खारुन नदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
खारुन नदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

मासूल : खारुन नदी की रोमांचक यात्रा

कुकुर कोटना से आगे बढ़ने पर मुझे सूखी हुई वह घास दिखाई दी, जिसे मेले ठेले में लोग संजीवनी बूटी कह कर बेचते हैं। यह सूखी घास पानी में डालने पर फ़िर से हरी हो जाती है। रामकुमार ने बताया कि इसे भठेलिया (लाल खरगोश) चारा कहते हैं, यह भठेलियों का भोजन है। 
भालुओं का भोजन
यहां से हम आगे बढे ही थे कि मुझे पत्तों में  सरसराहट की आवाज सुनाई दी, मुड़ कर देखा तो एक बड़ा किंग कोबरा सरसराते हुए निकल रहा था। उसकी लम्बाई भी सात आठ फ़ुट रही होती, इसे गंउहा डोमी कहा जाता है। मैने साथियों को आवाज दी तो उन्होने उसे दूर भगा दिया।
जंगल का भठेलिया चारा, शहर की संजीवनी बूटी
नदी के कुछ स्थानों पर गांव वालों ने मछली पकड़ने का ठिकाना बना रखा है, उस ठिकाने पर कोई दूसरे गांव वाला मछली नहीं पकड़ सकता है,  यह जंगल का अघोषित नियम है। सब गांव वालों का अपना-अपना दहरा है। आगे बढ़ने पर चट्टानें बड़ी होती जाती हैं। इस स्थान को मासुल कहा जाता है। मासुल पहुंच कर नदी एक छोटे से झरने का रुप ले लेती है।
तिहारु राम सोरी बीज साफ़ करते हुए
यहाँ पर तिहारुराम कुछ फ़ल तोड़ लाया। उनको फ़ोड़ कर नदी के जल में बीजों को धोया और मेरे को खाने के लिए दिए। बीज देते वक्त उसके मन में प्रकट हो रहे भावों को मैं देख रहा था, ये वही भाव थे जो जिस भाव से सबरी ने रामचंद्र को बेर खिलाए थे। नितांत निश्छल प्रेमिल मुस्कान के साथ उसने बीज मेरी ओर बढाए। बीजों के उपर लगे गुदे का स्वाद कुछ कुछ सीताफ़ल के  जैसे था। मैं उस फ़ल का नाम भूल गया, परन्तु स्वाद अभी तक याद है।
भालु के पंजो के निशान
मासुल बहुत बीहड़ दिखाई देता है। पत्थरों के बीच की गुफ़ाएं भालुओं एवं अन्य जंगली जानवरों के छिपने के लिए आदर्श स्थान है। कउहा (अर्जुन) के ऊंचे पेड़ों पर मधुमक्खियों के बड़े बड़े छत्ते लटक रहे थे और पेड़ों पर भालूओं के पंजो के निशान भी। नीचे देखने पर नदी की रेत में भालुओं के पंजो के निशान दिखाई दिए। नदी के पार तीन भालु विचर रहे थे। साथियों ने मुंह से आवाज निकाल कर उन्हें भगाया क्योंकि हमें मासुल से उतर कर नदी पार करनी थी।
मासुल से खारुन नदी का नजारा
मासुल इस ट्रेकिंग का बहुत ही सुंदर एवं मनोरम स्थल है। यहाँ आकर मन रम गया। एक चट्टान काफ़ी ऊंचाई पर लगभग 12 फ़ुट तक बाहर निकली हुई है। उस पर बैठकर नदी का दृश्य आनंददायक दिखाई देता है। तिहारु राम ने मासुल नाम के विषय में बताया कि यह स्थान गहरा होने के कारण यहाँ से मछलियां ऊपर नहीं चढती। लोग यहां पर मछली मारने के लिए आते हैं। एक दिन पानी रोकने के लिए लकड़ी का लट्ठा ढूंढने लगे तो समीप ही दीमक लगा लट्ठा मिल गया। उन्होंने उठाकर उसे काम में ले लिया।
अर्जुन के वृक्ष पर भालु के पंजों के निशान
कुछ देर बात लट्ठे में हलचल हुई तो पता चला कि मासुल सर्प है। मासुल सर्प आलसी होने के कारण एक स्थान पर ही पड़ा रहता है। उसके मुंह के सामने जो कीड़े मकोड़े आ जाते हैं उन्हें खाता है। यहाँ तक कि उस दीमक भी चढ़ जाती है। उस दिन के बाद इस स्थान का नाम मासूल पड़ गया। कुछ देर यहां बैठकर भालुओं को भगाने के बाद हम धीरे-धीरे नदी में उतरे, क्योंकि आगे भालुओं का खतरा था।
मासुल का नजारा
नदी पार करके आधा किमी चलने के बाद खैरडिगी गांव का खार (खेत) आ गया। हमने गांव में पहुंच कर एक के घर में चाय बनवा कर पी। अब लौटने के लिए कोई साधन नहीं मिला। हमारी गाड़ी कंकालीन मंदिर में ही खड़ी थी। अब फ़िर पैदल चलकर लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था। हमने नदी का साथ छोड़ दिया और उसके बगल से चरवाहों वाले रास्ते से कंकालीन लौटने लगे। फ़िर उबड़-खाबड़ रास्ते का सामना किया। 

खारुन ट्रेकिंग का सुंदरतम स्थान मासुल
दिन ढलने से पहले हम कंकालीन पहुंच जाना चाहते थे। ट्रेकिंग के शौक ने आज खूब पैदल चला दिया था। दो घंटे लगातार चलने के बाद कंकालीन मंदिर दिखाई देने लगा और सूरज भी ढल रहा था। मन में खुशी थी कि आज हमने खारुन नदी की कठिन ट्रेकिंग कर ली थी।
उबड़ खाबड़ पत्थरों के बीच से मार्ग बनाते हुए वापसी
थकान बहुत अधिक हो गई थी, तिहारु राम सोरी भी नाहर डबरी से हमारे साथ लौट आया था। मैने उन्हें कुछ पैसे दिए और हम घर लौट आए कि बाकी ट्रेकिंग दो चार दिन बाद शुरु करेंगे। सुबह उठकर देखा कि दोनों पैरों के अंगुठे नीले हो कर फ़ुल गए हैं। देखते ही घबराहट बढ गई। तुरंत डॉक्टर के पास दौड़ा उसने दवाईयाँ दी। डर रहा था कि कहीं गैंगरिन न हो जाए। 
पैरों की हालत: अंगुठे के साथ दो अंगुलियों के नाखून भी नीले हो गए
तीन महीने बाद एक पैर के अंगुठे का नाखून थिम्पू में निकला और दूसरा दिल्ली में तथा आगे की ट्रेकिंग पर विराम लग गया। मेरा मानना है  कि लोग पहाड़ों पर जाते हैं ट्रेकिंग के लिए, परन्तु छत्तीसगढ़ में ऐसे स्थानों की कमी नहीं है, जहाँ आप अपना रोमांचक शौक पूरा न कर सें। कभी आप भी ट्रेकिंग करके देखिए।

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

कुकुर कोटना : खारुन नदी की रोमांचक पदयात्रा

चलते-चलते बन्नु सिंह अपनी कथा कहता जा रहा था "मुझसे धनी कोई नहीं है, ये पत्थर देखो। एक-एक पत्थर कितना मंहगा है। ये पेड़ देखो, जिसे दीमक खा रही है, यह कितना मूल्यवान है। जंगल वाले ही सारा जंगल काट कर ले गए। अब तो जलाऊ के लायक भी लकड़ी नहीं दिखाई देती। 

बन्नु सिंह और नारायन साहू
फ़ालतू का काड़ी-कचरा उगा हुआ है। अगर इन पत्थरों को ही गाड़ी मोटर में भर के शहर ले जाए तो लाखो-कड़ोरों रुपए के हैं। उधर देखो साहब, पेड़ों पर चारों तरफ़ नोट ही नोट लटके हैं। एक-एक पत्ता सौ-सौ का नोट है। अब बताओं आप, मुझसे अमीर कौन है? ये सारा जंगल मेरा है और मैं इसका मालिक हूँ। मेरे ही धन को लोग चोरा कर ले जा रहे हैं।" 
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हमारी अमानत
मैं बन्नु राम की बात सुनकर उससे सहमत होता हूँ, जंगल के मालिक तो वे ही हैं जो उनसे प्यार करते हैं, उसकी रखवाली करते हैं। जंगल कटने एवं खत्म होने का दर्द वही महसूस कर सकता है, जिसका जीवन उसके साथ जुड़ा है। जिस पेड़ को मैने लगाया है, उसे काटने की हिम्मत मैं जुटा नहीं पाता। इसके कारण मेरे घर परिसर में कई महावृक्षों ने विस्तार ले लिया है, जो अब हानि भी पहुंचा रहे हैं। फ़िर तो बन्नु सिंह जंगल का ही आदमी है। 
पथरीली नदी घाटी
वह मुझे मुक्त कंठ से एक रेलो गीत सुनाता है। जो जंगल में गूंजता है और मैं उसे रिकार्ड करता हूँ… "साय रेलो रे रेलो रे रेलो, नदी नादर निहिर निहिर ताघर ता, ओSS रोहुर झुहुर झुहुर बाजेर तिहिर तोर। गांवे रे गांवे रे घुमेर बाबू कहे नादर तोर। ओSS नादर लोहर लोहर लोघर तोर।" सुनसान जंगल में उन्मुक्त कंठ से गाया हुआ गीत बिना साज के ही सुहाना लग रहा था तथा आनंद दे रहा था। पहले रेडियो में बस्तर के रिलो गीतों का रायपुर से प्रसारण होता है, एक अरसे के बाद बन्नु सिंह के मुंह से गीत सुना। बन्नु सिंह के गीत मुझे जंगल के साथ जोड़ रहे थे। 
एक पड़ाव कुकुर  कोटना
वनवासी के गीतों ने मेरे अंतरमन को वन के साथ एकाकार कर दिया था, पर कदम उबड़-खाबड़ पत्थरों पर पड़ते हुए सावधान थे। सफ़र चल रहा है बलखाती इठलाती कुंवारी नदी के साथ। अइरी बुड़ान के बाद हम जिस स्थान पर पहुंचे, साथियों ने इस स्थान का नाम कुकुर कोटना बताया। यहाँ चट्टान को काटकर दो ढाई फ़ुट चौड़ी नाली सी बनाई हुई है। पहले जंगल में शिकार करने वालों के कुत्ते इस स्थान पर पानी पीने आते थे। कोटना के आगे थोड़ी गहराई है, इन चट्टानों के नीचे काले केकड़े छिप रहते हैं, एक साथी केकड़े पकड़ने के लिए पानी में उतर गया। 
कुकुर कोटना पर दोपहर का भोजन पानी
सूर्य सिर पर चढ गया था, हमने अपने खाने की पोटली खोल ली। रामकुमार के घर से बनाकर लाई हुई अंगाकर रोटी सभी लोगों ने आपस में बांट ली। अंगाकर रोटी छत्तीसगढ़ का पारम्परिक भोजन है। रोटी इतनी बड़ी होती है कि एक रोती चार आदमियों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है। कुकुर कोटना पर बैठकर भोजन समाप्त करते तक साथी ने कई केकड़े पकड़ कर अपने झोले के हवाले कर लिए। दोपहर का भोजन इतमिनान से हो गया। जारी है… आगे पढें।

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

भकाड़ू डबरी: खारुन नदी की रोमांचक पद यात्रा

भालु खांचा से आगे बढने पर घना जंगल प्रारंभ हो जाता है, पेड़ों पर लटकती लताओं की बेलें मोटी हो जाती हैं। दीमक की बांबियाँ आठ-दस फ़ुट ऊंची हो जाती हैं। इन बांबियों में सांपों का बसेरा रहता है और भालू भी इनके आस पास दीमकों की तलाश में पहुंचते हैं। 
पदयात्रा दल: लगभग दस फ़ुट ऊंची बांबी के साथ
नदी अब चट्टानों के बीच से होकर बहने लगती है। नदी के मार्ग में बड़े बड़े बोल्डर दिखाई देने लगते हैं। बोल्डरों पर से होकर चलना कठिनाई भरा था। पैर फ़िसलने पर चोट लगने की आशंका बढ जाती है। इसलिए चाल धीमी हो गई और हर कदम जमीन देख कर रखना पड़ रहा था।
भकाड़ू डबरी
आगे बढ़ने पर एक तालाब दिखाई दिया। पूछने पर बन्नु सिंह ने बताया कि इसे भकाड़ू डबरी कहते हैं। इसका निर्माण जंगलात वालों ने वन्य पशुओं के पानी पीने के लिए बनाया है। नामकरण के पीछे की कहानी पूछने पर रामकुमार ने कहा कि हमारे गाँव में निषाद जाति का भकाड़ू नाम व्यक्ति रहता था। उसका विवाह नहीं हुआ। गांव में अविवाहित आदमी की कोई कदर नहीं होती और भले ही न हो, पर उसे हमेशा नीयतखोर समझा जाता है। 
भकाड़ू डबरी में धुंए के छल्ले बनाता बन्नु सिंह
भकाड़ू की वृद्धावस्था में मृत्यु हो गई तो गांव वालों ने उसके दाह संस्कार के लिए गांव में जगह नहीं थी। जगह न देने की पीछे डर था कि मरने बाद वह रक्सा (कुंवारा प्रेत) बनकर गांव वालों को हलाकान करेगा। गांव वालों ने सहमति से इस तालाब के किनारे उसका दाह संस्कार किया। तब से इस तालाब को भकाड़ू डबरी कहा जाता है।
  
नदी में बेचांदी कांदा प्रसंस्करण: नाहर डबरी
बातचीत करते हुए हम संभल कर चल रहे थे। आगे चलकर नदी का पाट थोड़ा चौड़ा हो जाता है, दोनों किनारों पर बड़ी बड़ी चट्टाने हैं। इस जगह पर नदी का पानी थोड़ी गहराई लिए हुए ठहरता है। दूर से हमें कुछ लोग नदी के किनारे कुछ चमकीली सी चीज धोते हुए दिखाई दिए। समीप पहुंचने पर देखा कि ये लोग एक कंद की चिप्स बनाकर धो रहे थे। इस काम में चार पांच परिवार लगे हुए थे। चिप्स को धो कर चट्टानों पर सुखाया हुआ था। इस स्थान को नाहर डबरी कहते हैं।
बेचांदी कांदा की चिप्स धोते हुए
यहां हमारी भेंट तिहारु राम सोरी से हुई। उनका परिवार भी कंद का प्रसंस्करण कर रहा था। उसने इस कंद का नाम बेचांदी कांदा बताया तथा कहा कि इसमें बहुत नशा होता है। अगर इस कंद का गेंहूं के बराबर का दाना किसी को खिला दिया जाए तो उसके मांस पेशियां जाम हो जाती है अत्यधिक नशे में व्यक्ति शिथिल हो जाता है। 
नाहर डबरी: खारुन पदयात्रा
डाक्टरी इलाज से भी इसका नशा नहीं उतरता। जब इसके नशे की मियाद पूरी होती है तो स्वत उतरता है। इस कंद के चिप्स बनाकर ये बाजार में ले जाते हैं, जहाँ व्यापारी दवाई बनाने के लिए अस्सी रुपए किलों में खरीदते हैं। यहाँ आधे घंटे विश्राम कर हमने जल ग्रहण किया। अब हमारे दल में तिहारु राम भी जुड़ चुके थे।
अइरी बुड़ान
उबड़ खाबड़ चट्टानों पर चलना दुखदाई भी था, परन्तु आगे की सोच कर रोमांच भी हो रहा था। यही रोमांच हमें आगे खींच कर ले जा रहा था। आगे चलकर अरई बुड़ान नामक स्थान आया। यहाँ पर नदी की धार में एक छोटा सा रेतीला टीला है, जिसके आस पास काफ़ी जानवरों के खुरों के चिन्ह दिखाई दिए। 
नमकीन मिट्टी: यहां जानवर  नमकीन  मिट्टी चाटने आते हैं।
इस स्थान की मिट्टी नमकीन है, जिसे चाटने के लिए वन्य पशु आते हैं। इस स्थान पर मछलियां भी खूब मिलती है, इसलिए अइरी नामक पक्षी भोजन की तलाश में डेरा डाले रहते हैं। अइरी पक्षी के नाम पर इस स्थान का नाम अइरी बुड़ान हो गया।

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

भालु खांचा: खारुन नदी की रोमांचक पदयात्रा

कंकालीन मंदिर में पक्का हाल भी बना हुआ है, वहाँ रात काटने के लिए हमने रामकुमार से चर्चा की तो वह हमें स्थान देने के लिए तैयार हो गया और एक दरी हमारे सोने के लिए भी बिछा दी। रात बातचीत करते हुए सुबह का कार्यक्रम बनाते हुए गहरी होती गई। 
सफ़र का साथी पोयाम
लगभग बारह बजे के बाद नींद आई। सुबह की चाय के लिए मैने रामकुमार से कह दिया था। सुबह के खाने के लिए मैने रामकुमार कोमर्रा को घर से अंगाकर रोटी और टमाटर की चटनी बनाने के लिए रुपए दे दिए। ग्राम के तीन चार लोग हमारा मार्ग दर्शन करने के लिए तैयार हो गए।
दोपहर का भोजन अंगाकर रोटी
इस यात्रा में मेरा एक साथी बना बन्नु सिंह उकै। इसके पास छ: एकड़ की किसानी एवं बीबी-बच्चे सब हैं, पर घुमक्कड़ जीवन व्यतीत कर रहा है। भोजन बनाने के लिए जर्मन के दो बर्तन, एक लाल रिफ़िल का पेन, फ़ुल स्केप का पेपर, थैली में तम्बाखू चूना की पुड़िया तथा चिलम ही इसकी कुल सम्पत्ति है। जिसे हमेशा साथ रखता है। सुबह हमारी नींद खुली तो बन्नु राम ने नदी के किनारे चूल्हा बना एवं जलाकर गुड़ की लाल चाय पिलाई। चाय पीकर तबियत तर हो गई क्योंकि मुझे सुबह की चाय की आवश्यकता होती है। उसके बाद दिन भर चाय की कोई दरकार नहीं। लगा कि बिगबॉस का लक्जरी आयटम मिल गया।

बन्नु सिंह ऊकै
हम लोगों के दैनिक कार्यों से निवृत्त होते तक बन्नु सिंह नदी में नहाकर आ गया और उसने चूल्हे में राहर दाल बनने के लिए चढा दी थी। मेरे लिए आंवला वृक्ष की दातौन तोड़ लाया। मेरे दातौन मुखारी करते तक भोजन तैयार हो गया। भोजन करने से पहले उसने बालों में तेल लगाया और डबरा के जल में चेहरा देखकर जुल्फ़ों को संवारा। फ़िर लहसुन, टमाटर एवं मिर्च का तड़का देकर दाल फ़्राई की। जिस सलीके से उसने सीमित संसाधन में भोजन तैयार किया उससे लगा कि बन्नु सिंह भोजन का शौकीन है।

खारुन नदी पदयात्रा प्रारंभ
सुबह छ: बजे रामकुमार अपने साथियों के साथ आ गया, साथ में बड़ी-बड़ी तीन अंगाकर रोटी एवं टमाटर मिर्च की चटनी भी लाया। रोटी के एक टुकड़े का नाश्ता करके हम ट्रेकिंग पर चल पड़े। कंकालीन मंदिर से पथरीला उबड़ खाबड़ क्षेत्र प्रारंभ हो जाता है। हम नदी के साथ-साथ ही चल रहे थे। जंगल के भी अपने नियम और कायदे होते हैं। यहाँ अनजान आदमी तो चक्कर काटते ही रह जाएगा। 
सुबह तालाब का दृश्य
जिस तरह शहरों में गली मोहल्लों को नाम रख कर चिन्हित किया जाता है उसी तरह जंगल में स्थानीय ग्रामीण स्थानों को विभिन्न नामों से चिन्हित करके रखते हैं, यही चिन्ह जंगल में रास्ता न भूलने में सहायक होते हैं। बन्नु सिंह बड़ा ही फ़क्कड़ एवं मस्त मलंग है, इसके साथ नदी के आस-पास देखते हुए बात चीत करते रास्ता कट रहा था।
यात्रा मार्ग में भालु खांचा - यहाँ बारहो महीने पानी रहता है।
प्राकृतिक वनों विभिन्न प्रजाति के पेड़ पौधे एवं वनस्पति होती हैं। जिन्हें जंगल का आदमी बराबर पहचानता है और स्थानीय भाषा में उसका नाम रखकर चिन्हांकित कर लेता है। कुछ दूर चलने पर पथरीली धरती पर एक स्थान पर चारों तरफ़ से पानी आकर जमा होता है। इसे भालू खांचा नाम दिया गया है। जंगल में जब पानी की कमी हो जाती है तो भालु इस खांचे में आकर पानी पीते हैं। जारी है …… आगे पढें।

सोमवार, 26 सितंबर 2016

खारुन नदी के संग-संग सफ़र: उद्गम से पदयात्रा

कभी आप वनों में उबड़-खाबड़ पथरीले रास्तो के साथ बहती किसी अल्हड़ सी नदी के साथ-साथ चले हैं? नहीं न। फ़िर आज चलते हैं प्राकृतिक सुषमा के बीचे वनों से आच्छादित भूधरा पर प्रवाहित सलिला खारुन नदी के साथ उसके उद्गम के सफ़र पर। 
कंकालिन मंदिर पेटेचुवा
खारुन नदी रायपुर शहर की जीवन रेखा है, जिसका सफ़र बालोद जिले के ग्राम पेटेचुवा से प्रारंभ होकर सोमनाथ में शिवनाथ से मिलन तक का है। नदी का उद्गम ग्राम पेटेचुवा के नायक तालाब से हुआ है। यहाँ इसे कंकालीन नाला कहा जाता है, जो आगे चलकर नदी का रुप धारण कर लेता है।
खारुन उद्गम नायक तालाब
रायपुर से धमतरी होते हुए चारामा घाट से पहले दाँए तरफ़ मरकाटोला ग्राम से पेटेचुआ तक का सफ़र 115 किमी का है। 
नदी के साथ साथ पदयात्रा का आरंभ
इस छोटे से वनग्राम में कंकालीन माता का प्रसिद्ध मंदिर है। खारुन नदी कंकालीन मंदिर  की चौहद्दी से लगकर खैरडिग्गी ग्राम तक का पांच किमी का सफ़र घने वन के बीच से तय करती है। इस पांच किमी का सफ़र विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरता है, यह ट्रैकिंग रोमांचित कर जाती है एवं अद्भूत अनुभूति से भर देती है। 
पदयात्रा के साथी, नारायण साहू, बन्नु राम
जब हम नदी के साथ साथ यात्रा प्रारंभ करते हैं तब पहला स्थान भालू खांचा नाम का स्थान मिलता है। इस खांचा में बारहों महीने पानी रहता है, जिसका उपयोग भालू करते हैं। 
खारुन नदी में भालू खांचा
अगले पड़ाव में भकाड़ू डबरी मिलती है, यह छोटा सा तालाब है, जो पानी से लबालब भरा रहता है, इसके नामकरन के पीछे की कहानी रोचक है। मेरे साथी रामकुमार कोमर्रा बताए हैं कि गाँव में भकाड़ू नामक अविवाहित व्यक्ति रहता था। उसकी मृत्यु होने पर उसके रक्शा (कुंवारा प्रेत) बन जाने के डर से ग्रामवासियों ने दाह संस्कार के श्मशान में भूमि नहीं दी। तब वन में तालाब के किनारे उसके दाह संस्कार का निर्णय लिया गया, तब से इस तालाब का नाम भकाड़ू डबरी पड़ गया।
जंगल के मध्य भकाड़ू डबरी
आगे बढने पर नदी के बीच चटान काट कर कोटना जैसी आकृति बनाने के कारण एक स्थान को कुकुर कोटना कहा जाता है, यहाँ कभी शिकारी कुत्ते पानी पीते थे। यहां हमने दोपहर के भोजन में गांव से बनाकर लाई हुई टमाटर की चटनी के अंगाकर रोटी का आनंद लिया। 
दोपहर का भोजन कुकुर कोटना में
अगला पड़ाव अइरी बुड़ान है, जहां मछली भोजन की तलाश में अइरी नामक चिड़ियों का डेरा रहता है। यहां एक स्थान ऐसा भी है जहाँ कि मिट्टी खारी है और उसे चाटने के लिए नीलगाय, चीतल, कोटरी आदि जानवर आते हैं, उनके खुरों के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं। 
अइरी बुड़ान
अगला पड़ाव नाहर डबरी है, गहराई होने के कारण यहाँ नदी का पानी कुछ महीनो ठहर जाता है, जिसका उपयोग वन ग्राम नाहर के लोग करते हैं। यहां जंगल के खोदकर लाए हुए बेचांदी कांदा की प्रोसेसिंग की जाती है।
नाहर डबरी में बेचांदी कंद की प्रोसेसिंग
इस यात्र का महत्वपूर्ण स्थान मासूल है, यहां नदी गहराई में उतर जाती है, ऊपर नीचे रखी बड़ी चट्टानें इमारत होने का भ्रम उत्पन्न करती हैं। यह स्थान इतना रमणीक है कि कुछ पल ठहरने का मन हो जाता है तथा भालूओं से भी भेंट हो सकती है। क्योंकि इनके रहने के लिए यह आदर्श स्थान है। 
नदी का बीहड़ मार्ग
इस स्थान का मासूल नाम धरने के पीछे की कहानी तिहारु राम सोरी बताते हैं, मासूल एक बड़ा और मोटा सर्प होता है, जो एक स्थान पर ही पड़ा रहता, उस पर दीमक चढ़ जाती है, फ़िर भी नहीं हिलता। जो उसके मुंह के सामने आ जाता है उसे खा लेता है। एक बार मछली पकड़ने वालों ने उसे लकड़ी का लट्ठा समझ कर उठा लिया और पानी रोकने के लिए आड़ के रुप में लगा दिया। पानी में मछली देख कर जब उसने हरकत की तब पता चला कि यह मासूल सर्प है, तब से इस स्थान का नाम मासूल प्रचलित हो गया।
मनोरम स्थल मासुल
मासूल के आगे दोरदे नामक स्थान है, यहां से मछलियां नदी में ऊपर नहीं चढती। जंगल यहीं पर समाप्त हो जाता है और आगे खैरडिग्गी नामक गांव का खार लग जाता है। नदी का यह सफ़र आनंददायक है। 
जोहर ले, सफ़र के साथी तिहारु राम सोरी
जब भी यहां कि ट्रेकिंग करें तब ट्रेकिंग शुरु करने से पहले अपना वाहन खैरडिग्गी ग्राम में बुलवा लें, अन्यथा इसी रास्ते पर पुन: लौटना होगा। विशेष ध्यान रखे कि गांव के किसी जानकार व्यक्ति के साथ पर्याप्त भोजन पानी लेकर ट्रेकिंग करें।       

रविवार, 12 मई 2013

तरीघाट में प्राचीन सभ्यता के अवशेष

 जे. आर. भगत 

अभनपुर से 14 किलोमीटर की दूरी पर प्रवाहित खारुन नदी के बांए तट पर बसा है तरीघाट गाँव। तरीघाट जैसा की नाम से प्रतीत होता है कि यह कोई नदी का निचले किनारे स्थित घाट होगा, इसलिए तरीघाट कहलाता है। खारुन नदी रायपुर एवं दुर्ग जिले को विभाजित करती है। एक किनारा रायपुर जिले में है और दूसरा किनारा दुर्ग जिले में। खारुन नदी में पानी बारहों महीने रहता है और भिलाई या पाटन जाने के लिए इस नदी को डोंगी से पार करके जाना पड़ता था। फ़िर एक दशक पूर्व पास के गाँव वाले रपटा बना लेते थे और उससे जाने वाले से कुछ शुल्क लेकर कमाई करते थे। मैने मोटर सायकिल से खारुन नदी को कई बार पार किया और कभी इसके काई लगे पत्थरों पर बाईक सहित गिरकर घुटने भी फ़ोड़वाए। कुछ वर्षों पहले इस नदी पर पुल बन गया और आवागमन सहज होने लगा।

अतुल प्रधान, नरेन्द्र शुक्ल, जे. आर. भगत उत्खनन का शुभारम्भ  
अभनपुर से दुर्ग जाने के लिए इस रास्ते का प्रयोग सदियों से हो रहा है। अब इस अंचल से प्राचीन कालीन मानव बसाहट के अवशेष मिलने लगे हैं। रास्ते  के गाँव चंडी में देवी का प्रसिद्ध मंदिर है तथा इसका निर्माण भोसला राजाओं द्वारा किया प्रतीत होता है। मंदिर की दक्षिण दिशा में तालाब का भी निर्माण हुआ है तथा सैनिक बसाहट के भी चिन्ह मिलते हैं। इससे आगे चलने पर नदी के दांए तट पर परसुलिडीह गाँव एवं बांए तट पर तरीघाट गाँव बसा है। परसुलिडीह से ही नदी के उस पार बड़े बड़े टीले दिखाई देने लगते हैं। इन टीलों पर अकोल के वृक्षों की भरमार है। इन टीलों की सतह पर काले और लाल मृदा भांड के अवशेष पाए जाते हैं। जिससे सिद्ध होता है कि इस स्थान प्राचीन बसाहट रही होगी। ग्रामीणों ने यहाँ महामाया का मंदिर बना रखा है और एक टीले पर रावण भी विराजमान होने से यह रावण भाटा भी है।

पॉटरी यार्ड
छत्तीसगढ़ शासन के पुरातत्व विभाग के उप संचालन जे आर भगत ने विधिवत सर्वे कर शासन से इस स्थान पर उत्खनन की अनुमति प्राप्त की। 17 मार्च को लगभग सांय 4 बजे तत्कालीन पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के संचालक नरेन्द्र शुक्ला ने उत्खनन का शुभारंभ किया और इस स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। उत्खनन सहयोगी के रुप में अतुल प्रधान यहाँ मुस्तैदी से तैनात हैं। कुछ दिनों के बाद रावण भाटा वाले स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। 23 मार्च को मैं यहाँ पहुंचा तो बसाहट के चिन्ह उजागर हो चुके थे। यहाँ बसाहट के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रागैतिहासिक काल से लेकर मौर्य काल, शुंग काल, कुषाण काल एवं गुप्त काल तक के अवशेष प्राप्त हो रहे हैं। इससे यह तो तय है कि छत्तीसगढ़ में मल्हार के बाद पहली बार कहीं इतनी पुरानी सभ्यता के चिन्ह प्राप्त हो रहे हैं।

टीले पर उत्खनन और पार्श्व में खारुन नदी 
उत्खनन में सिरपुर जैसी कोई बड़ी संरचना तो प्राप्त नहीं  हो रही, परन्तु टेराकोटा के बर्तन, मूर्तियाँ, बीटस बड़ी मात्रा में प्राप्त हो रहे हैं। साथ ही लोहा, तांबा से बनी वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं। मानवोपयोगी दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुएं दिया, मटकी, सुराही, मर्तबान, सिल-बट्टा, सिरेमिक का एड़ी घिसने का बट्टा इत्यादि भी प्राप्त हो रहा है। सुत्रों से प्राप्त सूचना के आधार ज्ञात हुआ है कि कुषाण वंशीय तांबे के सिक्कों के साथ गुप्त कालीन सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। लोहे के औजारों में भालों के फ़ाल, ठेकी के मुसल का लोहा इत्यादि प्राप्त हुआ है। इन प्राप्तियों से छत्तीसगढ़ के इतिहास में परिवर्तन होगा एवं इतिहास समृद्ध भी होगा। जे आर भगत उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं से उत्साहित है और कहते हैं कि हो सकता है यहाँ 16 महाजनपदों में से किसी एक जनपद के अवशेष प्राप्त हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इस साईट की तिथि सिरपुर से भी आगे निकल गई है।

उत्खनन में प्राप्त संरचना का स्तर 
तरीघाट के आस-पास के गाँवों में भी पुरा सामग्रियाँ प्राप्त हो रही हैं। जिसका तत्त्कालिक उदाहरण ग्राम पंदर में मनरेगा के दौरान उत्खनन में प्राप्त वस्तुएं हैं। इससे जाहिर होता है कि सातवाहनों का प्रसार पाटन तक था एवं गाँव का पंदर नाम बंदर का अपभ्रंश हो सकता है। नदी के किनारे यहाँ पर पहले कभी डाक यार्ड रहा होगा। तरीघाट में स्थित इन 4 टीलों के चारों तरफ़ पत्थर के परकोटे बने हुए हैं। जब यहाँ बसाहट थी तो ये परकोटे सुरक्षा घेरे का काम करते थे। उत्खनन के दौरान ज्ञात हुआ कि सभी घर पंक्तिबद्ध रुप से बसे थे और उनके बीच चौड़ी सड़क के साथ गलियाँ भी थी। कई घरों से रसोई प्राप्त हुई है, जहाँ चुल्हे की राख के साथ के मिट्टी के दैनिक उपयोग के बर्तन प्राप्त हुए हैं। मिट्टी के दीये बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। उत्खनन सतत चल रहा है तथा प्राचीन सभ्यता के चिन्ह निरंतर अनावृत हो रहे हैं। मेरा अनुमान है कि नदी के किनारे इस स्थान पर सैनिक छावनियाँ हो सकती हैं। आगे उत्खनन से और भी स्थिति साफ़ होगी तथा ज्ञात होगा कि इस स्थान का इतिहास में क्या महत्व  था?