रोहतक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रोहतक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

माऊस को सजा, पानीपत की चौथी लड़ाई और काफ़िनो

आरम्भ से पढ़ें 
पानीपत के युद्ध के विषय में हम इतिहास में पढते आए हैं,1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया था। पानीपत की दूसरी 1556 में हुई। पानीपत की तीसरी लड़ाई 1761 में हुई।

अब पानीपत की चौथी लड़ाई तब से ही जारी है जीजिविषा के लिए। पानीपत अब एक औद्यौगिक नगर बन चुका है। उद्योगों में बाहर से आकर हजारों लोग काम करते हैं। रोजी रोटी की लड़ाई हर आदमी लड़ रहा है।

यहां के लोग साफ़ पानी के लिए भी लड़ाई लड़ रहे हैं। औद्यौगिक प्रदूषण ने यहां के जमीनी पानी को प्रदूषित कर दिया है। घर-घर एक्वागार्ड लगे हैं और पीने के लिए फ़िल्टर प्लाँट से पानी खरीदना पड़ता है। पानीपत में तो मेरा पड़ाव कुछ घंटो का ही था। इसलिए अधिक जानकारी नहीं ले पाए। हमे रोहतक के लिए भी निकलना था

देश की मशहूर हस्ती भाई योगेन्द्र  मौदगिल जी के साथ हम उनके घर पहुंचे। भाभी जी और बेटे बेटी से मुलाकात हुई। बेटा योगेन्द्र जी के काम में हाथ बंटाता है और पढाई भी करता है। इसीलिए ये बेफ़िक्र होकर कवि सम्मेलन करते फ़िरते हैं।

सफ़र में निकले कई दिन हो गए थे। छत्तीसगढ से मध्यप्रदेश,राजस्थान और दिल्ली होते हुए हरियाणा में प्रवेश कर चुके थे। कई दिनों तक पक्का खाना खाया। अब कुछ अलग तरह का खाने का मन था।

शायद भगवान ने सुन ली। जब खाने की टेबल पर पहुंचे तो भाभी जी ने पकौड़े वाली कढी बना रखी थी। वाह क्या कहने। मनवांछित भोजन देखकर ही आनंद आ गया। हरियाणा की एक मशहूर सब्जी पनीर भी है। यहां आपको शादी ब्याह और भी कोई कार्यक्रम हो, पनीर की सब्जी जरुर मिलेगी।

अगर किसी के यहाँ नही मिली तो कह देंगे कि – “सुसरे नै के इंतजाम करया था। एक दम घटिया। पनीर का साग भी कोनी बणाया।“ और अगर पनीर का साग मिल गया तो सबसे पहले उससे ही प्लेट भर लेंगे। चाहे पीच्छे कुछ ना मिले तो भी काम चल ज्यागा।)

गरम गरम कढी पकौड़े और पनीर की सब्जी के साथ भोजन करके हम चल पड़े रोहतक की ओर। ठंड कुछ अपना असर दिखाने लगी थी।

रोहतक से पहले हमने राज भाटिया जी को फ़ोन लगा दिया था। उन्होने सुभाष नगर गुरुद्वारे के पास का पता दिया। हम पूछते-पुछते पहुंच गए।

बस आखरी बार एक ताऊ से पूछा था गुरुद्वारे का पता। ताऊ भी कानों में सुनने मशीन लगाए जैसे तैयार ही बैठा था कि हम आवैंगे और उससे गुरुद्वारे का पता पूछेंगे।

ताऊ ने गुरुद्वारे का पता बता दिया। जैसे ही हमने गाड़ी टर्न की सामने राज भाटिया जी खड़े दिख गए। ओ ज्जी की बतावां साड्डी ते बल्ले बल्ले हो गयी। सबने मिल के कस के जफ़्पी पाई और चल पड़े घर की ओर् । राज भाटिया जी रास्ता बताते रहे और योगेन्द्र की कार ड्राईव करते रहे। इस तरह भाटिया जी के घर पहुंच गए।

जाते ही राज भाटिया जी सवाल किया कि –“ बाकी कहाँ हैं? मैने कहा जी – मन्ने तो बेरा कोनी। आज नहीं तो काल आ ज्याँगे।“

राज भाटिया जी ने जर्मनी की चाय (काफ़िनो) पिलाई और कहा कि चलिए सामान लेने चलते हैं। तब तक अंतर सोहिल भी पहुंच चुके थे।

अब बाजार सामान लेने पहुंच गए। दो बीयर तीन सिगनेचर के खंबे लिए। चिकन लिया और हरी सब्जियाँ आदि खरीदी।

सब्जी की दुकान में लिखा था " कृप्या थैला साथ लेकर आएं थैली बंद हो गयी है, धन्यवाद।" 6 कांच के गिलास लिए भविष्य के लिए। नहीं तो फ़िर लेने पड़ते। खाना बनाने में सभी ने हाथ बंटाया। योगेन्द्र जी ने मटर छीले, मैने भी कुछ किया। राज भाटिया जी ने गोभी काटी। कुल मिलाकर सभी ने थोड़ा थोड़ा काम किया। तब तक मैने रोस्ट तैयार कर दिया था। रेखा रोटियाँ बनाने लगी।

लैपटाप चालु किया तो पता चला कि नेट नहीं चल रहा है, उसका माऊस ढूंढा तो राज भाटिया जी ने उसे खराब होने की सजा  दी है, जर्मनी में माऊस बिगड़ने पर उसे इसी तरह सुधारा जाता है। यह हमें पता चला।

फ़िर हमने भी गप्प शप्प मारते हुए अपनी महफ़िल जमाई और रज्ज के मजा लिया। जैसे कयामत की रात हो। खाना खाते रात के 1 बज गए। सबने अपना अपना बिस्तर संभाल लिया।

रात 3 बजे करीब मेरी आँख खुली तो योगेन्द्र भाई कमरे में चक्कर काट रहे थे। मैने पुछा कि क्या हुआ? क्यों जाग रहे हैं? उन्होने कहा कि नींद नहीं आ रही। राज भाटिया जी अपने गुदड़े उठा के कमरे में चले गए थे।

मैने कहा- “ सो जाओ जी, बहुत रात हो गयी, अब तो पौ फ़टने वाली है।“ योगेन्द्र जी ने सोने का यत्न किया। मैं भी कहके सो गया। सुबह आँख खुली तो योगेन्द्र जी खर्राटे चालु थे। राज भाटिया जी ने बताया कि मेरे खर्राटों के कारण योगेन्द्र जी नींद खराब हो गयी और वे अपने बिस्तरे उठाकर दूसरे कमरे में  चले गए।

बात तो ये है कि जब सारे ही खर्राटे लेने वालें हों तो जिसे पहले नींद आ गयी वही राज करेगा – बोले सो निहाल आगे पढ़ें 

सोमवार, 22 नवंबर 2010

भाटिया और अलबेला में युद्ध--ब्लोगर मिलन के बाद

आरम्भ से पढ़ें 
ब्लोगर्स हाउस सुबह हो गई है. कल के ब्लोगर मिलन के बाद. नीरज जाट अभी सोकर उठा है. अलबेला खत्री ने गरम पानी पिया नमक डाल के, आज किसी के यहाँ इनका न्योता है.

अल सुबह भाटिया जी और अलबेला में युद्ध हो गया. बरतन मांजने को लेकर. अलबेला देशी तरीके से मांजने के मूड में थे. लेकिन भाटिया जी को जर्मन तरीके से ही मांजना था.

केवल राम रचना सुनाने के लिए पीछे पड़ गए. कहने लगे मेरी रचना सुनो.... अब सुबह सुबह रचना झेलना बहुत भारी पड़ जाता है. क्योंकि रात भर वही रचना चलती रही. सभी ने अपनी अपनी रचना का जिक्र किया.......

लेकिन नीरज जाट में कुछ दम था. क्योंकि तिलियार में पानी कुछ कम था. इसलिए इसने ही सारी रचनाएँ झेली.... कल के गुलाब जामुन का असर जो था........ बाकी तो सारा आइटम कार में ही धरा रह गया............ समीर लाल की रचना सुनने का मन था...... लेकिन उन्होंने फोन पर अपनी रचना नही सुनाई..... 

मैंने तो सुबह सुबह अजवायन ली, क्योंकि कल रात से ही तबियत नासाज हो गई ...... सर्दी जुखाम और बुखार ने हालत गंभीर कर रखी है.. सब कुछ उल्टा पुल्टा ...........

नीरज बोल्ला.. कुछ लेते क्यों नहीं?.... अरे भाई तीन दिनों से ले ही रहे थे....... रात टीचर्स और अलबेला की रचनाओं के साथ कटी........

योगेन्द्र मौदगिल ने तो तम्बू ही उखाड़ दिया......रात ही पानीपत  चल पड़े.  लेकिन कविता कहानी और व्यंग्य की महफ़िल खूब जमी........



अब सुबह हो चुकी है और नहाने के बाद अलबेला जी जयपुर जायेंगे.....हम रिवाड़ी जायेंगे.........नीरज का नहाने का मन नहीं है..............

केवल राम कल ही नहा लिए थे.......... राज भाटिया जी को जर्मन मेड साबुन नहीं मिल रहा है......नहाने के लिए..

संगीता जी ने कल ही भविष्यवाणी कर दी थी कि मुझे सर्द गरम हो सकती है.......

अब देखते हैं कब तक तबियत ठीक होती है...... और ब्लोगर रजाई से बाहर निकलते हैं......  अभी केवल राम चाय बना कर ला रहे है. अगर किसी को हिमाचल की चाय पीनी हो तो टिप्पणी द्वारा सूचना दे ........... फिर मत कहना की जादू नहीं दिखाया............. आगे पढ़ें 

सोमवार, 15 नवंबर 2010

आन मिलो सजना--लागी छुटे ना -- हम तो चले ----- ललित शर्मा

ताम्रकार समाज ने भगवान सहस्त्रबाहु जयंती का कार्यक्रम रखा था जगन्नाथ मंदिर रायपुर में। धीरज ताम्रकार ने मुझे फ़ोन आमंत्रित किया कि शाम 5 बजे के मिलन कार्यक्रम में आपको आना है। मैं 5 बजे जगन्नाथ मंदिर में पहुंच गया। थोड़ी ही देर बाद आर्टिजन वेलफ़ेयर आर्गेनायजेशन के अध्यक्ष व्ही विश्वनाथ जी, महापौर दुर्ग डॉ शिव तमेर, आर एस विश्वकर्मा जी भी पहुंच चुके थे। गरिमा मय आयोजन में ताम्रकार समाज के सभी बंधु पधार चुके थे। अतिथियों के स्वागत के पश्चात भाषण इत्यादि का कार्यक्रम हुआ। समाज के संगठन के विषय में उपस्थित महानुभावों ने प्रकाश डाला। इस तरह कार्यक्रम 9 बजे तक चला। भोजन प्रसादी के पश्चात देर रात हम घर पहुंचे।

सुबह भाई अशोक बजाज जी का फ़ोन आया कि छत्तीसगढ सरकार द्वारा खेलों का आयोजन किया जा रहा है जिसमें मैराथन दौड़ का शुभारंभ किया जाना है। उन्होने के कहा कि मैं 20 मिनट में पहुंच रहा हूँ। बस फ़िर मुझे  फ़टाफ़ट तैयार होना पड़ा। तब तक अशोक बजाज जी पहुंच चुके थे। हम सब आयोजन स्थल की ओर चल पड़े। वहां सभी तैयारी में थे। हमारे जाते ही औपचारिक शुभारंभ हुआ और भाई अशोक बजाज ने हरी झंडी दि्खा कर मैराथन दौड़ का शुभारंभ किया। छोटे छोटे बच्चों में अपार उत्साह था। स्थानीय थानेदार ओटी और तहसीलदार देवांगन की भूमिका भी सराहनीय रही। हम भी खिलाड़ियों के साथ समापन स्थल तक गए।

हमारा यात्रा पर निकलने का मुहुर्त बन रहा था, इसी बीच राजभाटिया जी और समीर लाल जी के आने का समाचार मिला। राज भाटिया जी ने तो रोहतक में ब्लागर मिलन का आयोजन ही कर डाला। मैने और पाबला जी ने रुट तय कर लिया और टिकटें बुक कर ली। अब यात्रा का दिन नजदीक आते जा रहा था। तभी पाबला जी को अपनी यात्रा स्थगित करनी पड़ी और मुझे ही अकेले निकलना पड़ा।15 नवम्बर को प्रारंभ इस यात्रा में मेरा पहला पड़ाव धोरां री धरती याने कोटा राजस्थान है, द्विवेदी जी से राम राम के बाद निकल पड़ेगें महाराणा प्रताप और इंदुपुरी की नगरी चित्तौड़ की ओर यहां दो दिनों तक रुकने का कार्यक्रम है। रोहतक ताऊ जी के भी पहुंचने की संभावना है।
यहां से चलकर पहुंचेगे 20 नवम्बर को दिल्ली और वहां से रोहतक की तरफ़ प्रस्थान करेंगे। रोहतक गए कई साल  हो गए। एक बार मैं भिवानी से रोहतक स्कुटर से भी गया था। जब काठ मंडी की तरफ़ जा रहा था तो कोतवाली के सामने पुलिस वालों ने रोक लिया और कहा कि आपका हेल्मेट कहां है? चालान काटना पड़ेगा। मैने कहा कि मुर्खों महकमे के आदमी को भी नहीं पहचानते। सुनते ही उन्होने झट बैरियर खोल दिया। उस दिन से मैने सोच लिया कि रोहतक में स्कुटर तो चलाना ही नहीं है। चार चक्के की गाडी से ही जाना है देखना है फ़ेर सुसरे किसका चालान काटते हैं :) अब विचार किया कि जब चक्कों पर ही जाना है कम पर क्यो जाएं। इसलिए  हो सके तो सैकड़ों चक्कों वाली गाड़ी पर जाने का मन बनाया है।

एक बार लौहपथ गामिनी से रोहतक जाने का कार्यक्रम बनाया था। सदरबाजार से लोकल पकड़ी, उस दिन रविवार होने के और ट्रेड फ़ेयर लगने के कारण गाड़ी ओवरलोड थी। धक्कम धक्का करके बोगी के भीतर घुसे, पैर रखने की जगह नहीं थी। उपर वाली सीट पर एक बंदा अकेला सो रहा था। मैने उसे उठाया तो उसने एक बार मेरी तरफ़ दे्खा तो मैने कहा -" सरक ले परेनै"। वो बिना कुछ बोले सीट के एक कोने में सरक लिया। मैं और राजेश जी आराम से सीट पर बैठ लिए। तभी सामने बैठा एक छोरा बोल्या-" क्युं उठ लिया, आ ग्या ना तेरा फ़ूफ़ा"। यह सुनकर भी वो छोरा चुपचाप बैठा रहा।

रोहतक आने वाला था, तब वो बड़ी हिम्मत करके हिकमत से बोला-" सर आप कौण से थाणे में हैं?" ओ ह्हो सारा किस्सा मेरी समझ में आ गया। कि वो पूरी सीट छोड़ कर क्यों उठा था। मैने कहा - " आन मिलो सजना"। इतना सुन के उसको भी सारी बात समझ में आ गयी। वो और भी ज्यादा अटेंशन हो गया। अब "आन मिलो सजना का राज बहुत ही मजेदार है। क्योंकि वहाँ सजन मिलने को तैयार खड़े हैं। अगर कोई एक बार मिल ले तो उसके पुरखे भी आन मिलो सजना की तरफ़ मुंह करके नहीं देखे। दिन में भी सोच ले तो रोंगटे खड़े हो जाएं और अगर सजना सपने में दिख  जाएं तो चिल्ली मार  कर उसका मूत निकल जाए। इसलिए आन मिलो सजना कहना और सुनना भी ठीक नहीं है। भई हम तो रोहतक पहुंच गए पर सजना से मिलना किसी को गवारा नहीं था।
भले ही सजना ना मिले कोई बात नहीं लेकिन हम ब्लागरो से तो जरुर मिलेंगे। वहां से 22 अंतर सोहिल जी के साथ पहुंचेगे रिवाड़ी जहां मुझे एक विवाह समारोह में शामिल होना है। 23 को गुड़गांव में कुछ चिरपरिचित मित्रों से मुलाकात है। इसके बाद मुझे नारनौल जाना है वहां से वापसी पर दिल्ली के मित्रों से मिलते हुए वापसी है। लागी छूटे ना अब तो बलम।