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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

बूढ़ा नीलकंठ में सूतल विष्णु : काठमांडू

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
शुपतिनाथ मंदिर के बाद हमारा अगला पड़ाव बूढ़ा नीलकंठ था। काठमांडू की गलियों के बीच वातानुकूलित बस का ड्रायवर कुशलता का परिचय दे रहा था। बड़ी लक्जरी बस को आसानी के साथ चौड़े चौक चौराहों पर मोड़ लेता था। हमारी बस काठमांडू की सड़कों पर चक्कर काटते हुए बूढ़ा नीलकंठ मंदिर पहुंची। मंदिर से थोड़ी दूरी पर बस को विश्राम दिया गया और हम गली से होते हुए मंदिर तक पंहुचे। काठमांडू के मध्य से 10 किलोमीटर की दूरी पर शिवपुरी हिल के समीप यह मंदिर स्थित है। पूजन सामग्री की दुकाने नीचे ही गली में लगी हुई थी। इन दुकानों  में अधिकतर महिलाएं काम करते दिखाई दी। 
   खाई - खाजा की दुकान 

मंदिर के प्रवेश द्वार की चंद्रशिला के उपर पद्मांकन दिखाई दिया। उसके पश्चात पैड़ियों के बीच में चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा स्थानक मुद्रा में स्थापित है। मुख्य द्वार के किवाड़ों पर पीतल का पतरा चढा हुआ है तथा उसके एक किवाड़ पर  शिव परिवार के सदस्य कार्तिकेय एवं दूसरे किवाड़ पर गणेश जी विराजमान हैं। इस स्थान पर हमने कुछ चित्र लिए। द्वार पर पुष्प पत्र बेचने वालों ने कब्जा जमा रखा था तथा इस मंदिर में भी एकमात्र हिंदुओं को ही प्रवेश की अनुमति है। अन्य धर्म के लोग यहाँ प्रवेश नहीं कर सकते। 
कार्तिकेय 

प्रवेश द्वार के समक्ष जल का विशाल कुंड बना हुआ है, जिसमें शेष शैया पर लेटे हुए भगवान विष्णु की चर्तुभुजी प्रतिमा है। प्रतिमा का निर्माण काले बेसाल्ट पत्थर की एक ही शिला से हुआ है। प्रतिमा का शिल्प मनमोहक एवं नयनाभिराम है। शेष शैया पर शयन कर रहे विष्णु की प्रतिमा की लम्बाई 5 मीटर है एवं जलकुंड की लम्बाई 13 मीटर बताई जाती है। शेष नाग के 11 फ़नों के विष्णु के शीष पर छत्र बना हुआ है। विष्णु के विग्रह का अलंकरण चांदी के किरीट एवं बाजुबंद से किया गया है। प्रतिमा के पैर विश्रामानंद की मुद्रा में जुड़े हुए हैं। शेष नाग भी हष्ट पुष्ट दिखाई देते हैं।
 सुनीता यादव, रविन्द्र प्रभात, राजीव शंकर मिश्र, नमिता राकेश, मनोज भावुक, मनोज पाण्डे 

जलकुंड को चारदीवारी से घेरा गया है सभी ब्लॉगर शंख, चक्र पद्म एवं गदाधारी चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा के चित्र ले रहे थे तथा मैं इस जुगत में था कि इस विशाल प्रतिमा का एक बढिया सा चित्र लिया जाए। मैंने कुंड की चार दिवारी में प्रवेश करके एक चित्र लिया तो एक व्यक्ति ने मुझे वहाँ लिखी चेतावनी की ओर इंगित किया। जिस पर लिखा था कि चार दिवारी के भीतर चित्र लेना वर्जित है। फ़ोटो खींचने के बाद सभी ब्लॉगर एक वृक्ष की छांव में बैठ गए तथा सुनीता सभी के विडियो बनाने लगी। अभी हमारे दल का नेतृत्व राजीव शंकर मिश्रा बनारस वाले कर रहे थे। 
अक्षिता पाखी, आकांक्षा यादव, कृष्ण कुमार यादव, मुकेश तिवारी, सुनीता यादव

मंदिर से लौटते हुए उन्होनें उपस्थित ब्लॉगर्स को रुद्राक्ष के कुछ फ़ल भेंट किए तथा बताया कि इन फ़लों से रुद्राक्ष निकालने के लिए कैसी साधना करनी पड़ती है। अब यहाँ पर समस्या यह थी कि मंदिर का नाम बूढ़ा नीलंकठ है तथा शेष शैया पर भगवान विष्णु विराजे हैं, द्वार पर जय विजय की तरह शिव परिवार के उत्तराधिकरी कार्तिकेय एवं गणेश पहरा दे रहे हैं और भगवान विष्णु क्षीर सागर में मजे से आनंद ले रहे हैं। बूढ़ा नीलकंठ महादेव तो कहीं दिखाई नहीं दिए। जब बूढा नीलकंठ ही इस स्थान पर नहीं है तो यह नाम इस स्थान के लिए रुढ कैसे हो गया? यह प्रश्न दिमाग में कौंध रहा था।
बूढ़ा नीलकंठ

विषपान करने के पश्चात जब भगवान शिव का कंठ जलने लगा तब उन्होने विष के प्रभाव शांत करने के लिए जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक स्थान पर आकर त्रिशूल का प्रहार किया जिससे गोंसाईकुंड झील का निर्माण हुआ। सर्वाधिक प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है गोसाईंकुंड झील जो 436 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. काठमांडू से 132 उत्तर पूर्व की ओर स्थित गोसाईंकुंड पवित्र स्थल माना जाता है। मान्यता है कि बूढा नीलकंठ में उसी गोसाईन कुंड का जल आता है, जिसका निर्माण भगवान शिव ने किया था। श्रद्धालुओं का मानना है कि सावन के महीने में विष्णु प्रतिमा के साथ भगवान शिव के विग्रह का प्रतिबिंब जल में दिखाई देता है। इसके दर्शन एक मात्र श्रावण माह में होते हैं।
चतुर्भुजी विष्णु

बूढ़ा नीलकंठ प्रतिमा की स्थापना के विषय में स्थानीय स्तर पर दो किंवदंतिया प्रचलित हैं, पहली प्रचलित किंवदंती है कि लिच्छवियों के अधीनस्थ विष्णु गुप्त ने इस प्रतिमा का निर्माण अन्यत्र करवा कर 7 वीं शताब्दी में इस स्थान पर स्थापित किया। अन्य किंवदन्ती के अनुसार एक किसान खेत की जुताई कर रहा था तभी उसके हल का फ़ाल एक पत्थर से टकराया तो वहाँ से रक्त निकलने लगा। जब उस भूमि को खोदा गया तो इस प्रतिमा का अनावरण हुआ। जिससे बूढ़ा नीलकंठ की प्रतिमा प्राप्त हुई तथा उसे यथास्थान पर स्थापित कर दिया गया। तभी से नेपाल के निवासी बूढ़ा नीलकंठ का अर्चन पूजन कर रहे हैं। 
सरोज सुमन, मुकेश तिवारी, रविन्द्र प्रभात, मनोज भावुक विश्रामासन में 

नेपाल के राजा वैष्णव धर्म का पालन करते थे, 12 वीं 13 वीं शताब्दी में मल्ल साम्राज्य के दौरान शिव की उपासना का चलन प्रारंभ हुआ तथा 14 वी शताब्दी में मल्ल राजा जय ने विष्णु की आराधना प्रारंभ की एवं स्वयं को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। 16 वीं शताब्दी में प्रताप मल्ल ने विष्णु के अवतार की पराम्परा सतत जारी रखी। प्रताप मल्ल को दिखे स्वप्न के आधार पर ऐसी मान्यता एवं भय व्याप्त हो गया कि यदि राजा बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन करेगें लौटने पर उसकी मृत्यु अवश्यसंभावी है। इसके पश्चात किसी राजा ने बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन नहीं किए। इस मंदिर में देवउठनी एकादशी को मेला भरता है तथा श्रद्धालु भगवान विष्णु  के जागरण का उत्साह पूर्वक आशीर्वाद लेकर जश्न मनाते हैं। 
काठमांडू नगर 

काठमांडू में इसके अतिरिक्त विष्णु की शयन प्रतिमाएं हैं, एक प्रतिमा बालाजु बाग में स्थापित है जिसका दर्शन आम जनता कर सकती है तथा दूसरी प्रतिमा राज भवन में स्थापित है, जिसके दर्शन आम आदमी के लिए प्रतिबंधित हैं।बौद्ध धर्मी नेवारी समुदाय इसे बुद्ध मान कर पूजा करता है तथा हिन्दुओं के द्वारा मना करने पर उनकी पूजा करने की परम्परा चली आ रही है। हम बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन करने के उपरांत आगे की नेपाल दर्शन यात्रा में चल पड़े। अब हमारा अगला पड़ाव पाटन दरबार चौक था।

नेपाल यात्रा की आगे की किश्त पढें……

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

सावधान, सावधान, सावधान ---------- ललित शर्मा

जिबीमारी का ईलाज नहीं, उसकी हजारों दवाएं हैं। लाईलाज बीमारियाँ लोगों को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर करती हैं। ऐलोपैथी के प्रति अभी तक ग्रामीण अंचल में पूरी तरह लोगों को विश्वास नहीं है। थोड़ी सी भी सर्दी जुकाम या हरारत होने पर देव स्थान में जाकर बैगा से झाड़ फ़ूंक करवा लेते हैं। जिससे उन्हे लगता है कि स्वस्थ हो जाएगें।  मुफ़्त की सलाह देने वाले बहुत मिल जाएगें, साथ ही दवाई देने वाले बैगा-गुनिया एवं नीम-हकीम का पता बताना भी नहीं भूलते। जब इंसान ऐलोपैथी से हार जाता है तब वैकल्पिक चिकित्सा बैगा-गुनिया तथा झाड़ फ़ूंक का सहारा लेता है। बस इसी समय का फ़ायदा उठाने के लिए बैगा-गुनिया और झाड़-फ़ूकिया मुस्तैद रहते हैं। आया हुआ मुर्गा हाथ से नहीं जाने देते। दुनिया चाँद से होकर मंगल पर पहुंच रही है, पर समाज अंधविश्वास के शिकंजे से बाहर नहीं निकला है। इसकी जड़े बहुत गहरी हैं। लाख जागरुकता  अभियान सरकार और सामाजिक संस्थाएं करें, पर लोग रुढियों की जंजीरे नहीं तोड़ना चाहते। बीमार होने की अवस्था में चमत्कार की आस लगाए दर-दर पर माथा घिसते-फ़िरते हैं और अंधविश्वास के कारण जान से हाथ गंवाते हैं। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आत्मा का परमात्मा से मिलन हो चुकता है। पीछे बचते हैं रोते-धोते परिजन। नीम-हकीमों पर कोई प्रशासनिक कार्यवाही न होने से इनका धंधा बदस्तूर जारी रहता है। 
5 जुलाई 2012 नई दुनिया

हमारे पड़ोसी मित्र को को किसी ने बताया कि मुझे डायबीटिज हो गयी है। तो वे संध्या काल में मेरे पास आए। वो भी डायबीटिज के शिकार हैं। इस राज रोग के अपने अनुभव बताने लगे। साथ जो दवाईयाँ ले रहे थे उसके बारे में भी जानकारी देने लगे, मैं सुनता रहा। नीम, मेथी, जामुन, गुड़मार इत्यादि मिश्रित नुश्खा भी बताया। अपोलो के डॉक्टर मित्र ने मुझे कहा था कि डायबीटिज के रोग में आप जिस पैथी से ईलाज कराते हैं उसे कभी बंद मत करना। अधिंकाश मरीज बार-बार चिकित्सा पद्धति एवं दवाई बदलने के चक्कर में जान गंवा बैठते हैं और कोई चिकित्सा पद्धति पूर्णत: कारगर सिद्ध होकर सकारात्मक परिणाम नहीं दे पाती। मैने डॉक्टर का मंत्र गाँठ बांध लिया तथा दवाईयों के साथ ही व्यायाम और 5-6 किलोमीटर की सैर जारी थी। एक दिन वही मित्र फ़िर आए और कहने लगे कि दुर्ग में एक ऐसा हकीम है जो एक बार दवाई देता है और खूब मीठा खाने कहता है। एक बार की दवाई से ही डायबीटिज का ईलाज हो जाता है। फ़लाना भी वहीं से दवाई लेकर आया है, उसके बताने पर मैं भी वहाँ गया था। आपको भी जाना चाहिए। वैसे भी मै किसी के दावे को बिना अपने परीक्षण के सही नहीं मानता और न ही इन नीम-हकीमों पर विश्वास करता। फ़िर भी सोचना पड़ा कि एक बार की दवाई लेने से अगर बीमारी ठीक हो जाती है तो रोज-रोज मंहगी चिकित्सा से मुक्ति मिलेगी। यह भी पता चल जाएगा कि दवाई के नाम पर वह वैद्य क्या खिला रहा है। यही सोच कर दवाई लेने दुर्ग जाने का मन बना लिया।

सुबह जल्दी तैयार होकर दुर्ग के लिए चल पड़ा। मुझे मित्र ने बताया था कि बस स्टैंड के पास मस्जिद के निकट जाकर हकीम का पता पूछ लेना, कोइ भी बता देगा। मैने रास्ते में चलते-चलते सोचा कि भिलाई से विश्वनाथन जी को भी साथ ले लिया जाए। जब मेरा ईलाज हकीम की दवाई से हो जाएगा तो वे भी ईलाज से क्यों वंचित रहें? एक से भले दो। रास्ते से ही उन्हे फ़ोन कर दिया कि वे तैयार रहें। भिलाई से हम दोनो साथ ही दुर्ग चले, वहाँ जाकर हकीम का पता पूछा। लोगों ने ठिकाना बता दिया। वहाँ पर हकीम मिले, बोले कि - शक्कर वाला एक लीटर दूध लाए हो? हमने कहा -  नहीं। तो बोले यहीं सामने मिलता है उस दुकान में, ले आओ। हम दोनो एक-एक लीटर शक्कर वाला दूध लेकर आए। उनके घर पर काफ़ी लोग थे। जो दवा लेने आए थे। पूछने पर पता चला कि बहुत दूर दूर से आए हैं। केरल से लेकर हरियाणा तक के मरीज मिले। इससे अंदाजा लगा कि डायबीटिज के ईलाज के लिए यह भारत में प्रसिद्ध हो चुके हैं। हकीम ने धमेले (बड़ा बर्तन) में रखी दवाई की दो मुट्ठी दूध में डाली और पी जाने कहा। एक लीटर दूध, वो भी गर्म और खाली पेट पीना बड़ा कष्ट दायी लगा। दूध को पीने पर उसमें मुझे चिरपरिचित गंध एवं स्वाद आया। दवाई को जानने के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ गयी। मेरे पूछने पर हकीम ने अपना गुप्त फ़ार्मुला नहीं बताया, लेकिन मैं जान गया। सामने ही दान पेटी रखी थी, हमसे 200-200 रुपए उसमें डालने कहे और वहां पर जिस लड़की ने पानी लाकर दिया था उसे 50-50 रुपए दिलाए। साथ ही बताया कि हम अब जी भर मीठा खा सकते हैं। सिर्फ़ ईमली और बैंगन का परहेज करना पड़ेगा। अन्यथा दवाई काम नहीं करेगी। हम ईलाज करा कर खुशी-खुशी घर आ गए।

घर आने पर साथ में ऐलोपैथी दवाई चलती रही। कुछ दिनों के बाद हाथ की उंगलियाँ सुन्न रहने लगी। डॉक्टर को दिखाया, शुगर लेवल चेक करने पर 478 निकला, डॉक्टर ने एक टेबलेट की जगह तीन टेबलेट लिख दी। हकीम के ईलाज का दुष्परिणाम सामने था। समय पर चिकित्सा मिलने पर किसी बड़े नुकसान से बच गया। कुछ दिनों के बाद गोरखपुर से एक मित्र ने फ़ोन करके इस हकीम के विषय में जानकारी ली। राउरकेला से फ़ोन पर एक परिजन ने पूछा। भारत से कई जगहों से फ़ोन आए। हकीम का इतना वाचिक प्रचार हो गया था कि लोग दूर-दूर से आकर ईलाज कराना चाहते थे। मैने उनको हकीकत बताई, लेकिन लोग मानते कहाँ है? कुछ लोग आखिर आकर ही गए और भुगते भी। कुछ दिनों के बाद हकीम की दवाई के कारण बाहर से आए एक व्यक्ति की दुर्ग में ही तबियत खराब हो गयी। जिसे जान बचाने के लिए भिलाई के सेक्टर-9 दाखिल होना पड़ा। फ़िर सुनने में आया कि हकीम की दवाई से शुगर लेवल बढने के कारण किसी की जान चली गयी। जब यह खबर अखबारों में आई तो प्रशासनिक अमला जागा और जवाहर चौक दुर्ग जामा मस्जिद बाड़ा में रहने वाले शेख इस्माईल वल्द स्व: शेख बहादूर 70 वर्ष के विरुद्ध 5-7 चमत्कारिक उपचार अधिनियम 1954 के अधीन मामला दर्ज किया। उसके पास औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम 1940 के तहत दवाई बनाने की अनुज्ञा भी नहीं थी। दवाई को परीक्षण के लिए प्रयोग शाला भेजा। जिसकी रिपोर्ट का पता नहीं चला। यह घटना 3 जनवरी 2012 की है। मामला कलेक्टर के पास कार्यवाही के लिए 5 माह से लंबित है।

4 जनवरी 2012
अपराध दर्ज होने के बाद भी हकीम का दवाई देना निर्बाध जारी है। इसके दुष्परिणाम स्वरुप एक व्यक्ति की जान और चली गयी। अनुपपुर मध्यप्रदेश के रामप्रसाद यादव पिता लाभसिह यादव 25 वर्ष की मंगलवार 3 जुलाई 12 को दवाई पीने के बाद रात को तबियत बिगड़ गयी। उसे जिला चिकित्सालय में भर्ती गया, जहां उपचार के दौरान बुधवार को उसकी मृत्यु हो गयी। दुर्ग पुलिस ने मर्ग कायम कर लिया। अंधविश्वास ने एक युवक की जान ले ली। शेख इस्माईल द्वारा शुगर की दवाई दी जा रही है। कई मौते होने के बाद भी प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की। न ही लोगों तक दवाई से होने वाली मौतों की सूचना पहुंची। मैने अनुभव किया कि - यहाँ शक्कर वाला दूध पीने से मरीज की शुगर खतरनाक स्तर तक पहुच जाती है। जिसका दुष्परिणाम उसे भोगना पड़ता है। दवाई के सेवन के बाद मुझे नीम की गुठली, मेथी, जामुन की गुठली का स्वाद आया। नीम के तेल की खुश्बू और मेथी का लसलसापन कोई भी जान सकता है। शुगर के मरीजों में भ्रम है कि कड़ूवा खाने पर खून में मीठे का स्तर कम हो जाता है। इसलिए कहीं भी किसी अनजान नीम-हकीम की दवा खाने से पहले सौ बार सोचें, तब निर्णय लें। नीम-हकीम खतरे जान से जहाँ तक संभव हो बचें।  अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें, अन्यथा शुगर बढने से प्राण गंवाना पड़ेगा। 

गुरुवार, 24 मई 2012

एक युद्ध डायबीटिज से……… ललित शर्मा


डॉ सत्यजीत साहू
जब से लोग सुविधाभोगी हुए हैं, तब से भारत में डायबीटिज रोगियों का तेजी से प्रसार हो रहा है। ऐसा नहीं है कि डायबीटिज कोइ नया रोग है, चरक संहिता में उल्लेखित प्रमेहों में एक प्रमेह मधुमेह का भी उल्लेख हुआ है तथा इसका उपचार बताया गया है। असयंमित, अमर्यादित दिनचर्या के कारण मधुमेह अधिक लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा, मैं एक विश्वविद्यालय के कुलपति से मिलने गया था। उनसे चर्चा के दौरान तीन व्यक्ति और उपस्थित थे। जब कुलपति जी ने चाय लाने कहा तो सभी लोगों ने एक स्वर में बिना शक्कर की ही चाय कही। इसका मतलब यह था कि हम पाँच लोगों में सभी मधुमेह का शिकार थे। एक स्थान पर 100% मधुमेह ग्रसित व्यक्तियों का मिलना मुझे आश्चर्य चकित कर गया। खैर अब तो इसे राज रोग कहा जाने लगा है। एक मित्र का कहना था कि- मधुमेह एड्स से भी बुरी बीमारी है। क्योंकि एड्स के फ़र्स्ट स्टेज, सेकंड स्टेज एवं फ़ायनल स्टेज के विषय में व्यक्ति एवं डॉक्टर को पता रहता है परन्तु मधुमेह के मरीज को पता नहीं रहता कि कब उसे अटेक आ जाएगा या अन्य मधुमेह जनित रोग उसे कब अपनी गिरफ़्त में ले लेगें।

ड़ायबीटिज से ग्रसित होने पर ही व्यक्ति को पता चल पाता है कि वह रोग की चपेट में आ गया। डॉक्टर द्वारा शुगर लेबल बढा हुआ बताने पर वह चिंता ग्रस्त हो जाता है तथा मधुमेह को सहज स्वीकार नहीं करता। जैसे उसकी दिनचर्या चलती है उसी पर कायम रहता है। मधुमेह के प्रति जागरुकता की आवश्यकता है, जागरुकता एवं जानकारी के अभाव में अधिक नुकसान होता है और जान से भी हाथ धोना पड़ता है। कुछ दिन पूर्व एक महोदय मिले, उन्हे मधुमेह जनित इतनी अधिक बीमारियाँ थी कि सुबह से लेकर शाम तक 23 टेबलेट खाने के बारे मे बताया। ग्रामीण अंचल में भी मधुमेह पसर गया है। पहले लोग थकते तक मेहनत करते अब मशीनों के आने के कारण शारीरिक श्रम कम हो गया। आवश्यक नहीं है कि मधुमेह सिर्फ़ सुविधाभोगी लोगों को ही अपनी गिरफ़्त में ले रहा है। एक बोरा ढोने वाला पल्लेदार (कुली) भी इसकी गिरफ़्त में है। मधुमेह रोग जाति -पांति, धर्म, वर्ग, आयु, नारी-पुरुष आदि के बंधनों को तोड़ कर बिना किसी भेदभाव के सभी को समान रुप से शुगर से नवाज रहा है और मधुमेह से लोग जूझ रहे हैं।


ग्रामीण अंचल में मधुमेह का हमला सबसे पहले पैरों पर ही होता है। क्योंकि यहाँ खेतों में काम करने के लिए नंगे पैर जाना पड़ता है। बरसात के मौसम में ही खेती होती है, खेत को जोतने, बीज छिड़कने, निंदाई करने, रोपा लगाने, मेड़ मुंही पार बांधने के लिए पानी में ही काम करना पड़ता है। कांच से कटने एवं कांटे गड़ने का भय हमेशा बना रहता है। छोटी-मोटी फ़ुंसी होने, या कांटा, कांच गड़ने पर तुरंत ही गैंगरीन हो जाता है और पैर काटना पड़ता है। अच्छा भला व्यक्ति जागरुकता के अभाव में विकलांग हो जाता है। मैने होम्योपैथी के एक डॉक्टर के पास आया हुआ गातापार गाँव का एक ऐसा मरीज देखा कि जिसके दोनो हाथ कोहनियों एवं दोनो पैर घुटने के उपर से कटे थे तथा सारा शरीर सड़ रहा था, बदबू के मारे घिन आ रही थी। वह साक्षात नरक भोग रहा था। उस मरीज को देख कर डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए क्योंकि वह सभी चिकित्सा पद्धतियों से गुजर चुका था। अब अंतिम इलाज मौत ही थी। ऐसे मरीज देखकर कोई भी मधुमेह का मरीज दहल जाए। ऐसी अवस्था में मधुमेह के प्रति लोगों को जागरुक करना सामाजिक संस्थाओं एवं सरकार का कर्तव्य हो जाता है।


सरकार, मलेरिया, एडस, कैंसर एवं अन्य बीमारियों के विषय में जागरुकता फ़ैला रही है। लेकिन डायबीटिज जैसे भयानक रोग के विषय में कोई कार्यक्रम नहीं है। सारा बजट इन्ही बीमारियों के प्रचार-प्रसार में लग रहा है। डायबीटिज के विषय में ग्रामीण अंचल में जागरुकता फ़ैलाने का काम डॉ सत्यजीत साहू ने प्रारंभ किया है। रायपुर के इस युवा डॉक्टर ने कालीबाड़ी रायपुर में डायबीटिक रिसर्च सेंटर एवं चिकित्सालय प्रारंभ किया। जहाँ मधुमेह के मरीजों के ओपीडी इलाज के साथ उसके साथ जीने का तौर तरीका सिखाया जा रहा है। प्रतिमाह की पहली तारीख को नि:शुल्क शुगर परीक्षण के साथ इलाज भी किया जाता है। साथ ही साथ ग्रामीण अंचल में डायबीटिज के प्रति जागरुकता के लिए "डायबीटिक मित्र" भी नियुक्त किए जा रहे हैं। जो ग्रामीणों को डायबीटिज के प्रति जागरुक करने का महती कार्य करेगें। प्रति रविवार को ग्रामीण अंचल का दौरा करके पोस्टर-पाम्पलेट एवं व्यक्तिगत सम्पर्कों से डायबीटिज के विरुद्ध युद्ध का शंखनाद किया जा चुका है। डॉ सत्यजीत साहू का कहना है कि अब यह युद्ध लगातार लड़ा जाएगा। प्रत्येक गाँव में मधुमेह से ग्रसित लोग मिल रहे हैं। उनको स्वस्थ्य रहने की उपयुक्त सलाह के साथ चिकित्सा भी दी जा रही है। डायबीटिज जैसे महामारी के विरुद्ध लड़ाई में हम भी डॉ सत्यजीत साहू के साथ हैं।

दो ब्लॉगर- डॉ सत्यजीत साहू और ललित शर्मा
ड़ायबीटिज से बचने के लिए सिर्फ़ खानपान एवं जीवन शैली बदलने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। ड़ायबीटिज एक बहुत हीं खतरनाक बीमारी है लेकिन अगर आप प्राकृतिक उपायों से इस पर नियंत्रण कर सके तो मधुमेह से आपको घबराने की जरुरत नहीं है। डायबीटिज को समझें और उसका उपचार करें। अगर शुगर अत्यधिक बढ गयी हो तो पहले ऐलोपैथी से नियंत्रित करके प्राकृतिक उपचार से भी नियंत्रित की जा सकती है। जिसमें हल्के व्यायाम के साथ सुबह की सैर और फ़ायबर युक्त कम कैलोरी का भोजन प्रमुख हैं। मीठा, चावल, फ़लों का रस, कोल्डड्रिंक, शराब को त्याग ही देना बेहतर होगा। घरेलु तौर पर शाक सब्जियाँ शुगर नियंत्रित करने मे मुख्य भूमिका निभाती हैं। कहते हैं कि डायबीटिज और हाईब्लड्प्रेशर दोनो बहन-भाई जैसे ही हैं। एक के आगमन पर दूसरा बिना बुलाए ही साथ चला आता है। मैने अधिकतर डायबीटिज रोगियों को हाईब्लड्प्रेशर का शिकार देखा है। दोनो बहन-भाई मिल कर मनुष्य के शरीर को घुन या दीमक जैसे चट कर जाते हैं। अंत मे कुछ नहीं बचता राम नाम सत्य के सिवा। इसलिए जिन्हे भी डायबीटिज का राजरोग हो गया है वे स्वास्थ्य के प्रति जागरुक रहें और मित्रों के निवेदन है डायबीटिज के विरुद्ध इस मुहिम में अपना हाथ बटाएं। फ़ेसबुक पर डायबीटिक ग्रुप ज्वाईन करें, जहाँ नित नई जानकारियाँ प्राप्त होते रहेगी।