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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

इनकी उनकी नाक कटन्ना, उनने इनकी नार हरन्ना -- ललित शर्मा

जय लंकेश
गतांक से आगे
रावण को मैदान में छोड़कर मैं घर चले आया। उदय ने मुझसे कहा कि-"पापा सोनपत्ती तो आप लाए ही नहीं, फ़िर से जाओ और रावण जलने के बाद सोनपत्ती लेकर आना।" अब पुत्र का आदेश मानना ही पड़ा। दुबारा रावण भाटा जाकर रावण के मरने का इंतजार करने लगे। इस दौरान कुछ लोग चर्चा कर रहे थे कि इस बार का रावण दुबला नजर आ रहा है। पिछले साल तो अच्छा मोटा तगड़ा था। रमेसर ने कहा कि- "26 रुपया में तो रावण इतना ही मोटा होगा। अगर अधिक मोटा और बड़ा करना है तो आलुवाले से बात करो, कुछ गरीबी रेखा की राशि बढे तो इसका भी खर्चा चले।" माहौल कुछ शांत होने पर चचा भी घर से चले आए। तो उनसे पता चला कि रावण बनाने के लिए उन्हे 1500 रुपए दिए थे कमेटी वालों ने। एक बार तो गाय रावण के 4 सर फ़ोड़ गयी और दुसरी बार उसका पैजामा खा गयी। दो सौ रुपए जेब से भरने के बाद रावण तैयार हुआ। अब इतने कम बजट में तो रावण ऐसा ही बनेगा। अब रावण की सेहत की असलियत सामने आ गयी थी। राम दल और रावण सेना के मंच पर आने में देरी थी। इस बीच मैं उदय को घर से ले आया गोल गप्पे खिलाने के लिए।

राजु गुप्ता - सिमरन चाट सेंटर
सार्वजनिक उत्सवों के स्थल पर एक छोटा-मोटा मेला लग जाता है। गुब्बारे वाले, चाट वाले, पान वाले, मिठाई वाले, साईकिल स्टैंड वाले अपनी दुकान लगा लेते हैं। लोग भी तफ़री के साथ मुंह का स्वाद बदल लेते हैं। उदय को लेकर राजु के गोलगप्पे के ठेले पर पहुंचा और उसे गोलगप्पे खिलाने को कहा। इस बार इसके रेहड़ी की रौनक बदल गयी। सब कुछ नया और साईन बोर्ड के साथ "गुप्ता चाट भंडार" से नाम बदल कर "सिमरन चाट सेंटर" रख दिया था। पहले तो मुझे शक हुआ कि कहीं इसने दीवाला तो नहीं निकाल दिया है। फ़िर सोचा कि इसके पास इतनी सम्पत्ति तो है नहीं कि दीवाला निकाल सके। जब सेठों के पास धन होता है तभी दीवाला निकालते हैं और एक बेटी की शादी का जुगाड़ हो जाता है। लाला जी ने मुझे एक बार बताया था कि उन्होने 5 बार दीवाला निकाल कर 8 बच्चों की शादी कर दी थी। जब किसी के यहाँ लड़की का रिश्ता लेकर जाते थे तो संबंधी सबसे पहले यही पूछता था कि-" लाला जी कै बार? तो लालाजी गर्व से बताते 5 बार। बस तुरंत रिश्ता तय हो जाता। क्योंकि संबंधी इससे अंदाजा लगा लेता था कि एक बार के दीवाले में सेठ जी ने कितना माल अंदर किया है। तुम्हारी भी जय जय हमारी भी जय जय।

भीषम-गोपाल-गोबरधन
राजु के ठेले के बगल में भीषम ने अपनी नयी मुंगफ़ली की दुकान लगा थी, उसके बगल मे गोबरधन ने पुरानी मुंगफ़ली की दुकान लगायी थी। शांति लाल मुंगफ़ली सेकने के लिए पंखा हिला-हिला कर सिगड़ी सिलगा रहा था पर लकड़ी कच्ची होने के कारण धूंवा दे रही थी। भीषम बचपन से ही बस स्टैंड में अपना पसरा (दुकान) लेकर बैठता था, जिसमें उबली हुई शकरकंद एवं चना-चबेना रख कर बेचता था। जब हम प्रायमरी स्कूल में पढते थे तो वह रोज 5-7 रुपया कमा लेता था। हमारी दृष्टि में वह उस समय पैसा वाला था। कभी अपने साथ होटल में समोसा भी खिला देता था। वह आज भी नहीं बदला, बिलकुल वैसा ही है, मेरे पहुंचते ही लड़के को बुलाकर मेरे लिए पान मंगवाया। कहने लगा, महाराज के स्वागत मे कोई कमी नहीं होनी चाहिए। गोबरधन मेरे से उम्र में बड़ा है। यह बस स्टैंड पर कांच की बरनी में संतरे की टिकिया लेकर बसों में बेचता था अब दारु भट्टी के सामने फ़ल्ली और मौसमी चखने की दुकान लगाता है।

गुब्बारे वाले, मेले की शान
पिछले बरस के बाद आज गांव के सार्वजनिक कार्यक्रम में पहुंचा था। सभी पुराने मित्र लोग यहीं मिल रहे थे और उनसे मिल कर आनंद भी आ रहा था। मुझे सामने से प्रताप सिंह लंगड़ाते हुए आता दिखाई दिया। आँखों पर मोटा चश्मा लगा रखा था। जय जोहार होने के बाद उससे हाल-चाल पूछा तो कहने लगा कि शुगर की बीमारी हो गयी है और इसके कारण किडनी खराब हो गयी और आंखों में मोतियाबिंद उतर आया। खेत बेचकर इलाज करवाया है, अब ठीक है। एक बेटे और दो बेटियों की शादी कर दिया, एक बेटा और बचा है कुंवारा, अब के सीजन में उसकी भी शादी करना है। जब हम आठवीं में पढते थे तो प्रताप की शादी हो गयी थी और नवमी पहुंचते-पहुंचते एक बेटा भी। जब ग्याहरवीं पास हुए तब तक प्रताप तीन बच्चों का बाप बन चुका था। एक तरह कुछ जल्दी ही बूढा हो गया। मैने उससे घर आकर ठीक से मिलने का वादा किया। अब उसने पान गुटखा खाना भी बंद कर दिया है। डॉक्टर ने कहा है कि अब खाएगा तो दुनिया की कोई दवाई उसे नहीं बचा सकती।

रंग बिरंगी मिठाई
मिठाई वाले की दुकान में रंग बिरगीं मिठाईयाँ सजी थी। नारियल की बरफ़ी, खाजा, पेठा, शक्करपारे, सलोनी, सेव भुजिया, जलेबी, बालुशाही आदि। साथ में गुटखे भी बेच रहा था, बगल में उसकी बीबी ने अलग दुकान लगा रखी थी। बेटे की बहू दोनो दुकानों में काम देख रही थी। एक ग्राहक के पूछने पर उसने जलेबी का मुल्य 20 रुपए पाव बताया। मंहगाई बहुत बढ गयी, दो साल पहले ही 30 रुपए किलो जलेबी आती थी। बस एक मिठाई से ही बाकी का अंदाजा लग गया। तभी कहीं से तितलियों का एक झुंड उड़ कर आया और मिठाईयों पर छा गया। बस फ़िर दुकानदार व्यस्त हो गया। किसी ने शक्करपारे लिए तो किसी ने बालुशाही। मेले की असली मौज तो यही है जो अच्छा लगे खाओ और खरीदो बिंदास होकर। मिठाईयों में रंग बहुत अधिक डाल रखा था। दूर से ही देख कर मन ललचा जाए खाने को, पर सेहत का भी ध्यान रखना पड़ता है। रंग सेहत को नुकसान पहुचाते हैं।

रावण है तैयार - जय लंकेश
कुछ हो हल्ला होने लगा, बैलगाड़ियों पर सवार रावण सेना नगर भ्रमण कर आयोजन स्थल पर पहुच रही थी, बैलगाड़ियों को देखकर भीड़ ने रास्ता बना दिया। रावण की सेना के पीछे-पीछे राम की सेना भी पहुंच गयी। माईक पर उद्घोषणा होने लगी, शीघ्र ही रामलीला शुरु हो रही है। मैं जब स्टेज पर पहुंचा तो रावण और राम की सेना आमने-सामने विराजमान हो चुकी थी। विदूषक रामायण जी की आरती कर रहे थे। रावण महाराज अपने दसशीश को गोद में रखे बैठे हुए थे। मेरे आग्रह करने पर उन्होने शीश धारण किया जिससे मैं फ़ोटो ले सका। सामने के मंच पर राम दल था। राम और लक्ष्मण शांत नजर आ रहे थे पर हनुमान एवं अंगद उछल कूद कर रहे थे। अंगद का पात्र मेरा पुराना मित्र है। बचपन से राम लीला में अपनी भूमिका निभाता है। माईक पर घोषणा हो रही थी कि अहिरावण वध, अंगद रावण संवाद, और लंका विजय के पश्चात ही रावण दहन होगा।

अब अंगद है तैयार - दिया रावण को ललकार
कुछ वर्षों से नयी परम्परा चली है कि रावण का वध राम के द्वारा न हो कर रामलीला के मुख्यातिथि के द्वारा किया जाता है। रावण वध का अधिकार राम से कब छिन गया पता ही न चला उसे। अब पुतले में आग लगाने के लिए मंत्री-संत्री का इंतजार किया जाता है। पुलिस संरक्षण में प्रतिवर्ष रावण को मारा जाता है पर किसी पर कोई कार्यवाही नहीं होती। भाऊ बोले कि- पिछले साल रावण एवं रामलीला कमेटी की मांग पर मंत्री जी ने चबुतरा बनाने की घोषणा की थी पर अभी तक चबुतरे का निर्माण नहीं हो पाया है। अरे भैया, सरकारी काम सरकारी जैसे होता है। मंत्रियों का काम तो घोषणा करना है। घोषणा करने के लिए तो इन्हे मंत्री बनाया जाता है। राम लीला सम्पात्ति की ओर थी। मुख्यातिथि का कहीं पता नही। पब्लिक घर वापस जाने लगी। इस बीच हम भी एक चक्कर घर का लगा आए। फ़ेस बुक पर एक फ़ोटो चेप कर ताजा अपडेट दे आए रामलीला मैदान का मित्रों को।

राधाकृष्ण टंडन- अशोक बजाज- किसन शर्मा
आखिरकार चचा की मेहनत रंग लाई। उन्होने मंच पर जाकर रामलीला को थोड़ा विस्तार दिया,जिससे समय व्यतीत हो सके। मंत्री जी न आने पर रावण दहन के लिए अशोक भाई को फ़ोन लगाया। वे दुसरे शहर में रावण दहन कर रहे थे। सूचना मिलते ही तत्काल पहुच गए। उनकी शुभकामनाओं के साथ रावण का दहन हुआ। ग्रामवासियों ने लंका विजय का उत्सव मनाया। एक दुसरे को सोन पत्ती भेंट पर यथा योग्य आशीर्वाद लिया और विजयादशमी पर्व की बधाई दी। रावण दहन का कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद भी चचा के मत्थे एक उलाहना मढ ही दिया गया कि रावण के पुतले में पटाखे कम डाले गए। पटाखों के पैसे चचा अंदर कर गए। हमने चचा का पक्ष लिया। जब दिल्ली में बैठे नेता लाखों करोड़ रुपए जनता का खा गए तो चचा ने इतनी मंहगाई में दो-चार पटाखे कम लगा कर कौन सा गुनाह कर डाला। कैसे भी हो, विजयादशमी का उत्सव तो मनवा दिया, रावण का दहन तो करवा दिया अन्यथा साल भर फ़िर रावण से हलकान होना पड़ता। चचा कह रहे थे - राम रवन्ना दुय जानना, एक क्षत्रिय, एक बम्हन्ना, इनकी उनकी नाक कटन्ना, उनने इनकी नार हरन्ना,फ़िर दोनों में हुई लडन्ना, तुलसीदास ने रची पोथन्ना। चचा ने सभी पाठकों को विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं देने कहा है, चचा की शुभकामनाएं ग्रहण कर ली तो अब हमारी भी बधाई स्वीकार करें।


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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

चचा पंचायती लाल मुहल्ले वाले --- ललित शर्मा

चचा पंचायती लाल मुहल्ले के एक ऐसे पात्र हैं, जिनके बिना कोई सामाजिक एवं सार्वजनिक कार्य के सम्पन्न होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। समाज सेवा करना इनका बचपन का शौक है और बढ-चढ कर भागीदारी निभाते हैं। नवरात्रि पक्ष शुरु होने वाला था, मोहल्ले में कई वर्षों से दुर्गा स्थापना नहीं हो पा रही थी। इसका मुख्य कारण चचा का इस आयोजन से अलग हो जाना ही था। चचा दुर्गा स्थापना के आयोजन से अलग नहीं होते, अगर उनके गले खर्च की उधारी नहीं पड़ती। कमेटी के सदस्य चंदे का रुपया हजम कर गए और उधारी चचा के गले पड़ गई। बीबी के गहनों को गिरवी धर कर उधारी चुकानी पड़ी। तब से चचा ने कान पकड़ कर तौबा कर ली कि मोहल्ले के छोकरों के चक्कर में नहीं पड़ेगें। इस वर्ष मोहल्ले के छोकरे चचा को फ़ांसने का उद्यम कर रहे थे। चचा को जाकर उन्होने मनाया कि आपके अलग होने से मोहल्ले की शान खराब हो रही है। दुसरे मोहल्लों में दुर्गा स्थापना का आयोजन हो रहा है और आपके रहते हमारा सूना पड़ा है। चचा पुरानी बातों को भूल कर एक बार फ़िर चने के झाड़ पर चढ गए। उन्हे दुर्गोत्सव कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया और दुर्गा स्थापना की कार्यवाही शुरु हो गयी।

चचा की खासियत है कि जिस काम को हाथ में लेते हैं उसे जिम्मेदारी से करते हैं, चाहे बेगारी हो। सामाजिक कार्य के लिए चंदा मांगने इन्हे कोई शरम नहीं आती। चंदा मांगने के लिए एक से बढ कर एक दोहे गढ रखे हैं। जिस किसी के पास चंदा लेने जाते हैं उसे गरुड़ पुराण की तरह पहले दोहे सुनाते हैं और फ़िर दूहते हैं। कहते हैं - मांगन से मरनो भलो, जो मांगु अपने तन के काज, परमारथ के कारने मोहे न आवे लाज। जब लाज ही त्याग दी तो चंदे का जुगाड़ तो होना ही था। मोहल्ले के लड़के इनके संग चल कर चंदा उगाही में साथ दे रहे थे। परमेश्वर को कोषाध्यक्ष बनाया गया। चंदे के रुपए उसी के पास जमा हो रहे थे। परमेश्वर किसी और ताक में लगा था। चचा सुबह से उसे ढूंढ रहे थे। परमेश्वर मिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। होता तो मिलता, मौका और रुपए का सुयोग पाकर वह चंद्रिका के साथ फ़रार हो गया। अब मुर्ति वाला, टेंट वाला, माईक वाला, किराने वाला सबको पैसा चुकाना था। अगर दुर्गा स्थापना नहीं होती तो चचा की नाक कट जाती। कुछ लोग शब्दों की छूरी लेकर प्रतीक्षा में बैठे थे। जिन्होने चंदा दिया था वे चचा का धुर्रा बिगाड़ देते। अब मुड़ पकड़ कर बैठने अलावा चचा के पास दूसरा कोई चारा नहीं था।

संकट के समय अपना ही काम आता है, चचा अपने बचपन के मित्र (मितान) के पास पहुंचे और रोना रोने लगे। मितान ने चचा को दस हजार देते हुए कहा कि - रुपया पैसा की चिंता छोड़ो, पहले काम को निपटाओ, अन्यथा बेईज्जती हो जाएगी। परमेश्वर भाग कर कहाँ जाएगा, उसे एक दिन गाँव में वापस आना ही है। मिलते ही रुपए वसूल लेगें। मितान के एन वक्त पर काम आने से चचा की ठुकाई करने के मंसुबे पाले विरोधियों की योजना पर पाला पड़ गया। चचा ने धूम-धाम से दुर्गास्थापना की और पूजा पाठ चलते रहा। चचा भी सीना तान कर विरोधियों को चिढाते रहे। नवमी को दुर्गा विसर्जन के पश्चात दसमी को दशहरा मनाने की परम्परा है। इस दिन रावण का पुतला जला कर लंका लूटी जाती है। साल भर से लोग दशहरा के त्यौहार का इंतजार करते हैं। इस दिन रावण वध स्थल पर मेला भी भरता है। चाट-गोलगप्पे से लेकर मिठाई और खिलौनों की दुकाने सजती हैं। काफ़ी रौनक रहती है। दशहरा का रावण बनाने का जिम्मा भी चचा के ही गले पड़ गया। चचा चुनौतियों को स्वीकार कर लेते हैं बिना आगा-पीछा सोचे। यही उनकी खास बात है। दुर्गोत्सव में दस हजार की चपत लगने के बाद भी नहीं चेते। काकी ने बहुत समझाया कि इस पचड़े में मत पड़ो। पर चचा न जाने किस मिट्टी के बने थे। "चाहे जूते पड़े हजार, तमाशा घुस के देखेंगे।"

रावण का कद दिनों दिन बढते जा रहा है, हर साल रावण के पुतले का खर्च भी बढ जाता है। चचा ने सामान का जुगाड़ किया, बच्चे-कच्चे सब मिल कर रावण का पुतला बनाने लगे। 10 हंडिया लगा कर दशानन बनाया गया, उसे रंग पोत कर रावण की शक्ल दी गयी। घास फ़ूस भरकर रावण का धड़ भी बन गया। लाल-नीली-पीली पन्नियाँ लगा कर उसे भी स्वरुप दिया गया। अब फ़ायनल टच देना था, रावण के धड़ पर शीश लगाना था। तभी एक सांड गैइया को दौड़ाते हुए आया और गैइया दशानन के शीश उपर आकर गिर पड़ी। जिससे 4 हंडिया फ़ूट गयी। चचा की खोपड़ी भन भना गयी। बना बनाया रायता बिखर गया। सांड भी जान का दुश्मन बन गया। गैइया को दौड़ाना था तो थोड़ी देर बाद दौड़ा लेता, फ़िर रावण की तरफ़ ही दौड़ाने की क्या जरुरत थी। फ़ालतु काम बढा दिया। 4 मुड़ी फ़ूट गयी, फ़िर रोते गाते उन्हे तैयार किया और सुबह हो चुकी थी नहाने धोने चचा घर में घुस गए। रावण दुवारी मे खड़ा था। इधर पता नहीं कहाँ से गायों का झुंड फ़िर आ गया। चचा के आते तक रावण के पैजामे हो ही साफ़ कर गया। अब किस्मत ही खराब हो तो क्या किया जा सकता है।

चचा जब वापस आए तो रावन नंगा खड़ा था, माथा पीट लिया, रावण को नया पैजामा पहनाया गया। सवाल इज्जत का था। एक रात का जागरण करने के बाद रावण तैयार हुआ था। अब चचा ने सोच लिया कि इसे ठिकाने पर लगा दिया जाए। नहीं तो फ़िर कोई समस्या आ सकती है। रावण को मैदान के बीचों बीच खड़ा कर दिया और छुट्टी पाई, शाम को रावण दहन हो जाएगा सोच कर चचा सोने के लिए चले गए। चचा के सोते ही बरसात शुरु हो गयी। घनघोर बारिश हुई, एक घंटे में पानी ही पानी हो गया। रावण बरसात के पानी से भीग गया। शाम को लोग इकट्ठे होने लगे, भीगा हुआ रावण कैसे जलेगा? इस पर चर्चाएं होने लगी। चचा का विरोधी गुट इसे उनकी लापरवाही बता रहा था कि रावण को शाम को खड़ा करना था। तब तक किसी टीन शेड के नीचे रख कर दिया जाता तो भीगता नहीं। साल भर का त्यौहार अब कैसे मनेगा? रावण के भीगने की खबर चचा तक पहुंच गयी थी। वे अब घर से बाहर नहीं निकल रहे थे। विरोधी गुट के लड़के दारु पीकर चचा को गरियाते घूम रहे हैं कि मिल जाए तो उनकी मरहम पट्टी का इंतजाम किया जाए। चचा की खबर ली जाए, हम भी रावण भाटा में खड़े होकर रावण दहन का इंतजार कर रहे हैं। कुछ लोग चिल्ला रहे है कि एक कनस्तर मिट्टी तेल डाल कर रावण को आग लगा दी जाए। रावण को तो हर हाल में जलाना है। भले आतिशबाजी न हो। माहौल की दशा और दिशा सही नजर नहीं आ रही। इसलिए घर की तरफ़ खिसकने में ही भलाई है। आप भी चलिए, फ़ालतु तमाशे में क्या रखा है? बाकी समाचार कल के अखबार में पढ लेगें कि चचा और रावण का क्या हुआ? आखिर चचा पंचायती लाल फ़िर फ़ंस ही गए।

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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

पांडे के पोथी पतरा अऊ पंडियाईन के मुखगरा -- ललित शर्मा

सुबह-सुबह कम्प्युटर का बटन दबा कर अंतरजाल से जुड़े ही था कि श्रीमती जी ने टेबल पर सरोता ला कर रख दिया। हम सरोता देखते ही समझ गए कि आज कैरियाँ जिबह करनी पड़ेगीं अचार के लिए। साथ ही उन्होने कह दिया कि पेड़ से कैरियाँ भी तोड़नी पड़ेगीं। आदेश का तत्काल पालन किया और दादी ने कैरियाँ तोड़ी उदय ने सायकिल की टोकरी में रख कर घर पहुंचाया। अचार के लिए पेड़ से हाथ से तोड़ी गयी कैरियाँ ही श्रेष्ठ होती है। पेड़ से जमीन पर गिरी हुई कैरियों का अचार सड़ जाता है। इधर मैने सरोता संभाल लिया। मनोयोग से कैरियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। श्रीमती जी मसाले तैयार करने में जुटी थी। अचार बनाना श्रम साध्य कार्य है। भोजन का मुख्य अंग होने के कारण अचार का प्रचलन सम्पूर्ण भारत में है। लेकिन घर के बने अचार की तो बात ही निराली है। बनाते वक्त सावधानी भी रखनी पड़ती है, नहीं तो फ़फ़ूंद लग कर सड़ने का खतरा निरंतर बना रहता है। बाजार के अचार तो खाने लायक ही नहीं रहते। घर के बने अचार की विशिष्टता यह है कि एक तरह का मसाला डालने के बाद भी अलग-अलग घरों के अचारों में स्वाद का बदलाव पाया जाता है।

एक बार हरिद्वार में हर की पौड़ी के पास मैने एक अचार की दुकान देखी थी। जिसमें तरह-तरह के अचार बरनियों में सजे थे। अचार देखकर लालच आ गया और सोचा कि कुछ अचार ले लिए जाए। आम, नींबू, मिर्च, कटहल, गोभी, करील, केर, गाजर, सिंगरी और भी न जाने कितने तरह के अचार थे। मैने सभी आचार 100-100 ग्राम लिए। वहाँ से मुझे मसूरी तक की यात्रा करनी थी। रास्ते में अचार का स्वाद लिया जाएगा सोच कर बैग के हवाले किया और चल पड़े। द्रोणाचार्य गुफ़ा (झंडु नाला) के पास बैठ कर सभी अचारों का स्वाद लिया। किसी भी अचार में पृथक स्वाद नहीं मिला। सब में एक जैसा ही स्वाद था। पूरा मजा किरकिरा हो गया। तब जाकर घर के अचार का महत्व समझ में आया। घर के बने अचार के तो कहने ही क्या हैं।

कल 25 अप्रेल का दिन था, इस दिन वैवाहिक बंधन में बंध कर स्वेच्छा से अपनी स्वतंत्रता को खोया था  कुछ बंधन जीवनोपयोगी होते हैं। इसमें वैवाहिक बंधन को पवित्र बंधन माना गया है। वैवाहिक जीवन में आचार और सरोते का बड़ा महत्व है। अचार से ही आचार संहिता बनती है, जिसमें प्रेम, विश्वास, सम्मान, समर्पण, एवं परिवार के प्रति जिम्मेदारियों के निर्वहन का संकल्प इत्यादि मसाले डाले जाते हैं त्तब कहीं जाकर ग़ृहस्थी नामक अचार का निर्माण होता है। जिस तरह किसी राष्ट्र को चलाने के लिए स्वनिर्मित संविधान की प्रमुख भूमिका होती है ठीक उसी तरह गृहस्थी को चलाने के लिए स्वनिर्मित आचार संहिता की भूमिका महत्वपूर्ण है। स्वघोषित आचार संहिता के सहारे बिना किसी विघ्न बाधा के जीवन नैया खेते हुए वैतरणी पार हो सकते हैं।

हाँ! एक बात है सरोता का ध्यान रखना पड़ता है। यह सरोता सिर्फ़ काटने का ही काम करता है, जोड़ने के काम तो इसकी प्रवृति में ही नहीं है। इसका निर्माण काटने के उद्देश्य से ही हुआ है। इसे चलाते वक्त नजर चूकी और यह घायल करने से नहीं चूकने वाला। इस तरह सरोते का प्रयोग करते हुए सावधानी जरुरी है। समाज में सरोते जगह-जगह मिल जाएगें जो अवसर मिलते ही आपके विश्वास को काटने का प्रयत्न करते हैं। इन सरोतों से निपटने के लिए व्यक्ति को अच्छा श्रोता होना जरुरी है। तभी सार्थक चिंतन कर नीर-क्षीर किया जा सकता है। इतिहास गवाह है राम राज में भी ऐसे ही एक सरोते ने सीता की अग्नि परीक्षा कराई थी। सरोते ने अपना काम कर दिया। आगे अब तुम भुगतो। भगवान को भी गहरा संताप सहना पड़ा। सरोते का कुछ नहीं बिगड़ा, वह आज तक चल रहा है, जैसा पहले चला करता था।

सरोते कई तरह के होते हैं, छोटी सरोती से लेकर बड़े सरोते तक मिलते हैं। सुपारी आम काटने वाले से लेकर मधुर संबधों को भी काटने वाले सरोते मिलते हैं। सरोते ऐसा नहीं है कि दाम्पत्य जीवन में ही मिलते हैं वे तो आपको प्रत्येक जगह मिल जाएगें। सरोते को साधकर आचार संहिता का पालन करते हुए अब हमारी गृहस्थी बालिग हो चुकी है। समाज में तरह-तरह के सरोते मिलते हैं, प्राचीन काल का विभीषणी सरोता प्रसिद्ध है, इसने ही अपने भाई रावण का सर्वनाश कराया था। वर्तमान में जयचंदी सरोते चलन में हैं, जो घर परिवार से लेकर देश का सर्वनाश करने पर आमादा हैं। विभीषणी एवं जयचंदी सरोते मौका देखते ही काम कर जाते हैं। पर विडम्बना यह है कि इनसे काम पड़ ही जाता है, घर में ही संभाल कर रखना पड़ता है। आवश्यकता पड़ने पर पड़ोसी भी मांग कर ले जाते हैं, लेकिन वापस कर जाते हैं। घर में रखना खतरे से खाली नहीं है।
सरोते से काम ले लिया। आम काट कर अचार बना लिया। घर में था इसलिए फ़टाफ़ट काम आ गया नहीं तो पड़ोसी से मांग कर लाना पड़ता। श्रीमती जी ने वर्षगांठ की सुबह ही सरोता सामने रख कर चिंतन करने पर मजबूर कर दिया। श्रोता को भी सरोता कहा जाता है। श्रोता वाला सरोता बनने में कोई बुराई नहीं है। अच्छा सरोता सभी पसंद करते हैं, अच्छा सरोता ही उम्दा वक्ता होता है। पांडे के पोथी पतरा अऊ पंडियाईन के मुखगरा, दुनो एकेच होथे। (पंडित जी जो पोथी पत्रा देख कर बताएंगे वह पंडिताईन मुंह जबानी ही बता देती है) क्योंकि पंडिताईन ने सरोता होने का मरम जान लिया है। इनके फ़जल से मैं भी अच्छा सरोता बनने के उद्यम में हूँ। क्योंकि वर्षगांठ पर इससे अच्छा तोहफ़ा कोई दूसरा नहीं हो सकता। आखिर कहना ही पड़ेगा सरोता जिंदाबाद।

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

रावण भाटा से सीधी रपट---------ललित शर्मा

दशहरा पर्व की चित्रावलियाँ--रावण भाटा से सीधी रिपोर्ट

रावण तैयार है युद्ध के लिए

उदय भी  पहुंच चुके हैं युद्ध के मैदान में

हा हा हा हा मैं ही हूँ दशानन

युद्ध का मैदान सज रहा है

तब तक गोल गप्पे का मजा ले लिया जाए

चाट वाले राजु की दृष्टि से रावण भाटा

गुब्बारे वाले भी हैं-उदय को चाहिए

राम लीला शुरु हो चुकी है

राम रमापति कर धनु लेहू

कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू और अशोक भाई पधार चुके हैं

अशोक भाई विजयादशमी की शुभकामनाए देते हुए

कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहु, ललित शर्मा, राधा कृष्ण टंडन

दो लाख का अनुदान दो-मैं प्राणोत्सर्ग करने तैयार हूँ

रावण दहन की तैयारी

रावण के पुतले में मंत्री जी ने आग लगाई

धू धू करके जलता रावण

प्रतिवर्ष यही गति है रावण की

एखर का भरोसा चोला माटी के हे