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सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

उदय और आम्रपाली के साथ छुक-छुक गाड़ी में--- ललित शर्मा

अभनपुर जंक्शन
भाई दूज मनाने का चलन बढा, जब से गाँव के घर-घर में गाड़ियाँ हुई, लोग पहुंच जाते हैं बहन-बेटियों के घर। हाल चाल के साथ साक्षात्कार भी हो जाता है, बहन-बुआ भी खुश कि पीहर से भाई-भतीजा आया है मिलने। बेटी माई की लगन पीहर के लिए सदा लगी रहती है, भावनात्मक रिश्ता सदियों से कायम है, जब-जब कोई त्यौहार आता है तो इनकी याद आ ही जाती है, बचपन के दिन बरबस याद आ जाते हैं, जब साथ मिल कर त्यौहार मनाते थे। पीहर के लिए बेटियों का हृदय उमड़ता रहता है, माता-पिता भाई-भौजाई से मिलने की आस लगी रहती है। कुछ दिनों पहले मेरी मुलाकात मेरे दादा की 107 वर्षीय बड़ी बहन से हुई, पापा की तरह हम भी उन्हे बुआ ही कहते हैं। कहते हैं कि जब तक माँ-बाप हैं तक ही मायका है, उसके बाद तो कोई आए-जाए वही बड़ी बात है। जब मैं उनसे मिलने पहुंचा तो खाट से उठ कर मेरे पास आकर बैठ गयी, पता चला कि मेरे पहुंचने पर कई दिन बाद खाट से उठ कर चली हैं। मायके से पोते की आने की खुशी ने उनमें फ़ुर्ती भर दी। उन्होने मेरा दुलार किया और मेरे साथ आने का बाल हठ करने लगी। उन्हे इस अवस्था में घर तक लाना मुश्किल काम था, लेकिन मायके को देखने की ललक कायम थी, उन्होने मुझसे पुरे परिवार के विषय में जानकारी ली। बड़ा अच्छा लगा उनसे मिलकर और स्नेह पाकर। बड़ी बुआ, बुआ, बहन और बेटियाँ चार पीढियाँ मौजूद हैं।

खुली खिड़की
जब से होश संभाला, तब से देख रहा हूँ ,मेरे घर के बगल से छोटी रेलगाड़ी को आते-जाते। जब कोयला वाले इंजन हुआ करते थे, छुक-छुक करती रेल जब सीटी बजाती थी हम दौड़ कर रेल देखने पहुंच जाते थे, सवारियों को हाथ हिला कर टा टा बाय बाय करते, इंजन भी हमें देख कर ढेर सारा धूंवा उगल कर अभिवादन स्वीकार करता। काली टोपी लगाए ड्रायवर और कोयला डालने वाला भी बेलचा थामे हाथ हिलाता। प्रतिदिन का ही काम था, ड्रायवर भी पहचानने लगे थे। कभी एक दो पैसे का सिक्का पटरी पर रख कर उसकी गति भी देखते थे, सिक्का फ़ैल कर चिकना हो जाता। रेल्वे स्टेशन के पास एक ईमली का पेड़ था, कभी स्कूल से बंक मारकर ईमली तोड़ने पहुंच जाते, एक दो पत्थर स्टेशन मास्टर की कुटिया की छत पर गिरते तो वह बाहर आकर चिल्लाता तथा कमरे में बंद करने की धमकी देता। हम डर कर भाग जाते, अगले दिन फ़िर वही हरकतें शुरु हो जाती। स्टेशन मास्टर के बच्चे भी हमारे साथ पढते थे, इसलिए स्टेशन मास्टर उत्पात झेल लेते थे। 112 साल से लगातार इस रेल लाईन पर गाड़ी चल रही है। सड़क मार्ग से साधन होने के कारण ट्रेन में दो-चार बार ही यात्रा करना नसीब हुआ। रायपुर से धमतरी, राजिम के लिए यह छोटी रेल चलती है, अभनपुर आकर एक लाईन धमतरी और दूसरी राजिम के लिए विभाजित हो जाती है, इसलिए अभनपुर जंक्शन रेल के मानचित्र में प्रमुखता से दिखाई देता है। कुछ दिनों बाद यह रेल बंद हो जाएगी, इसकी जगह बड़ी लाईन बनने वाली है।

छोटी गाड़ी का डिब्बा
बच्चे रोज रेल को देखते हैं, लेकिन इन्हे इसकी सवारी करने का कभी मौका नहीं मिला। लोग टॉय ट्रेन की सवारी करने मेले ठेले में जाते हैं, हमारे घर के पास से गुजरी ट्रेन में कभी बच्चे बैठे नहीं यही सोचकर निर्णय लिया कि भाई दूज के दिन बुआ जी के घर धमतरी चला जाए, भाई दूज भी मन जाएगी और बच्चे भी छुक-छुक गाड़ी की सैर कर लेगें। अभनपुर से धमतरी पहुंचने में 2 घंटे लगेगें, इसके हिसाब से बच्चों के लिए नाश्ता-पानी रख लेगें। शाम को तय हुआ कि बच्चा पार्टी और मैं सुबह 8 बजे वाली गाड़ी से धमतरी जाएगें और शाम 6 बजे धमतरी से आने वाली ट्रेन से वापसी करेगें। इस तरह एतिहासिक गाड़ी का सफ़र हो जाएगे। पुराने भूले बिसरे स्टेशनों एवं पैसेंजर हाल्ट की याद भी ताजा हो जाएगी। 1985 के आस-पास भाप के इंजन बदल गए, तब से डीजल इंजन चल रहे हैं। गाड़ी की स्पीड भी बढी है, जब डीजल इंजन प्रारंभ हुए थे तब अभनपुर से रायपुर पौन घंटे में पहुंच जाते थे। लेकिन पटरियों की जीर्ण हालत को देखते हुए गति कम कर दी गयी, अब सवा घंटा लग जाता है। ट्रेन भी स्टेशन तक न जाकर तेलीबांधा में ही रोक दी गयी है। बहुत कुछ बदलाव हो चुके हैं। अभनपुर से रायपुर का किराया 5 रुपया और धमतरी का किराया 7 रुपए है।

हनी
सुबह जल्दी उठने के बाद बच्चा पार्टी को जगाने लगा। कोई जागने को तैयार नहीं था, आदि ने आँख खोल कर देखा और जाने से मना कर दिया और फ़िर आँखे बंद कर ली। श्रेया-श्रुति के कान पर जूँ नहीं रेंगी, खूब जगाने पर भी नहीं जागी। उदय जाग गया एक आवाज में और तैयार होने बाथरुम में घुस गया। हनी भी जाग गयी, लेकिन हनी को ले जाने से परेशानी होनी थी, वह सुबह से शाम तक बिना श्रेया-श्रुति के नहीं रह सकती थी, मुझे हलाकान करती, उसे मना कर फ़िर सुला दिया, अब उदय और मुझे ही जाना था। स्टेशन पर पहुंच कर टिकिट ली, उदय की आधी और मेरी पुरी टिकिट 11 रुपए की आई। सोचा था कि ट्रेन में भीड़ नहीं होगी, लेकिन भाई दूज का असर इस ट्रेन पर भी दिखा। पहले इस ट्रेन में सिर्फ़ दो डिब्बे ही लगते थे, इसलिए इसे ग्रामीण दूडबिया गाड़ी कहते थे, अब 6 डिब्बे लगते हैं। एक डिब्बे में बैठने की जगह मिल गयी, उदय ने भी खिड़की की सीट संभाल ली। खिड़की से खेत खलिहान, नदी नाले देखने का मजा बच्चों को बहुत आता है, इसलिए खिड़की की सीट पर बैठना उन्हे अच्छा लगता है। उदय नजारों का मजा लेगा और मैने अपने साथ वैशाली की नगरवधू अम्बपाली को ले लिया,डेढ दो घंटे का सफ़र मजे से कट जाएगा।

स्टेशन पर भाई दूज
धमतरी,राजिम और रायपुर से आने वाली ट्रेन एक साथ ही स्टेशन पर पहुंचती है। दो महिलाएं धमतरी वाली ट्रेन से उतरी और दो पुरुष रायपुर वाली ट्रेन से, स्टेशन पर जय जोहार हुई भाई बहनों में। स्टेशन की बेंच पर बैठाकर बहनों ने भाईयों को तिलक निकाल कर मि्ठाई खिलाई, स्टेशन पर ही भाई दूज मनी देख कर बम्बई की आपा-धापी याद आ गयी, अब गाँवों पर भी शहरों का असर हो रहा है, समय कम होने पर परम्पराओं के कायम रखने की खुशी भी हैं। ट्रेन स्टेशन तो छूटी तो एक जोड़ा बच्चे सहित ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ने लगा। उन्हे देख कर गार्ड ने ट्रेन रुकवा दी। इस ट्रेन में टी-टी नहीं हैं, गाड़ी संचालन खर्च कम करने के लिए टी टी और क्रासिंग के गेट मेन हटा दिए, जब ट्रेन क्रासिंग पर पहुंच कर रुकती है तो एक गेट मेन ट्रेन से उतर कर गेट बंद करता है तब ट्रेन आगे बढती है। रायपुर से धमतरी तक सभी क्रासिंग पर यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। इस ट्रेन के संबंध में एक बार इंडिया टूडे में छपा था कि एक सब्जी वाली का टोकरा गिर जाने के कारण लोको पायलट ट्रेन को 7 किलोमीटर रिवर्स ले आया था। यात्री सेवा की इतनी बड़ी मिसाल पुरे भारत में कहीं नहीं मिलेगी। फ़िर भी लोग रेलसेवा को कोसते हैं।:)

जानकी बाई
ट्रेन चल पड़ी, उदय खिड़की से नजारे देख रहा था, भीड़ की धका पेल जारी थी। मेरे सामने एक वृद्धा बैठी थी, उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था। थोड़ी देर में दिमाग की बत्ती जल गयी, ह्म्म, ये तो फ़लाने सेठ की नौकरानी जानकी है, दांत झर गया है इसलिए पहचान नहीं पाया, उसने भी मुझे बचपन में देखा था इसलिए वह भी नहीं पहचान पाई, उससे बातचीत चली तो पहचान कर खुश हो गयी, अपने द्वारा सेठ के घर में 40 सालों तक किए गए काम का बखान करने लगी। उसकी यादों के पुराने पन्ने खुल चुके थे, उसके मोहल्ले के आस-पास के पुराने लोगों की चर्चा होने होने लगी। पहला स्टेशन चटौद आ चुका था, गाड़ी रुकी, सवारियाँ चढी और फ़िर चल पड़ी, अगला स्टेशन सिर्री था, साहू बाहुल्य बड़ा गाँव है, कुरुद ब्लाक का। थाना अभनपुर लगता था, शायद अब बदल कर कुरुद या भखारा हो गया हो गया होगा। जानकी बाई की कथा जारी थी, सेठ का गुणगान जारी था। सिर्री से गाड़ी आगे चलने पर एक गाँव अछोटी में गाड़ी के ब्रेक लग गए, यहाँ स्टॉप तो नहीं था पर सवारी को विशेष सुविधा देने के लिहाज से उसके उतरने तक गाड़ी रोक दी गयी। इस रुट पर गाड़ी गार्ड और पायलट की मर्जी से चलती है, रेल्वे के सारे कानून और नियम बस्ते में बंद रहते हैं।

सरसोंपुरी स्टेशन
कुरुद से चलकर सरसोंपुरी फ़िर संबलपुर फ़िर डेढ घंटे के भीतर गाड़ी धमतरी पहुंच चुकी थी। धमतरी स्टेशन पर उतर कर बुआ जी के घर पहुंचे। कुछ देर बाद याद आया कि डीआईजी हिमांशु गुप्ता जी भी धमतरी में ही हैं, उन्हे फ़ोन लगाया तो पता चला कि कुछ तबियत नासाज है, मैने फ़िर कभी धमतरी आने पर मिलने का वादा किया। अम्बपाली वैशाली के कानून को धिक्कृत कर रही थी, वैशाली के कानून धिक्कृत कहने के कारण संथागार में उत्तेजना फ़ैली हुई थी, वैशाली ने जनपद कल्याणी का पद ग्रहण करने के लिए तीन शर्तें रख दी थी। उसके पिता महानामन भरी सभा में अपनी बात रख रहे थे। नगर के श्रेष्टी और युवा अम्बपाली के शर्तों को मानने के लिए तैयार थे। गणपति ने आखरी शर्त में संसोधन के साथ अम्बपाली की शर्ते मान ली और महाबलाधिकृत क्रोध के मारे अपने पैर पटक रहे थे। वाद-विवाद के पश्चात महाबलाधिकृत अम्बपाली को शर्ते मानने की सूचना देने नीलपद्मप्रासाद में पहुंच गए। अम्बपाली उनकी खबर ले रही थी और मुझे नींद आ गयी।

भाई दूज
शाम 5 बजे नींद खुलने पर पता चला की अम्बपाली की शोभायात्रा सप्तप्रसाद पहुंच रही है, उसका जनपद कल्याणी के पद पर अभिषेक कर दिया गया। इधर हमारी भी वापसी का समय हो रहा था। बुआ जी ने तिलक लगा मौली बांध कर भाई दूज की परम्परा का निर्वहन किया। उदय भी बुआ जी के घर पहली बार पहुंचा था। छुक छुक ट्रेन के माध्यम से मिलन संभव हुआ। स्टेशन पर ट्रेन लग चुकी थी। मै गार्ड से कुछ जानकारी ले रहा था, तभी गोविंद दारु के नशे में हिलते डुलते पहुंचा, मेरे से पा लागी किया और गार्ड को नमस्कार और बोला - पहचाने क्या आप मुझे? गार्ड ने इंकार किया, तो बोला लखन के बहिन दमांद हंव। तो मैने कहा फ़िर टिकिट लेने की क्या जरुरत हैं, बैठो गाड़ी में, पहचान तो बता ही दिए हो। वह ट्रेन में बैठ लिया। भारतीय रेल इस तरह छोटी गाड़ी की सेवा बेरोकटोक 112 वर्षों से दे रही है, जो टिकिट ले उसका भी भला, जो न ले उसका भी भला। गंतव्य तक साधुभाव से बिना किसी भेदभाव के पहुंचा रही है। ईंजन ने सीटी बजा दी मैं, उदय और अम्बपाली चल पड़े गंतव्य की ओर............।

सोमवार, 3 जनवरी 2011

नव वर्ष का धमाल--देवी आम्रपाली के सप्तप्रासाद में

किवाड़ों पर दस्तक हुई, मैने उठकर कुंडी खोली, समक्ष प्रतिहार था, करबद्ध स्वर्णखचित संदेश पेटिका लिए।

“भन्ते! आपके लिए आम्रपाली का विशेष संदेश है।“ उसने  रेशम के कोमल सुगंधित मलमल में लिपटा हुआ पत्र मुझे दिया और मुड़ गया। आम्रपाली का पत्र पाकर मेरी भी उत्सुकता बढ गयी कि जनपद कल्याणी क्या आयोजन कर रही है? जिसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया है।

मैने पत्र खोला, उसमें लिखा था –“ आर्य! नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं, धिक्कृत गणराज्य के सप्तप्रासाद में  विशेष आयोजन है। बीत रहे वर्ष की ढलती सांझ से लेकर नव वर्ष की पहली किरण तक। इस रंगारंग कार्यक्रम में आप सादर आमंत्रित हैं।“

विशेष:- पूर्ण मनोरंजन की व्यवस्था है। नृत्य  मंच को नई रंगत दे दी गयी है। ब्लॉगर्स के लिए चायनिज, कांटिनेंटल के संग उम्दा कॉकटेल की व्यवस्था है। मुन्नी बदनाम एवं शीला की जवानी नृत्य का विशेष प्रयोग किया जाएगा।

अहो भाग्य! देवी कल्याणीSSS  नव वर्ष का स्वागत वैशाली की नगर वधू आम्रपाली के संग, सोच कर ही आनंद की लहरियाँ उठ रही थी। दीदे रौशन हो चुके थे। हमारा पीलवान पूर्व से ही तैयार था मुन्नी बदनाम के नृत्य  दर्शनार्थ।

दीप जल उठे थे, सप्त भूमि प्रासाद एवं हमारा हृदय द्वार उन्मुक्त था। सर्वत्र  दीप मालिकाएं झिल- मिला रही थी। बांदी, चेटी, और दण्डधर प्रबंध व्यवस्था में व्यस्त हो आ-जा रहे थे।

तभी मदलेखा ने तीव्रता से उपस्थित होकर पूछा-“देवी! सिंह द्वार पर मंत्री, संत्री, चेयरमेन, मेयर, पार्षद, बाहू बली, पत्रकार इत्यादि प्रासाद में प्रवेश की अनुमति चाहते हैं।“

“मदलेखा! दण्डधर से कह दो कि जनपद कल्याणी के विशेष अतिथि मित्र ब्लॉगर्स आमंत्रित हैं। आज उनके लिए ही दरवाजे खुलेगें। वे चले जाएं”।

हम संध्या वेला में ऊँट गाड़ी पर सवार होकर सपत्निक पहुंच गए आम्रपाली के सप्तप्रासाद सिंह द्वार पर। हमारी अधीरता से प्रतीक्षा हो रही थी। सिंह द्वार पर व्योमबालाएं पुष्प वल्लरियों एवं चार्ली की सुगंधित फ़ूहारों से अतिथियों का स्वागत कर रही थी।


मदलेखा ने नामारुप घायल करने वाली बंकिम दृष्टि डाली –“देवी आम्रपाली आपकी पतीक्षा कर रही हैं आर्य। आपका स्वागत है”। श्रीमती मुस्काई और बोली-" वाह! क्या झकास आयोजन है।

हमने अंतपुर की ओर प्रस्थान किया। सुंदर सजे हुए प्रसाद के सभी अलिंदों पर फ़्लेक्स बेनर लगे हुए थे जिनमें अशोक भाई का नारा लिखा हुआ था-“नशा है खराब-झन पीहू शराब”।

छठवें अलिंद में पहुंचे तो प्रतिहारों और बांदियों ने स्वागत किया, उन्मुक्त द्वार से ही छटे हुए ब्लॉगर देवी आम्रपाली के सानिध्य में दृष्टिगोचर हुए।

प्रथमत: हमारी दृष्टि आसंदी पर गाव तकिया लगाए मद्य पात्र करधारित जी.के.अवधिया पर पड़ी, मुन्नी बदनाम पास हिंडोले में बैठ कर पात्र में मद्य ढाल रही थी। जी.के.अवधिया उसकी हिन्दी ब्लॉगिग की सार्थकता पर क्लास ले रहे हैं।

धीमें स्वर में मधुशाला की स्वर लहरियाँ वातारवरण को मादक बना रही थी। अलबेला खत्री अपनी आने वाली फ़िल्म का सीन देवी लतिका को समझा रहे है, हीरोईन जो कास्ट करना है।

बी.एस.पाबला चौकी पर बैठ कर लैपटॉप से किलोल कर रहे हैं। गिरीश बिल्लौरे बुमबजर पर लाईव टेलीकास्ट की तैयारी में लगे। राज भाटिया बीयर का गिलास भर रहे थे काष्ठ गोलक से। फ़ेनिल बीयर उनके पात्र में शोभायमान हो रही है। नीरज जाट हैंडी कैम लेकर आयोजन का चित्रण कर रहे हैं।

चिर युवा ब्लॉगर राजीव-संजु तनेजा, पद्म सिंग, इंदुपुरी, खुशदीप सहगल, संजय भास्कर, केवल राम डांस फ़्लोर पर थिरक रहे हैं। नरेश सिंह राठौड़ और रतन सिंह शेखावत परम्परागत राजस्थानी वेशभूषा में हुक्का गुड़-गुड़ाते ताऊ की बाट जोह रहे हैं, अविनाश वाचस्पति का लिखित स्वागत भाषण कहीं खो गया, उसकी तलाश में हैं। सतीश सक्सेना नए कैमरे से खटा-खटा चित्र खींच लगे। अजय झा, शाहनवाज लैपटॉप पर पोस्ट लगाने की तैयारी में हैं। शिवम मिश्रा वार्ता के लिए चिंतित दिखाई दे रहे हैं, आज की वार्ता कौन लगाएगा?

सुंदरी कुमारियाँ रत्नावलियाँ कंठ में धारित कर, लोघ्ररेणु से कपोल-संस्कार कर,कमर में स्वर्ण-करधनी और पैरों में जड़ाऊ पैजनी पहन, आलक्तक पैरों को कुसुम स्तवकवाले उपानहों से सज्जित करके कोमल तंतुवाद्य और गम्भीर घोष मृदंग की धमक शुद्ध-स्वर-ताल पर उठाने-गिराने और भू पर आघात करने लगी। उनकी नवीन केले के पत्ते के समान कोमल और सुंदर देहयष्टि पद-पद पर बल खाने लगी।

उनके नूपुरों की क्वणक ध्वनि ने प्रकोष्ठ के वातावरण को तरंगित कर दिया। वे थिरक-थिरक कर सावधानी से और व्यवस्था के साथ स्वर-ताल पर पदाघात कर मद्य की लाली में मद विस्तार कर रही थी। उनके गण्डस्थल की रक्तावदान कांति देखकर महुआ रस से पूर्ण मदणिक्य-शुक्ति के सम्पुट की याद आने लगी।

हम मंत्रमुग्ध से ताक रहे थे, श्रीमती जी बोली-“ यहीं खड़े रहेगें क्या? सहसा तंद्रा टूटी, देवी आम्रपाली ने कहा- “चित्रक पर स्थान ग्रहण करें आर्य।“

जर्मनी से आए ब्लॉगर राज भाटिया की आवाज माईक पर गुंजी-“ आर्यवीरों! जनपद कल्याणी देवी आम्रपाली ने आज सिर्फ़ ब्लॉगर्स के लिए आनंद के दीप प्रज्ज्वलित  किए है। सप्तभूमि प्रासाद में सभी का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ। यह कोई ब्लॉगर मीट नहीं है जहाँ गंभीर चर्चा होगी।देवी आम्रपाली का नि्जी ब्लॉगर परिवार सम्मिलन है, इसलिए खाएं-पीएं परिचय बढाएं, नृत्य एवं उम्दा भोजन का आनंद लें। आज की वेला को यादगार बनाएं और नव वर्ष की पहली किरण का आनंद पूर्वक स्वागत करें। उषा की पहली किरण आपके जीवन में सकारात्मक उजास भरे और नयी उर्जा विश्वास एवं आशा के साथ नव वर्ष में पदार्पण करें“ फ़िर उन्होने एक गीत गाया-“ आज गा लो मुस्कुरा लो महफ़िलें सजा लो।

सहसा अंतर सोहिल का आगमन हुआ बोले-“धुंध के कारण सांपला से आने में विलंब हो गया और तनिक विलंब श्रीमती जी के तैयारी से हो गया नहीं तो टैम पे पहुंच ही जाते।“आर्य आपका स्वागत है,कह कर मदलेखा ने बंकिम कटाक्ष के साथ एक पात्र उनके हाथों में थमा दिया।

हम भी कौन सा पीछे रहने वाले थे दो मदरस पात्र एक साथ कंठ में उड़ेल कर अनिंद्य सुंदरियों का नृत्य देखने लगे। प्रमोद कानन में हंसी के ठहाके और मुस्कान बिखर रही थी। आम्रपाली की मंद मंद मुस्कान सबको उन्मादित कर रही थी।

महाकवि योगेन्द्र मौदगिल एवं बवाल उपधानों के सहारे अधलेटे मदरस का आनंद ले रहे हैं। षोडशी कामिनी उन्हे स्वयं मदरस ढाल-ढाल कर पिला रही थी। वे कामिनी से कहने लगे-“तुम्हारे हाथों के मदरस की बात ही कुछ और है। जीईइस्सा आ ग्या, दिल से काव्य निर्झर फ़ूट पड़ा।“

डी जे पे नया गाना लग चुका है " मैडम बैठ बोलेरो में, तेरी खातर स्पेशल लाया"। अब मेरे से रुका नहीं गया, जब बात स्पेशल की हो तो जाना ही पड़ेगा। महाकवि योगेन्द्र मौदगिल ने डी जे पे मचा दिया धमाल, दे धमा धम धम, हम जम के नाचे।

तभी आवाज आई –“ मेरे से पंगा नहीं लेना। नहीं तो माँ बहन एक कर दूंगी। मेरा भी नाम इंदूपुरी है। हां एसीच्च हूँ मैं।“

“दीदी आपसे पंगा ले किसकी हिम्मत है? देखो आपका सारा परिवार यहीं है, बुलाऊं क्या चंदु के पापा को।“ -श्रीमती जी ने कहा।

“माँ ! मेरे रहते आपसे कोई पंगा ले, उसकी तो सुसरे/सुसरी की मैं……….।“पद्म सिंह ने सिंहनाद किया

हल्ला-गुल्ला सुनकर सतीश सक्सेना आ गए –“इंदु माँ, डोन्ट वरी, अपुन है ना। आप डी जे का मजा लो। पार्श्व में राजीव तनेजा मंद मंद मुस्कुरा रहे थे आम्रपाली की तरह, एक कहानी का मसाला जो मिल गया।

आधुनिक और प्राचीन दोनो मंच सजे हुए थे। पसंदानुसार आनंद लिया जा रहा था। जी के अवधिया शीला से एक पुराने गाने की फ़रमाईश को लेकर उलझे हुए थे। कह रहे थे –“ देवियों सुधा वर्षण बहुत हुआ, अब मुझे आवारा फ़िल्म का गीत “जब से बलम घर आए।“ बस यही सुनने की इच्छा है भले जी इसके पश्चात प्राण निकल जाएं। "आज फ़िर जीने की तमन्ना है आज फ़िर मरने का इरादा है।“

पाबला जी ओर दृष्टिपात किया तो कुछ सतर्क दिखाए दिए। पता चला कि कोई नए वायरस का आगमन होने वाला है। उनके सैनिकों ने सतर्क रहने के लिए कहा।

“ कोई गल नइ प्राव्हां मेरे, वायरस नुं तो साड्डे फ़ौजी ठिकाणे ला देगें। आओ लस्सी पीओ और डी जे दी मौज लो"- हमने कहा।“मितरां दी छतरी ते उड़ गयी”- अब भांगड़ा पाया जाणे लगा।

आम्रपाली को भी जोश आ गया। उसने भी सब पर लीला कटाक्ष करते हुए ठुमका लगाया। ओए होए, क्या कहने? अलबेला खत्री कूद पड़े, “काळ्यो कूद पड़यो मेळा में, सायकिल पंचर कर ल्यायोSSSSS। फ़िर तो जम कर धमाल होने लगा।

योगेन्द्र मौदगिल ने इशारे से मुझे और सतीश सक्सेना को बुलाया, बताया कि साकी व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रही है। विशेष कक्ष में पहुचे। पीछे-पीछे आम्रपाली भी चली आई। उसने तीन मदरस पात्र भरकर अपने हाथ से तीनो मित्रों को अर्पित किए और कहा-“ मेरे सर्व श्रेष्ठ तीनों मित्रों की स्वास्थ्य-मंगलकामना से ये तीनों पात्र परिपूर्ण हैं।“ हमने पात्र थाम लिए। पुन: बोली-“कहें आर्य! मैं आपका और क्या प्रिय कर सकती हूँ। व्यवस्था में तो कोई न्युनता नहीं है?”

समवेत स्वर निकला-“ आपकी उत्तम व्यवस्था से हम मुदित हैं। मुफ़्त का खाना, मुफ़्त का पीना और मुफ़्त में आनंद, फ़िर क्या चाहिए हमें। इससे प्रिय क्या हो सकता है? हम अनुग्रहित हैं देवी जनपद कल्याणी आम्रपाली, कहीं जले-भूने आर्य बलाधिकृत से पंगा न हो जाए :)

वह उठ कर खड़ी हुई और तीनों का हाथ पकड़ कर बोली –“निश्चिंत होकर प्रस्थान करो आर्य, उससे मुझे निपटना आता है। रात गहरा गयी  है, आपकी रात्रि सुख-निद्रा सुखस्वप्नों की हो, प्रात:वेला का सूरज आपके जीवन में आनंदमयी प्रकाश भर दे।

“अभी प्रस्थान की वेला नहीं आई। ठहरो देवी आम्रपाली ठहरोSSSSSS।“ मैने जोर से हांक लगाई।

तन-मन भीगा-भीगा लगा, आँख खुली तो देखा सारा बदन भीगा, श्रीमती जी हाथ में पानी की बाल्टी लिए सर पर खड़ी थी। -“कब से जगा रही हूँ उठते नहीं हो? और ये मुई आम्रपाली कौन है? जिसका नाम लेकर चिल्लाए जा रहे हो?

(निर्मल – हास्य)  नूतन वर्ष की मंगल कामना