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बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

प्राचीन विद्या और विज्ञान

प्राचीन काल में परम्परागत शिल्पकारों ने यंत्रों का निर्माण किया तथा उनके वैज्ञानिकता एवं अनुसंधानों ने सारे जगत को अभी भी चकित कर रखा है. उन्होंने जो यन्त्र बनाये उनकी तकनीकि उत्कृष्टता पर हम आज भी चकित हो जाते है. 

धम्मपाद की कथा वसुल्दात्ता वत्थु पृष्ठ ६८ पर लिखा है कि कौशाम्बी के राजा उदयन से उज्जियनी के राजा चंडप्रद्योत की शत्रुता थी. 

प्रद्योत ने राजा उदयन को धोखा देकर पकडवाने के लिए एक हस्ति यन्त्र तैयार करवाया, यह हाथी लकड़ी का था. इसका रंग सफ़ेद था. यह स्वचालित यन्त्र से चलता था. इसके अन्दर ६० योद्धा बैठ सकते थे. प्रद्योत ने इस हाथी को उदयन के जंगल में छुडवा दिया. 

हाथी जंगल में इधर उधर विचरण करने लगा. सफ़ेद हाथी की खबर पाकर उदयन इसे पकड़ने आया, परन्तु 
स्वयं ही पकड़ा गया. 

इसी ग्रन्थ में कथा विशाखा वत्थु  पृष्ठ १९५ में लिखा है कि विशाखा के लिए एक महालता नामक आभूषण बनवाया गया था. यह सर से परों तक था. इसे चार महीनो में ५०० सुतारों ने बनाया था. 

इसकी कीमत उस समय में किसी सिक्के के भाव से ९ करोड़ थी. इस आभूषण में एक मोर लगा था. जो विशाखा के मस्तक पर नाचा करता था. इस तरह महाभारत के आदि पर्व में उतंग घोड़े का वर्णन आया है. वह भी यन्त्र के सहारे ही चलता था. 

शाहवाज गढ़ी पेशावर में एक पत्थर पर रेल का प्रतीक भी बना हुआ है. इस तरह हमें अपनी प्राचीन विद्या और विज्ञान पर गर्व है. इन्होने जो अविष्कार किये हैं वह उस ज़माने और आज के समय में भी चमत्कार से कम नहीं है.

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

प्राचीन भारत के यंत्र एवं बैज्ञानिक अविष्कार

प्राचीन काल में हमारा विज्ञान उत्कर्ष पर था, वर्तमान से तुलना करें तो हम इतनी वैज्ञानिक प्रगति करने के पश्चात प्राचीन काल की वैज्ञानिक तरक्की के सामने बौने साबित हो रहे है। हम मंत्रों के विषय मे बचपन से सुनते आए हैं। जब हम लिखना पढना भी नही जानते थे। तब मंत्रों के उच्चारण दादा जी के मुंह से सुनते थे। वे नित नेम से संध्या इत्यादि मंत्र पाठ करते थे। इसके पश्चात पिताजी ने भी यह परम्परा बनाए रखी। वे मंत्र के साथ यंत्र का भी प्रयोग करते थे। अब हम हैं,हम मंत्र,यंत्र और तंत्र तीनो का प्रयोग करते है। अब हम चलते हैं भारद्वाज मुनि कृत यंत्रणार्व ग्रन्थ के वैमानिक प्रकरण में दी गई  मन्त्र, तंत्र और यंत्र की परिभाषा की ओर........
मंत्रज्ञा ब्राह्मणा: पूर्वे जलवाय्वादिस्तम्भने।
शक्तेरुत्पादनं चक्रुस्तन्त्रमिति गद्यते॥
दण्डैश्चचक्रैश्च दन्तैश्च सरणिभ्रमकादि भि:।
शक्तेस्तु वर्धकं यत्तच्चालकं यन्त्रमुच्यते॥
मानवी पाशवीशक्तिकार्य तन्त्रमिति स्मृतं---(यन्त्राणर्व)
  • मन्त्र-जल और वायु के स्तम्भन से जो शक्ति प्राप्त होती है उसे मन्त्र कहते है.
  • यन्त्र-दांतों की योजना, सरणी और भ्रामक आदि के द्वारा जिस शक्ति का वर्धन और संचालन किया जाता है, उसे यन्त्र कहते है.
  • तंत्र-मनुष्यों और पशुओं की शक्ति से कार्य किया जाता है, उसे तंत्र कहते हैं.
हमारे प्राचीन ग्रंथो मे इन मंत्र-यंत्र-तंत्र के अनेक प्रमाण मिलते है।
विविध यन्त्र
हम प्राचीन कला कौशल युक्त यंत्रों के वर्णन करते हैं. भोज प्रबंध में लिखा है .......
घट्यैकया क्रोशवदशैकमश्च: सुकृत्रिमो गच्छति चारुगत्या।
वायुं ददाति व्यजनं सुपुष्कलं विना मनुष्येण चलत्यजस्रम्॥ (भोज प्रबंध)
मन्त्रों की चर्चा कभी फिर करेंगे आज यंत्रों की चर्चा करते हैं. जो सवारी और मनोरंजन और युद्ध के काम आते थे. भोज प्रबंध में लिखा है. राजा भोज के पास एक काठ का घोडा था, एक घडी में ग्यारह कोस चलता था और एक पंखा था, जो बिना किसी मनुष्य की सहायता के  अपने आप ही खूब तेज चलता था और हवा देता था.