मंगलवार, 7 जनवरी 2014

सरगुजा का रामगिरि

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला मुख्यालय से 50 किलो मीटर की दूरी पर बिलासपुर सड़क मार्ग पर उदयपुर से दक्षिण में रामगढ़ पर्वत स्थित है। दण्डकारण्य के प्रवेश द्वार स्थिति समुद्र तल से 3,202 फ़ीट की ऊंचाई पर अद्वितीय प्राकृतिक वैभव के साथ प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति को अपने आप में संजोए यह सदियों से अटल है। यहाँ घने शीतल छायादार वृक्षों की शीतलता से युक्त विश्व का चिरंतन नाट्य तीर्थ "शैलगुहाकार नाट्यमण्डप" का एकमात्र जीवंत अवशेष है। यहीं रामायण कालीन ॠषि शरभंग का आश्रम माना गया है। यहां सीता बेंगरा एवं जोगी मारा नामक प्राचीन गुफ़ाए हैं। भगवान रामचंद्र के वनवास का कुछ काल माता सीता के साथ रामगढ़ पर्वत की गुफ़ा में निवास करने के कारण उत्तरी गुफ़ा को सीता बेंगरा का नाम दिया गया।

रामगढ़ पर मेघदूत
कविकुलगुरु महाकवि कालिदास ने यहीं मेघदूत की रचना की थी। दक्षिणी गुफ़ा जोगीमारा में मेघदूत का यक्ष निर्वासित था। जोगी मारा गुफ़ा में भित्तिचित्रों के प्राचीन प्रमाण उत्कीर्ण हैं। विद्वान इनका काल ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी मानते हैं। ये भित्ती चित्र अजंता एलोरा की गुफ़ाओं में उत्कीर्ण भित्तीचित्रों जैसे ही हैं जो यहाँ की प्राचीन सांस्कृतिक सम्पन्नता के प्रतीक हैं। कोरिया राज्य के दीवान रघुवीर प्रसाद द्वारा रचित झारखंड झंकार नामक पुस्तक में उल्लेख है कि रकसेल राजवंश के विष्णु प्रताप सिंह ने रामगढ़ में एक किले का निर्माण किया तथा यहां पर 35 वर्षों तक राज किया।
हाथी खोल
रामगढ़ पर्वत में गुफ़ाओं तक पहुचने के लिए हाथीपोल नामक सुरंग है। यह सुरंग 180 फ़ीट लम्बी एवं प्राकृतिक होने के साथ इतनी ऊंची है कि हाथी भी इसमें से सरलता प्रवेश कर सकता है। दोनों ही गुफ़ाओं में दूसरी शती ईसा पूर्व के अभिलेख उत्कीर्ण हैं। जिसमें से सीता बेंगरा प्राचीन नाटयशाला है। कर्नल ओसले ने सन् 1843 में  तथा जर्मन विद्वान डॉ ब्लॉख ने इसे 1904 में जर्मन जर्नल में प्रकाशित किया था। इसके पश्चात डॉ बर्जेस ने इंडियन एंटीक्वेरी में इसको विस्तार से वर्णित किया। 
सीता बेंगरा (प्राचीन नाट्य शाला)
प्राचीन काल में सीता बेंगरा गुफ़ा पर्वत काट कर बनाई गई है। 44 फ़ीट लम्बी और 15 फ़ीट चौड़ी सीता बेंगरा गुफ़ा के प्रवेश द्वार के समीप दाहिनी ओर श्री राम चरण चिन्ह उत्कीर्ण हैं। इसके मुख्यद्वार के समक्ष शिलानिर्मित चंद्राकार सोपान जैसी बाहर की ओर संयोजित पीठिकाएं है। प्रवेश द्वार के समीप भूमि में खम्भे गाड़ने के लिए दो छिद्र् बनाए गए हैं। इस गुफ़ा का प्रवेश द्वार पश्चिम की ओर है एवं पूर्व में पहाड़ी है। विद्वानों कि अवधारणा है कि भारतीय नाट्य के इस आदिमंच के आधार पर ही भरतमुनि ने अपने ग्रंथ में गुफ़ाकृति नाट्यमंडप को स्थान दिया होगा- कार्य: शैलगुहाकारो द्विभूमिर्नाट्यमण्डप:। 
रामगढ़ पर्वत की चढाई
इसी गुफ़ा के प्रवेश करने पर बाएं तरफ़ मागधी भाषा में 3 फ़ीट 8 इंच के दो पंक्तियों के लेख से इस स्थान पर राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलन होना पहला शिलालेखिय प्रमाण माना जाता है। प्रो व्ही के परांजपे की "ए फ़्रेश लाईट ऑन मेघदूत के अनुसार यह शिलालेख निम्नानुसार है "आदि पयंति हृदयं सभावगरु कवयो ये रातयं… दुले वसंतिया! हसवानुभूते कुद स्पीतं एवं अलगेति" अर्थात हृदय को आलोकित करते हैं। स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में… वासंती दूर है। संवेदित क्षणों में कुंद पुष्पों की मोटी माला को हि आलिंगित करता है।  
जोगी मारा गुफ़ा का प्रसिद्ध लेख
जोगीमारा गुफ़ा में मौर्यब्राह्मी लिपि में शिलालेख अंकित है जिससे सुतनुका तथा उसके प्रेमी देवदत्त के बारे में पता चलता है। जोगीमारा गुफ़ा की उत्तरी भित्ती पर उत्कीर्ण पांच पंक्तियाँ है - शुतनुक नम। देवदार्शक्यि। शुतनुकम। देवदार्शक्यि। तं कमयिथ वलन शेये। देवदिने नम। लुपदखे। अर्थात सुतनुका नाम की देवदासी (के विषय में) सुतनुका नाम की देवदासी को प्रेमासक्त किया। वरुण के उपासक(बनारस निवासी) श्रेष्ठ देवदीन नाम के रुपदक्ष ने। इससे प्रतीत होता है कि जोगीमारा गुफ़ा की नायिका सुतनुका है। आचार्य कृष्णदत्त वाजपेयी के अनुसार भित्तिलेख से यह ध्वनि निकलती है कि सुतनुका नाम की नर्तकी थी, जिसके लिए देवदासी एवं रुपदर्शिका इन दो शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसके प्रेमी का नाम देवदत्त था। संभवत: देवदत्त द्वारा गुफ़ाओं में उक्त लेख अंकित कराए गए, ताकि उस स्थान पर उसकी नाट्य-प्रिया सुतनुका का नाम अजर-अमर हो जाए।
गुहा शैल चित्र जोगीमारा गुफ़ा
जोगीमारा गुफ़ा में यक्ष का निवास था। यहाँ प्राकृतिक रंगों से उत्कीर्ण चित्रकला ऐतिहासिक महत्व रखती है। यक्ष के इस प्रवास कक्ष में प्राचीनतम भित्तीचित्र आज भी प्राचीन कला एवं संस्कृति का स्मरण कराते हैं। एक ओर पुष्पों एवं पल्लव तोरणों की पृष्ठ भूमि में तीन अश्वों से खींचा जाता रथ है और दूसरी ओर रंग बिरंगी मछलियाँ चित्रित हैं। मानवीय आकृतियों के साथ सामुहिक नृत्य संगीत के साथ उत्सव मनाते हुए लाल, काले एवं सफ़ेद रंग से रेखांकित चित्र जोगीमारा गुफ़ा में जीवंत दिखाई देते हैं। इन चित्रों को विद्वानों ने ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का माना है। डॉ हीरालाल इन भित्तीचित्रों को बौद्ध धर्म से संबंधित मानते हैं तथा रायकृष्णदास इन्हे जैन धर्म से संबंधित कहते हैं क्योंकि पद्मासन में एक व्यक्ति की आकृति चित्रित है एवं इन्हे कलिंग नरेश खारवेल का बनवाया मानते हैं। जैन मुनि कांति सागर ने इस गुफ़ा के कुछ चित्रों का विषय जैन धर्म से संबंधित माना है। इन चित्रों में इतिहास समाया हुआ है। आवश्यकता है सिर्फ़ उसे पढने, जानने एवं समझने की।
रामगढ में उपेन्द्र दुबे, अमित सिंह देव और ब्लॉगर ललित शर्मा
महामहोपाध्याय डॉ भास्कराचार्य जी अपने लेख "रामगढ़ में त्रेतायुग की नाट्य शाला" में लिखते हैं कि "रामगढ़ पर्वत प्राकृतिक सुषमा से सम्पन्न रामायण एवं महाभारत कालीन अवशेषों  का ही धनी नहीं है वरन छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में सर्वाधिक प्राचीन भी है। रामगढ़ की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन मंदिर, गुफ़ाओं एवं भित्ती चित्रों से सुसम्पन्न प्राचीन भारतीय संस्कृति का आभास आभास मिलता है। सात परकोटों के भग्नावेश देख कर सहज ही विश्वास होता है कि यह ब्रह्मभवनप्रख्य शरभंगाश्रम रहा होगा। 
रामगढ़ पर्वत के शिखर पर स्थित मंदिर में सीता, लक्ष्मण, हनुमान एवं राम विग्रह
"संस्कृत साहित्य में सरगुजा" लेख में वे अपनी बात को वाल्मीकि रामायण के उद्धरण से और स्पष्ट करते हैं " सरगुजा के प्रशांत, प्रकृति वातावरण ने प्राचीन समय में महर्षि शरभंग के प्रामुख्य में अवस्थित ॠषि कुल को जीवन दिया है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार शरभंग आश्रम ब्रह्मभवन की भांति ऊंचा  तथा वेद मंत्रों से अनुकुंचित रहता था। यहाँ प्रतिदिन पूजा एवं नृत्य-संगीत अप्सराएं किया करती थी -पूजितं चोपनृत्तंच नित्यमप्सरसां गणैं:, तद ब्रह्मभवन-प्रख्यं ब्रह्म घोषनिनादितम्।

प्राचीन नाट्य शाला में श्री राम चरण चिन्ह
डॉ भास्कराचार्य जी “रघुपतिपदैरकिंतं मेखलासु” में कहते हैं कि मुक्ति प्रदाता दण्डकारण्य के प्रवेशद्वार पर आज भी त्रेतायुगीन नाट्य शाला अवस्थित है, जिसके समक्ष श्रीराम क पदार्पण होते ही शरभंग आश्रम के कुशल शिल्पियों ने दिवय चरण-चिन्ह छेनियों से उट्टंकित कर सदा के लिए संजो लिए होगें। इन चरण चिन्हों की आराधनाअ से दो हजार वर्ष पूर्व महाकवि कालिदास की काव्य प्रतिभा परवान चढी होगी, तभी रामगिरि की पहचान बताते हुए उन्होने मेघदूत के बारहवें पद्य में कहा है -आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुंगमालिंग्य शैलम वन्द्यै: पुंसां रघुपतिपदैरकिंतं मेखलासु। काले काले भवति भवतो यस्य संयोगमेत्य स्नेहव्यक्तिश्चिरविरहजं मुच्ञ्तो वाष्पमुष्णम्। सीता बेंगरा गुफ़ा में श्रीराम के पदचिन्हों के अंकित होने को स्पष्ट रुप से प्रदर्शित किया है। यक्ष मेघ से कहता है कि मेरे मित्र समय-समय पर इस पर्वत पर आते हो मुझे लगता है जितने दिन अलग रहते हो, उन्ही की याद करके पानी की शक्ल में गरम-गरम आँसू गिराया करते हो।
रामगढ़ पर्वत पर स्थित मंदिर
इस आश्रम का तालमेल रामगढ़ में ही दिखाई देता है। जहाँ सात द्वारों से निर्मित विशाल मंदिर के भग्नावशेष अभी भी शिलालेख के माध्यम से सुतनुका देवदासी का नृत्य सुनाया करते हैं। पास ही थार पर्वत से निकल कर मांड नदी प्रवाहित होती है, जिसका किनारा लेकर राम शरभंग के निर्देशन में आगे बढ़े थे। विद्वानों का मत है कि रामगढ़ की गुफ़ाओं में रहकर ही कालीदास ने मेघदूत की रचना की थी। कालिदास ने अपने मेघदूत में रामगढ़ को रामगिरि कहा है। “वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम” पूर्वमेघ-2 में रामगिरि पर्वत का शिखर विन्यास वप्र क्रीडा करते हुए हाथी जैसा बताया गया है। इससे प्रतीत होता है कि महाकवि कालिदास ने रामगढ से ही मेघदूत की रचना की थी। प्रो परांजपे आदि विद्वानों ने भी यही माना है।
“वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम" रामगिरि पर्वत
मेघदूत के प्रमाणों का सत्यापन करने के पश्चात विद्वानों ने रामगढ़ पर्वत को ही रामगिरि चिन्हित किया है। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास का रामगिरि से गहरा नाता है। यहीं यक्ष ने निवास कर प्रिया को प्रेम का संदेश भेजा था। शरभंग ॠषि का आश्रम एवं भगवान राम एवं सीता का वनवास के दौरान दण्डकारण्य के इस प्रवेश द्वार रामगढ़ में निवास करना इसे त्रेतायुग के साथ जोड़ता है। विश्व की प्राचीन नाट्यशाला हमें संस्कृति की पहचान कराती है तो सीताबेंगरा का शिलालेख राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलन का प्रमाण देता है। 
ब्लॉगर ललित शर्मा एवं सांध्य दैनिक छत्तिसगढ़ के संवाददाता मुन्ना पांडे
जोगीमारा गुफ़ा में उत्कीर्ण शिलालेख से रुपदर्शिका नर्तकी सुतनुका एवं रुपदक्ष देवीदत्त की शहस्त्राब्दियों पुरानी प्रेम कहानी से परिचय होता है। जोगीमारा की गुफ़ा में अंकित भित्तीचित्र बौद्ध एवं जैन धर्म के साथ रामगढ़ का संबंध प्रदर्शित करते हैं तो सरगुजा राज्य में स्थापित रकसेल राजवंश के प्रथम शासक द्वारा रामगढ़ पर्वत पर किला बनाकर 35 वर्षों तक राज करना भी बताते हैं। यह रामगढ़ का ज्ञात इतिहास है। अभी रामगढ़ परिक्षेत्र में अनेकों ऐसे ऐतिहासिक स्थल होगें जो अज्ञात हैं। रामगढ़ का ऐतिहासिक महत्व किसी भी अन्य स्थान से कम प्रतीत नहीं होता है।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

सिंहासन बत्तीसी पर यायावर

लाव की बिखरी हुई लकड़ियों को एकत्र कर हवा देने पर कोयले धधक उठे। धधकते हुए कोयले आग से बाहर निकाल कर उन पर केटली रख दी।
सर्द मौसम में नदी किनारे अलाव पर चाय बनाना और उसकी गर्म भाप से भीतरी दुनिया को सिकता हुआ महसूस करना अलौकिक अनुभव होगा।
अदरक की कमी खल रही थी। अगर अदरक होती को गुड़ की चाय का स्वाद कई गुना बढ जाता। शिलारुपी सिंहासन बत्तीसी पर बैठ कर देख रहा था आकाश की ओर बढती हुई अग्निशिखाएं को नर्तन करते हुए, लग रहा था कि कोई निपुण नर्तकी उत्कृष्ट कला प्रदर्शन कर रही हो।
लकड़ियाँ अलाव के लिए क्या समेटी, जैसे मैने यादों को ही समेट लिया हो। जरा सा एकातं का पवन क्या चला, भीतर बहुत कुछ धधकने लगा। अग्निशिखाओं ने आकृतियाँ बनानी प्रारंभ की, भिन्न-भिन्न आकृतियाँ बन रही थी चलचित्र की मानिंद। 

अग्निशिखाओं ने वृत्त प्रदर्शन प्रारंभ किया, जीवन वृत्त लघु होतो तो लघुअग्निशिखा ही प्रदर्शित कर देती, पर उन्होने बडा रुप ले लिया।
जीवन वृत्त के लिए कैनवास बड़ा होना चाहिए। यायावर की जीवन यात्रा के प्रदर्शन के लिए परदा भी बड़ा होना चाहिए। तभी जीवन यात्रा सार्थक होगी।
अग्निशिखाओं की चंचलता कभी-कभी किसी फ़्रेम को बिगाड़ कर विकृत कर देती हैं, मुखाकृति कुरुप दिखाई देती है। अग्निशिखाएं जान बूझ कर नहीं कर रही, आज इन्होनें ने दर्पण का रुप ले लिया। ऐसा चमत्कारी दर्पण जो वर्तमान को भूल कर अतीत की यात्रा करवा रहा है।
अपनी गलतियों का परिणाम तो स्वयं ही भुगतना पड़ेगा। ग्रहण तो सूर्य को भी लगता है। चाँद भी एक पखवाड़े अंधकार में डूब जाता है। फ़िर मैं मानव हूँ, जिसे त्रुटियों का, कमजोरियों का पुतला कहा जाता है।

चाय उबलने लगी है, भाप के साथ बुलबुले केटली के बाहर निकल कर अग्नि को शांत करने लगे। जल का अग्नि के साथ सदैव विरोध रहा है।
शीतल जल अग्नि का बैरी तो है ही पर गर्म जल भी अग्नि को शांत करने में सक्षम है। तासिर बदलने के बाद भी जल की प्रवृत्ति नहीं बदलती है।
ठीक मनुष्य भी ऐसा ही है, रुप बदलने पर प्रवृत्ति नहीं बदलती। कभी अवसर आ ही जाता है जब उसका असली रुप सामने दिखाई दे जाता है। न चाहते हुए भी उसका मुखौटा उतर जाता है।
देव स्वरुप का मुखौटा उतरने पर दानवी चेहरा सामने दिखाई देने लगता है। ईश्वर की बनाई सृष्टि में सबका पात्र निर्धारित है। संसार रुपी रंग मंच पर उसे अपना पात्र निभाना ही पड़ता है।
निर्देशक जब सर्वशक्तिमान हो तो क्या मजाल है कहीं चूक हो जाए। पात्र के अभिनय के अनुसार उसे पारितोषिक मिल जाता है। यही कर्मफ़ल का सिद्धांत है।

केटली में चाय तो बन गई, अब इसे छानने की जुगत लगानी होगी। चायछलनी तो सामान में रखी ही नहीं। अगर धूले हुए रुमाल से छान लेता हूँ तो 1 रुमाल का सत्यानाश हो जाएगा। चलो आज ऐसे ही निथार कर पी ली जाए।
आदिम परिवेश में आदिम भी होकर देखना चाहिए। भाप के साथ चाय की पत्ती भी तल में बैठ गई, केटली की टोंटी से कटोरी में सिर्फ़ तरल ही बाहर आ रहा है। अपने हाथों से बनाई चाय का मजा ही कुछ और है।
पता नहीं कहाँ से कूं कूं करता एक स्वानपुत्र भी चला आया अलाव के पास। थोड़ी देर तो उसने अपनी देह को चाट कर साफ़ किया, फ़िर अलाव के समीप आकर भूमि को पूंछ से झाड़कर साफ़ किया और आराम से बैठकर मेरी ओर देखने लगा।
"ठंड है मित्र, तनिक तुम भी ऊष्मा सेवन कर लो, चाय पीनी है" सुनकर वह पूंछ हिलाता है। " अरे! गर्म चाय पीएगा तो जीभ जल जाएगी और फ़िर मुझे श्राप देगा" मैने उठकर बैग से निकाल कर उसे 4 "मैरी" बिस्किट दिए। पहले उसने बिस्किटों की खुश्बू लेकर गुणवत्ता परखी, फ़िर उसे मुंह से लगाया। 

अग्निशिखाएं शीतल हो चुकी थी, तुम्हारी अनुपस्थिति में इस सर्दी में इन्होनें खूब साथ निभाया। ऊष्मा से धरती गर्म हो गई थी। लग रहा था कि ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा हूँ।
हाँ! ज्वालामुखी। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को विराट स्वरुप दिखाया तो उसे कृष्ण देह के स्थान सारा ब्रह्माण्ड दिखाई दिया। जब देव ब्रह्माण्ड को देह में धारण कर सकते हैं तो देवांश मनुष्य क्यों नहीं।
सभी की क्षमतानुसार उसके भीतर ब्रह्माण्ड होता है। जब ब्रह्माण्ड है तो सृजन का द्योतक ज्वालामुखी भी होना तय है।
अब विज्ञान भी मान रहा है कि "बिग बैंग (महाविस्फ़ोट)" से ही ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। देखा है ज्वालामुखी फ़ूटते हुए? कितना अधिक दवाब होता है मुहाने पर।
निर्धारित दबाव से थोड़ा सा ही अधिक होने पर हो जाता है महाविस्फ़ोट, और बह निकलता है लावा। धातूएं आ जाती हैं सतह पर। जन्मने लगता है नया ब्रह्माण्ड।

सिंहासन बत्तीसी पर बैठते ही चिंतन की धारा बहने लगती है। अभी तो मैं ही जागा हूँ, बत्तीसों पुतलियाँ विश्रामानंद में है। विक्रम राजा से इन्होनें बहुत सवाल किए थे। उसी थकान ने इन्हे शिथिल कर रखा है।
जब जागेंगी तो मुझ पर सवालों के गोले दागने लगेगी। सोच रहा हूँ सवाल करने वाले बत्तीस और जवाब देने वाला सिर्फ़ मैं अकेला। कैसे झेल पाऊंगा इनके सवालों को।
मैं कोई विक्रम राजा जैसे विद्वान तो नहीं हूँ। एक अदना बंजारा यायावर हूँ, कभी तंबू यहाँ लगा लेता कभी वहाँ। साथ रहता है तो सिर्फ़ स्वानपुत्र का, यह मनुष्य का साथ कभी नहीं छोड़ता। मित्रता भी रज्ज के निभाता है जीवनपर्यंत।
तभी तो चौरासी लाख योनियों में यह प्रथम योनि में हैं जो सशरीर पाण्डवों के साथ स्वर्ग भोग आया। अब मेरे सामने बैठा होठों पर जीभ फ़िरा कर अलाव की गर्मी के साथ "मैरी बिस्कुट" के स्वादानंद में डूबा हुआ है।

सूर्य का रथ धरा पर उतरने के लिए रास्ता तलाश कर रहा है, पर कोहरे ने आज उसे हराने का मन बना लिया। प्रकृति का नियम है, जो सर्वथा विजयी होता है उसे भी एक दिन पराजित होना पड़ता है। चाहे सूर्य ही क्यों न हो। आज अदने से कोहरे से इसे हारता हूआ देख रहा हूँ।
बड़ी बात है मेरे लिए सूर्य की पराजय का साक्षी बन रहा हूँ। यह घटना रोमांचित करने वाली है। कटोरी में चाय निमड़ रही है, आखरी घूंट के साथ कटोरी का तल भी दिखाई देने लगा। लो चाय खत्म हो गई।
स्वानपुत्र विश्राम मुद्रा में मेरी ओर देखते हुए पूंछ हिला कर शायद कह रहा है "यह कटोरी है मुसाफ़िर, कोई समुद्र नहीं, जिसका कभी अंत न होगा।
कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि बैठे-बैठे समुद्र का जल भी खत्म हो जाता है।" सहमत हूँ स्वानमित्र, अब प्रयोजन सिद्ध करने के लिए उद्योग करना चाहिए, बैठे रहने से कोई लाभ नहीं।
यायावर को निरंतर चलते ही रहना चाहिए……… संसार को नापने के लिए मेरे साथ सिर्फ़ दो पद ही तो हैं,  नाप लूंगा कदम दर कदम एक दिन इस धरा को।