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बुधवार, 12 सितंबर 2012

काश!............


भिनसारे भिनसारे ही
कोयलिया की कूक
सुनाई देने लगी
सोचने लगा, अभी कौन से आम बौराए हैं
जो कोयलिया कूक रही है
विहंग को कौन बांध पाया है?
वे कोई मानव नहीं?
किसी प्रांत के एपीएल,
बीपीएल कार्डधारी लाभार्थी नागरिक नहीं
जो किसी के बंधन में बंध कर परतंत्र हो जाएगें
जीवन स्वतंत्र है
स्वतंत्र जन्मे और स्वतंत्र मरें
परतंत्रता तो इन्हे पल की नहीं सुहाती
न ही सीमा पार करने के लिए
किसी सरकार के अनुज्ञा-पत्र की दरकार होती
जब चाहें तब पंख फ़ड़फ़ड़ाए और उड़ जाते हैं
जब मन में आए तो गाने लगते हैं
काश! विहंग सा जीवन ही क्षण भर को मिल जाए
तो मन करता है
पूरा एक जीवन ही जी लूं

सोमवार, 12 मार्च 2012

नि:शब्द मौन के बोल -- ललित शर्मा



नि:शब्द
मौन के बोल
अबोल से झरते
शब्द
ज्यूँ झरता
अनहद से रसानंद
बजता अनहद नाद
अंतर में
यूँ लगा
कबीर हो गया
बजा जब
अनहद मृदंग
शुन्य में
पुलकित रोम रोम
एकाकार होते
उष्मा भरे वलय
ब्रह्माण्ड समाया हो
अंतर में
उष्मा से भरा अंतरिक्ष
फ़िर भीषण प्रकाश
और प्रकाश ही प्रकाश
हुआ अंतर आलोकित
तिमिर कलुष भागे
अबोल से झरे शब्द
यूँ लगा कि
तुमसे मिलकर
परमहंस हो गया
रोम रोम काव्य मय हुआ
स्वरलहरियां चल पड़ी
शब्दों से मिलने
बनकर गीत गुंजेगी
मेरे अंतस  में नित
अनहद नाद की तरह
जो बजता है अनवरत

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

चिरनिद्रा -- ललित शर्मा

निद्रा का सताया हुआ
थका तन-बदन
महसूस नहीं कर पाया
रात रानी की महक
मेंहदी की खुश्बू
बौराई हवा की गंध
महुए के फ़ूलों की
मदमाती गमक
दुर भगाती नींद को
उनकी आँखों में
तैरते हजारों प्रश्नामंत्रण
लाजवाब थे
लुढक गया वहीं
निद्रा ने भर लिया
आगोश में
शून्य सिर्फ़ शून्य था
न चेतना, न सपने
न पराए, न अपने
यह निद्रा का
सुखद अहसास था
शायद चिर निद्रा
ऐसी ही सुखद होती होगी ?

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

भूख मिटाने वाला साल्युशन -- ललित शर्मा

जूझती हैं कोहरे से
नित सूर्यकुमारियाँ
श्रमिक की तरह
रोटी के लिए
पृथ्वी का भार
कांधे पर लादे
बोझ से दबा एटलस
चलता है अनवरत
भूख मिटाने के लिए
कल पर्चे बंटे
बाजार मे
भूख मिटाने वाला
साल्युशन बनकर
तैयार
अब बोझा उतार दो
एटलस

सोमवार, 1 अगस्त 2011

शकुन्तला तरार की दो कविताएँ --- ललित शर्मा

नारी का संबंल पत्रिका की सम्पादक  शकुन्तला तरार जी की कविताएं प्रस्तुत हैं। परिचय जानने के लिए पेपर क्लिप पर क्लिक करें।

 (बस्तर अंचल जिसने छत्तीसगढ़ को अपनी कला, संस्कृति, साहित्य के माध्यम से विश्व में ख्याति दिलवाई है उसी बस्तर अंचल पर केन्द्रित मेरी यह कविता है।बस्तर पर मेरी कविता और मेरे गीत चलते रहेंगे निरन्तर निर्बाध पहाड़ी नदी की शीतल जलधारा की तरह। )


नई दुनिया में प्रकाशित परिचय
अभिव्यक्ति

पहाड़ों के बीच से निकलती है
इक नदी निश्छल, निर्मल
शीतल जलधारा लिये
अपनी मौज में वह बहती जाती है
तट पर आये लोगों को
अपनी शीतलता से ठंडक पहुंचाती
ठीक उसी तरह वह भी
जीवन की कुटिलताओं से परे
उन्मुक्त,निर्द्वन्द्व
निष्कपट भाव से निकलती है घर से तो
न जाने कितने लोगों की आंखों को
पहुंचाती है ठंडक
कुछ की आंखों में
उसकी खूबसूरती की प्रशंसा
कुछ की या ज्यादा की आंखें
वासनामयी
परन्तु उसे इन सबसे, कोई सरोकार नहीं
वह चलती जाती राह अपनी
वह जा रही है देखो
अरे भई कहां ?
महुआ बीनने,
नशा यहां तीन गुना हो गया है
मदमाता यौवन,
महुआ,
और वसन्त
तीनों ने जीवन को
नई अभिव्यक्ति दी है मानो।

   (2)
असभ्य कौन?

मैं आदिवासी हूँ
जंगलों में रहता हूँ
कंद-मूल-फल खाता हूँ
वनोपजों पर निर्भर हूँ
अशिक्षित हूँ/असभ्य हूँ
नंगे बदन रहता हूँ
नंगे पांव घूमता हूँ
काटता हूँ लकड़ी
बनाता हूँ झोंपड़ी
मालिक हूँ मैं
अपनी मर्जी का
किन्तु,
मैं आप जैसा नहीं बन सकता
क्योंकि मैं अशिक्षित हूँ
मैं गरीब हूँ
परन्तु मैं बुजदिल नहीं
सीधा-सादा सरल हूँ
आप जैसा छल-कपट
मुझे नहीं आता
मुझे नहीं भाता
जब घूरते हैं आप लोग
मेरी बहन, बेटियों को
मैं तो नहीं घूरता
आपकी बहन, बेटियों को
फिर मैं आप सबसे
अच्छा ही हुआ ना!
बताओ तो
असभ्य कौन?

        

शकुन्तला तरार ‘‘कवयित्री’’
प्रकाशक /संपादक- नारी का संबल
रायपुर (छत्तीसगढ़)

NH-30 सड़क गंगा की सैर

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

कविता क्या, कविता क्यों ? विषय पर व्याख्यान

राज्य की पहली वेब पत्रिका तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित, साहित्य, संस्कृति, विचार और भाषा की मासिक पोर्टल सृजनगाथा डॉट कॉम के चार वर्ष पूर्ण होने पर चौंथे सृजनगाथा व्याख्यानमाला का आयोजन 6 जुलाई, 2010 दिन मंगलवार को स्थानीय प्रेस क्लब, रायपुर में दोपहर 3 बजे किया गया था।

भाई जयप्रकाश रथ (मानस) जी के निमंत्रण पर हम भी शरीक हुए। बहुत अच्छा ही आयोजन था। कविता पर व्याख्यान का आयोजन था।

इलाहाबाद से पधारे हुए श्री प्रकाश मिश्र जी ने अपना व्याख्यान पढ़ा एवं कविता पर चर्चा भी हूई। सम्मान समारोह के विषय में कल कुछ पोस्टों से आपको पूरी जानकारी मिल गयी होगी। मैने इस व्याख्यान को रिकार्ड किया है, लेकिन श्री प्रकाश जी माईक को दूर रख कर पढ रहे थे।

आवाज थोड़ी मंद है। इसे फ़ुल वाल्युम में ही सुने तो अच्छा लगेगा। कविता पर सार गर्भित व्याख्यान आप अवश्य ही सुने, इसमें कविता के सफ़र पर अच्छी चर्चा है।

ब्लाग जगत से छोटे भाई संजीत त्रिपाठी का सम्मान सृजनगाथा टीम ने किया। बहुत खुशी हुई इस कार्यक्रम में उपस्थित हो कर सम्मान समारोह के प्रत्यक्षदर्शी बने।

संजीत त्रिपाठी वास्तव में इस सम्मान के हकदार हैं, इन्होने कई वर्ष ब्लागिंग को दिए हैं और शायद छत्तीसगढ के गिने-चुने प्रारंभिक चिट्ठाकारों में से एक हैं।

जब व्यक्ति के कार्य का सम्मान होता है तो उसका उत्साह बढता है तथा उसे अहसास होता है कि समाज में दूर बैठा कोई उसके कार्यों का मुल्यांकन भी कर रहा है। इसलिए कार्य ऐसा हो जिसमें समाज का हित हो और भला हो।

सृजनगाथा टीम ने ब्लाग जगत से सुपात्र का चयन किया, इसके लिए मैं पूरी टीम को साधुवाद देता हूँ तथा अपेक्षा रखता हूँ कि इस तरह के कार्यक्रम आयोजित होते रहे जिससे ब्लागजगत में भी उत्साह बना रहे। 

तबियत कुछ नरम है, मौसमी सर्दी बुखार ने घेर लिया है, इसलिए कम ही लिखा है,एक बार पुन: साधुवाद के श्री प्रकाश मिश्र जी व्याख्यान प्रस्तुत कर रहा हूँ। अगली पोस्ट में कार्यक्रम के अध्यक्ष गंगा प्रसाद बरसैंया जी का भाषण प्रस्तुत किया जाएगा।

कविता क्या, कविता क्यों--श्री प्रकाश मिश्र- पहला भाग




कविता क्या, कविता क्यों--श्री प्रकाश मिश्र- अंतिम भाग

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

भजन



फूलों  से  हो लो  तुम,जीवन   में  सुंगध   भर  लो
महकाओ तन-मन सारा भावों को विमल कर लो
फूलों से हो लो तुम ........................................

वो मालिक सबका हैं ,जिस माली का है ये चमन
वो  रहता  सबमे  है  तुम ,कर लो उसी का मनन
हो जाये सुवासित जीवन ऐसा तो जतन कर लो
फूलों से हो लो तुम.......................................

शुभ कर्मों की पौध लगाओ जीवन के उपवन में
देखो प्रभु को सबमे वो रहता हैं कण-कण में
बन जाओ प्रभु के प्यारे ऐसा तो करम कर लो
फूलों से हो लो तुम......................................

मै कौन? कहाँ से आया ? कर लो इसका चिंतन
जग में रह कर के, उस दाता से लगा लो लगन
रह  कर के  कीचड़  में  खुद को कमल कर लो
फूलों से हो लो तुम.......................................

वो   दाता   सबका  है,  दुरजन   हो   या   सूजन
वो  पिता   सबका  है,  धनवान   हो  या निरधन
ललित उसमे लगा करके जीवन को सफल कर लो
फूलों से हो लो तुम ........................................


आपका 
ललित शर्मा 


(फोटो गूगल से साभार)

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

चौरसिया की कविता


जिसने आंतरिक सौन्दर्य निखारा
उसको नमन किया जग सारा

अपने भीतर का खजाना जो खोज पाया हैं
जगत में वही असली धनवान कहलाया हैं,

परम सौभाग्यशालियों में अपना नाम लिखायें
मानवता के रास्ते पर चल कर तो दिखलायें
अच्छाई कहीं से भी मिले उसका लाभ उठाना चाहिए
प्रियजनों की भी बुराई कदापि नहीं अपनाना चाहिए

अपने लोगों को सही बात समझाना हैं बड़ा कठिन काम
इतिहास पढ़ कर देख लो अच्छे अच्छे हुए इसमें नाकाम

रचनाकार
रामसजीवन चौरसिया