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शनिवार, 10 सितंबर 2011

न मे स्तेनो जनपदे, न कर्दयो, न मद्यपो -- ललित शर्मा


रेलवे स्टेशन पर ८ से १२ साल के बच्चों का एक समूह घूम रहा था. सभी ने गंदे कपडे पहन रखे थे और उनके हाथ में रुमाल के साइज का एक कपडा था. जिसे वे थोड़ी-थोड़ी देर में सूंघ रहे थे. उनकी आँखे लाल थी, जैसे कोई नशा कर रखा हो. उनके मुंह से सुना - "सिलोशन कम हो गया." ह्म्म्म तब मेरी समझ में आया कि इनके हाथ के रुमाल में एड्हेसिव है, जिससे ट्यूब में पंचर लगाया जाता है. तभी पुलिस वाला आया उसने एक बच्चे की जेब से बोनफिक्स की ट्यूब निकली. पता चला कि ये सब बोनफिक्स के सिलोशन को सूंघते हैं. अगर सिलोशन नहीं मिला तो स्टेशन के बाहर खड़ी गाड़ियों का पैट्रोल निकाल कर सूंघते हैं. उससे भी नशा होता है. इस खतरनाक नशे से ये धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ रहे है. नशे में यही लोग स्टेशन में अपराध करते हैं. इन्हें सिर्फ नशे के लिए पैसा चाहिए.


एक दिन दौरे में जा रहा था. दो मित्र भी साथ में थे. रास्ते में एक शहर में एक मित्र ने गाड़ी रुकवाई और मेडिकल स्टोर से खांसी की दवाई ली. कोंडागांव में जाकर होटल में डेरा डाला. सुबह जब सोकर उठा तो देखा कोरेक्स की वह शीशी खाली पड़ी थी. मैंने उससे पूछा कि शीशी पूरी कैसे खाली हो गई? दवाई गिर गई क्या? तो उसने कोई जवाब नहीं दिया. साथ वाले ने बताया कि उसने रात को पूरी शीशी की दवाई पी ली. मैंने कारण पूछा तो उसने बताया की खांसी की १०० ग्राम दवाई में दारू की आधी बोतल का नशा होता है और दारू की खुशबु भी नहीं आती. नशे की मौज ही रहती है. तब मैंने पहली बार जाना कि खांसी की दवाई का भी नशे के लिए प्रयोग हो रहा है. जानकारी लेने पर ज्ञात हुआ कि मेडिकल स्टोर्स में सबसे अधिक खांसी की दवाई ही बिकती है. पहले आयुर्वैदिक दवाई के रूप में मृतसंजीवनी सूरा का चलन था, शायद अब वह बंद हो गई है. आयोडेक्स का प्रचलन तो बहुत दिनों से नशे के रूप में हो रहा है. 

बरसों पहले दिल्ली में हम कुछ मित्रों के साथ पुरानी दिल्ली में रुकने का ठिकान ढूंढ़ रहे थे. सीनियर तिवारी जी बोले किसी धर्मशाला में रुकते हैं. फतेहपुरी के पास की एक दह्र्म्शाला में पहुचे तो उसने हमें आश्रय देना मंजूर कर लिया. जब भीतर जाने लगे तो हमारे साथ युसूफ भाई को देखकर उसने जगह होने से मना कर दिया. अब हम वही पर बगल के होटल में रुके. जब मैं फोन करने पंहुचा तो काउंटर पर मौजूद व्यक्ति के पास एक आदमी आया और उसने २५० रूपये दिये. जिसके बदले में काउंटर वाले ने एक छोटी सी पुडिया दी. कुछ खटका लगा कि गड़बड़ है. मैंने मित्रों को बताया और वह होटल रात को छोड़ दिया. पूछने पर पता चला कि वह ब्राउन शुगर बेच रहा था. आप आज भी देख सकते हैं चांदनी चौक से दरियागंज वाले चौक तक सड़क के फुटपाथ पर माचिस की तीलियाँ और एल्युमिनियम की पन्नियों के ढेर मिल जायेंगे. यही स्थिति कनाट प्लेस से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक है. खुले आम मौत का सौदा हो रहा है.

कुछ दिनों पहले सुमित दास ने एक लडके को बोनफिक्स के साथ पकड़ा. वह बोनफिक्स छोड़ ही नहीं रहा था. कई लोगों ने मिलकर उससे बोनफिक्स छिनी. वह नशे की गिरफ्त में इतना फँस चूका है कि नशे के अलावा कुछ भी नहीं सोच सकता. सिर्फ सिलोशन ही सिलोशन की रात लगाये हुआ था. सुमित कहने लगा कि इलाके के अधिकतर नौजवान लड़के नशे का शिकार होकर पागल हो चुके हैं. गांजे की चिलम पीने के कारण पायरिया आदि से दांत जल्दी गिर जाते हैं. कम उम्र के लोग नशे के शिकार होकर काल के गाल में समा रहे हैं. फिर भी इनका हश्र देखकर लोग चेत नहीं रहे हैं. नशीले रासायनिक पदार्थों की सहज उपलब्धता से नशेड़ियों की संख्या में वृद्धि हो रही है. नींद की गोलियों एवं दर्द निवारक दवाओं का धडल्ले से प्रयोग हो रहा है. जबकि गांजा या नशीले पदार्थ बेचने वाले के नारकोटिक्स एक्ट में जमानत ही नहीं है. नशीले पदार्थों का धडल्ले से बिकना बिना पुलिस संरक्षण के संभव नहीं है. 

वनस्पतियों से प्राप्त होने वाले मादक पदार्थों का प्रचलन प्राचीन काल से रहा है। गाँजा, अफ़ीम, भांग-धतुरा मद्य इत्यादि प्रचलन में था, आज भी है। आदिम काल में मानव इसका उपयोग चोट लगने पर दर्द से राहत पाने के लिए करता था। नशे से आनंदाभूति होने के कारण इसका दास बन गया। तथाकथित साधु संतों में इसका प्रचलन रहा है। मंदिरों में भांग-धतुरा, मद्य चढता है। लोगों ने नशीले पदार्थों को सामाजिक मान्यता देने के लिए धर्म से जोड़ कर रास्ते निकाल लिए। युद्धकाल में अफ़ीम(अमल) एवं मद्य का सेवन सैनिक करते रहे हैं। वर्तमान में सैनिको शराब देने का प्रचलन सेना में है। शराब देने के अन्य कारण भी हो सकते हैं। लेकिन नशाखोरी एवं नशाखोरों का अपना एक अलग इतिहास है। एक समय था कि समाज में नशा करने वाले को स्थान प्राप्त नहीं था। 


छान्दोग्य उपनिषद कहता है कि राजा विश्वपति ने गर्व से घोषणा की थी--" न मे स्तेनो जनपदे, न कर्दयो, न मद्यपो। नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुत:॥ (अर्थात -"मेरे राज्य में न चोर है, न कायर है, न मद्यपान करने वाले लोग हैं, न अग्निहोत्र न करने वाले लोग हैं, न मुर्ख हैं, न व्यभिचारी हैं, न व्याभिचारिणी हैं।") यही यथार्थ शासन का आदर्श होता था। नशे की बुराईयों को देखते हुए समाज ने इसे सहजता से ग्राह्य नहीं किया। कुछ पंथों ने स्वार्थवश इसे धर्म के साथ जोड़ कर मोक्ष दायी बना दिया। वैदिकों ने पुरुषार्थ चतुष्टय एवं अष्टांग योग के माध्यम से अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिविग्रहा यमा:, शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा: बता कर मोक्ष का मार्ग दिखाया। तो वाममर्गियों ने कहा -- मद्यं मांसम मीनं मुद्राम मैथुनम एव च.. एते पञ्च मकारा: स्योरमोक्षदे युगे-युगे.......... शराब पीने वालों को भी मोक्ष का मार्ग दिया..... पीत्वा पीत्वा पुन: पीत्वा यावत पतति भूतले, पुनारुत्थाय पुन: पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते. नशा करके मरना मोक्ष प्राप्ति का सरल मार्ग बताया है. पुरुषार्थ चतुष्टय एवं अष्टांग योग से पूरा जीवन लगा जाता है मोक्ष प्राप्त करने में.
गुजरात को छोड़ कर सभी राज्य सरकारें शराब बेच कर राजस्व कमा रही हैं। राजस्थान सरकार तो बाकायदा "हैरिटेज वाईन" बेच रही है। वर्त्तमान में नए तरह के नशे सामने आ रहे हैं जो बहुत ही हानिकारक हैं. छोटी उम्र के बच्चों में इनका प्रसार हो रहा है, जो उनके जीवन के लिए घातक है. इसके निवारण के क़ानूनी कार्यवाही के साथ सामाजिक जागरण की आवश्यकता है. जिससे नशे के शिकार लोगों का सामाजिक पुनर्वास हो सके. पालक अपने बच्चों पर सतत निगाह रखें. जिससे वे नशे जैसे दुर्व्याषा के चक्कर में ना पड़ें. तभी राजा विश्वपति जैसे गर्व से घोषणा करने के भागी बन सकते हैं. ऐसा न हो कि एक तरफ खुले आम नशे के सामान बेचकर राजस्व कमाया जाये, दूसरी तरफ उसी पैसे से नशा मुक्ति के शिविर लगाये जाएँ एवं नशामुक्ति का प्रचार-प्रचार प्रसार किया जाये.


मंगलवार, 24 मई 2011

वो कालेज के दिन, वो तितलियाँ और भंवरे --- ललित शर्मा

डॉ.कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री जी ,जय प्रकाश जी एवं ललित शर्मा
आरम्भ से पढ़ें  रात को ही केवल ने चेता दिया था की आज सुबह जल्दी तैयार होना है. उनके स्टडी सेंटर में हिंदी विभाग, पत्रकारिता विभाग एवं अंग्रेजी विभाग के संयुक्त तत्वाधान में "हिंदी भाषा एवं न्यू मीडिया: चुनौती और संभावनाएं" विषय पर सेमिनार रखा गया है. सुबह हम जल्दी तैयार हो गए थे ११ बजे हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय के क्षेत्रिय स्टडी सेंटर धर्मशाला में पहुँच गए. यहाँ हमारी मुलाकात पत्रकारिता विभाग के जय प्रकाश जी से हुयी. बनारस के रहने वाले अच्छे व्यक्ति है. इनकी पत्रकारिता जैसे विषय पर गहरी पकड़ है. इन्होने मुझसे बस्तर की घटनाओं के विषय में चर्चा की. इसके पश्चात् केंद्र के निदेशक डॉ.कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री जी से भेंट हुयी.

अंग्रेजों के ज़माने का कालेज 
बिलासपुर जिले के बिल्हा अग्रसेन महाविद्यालय के समाजशास्त्र के सेमिनार में व्याख्यान के पश्चात काफी दिनों बाद कालेज के विद्यार्थियों से रूबरू होने का मौका मिला था. यहाँ पहुच कर मुझे भी अपने कालेज के बीते दिन याद आ गए. कालेज के दिनों की यादें किताब में दबे हुए किसी फूल की खुशबु जैसी ही थी. इस कालेज की स्थापना अंग्रेजों के समय में १९२६ में हुयी थी और २००० में यह अपनी प्लेटिनम जुबली मना चूका है. वैसे अध्ययन की दृष्टि से अच्छी जगह है और मौसम भी अच्छा है. कालेज कैम्पस भी बहुत सुन्दर है. अभी भी अंग्रेजो की बनायीं हुयी ईमारत में ही लगा रहा है. जिसमे ठण्ड में गर्मी के लिए बुखारी लगी हैं, जिसकी चिमनियाँ ईमारत की छत से नजर आती हैं. कालेज कैम्पस हरा-भरा है. तरह-तरह के फुल खिले हैं. तितलियाँ और भंवरे भी पुष्प रज का आनंद ले रहे हैं. इस कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट यहाँ और यहाँ भी पढ़ सकते हैं.

केवल राम जी- राम राम जी
कार्यक्रम के पश्चात केवल राम जी विद्यार्थियों के लिए कालेज केंटिन में स्वल्पाहार की थी. एक बात तो कहनी पड़ेगी, केवल अपने विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय हैं. उन्हें अपने विषय की अच्छी समझ है. विद्यार्थी भी उनका प्रेमादर करते हैं. जब कैंटीन में पंहुचा तो ऐसा लगा के हमारे ज़माने की कैंटीन और आज की कैंटीन में कोई खास फर्क नहीं है. थोडा सा तो बदलाव हुआ है. अब लड़के और लड़कियां बेझिझक साथ बैठते हैं और २५ साल पहले थोड़ी दूरी थी. यहाँ मेरा एक नए शब्द से परिचय हुआ "संघी चबूतरे". अच्छा शब्द है और अपनी व्याख्या स्वयं ही कर देता है. कैंटीन में संघ के प्रचारक संजीव से भी मुलाकात हुयी. हमें भी वो दिन आये जब आपात काल के समय शाखा लगाया करते थे और दक्ष होकर "नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।" गाया करते थे. बाद में हमारा संघ लिंक टूट गया था.

IPL- क्रिकेट स्टेडियम 
अपरान्ह हम पैदल-पैदल घुमने निकले. पुलिस लाइन होते हुए क्रिकेट स्टेडियम तक गए. जहाँ IPL के मैच होने थे.स्टेडियम सुन्दर चटक रंगों से सजाया गया है. इस स्टेडियम का मैदान उलटी रकाबी की तरह है. ३० गज के दायरे के बाहर बाल निकलने के बाद पकड़ में नहीं आने वाली, चौका पक्का मानकर चलो. पुलिस ग्राउंड में फुटबाल का मैच चल रहा था. आर्मी का बैंड बज रहा था. अफसर भी मौज लेने के सारे तरीके लगा ही लेते हैं. धर्मशाला में पैदल चलना याने चढ़ाई और उतराई ही है. चढ़ते समय घुटनों पर जोर पड़ता है और उतारते समय एडियों की मरम्मत हो जाती है. तिब्बती लामा घूमते हुए मिल रहे थे. एक हाथ में माला लिए जप चल रहा था."काम करते रहो, नाम लेते रहो. प्रभु के प्रति समर्पित रहो."

ग्राउंड प्लेन -- शहीद स्मारक
वैसे धर्मशाला कांगड़ा जिले का जिला मुख्यालय है. धौलाधार की घाटियों के बीच बसा सुन्दर नगर है. जगह-जगह पानी की टंकियां लगी हैं जहाँ से यात्री जल ले सकते हैं. ठंडा पानी चश्मे से आता है. चश्मे का पाने निर्मल होता है. जिसमे खजिन यौगिक भी होते हैं. हमने देखा कि एक जगह कालेज का नया ओडोटोरियम बन रहा है. डिज़ाइन तो अच्छा था. पैदल चलते-चलते हम शहीद स्मारक आ गए. जहाँ शहीदों की याद में स्मारक बना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी. शहीद स्मारक के सामने एक फाईटर प्लेन खड़ा है. साथ ही टैंक और हस्तचालित तोपें, जो युद्ध में काम आ चुकी हैं यहाँ रखी है. आस-पास हरियाली है और इस मौसम में तो पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा जवान हो जाता है. यहाँ एक ओपन थियेटर भी बना हैं, जहाँ नाटक खेले जाते हैं. हमारे यहाँ भी है मुक्ताकाश.

भूतपूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश शांता कुमार जी और मैं
शहीद स्मारक का निर्माण तत्कालीन मुख्यमंत्री शांताकुमार जी ने कराया था. शांताकुमार जी से मेरा परिचय १९९८ में हुआ था. बड़े ही सज्जन व्यक्ति हैं. उनके यहाँ कोई अनजान भी समस्या लेकर चला जाये, उसे वही सम्मान मिलता है जो परिचित को मिलता है और उनका काम तत्काल होता है. इस स्मारक पर शहीद सैनिको के नाम खुदे हैं. मैंने भी ह्रदय से शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की. यहाँ शाम के समय बहुत सारे सैलानी आते हैं. शहीद स्मारक में ५ रूपये की टिकिट लगती है. साथ ही एक रेस्टोरेंट भी है. जब हम पहुचे तो दो ही टेबलों पर लोग थे. एक टेबल पर दो तिब्बती लेपटोप पर कुछ देख रहे थे और दूसरी टेबल पर मोटी-मोटी कजरारी आँखों वाली दक्षिण भारतीय त्वंगी मोबाइल पर लगी हुयी थी. हमने भी वहीँ डेरा डाल लिया. एक-एक आइसक्रीम लेकर कुछ टाइम पास किया. इसके सामने ही रेडिओ स्टेशन है. मोबाइल पर एक गीत " आज पीने की दावत है यारों, चाँद पर बैठ कर हम पीयेंगे" हमने भी सुना.

बहुत स्पीड है हिमाचल में
अब फिर ११ नंबर की सवारी से चल पड़े ठिकाने की ओर.... रास्ते में एक बोर्ड लगा देखा, मैंने उसका एक चित्र लिया. सोचा की कभी काम आ जायेगा. घर पहुचने पर खाना बनाया गया. केवल कुछ नानवेज बनाना चाहता था और मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. साग-भाजी से ही काम चलाया जाये वही ठीक है. लाल किले के सामने से निकले तो वही भीड़ लगी हुयी थी. यहाँ भीड़ कम ही नहीं होती. कुछ हमारे छत्तीसगढ़िया बंधू भी खड़े सोच रहे थे कि अब खरीद ही लिया जाय. आज तो इतना कमा ही लिए हैं. घर पहुच कर अगले दिन की प्लानिंग में जुट गए. कल जाना है मैक्लोडगंज याने दलाई लामा के घर उसके पश्चात एक हिमाचली धाम में जाना है. सोचा की इसी बहाने हिमाचली गाँव की सैर भी कर लेंगे. ग्रामीण जन-जीवन के विषय में कुछ जानेगे....... आगे पढें…

सोमवार, 23 मई 2011

मेट्रो पिलर नंबर 420 और दाड़ी के लिए बस --- ललित शर्मा

ललित,संजीव,राजीव,गिरीश,अवधिया,बी.एस.पाबला
आरम्भ से पढ़ें  दिल्ली की सुबह हुई.. गुरुदेव जल्दी स्नान करके झोला लेने चले गए. सामान काफी हो गया था. इसलिए झोले की जरुरत पड़ गयी. मैंने आधा सामान गुरुदेव को थमाया और आधा अल्पना जी को. पाबला जी के रूम में पहुचे तो गिरीश बुलेरो लिहाफ में थे. चाय-चाय चिल्ला रहे थे. बिना चाय के इनकी नींद ही नहीं खुलती. चाय थोड़ी देर में आई. गिरीश जी ने आँखें खोली. फिर स्नानादि के पश्चात दही पराठों का आर्डर दिया गया. छक के नाश्ता किया. तब तक राजीव तनेजा जी पहच चुके थे. मुझे उनके यहाँ जाना था. और पाबला जी, संजीव तिवारी जी, जी.के अवधिया जी को सुनीता जी के यहाँ स्नेह भोज पर, अल्पना जी को फ्लाइट पकडनी थी. इसलिए वे होटल में ही रुक रही थी. इनकी फ्लाइट शाम की थी. गिरीश जी की ट्रेन दोपहर को थी. उन्हें जबलपुर जाना था, निजामुद्दीन से, हम साथ साथ ही चले. चलते-चलते सब से विदा ली. फिर मिलने के वादे के साथ.

ब्लॉगर मस्ती-- आ जा जरा नच के दिखा.
सुनीता+पवन जी के यहाँ कल की शार्ट मीट यादगार रहेगी. काफी आनंद आया. राजीव जी के साथ चल पड़े उनके घर की ओर. रास्ते में मशहूर दही-भल्ले की दुकान थी. वहीँ से राजीव जी ने दही भल्ले लिए. कहा कि ब्लोगिंग करते हुए बैठ कर खायेंगे. घर पहुचने पर बच्चों से मुलाकात हई. माणिक भी अब बड़ा हो गया. एकाध वर्ष में कद राजीव जी के बराबर हो जायेगा. थोड़ी देर नेट पर बिताने के बाद भाभी जी (संजू तनेजा) का आदेश आ गया था, खाना तैयार है. मैंने तो नाश्ता ही भरपूर कर लिया था. थोड़ी बहुत भी जगह खाली नहीं थी. फिर भी चावल, राजमा ले ही लिया. दही भल्ले भी लिए. भोजनोपरांत राजीव जी के कारखाने गए. मैं ड्राईविंग लायसेन्स घर भूल आया था. सोचा की इसकी फोटो का प्रिंट निकलवा कर लेमिनेशन करवा लूँ तो कम चल जायेगा. एक कलर लेब में गए तो उसने कहा कि १०० रूपये लगेगे और मेरे पास मोटा पेपर नहीं है. मतलब कि दिन दहाड़े डाका. हमने मना कर दिया.

नांगलोई मेट्रो स्टेशन
मेट्रो से नागलोई पहुचे. राजीव भाई का कारखाना मेट्रो पिलर नंबर 420 पर है. आज कल दिल्ली में पता मेट्रो के पिलर से ही बताया जाता है. नांगलोई स्टेशन के सामने ही राजीव जी का कारखाना है. पिछली बार यहीं पर यशवंत मेहता जी से मुलाकात हुयी थी. अब वो मुंबई बैंक ऑफ़ बड़ोदा में है. कभी-कभी फोन कर लेते है. राजीव भाई नांगलोई से काम निपटा कर मुझे कश्मीरी गेट छोड़ने आये. यहीं पर केवल राम से मुलाकात होनी थी. तब तक हमने मेक्डोनाल्ड में बर्गर खाया. टाइम पास करने के लिए ६.२० बजे केवल पहुँच चुके थे. राजीव जी से विदा लेकर हम बस स्टैंड चले गए. वहां धर्मशाला के लिए बस पकडनी थी. बस ६.५० पर चलती है. टिकिट खिड़की में लाइन लगी थी. हमें ३३-३४ नंबर सीट मिली 2x2  मामला पीछे की सीट का था. केवल के कंडेक्टर से गुजारिश करने के बाद भी सामने की सीट नहीं मिली. बस चल पड़ी.

केवल राम का बढ़ा हुआ कद
मेरी बस में पहली लम्बी यात्रा थी. जो लग-भग १२ घंटे की होने वाली थी. बस का पहला स्टापेज पिपली था. बस खड़ी होते ही होटल वालों ने पुकारना शुरू किया, खाना-खाना-खाना. हमें भी खाना ही था. होटल में सामने ही टायलेट बना रखा था. ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहाँ होटलों भट्ठी होती है. इसका फायदा उस होटल वाले को बहुत मिलता है. ३ घंटे की यात्रा के पश्चात सवारियां बस रुकने पर सबसे पहले टायलेट ही ढूंढ़ती है और उसके बाद खाने की तरफ बढ़ती है. हमने भी टेबल संभाली और खाने का ऑर्डर दिया. राजमा का साग लिया. मदरस के लिए पूछा तो बेयरे ने कहा की नगद १२०/- दीजिये. अभी लाता हूँ. उसका भी इंतजाम किया गया. जब बिल पेमेंट करने पहुचे तो एक सवारी होटल वाले से जूझ रही थी. ४ रोटी आधा चावल और सब्जी के उससे १२६ रूपये का बिल बना दिया था. सवारी कह रही थी "मैंने सब्जी मांगी ही नहीं, वेटर बोला कि चावल के साथ आती है, इसलिए मैंने खा ली." होटल वाला कहाँ छोड़ने वाला था. उसने पूरे पैसे वसूल कर लिए.

डीजल यहाँ से डलबायें
अब यहाँ से चलने पर हिचकोले खाती सीट पर नींद आ गयी. कब चंडीगढ़ निकल गया पता ही नहीं चला. अगले स्टॉप उन्ना में बस रुकी, वहां सरकारी पेट्रोल पंप है जहाँ हिमाचल प्रदेश रोडवेज की गाड़ियाँ डीजल लेती है. यहाँ विसर्जन करके फिर बस चल पड़ी. अगला स्टॉप था ढलियारा. यहाँ एक होटल में तरह-तरह की मिठाइयाँ सजी थी. कोई रात के ३ बज रहे थे. कुछ ठण्ड का अहसास होने लगा था. हमने चाय बनवा कर पी. इसके बाद केवल सोने लगा. बस चक्करदार रस्ते में चक्कर काट रही थी. चक्कर सा आने लगा और पसीने भी. आँख बंद कर के सीट पर पड़ गया. बस जवाला जी में रुकी. जैसे तैसे सुबह ६ बजे धर्मशाला पहुचे.बस स्टैंड से हमने दाड़ी  के लिए बस ली. ३ रुपये का किराया लगा दोनों सवारियों का. केवल के रूम पर पहुच कर सबसे पहले तो चाय पी और सोने का मन था. रात भर की थकान से बेहाल था.

पोस्ट ऑफिस चौक 
केवल खाना खिला कर कालेज चला गया और मैं सो गया. दिन भर सोया रहा. उठने का मन ही नहीं किया. फिर शाम को केवल के आने के बाद खाना खाया और फिर सो गया. रात को कुछ बदन में हरारत सी हो गयी थी. थकन इतनी थी की उठने की हिम्मत ही नहीं थी. आज नहाया भी नहीं. सुबह डॉ.श्रीधर को फोन लगा कर दवाई पूछी तो पता चला कि वो दार्जलिंग में है. उसकी भी घुमाई चल रही है. उसने एंटीबायोटिक बताई. शाम को केवल दवाई लेकर आया. २५०/- की ६ टेबलेट. पता नहीं डॉ. ने भी कौन से जनम की दुश्मनी निकाली थी. सोच रहा होगा.. कि "साले फोन पर दवाई पूछते हैं, थोडा झटका दे ही दिया जाये." 

छत्तीसगढ़िहा-सबले बढ़िया 
शाम को एक खुराक लेने के बाद हम लोग धर्मशाला में घुमने निकले.बाज़ार में घुमते हुए मुझे कुछ  हमारे छत्तीसगढ़ के मजदूर मिले. मुझे आश्चर्य हुआ. मैंने जब उनसे चर्चा करने की कोशिश की तो उन्होंने बात नहीं करना चाहा. थोड़ी देर बाद देखा तो बाजार में हर जगह यही दिख रहे है. स्थानीय लोगों से चर्चा के पश्चात पता चला कि ये लोग यहाँ निर्माण के काम में संलग्न हैं. नीव खोदने से लेकर लेंटर ढलने तक इनके अलग ग्रुप हैं. भाटापारा, सरसींवा के लोग अधिक मिले. सरकार छत्तीसगढ़ में भरपूर रोजगार दे रही है. १ रूपये किलो में ३५ किलो चावल, मुफ्त में नमक और चरण पादुका तक बांटी जा रही है. ऐसी स्थिति में मजदूरी के लिए पलायन तो नहीं  हो सकता. हाँ कुछ लोग हैं जिन्हें बहार की आब-ओ-हवा पसंद है. इसलिए काम करने चले आते हैं, मजदूरी भी अधिक मिलती है. इसका लालच भी इन्हें खींच लाता है. जबकि हमारे यहाँ  बिहार, उड़ीसा एवं आँध्रप्रदेश के मजदुर काम कर रहे हैं.

लाल किला खरीदने के लिए लगी लाइन
शहर का एक चक्कर लगते हुए. गुरुद्वारे की तरफ से हम कचहरी, डाकखाना देखते हुए, हनुमान जी के दरबार में पहुच गए. हनुमान जी ही सकल कष्टों को दूर करते हैं. इनके दर्शन होते ही, हरारत और थकान गायब हो गयी. बाज़ार से सब्जी लेते हुए. हम लाल किले की दुकान में पहुच गए. यहाँ लाल किला मिलता है. मूल्य साईज के हिसाब से है. और जो दुकान दार मुंह से कह दे वही देना पड़ेगा. मर्जी है उसकी. नए लोगों से अधिक मूल्य लिया जाता  है. यह मुझे बाद में पता चला. साथ में संतरा भी मिलता है. स्वाद उत्तम है, यहाँ का संतरा मीठा है. अधिक खंटास नहीं है. कुल मिलकर मैजिक मूवमेंट (जादू) ठीक है.... अभी तो भ्रमण प्रारंभ ही हुआ है.......आगे जारी........ बिना गोले की तोप