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गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

सुनसान भयावह सड़क पर भटकते ब्लॉगर

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
नेपाल से जैसे ही हमारी गाड़ी ने भारतीय सीमा में प्रवेश किया वैसे ही हमारी सहचरी बोल पड़ी। बहुत सुकून मिला उसकी मधुर आवाज सुन कर। भले ही मैं उसे गाहे-बगाहे कोसता रहा परन्तु नेपाल में उसकी जरुरत हमें महसूस होते रही। जब वह गडढों भरे रास्ते पर ले जाती थी तो उसका मुंह तोड़ने का मन करता था क्योंकि समय खराब होता था गाड़ी हिचकोले लेते हुए चलती थी। फ़िर भी उस आभासी साथी का संग कभी भूला नहीं जा सकता। एक हिम्मत बनी रहती थी, किसी भी शहर में रास्ता भटकने नहीं देती थी। जैसे ही हम सोनौली गाँव से बाहर निकले तो मैने पाबला जी से कहा कि भारत में प्रवेश कर गए हैं और इसकी पहचान स्वरुप लोटाधारी एवं लोटाधारिणियाँ सड़क के किनारे बैठे/बैठी दिखाई दिए। भारत की यही पहचान है कि सुबह शाम रास्ते के किनारे शौच करते महिला पुरुष दिखाई दे जाएगें।
बढ़ते चलो बी.एस.पाबला जी 
नौतनवा बायपास से निकलने पर पाबला जी ने कहा कि अब क्या प्रोग्राम बनाया जाए गोरखपुर में रात्रि विश्राम करने के लिए। तो मैने कहा कि - गोरखपुर में नहीं रुकते, सीधे ही चलेगें और रात भर गाड़ी हांकेगें। जहाँ नींद आएगी वहीं गाड़ी खड़ी करके सो लेगें। जब जाग गए तो आगे बढ जाएगें। सबने सहमति जताई और हम आगे बढते रहे। जीपीएस के कारण रास्ता याद करने की जरुरत नहीं थी। हम इलाहाबाद होकर आगे बढना चाहते थे। पिछला रास्ता छोड़ना था। जीपीएस वाली बाई को इलाहाबाद जाने का बोल कर हम निश्चिंत हो गए। उसने गोरखपुर से लगभग 25 किलोमीटर पूर्व ही बायपास से गाड़ी मोड़ दी। लगभग नौ बजने को थे। इस मार्ग पर ट्रकों का परिवहन दिखाई दे रहा था। 

उस समय चाय की दरकार हुई। भोजन का मन नहीं था। हमने चाय के लिए एक होटल में गाड़ी रोकी तो उसने बताया कि दूध नहीं है। कारण पूछने पर पता चला कि कोई त्यौहार है, इस दिन सभी घरों में दूध की जरुरत पड़ती है इसलिए होटलों में दूध नही मिलता। आगे बढ कर एक होटल में फ़िर चाय पूछी तो उसने भी मना कर दिया। हम आगे बढे ही थे कि किसी गाड़ी के जोरों से ब्रेक मारने की आवाज आई। साथ ही गाड़ी के टायरों के घर्षण से जलने गंध। हम अपनी साईड में थे और सामने से एक ट्रक आ रहा था। पाबला जी ने साईड की और मैने ब्रेक लगा दिए, ब्रेक क्या लगाना, लगभग अपनी जगह पर खड़ा ही हो गया था। सामने पुलिया थी और सायकिल वाले दो बच्चे भी। वे भौंचक निगाहों से हमारी गाड़ी की तरफ़ देख रहे थे। ये सब कुछ सेकंडों में घट गया ब्रेक मारने वाली उसी रफ़तार से हमारे बगल से गुजर गई।
कृष्ण कुमार यादव, बी.एस.पाबला, महफूज अली, गिरीश पंकज
कुछ दे्र हम अपने आपको संयत करते रहे। अगर वह कार वाला गाड़ी नहीं संभाल पाता तो हमें टक्कर मारता या सीधे सामने से आ रहे ट्रक से टकराता तो उसके चिथड़े उड़ने तय थे। पता नहीं कैसे लोग अपनी जान खतरे में तो डालते हैं साथ ही दूसरे को परलोकवासी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। हम आगे बढ गए, रास्ते में एक बड़ा ढाबा दिखाई दिया। जहाँ सफ़ेद कुर्ता पैजामाधारक टेबलों पर जमें  हुए थे। हमने भोजन के लिए यह जगह उपयुक्त समझी। खुले में बैठ गए, लेकिन होटल जितना बड़ा दिखाई, उतना ही घटिया था। रोटी चावल और भटे और आलू की सब्जी के अलावा कुछ था ही नहीं। जैसे तैसे हमने थोड़ा बहुत भोजन किया और आगे के सफ़र में चल पड़े। यह रास्ता अच्छा था, गाड़ी 50-60 की गति से मजे से चले जा रही थी।

जीपीस वाली बाई ने सज्जे मुड़ने कहा और सामने किसी नदी का बड़ा पुल था। पुल के पहले पुलिस की चौकी थी। एक कच्छाधारी पुलिस वाला लोटा लेकर जा रहा था तथा 3 पुलिस वाले डंडा लेकर पुल पर तैनात थे। 3 खटिया भी पड़ी थी मच्छरदानी लगाई हुई। पुल पार करते ही पुन: बड़े बड़े गड्ढे वाली सड़क मिली। हमने सोचा कि थोड़ी दूर होगी यह सड़क, फ़िर अच्छी सड़क आ जाएगी। यह रास्ता हमें बस्ती ले जा रहा था। बस्ती से अयोध्या फ़ैजाबाद होते हुए हमें इलाहाबाद पहुंचना था। यह सड़क तो बिलकुल बरबाद थी। घुप्प अंधेरे में अन्य कोई ट्रैफ़िक भी दिखाई नहीं दे रहा था। आधी रात के सन्नाटे में 4 लोग गाड़ी धकियाते चल रहे थे। 
कृष्ण कुमार यादव एवं ललित शर्मा सिरपुर के साथ 
एक स्थान पर तालाब के किनारे की सड़क ही गायब थी, उस पर नई मिट्टी डाली गई थी। पाबला जी ने गाड़ी रोक ली। अगर यहाँ गाड़ी फ़ंस जाती तो कोई निकालने वाला भी नहीं मिलता। मैने नीचे उतर कर देखा तो पहियों के निशान पर की मिट्टी सख्त थी। बस उन्ही निशान पर चलकर गाड़ी निकाली गई। गाड़ी निकल गई तो चैन की सांस आई। हम सड़क का ट्रेलर देख चुके थे। आगे बढे तो सड़क के किनारे मुसलमानों के घर, मदरसे इत्यादि दिखाई देने लगे। लगा कि हम मुसलमानों की घनी आबादी से निकल कर जा रहे हैं। सड़क दो कौड़ी और रात के एक बज रहे थे। अभी मुज्जफ़रनगर वाले मामले से हवा गर्म है और आपातकाल में इस इलाके में कोई पानी देने वाला भी नहीं मिलेगा। सियासत का क्या भरोसा? कब कौन शिकार हो जाए। सन्नाटा गहराता जा रहा था और रात रहस्यमयी होती जा रही थी। सड़क के आस पास की घास से निकल कर सियार सड़क पर दिखाई दे रहे थे, गाड़ी की रोशनी पड़ते ही भाग जाते थे। इस रास्ते पर 8 सियार दिखाई दिए।

मेरी आँखे लगातार सड़क पर लगी हुई थी। पाबला जी गाड़ी चलाते जा रहे थे। गिरीश भैया पिछली सीट पर शायद हमें कोसते हुए आराम कर रहे थे। क्योंकि उन्होने भी नहीं सोचा होगा कि इतने खतरनाक बियाबान रास्ते पर हमें चलना पड़ सकता है। शायद यह रास्ता बस्ती तक 40 किलोमीटर का रहा होगा। एक छोटे से गाँव में लगभग बहुत सारी लक्जरी बसें खड़ी दिखाई दी। पाबला जी ने कहा - ललित जी बसें देखिए। मैने कहा - यह कोई मुख्य स्टैंड होगा, जहाँ से चारों तरफ़ बसें जाती होगीं इसलिए इतनी सारी बसें एक साथ दिखाई दे रही हैं। हम आगे बढते गए और सड़क के किनारे खड़ी बसों की कतार खत्म ही नहीं हो रही थी। इतने अधिक खराब रास्ते पर लक्जरी बसें देख कर हम चौंक गए। लगभग 100 से अधिक बसें रही होगी। शायद इस इलाके में बड़ा ट्रांसपोर्ट माफ़िया होगा। तभी इतनी सारी बसें एक साथ दिखाई दी।
महफूज अली एवं गिरीश पंकज
बस्ती पहुंचने पर मैने आगे की सीट गिरीश भैया को सौंप दी तथा कुछ देर आराम करने के लिए पिछली सीट पर आ गया। पैर मोड़ कर नींद भांजने लग गया। मेरी आँख तब खुली जब हम अयोध्या से सरयू पर बने बड़े पुल से गुजर रहे थे। आगे फ़ैजाबाद हवाई अड्डे के किनारे से होते हुए हम आगे बढे। फ़ैजाबाद देख कर मुझे अमरेंद्र त्रिपाठी याद आए। यह उनका गृह जिला है। अगर समय होता तो अयोध्या का एक चक्कर फ़िर लगा लेते लेकिन हमें तो 17 तारीख तक किसी भी हालत में घर पहुंचना था। सुल्तानपुर 25 किलोमीटर था तब पाबला जी ने एक पैट्रोल पंप के किनारे गाड़ी को ब्रेक लगाया और बोले कि मैं सो रहा हूँ। जब थकान दूर हो जाएगी तो हम चल पड़ेगें। पैट्रोल पंप में एक चाय की दूकान थी और वहां कई तख्त पड़े थे। पहले तो चाय बनवाकर पी और मैं भी एक तख्त पर ढेर हो गया। गिरीश भैया पैदल घूम कर मौसम का आनंद ले रहे थे।

पाबला एक नींद पूरी करके उठे और मुझे जगाया। मौसम को देखते हुए उन्होने कहा कि डिक्की को ठकना चाहिए। आगे धूल भरा रास्ता है। वैसे भी रात भर चलने से पूरी गाड़ी में और बैग इत्यादि में धूल भर चुकी थी। गिरीश भैया की चादर को हमने डिक्की पर लपेट कर कांच बंद कर दिया। यह जुगाड़ हमें पहले ही कर लेना था। कैमरे को भी धूल से खतरा था, इसलिए मैने चित्र लेने के लिए बैग से निकाला ही नहीं। पर हमारा दिमाग तो काम नहीं किया पर सरदार का दिमाग काम आया। बात बन गई। यहां से हम आगे बढे। तभी ध्यान आया कि अपने प्रसिद्ध ब्लॉगर दम्पत्ति तो इलाहाबाद में ही रहते हैं और हमें अब नहाने और फ़्रेश होने की जरुरत थी। वैसे भी ब्लॉगर्स को मैं अपने पिछले जन्म का संबंधी ही मानता हूँ। जो इस जन्म में मुझे आभासी रुप से प्राप्त हुए। इस जन्म वाले सखा तो साथ पले बढे और खेले कूदे। पिछले जन्म के जो साथी छूट गए थे उन्हे भगवान ने इंटरनेट के माध्यम से मिलवा दिया। ये हुई न कोई बात।
महफूज अली, कृष्ण कुमार यादव, ललित शर्मा एवं  गिरीश पंकज
मैने 9 बजे मैसेज से कृष्णकुमार जी को इलाहाबाद आगमन की सूचना दी। उन्होने तुरंत मैसेज का जवाब देते हुए अपना पता भेज दिया और तत्काल मुझे फ़ोन लगाकर आने को कहा। मैने पाबला जी को बताया तो उन्होने सहचरी को जीपीओ पहुंचाने कह दिया। तभी महफ़ूज का फ़ोन भी आ गया। वह भी इलाहाबाद में था, पाबला जी ने मुझे बताया। चलो ये भी खूब रही, छोटा सा ब्लॉगर मिलन ही हो जाएगा। एक घंटे बाद हमने इलाहाबाद में प्रवेश किया। गंगा पार करने के बाद हमें एक नाका मिला। जहाँ टोल टैक्स लिया जा रहा था। छत्तीसगढ़ सरकार का पत्रकार का कार्ड दिखाने पर उन्होने कहा कि यहाँ नहीं चलेगा, ई यूपी है। चलो भई नहीं चलाओगे तो हमारा क्या जाएगा। घाटा तो यूपी सरकार का ही है। हम ब्लॉगर तो वैसे भी तुम्हारे यूपी की सड़कों को कोसते आ रहे हैं।

इलाहाबाद के ट्रैफ़िक सेंस की चर्चा क्या करुं? अगर नहीं करुंगा तो लोग कहेगें कि बताया नहीं। नाका से आगे बढने पर ट्रैफ़िक का जो हाल देखा, ऐसा कहीं देखने नहीं मिला। दांए, बांए, आगे, पीछे कोई कहीं से भी घुस जाता था। ऑटो वाले बीच सड़क से ही ऑटो मोड़ लेते थे। ट्रैफ़िक की हालत देख कर पाबला जी का दिमाग पर प्रेसर बढ रहा था और मेरा पैर पर। जी पी एस वाली बाई नगर के बीचों बीच लेकर चल रही थी। कृष्ण कुमार जी हम लोगों की लोकेशन ले रहे थे फ़ोन पर। लालबत्ती देख कर चौक पर हमारी गाड़ी रुकी। लेकिन बाकी ट्रैफ़िक नहीं रुका। हम हरी बत्ती का इंतजार करते रहे, चौक पर हमारी गाड़ी के बगल में ही सिपहिया खड़ा था। पाबला जी बोले - जब कोई नहीं रुक रहा तो हम क्यों रुकें। चलो बढा जाए, कह कर गाड़ी बढा दी।
ब्रिटिश क्राउन 
हम सिविल लाईन पहुंच गए। अब सिविल लाईन बहुत बड़ी है। किधर जाएं, जीपीएस वाली बाई जीपीओ, पोस्ट ऑफ़िस कमांड देने पर कई पोस्ट ऑफ़िस दिखाने लगी। जीपीओ की कमांड देने पर उसने हेड पोस्ट ऑफ़िस के पिछले दरवाजे पर पहुंचा दिया। वहाँ पर एक स्कूल था, लेकिन प्रवेश द्वार दिखाई नहीं दिया। हमने गाड़ी आगे बढाई तो गोल चक्कर पर चर्च दिखाई दिया। वहां से आगे बढने पर मुख्य प्रवेश द्वार दिखाई दे गया। द्वार पर पहरा लगा था, हमारी गाड़ी ने प्रवेश किया तो एक व्यक्ति हमें वहाँ मिल गए, जो हमें रिसीव करने के लिए खड़े थे। हमने गाड़ी खड़ी की तो धूल ही धूल भरी हुई थी समान में। तभी कृष्ण कुमार जी भी आ गए साथ आकांक्षा जी भी अलग कार में थे। नन्ही ब्लॉगर अक्षिता पाखी और अपूर्वा स्कूल से आए थे। हम गेस्ट रुम में पहुंच गए। पाबला जी सो गए और मैं स्नानाबाद चला गया।

खाना तैयार था, मैं पाबला जी को नींद से जगाना नहीं चाहता था, गिरीश भैया को खाने के लिए बुला लाया। हम दोनों ने भोजन किया और मैं भी एक नींद लेना चाहता था। यादव जी ने कहा था कि - जब आप लोग फ़्री हो जाएं तो मुझे फ़ोन कर लीजिएगा, मैं यहीं हूँ। मैं सोफ़े पर सो गया। पाबला जी का फ़ोन बजने लगा। 3 बार किसी का फ़ोन आया, वे गहरी नींद में थे। मैं भी निद्रा रानी के आगोश में जाने वाला था फ़ोन की घंटी बज गई। देखा तो महफ़ूज अली थे। आ जाओ भाई सीधे ही उपर। और वो पट्ठा भी सीधा ही उपर आ गया। :) थोड़ी देर में मैं नींद की खुमारी से बाहर आया। महफ़ूज ने पाबला जी को भी जगा दिया। पाबला जी ने स्नान करके भोजन किया। फ़िर मैने तीन बजे कृष्ण कुमार जी को फ़ोन लगाया। वे भी आ गए और ब्लॉगर्स की महफ़िल जम गई। मैने उन्हे सिरपुर सैलानी की नजर से पुस्तक भेंट की।
बी. एस. पाबला, महफूज अली, कृष्ण कुमार यादव, गिरीश पंकज एवं अन्य 
कृष्ण कुमार जी का जनसम्पर्क बहुत तगड़ा है, उन्होने तुरंत ही फ़ोन करके एक पत्रकार को बुला लिया। नेपाल ब्लॉगर सम्मान समारोह पर बात होने लगी। पत्रकार ने हम सबके विचार लिखे। फ़िर हम पोस्ट ऑफ़िस घूमने गए। जहाँ बहुत सारी चीजें मुझे देखने मिली। मेरी रुचि वहां मौजूद ब्रिटिश क्राऊन में अधिक थी। कृष्ण कुमार यादव जी ने बताया कि यह प्रस्तर निर्मित ब्रिटिश क्राऊन पोस्ट ऑफ़िस के कबाड़ में पड़ा हुआ था। उसे जोड़ कर उन्होने पोस्ट ऑफ़िस में रखवाया। इसका एक भाग टूट चुका है तथा लैटिन भाषा में लिखे हुए अक्षर टूटने के कारण लिखा हुआ पढा नहीं जा सका। कुछ पुरानी डाक टिकटें, हरकारों के हथियार इत्यादि यहां प्रदर्शित किए गए है। अब हमारा आगे बढने का समय हो रहा था।

हमने कुछ चित्र 1872 में निर्मित लेटर बॉक्स के साथ खिंचवाए और कृष्ण कुमार जी धन्यवाद देते हुए उनसे विदा ली। यह एक अविस्मरणीय भेंट थी, जो हमेशा याद रहेगी। अब हमें इलाहाबाद के ट्रैफ़िक से फ़िर जूझना था। चौराहे पर फ़िर वही घटना हुई। अबकि बार पाबला जी अड़ गए कि बिना हरी बत्ती हुए गाड़ी आगे नहीं बढाएगें। लाल बत्ती में भी पीछे की गाड़ियाँ वाले आगे बढने के लिए हार्न बजा रहे थे। बत्ती हरी होने पर आगे बढे। बाजार के बीचे से चलते हुए गाड़ी वाली आगे पीछे अगल-बगल से निकलने लगे। हमारी गति एकदम कम ही थी। एक सुजूकी वाले ने बाईक हमारी गाड़ी के सामने अड़ा दी और पाबला जी ने उसे हल्की की टक्कर दी। वह बाईक लेकर घूरते हुए आगे बढा। बाजार से निकल कर हम गंगानदी के पुल पर पहुंचे तो वहां खूंटे गड़े हुए मिले। मतलब इधर से लोहापुल से आगमन का रास्ता था, जाने वाला बंद था। गाड़ी वापस मोड़ी। जीपीएस ने फ़िर उसी रास्ते पर पहुंचा दिया।
तीन ब्लॉगर रास्ते में (कैम्प टी)
फ़िर हमें बंगाल के नम्बर की एक मारुति दिखाई दी। मैने कहा कि इसके पीछे पीछे चलते हैं ये भी पुल पार करेगा। इसके पीछे गाड़ी लगाने पर वह नदी के रास्ते पर गया और वहाँ से लौटती हुई सड़क से पुल पर चढने का रास्ता था। काफ़ी मशक्कत के बाद हमें पुल पार करने का रास्ता मिल गया। यहां पर जी पी एस वाली बाई फ़ेल हो गई। मुझे मालकिन ने फ़ोन करके कहा था कि घर में गंगाजल खत्म गया है। इसलिए गंगाजल लेकर आना। अब क्या बताएं गंगाजल की कहानी। एक बार इलाहाबाद में गंगा त्रिवेणी में स्नान करने के बाद 5 लीटर के डिब्बे में गंगाजल भर कर लाए थे। रायपुर पहुंचने पर देवी शंकर अय्यर मुझे स्टेशन लेने आए। गंगा जल उनकी बाईक की डिक्की में रख कर भूल गया और वो उनके घर पहुंच गया। फ़िर उनसे मांगा नहीं और न ही उन्होने मेरे घर पहुंचाया।

मैं बाजार में आस पास 5-10 लीटर का जरीकेन देखता रहा, लेकिन कहीं नहीं दिखाई दिया। गिरीश भैया कहने लगे कि डिब्बे में भरा हुआ गंगा जल बिकता है। कहीं दिख जाएगा तो ले लेगें। मैने तो आज तक डिब्बे में भरा गंगाजल बिकते नहीं देखा। हाँ डिब्बे जरुर बिकते हैं जिन पर गंगा जल लिखा रहता है। अगर कहीं डिब्बा मिल जाता तो नदी किनारे गाड़ी रोक कर भर लेते। गंगा की अथाह जल राशि से एक डिब्बा गंगा जल भी नसीब में नही था। हम पुल पार करके गंगा के किनारे भी पहुंचे, लेकिन गंगा जल लेकर किसमें जाएं। बिना गंगा जल लिए हमने इलाहाबाद छोड़ दिया और रींवा मार्ग पर चल पड़े। सूरज अस्ताचल की ओर जा रहा था। घरों में रोशनी हो चुकी थी। हमें इलाहाबाद से रींवा मार्ग पर आने में 1 घंटे से अधिक समय लग गया। एक होटल में रोक कर चाय बनवाई और पान खाए, बंधवाए और आगे बढे।

नेपाल यात्रा आगे पढे……… जारी है। 

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

राजा भृतहरि, रानी झरोखा एवं वध स्थल : चुनारगढ़

चुनारगढ़ का मुख्य द्वार
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उन्मुक्त द्वार हमें प्रवेश के लिए आकर्षित कर रहा था। प्रवेशाग्रह को स्वीकार कर हमारी "ईको" भी सरसराते-बलखाते हुए उन्मुक्त द्वार से प्रवेश कर गई। भीतर जाने पर खाकी वर्दी वाले दिखाई पड़े तो चौंकना पड़ गया। हमने गाड़ी विश्राम गृह तक चढा दी थी। एक सिपाही दौड़ कर आया तो हमने भीतर का रास्ता पूछा तो उसने गाड़ी गेट पर खड़े करने कहा और बताया कि इस गढ़ में उत्तरप्रदेश पुलिस का दरोगा प्रशिक्षण केन्द्र है। पाबला जी गाड़ी बाहर खड़ी करने गए और मैने आवक पंजी में अपना नाम, पता एवं आने का उद्देश्य दर्ज किया। सामने बनी बैरकों के बीच से गढ़ पर जाने का रास्ता है। द्वार पर भृतहरि शतकम का श्लोक लिखा है।

भवनों का प्रवेश द्वार
हम भवनों ओर जा रहे थे तभी एक व्यक्ति मिला और उसने बताया कि वह गाईड है। मैने सोचा कि रख लिया जाए वरना भवनों पर तो कोई नाम पट्ट लिखा नहीं है, जिससे हमें जानकारी मिल जाए। गाईड ने 150 रुपए पारिश्रमिक कहा और मैने 50 रुपए। वह तैयार नहीं हुआ, मैने फ़िर पूछा तो वह नखरे करता रहा। थोड़ी देर में 50 रुपए में मान गया। गढ़ की पहाड़ी के 90 प्रतिशत भाग पर पुलिस का कब्जा है, सिर्फ़ 10 प्रतिशत भाग ही आम आदमी के दर्शनार्थ खुला छोड़ा गया है। वैसे भी भारत के कई किले और दुर्ग पुलिस एवं सेना के कब्जे में है। सिर्फ़ लाल किले को ही सेना से मुक्त किया गया है। लेकिन ये पता नहीं है कि अब पूरे किले में घूमने दिया जाता है या नहीं।

एड़ी के आकार की गढ़ संरचना एवं गंगा नदी
एड़ी आकार के चुनारगढ़ के उपरी घेरे में प्रवेश करने पर सामने सोनवा मंडप दिखाई देता है। कहा जाता है कि महोबा के उद्भट योद्धा आल्हा का विवाह इसी मंडप में हुआ था। प्रस्तर निर्मित इस मंडप पे चूने की पोताई की हुई है। मंडप के प्रवेश द्वार के अलंकरण में छिद्र दिखाई देते हैं। गाईड ने कहा कि इन छिद्रों में हीरे, मोती, पन्ना, नीलम इत्यादि रत्न जड़े हुए थे तो मैने उसे डांट दिया - "झूठ बोलते हो, यह तो प्रस्तर पर बेल-बूटों का अलंकरण है यहाँ रत्न जड़ने की जगह एवं उखाड़ने का स्थान ही दिखाई नहीं देता। रत्न संगमरमर पर जड़े जाते थे, जिससे उसकी आभा बढ जाती थी तथा बलुए पत्थरों पर भित्तियों में कहीं पर मैने रत्नालंकरण नहीं देखे। पर्यटकों को झूठ बोल कर रोमांचित करने की बजाए सत्य से अवगत कराना चाहिए। यह एक परम्परा ही चल पड़ी है, किसी भी प्राचीन इमारत में जाओ, वहां भित्तियों पर रत्न जड़ने का जिक्र अवश्य ही गाईड करते हैं।" मेरी लताड़ सुनकर वह झेंप गया।

सोनवा मंडप एवं तहखाने का रास्ता
गिरीश भैया एवं पाबला जी अपनी अलग ही दुनिया में व्यस्त थे। धड़ाधड़ फ़ोटो लिए जा रहे थे, लगता था, गढ़ के इतिहास में कुछ विशेष रुचि नहीं है। सोनवा मंडप के पश्चिम मे बारहदरी है, उसके पीछे एक भवन में कुछ लोग दिखाई दिए। वहाँ जाने पर पता चला कि यहाँ राजा भृतहरि की समाधि है तथा वे यहाँ के पुजारी हैं। चुनारगढ़ का प्राचीन नाम चरनाद्रिगढ़ बताया जाता है। राजा विक्रमादित्य ने इसका निर्माण अपने भाई राजा भृतहरि के तप हेतू वनगमन के कारण वन्य पशुओ से रक्षार्थ गंगा नदी के तट पर करवाया था। यह गढ़ धरातल से लगभग 500 फ़ुट की उंचाई पर है दो तरफ़ गंगा नदी प्रवाहित होती है। गढ़ के उपर से गंगा जी की विशाल जलराशि दिखाई देती है। टाईल्स लगा कर समाधि को चमकाया गया है तथा लोग इस स्थान पर मनौतियाँ मानने आते हैं।

राजा भृतहरि की समाधि
इसके पीछे एल आकार की भवन संरचना है, जिसकी खिड़कियों से गंगा नदी दिखाई देती है। खिड़कियों में मोटे सरिए लगे हुए हैं। गाईड ने बताया कि यह विशिष्ट जनों की जेल है। मानो लालू, ए राजा, कन्नीमोझी, आशाराम सरीखे विशिष्ट कैदी रखे जाते थे। यह स्थान खुला-खुला एवं हवादार है। जिससे विशिष्ट कैदियों को हवा-पानी बराबर मिलता रहे और गंगा दर्शन कर अपने पापों का प्रायश्चित कर सकें। इसके साथ ही नीचे तहखाने बताए जाते हैं, मुझे तो कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया पर फ़र्श को ठोकने पर पोली आवाज आती है। इससे स्त्यापित होता है कि अवश्य ही भवन के नीचे तहखाने होगें। क्योंकि तत्कालीन शिल्प में तहखाने महत्वपूर्ण स्थान रखते थे।

कचहरी से दिखाई देता रानी झरोखा
इस हॉल से जुड़ा हुआ एक कक्ष है जिसमें सुरक्षा की दृष्टि से शतघ्नि रखकर संचालित करने के लिए दीवार में मोखे बनाए गए हैं। जहाँ शतघ्नि को रख कर सुविधानुसार चलाया जा सके। गाईड बताता कम था और सुनता अधिक था। वो भी सोच रहा था कि 50 रुपए में कितना सुनना पड़ता है :), अभी तक तो वह कथा सुनाता आया है, आज सुननी पड़ रही है। इस कक्ष की विपरीत दिशा में रानी झरोखा बना हुआ है। इस झरोखे का काफ़ी अलंकरण किया गया है तथा इस झरोखे से कचहरी दिखाई देती है। तत्कालीन समय में कचहरी के काम-काज पर रानी की नजर रही होगी। ये सभी इमारतें बलुए पत्थर से निर्मित हैं। कुछ निर्माण तो प्राचीन एवं कुछ निर्माण 14 वीं 15 वीं शताब्दी के दिखाई देते हैं जिनमें मुगल शैली की झलक दिखाई देती है।

कारागार
इस भवन के दांई तरफ़ कारागार का निर्माण किया गया है। यह कारागार लगभग 80 फ़ुट लम्बा और 30 फ़ुट चौरा होगा। इसमें कई कक्ष बने हैं तथा लोहे के मजबूत किवाड़ों से सुरक्षित किया गया है। गाईड ने बताया कि इस जेल का निर्माण वारेन हेस्टिंग्स ने कराया था तथा इसमें अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने वाले बंदी रखे जाते थे। शिल्प की दृष्टि से मुझे यह कारागार किसी घुड़साल जैसे दिखाई दिए, जिनकी बनावट में कुछ परिवर्तन करके परवर्ती शासकों ने इसे कारागार का रुप दे दिया। किवाड़ों पर लोहे की मोटी एवं मजबूत सलाखें जड़ी हुई हैं। इलेक्ट्रिक वेल्डिंग न होने के कारण ये किवाड़ लोहार द्वारा निर्मित प्रतीत होते हैं। लोहे के ऐसे किवाड़ों का निर्माण अंग्रेजों के काल में होता था। मैने किवाड़ के पीछे खड़े करके गिरीश भैया की तश्वीर ली।

वध स्थल
गढ़ के अन्य भवनों में कचहरी प्रमुख है। गाईड ने बताया कि इसका निर्माण शेरशाह सूरी ने कराया था। कचहरी में तीन कक्ष दिखाई देते हैं तथा एक बड़ा दालान है। जिसमें फ़रियादी और फ़रियाद सुनने वाले अधिकारी स्थान पाते होगें। कचहरी से लगा हुआ कारागार है। सजायाफ़्ता को तुरंत ही कारागार में डाला जाता होगा। कचहरी के साथ कारागार होने के कारण बंदी व्यक्ति के भागने की आशंका नगण्य होती होगी। कचहरी के समक्ष ही दंड स्थल है। जहाँ सिर कलम करके एवं फ़ांसी द्वारा दंड देने की व्यवस्था है। जिसकी जैसी इच्छा होती थी वैसी मृत्यू चुन लेता होगा। कचहरी से गंगा तट की ओर झांकने पर किले की प्राचीर से लगकर वध स्थल बना हुआ है।

सुरंग का मुहाना
गाईड ने एक स्थान पर सुरंग दिखाई, जिसे ईंटों से बंद कर दिया गया है। चंद्रकांता उपन्यास में चुनार गढ़ से आस पास के गढों में जाता हुआ सुरंगों का जाल दिखाई देता है। परन्तु मुझे लगता है कि हकीकत में ऐसा नहीं होगा। जनमानस को रोमांचित एवं भयभीत करने हेतु सुरंग के किस्सों को गढ़ा गया होगा। इस सुरंग के साथ ही सैनिकों के बैरेक बने हुए हैं। जिसमें गढ़ के सुरक्षाकर्मी एवं प्रहरी निवास करते होगें। सारी व्यवस्था चाक चौबंद दिखाई देती है। अनुमान है कि प्रहरियों की संख्या खासी रही होगी। क्योंकि दुश्मन गंगा की दिशा में कमंद डाल कर गढ़ में प्रवेश करने का रास्ता बना सकता था। गंगा की तरफ़ से गढ़ में सीधी चढाई नहीं है। बाहर की ओर निकली हुई चट्टानें दुश्मन के आक्रमण में सहायक हो सकती हैं।

कुंए में काल्पनिक सुरंग का रास्ता
एक कोने में वह प्रसिद्ध कुंआ है, जिसमें सुरंग मार्ग होने का जिक्र हमेशा सुनाई देता है। गाईड ने बताया कि कुंआ 85 हाथ गहरा है। पहाड़ी पर 85 हाथ गहरे कुंए को हम पातालतोड़ कुंआ कह सकते हैं। पत्थरों से बांधे गए इस कुंए में सीढियाँ बनी हुई हैं तथा दो स्थानों पर द्वार जैसी संरचना भी दिखाई देती है। जिसके समक्ष प्रकाश के हेतू मशाल रखने के लिए पत्थर का ठिया भी बना हुआ है। इससे थोड़ा नीचे एक बड़ा द्वार भी है, जिससे पैड़ियाँ एक कक्ष में पहुचती है। कुंए में ऐसी व्यवस्था संकट काल में गुप्त वार्तालाप करने के लिए बनाई जाती थी। जिससे लोगों को इसके सुरंग होने का भ्रम होने लगता था और ऐसी लफ़्फ़ाजियों का जन्म होता था जो अभी तक जनमानस में प्रचलित हैं।
नेपाल यात्रा की आगे की किश्त पढें

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

बसंती तागें वाली और हरिद्वार--- ललित शर्मा

तांगे की सवारी - बी एस ठाकुर एवं गिलहरे के साथ
प्रारंभ से पढें
बसंती तांगे वाली हमें पुल पर छोड़कर फ़रार हो गयी, पुल पर बहुत भीड़ थी बड़ी मुस्किल से नीचे उतरने के बाद हमने गौरीशंकर 1 का पता पूछा तो पता चला कि पुल के आखरी छोर से रास्ता बना है। मेरे पास वी आई पी पास था, वीआईपी व्यवस्था यज्ञशाला के पास ही की गयी थी। लेकिन वहाँ वीआईपी बनकर अकेले रहने की बजाय साथियों के दल में रहना ही उपयुक्त लगा। हम अपना सामान लाद कर गौरीशंकर 1 के लिए चल पड़े। सीढियों के पास से लगभग 3 किलोमीटर पैदल जाना पड़ा। रास्ते में एक जगह पुल पर लगी लोहे की सीढी से लोग उपर चढ रहे थे। यह बहुत ही खतरनाक कार्य था। महिलाएं भी सीढी पर उपर चढ रही थी। लोग पैदल चलने से बचने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे थे और लगभग आधा किलोमीटर लाईन में लग कर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। अगर पैदल चलते तो पहुंच जाते। इस सीढी से भी दुर्घटना हो सकती थी। मैने एक फ़ोटो ली और आगे बढ गया।

बसाहट का नक्शा
गौरी शंकर 1 के रिसेप्शन पर लोग आमद देकर अपना टेंट नम्बर ले रहे थे। हमें टेंट नम्बर छत्तीसगढ 220 मिला। यह लगभग 100 लोगों के रहने के लिए मुफ़ीद था। यहाँ से गंगा का किनारा भी समीप होने से रोज गंगा स्नान हो सकता था। सभी को प्रिंटेट परिचय पत्र दिए गए। तीन माह पहले से सभी शक्तिपीठों से आने वाले परिजनों की लिस्ट मंगा ली गयी थी और सभी के परिचय पत्र यहां बन कर तैयार थे। इतने बड़े आयोजन की सुरक्षा की दृष्टि से यह सही कदम था। टेंट के कई शहर बसाए गए थे। जिनमें छत्तीसगढ से आने वालों की संख्या अधिक थी। हमारे सीताराम गुरुजी दो महीने पहले से ही समय दान के लिए पहुंच गए थे। उनकी ड्युटी पंत द्वीप में थी और उन्होने मिलने की इच्छा भी जाहिर की थी। यहाँ कहीं भी जाने के लिए पैदल ही जाना पड़ेगा, यह मैं जानता था। कोई सवारी और साधन उपलब्ध नहीं था।

अपना सामान लेकर टेंट की ओर जाते सहयात्री
गायत्री परिवार के इस आयोजन की तैयारी तीन साल पहले से हो रही थी। कुंभ से भी विशाल आयोजन और इंतजाम था। जिसमें प्रशासन की कहीं पर भी भागीदारी नहीं थी। समय दानी वालिएन्टर्स अपना योगदान दे रहे थे। मुस्तैदी से अपनी ड्युटी पर लगे थे। जिस दिन हम पहुंचे बताते हैं कि उस दिन लगभग 50 लाख गायत्री परिजन हरिद्वार पहुंच चुके थे। उनके रहने, खाने एवं निस्तारी की उत्तम व्यवस्था थी। कुंभ में अरबों रुपए खर्च करके भी शासन इतनी सुंदर व्यवस्था नहीं कर पाता। जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को उसका परिचय पत्र बना हुआ तैयार मिल रहा था और रहने के लिए तुरंत छोलदारियों का आबंटन कर दिया गया। खानी की व्यवस्था सुबह से प्रारंभ हो जाती थी। लोग स्वयं जाकर भोजनालय में अपनी सेवाएं दे रहे थे। सेवा भाव से भोजन करवा रहे थे। भोजन के लिए अनुशासित कतारबद्ध लोग खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। हम अपने टेंट की ओर चल पड़े।

सीढी पर चढते लोग
टेंट में सामान रख कर साथी लोग गंगा स्नान के लिंए चले गए और हम सामान की चौकीदारी करते रहे। छोलदारी में रात गुजारने का अपना ही आनंद है। वीआइपी लोगों के लिए स्विस कॉटेज का इंतजाम था। जिसमें पलंग, लैट्रिन बाथरुम, पंखा था। छोलदारी में लाईट और दरी बस थी। इस पर ही रात गुजारनी थी। साथियों के आने के बाद हम स्नानादि से निवृत्त हुए। हमारा कार्यक्रम मसूरी जाने का था। इसलिए बस स्टैंड के लिए जल्दी निकलना चाहते थे। बस स्टैंड जाने के लिए फ़िर उसी पुल पर चढना था। हम 4किलोमीटर चलते हुए सीढी के पास पहुंचे तो वहाँ पुलिस लग चुकी थी और सिर्फ़ लोगों को उतरने दिया जा रहा था। चढने नहीं दिया गया। हमारी योजना खटाई में पड़ चुकी थी। वापस पुल पर आने के लिए 5 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता और 12 बज रहे थे। मसूरी जाकर वापस आना संभव नहीं था।

भोजन की लाईन
जब मैं गौरीशंकर से पुल की तरफ़ आ रहा था, लगभग 11 बजे होगें, तब घर से श्रीमती जी का फ़ोन आया कि हरिद्वार में भगदड़ मच गयी है। कई लोग मारे गए हैं, फ़िर एक मित्र का फ़ोन आया कि हरिद्वार में यज्ञ स्थल पर दंगा हो गया है। ऐसा मुझे कहीं नजर नहीं आया। टेंट में दिन में बिजली न होने से हमारा मोबाईल चार्ज नहीं हो पाया था। इसलिए बंद हो गया। अब किसी से सम्पर्क नहीं हो सकता था। यह भी एक समस्या हो गयी। जितने भी इष्ट मित्र परिजन थे इस अवधि में आशंकाओं से दो चार होते रहे। वे फ़ोन से जानकारी लेना चाहते थे लेकिन मोबाईल बंद होने से उन्हे सही जानकारी नहीं मिल पा रही थी। जैसा अफ़रा तफ़री एवं भगदड का माहौल बताया जा रहा था वैसा तो मुझे वहाँ नहीं लगा। हम लोग सीढी के पास से वापस आते हुए थक चुके थे। अब कहीं बैठने की जगह देख रहे थे। जहाँ खड़े होने के लिए जगह नहीं थी वहाँ बैठने के लिए जगह तलाश करना बड़ी बात है।

छोलदारियों का विहंगम दृश्य
हम चलते हुए आगे बढे तो एक स्थान पर चायवाले की 5-6 कुर्सियाँ खाली दिखी। बस हमने उन्हे हथिया लिया और चाय का आर्डर दिया। सभी ने आराम किया। उसने चाय एकदम घटिया बनाई। हमें चाय से कोई मतलब नहीं था, हमारा मुख्य उद्देश्य कुछ देर आराम करना था। यहां 1बज गए थे, पंकज और मैने कुछ फ़ोटुएं ली। अब विचार बनाया कि मसूरी की बजाए ॠषिकेश चला जाए। जब पहले मैं आया था तब हरिद्वार से ॠषिकेश जाने के 5 रुपए लगते थे। मैने सोचा कि अब अधिक से अधिक 20 रुपए लगेंगे। लेकिन जब पुल के नीचे जाकर ऑटोवालों से पूछा तो उन्होने आठ सवारी के 1600 रुपए बताए, ॠषिकेश से घुमाकर वापस लाने के। मै तो भौंचक रह गया। एक बार तो मन में आया कि बजाऊं उसके कान के नीचे। साले अनाप-शनाप किराया बता रहे हैं। दो चार ऑटो वालों से पूछा तो उन्होने भी यही किराया बताया। 

जय बाबा की - वानप्रस्थ की ओर अग्रसर :)
ॠषिकेश दो बार मेरा पहले भी देखा हुआ था, लेकिन जो नए लोग मेरे साथ आए थे वे देखना चाहते थे। आखिर 1500 रुपए में एक ऑटो तैयार हुआ। वह हमें मुख्यमार्ग की बजाय राजा जी पार्क के भीतर से नहर के किनारे-किनारे ॠषिकेश लेकर गया। उसने बताया कि ॠषिकेश पहुंचकर आपको 1500 रुपए युनियन में जमा करने होगें। फ़िर वहां से आपको रसीद और टाईम दिया जाएगा। उस टाईम पर आपको वापस आना है। युनियन वालों ने भी फ़र्जीवाड़ा खोल रखा है। पैसे की रसीद काटने के 10रुपए लेते हैं सवारियों से। खुले आम डकैती का शिकार हो रहे हैं पर्यटक। घुमकर आने के बाद रसीद दिखाने पर वह आपके रुपए वापस करेगा। ऑटो वाले कहा कि जब आपको वापस छोड़ देगें तभी आप किराया देना। ऑटो वाला गाजीपुर का था, कुछ अधिक ही चलता पुर्जा नजर आ रहा था। सोच रहा था कि मुफ़्त में ही 1500 हजम कर ले। लेकिन उसका पाला तो मोगेम्बो से पड़ा था। अभी उसने मेरा चमत्कार नहीं देखा था। जारी है.....आगे पढें।