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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

संगतराश : एक मुलाकात


थौड़े की चोट से छेनी से निकलता संगीत आकर्षित करता है मुझे, मंत्र मुग्ध सा उस शिल्पकार के समीप खड़ा हो जाता हूँ जो प्रस्तर प्रसव द्वारा एक सजीव प्रतिमा को जन्म दे रहा है। उसकी पीड़ा में सहभागी हो जाता हूँ, इतना अधिक अंतरंग कि वह मेरे वुजूद पर छा जाता है, उससे अलग नहीं हो पाता। लगता है उस प्रतिमा को मैं ही आकार दे रहा हूँ तन्मय होकर। शायद पिछले जन्म में संगतराश था, आज हर्फ़तराश हूँ, इस जीवन में भी तराशने का कार्य ही है। शिल्पकार की यही नियति है, उसे तराशना ही पड़ता है, आने वाली पीढी को विरासत में देने के लिए, चाहे  जो भी हो।  
अद्भुत शिल्प-सिरपुर (फ़ोटो - सुशील जाचक)
भरी दुपहरिया, सूरज की तपन के मारे सिर भन्नाने लगा। राह चलते हुए एक स्थान पर ठक-ठक ठका-ठक की मधुर लय सुनाई देने पर देखा कि एक अधेड़ जोड़ा स्वेद कणों से नहाया छेनी हथौड़ी से पत्थर तराश रहा है। उसके हथौड़े की चोट से पत्थरों के किरचे ईर्द-गिर्द उड़ रहे थे। सिर पर धूप से बचने के लिए घास-फ़ूस की छाया बना रखी है। समीप पहुंचता हूँ तो बाईक बंद होने पर उनका ध्यान मेरी तरफ़ होता है, वे दोनो पति-पत्नी सावधान हो जाते हैं और सोचते हैं कि कोई ग्राहक आया है। समीप ही ईंटों की बेंच पर पत्थर के किरचे बिखरे पड़े थे तथा लाल चीटियों का डेरा था। उसे साफ़ करने कहता तो महिला एक टूटा हुआ झाड़ू ढूंढ कर लाती और उसे बहारती है। बेंच बैठने लायक हो जाती है। गर्मी लगभग 42 डिग्री रही होगी। ऐसे में शीतल छांव सुहानी हो जाती है।
प्यारे लाल और बुधवंतिन
बैंच पर बैठकर थोड़ी देर बाद उनसे चर्चा प्रारंभ करता हूँ, पुरुष का नाम प्यारे लाल सोरी और स्त्री का नाम बुधवंतिन। बुधवंतिन "सिल" को रुप देने के लिए तेजी से हथौड़ा चला रही है। माथे पर चमकती पसीने की बूंदे बह कर नाक के उपर से ठोढी पर ठहर कर टपक रही है। इसकी परवाह किए बिना वह अपनी धुन मे मगन है। मेरे सवाल के जवाब में प्यारे लाल कहता है कि "सिल-बट्टा" बनाना उनका पुश्तैनी काम है। पूर्वज भी यही करते थे और मेरे बच्चे भी यही काम करते हैं। पूरा परिवार सिल बट्टा बनाने का ही काम करता है। पिताजी के साथ मैं बचपन से ही पत्थर तराशने का काम कर रहा हूँ इसलिए  पढ़ लिख नहीं बन पाया। मेरे साथ काम करने के कारण मेरे बेटे भी नहीं पढ पाए। अब मैं नाती पोते वाला हो गया हों। बेटे और बहु सिल बट्टा बेचने के लिए उड़ीसा गए हैं।
संगतराश एवं ब्लॉगर
गरियाबंद जिले की छुरा तहसील के पोंड़ गाँव में लगभग 12-13 घर बेलदारों के हैं। ये अपने कार्य के लिए पत्थर पोंड डोंगरी से लाते हैं। पत्थर लाने में भी बहुत समस्या है। ठेकेदार से लेकर माईनिंग के चौकीदार तक सबको पैसा देना पड़ता है। तब कहीं जाकर एक सिल का पत्थर 15-20 रुपए में मिलता है। उसके बाद भी धमकी चमकी चालु रहती है। प्यारे लाल कहता है कि हमारा पुस्तैनी धंधां है, किसी के पास एकाध एकड़ खेती है, हमें बारहों महीना पत्थर तोड़ कर जीवन चलाना पड़ता है। जैसे सरकार कंड़रा लोगों को बांस देती है, वैसे हमें भी पत्थर देने चाहिए। पुस्तैनी पेशेवरों का सरकार को ध्यान रखना चाहिए। पर सुनता कौन है। हाड़ तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। जिस तरह बढ़ई लकड़ी पहचानता है अपने काम लायक, उसी तरह हमें भी पहाड़ से पत्थर पहचान कर लाना पड़ता है। फ़िर वह सामने पड़े पत्थर पर हथौड़े की चोट करता है। उससे ठक की ध्वनि निकलती है। इस तरह का पत्थर ही काम आता है सिल बट्टा के लिए। न अधिक कठोर न अधिक मुलायम।
बुधवंतिन
प्राचीन काल से मानव के जीवन में नित्य काम आने वाले यंत्र बना रहा है प्यारे लाल। हजारों वर्ष पुराने स्थलों के उत्खनन में भी सिल बट्टे और चक्कियाँ मिलती हैं। ये ऐसे उपरकरण है जो प्राचीन काल से लेकर वर्तमान में भी चलन में हैं। प्यारे लाल बताता है कि माटी छाबना (इसके उपर वाले पट को मिट्टी से छाबना पड़ता है) , खुसेरा (चलाने के लिए इसमें बगल से हत्था घुसाया जाता है) और ठाड़ खुंटा वाला (इसमें हत्था उपर लगता है) तीन तरह का "जांता" (हाथ चक्की) बनाते हैं। मसुर, उड़द एवं मुंग की दाल बनाने  के लिए "जंतली" होती है जिसका आकार छोटा होता है। प्राचीन काल में भी ऐसे ही घरेलू उपकरण बनाए जाते थे। गाँव के घरों में आज भी ये उपरकरण मिल जाते हैं और इन्हे बनाने की प्रक्रिया भी सतत जारी है।
पत्थर को आकार देता शिल्पकार प्यारेलाल
प्यारे लाल कहता है कि इन उपकरणों को बनाने के बाद बेचने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता है। कांकेर, केसकाल, कोंडागाँव, दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर, उड़ीसा तक सामान बेचने जाते हैं। पहले तो गदहों पर लाद कर ले जाते थे, अब इन्हें बनाने के बाद मेटाडोर एवं  ट्रक में भरकर ले जाते हैं। फ़िर किसी बड़े शहर या कस्बे में रख कर सायकिल पे लेकर गाँव-गाँव बेचने के लिए जाते हैं। एक सिल 100-150 रुपए में बिक जाती है। जांता का चलन कम हो गया है। गाँव-गाँव में बिजली से चलने वाली चक्कियाँ हो गई है। लेकिन सिल बट्टा तो बिकता ही है। ग्रामीण अंचल में जिसके घर विवाह होता है वह एक सिल जरुर खरीदता है। पाणीग्रहण के वक्त "शिला रोहण" के लिए सिलबट्टा गरीब से गरीब व्यक्ति खरीदता है। इसे पार्वती का प्रतीक माना जाता है और यह बेटी के दहेज में उसकी सखी के रुप में उसके साथ जाता है। हमारा समाज बूढा देव एवं बूढी माई की पूजा करता है। वर्तमान में कुछ वर्षों से विश्वकर्मा भगवान की पूजा भी करने लगे हैं।
एक की कमाई से जीवन नहीं चलता
मान्यता है कि सिल और बट्टा एक साथ बेचा और खरीदा नहीं जाता है। बट्टे को शिव का स्वरुप माना जाता है और सिल को पार्वती का। इन दोनो को जन्म देने वाला "शिल्पकार" होने के कारण वह इन दोनों का पिता है। इसलिए वह दोनों को एक साथ नहीं देता। पहले दोनों में किसी एक को लेना पड़ता है फ़िर कुछ दिन बाद इसकी जोड़ी पूरी करनी पड़ती है। जो लोग जानकार है वह कभी सिल बट्टा एक साथ नहीं खरीदते। जिन्हे जानकारी नहीं है उन्हे हम बता देते हैं और सिल बट्टा एक साथ नहीं देते। यह मान्यता हमारे समाज में प्राचीन काल से ही चली आ रही है। सांवली सी लड़की स्कूल ड्रेस पहने मुझे आती दिखाई देती है। उसे पास बुलाकर नाम पूछता हूँ तो प्यारे लाल कहता है, ये मेरी पोती है शारदा साहब। पूछने पर लड़की बताती है कि वह 4 थी क्लास में पढती है। स्कूल में मिलने वाले मध्यान भोजन के बारे में बताती है कि चावल, दाल, सब्जी, खीर, बड़ी की सब्जी और अन्य चीजें भी भोजन में मिलती हैं। अंडा के विषय में पूछने पर कहती है कि अंडा की सब्जी नहीं मिलती। दो वर्षों पूर्व मध्यान्ह भोजन का एक सर्वे किया था तो छुरा ब्लॉक के कुछ स्कूलों में अंडा की सब्जी देने की बात सामने आई थी। शारदा खेलने चली जाती है। 
विक्रय के लिए रखा सिल-बट्टा - सहस्त्राब्दियों की गारंटी
कौन सी जाति के हो? मेरे प्रश्न के जवाब में प्यारे लाल अपनी जाति "बेलदार" बताता है और कहता है कि हम आदिवासी ही हैं साहब, उनके और हमारे गोत्र मिलते हैं जैसे कुंजाम, बघेल, सोरी, नेताम, मरकाम, मरई इत्यादि। लेकिन काम के आधार पर हमें लोग बेलदार कहते हैं, बेलदार जाति नहीं कर्म है, आरंग तरफ़ सतनामी लोग बेलदार कहलाते हैं और उड़ीसा में राजपूत बेलदार होते हैं। हमारा जाति प्रमाण पत्र नहीं बनता। हमारी जाति के कुछ लोग कलेक्टर से मिलने गरियाबंद गए थे। क्या हुआ उसका पता नहीं। बुधवंतिन भी हमारी बातों में शामिल हो जाती है, पर उसका हथौड़ा निरंतर सधा हुआ प्रहार पत्थर पर कर रहा है। मैं कहता हूँ " तैं तो मोर काकी सही दिखत हस" (तुम तो मेरी काकी जैसी दिख रही हो) तो वह मुस्काती है। प्यारे लाल कहता है - "तोर काकी अइसन नी हो ही, ये ह त बिलई ए" ( आपकी काकी ऐसी नहीं होगी, यह तो काली है।) मोर काकी कोदो सांवर हे (मेरी काकी का रंग कोदो के रंग जैसा है।) हम तीनो ठहाका लगाते हैं। हथौड़ों की चोट के साथ माथे पर चुहती पसीने की बूंदों के बीच हँसी जीवनामृत का कार्य करती है। मैं हँसते-हँसाते ठहाके लगाते हुए उनसे विदा लेता हूँ।     

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

शिक्षाकर्मियों की हड़ताल से विद्याथी बेहाल ……… ललित शर्मा


दिसम्बर माह के प्रारंभ से शिक्षाकर्मियों ने हड़ताल कर अपना मोर्चा सरकार के खिलाफ़ खोल रखा है। प्रदेश के 1 लाख 80 हजार शिक्षाकर्मी छठे वेतनमान की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं। सभी सरकारी स्कूलों में पढाई ठप्प हो गयी  है। विद्यार्थी हलाकान एवं परेशान हैं। विद्यार्थियों के समक्ष पाठयक्रम पूरा करने की समस्या खड़ी हो गयी है। उनका पाठयक्रम पूरा नही हुआ है। इधर बोर्ड ने वार्षिक परिक्षाओं के लिए तारीख  की घोषणा कर दी। शिक्षाकर्मियों और सरकार के बीच की लड़ाई में लगभग आधा करोड़ विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है।

कम खर्च में अधिक शिक्षक उपलब्ध कराने की दृष्टि से रेग्युलर शिक्षकों को कम करके शिक्षाकर्मियों की भर्ती करने के परिणाम स्वरुप बहुसंख्यक स्कूल शिक्षाकर्मियों के भरोसे ही चल रहे  हैं। हड़ताल के पश्चात लगभग इन सभी स्कूलों  में ताला बंदी हो गयी है। विद्यार्थियों को कोई पढाने वाला नहीं है। इससे पालकों की नाराजी के साथ विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर चिंता भी बढती जा रही है। गाहे-बगाहे प्रतिवर्ष शिक्षाकर्मियों की हड़ताल होते रहती है। हड़ताल की इस परम्परा से कोर्स पूरा न होने के कारण विद्यार्थी हलाकान हैं।

3 दिसम्बर से प्रारंभ शिक्षाकर्मियों की हड़ताल को आज एक महीना हो गया। सरकार भी इनकी मांगों की तरफ़ ध्यान नहीं दे रही है और शिक्षाकर्मी भी अपने आंदोलन पर अडिग हैं। इस रस्साकसी के बीच 45 लाख विद्यार्थियों का भविष्य फ़ंसा हुआ है। सरकारी स्कूलों की पढाई का स्तर तो सर्वविदित है तथा एक महीने से पढाई बंद होने से बोर्ड परिक्षाओं का परिक्षाफ़ल भी कमतर होने की आशंका है। शिक्षा विभाग ने आदेश जारी किए हैं कि किसी भी तरह सालाना पाठ्यक्रम पूरा कराया जाए। पढाने वाले शिक्षक रहेगें तभी तो कोर्स पूरा होगा। जब स्कूलों में शिक्षक ही नहीं है तो कोर्स कौन पूरा कराएगा? 

जनवरी माह प्रारंभ हो चुका है तथा बोर्ड परिक्षाओं में सिर्फ़ दो महीने ही बचे हैं। दिपावली की एक महीने की छुट्टी और एक सप्ताह की शीतकालीन छुट्टियों के बाद लगभग 50 प्रतिशत कोर्स ही पूरा हो पाया है। गणित, रसायन, भौतिकी, बायो आदि विषयों के विद्यार्थियों पर अध्ययन का दबाव बढ गया है।  ऐसा न हो कि कोर्स पूरा न होने की चिंता को लेकर कहीं विद्यार्थी अवसाद से ग्रसित हो जाएं। बोर्ड की कक्षाओं के विद्याथियों में अपने कैरियर को अत्यधिक दबाव होता है। देखने में आया है परिक्षा में असफ़ल रहने या अंकों का प्रतिशत कम आने पर मानसिक दबाव में आकर विद्यार्थी आत्महत्या करने का भी दुस्साहस कर लेते हैं। अगर ऐसी कोई दुर्घटना घट जाती है तो इसके जिम्मेदार कौन होगा?

शासन एवं शिक्षाकर्मियों को चाहिए कि वह विद्यार्थियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लें। जिससे विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर न लगे। पढाई बंद करने की बजाए अगर शिक्षाकर्मी विद्यार्थियों को अध्ययन कराते हुए अपनी हड़ताल जारी रखते तो पालकों का भी उन्हे समर्थन मिलता एवं उनकी मांगो पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने के लिए पालक भी अपना सहयोग देते थे। अगर सरकार और शिक्षाकर्मियों के बीच कोई सहमति नहीं बन रही है तो राज्य मानवाधिकार आयोग एवं बाल संरक्षण आयोग को संज्ञान लेते हुए उचित कार्यवाही करनी चाहिए। जिससे 45 लाख विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य पर प्रश्न चिन्ह न लगे।

नोट:- चित्र गुगल से साभार … आपत्ति होने पर हटा दिए जाएगें।

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

प्राचीन बंदरगाह ....................... ललित शर्मा

प्राचीन बंदरगाह
महर्षि महेश योगी की जन्म भूमि पाण्डुका से आगे सिरकट्टी आश्रम से पहले मगरलोड़ और मेघा की ओर जाने वाले पुल के किनारे नदी में लेट्राईट को तोड़ कर बनाई गयी कुछ संरचनाएं दिखाई देती हैं।   मैने कयास लगाया कि यह अवश्य ही बंदरगाह है। नदी में उतर कर बंदरगाह का निरीक्षण किया एवं कुछ चित्र लिए। बंदरगाह की गोदियों में घूमते हुए कई तरह के विचार आ रहे थे। कौन लोग यहाँ से व्यापार करते थे? यह बंदरगाह किस समय बना? किसने बनाया? आदि आदि। इन प्रश्नो के उत्तर बाद में ढूंढेगे, पहले सिरकट्टी आश्रम देख लें, नाम तो बहुत सुना था पर देखा नहीं था। पैरी नदी के तट पर कुटेना ग्राम का सिरकट्टी आश्रम स्थित है। आश्रम का नाम सिरकट्टी इसलिए पड़ा कि यहाँ मंदिर के अवशेष के रुप में सिर कटी मूर्तियाँ प्राप्त हुई, जिन्हे बरगद के वृक्ष के नीचे स्थापित कर दिया। तब से इसे सिरकट्टी आश्रम के नाम से जाना जाता है।

सिर कट्टी आश्रम 
यहाँ बैरागी पुनीतराम शरण से चर्चा हुई। उन्होने बताया कि महाराज भुनेश्वरीशरण दास ने 16 वर्ष की आयु में सन्यास ले लिया था। उन्हे ग्राम कुटेना स्थित चंडी मां ने स्वप्न में इस स्थान की जानकारी दी। तो ग्राम वासियों के सहयोग के वे इस स्थान पर बैठ गए और यज्ञ करने लगे। आश्रम में स्थित सिरकटी मूर्तियाँ एक दीमक की बांबी से प्राप्त हुई थी। उन्होने बताया कि भुनेश्वरीशरण दास को कुछ द्रव्य के साथ दो शिवलिंग भी यहाँ प्राप्त हुए, जिसमें से पेड़ के नीचे एक स्थापित है, दूसरा मंदिर में स्थापित है। इस स्थान पर सुदूर प्रांतों  से संत आते हैं, संतों का आगमन 1963 से हो रहा है, अब वे यहीं स्थायी रुप से बस कर आश्रम की सेवा कर रहे हैं। आश्रम में जाति समाज वालों ने अपने भवन बना रखे हैं। यहाँ लगभग सौ अधिक गाय भैस हैं एवं आश्रम के नाम से लगभग 40-50 एकड़ जमीन है। जो कुटेना, पाण्डुका, जटिया सोरा, पोंड, गाड़ा घाट एवं फ़िंगेश्वर आदि गांवों में है।

प्राचीन बंदरगाह
अब चर्चा करते हैं बंदरगाह की, मानव सभ्यता का उद्भव एवं विकास समुद्र तथा नदियों के किनारे हुआ। जलमार्ग ही आवागमन एवं परिवहन का प्रमुख साधन था। प्राचीन काल में थलमार्ग से परिवहन कम ही होता था। जितनी भी प्राचीन राजधानियाँ एवं शहर हैं, सभी नदियों के तट पर ही स्थित हैं। अन्य राष्ट्रों से व्यापार जल मार्ग से होता था तथा वर्तमान में भी हो रहा है। वास्कोडिगामा, कोलंबस इत्यादि यायावर भी जल मार्ग से ही भारत में प्रविष्ट हुए। जल परिवहन द्वारा व्यापार करना थल परिवहन से कम लागत में हो जाता है। नाव एवं बड़े जहाजों के माध्यम से माल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाया जाता है। ऋग्वेद में जहाज और समुद्रयात्रा के अनेक उल्लेख है (ऋक् 1/25/7, 1/48/3, 1/56/2, 7/88/3-4 इत्यादि)। प्रथम मंडल (1-116-3) की एक कथा में 100 डाँड़ोंवाले जहाज द्वारा समुद्र में गिरे कुछ लोगों की प्राणरक्षा का वर्णन है। इन उल्लेखों से ज्ञात होता है कि ऋग्वेद काल, अर्थात् लगभग 2,000 - 1,500 वर्ष ईसा पूर्व, में यथेष्ट बड़े जहाज बनते थे और भारतवासी समुद्र द्वारा दूर देशों की यात्रा करते थे। इन जहाजों के द्वारा लाए गए माल को उतारने के लिए गोदी या बंदरगाहों का निर्माण किया जाता था। छत्तीसगढ की प्रमुख नदी चित्रोत्पला गंगा महानदी के जल मार्ग से व्यापार होता था। महानदी के तट पर स्थित प्राचीन नगर राजधानी सिरपुर के उत्खन में व्यापार से संबंधित वस्तुएं एवं प्रमाण प्राप्त हो रहे हैं। 

महानदी उद्गम स्थान - भीतररास 
चित्रोत्पला गंगा महानदी का उद्गम सिहावा नगरी के भीतररास ग्राम से हुआ है। भीतररास में महानदी दक्षिण की ओर प्रवाहित होती प्रतीत हुई। महानदी के उद्गम स्थान पर मेरा दो बार जाना हुआ। महानदी धमतरी जिले के सिहावा नगरी स्थित भीतररास ग्राम से निकल कर 965 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में समाहित होती है। इसकी सहायक नदियाँ हसदो, जोंक, शिवनाथ, पैरी एवं सोंढूर नदियाँ है। पैरी, सोंढूर एवं महानदी का त्रिवेणी संगम पद्मक्षेत्र राजिम मे होता है। इस संगम पर कुलेश्वर (उत्पलेश्वर) महादेव का मंदिर है। जहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को मेला भरता है, जिसे अब राजिम कुंभ का नाम दिया गया है। पैरी नदी का उद्गम मैनपुर से लगे हुए ग्राम भाटीगढ से हुआ है। पहाड़ी पर स्थित पैरी उद्गम स्थल से जल निरंतर रिसता है। अब इस स्थान पर छोटा सा मंदिर भी बना दिया गया है। पैरी और सोंढूर नदी का मिलन रायपुर-गरियाबंद मार्ग पर स्थित मालगाँव के समीप मुहैरा ग्राम के समीप हुआ है। यहाँ से चल कर दोनो नदियाँ महानदी से जुड़ जाती है। राजिम पद्मक्षेत्र पैरी नदी के तट पर स्थित है। 

डॉ विष्णु सिंह ठाकुर एवं यायावर 
पैरी नदी के तट पर कुटेना में स्थित यह बंदरगाह (गोदी) पाण्डुका ग्राम से 3 किलोमीटर दूर स्थित है। अवलोकन करने प्रतीत होता है कि इस गोदी का निर्माण कुशल शिल्पियों ने किया है। इसकी संरचना में 90 अंश के कई कोण बने हैं। कठोर लेट्राईट को काटकर बनाई गयी गोदियाँ तीन भागों में निर्मित हैं, जो 5 मीटर से 6.60 मीटर चौड़ी तथा 5-6 मीटर गहरी हैं। साथ ही इन्हें समतल बनाया गया, जिससे नाव द्वारा लाया गया सामान रखा जा सके। वर्तमान में ये गोदियाँ नदी की रेत में पट चुकी हैं। रेत हटाने परगोदियाँ दिखाई देने लगी। प्रख्यात इतिहासकार एवं पुरात्वविद डॉ विष्णु सिंह ठाकुर से इस विषय मेरी चर्चा हुई। उन्होने इसे चौथी शताब्दी ईसा पूर्व माना। बताया कि इस स्थान पर महाभारत कालीन मृदा भांड के टुकटे भी मिलते हैं। नदी से "कोसला वज्र" (हीरा) प्राप्त होता था तथा जल परिवहन द्वारा आयात-निर्यात होता था।

गरियाबंद मार्ग पर मालगाँव 
गरियाबंद 15 किलोमीटर पर पैरी नदी के तट पर स्थित एक ग्राम का नाम मालगाँव है। यहाँ नावों द्वारा लाया गया सामान (माल) रखा जाता था। इसलिए इस गांव का नाम मालगाँव पड़ा। मालगाँव में पैरी नदी के तट पर आज से लगभग 10-15 वर्ष पूर्व तक एक रपटा (छोटा पुल) था जो नदी में पानी आने के कारण वर्षाकाल में बंद हो जाता था। जिससे गरियाबंद से लेकर देवभोग एवं उड़ीसा तक जाने वाले यात्री प्रभावित होते थे। नाव द्वारा नदी पार कराई जाती थी और उस पार बस गाड़ी इत्यादि के साधन से लोग यात्रा करते थे। वर्तमान में इस नदी पर पुल बनने के कारण बरसात में भी मार्ग खुला रहता है। वर्षाकाल में रायपुर से देवभोग जाने वाले यात्री मालगाँव से भली भांति परिचित होते थे, क्योंकि यहीं से पैरी नदी को नाव द्वारा पार करना पड़ता था। यहाँ से महानदी के जल-मार्ग के माध्यम द्वारा कलकत्ता तथा अन्य स्थानों से वस्तुओं का आयात-निर्यात हुआ करता था। पू्र्वी समुद्र तट पर ‘कोसल बंदरगाह’ नामक एक विख्यात बन्दरगाह भी था। जहाँ से जल परिवहन के माध्यम से व्यापार होता था।  इससे ज्ञात होता है कि वन एवं खनिज संपदा से भरपूर छत्तीसगढ प्राचीन काल से ही समृद्ध रहा है। नदियाँ इसे धन धान्य से समृद्ध करते रही हैं।
प्राचीन बंदरगाह

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

चैतुरगढ से लाफ़ागढ की ओर --------- ललित शर्मा

पहाड़ की सुंदरता
चैतुरगढ से लौटते हुए रास्तों की ढलान से सामने सीना ताने खड़े विशालकाय पहाड़ अनुपम दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। पहाड़ का जो दृश्य मेरे सामने था, कमाल का था, वह पहाड़ चोटी से लेकर तराई तक सीधा खड़ा था अर्थात कोई ढलान नहीं थी, जैसे किसी ने इसे चोटी से लेकर नीचे तक आरी से काट दिया हो। बंजी जम्पिंग या रॉक क्लाईम्बिंग करने वालों के आदर्श स्थान लगा। रॉक क्लाईम्बर्स के लिए तो चुनौती भी हो सकता है। इसकी ऊंचाई पर विशाल गुफ़ानुमा आकृति बनी हुई दिखाई दे रही थी। इस सुहाने दृश्य को कैमरे में कैद करने से स्वयं को रोक न सका। पंकज से कार रुकवाई और पहाड़ का चित्र लेने जंगल में घुस गया। जीवन चक्र सही चलता रहे तो पहाड़ सी जिंदगी भी कट जाती है खेलते कूदते। कहीं विघ्न हो जाए तो पल भी नहीं कटता। जीवन का फ़लसफ़ा यही है, पहाड़ को काटते रहो, छांटते रहो, चढते रहो ऊपर, बिना विश्राम के। एक दिन अवश्य ही विजय मिल जाएगी।


कृष्ण कुमार गोंड और ब्लागर जेमरा गांव में
रास्ते में आदिवासी गाँव जेमरा आया, तो यहाँ रुकने का मन हो गया, जैसे हारा हुआ सिपाही कहीं छांव में बैठ कर विश्राम कर ले और आगे की लड़ाई के लिए शक्ति विश्राम से शक्ति अर्जित कर फ़िर दुगनी शक्ति से जीतने के लिए युद्ध के मैदान में अग्रसर हो। रास्ते पर ही मुझे कृष्ण कुमार घ्रुव मिल गए। उनसे गाँव का नाम पूछो तो उन्होने जेमरा का नेवरिया पारा (जेमरा गाँव नया बसा मोहल्ला) बताया। उससे चर्चा होने लगी, आदिवासी गाँव में महुआ की दारु की चर्चा न हो ये तो हो ही नहीं सकता। परन्तु कृष्ण कुमार ने बताया कि उनके गाँव में कोई दारु नहीं बनाता। जिन्हे पीना होता है सरकारी भट्ठी से ही लाकर पीते हैं। हो सकता है कि वह हमारे रौब-दाब को देखकर झूठ बोल रहा होगा। क्योंकि आदिवासी गाँवों में स्वसेवन के लिए प्रति घर 5 लीटर तक महुआ की दारु बनाने की छूट है।

 चैतुरगढ की महामाया गाँव में 
मुख्य मार्ग से एक गली सामने के मोहल्ले में जाती है। वहाँ बने तिराहे पर एक पत्थर गड़ा है। उस स्थान को साफ़ सुथरा देखकर मैने कृष्ण कुमार से जिज्ञासावश पूछ लिया। तो उसने बताया कि इन्होने यह पत्थर चैतुरगढ की महामाया के नाम पर गड़ाया है। हम यहाँ पर महामाया का ही स्थान मानते हैं। क्योंकि त्यौहारों के अवसर पर चैतुरगढ दूर होने के कारण जाना कठिन हो जाता है। इसलिए इसी स्थान पर सभी पूजा-पाठ करके बकरों या अन्य जानवरों की बलि देते हैं। जहाँ मान लो वहीं देवी-देवता उपस्थित हैं। हमें चैतुरगढ की पहाड़ी पर दर्शन नहीं हुए महामाई के तो यहीं दर्शन कर लिए। मेरे पूछने पर उसने बताया कि यहाँ से थोड़ी दूर आगे जाने पर आदिवासी हास्टल है। वहाँ के गुरुजी के पास मोटरसायकिल है। हमने सोचा कि यह मिल जाए तो अधूरी यात्रा पूरी हो जाएगी। हम दुविधा में थे कि जाएं या नहीं। मन हमेशा जाने के पक्ष में ही रहता था।

ढेकी (प्राचीन यंत्र)
आस-पास धनकुट्टी या आटा चक्की नहीं दिखने पर मैने कृष्ण कुमार से गाँव में ढेकी के बारे में पूछा। तो उसने बताया कि गाँव में बहुत सारे घरों में ढेकी है। बस मेरा काम बन गया क्योंकि ढेकी की फ़ोटो मैं बहुत दिनों से लेना चाहता था पर मेरे गाँव में भी अब किसी के घर में ढेकी नहीं रही। सिर्फ़ फ़ोटो के लिए ही 5-7 गाँवों में चक्कर लगाना पड़ता। तब कहीं जाकर एकाध घर में धूल मिट्टी खाती हुई ढेकी मिलती। ढेकी सम्पन्न गृहस्थ का प्रतीक प्राचीन यंत्र हैं। लोग मुसल से कूट कर धान का छिलका निकालते थे। जिसमें समय और श्रम अधिक लगता था। इसके बाद ढेकी का अविष्कार हुआ, इसे सिर्फ़ एक आदमी खड़े-खड़े अपने पैरों से चलाता है और एक घंटे में दो-तीन बोरा धान से चावल निकाल लेता है। इसे चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता नहीं होती। घर गृहस्थी खेती किसानी के प्राचीन यंत्रों को संजोने के क्रम मुझे यहाँ ढेकी का मिलना सुखद लगा। कृष्ण कुमार के घर में हमने जाकर जी भर ढेकी के फ़ोटो खींचें।

जेंजरा का आदिवासी छात्रावास
यहां से अगला पड़ाव था, आदिवासी आश्रम के गुरुजी का घर। आगे बढने पर कुछ ईमारतें दिखाई दी। हमने कार उधर ही मोड़ ली। जहाँ कार रुकी, उसी कमरे के सामने मोटर सायकिल खड़ी थी। झांकने पे पीछे टेबल कूर्सी डाल कर दो-तीन खाकी बर्दी धारी दिखाई दिए। लग रहा था संध्या वंदन की तैयारी है। ये फ़ारेस्ट के अधिकारी कर्मचारी थे, जंगल में इनका रोल किसी पुलिस से कम नहीं होता। जिसे चाहे धर ले, जिसे चाहे छोड़ दे। हमें देख कर एक बंदा बाहर आया। पंकज के पूछने पर उसने गुरुजी का घर दूसरी जगह बताया। वहाँ पहुंचने पर पता चला कि गुरुजी नहीं हैं, पाली गये हैं।

हम वहाँ से आगे बढे तो एक बाईक वाले ने हमारे से आगे निकाल कर हमें रोका। मैने सोचा कि यह बाईक देने आया होगा। उसका कहना था कि यहां से तीन किलोमीटर उसका गाँव है। वहाँ ठेकेदार घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग कर पुल बना रहा है। आप फ़ोटो खींच कर अखबार में छाप दीजिए। मैने सिर हिलाया और हम आगे बढे। यहाँ पत्रकारी करने थोड़ी आए हैं। सरकार में बैठे लोग लाखों करोड़ खा जाते हैं। एक ठेकेदार लाख-दो लाख भी खा लेगा तो क्या फ़र्क पड़ने वाला है? यह मुकदमा हमने बाबा रामदेव की एवं अन्ना की सेना के लिए छोड दिया।

चलो भाई ढेकी कुरिया में
तिराहे पर पहुंचने पर जिस दुकानदार की बाईक की आस लगा कर यहां तक आए थे उससे बाईक मांगी तो उसने मना कर दिया। बोला कि बाईक इंजन खराब है लोड नहीं ले रहा है। मैने कहा - यार अभी तो बाईक बदले कार रख ले। हमारे चैतुरगढ से लौटते तक तुझे कार का मालिक बना देते हैं। इतने पर भी लेकिन वह नहीं माना। आखिर में हमें वापस ही पाली की तरफ़ लौटना पड़ा। चैतुरगढ जाने के सारे रास्ते हमारे लिए बंद हो चुके थे। मन मार कर सोचा कि आज नहीं जा पाए तो कोई बात नहीं, मौसम खुलने के बाद फ़िर कभी आएगें चैतुरगढ के लिए। रात तक हमें बिलासपुर भी पहुंचना था। झा जी ने फ़ोन पर निर्देश देकर खाने की व्यवस्था अपने बंगले पर कर ली। पंकज और हमको उनके घर का निमंत्रण था। यहाँ से थोड़ी दूर पर पुरानी जमीदारी लाफ़ागढ है। जिसका नाम मैने सुना था। अब फ़ैसला लिया गया कि चैतुरगढ न सही तो लाफ़ागढ ही सही। वहीं चला जाए, अपने पास अभी एक-डेढ घंटा और था बिताने के लिए। आगे पढें………

शनिवार, 25 अगस्त 2012

पाली के शिव मंदिर की मिथुन मूर्तियाँ-------- ललित शर्मा

रतनपुर दुर्ग का मोतीपुर द्वार
बिलासपुर से रतनपुर होते हुए अंबिकापुर जाने वाले मार्ग पर ५० किलोमीटर दूरी पर उत्तरपूर्व में पाली स्थित है। वेरना सर्पीले रास्ते को नयी-नवेली दुल्हन की तरह बलखाते बड़ी सफ़ाई से नाप रही थी और पंकज कुशलता से हांक रहा था। गाड़ीवाले गाड़ी धीरे हांक रे……जिया उड़ा जाए लड़े आँख रे…… गाड़ी हांकने में जोर भी बहुत पड़ता है और आँख लड़ने के बाद तो आँख आने का खतरा कई गुना हो जाता है। जिनके आँख नहीं उनके भी आ जाती है। आलोक धरती से लेकर अंबर तक फ़ैल जाता है। सम्पूर्ण चराचर जगत प्रकाशमान होकर उमंगों से भर जाता है। हरियाली और मौसम बेईमान बनने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा।

ढाबा शेरे पंजाब पाली और पंकज सिंह
उत्तर से उमड़ती-घुमड़ती घटाएं प्रभावोत्पादक बन रही थी। वो आँख ही क्या जो कभी लड़े न, लड़ गयी तो आए न। आए तो फ़िर जाए न और फ़िर कभी लड़ने के काबिल रहे न। आंखे भी बड़े कमाल की हैं न। हमारी आँखें तो अब लड़ने-झगड़ने लायक बची नहीं। काला चश्मा लगाने के बाद दीदे फ़ाड़ कर देखने से भी दिखाई नहीं देता। काला चश्मा बड़ा कारगर होता है आँखों की बीमारी के लिए पास फ़टकने ही नहीं देता। गाड़ी पाली की ओर चली जा रही है और आँखे अपने काम में लगी है। दोपहर को आलस आ ही जाता है, पाली पहुंचने तक भूख लग चुकी थी।

पाली का शिव मंदिर और यायावर
हम वहाँ खाने का कोई अच्छा ढाबा ढूंढ रहे थे, मुझे याद आया कि एक ढाबे में कई वर्ष पूर्व भोजन किया था। वहीं चला जाए, लेकिन वह ढाबा दिखाई नहीं दिया, ढाबे की खोज में हम पाली की बाऊंड्री से पार हो चुके थे। आखिर फ़िर गाड़ी लौटा कर ढाबा ढूंढना शुरु किया। आखिर मनपसंद शेरे-पंजाब ढाबा मिल ही गया। शेरे पंजाब ढाबे हर जगह कमो-बेश मिल ही जाते हैं। जब से पंजाब के जंगलों का सफ़ाया हुआ सारे शेर जंगलों की तरफ़ आ गए। इधर जंगलों में कोई शिकार न मिला तो ढाबे ही खोल लिए। आम के आम और गुठली के दाम। खाने-खिलाने और पीने-पिलाने का इंतजाम तो हो गया। हमने यहीं खाने का आर्डर दिया। तंदूरी रोटियों के साथ करी का भरपूर स्वाद लिया। अब हम चल पड़े पाली मंदिर के दर्शनावलोकन करने।

शिव मंदिर का गर्भ गृह
पाली का मंदिर अपनी शिल्पकला के लिए जग प्रसिद्ध है। केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत इसे चार दीवारी से घ्रेरा गया है। लोहे के बड़े प्रवेश द्वार से हमने मंदिर परिसर में प्रवेश किया। परिसर में मखमली घास बिछाकर सुंदर हरे गलीचे के साथ ही बगीचा  तैयार किया गया है। मुख्यद्वार के समीप ही मंदिर के केयर टेकर का निवास है। मंदिर के समीप ही एक सुंदर जलाशय है। अनुमान है कि यहाँ पूर्व में और भी मंदिर होगें जो काल की भेंट चढ गए। यहाँ आवाज देने पर संतोष त्रिपाठी जी अपने दो सहयोगियों के साथ मिले। इन्होने बताया कि ये पहले बारसुर के मंदिर में थे। अभी कुछ महीनों से ही स्थानांतरित होकर पाली आए हैं। रेड सेंड स्टोन से तैयार पाली के शिव मंदिर की कारीगरी मनमोहक एवं नयनाभिराम है। मंदिर के भीतर और बाहर प्रस्तर मूर्तियां उत्कीर्ण की गयी हैं। मंडप एवं जगती का पुनर्निर्माण हुआ है तथा पुरातत्व विभाग की देख-रेख में मंदिर अपनी पुरानी शानौ शौकत के साथ आकाश से टक्कर लेता हुआ अडिग, अविचल विद्यमान है।

मंदिर के भीतर शिलालेख
मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करने पर शिल्पकारी दिखाई देती है। मन श्रद्धा से भर जाता है उन शिल्पकारों के प्रति जिन्होने अनगढ पत्थरों को अपनी छेनी-हथौड़ी से तराश कर जीवंत कर दिया। नयनाभिराम शिल्प मन को मोह लेता था। गर्भ गृह का द्वार सुंदर लता वल्लरियों से अलंकृत है। बांई तरफ़ की दीवार पर ब्रह्मा विराजमान तथा चौखट के बाई तरफ़ दशावतार उपस्थित हैं। मंदिर के वितान पर मनमोहक अंकन विशिष्टता प्रदान करता है। गर्भ गृह का यह अलंकरण अनुपम है। दाईं तरफ़ स्तंभ पर उत्कीर्ण "श्रीमद जाजल्लादेवस्य कीर्ति रिषम" शिलालेख दिखाई देता है। पाली के प्राचीन शिव मंदिर की हरिहर प्रतिमा, इसका निर्माण 11वीं सदी में कलचुरी शासनकाल में राजा श्री मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य द्वितीय ने कराया था। शिलालेख द्वारा अनुमान है कि इसका जीर्णोद्धार बारहवीं शताब्दी में रतनपुर के हैहयवंशीय राजा जाज्जल्वदेव प्रथम ने करवाया।

हरिहर की अद्भुत प्रतिमा
मंदिर के बाहरी परकोटों पर देवी-देवताओं के साथ व्यालाकृति, अप्सराओं की मूर्तियां अंकित हैं। व्याघ्र व्याल, हस्ति व्याल, वराह व्याल के साथ अन्य प्रकार के व्याल भी अंकित हैं। मंदिर के बांए तरफ़ की दीवार पर एक अद्भुत प्रतिमा है,जिसे हरिहर कहते हैं। इस मूर्ति में शिव और विष्णु के अर्धांग बने हुए हैं। दोनो अर्धागों से यह प्रतिमा पूर्ण हुई है। बाईं तरफ़ शिव एवं दायीं तरफ़ विष्णु का अंकन शिल्पकार ने किया है। शिव को त्रिशूल,डमरु एवं नदी के साथ अंकित किया है और विष्णु का शंख एवं गदा के साथ अंकन है। इस तरह की शिल्पाकृति मुझे अभी तक अन्य स्थान पर देखने नहीं मिली। अनुपम शिल्प का निर्माण हुआ है इस प्रतिमा के रुप में। शिल्पकार की कल्पना को नमन करना चाहिए।

पाली का शिव मंदिर
मंदिर के दाएं तरफ़ प्रेमासक्त,कामासक्त आलिंगनबद्ध अप्सराओं एवं गंधर्वों का अंकन है। प्रतिमाएं सुंदर एवं सुडौल होने के साथ आकर्षित भी करती हैं। खजुराहो का शिल्प भी यहां देखने मिलता है। एक मूर्ति में संभोग से समाधि की ओर जाते हुए गंधर्व एवं अप्सरा दिखाई दिए। मंदिरों में मिथुन मूर्तियाँ उत्कीर्ण करने की परम्परा से प्रतीत होता है  कि यौनशिक्षा का माध्यम कभी मंदिरों का शिल्प रहा होगा। हमने प्रतिमाओं के चित्र लिए, मंदिर के चारों तरफ़ इतनी मूर्तियाँ हैं कि चित्र लेने में आधा दिन निकल जाए। हमारे पास समय की कमी थी इसलिए मंदिर की एक परिक्रमा कर पुन: मूर्तियों को देखा और उन्हे बनाने वाले अनाम शिल्पकारों को नमन करके बाहर आ गए। इस बीच संतोष त्रिपाठी ने कहा, आप पुरी जाएं तो आपके रहने और खाने का पूरी जिम्मेदारी लेने को तैयार हूँ। हमने संतोष जी को धन्यवाद दिया और विदा लेकर हम चैतुरगढ की ओर चल पडे। मौसम यथावत बना हुआ था…॥ आगे पढें……

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

रतनपुर का गोपल्ला बिंझवार --------------- ललित शर्मा

रतनपुर किले का द्वार
दोपहर के 12 बज रहे थे हम बस स्टैंड के पास स्थित हाथी किला की ओर चल पड़े। यह किला केन्द्रीय पुरातत्व के संरक्षण में है। यहाँ केन्द्रीय पुरातत्व के 3 कर्मचारी हैं, पर मुझे एक भी नहीं मिला। किले के भव्य प्रवेश द्वार से प्रवेश करने पर तालाब के बगल से दो-तीन गंजेड़ी बाहर निकलते दिखाई दिए। इससे लगा कि यह असमाजिक तत्वों का मुफ़ीद अड्डा हो सकता है। कहते हैं कि जब किला पुरातत्व के संरक्षण में नहीं था और उजाड़ पड़ा था तब रतनपुर के निवासी नगर के घरों में निकलने वाले सांपों को किले में छोड़ जाते थे। यहां कई प्रकार के सांप होने की बात सामने आई। पर पूरा किला घूमने पर भी हमें एक भी सर्प दिखाई नहीं दिया। यह किला राजा पृथ्वी देव ने बनाया था। यह चारों ओर खाईयों से घिरा हुआ है। किले में 4 द्वार सिंह द्वार, गणेश द्वार, भैरव द्वार तथा सेमर द्वार बने हुए हैं। सिंह द्वार के बांयी ओर गंधर्व, किन्नर, अप्सरा एवं देवी देवताओं के अलावा लंकापति रावण भी अपना सिर काटकर यज्ञ करते हुए दिखाई देता है।

गोपल्ला बिंझवार
सिंह द्वार में प्रवेश करने पर बायीं ओर एक विशाल पाषण प्रतिमा है, जिसके सिर और पैर ही दो भागों में दिखाई देते हैं। मान्यता है कि इस प्रतिमा का धड़ मल्हार में रखा है। अब इस प्रतिमा का धड़ मल्हार कैसे पहुंचा इसका कोई पता नही है। यह प्रतिमा गोपल्ला बिंझवार (गोपाल राय वीर) की मानी जाती है, इसे देवार गीतों में भी गाया जाता है। कहा जाता है कि गोपाल की वीरता से प्रभावित होकर मुगलबादशाह जहांगीर ने राजा कल्याणसाय को अनेक उपाधियां दी तथा रतनपुर से लगान लेना बंद कर दिया। आगे गणेश द्वार है, जहाँ हनुमान जी प्रतिमा है, कहते हैं कि इस प्रतिमा के पीछे सुरंग का द्वार है। जिसे प्रतिमा से बंद कर दिया गया है। इसके आगे थोड़ी दूर पर मराठा साम्राज्ञी आनंदीबाई द्वारा निर्मित लक्षमीनारायण मंदिर है। किले के मध्य में जगन्नाथ मंदिर स्थित है, इसका निर्माण राजा कल्याणसाय ने कराया था। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा, एवं बलभद्र की प्रतिमा एवं भगवान विष्णु, राजा कल्याण साय एवं देवी अन्नपूर्णा की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित है।

रनिवास-रतनपुर
मंदिर के पार्श्व भाग में रनिवास एवं महल के अवशेष विद्यमान हैं। रनिवास में माल खाना, हथियार खाना एवं सुरक्षा प्रहरियों के रहने के स्थान भी हैं। किले के पिछले द्वार पर ताला लगा था, यह रास्ता मोतीपुर की ओर जाता है। ताला बंद होने पर हम फ़ेन्सिग को उपर से पार करके मोतीपुर की ओर गए। कुछ दूरी पर यहाँ खाई से बने तालाब के किनारे एक बीसदुवरिया और बनी है। यहाँ राजा लक्ष्मणसाय की बीस रानियां सती हुई थी, उन्ही के स्मृति में यह स्मारक बनाया गया है। यह बीस दुवरिया क्षतिग्रस्त है। इस में अभी भेड़-बकरियों का डेरा होने से यह बीसदुवरिया खंडहर भी ध्वस्त होने के कगार पर है। कहते हैं कि मलयगिरि की भीलनी चूल्हा जलाने के लिए चंदन की लकड़ियों को उपयोग में लाती थी वैसे ही इस भव्य किले को समीप के रहवासियों ने हागालैंड बना दिया है। वापसी के दौरान कुछ लोटाधारी महिलाएं पुरुष किले में दिखाई दिए। हम सिर झुकाए उनके आगे से निकल गए। लोगों ने अभी तक अपनी महत्वपूर्ण पुराधरोहरों को सम्मान देना एवं सुरक्षित रखना नहीं सीखा है।

रामटेकरी- रतनपुर
हाथी किला से हम रामटेकरी की ओर चल पड़े। रामटेक की राम टेकरी तो हमने देखी थी। रतनपुर की रामटेकरी के दर्शन एवं निर्माणकर्ता की जिज्ञासा लिए हम रामटेकरी पहुंच रहे थे। टेकरी के समीप ही एक तालाब है, जिसे टेकरी पर से देखने पर भारत का नक्शा तालाब में दिखाई देता है। आसमान में बादल घिर आए थे, सुबह से पंकज बारिश की मांग कर रहा था। मैने उससे वादा किया था कि बरसात बुलाना मेरी जिम्मेदारी है और उसे रोकना तुम्हारा काम। अगर रोक सकते हो तो अभी घनघोर घटा छाकर बरस जाएगी। पर कितनी देर बरसेगी यह मैं नहीं बता सकता। अरविंद झा भी मौज ले रहे थे, बार-बार घर फ़ोन लगा कर रात के खाने का इंतजाम कर रहे थे। भूख का समय हो गया था, झा जी एक दर्जन केले लेकर आए पर उन्होने खाए नहीं। रात को ही इतनी ओवरडोज हो गयी थी उसका असर दोपहर तक बना हुआ था। अर्थात संडे का पूरा-पूरा फ़ायदा लेने के चक्कर में थे, पर क्या करें? हमारे जैसे घनचक्करों के चक्कर में फ़ंस कर रह गए।

ब्लॉगर ललित शर्मा एवं पार्श्व में रामटेकरी
रामटेकरी पर पहुंचे तो यहां काफ़ी पर्यटक आए हुए थे, इस पहाड़ी पर राम दरबार का भव्य एतिहासिक मंदिर है। समीप ही खुंटाघाट जलाशय भी है, इस बांध का निर्माण अंग्रेजों ने 1926 में कराया था। यहां सुंदर उद्यान भी है। बरसात में खुंटाघाट जलाशय लबालब भरा हुआ दिखाई दे रहा था। मंदिर के प्रवेशद्वार पर नारियल, फ़ूल अगरबत्ती वगैरह पूजा सामग्री के एक दुकान लगी थी। संभवत: यह मंदिर के पुजारी का कोई अनुग्रही लगता है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान राम, देवी सीता, भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न की प्रतिमा पंचायत शैली में विद्यमान हैं। भगवान राम की प्रतिमा के अंगूठे से जल की धारा प्रभावित होती है। साथ ही सभा मण्डप में भगवान विष्णु तथा हनुमान जी की प्रतिमा हैं। सभागृह के आगे रानी आनन्दी बाई द्वारा निर्मित राजा बिंबाजी का मंदिर है। मंदिर में फ़ोटो खींचने की मनाही है। मैने फ़ोटो लेने की कोशिश की, लेकिन पुजारी ने मना कर दिया और मेरे पीछे ही लगे रहे, कहीं फ़ोटो न उतार ले।

रामटेकरी से खुंटाघाट उद्यान का दृश्य
उनका कहना था कि फ़ोटो खींचने की मनाही सुरक्षा की दृष्टि से है। पूर्व में कभी मूर्ति चोरों ने यहाँ धावा बोल दिया था। फ़िर बाद में पता चला कि इस मंदिर को लेकर इसकी सर्वराकार चंद्रकांता और राज्य सरकार के बीच न्यायालय में संपत्ति के अधिकार को लेकर वाद विचाराधीन है। इसलिए मंदिर का पुजारी चित्र लेने से मना कर रहा था। इस पहाड़ी से रतनपुर का मनोरम दृष्य दिखाई देता है साथ ही हाथी किला भी, लेकिन वृक्ष आड़े आने के कारण हाथी किले की फ़ोटो नहीं ली जा सकी। जब हम जाने लगे तो पुजारी जी ने तीनों के लिए अलग से प्रसाद भिजवाया। आधे नारियल के साथ फ़ल और मिष्ठान भी थे। मैने मंदिर के परकोटे से एक चित्र खूंटाघाट बांध के समीप बने हुए उद्यान का लिया। नागपुर के समीप स्थित रामटेक के जैसे ही यहाँ पर भोसला राजा ने इस रामटेकरी मंदिर का निर्माण किया। रामटेक (महाराष्ट्र) का मंदिर भी मैने देखा है।

बूढा महादेव का  जलाभिषेक
 रामटेकरी से लौटकर हम बूढ़ा महादेव के प्राचीन मंदिर के दर्शन करने के लिए गए। पुराने शहर में संकरी गलियों से सिर्फ़ एक ही गाड़ी निकल सकती है। सामने से दो गाड़ियाँ आ गयी जिससे रास्ता जाम हो गया। हमने पास की गली में अपनी कार को बैक करके घुसाया तब कहीं जाकर भीतर जाने का रास्ता बन पाया। वृद्धेश्वर महादेव को बूढा महादेव कहते हैं। इस मंदिर के सामने बावड़ी बनी हुई है। मंदिर प्रस्तर से निर्मित है, तथा एक खम्बे पर उत्कीर्ण कुछ अभिलेख भी दिखाई दिया। यहाँ स्थापित लिंग बीच में खोल है। इसमें जितना भी जलाभिषेक करिए, जल का स्तर सामान्य ही बना रहता है। थोड़ा सा भी जल का स्तर नहीं बढता, जितना पहले था उतना ही रहता है। हमने भी सावन में शिवजी का जलाभिषेक किया। पुजारी जी ने केले एवं सेव का प्रसाद दिया।

बूढा महादेव
रतनपुर में देखने के लिए अभी बहुत कुछ बचा था लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं था कि सब कुछ देख सकें। महालक्ष्मी मंदिर, जूना शहर तथा बादल महल, हजरत मुसे खाँ बाबा की दरगाह, गिरजावर हनुमान, रत्नेश्वर महादेव मंदिर, भुवनेश्वर महादेव मंदिर, कृष्णार्जुनी तालाब इत्यादि अनेक दर्शनीय स्थल हैं। पुरातत्व में रुचि रखने वाले के लिए रतनपुर दर्शन करना एक दिन में संभव नहीं है। इसके लिए कम से कम दो दिनों का समय होना चाहिए। फ़िर कभी अधिक समय लेकर आना होगा तभी सारे रतनपुर का भ्रमण हो सकता है। अब हमें पाली होते हुए चैतुरगढ एवं तुम्माण जाना था। पूछने पर पता चला कि बरसात में चैतुरगढ का मार्ग बंद हो जाता है और कार से जाना संभव नहीं होगा। तब हमने विचार किया कि रतनपुर से मल्लार होते हुए बिलासपुर चला जाए। मल्लार की दूरी भी यहां से 70 किलोमीटर के लगभग है तो हमने पाली और चैतुरगढ जाने का निश्चय किया और दीपक को छोड़ कर पाली की ओर चल पड़े। आगे पढें……

बुधवार, 22 अगस्त 2012

प्राचीन राजधानी रतनपुर ----------- ललित शर्मा

बिलासपुर से चलने की तैयारी
29 जुलाई 2012 की सुबह सप्ताहांत का रविवार लेकर आई, आसमान में बादल छाए हुए थे रिमझिम बरखा के आसार बने हुए थे। लाल चाय से सुबह हुई, स्नानाबाद से आकर बाबू साहब को फ़ोन लगाए तो पता चला कि उनकी तबियत नासाज हो गयी है और ओबामा के गोले ओसामा पर बरस रहे हैं। पहला झटका यहीं लग गया, हमने सारे गुदड़े बाबू साहब पर ही लाद रखे थे। नोकिया का चार्जर भूल आया, कैमरे वाले चलभाष की बैटरी अंतिम सांसे ले रही थी। कोई हॉट चार्जर मिल जाता तो चलभाष जल्दी चार्ज हो जाता। रास्ते के लिए जरुरी सामान समेट कर हम आगे के सफ़र के लिए चल पड़े। नाश्ता करने के लिए देवकीनंदन चौक की चौपाटी पर पहुंचे, वहां फ़टाफ़ट पोहा-जलेबी उदरस्थ की और अरविंद झा को फ़ोनियाए तो पता चला कि वे अभी भी निद्रासन में हैं। मैने उन्हे 15 मिनट में तैयार होने कहा और उनके घर की ओर चल पड़े।


पंकज सिंग
हमारे पहुंचने पर अरविंद झा किसी से फ़ोन पर चर्चा कर रहे थे। असनान-ध्यान का तो कहीं पता ही नहीं था। थोड़ी हुड़की लगाने के बाद भी 20 मिनट और जाया हुए और ब्लॉग कोतवाल तैयार हो गए चलने के लिए। हमने गाड़ी रतनपुर की ओर बढाई। बरसात में घूमने का आनंद ही कुछ और है। अरपा के साथ-साथ सफ़र हो रहा था, हमेशा की तरह नदी के किनारे सब्जी वाले बैठे थे। हमारी पहली मंजिल रतनपुर थी। वैसे तो रतनपुर का प्रवास सैकड़ों बार हुआ है पर आज सैलानी की नजर से देखने की इच्छा थी। इच्छा क्यों न हो भाई, रतनपुर छत्तीसगढ की चारों युगों की राजधानी थी इसलिए रतनपुर को चतुर्युगी नगरी भी कहा जाता है। राजे-रजवाड़ों के अवशेष देखने हैं। कम समय में अधिक स्थान देखने की गरज से राहुल भैया को फ़ोन लगाया और फ़िर समाधान हो गया। शहर के प्रवेश में खंडोबा मंदिर है। यहाँ शिवजी और भवानी की अश्वारोही प्रतिमा विराजमान है। इसे तुलजा भवानी मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर को मराठा नरेश बिंबाजी राव भोसला की रानी ने अपने भतीजे खांडो की स्मृति में बनवाया था। मंदिर के पीछे प्राचीन दुलहरा तालाब है।

महामाया मंदिर के पार्श्व में महाकाली
इसके बाद आगे चलने पर दाहिनी ओर भैरव मंदिर स्थित है। मंदिर के बाहर पूजा सामग्री और गानों की सीडी कैसेट बेचने वालों की पचासों दुकाने सजी हुई हैं। यहां काल भैरव की 9 फ़िट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। देवी दर्शन करने के पश्चात श्रद्धालु काल भैरव की पूजा अवश्य करते हैं। किंवदंती है कि मणिमल्ल नामक दैत्य के संहार के लिए भगवान भोलेनाथ ने मार्तण्ड भैरव का रुप बनाकर सहयाद्री पर्वत पर उसका संहार किया था। रतनपुर कौमारी शक्ति पीठ होने के कारण कालांतर में यहाँ तंत्र साधना भी होने लगी तब बाबा ज्ञानगिरी ने इस मंदिर का निर्माण कराया था।रतनपुर महामाई मंदिर पहुंचे तो वहाँ हमें दीपक दुबे मिले। अब रतनपुर दर्शन उनके साथ ही करना था। रतनपुर दर्शन करके पाली होते हुए चैतुरगढ से तुम्माण तक पहुंचना था। रतनगढ में ही पूरा दिन बीत सकता था।

महासरस्वती एवं महालक्ष्मी
बिलासपुर, अम्बिकापुर मुख्य मार्ग पर बिलासपुर से 26 किलोमीटर की दूरी पर रतनपुर स्थित है। बिलासपुर से चलकर आधे घंटे के बाद हम रतनपुर आदिशक्ति महामाया के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो एक स्कार्पियो सपाटे से हमारे सामने से आगे निकल खड़ी हो गयी। इसमें दो तीन सज्जन बाहर आए। मंदिर के दरवाजे तक गाड़ी आने का तात्पर्य था कि कोई न कोई पॉवर हाऊस है, तभी गाड़ी यहाँ तक आई है। गर्भ गृह में दर्शनार्थ पहुंचने पर पुजारी उन सज्जन को विशेष पूजा करा रहे थे। उन्हे पद्महार पहनाया गया तथा उत्तरीय धारण कराया गय। जब वे बाहर आने के लिए घूमे, तब तक मैं पहचान चुका था। ये ट्रस्ट के अध्यक्ष बलराम सिंह जी थे। राम-राम हुई वे अपने काम में लग गए और हम अपने काम में। हमने महामाई के दर्शन किए और प्रसाद लिया। राजा रत्नदेव प्रथम ने मणिपुर नामक गांव को रतनपुर नाम देकर अपनी राजधानी बनाया। इस स्थान को महाभारत एवं जैमिनी पुराण आदि में राजधानी होने का गौरव प्राप्त है।

अरविंद झा एवं पंकज सिंह
त्रिपुरी के कलचुरियो ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक छत्तीसगढ़ में शासन किया। इसे चर्तुयगी नगरी भी कहा जाता हैं जिसका तात्पर्य है कि इसका अस्तित्व चारो युगो में विद्यमान रहा है। इस मंदिर के निर्माण के पीछे कथन है कि 1045 ई में राजा रत्नदेव प्रथम तुम्माण से मणिपुर नामक गाँव में आए, यहाँ उन्होने रात्रि विश्राम एक वट वृक्ष पर किया। अर्धरात्रि में जब राजा की नींद खुली तो उन्होने वट वृक्ष के नीचे अलौकिक प्रकाश देखा, वे आश्चर्य चकित रह गए कि वहाँ आदिशक्ति महामाया की सभा लगी हुई थी। यह सब देख कर राजा अपनी चेतना खो बैठे। सवेरा होने पर वे अपनी राजधानी तुमान लौट आए तथा रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का फ़ैसला किया। 1050 ई में महामाया के भव्य मंदिर का निर्माण कराया।

नीलकंठेश्वर - कंठी देवल मंदिर
इस मंदिर में तीन देवियाँ हैं, महासरस्वती एवं महालक्ष्मी मंदिर के गर्भ गृह में विराजित हैं और महाकाली बाहरी दीवाल पर पार्श्वभाग में विराजित हैं। मान्यता है कि यह मंदिर कभी तंत्र-मंत्र का केन्द्र रहा होगा। कहते हैं कि रतनपुर में सती का दाहिना स्कंध गिरा था तब भगवान शिव ने स्वयं इसे कौमारी पीठ का नाम दिया। जिसके कारण यहाँ माँ के दर्शन से कुंवारी कन्याओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कहते हैं कि यह जागृत पीठ है, कुछ वर्षों पूर्व चंद्रास्वामी का यहाँ आगमन काफ़ी चर्चित रहा। पटौदी के बाबा सतबीर नाथ ने भी यहाँ के प्रभाव को महसूस किया तथा मुझे बताया था। यहाँ मनोकामना ज्योतियाँ भी जलाई जाती हैं।

बीस दुवरिया
महामाया मंदिर के परिसर में स्थित तालाब के के किनारे नीलकंठेश्वर महादेव का भव्य एवं शिल्पकला से परिपूर्ण मंदिर है। इसे कंठी देवल मंदिर भी कहते हैं, इस मंदिर के समीप एक प्रतिमा विहीन मंदिर भी है। कंठी देवल मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। इस मंदिर का बड़ी खुबसूरती के साथ जीर्णोद्धार किया गया है। अब हम महामाया मंदिर से थोड़ी ही दूर स्थित मधुबन की ओर जाते हैं, यहाँ पर तालाब के किनारे भगवान नर्मदेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है एवं दूसरी तरफ़ राजा राजसिंह का भव्य स्मारक बना हुआ है, जिसे बीस दुवारिया कहते हैं। यह मंदिर प्रतिमा विहीन है तथा इसमें 20 दरवाजे हैं। प्रत्यके दरवाजों की चौखट की खड़ी पाटी में दो-दो फ़ुट के वही पत्थर दिखाई दिए जो हमने सिरपुर में देखे थे। बाकी पत्थर जामुनी रंग के थे। वैसे ही एक पत्थर का खम्बा मैने राजिम के कुलेश्वर महादेव के मंदिर में भी देखा था। अभी यह मंदिर जीर्ण शीर्ण अवस्था में है, इसे संरक्षण की आवश्यकता है वरना समय की मार से धराशायी हो सकता है। इसके चारों तरफ़ गंदगी फ़ैली हुई है। बैरागवन के समीप खिचरी केदारनाथ का प्राचीन मंदिर भी दर्शनीय है।आगे पढें………

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

बर्फ़ानी आश्रम एवं संत बालयोगी का योग ---------- ललित शर्मा

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र्मदा माई के दर्शन करके हम बर्फ़ानी बाबा की खोज में निकले। यह पता नहीं था कि उनका आश्रम नर्मदा उद्गम स्थल के पीछे ही है। दो-चार किलोमीटर के चक्कर काट कर हम आश्रम के मुख्यद्वार पर पहुंचे। द्वार पर सिक्योरिटी गार्ड मुस्तैद थे। उनसे पूछने पर पता चला कि बाबा जी आराम कर रहे हैं। भीतर कोई होगा तो जाकर उनसे पूछ लीजिए। भीतर जाने पर श्वेत वस्त्रधारी युवा विराजमान थे कुर्सी पर। उनके सामने दो व्यक्ति जमीन पर बैठे थे। हाव-भाव से लगा कि यही प्रमुख हैं यहाँ के। मदन साहू बर्फ़ानी बाबा से मिलना चाहते थे। उनकी उम्र 221 साल बताई जाती है। अमरकंटक में चीन के युद्ध के पश्चात 1965 में आए। बर्फ़ानी दादा जी का पैतृक निवास उन्नाव जनपद के दोदियाखेड़ा ग्राम है। ये ब्राह्मण जमीदार परिवार से हैं। इनके पिता का नाम हरिदत्त दूबे था। इन्होने 36 अंचल बिलासपुर, डोंगरगढ और खैरागढ में ही समय बिताया। इनका मुख्याश्रम छत्तीसगढ के राजनांदगांव में है। उन्हे ब्रह्मर्षि बर्फ़ानी दादा जी के नाम से जाना जाता है। अमरकंटक में संत लक्ष्मण दास बालयोगी जी उपलब्ध थे। 

हमने भी उनकी बैठक में स्थान ग्रहण किया और चर्चा होने लगी। बालयोगी जी के पास एक डेस्कटॉप और एक लैपटॉप रखा हुआ था। कहने लगे कि इंटरनेट का कनेक्शन बंद है। शिकायत दर्ज कराने पर भी चालु नहीं हुआ है। मैने अपने बीएसएनएल के डॉटाकार्ड से चलाने की कोशिश की तो वहाँ पर नेटवर्क नहीं मिला। बालयोगी जी से बर्फ़ानी दादा जी के विषय में चर्चा हुई। उन्होने बताया कि वे इस आश्रम से एक पत्रिका भी निकालते हैं। हमारे स्वामी जी उनकी प्रत्रिका के वार्षिक सदस्य बने। लेकिन पत्रिका कई माह से प्रकाशित नहीं हो पायी थी। इस तरह हमारे स्वामी जी भाव विभोर होकर टेसन पर खड़ी रेल में टिकट लेकर बैठ गए। पता नहीं गाड़ी चली भी है या नहीं या स्वामी जी गाड़ी खुलने का इंतजार ही कर रहे हैं। बालयोगी जी ने बताया कि उन्हे कम्पयुटर और नेट चलाना आता है। जो पत्रिका वे निकालते हैं उसकी डिजाईन वे स्वयं ही करते हैं। डीटीपी के साथ कोरल पर भी काम जानते हैं। होना भी चाहिए, वर्तमान में बहुतेरे संत इलेक्ट्रानिक माध्यमों का उपयोग कर धर्म एवं संस्था के प्रचार प्रसार में लगे है।

लेखक एवं संत लक्ष्मण दास बालयोगी
बालयोगी जी की अर्थेजर्निक योग भक्ति फ़ाऊंडेशन नामक संस्था भी है। जिसके माध्यम से प्राण शक्ति बढाने वाले योग का प्रचार प्रसार करते हैं। योग शास्त्र कहता है- योगश्चित्तवृत्ति निरोध:। अगर मनुष्य नियमित यौगिक दिनचर्या का पालन करे तो अस्वस्थ हो ही नहीं। बालयोगी जी ने मुझे अपने प्रकाशन की तीन किताबें 1- नमस्कार सूर्य, 2-अर्थेजर्निक योग भक्ति साधना उर्जा एवं अर्थेजर्निक योग भक्ति साधना (अर्थ और उर्जा के साथ परम लक्ष्य की प्राप्ति सप्रेम भेंट की। हमने उनके साथ फ़ोटो ली। योगी जी को पत्रिका निकालने के लिए एक कम्पयुटर आपरेटर चाहिए। जो अमरकंटक में रह कर इनका काम करे। मानदेय के विषय में पूछने पर इन्होने बताया कि मानदेय योग्यतानुसार दिया जाएगा। आश्रम के एक हिस्से का कालेज के छात्रों के लिए छात्रावास के रुप में प्रयुक्त हो रहा है । आश्रम में अतिथियों के लिए जलपान की कोई व्यवस्था नहीं है। यह सोच कर थोड़ा ताज्जुब लगा। आमसेना वाले महाराज तो बिना जलपान किए किसी को वापस ही नहीं आने देते हैं। चाहे जितने दिन भी रहिए, तीन समय का भोजन प्रसाद अवश्य मिलेगा। चाहे वह व्यक्ति आम हो या खास हो।

बालयोगी जी व्यवहार कुशल एवं मृदूभाषी हैं। इनका व्यवहार शांत एवं मनमोहक है। अर्थेजर्निक योग भक्ति साधना उर्जा की प्रस्तावना में लिखते हैं कि शारीरिक एवं आध्यात्मिक उर्जा संचित करने के लिए अर्थेनर्जिक योग, भक्ति के अंतर्गत योग साधना के छ: अलग-अलग कोर्स बनाए गए है। इनमें पहला कोर्स है "भूमिका" जो तीन दिवसीय प्रयोग है, यह मुख्य रुप से शरीर साधना से संबंधित है। इसके बाद दूसरा कोर्स है "उर्जा"। यह कोर्स सात दिवसीय प्रयोग है और यह शरीर साधना के साथ आध्यात्मिक साधना से जुड़ा हुआ है। इसी परिपेक्ष में यह पुस्तक प्रकाशित की गयी है। इसमें मुख्य रुप से सात दिवसीय उर्जा का संकलन किया जा रहा है। सात दिवसीय यह उर्जा कोर्स समाज के बदलते परिवेश को दृष्टिगत करते हुए निर्धारित किया गया है क्योंकि वर्तमान में  व्यवहार जगत की सक्रियता लगातार बढते जा रही है, इस समय न तो कोई चैन से बैठना चाहता है और न ही किसी से पीछे रहना चाहता है ऐसे में शारीरिक उर्जा का महत्व और भी बढ जाता है।

बालयोगी जी से हम पुस्तकें ग्रहण कर अपने अगले पड़ाव की ओर चल पड़त है। वे हमें मुख्यद्वार तक पहुंचाने आते हैं, हम उनसे विदा लेते हैं। अमरकंटक में वैसे भी छत्तीसगढी बोली का प्रयोग निवासी सामान्यत:  करते हैं। इसे बंटवारे में छत्तीसगढ को ही दिया जाना चाहिए था। लेकिन राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी एवं दोनों प्रातों में एक ही राजनैतिक दल की सरकार होने के कारण बंदर बांट हो गयी। अमरकंटक जैसा सुरम्य इलाका छत्तीसगढ में रहने से वंचित हो गया। पहले जब किसी को टी बी इत्यादि बीमारी हो जाती थी तो डॉक्टर उसे पेंड्रारोड या अमरकंटक जाकर स्वास्थ्य लाभ करने के लिए कहते थे। जैसे दिल्ली वाले गर्मी के मौसम में स्वास्थ्य लाभ करने शिमला या कुल्लू मनाली जाते हैं। अमरकंटक में भी गर्मी के दिनों में इसी तरह का मौसम होता है और शीतल बयार चलती है। मन एवं आत्मा प्रफ़ुल्लित हो जाती है। जब भी आओ यहीं बसने का मन होता है। घर के समीप इस हिल स्टेशन पर भी एक घर होना चाहिए। … आगे पढें