के फ़ोन आने शुरु हो गए। 10 मिनट तक चलने के बाद फ़ोन फ़िर बंद हो गया। मतलब जै राम जी, अब किसी से समपर्क नहीं हो सकेगा। लक्ष्मण झूले से मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाई। पुल पर दर्शनार्थियों की बहुत भीड़ थी।

सड़कों पर बसंत उतर आया
हमने शाम को डूबते हुए सूरज और उगते हुए चाँद के चित्र लिए। बाजार से चलते हुए चोटी वाले के होटल में पहुंचे। ये चोटीवाले होटल ॠषिकेश की पहचान बन गए हैं। होटल के सामने घंटी लेकर बैठे हुए ये चोटी वाले ग्राहकों को आकर्षित करते हैं। मार्केटिंग का यह फ़ंडा अच्छा है। ऊंची कुर्सी पर बैठे ये चोटी वाले होटल के सामने भीड़ भी नहीं लगने देते। यहाँ से हम दुसरे झूले याने राम झूला पर पहुंचते हैं। पिछली बार जब आया था मैने यहां एक दुकान से एक किलो आटा लेकर गोलियाँ बनाकर मछलियों को खिलाई थी। बड़ी बड़ी मछलियाँ आकर आटे की गोलियाँ खाती हैं। मछलियों को आटे की गोली खिलाने से उग्र ग्रह शांत होते हैं। ऐसा कहा जाता है, कई ज्योतिषि यह टोटका करने कहते हैं। ग्रह शांत हो न हो पर मन की शांति तो हो जाती है। 

राम झूला पर चढने से पहले वहां पर चबुतरे बने हैं। पैदल चल कर थक लिए थे इसलिए वहीं बैठकर विश्राम करने लगे। मै चबुतरे पर बैठा तो पंकज फ़ोटो लेने लगा। मैने बगल में मुड़ कर देखा तो एक जाना पहचाना चेहरा सामने आ गया। ये थे पेंड्रारोड़ के रामनिवास तिवारी जी, अपनी डुकरिया के साथ तीरथ करने आए थे। मैने उन्हे देखा और उन्होने मुझे देखा। बोले शर्मा जी, हमने कहा- हाँ तिवारी जी, कैसे हैं? गजब मुलाकात हुई भाई। फ़िर क्या था तिवारी सुनाने लगे, वे किसान कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। पेंड्रारोड़ का बच्चा बच्चा उन्हे जानता है। पिछले इलेक्शन में हम भी उनके यहाँ के पहुंचे थे। पान चबाते हुए गले में चुंदड़ी स्टाईल का पटका डाले मिले। गजब कहानी है भाई। धन्य हो गए तिवारी जी से मिल कर। जब मै फ़ोटो लेने लगा तो पता चला कि वे पंकज के पापा के भी परिचित निकले।

पंकज सिह 
रामझूला पर चढे तो वह हिल रहा था, गुजरात की कुछ महिलाएं डरते हुए उस पर चल रही हैं। नदी पर केबल के सहारे बना हुआ यह पुल कारीगरी की अद्भुत मिशाल है। मोटर सायकिल और स्कूटर वाले भी इसी पुल से जा रहे थे और पुल लगातार हिल रहा था। डर भी लगता है कि कहीं गिर न जाए। लेकिन जब इतने बरसों से नहीं गिरा तो हमारे चलने से क्या गिरेगा। हमारे आगे गिलहरे गुरुजी और चौरसिया जी थे। हम पीछे पीछे चल रहे थे फ़ोटो लेते हुए। पुल पार करके हम धीरे धीरे बाजार की तरफ़ हो लिए, आगे बस अड्डा था। वहीं पर हमें ऑटो वाला मिल गया। बलदाऊ गुरुजी भी वहीं इंतजार करते मिले परिवार के साथ। लेकिन गिलहरे गुरुजी और चौरसिया जी नहीं आए थे। ऑटो वाला जल्दी चलने के लिए हाय तौबा मचाने लगा। मैं इन्हे ढूंढ रहा था। मोबाईल की बैटरी खत्म थी इसलिए इन्हे ढूंढने में समस्या हो रही थी। पैदल चलने की इच्छा न होने पर भी इन्हे ढूंढा। कहीं नहीं मिले, जमीन खा गयी कि आसमां निगल गया।

प्यास बुझाएं - मेरी फ़ोटोग्राफ़ी
ऑटो वाला कह रहा था कि गुरु जी नहीं मिले तो उन्हे छोड़ कर चले जाएगें। अरे कैसे छोड़ कर चले जाएगें, तेरे बाप का राज है क्या? तुझे अधिक जल्दी है तो जाकर ढूंढ कर ला। अभी 6 नहीं बजे हैं और हमारे पास 6 बजे तक का समय है। हम उन्हे ढूंढते-ढूंढते थक हार कर बैठ गए। जब वे आएगें तभी चलेगें। मैं समझ तो गया था कि वे गलत रास्ते चले गए पुल से। दांए मुड़ने की बजाए बांए चले गए, जैसे नीरज जाट एवं जाट देवता में दांए बांए का लफ़ड़ा हो जाता है वैसा ही इनके बीच भी हुआ होगा। आखिर में हमने तय किया कि 10 मिनट में ये लोग नहीं आते हैं तो इन्हे छोड़कर ही चले जाएगें। ऐसा विचार बनाते ही ये दोनो सामने नजर आए और वही हुआ कि ये पुल से बांए तरफ़ चल गए थे। इसलिए रास्ता भूल गए थे। लेकिन वह जगह भूलने वाली नहीं है। ऑटो वाले ने युनियन में आकर पर्ची देकर 1500 रुपए लिए और अपनी जेब में रख लिए। मैने सोचा कि चलो हरिद्वार जाकर देने हैं उसने पैसे अभी रख लिए तो कोई बात नहीं।

पानी वाले बाबा- आधा सच
अब हरिद्वार हम मेन रोड़ से जा रहे थे। राजाजी पार्क वाला रास्ता रात में बंद कर दिया जाता है। जंगली जानवरों के हमला होने और बियाबान में लूटपाट का खतरा है। रास्ते में श्यामपुर की पुलिस चौकी के पास दो तीन लड़के मिले, उन्होने ऑटो वाले को रोक लिया और उनमें आपस में कुछ बातें होने लगी। मेरा ध्यान उनके तरफ़ ही था पता चला कि ऑटो ड्रायवर का नहीं था और वह किसी से किराए पर चलाने के लिए लाया था। जिसकी मियाद 6 बजे तक थी। अब ऑटो मालिक अपना ऑटो वापस मांग रहा था और कह रहा था कि सवारी जाए भाड़ में, मुझे अभी ऑटो चाहिए। तुम जानो और सवारी जाने। ऑटो ड्रायवर ने हमें पहुंचाने के लिए दुसरे ऑटो वाले से बात की। वह 400 मांग रहा था हमें छोड़ के आने के। यह 400 देने को तैयार नहीं था। इस तरह उसने सड़क पर ही 20 मिनट लगा दिए। मुझसे कहने लगा कि हरिद्वार रोड़ पुलिस ने बंद कर रखा है आपको किसी और साधन से जाना पड़ेगा। मैं आगे नहीं ले सकता। गाड़ी ही नहीं जा रही है।

विचार क्रांति अभियान की मशाल
आधे रास्ते में गाड़ी रोक कर साले तमाशा करने लगे। बस फ़िर अपन ने अपना फ़ार्मुला नम्बर 45 इस्तेमाल किया। उस ऑटो मालिक को कोने में ले जाकर मंत्र दिया। उस पर मंत्र का असर बिच्छु के डंक मारने जैसा हुआ। जो अभी तक ऑटो मांग रहा था वह उस ड्रायवर से बोला- साले सवारी देख कर बैठाए करो, खुद भी मरोगे और हमें भी मरवाओगे। चलो अब जैसे भी होगा इन्हे गौरीशंकर 1 तक पहुंचा कर आना है। अब इन्होने यहीं से हिसाब लगाना शुरु कर दिया कि रास्ता बंद होने पर किधर से गौरीशंकर तक पहुंचा जाएगा। पहले हमें हर की पौड़ी तक छोड़ने की बातें करने लगे। वहां से हरिशंकर लगभग 5 किलो मीटर है। मैने कहा कि - एक बार तो तुम्हे समझा दिया, फ़िर मत कहना कि जादू नहीं दिखाया। जब जादू देख लोगे तो भालू के बालों वाला ताबीज भी लेना पड़ेगा। जब ताबीज ले लिया तो गले में डालना पड़ेगा। बहुत दुखदायी होगा तुम्हारे लिए।

हरिद्वार में गंगा जी का पुल - मुसीबत की जड़
इधर उधर से घुमाते हुए वे हमें पुल के नीचे ले आए जहाँ से हमें बैठाया था। मैने कहा कि पर्ची में गौरीशंकर लिखा है देख ले। हमें वहाँ तक छोड़ना पड़ेगा। वह अड़ गया कि गौरीशंकर तक नहीं जाऊंगा। मैने कहा कि बहुत देर से तुझे बरज रहा था। अब तेरे क्रियाकर्म का समय आ गया है। जब नहीं ही मानेगा तो फ़ार्मुला नम्बर 36 लगाना पड़ेगा और फ़िर तू दो चार दिन किसी काबिल नहीं रहेगा। सोच ले अब, वैसे भी बिना गौरी शंकर जाए हम ऑटो से नहीं उतरने वाले। साले तुझे हराम का माल चाहिए, मुफ़्त में 1500 सौ रुपए नहीं दिए हैं। जात भी देगा और जगात भी देगा। फ़िर वह हमें गौरीशंकर 1 तक छोड़ने के लिए चल पड़ा। ठंड बढ चुकी थी, लाउडस्पीकर पर प्रसारण हो रहा था कि- शांतिकूंज हरिद्वार द्वारा बाकी कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए हैं, कल सिर्फ़ पूर्णाहूति होगी, जो परिजन अपने वाहनों से आए हैं वे वापस चले जाएं। ट्रेन आदि से आए हुए परिजन अपने टेंटों में रहे। भोजन की व्यवस्था यथावत चलती रहेगी तथा स्नान करने के लिए गंगा के किनारे न जाएं। जिससे भीड़ बढ जाए, खास कर हर की पौड़ी की तरफ़ जाने की मनाही है। भोजन करने के पश्चात योग निद्रा में पहुंच गए। जारी है --
(फ़ोटो - पंकज सिंह के सौजन्य से)

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

बसंती तागें वाली और हरिद्वार--- ललित शर्मा

तांगे की सवारी - बी एस ठाकुर एवं गिलहरे के साथ
प्रारंभ से पढें
संती तांगे वाली हमें पुल पर छोड़कर फ़रार हो गयी, पुल पर बहुत भीड़ थी बड़ी मुस्किल से नीचे उतरने के बाद हमने गौरीशंकर 1 का पता पूछा तो पता चला कि पुल के आखरी छोर से रास्ता बना है। मेरे पास वी आई पी पास था, वीआईपी व्यवस्था यज्ञशाला के पास ही की गयी थी। लेकिन वहाँ वीआईपी बनकर अकेले रहने की बजाय साथियों के दल में रहना ही उपयुक्त लगा। हम अपना सामान लाद कर गौरीशंकर 1 के लिए चल पड़े। सीढियों के पास से लगभग 3 किलोमीटर पैदल जाना पड़ा। रास्ते में एक जगह पुल पर लगी लोहे की सीढी से लोग उपर चढ रहे थे। यह बहुत ही खतरनाक कार्य था। महिलाएं भी सीढी पर उपर चढ रही थी। लोग पैदल चलने से बचने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे थे और लगभग आधा किलोमीटर लाईन में लग कर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। अगर पैदल चलते तो पहुंच जाते। इस सीढी से भी दुर्घटना हो सकती थी। मैने एक फ़ोटो ली और आगे बढ गया।

बसाहट का नक्शा
गौरी शंकर 1 के रिसेप्शन पर लोग आमद देकर अपना टेंट नम्बर ले रहे थे। हमें टेंट नम्बर छत्तीसगढ 220 मिला। यह लगभग 100 लोगों के रहने के लिए मुफ़ीद था। यहाँ से गंगा का किनारा भी समीप होने से रोज गंगा स्नान हो सकता था। सभी को प्रिंटेट परिचय पत्र दिए गए। तीन माह पहले से सभी शक्तिपीठों से आने वाले परिजनों की लिस्ट मंगा ली गयी थी और सभी के परिचय पत्र यहां बन कर तैयार थे। इतने बड़े आयोजन की सुरक्षा की दृष्टि से यह सही कदम था। टेंट के कई शहर बसाए गए थे। जिनमें छत्तीसगढ से आने वालों की संख्या अधिक थी। हमारे सीताराम गुरुजी दो महीने पहले से ही समय दान के लिए पहुंच गए थे। उनकी ड्युटी पंत द्वीप में थी और उन्होने मिलने की इच्छा भी जाहिर की थी। यहाँ कहीं भी जाने के लिए पैदल ही जाना पड़ेगा, यह मैं जानता था। कोई सवारी और साधन उपलब्ध नहीं था।

अपना सामान लेकर टेंट की ओर जाते सहयात्री
गायत्री परिवार के इस आयोजन की तैयारी तीन साल पहले से हो रही थी। कुंभ से भी विशाल आयोजन और इंतजाम था। जिसमें प्रशासन की कहीं पर भी भागीदारी नहीं थी। समय दानी वालिएन्टर्स अपना योगदान दे रहे थे। मुस्तैदी से अपनी ड्युटी पर लगे थे। जिस दिन हम पहुंचे बताते हैं कि उस दिन लगभग 50 लाख गायत्री परिजन हरिद्वार पहुंच चुके थे। उनके रहने, खाने एवं निस्तारी की उत्तम व्यवस्था थी। कुंभ में अरबों रुपए खर्च करके भी शासन इतनी सुंदर व्यवस्था नहीं कर पाता। जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को उसका परिचय पत्र बना हुआ तैयार मिल रहा था और रहने के लिए तुरंत छोलदारियों का आबंटन कर दिया गया। खानी की व्यवस्था सुबह से प्रारंभ हो जाती थी। लोग स्वयं जाकर भोजनालय में अपनी सेवाएं दे रहे थे। सेवा भाव से भोजन करवा रहे थे। भोजन के लिए अनुशासित कतारबद्ध लोग खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। हम अपने टेंट की ओर चल पड़े।

सीढी पर चढते लोग
टेंट में सामान रख कर साथी लोग गंगा स्नान के लिंए चले गए और हम सामान की चौकीदारी करते रहे। छोलदारी में रात गुजारने का अपना ही आनंद है। वीआइपी लोगों के लिए स्विस कॉटेज का इंतजाम था। जिसमें पलंग, लैट्रिन बाथरुम, पंखा था। छोलदारी में लाईट और दरी बस थी। इस पर ही रात गुजारनी थी। साथियों के आने के बाद हम स्नानादि से निवृत्त हुए। हमारा कार्यक्रम मसूरी जाने का था। इसलिए बस स्टैंड के लिए जल्दी निकलना चाहते थे। बस स्टैंड जाने के लिए फ़िर उसी पुल पर चढना था। हम 4किलोमीटर चलते हुए सीढी के पास पहुंचे तो वहाँ पुलिस लग चुकी थी और सिर्फ़ लोगों को उतरने दिया जा रहा था। चढने नहीं दिया गया। हमारी योजना खटाई में पड़ चुकी थी। वापस पुल पर आने के लिए 5 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता और 12 बज रहे थे। मसूरी जाकर वापस आना संभव नहीं था।

भोजन की लाईन
जब मैं गौरीशंकर से पुल की तरफ़ आ रहा था, लगभग 11 बजे होगें, तब घर से श्रीमती जी का फ़ोन आया कि हरिद्वार में भगदड़ मच गयी है। कई लोग मारे गए हैं, फ़िर एक मित्र का फ़ोन आया कि हरिद्वार में यज्ञ स्थल पर दंगा हो गया है। ऐसा मुझे कहीं नजर नहीं आया। टेंट में दिन में बिजली न होने से हमारा मोबाईल चार्ज नहीं हो पाया था। इसलिए बंद हो गया। अब किसी से सम्पर्क नहीं हो सकता था। यह भी एक समस्या हो गयी। जितने भी इष्ट मित्र परिजन थे इस अवधि में आशंकाओं से दो चार होते रहे। वे फ़ोन से जानकारी लेना चाहते थे लेकिन मोबाईल बंद होने से उन्हे सही जानकारी नहीं मिल पा रही थी। जैसा अफ़रा तफ़री एवं भगदड का माहौल बताया जा रहा था वैसा तो मुझे वहाँ नहीं लगा। हम लोग सीढी के पास से वापस आते हुए थक चुके थे। अब कहीं बैठने की जगह देख रहे थे। जहाँ खड़े होने के लिए जगह नहीं थी वहाँ बैठने के लिए जगह तलाश करना बड़ी बात है।

छोलदारियों का विहंगम दृश्य
हम चलते हुए आगे बढे तो एक स्थान पर चायवाले की 5-6 कुर्सियाँ खाली दिखी। बस हमने उन्हे हथिया लिया और चाय का आर्डर दिया। सभी ने आराम किया। उसने चाय एकदम घटिया बनाई। हमें चाय से कोई मतलब नहीं था, हमारा मुख्य उद्देश्य कुछ देर आराम करना था। यहां 1बज गए थे, पंकज और मैने कुछ फ़ोटुएं ली। अब विचार बनाया कि मसूरी की बजाए ॠषिकेश चला जाए। जब पहले मैं आया था तब हरिद्वार से ॠषिकेश जाने के 5 रुपए लगते थे। मैने सोचा कि अब अधिक से अधिक 20 रुपए लगेंगे। लेकिन जब पुल के नीचे जाकर ऑटोवालों से पूछा तो उन्होने आठ सवारी के 1600 रुपए बताए, ॠषिकेश से घुमाकर वापस लाने के। मै तो भौंचक रह गया। एक बार तो मन में आया कि बजाऊं उसके कान के नीचे। साले अनाप-शनाप किराया बता रहे हैं। दो चार ऑटो वालों से पूछा तो उन्होने भी यही किराया बताया। 

जय बाबा की - वानप्रस्थ की ओर अग्रसर :)
ॠषिकेश दो बार मेरा पहले भी देखा हुआ था, लेकिन जो नए लोग मेरे साथ आए थे वे देखना चाहते थे। आखिर 1500 रुपए में एक ऑटो तैयार हुआ। वह हमें मुख्यमार्ग की बजाय राजा जी पार्क के भीतर से नहर के किनारे-किनारे ॠषिकेश लेकर गया। उसने बताया कि ॠषिकेश पहुंचकर आपको 1500 रुपए युनियन में जमा करने होगें। फ़िर वहां से आपको रसीद और टाईम दिया जाएगा। उस टाईम पर आपको वापस आना है। युनियन वालों ने भी फ़र्जीवाड़ा खोल रखा है। पैसे की रसीद काटने के 10रुपए लेते हैं सवारियों से। खुले आम डकैती का शिकार हो रहे हैं पर्यटक। घुमकर आने के बाद रसीद दिखाने पर वह आपके रुपए वापस करेगा। ऑटो वाले कहा कि जब आपको वापस छोड़ देगें तभी आप किराया देना। ऑटो वाला गाजीपुर का था, कुछ अधिक ही चलता पुर्जा नजर आ रहा था। सोच रहा था कि मुफ़्त में ही 1500 हजम कर ले। लेकिन उसका पाला तो मोगेम्बो से पड़ा था। अभी उसने मेरा चमत्कार नहीं देखा था। जारी है.....आगे पढें।

बुधवार, 23 नवंबर 2011

चाहिए हमदर्द का टॉनिक सिंकारा --- ललित शर्मा

मथुरा जंक्शन में हमारे साथी
प्रारंभ से पढें
में हरिद्वार के लिए मसूरी एक्सप्रेस से जाना था, मसुरी एक्सप्रेस सरायरोहिल्ला से बन कर पुरानी दिल्ली से चलती है। अब समस्या यह थी कि मथुरा से कोई सीधी ट्रेन हो जो हम सबको पुरानी दिल्ली पहुंचाए। हम मथुरा से पुरानी दिल्ली तक की गाड़ी पकड़ने में असमर्थ रहे। पवन शर्मा जी ने जो लोकल बताई थी वह मथुरा से सुबह 10 बजे ही चल पड़ती है। इतनी जल्दी कोई भी स्टेशन नहीं पहुंच पाता। आखिर तय किया गया कि समता एक्सप्रेस से ही निजामुद्दीन पहुंचा जाए। पवन शर्मा जी ने हमें उसके बाद बुलंद शहर वाली लोकल बताई जो पुरानी दिल्ली जाती है निजामुद्दीन से ही बन कर। इसका चलने का समय 6 बजे हैं उन्होने हमारी सहायता की। हम मथुरा से ढाई बजे दोपहर में चल कर शाम को साढे पांच बजे निजामुद्दीन पहुंचे। प्लेट फ़ार्म नम्बर 3 पर बुलंदशहर वाली पैसेजंर खड़ी थी। सब उसमें सवार हो गए। सवा सौ सवारियों को सामान के साथ चढना उतरना भी महाभारत ही है। कोई एकाध नहीं उतर पाया या चढ नहीं पाया तो समस्या ही है।

ट्रेन का इंतजार
पुरानी दिल्ली पहुंच कर देखा तो कईयों की टिकिट कन्फ़र्म नहीं थी। मोबाईल से पी एन आर देखा तो गलत बता रहा था। इसलिए हमने सदा नेट पर रहने वाले ब्लॉगरों की तलाश की। जिसमें संगीता पुरी जी ही ऑनलाईन मिली। राजीव भाई तो अपनी ससुराल में थे, साली का जन्मदिन मना रहे थे। जी के अवधिया जी, पी के अवधिया हो गए थे। अब मजाल है कोई उनसे बात कर सके। इसलिए मैने संगीता जी से फ़ोन पर पी एन आर कन्फ़र्म किए। हमारे साथ बी एस ठाकुर सर थे, इन्होने मुझे मिडिल स्कूल में गणित विषय पढाया था। जिसकी वजह से गणित में सम्मानजनक अंक मिल गए थे, बाकी तो राम जाने कैसे पास हो गए। इन्होने मुझसे गुरु दक्षिणा स्वरुप मेट्रो में घुमाने का संकल्प लिया।

अपुन है भाई
गुरु का आदेश सिर माथे पर लिया और सवा सौ सवारियों में उन्हे चुपके से लेकर मैट्रो की सैर कराने ले गया। पुरानी दिल्ली मैट्रो स्टेशन में टिकिट ले रहा था तभी पीछे से आवाज आई "पकड़ लिया अंकल आपको" अरे! छोड़ो यह पकड़ा पकड़ी मत करो। कुछ नौजवानों ने मुझे स्टेशन के बाहर निकलते देख लिया था। वे भी पीछे पीछे पहुंच गए। अब उन्होने ने भी राजीव चौक की टिकिट ली। मुझे छोड़ कर मैट्रो देखने का सभी का पहला अनुभव था। सभी मुंह फ़ाड़े मैट्रो स्टेशन को ही देख रहे थे। एक कह रहा था कि ऐसा लगता है कि हम सिंगापुर में पहुच गए। अरे भाई दिल्ली सिंगापुर से कम नहीं है।

रात में दिन
बस जेब में माल होना चाहिए फ़िर सिंगापुर ही दिल्ली आ जाएगा। सारी मौज मस्ती सिंगापुर वाली ही मिल जाएगी। मुझे तो तब हँसी आई जब जो पहली बार दिल्ली पहुंचा है वही इसकी तुलना सिंगापुर से कर रहा था। मतलब हमारे देहात के लोग टीवी और फ़िल्मों के माध्यम से सिंगापुर पहले पहुंचते हैं और दिल्ली बाद में। पुरानी दिल्ली से हम राजीव चौक पहुंचे। गेट नम्बर 5 पर निकल कर बाहर आए। अब इन्हे पालिका बाजार दिखाया। पालिका बाजार का एक चक्कर लगाकर हम वापस उसी रास्ते से मैट्रो में बैठकर पुरानी दिल्ली पहुंच गए। एक घंटे में मैट्रो की सैर हो गई और हम भी गुरु ॠण से उॠण हो गए। अच्छा हुआ गुरुजी ने मैट्रो की सैर के लिए कहा, वरना यहाँ तो अंगुठा मांगने की परम्परा है। गुरु से चतुर चेले हो गए, अंगुठा देते नही वरन दिखा जरुर देते हैं।

बाबा साहेब याने गिलहरे गुरुजी
यात्रा आयोजक ने सबसे कह दिया था कि दिल्ली घूमने के लिए आपके पास पूरा समय है, लोग उत्साहित थे, लेकिन इन्हे दिल्ली घुमने के नाम पर मात्र 3 घंटे ही मिले। इतने कम समय में कहाँ जाए और कहाँ न जाएं। हमारी मेट्रो से वापसी तक कुछ लोग चांदनी चौक और लालकिले तक हो आए थे। गिलहरे गुरुजी मुझे पुल पर मिले और गुस्से बोले "आई नेवर टॉक टू यू"। मेरा माथा भी ठनक गया। इतनी गरिष्ठ अंग्रेजी मुझे हजम नहीं हुई। मैने भी कह दिया "जैसे तोर मर्जी, मोरो मन नइ हे तोर ले गोठियाए के' और आगे बढ गया। मैने किसी का ठेका ले रखा है क्या? जो कोई भी मेरे साथ लद ले। थोड़ी देर बाद गुरुजी को लगा होगा कि गलत कह दिया। वे आए और साफ़-सफ़ाई देने लगे। मसूरी एक्सप्रेस प्लेटफ़ार्म पर लग चुकी थी। स्लीपर कोच के बीच एसी बोगी लगा रखी थी। हमारी सवारियां दो हिस्सों में बंट गयी। तीन कोच में सवारियाँ थी और टी टी भी तीन थे। पहले एस 2 के टी टी को टिकट चेक कराई।

जप ले  हरि का नाम बंदे - बंछोर जी
एस 4 का टीटी हमारे यात्रियों को टिकिट चेक होने के बाद भी परेशान कर रहा था। इस बोगी में वेटिंग की 5 सवारियाँ थी, उन्हे जनरल में भेजने की धमकी दे रहा था। वे सवारियाँ मेरे पास दौड़ कर आई। मैं जब टी टी ई के पास गया तो मुझे कुछ नहीं कहा। थोड़ी देर बाद सवारियों को फ़िर धमका दिया। बाद में पता चला कि वह प्रति सवारी 100 रुपए चाहता था। फ़िर मैने उसे हिन्दी में समझाया, तब उसे समझ आया। गजरौला स्टेशन में गाड़ी आधे घंटे रुकी, तब तक लगभग 12 बज गए थे। यह वही गजरौला है जहाँ से गजरौला टाईम्स निकलता है और एक कालम में चिट्ठाकारों की पोस्टें छपती हैं। मेरी भी कई पोस्टें गजरौला टाईम्स में प्रकाशित हो चुकी हैं। सभी सवारियों को व्यवस्थित करने के बाद मैने भी अपनी सीट पर सोने का इरादा बनाया तो वहाँ ठाकुर गुरुजी सोए थे। सोचा कि नीचे ही हिन्दुस्तान टाईम्स बिछाया जाए और लेट मारी जाए। लेकिन गुरुजी ने जबरन सीट खाली कर दी। उनका आग्रह न टाल सका और सीट पर सो गया।

मौनी बाबा - नम्बर 1
रात को किसी के अकेले ही बड़बड़ाने की आवाज नींद में खलल डाल रही थी। उठकर देखा तो एक माता जी अपने से बातें कर रही थी। मैने उन्हे हाथ जोड़ कर निवेदन किया, "माता जी आपकी कृपा हो तो मैं सो जाऊं, अगर आप चुप रहें। तीन दिनों से सोया नहीं हूँ।" माता जी ने कृपा की और चुप हो गयी। थोड़ी देर बाद फ़िर वही बड़बड़ाने की आवाज आई। माता जी पुन: शुरु हो चुकी थी। मैं भी उनके साथ चर्चा में शामिल हो गया। अल सुबह अमृतवाणी श्रवण कर पूण्य लाभ प्राप्त कर रहा था। पौ फ़टने को थी, मौनी बाबा (चौरसिया जी) भी उठ चुके थे। ये सुबह उठने के बाद से आठ बजे तक नित्य मौन रहते हैं। इशारों से ही बातें करते हैं। माता जी इनके पीत वस्त्रों से प्रभावित होकर 21 रुपए की दक्षिणा से स्वागत किया। मौनी बाबा इशारे मना कर रहे थे पर वो मानने वाली कहाँ थी, 21 रुपए थमा कर ही मानी। यहाँ से मौनी बाबा के वानप्रस्थ की शुरुवात हो चुकी। हम भी मजे ले रहे थे। हरिद्वार स्टेशन आ गया। सभी प्लेट फ़ार्म पर रोलकॉल के उपस्थित हुए। एक महिला यात्री कम निकली। उसे एक घंटे तक ढूंढा गया, पता चला कि वह पहले ही वेटिंग रुम में जा चुकी थी।

चाहिए हमदर्द का टानिक सिंकारा
स्टेशन से बाहर निकलते ही ठंड का अहसास हुआ। मैने अपनी लोई डाल ली। स्टेशन के बाहर गायत्री परिवार का सहायता केन्द्र बना था। वहां सम्पर्क करने पर उन्होने हमें गौरीशंकर 1 का पता दिया। ऑटो वाले भी सवारियों को देख कर अनाप-शनाप किराया बता रहे थे। पुल तक ही पंहुचाने का 40 रुपए मांग रहे थे। जबकि वहां का किराया 5 रुपए से अधिक नहीं है। हमने एक तांगा 15 रुपए सवारी में तय किया। हरिद्वार में सुबह-सुबह गुलाबी ठंडे एवं हवा के बीच तांगे की सवारी करने का मजा लेना जो था। हमारा तांगा चल पड़ा। तांगे वाला भी डेढ होशियार था। उसने हमें पुल की गंगा जी में उतरने वाली सीढियों के पास उतार दिया। पुल से विशाल जन समुद्र का विहंगम दृश्य दिखाई दे रहा था। नर-नारियों का रेला चारों तरफ़ से आ रहा था। पुल की सीढियों पर गंगा जी से चढने वालों की भीड़ थी। उतरने वालों को कोई जगह नहीं दे रहा था। हमें मालुम नहीं था गौरी शंकर 1 किधर है। इसलिए मैने किनारे से रास्ता बनाकर उतरना चाहा। यह कदम बड़ा खतरनाक रहा। दो बार पैर फ़िसलने के कारण गिरते गिरते बचा। जारी है.........आगे पढें।

शनिवार, 5 नवंबर 2011

लखनऊ में मिलेगें स्वामी ललितानंद एवं स्वामी महफ़ूजानंद --- -ललित शर्मा

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
सामुहिक यात्रा के भी अपने मजे हैं, अकेले दुकेले यात्राएं बहुत की, लेकिन सामुहिक यात्रा दो-तीन ही हुई। आज से एक सामुहिक यात्रा पर फ़िर चल रहे हैं। पूरे गेंग में 117 यात्री हैं। बच्चे से लेकर बूढे तक। सामुहिक यात्रा के मजे हैं तो कुछ कठिनाईयाँ भी हैं। सभी का एक साथ ट्रेन में चढना उतरना एवं फ़िर उनको सही सलामत घर तक पहूंचाना एक बड़ी जिम्मेदारी हो जाती है। सन 1999 में हरिद्वार में अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन हुआ, तो मित्र चौरसिया जी के कहने पर हरिद्वार के लिए चल पड़े, मुझे 16 नवम्बर को दिल्ली में काम था। इसलिए 4 नवम्बर को रायपुर से चल कर हरिद्वार में कुछ दिन घुमक्कड़ी करके दिल्ली पहुंचना तय हुआ। लम्बी दूरी की मेरी पहली सामुहिक यात्रा थी। मेरी सीट कनफ़र्म थी, पर सभी लोग सामान्य श्रेणी के सवार थे, संगलोभ के कारण इनके साथ ही जाना तय किया। ट्रेन में मजदूरी के लिए छत्तीसगढ से पलायन करने वालों की भीड़ थी। हम लोग कुल 17 नग थे। जैसे तैसे ट्रेन में चढे और ट्रेन चल पड़ी।
विचार क्रांति अभिय
दुर्ग पार होने के बाद हमारे एक साथी को घड़ी मिली, उसने आवाज लगाकर पूछा कि यह घड़ी किसकी है? किसी ने जवाब नहीं दिया। तो घड़ी हमने रख ली, अगर कोई दावेदार होगा तो उसे लौटा दी जाएगी। शाम को हमारे एक साथी ने अपनी घड़ी गायब होने की सूचना दी। जब पूछा जा रहा था तो वे सामने ही थे, लेकिन तब ध्यान नहीं दिया। शिनाख्त करवा कर उनको घड़ी सौंप दी। गाड़ी आगे बढती गयी और सभी को स्थान मिलता गया। जैसे तैसे करके निजामुद्दीन से पुरानी दिल्ली पहुंचे। वहां से हमे रात को मसूरी एक्सप्रेस से हरिद्वार पहुंचना था। पुरानी दिल्ली पहुंचकर इन्होने दिल्ली भ्रमण का विचार किया। एक टूर वाले से मोल भाव करके प्रतिव्यक्ति 60 रुपए में दिल्ली घूमना ठहराया। बस से सभी दिल्ली भ्रमण पर निकल गए। बस वाले ने अपना रुट तय कर रखा था। साथ में एक फ़ोटोग्राफ़र भी था। एक फ़ोटो के 20 रुपए दाम और निगेटिव भी नहीं दूंगा कह रहा था। मेरे पास अपना कैमरा था, इसलिए मुझे जरुरत नहीं पड़ी। दिन भर दिल्ली घूमते रहे। शाम को बिड़ला मंदिर देखने के बाद पुरानी दिल्ली वापसी होनी थी। वहां पहुंचकर बस का डीजल खत्म हो गया, ईंजन ने एयर ले ली।
मसूरी का सर्पीला रास्ता
अब हमने उतर कर पुरानी दिल्ली के लिए बस पकड़ी। मेरे साथ पीछे सीट पर एक साथी बैठ गया। जैसे ही आगे की सीट खाली हुई, मैं आगे बढ गया और पुरानी दिल्ली सभी उतर गए। जब मसूरी एक्सप्रेस आई तो सवारियां गिने जानी लगी। एक सवारी कम निकली, कई बार गिन डाला। जैसे जैसे ट्रेन चलने का समय निकट आ रहा था, उस सवारी की तलाश व्यग्रता से बढते जा रही थी। आखिए में वह लड़का दौड़ते हुए आया और मेरे को बोला कि "महाराज आप मेरे को बस में छोड़ आए थे।" तो मैने कहा कि तु उतरा क्यों नहीं? तो उसने कहा कि "नींद लग गयी थी।" मुझे अनुभव हो गया कि ऐसे नींद लगाने वाले लोग रास्ते भर परेशान करेगें।" सुबह हरिद्वार पहुंचे, वहाँ टेन्ट की नगरी बसाई गयी थी। सभी ने रजिस्ट्रेशन करवा कर अपना अपना टेंट संभाला। टेंट में रुकने का मेरा यह पहला अनुभव था। ठंड अच्छी हो चुकी थी। ठंडे पानी से स्नान करना पड़ा। कौन गरम पानी का इंतजाम करके देता। यहां से गए यात्रियों ने वहां पहुंच कर अपना काम संभाल लिया, कोई सब्जी काटने लगा तो कोई तगाड़ी लेकर मिट्टी फ़ेंकने लगा। मतलब गुरु सेवा प्रारंभ हो चुकी थी। मैं आराम से कुर्सी पर बैठ कर देखता रहा। क्योंकि इस तरह का पहला अनुभव था।
द्रोणाचार्य गुफ़ा  सहस्त्र धारा
दुसरे दिन हमने (सीताराम गुरुजी और लखन वर्मा) ने तय किया कि घुमने चला जाए। जहां भी हम छत्तीसगढी में बात क्ररते थे आटो रिक्शा वालों का किराया 5 रुपए बढ जाता था, तो हमने तय किया कि इनसे बात सिर्फ़ मैं ही करुंगा। इसके बाद हम ॠषिकेष गए। दिन भर घूमे अच्छा लगा, शाम को गंगा आरती शामिल हुए। दुसरे दिन फ़िर वहीं पहुंच गए, चोटी वाले का होटल में नास्ता करके घूमे। लक्ष्मण झूला से मछलियों को आटे की गोलियां खिलाई। अगले दिन मसूरी जाने का कार्यक्रम बनाया। रात को हर की पौड़ी के पास एक ट्रेवलस से 155 रुपए में तीन टिकिट करवाई मसूरी के लिए, उसने बताया कि बस स्टैंड से सुबह 8 बजे 2x2 बस मिलेगी। जब हम बस स्टैंड पहुंचे तो हमे 3x2 की पिछली सीट में बैठाने लगा। मैने कहा कि टिकिट तो 2x2 का है और तुम 3x2 में बैठा रहे हो। उसने सीधा कहा कि "बैठ जाओ, नहीं तो पिट जाओगे", बड़ा अप्रत्याशित घटा। मेरा क्रोध चढ गया, मैने बिना कुछ कहे उसके सिर के बाल पकड़ कर तीन डंडे मारे तो स्टैंड के सारे ड्रायवर, कंडेक्टर आ गए। मैने गुरुजी से कहा कि "कंट्रोल रुम को फ़ोन करो, अभी इनकी सारी हेकड़ी उतार कर जाएगें। सालों ने दादा गिरी मचा रखी है। सवारियों से बदसलूकी कर रहे हैं।" फ़िर कुछ लोग बीच-बचौवल एवं मान मनौवल पर आ गए। उन्होने हमे सामने की सीट दी।
कैम्प टी फ़ॉल
अब नजारे देखते हुए, मसूरी की ओर चल पड़े। पहले स्थान था झंडू नाला, जिसे सहस्त्रधारा और द्रोणाचार्य गुफ़ा भी कहते हैं। यहां पहाड़ की चट्टानों से धाराओं में पानी निकलता है, मैने सोचा कि यही तो असली मिनरल वाटर है, न जाने कितने तरह की आयुर्वैदिक जड़ी बूटियों के सम्पर्क से बहते आ रहा है। वाटर बोटल में मैने पानी भर लिया। अब आगे चले तो पहाड़ियों की चढाईयाँ थी। चलते चलते टॉप पर पहुंचे, दृश्य इतने नयनाभिराम थे कि आँखों में ही नहीं समा रहे थे। कैमरे की आंखे भी नहीं समेट पा रही थी। पहाड़ों की रानी मसूरी आ चुकी थी। उपर पहुंच कर गाईड ने कहा कि"मसूरी के मौसम का और दिल्ली की लड़की का कोई भरोसा नहीं, कब धोखा दे जाए?" सभी सवारियाँ मुस्कुराकर रह गयी। मसूरी में माल रोड़ और गन हिल देखी। गनहिल तक रोप वे है। 50 रुपए टिकिट ले रहा था रोपवे वाला। वहां से कैम्प टी फ़ाल पहुंच गए, अच्छी जगह है, कैम्प टी फ़ाल की मैने 100 साल पुरानी तश्वीर देखी थी कहीं लेकिन अब वैसा नहीं है। इसके चारों तरफ़ अतिक्रमण की बाढ है। दुकानदारों ने इसे चारों तरफ़ से घेर इसकी सुंदरता को बरबाद कर दिया है। बाकी फ़िर कभी..........
आचार्य सतीश - अनंतबोध बाबा जी
आज मैं फ़िर एक सामुहिक यात्रा में चल पड़ा हूँ, जो मथुरा, वृंदावन से दिल्ली, दिल्ली से हरिद्वार, हरिद्वार हम मसूरी एक्सप्रेस से जाएगें और हरिद्वार में डेढ दिन का मुकाम है, वहां से मसूरी जाना चाहूंगा, पुरानी यादें ताजा करने के लिए, फ़िर हरिद्वार से लखनऊ, लखनऊ के लिए एक दिन का पूरा समय है, वहां से लखनऊ नरेश के साथ श्रावस्ती जाने का कार्यक्रम है, श्रावस्ती में भगवान बुद्ध ने अपने जीवन का सबसे अधिक समय बिताया था। इस एतिहासिक स्थल को देखे बिना यात्रा अधुरी ही रहेगी। श्रावस्ती से अयोध्या आकर रायपुर के लिए वापसी करनी है। डेढ दिन हरिद्वार में गंगा के किनारे स्वीस कॉटेज का आनंद लिया जाएगा और ॠषिकेश भी घूमा जाएगा। बाबा जी नर्मदा तट पर धूनी रमा रहे हैं, उन्हे कह दिया है कि हरिद्वार पहुंच जाएं। इब तो बाबा जी को मिलना ही पड़ेगा, नहीं तो दंड भरने को तैयार रहें :)। यह यात्रा शांतिकुंज हरिद्वार के आमंत्रण पर हो रही है, वहां महापूर्णाहूति समारोह के युग सृजन महाकूंभ में शामिल होगें। हमारा 117 यात्रियों का दल अब चल पड़ा है भ्रमण पर। वापस आकर यात्रा की कथा सुनाएंगे। इस बीच अगर कोई ब्लागर मित्र सम्पर्क करना चाहते हैं तो फ़ोन पर उपलब्ध हूँ।

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

ब्लॉग बाबा जमावड़ा और शास्त्रार्थ ---------- ललित शर्मा

आज हम टहलते हुए गुगल के बिग मॉल पर पहुंचे तो एक पुरानी भूली बिसरी दुकान पर हमारा एक प्रोडक्ट दिखाई दे गया। उन दिनों की याद आ गयी, जब दो बाबाओं में शास्त्रार्थ हुआ था। हम पूरा का पूरा शास्त्रार्थ पुरानी दुकान से उठाकर नयी दुकान पर ट्रांसफ़र कर दिए। नवीन शास्त्रार्थ का पठन लाभ लेकर ज्ञान रंजन कीजिए।
आज पान की दुकान पर  अनिल भाई का ड्यूटी था लेकिन वो नागपुर में चक्का जाम में  फँस गए ,तो क्या  करें? हम पान की दुकान पर बैठ के चुना लगा रहे थे. तभी महेंद्र मिश्रा जी आ गए!
हमने कहा......."पाय लगी मिसिर जी, आज कैसे विलम्ब हो गया? हम तो आपका पान लगा के रख दिये थे"
मिसिर जी बोले.....का बताएं शर्मा जी.......आज हमारे बुलाग मोहल्ले में नए साल पे एक बाबा पधारे हैं.........लंगोटा नन्द महाराज... तो हम उनके आश्रम पे चले गए थे... उन्हां जाके देखे तो .... हमने बाबा जी नया साल का शुभ कामना दिया.... तभी देखा और बुलागर भी आ रहे हैं बाबा जी के पास तब हम तो खिसक लिए............... तभी बिलम्ब हो गया.
हमने कहा......ई तो बढ़िया समाचार बताये मिसिर जी......... जरा हम भी दुकान बढा के ........बाबा लोगन के दरशन-परसन करके आते हैं....! 
तो भैया हम भी दुकान बढ़ाये और पहुँच गये लंगोटा नन्द महा मठ वाणी आश्रम में......... वहां बाबा लंगोटा नन्द महाराज कह रहे थे...................... इसके बाद हम आश्रम से डिरेक्ट सवांद आपको सुना रहे हैं.... आप भी मौज लीजिए......
राज भाटिय़ा .........बाबा जी प्रणाम !! भर पेट खाने के बाद भुख नही लगती ?? कोई जडी बुटी बताये महा राज आप को ओर आप के परिवार को नववर्ष की बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ! 
लंगोटा नंदजी महाराज ....बच्चा राज भाटिया, कल्याण हो,चिंता न करो,उपाय बता रहे हैं- काली बिल्ली की पूंछ में लाल कपड़ा बाँध कर हमारी भभूत का लेप उसपर चढ़ा दो, हम भभूत जल्द भेजेंगे, तुम्हारा कल्याण होगा,खाना खाने के बाद जबरदस्त भूख लगेगी!
लंगोटा नंदजी महाराज ......सभी ब्लोगर बच्चा, कोई भी समस्या हो, तुरंत निसंकोच संपर्क करो,हमारी भभूत द्वारा हर समस्या का निदान संभव है, हमारे मठ में हिमालय की जड़ी-बूटी द्वारा मंत्रित भभूत चमत्कारी असर करेगी !नक्कालों से सावधान ! नव वर्ष में सभी ब्लागरों का कल्याण हो !
ताऊ रामपुरिया .....बाबाश्री लंगोटानंद जी नववर्ष की शुभकामनाएं. नववर्ष मे आपके चेलों की संख्या मे असीमित वृद्धि हो. यही कामना है
लंगोटा नंदजी महाराज ........बच्चा, रामपुरिया, कल्याण हो! अंग्रेगी नव वर्ष की बधाई हो !बच्चा, हमको पता है तुम्हे टीआरपी की जरूरत नहीं है,तुम्हारा ब्लॉग जगत में बड़ा नाम है, खूब तरक्की करो, हमारे मठ में भी भभूत ग्रहण करने आ जाना, और ऊँचा नाम होगा ! बच्चा हमारे फोलोवर बनकर हमारी शिष्यता स्वीकारो !
अब बाबा लंगोटा नन्द और ताऊ जी का संवाद चल ही रहा था तो हम भी उठा के अपना जुमला ठोक दिये. बाबा जी भी मुंह फार के देखने लगे
ललित शर्मा ......बाबा जी तीन काल का दरस है,सन् 2010 का नया बरस है,नये साल की आपको बधाई,कांबल ओढ के खाओ मलाई,
लंगोटा नंदजी महाराज ......बच्चा रामपुरिया, हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हुए, मांग लो वरदान !ताऊ रामपुरिया ...बाबाजी वरदान ई देणो चाहो हो तो कोई दूध आली पहलूण झौठडी दिलवाण की किरपा करो.:)
लंगोटा नंदजी महाराज ......बच्चा रामपुरिया, कल्याण हो! तुम हमारे प्रिय शिष्यों में से हो, हम तुम्हे चमत्कारी भभूत भिजवाने की व्यवस्था कर रहे हैं तुम हमारी भभूत की ३० पुड़िया बना लेना और स्नान के बाद प्रतिदिन ब्रेकफास्ट के साथ फांक लेना, एक मंत्र भी दे रहे हैं- ॐ लंगोटा नन्द फट स्वाहा ! इस मंत्र का जाप रात को खुली छत पर उलटे लेटकर १० बार करना ! जल्द ही अरब पति हो जाओगे ! खुश रहो !
ताऊ रामपुरिया ....जय हो बाबा श्री लंगोटा नंद महाराज की जय हो.बाबाजी एक बात पूछनी थी कि अगर ॐ लंगोटा नन्द फट स्वाहा ! का जाप रात के साथ साथ दिन मे सीधे लेटकर भी कर लिया जाये तो असर कुछ जल्दी होगा क्या? जय हो सच्चे गुरु लंगोटा नंद महाराज की जय हो।
लंगोटा नंदजी महाराज ...बच्चा ललित शर्मा, कहाँ हो? जल्दी आओ.. बच्चा रामपुरिया को समझाओ कहीं उल्टा आसन न कर बैठे, हमें बड़ी चिंता हो रही है.
ताऊ रामपुरिया .....जय हो बाबा लंगोटानंद जी की, अब समझ गये अब नही करेंगे. और बाबाजी ललित जी तो ढोसी के पहाड पर तपस्या करने चले गये हैं. खुद बाबा ललितानंद बन कर. 
तभी अचानक बाबा शठाधीश जी महाराज का आगमन होता है वो आते ही एक सवाल दागते हैं. सुनिए.
श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज .....अलख निरंजन, ये किसका धुणा है, कौन बाबाजी बिराजते हैं?हमारा एक चेला बहुत दिन से हमारी लंगोटी लेकर फ़रार हो गया है, तब से हम उसको ढुंढ रहे है। कहीं मिले तो बताना। बिना गुरु के ज्ञान नही। ज्ञान बिना स्थान नही॥ अलख निरंजन
इसके बाद इस कहानी में एक नए पात्र का प्रवेश होता है वो हैं पी.सी.गोदियाल जी,अब आगे देखिये
पी.सी.गोदियाल ........."हम हिमालय से तुम्हारी पीड़ा दूर करने के लिए ही उतरे हैं,...."बाबा जी एकदम झूठ बोल रहे है आप ! हिमालय से इसलिए उतर भागे क्योंकि वहाँ पर ठण्ड से कुल्फी जम रही है !:) मैं भी हाल ही में होकर आया हूँ !
लंगोटा नंदजी महाराज ......बच्चा गोदियाल, कल्याण हो ! हम तो लंगोटधारी हैं,ठण्ड हो या बरसात-गर्मी हम नहीं डरते, क्या मार सकेगी ठण्ड उसे ब्लागरों के लिए जो जीता हो,
पी.सी.गोदियाल ...........बाबा धीरे बोलो, वो शठाधीश बाबा आप ही को ढूंढ रहे है ! पता है आपको जब दो बाबा लड़ते है तो चिमटे से बजाते है एक दुसरे को :)
लंगोटा नंदजी महाराज ......श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज!आप हम पर शक न करें, हम तो एक मात्र लंगोट सहित पैदा हुए हैं , ब्लॉग जगत में बहुत से चालू बाबा घूम रहे हैं , उनकी लंगोट चेक करें! कल्याण हो ! 
लंगोटा नंदजी महाराज .....बच्चा गोदियाल, हम न तो किसी प्रकार का नशा करते हैं और न ही किसी नशेडी चिलम खोर बाबा से डरते हैं, नशे का जो हुआ शिकार,उतर जायेगा पाखण्ड का बुखार ! कल्याण हो !
राज भाटिय़ा .......लंगोटा नंदजी महाराज जी आप की शकल ओर बाते तो हमारे ताऊ राम पुरिया से मिलती है, ताऊ भी बहुत पहुचा हुं गुरु बाबा है बडो बडो को टोपी पहन देता है,अब कोई उपाय बताओ वो मेरे सारे पैसे वापिस कर दे, जब भी मांगो तभी नयी टोपी पहना कर फ़िर से पैसे ऎंठ लेता है गवाह सारा ब्लांग जगत है बाबा आप का टिकाना कही इंदोर मै तो नही है, जय हो बाबा लंगोटा नंदजी महाराज जी की जय हो.
लंगोटा नंदजी महाराज ......बच्चा राज भाटिया, कल्याण हो! पहले हमारे फोलोवर बनकर हमारी शिष्यता ग्रहण करो,तब भभूत पार्सल करेंगे, रामपुरिया पहले से हमारा परम शिष्य है !
पी.सी.गोदियाल ......श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज आप सुन रहे है न ? आपके इन लगोट चोर बाबा ने आप पर कितना गंभीर आरोप मडा है , जल्दी जबाब दीजिये वरना मैं भी बाबा लंगोट के खेमे में चला जाउंगा , वैसे भी आजकल दल्बद्लुओ की ही ज्यादा चलती है !
लंगोटा नंदजी महाराज ......बच्चा गोदियाल, क्यों दो बाबाओं की कुश्ती करने पर तुले हो ? कल्याण हो!
श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज .......अलख निरंजन! बाबा लंगोटानंद जी, आपको क्या पता लंगोटी चोरी होने का दर्द, हम तो ऐसे ही घुम रहे हैं। ठंड इतनी ज्यादा है कि चिलम पीना ही पड़ता है। नही तो ईंजन ठंडा हो जायेगा।अगर कोई भक्त पैग की भी बेवस्था करवा दे तो रात कट जाती है। ध्यान रहे हम बाबा वामपंथी(अघोरी)है और पंच मकारों को धारण करते हैं, वही मुक्ति का मारग है।
पी.सी.गोदियाल .......मैंने आज से दल बदल लिया, मैं बामपंथियों (सबसे निठल्ले ) के दल में कदापि नहीं रह सकता, इसलिए आज से मैं लंगोतानंद बाबाजी के खेमे में हूँ 
लंगोटा नंदजी महाराज .........बाबा शठाधीश जी, कल्याण हो ! अगर इतनी ही ठण्ड लगती है तो शादी कर लें , साल के ३६५ दिन इंजन गर्म रहेगा !
श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज .......लंगोटानंद महाराज,आप भी संतों को गलत सलाह दे रहे हैं,गाछी, बाछी और दासी। तीनो संतो की फ़ांसी ॥ ये संतो का काम नही है।
ताऊ रामपुरिया ......बाबाजी आपको मालूम है कि नही बाबा शठाधीश महाराज का लंगोट भी डेढ महिने पहले चोरी हुआ था...जरा आपके प्रज्ञा चक्षुओं का इस्तेमाल करें और बताये...शठाधीश महाराज डेढ महिने से बिना लंगोट घूम रहे हैं.
लंगोटा नंदजी महाराज .......बच्चा रामपुरिया, हमारे पास एक मात्र लंगोट है .. दो होती तो एक श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज को दे देता, उन्हें इस तरह नागा न घूमने देता ! कल्याण हो
श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज ........अलख निरंजन, मद्यं,मासं,मीनं,मुद्रं, मैथुनं एव च। ऐते पंच मकार: श्योर्मोक्षदे युगे युगे। यह पंच मकार ही मोक्ष का मार्ग है। इन्हे धारण करने से ही मोक्ष मिलेगा॥ तभी कल्याण होगा
लंगोटा नंदजी महाराज .......श्री बाबा शठाधीश जी महाराज दूसरों को मोक्ष का मार्ग दिखाने से पहले खुद मदिरा-पान से मोक्ष पा लें ! कल्याण हो 
लंगोटा नंदजी महाराज .......श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज! संत तो श्री तुलसी दास, कबीर दास को कहते हैं, ये मदिरा-पान नहीं करते थे,आप तो इन सबसे हटकर हैं, इसलिए आपको सही सलाह दी है, बूरा लगा हो तो खेद है ! कल्याण हो !
श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज .......मोक्ष का सरल रास्ता और बताते है। पहले तो हमने पंच मकार बताए थे अब सुनो, पीत्वा-पीत्वा पुनर्पित्वा, यावत्पतति भुतले। पुन: उत्त्थाय पुनर्पित्वा, पुनर्जन्म ना विद्यते॥ किसने कहा मदिरा पान बुराई है, जिन्होने छिप के पी,उन्होने ही बात उड़ाई है। अलख निरंजन
सिद्ध बाबा बालकनाथ त्रिकालज्ञ ......ये क्या होरहा है बच्चा लोग? हर हर महादेव...
यहाँ पर लंगोटा नन्द जी महाराज हैरत में पड़ जाते हैं की अभी तक तो हम एक ही बाबा थे अब ये सब नए-नए बाबा कहाँ से निकल-निकल कर आ रहे है. बड़ी सोचनीय स्थिति में फँस जाते हैं और कहते हैं. 
लंगोटा नंदजी महाराज .........सिद्ध बाबा बालकनाथ त्रिकालज्ञ कल्याण हो!आप आये मठ में हमारे, हमें भी हैरत है, कभी हम अपनी लंगोट देखते हैं , कभी आपको ......?
श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज .......मृत्यु लोक पे मना है धर सोम रस की आस । जब लेकर आयेगी उर्वशी,दौड़ेंगे सब उसके पास॥
लंगोटा नंदजी महाराज ......श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज, कल्याण हो, शायाद आप कहना चाहते हो खुलकर पीने में क्या बुराई है, तो खूब पियो, कलेजा आपका जलेगा,परेशान आपके चेले होंगे.. वैसे आपका नाम तो ढीठा धीश महाराज होना चाहिए था, ये नाम आप पर फिट बैठता है !
श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज .........लंगोटा नंद जी महाराज, हमने पहले ही बताया, हम वाम पंथी हैं। दुनिया के जितने भंगेड़ी, गंजड़ी, शराबी, कबाबी, शठ, मुरख, बेवकुफ़, अज्ञानी, बेध्यानी, लु्च्चे, लफ़ंगे, सब हमारे पट्ट शिष्य हैं।तभी तो हम शठाधीश कहलाते हैं। इस ब्रह्माण्ड मे हम अकेले शठ संत है। इसीलिए जगत शठों की वंदना करता है। हमारे आशीर्वाद और श्राप का तुरंत फ़ल मिलता है।इसलिए कहा गया है,
शठ की संगत कीजिए तज काम और धाम। 
शठ से ही संसार चले शठ को कोटि प्रणाम्!


लंगोटा नंदजी महाराज ........श्री श्री बाबा शठाधीश जी महाराज, कल्याण हो! सत्य वचन है !
इतना कह कर दुनो बाबा लोग अपने-अपने मार्ग पर चल दिये. हम खड़े होकर सोच रहे थे!
दुनो बाबा जी के बीच जो ज्ञान रंजन हुआ  उसको सुनकर हम आनंदित हो उठे, चलो भाई हमारे बुलाग मोहल्ले के बाबा लोग भी ज्ञानी ध्यानी हैं. दू पक्ष हर जगह दिखता है, यहाँ पर भी दू पक्ष दिखाई दे रहा हैं, लेकिन दुनो बाबा कितने संयमी हैं. हमारे को ये देखने मिला और दुनो ने एक उदहारण पेश किया बुलाग जगत के सामने. हमने ये कहानी यूँ ही नहीं लिखी है,आप एक -एक संवाद देखिये. आपको लगेगा यही संसार है.
चलिए एक बार जय बोलिए बाबा शठाधीश जी महाराज की जय . लंगोटा नन्द जी महराज की जय