शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

प्रकृति का अजूबा जलजली (दलदली) मैनपाट

राजधानी रायपुर से 352 किलोमीटर अम्बिकापुर एवं अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर छत्तीसगढ़ का शिमला एवं निर्वासित तिब्बतियों की शरण स्थली मैनपाट स्थित है। 

मैनपाट के ग्राम कमलेश्वरपुर के इर्द गिर्द शरणार्थी तिब्बतियों के कैम्प हैं। यहीं पर पर्यटन विभाग के शैला रिसोर्ट से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर जलजली (दलदली) नदी है। 

इस नदी का लगभग 3 एकड़ का क्षेत्र ऐसा है कि इस पर कूदने से यह हिलता है। इसे जम्पिंग लैंड भी कह सकते हैं। जब इस भूमि पर कोई कूदता है तो यह स्पंज की गेंद जैसी प्रतिक्रिया देती है। यहाँ आने के बाद लोग बच्चों की तरह उछल कूद कर इसे परखते हैं।

मैनपाट
मैनपाट जलजली

जलजली की इस विशेषता से बाहरी दुनिया के लोग अधिक परिचित नहीं है। फ़िर भी कुछ सैलानी प्रतिदिन कुदरत के इस अजूबे को देखने के लिए पहुंचते हैं। 

जब संसार में कहीं पर धरती हिलती है तो हलके से भी कंपन से घबराहट फ़ैल जाती है और इससे भारी क्षति भी होती है। 

यही एकमात्र ऐसा भूचाल है जिसका आनंद लेने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं और प्रकृति के इस अजूबे को देख कर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। 

इस स्थल से थोड़ी दूर झरना भी है लेकिन वन क्षेत्र होने कारण यहाँ तक पहुंचने का मार्ग नहीं बना है।
मैनपाट
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
मेरा मानना है कि यह स्थान देश में धरती बनने की प्रक्रिया का प्रथम उदाहरण है। जब धरती पर जल ही जल था और उसके बाद धीरे-धीरे जल में वनस्पति का जमाव होने लगा और जल दलदल में परिवर्तित होकर ठोस होते गया. 

करोड़ों वर्षों की प्रक्रिया के पश्चात जल ठोस भूमि में परिवर्तित हो गया। यहाँ पर जल से भूमि बनने की यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है। सैकड़ों वर्षों के पश्चात यह भूमि भी ठोस हो जाएगी। 
मैनपाट जलजली
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
दलदली की इस भूमि के नीचे नदी बहती है। वनस्पति ने इस भूमि को इतना अधिक जकड़ रखा है कि इसका क्षरण भी नहीं होता और कूदने पर हमेशा यह इसी तरह की प्रतिक्रिया करती है। 

नदी के जल के ऊपर मिट्टी और वनस्पति की लगभग 4-5 मीटर मोटी परत है, इस पर मैने पत्थर से भरी ट्राली लेकर ट्रेक्टर को भी जाते हुए देखा है, यह जमीन इतने वजन के बाद भी फ़टती नहीं है और न ट्रेक्टर के पहिए इसमें धंसते हैं। प्रकृति का यह अजूबा मैने मैनपाट में देखा और कहीं नहीं।

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

मीना बाज़ार का इतिहास एवं वर्तमान

नगर में मीना बाज़ार लगा हुआ है, सांझ होते ही उदय भैया का मन मीना बाजार घूमने का करता है। यहाँ  मनोरंजन के कई साधन जुटाए गए  हैं।

जिसमें कई तरह के झुले, मौत का कुंआ, नाचने वाली सोलह साल की नागिन के साथ खिलौनों, टिकुली फ़ुंदरी की दुकान एवं  खाने के लिए चाट पकौड़ी की दुकाने भी लगी हैं।

कुल मिलाकर बच्चों एवं महिलाओं के मनोरंजन का समस्त साधन जुटाया गया है। वैसे तो वर्तमान में मीना बाजार मेले-ठेलों में दिखाई देते हैं, परन्तु बरसाती खर्चा निकालने के लिए मीना बाजार वाले कस्बों का रुख कर लेते हैं।
मीना बाज़ार

भारत में मीना बाजार रजवाड़ों में लगाए जाते थे, जिसमें सिर्फ़ महिलाओं का प्रवेश ही होता था। रजवाड़ों की महिलाओं की सौंदर्य प्रसाधन एवं अन्य आवश्यकता की वस्तुओं की पूर्ति मीना बाजारों के माध्यम से की जाती थी।

आमेर के किले रनिवास में मीना बाजार लगने का उल्लेख मिलता है, जहाँ रनिवास की महिलाएँ, गहने गुंथे, चूड़ियां, कपड़े इत्यादि की खरीदी करती थी। इसके साथ ही मनोरंजन भी हो जाता था।

मीना बाजार नामकरण के पीछे प्रतीत होता है कि गहनों पर की जाने वाली मीनाकारी के नाम पर ही इसका नाम मीना बाजार पड़ा होगा। 
मीना बाज़ार

इतिहास में पीछे मुड़कर देखें तो अकबर में काल में मीना बाजार बहुत बदनाम हुए। अकबर की काम लालसा ने दिल्ली में मीना बाजार लगवाना प्रारंभ किया, जिसमें सिर्फ़ स्त्रियों का ही प्रवेश होता था और बाजार की चौकीदारी के लिए तातारी महिलाएं नियुक्त कर रखी थी।

बाजार में आने वाली कोई भी महिला उसे पसंद आ जाती तो उठवा लिया करता था। बीकानेर के राव कल्याणमल की पुत्रवधु सिसौदिया वंश की किरण कुंवर से लात खाने के बाद उसने मीना बाजार की नौटंकी बंद की।  
मीना बाज़ार

भोपाल में भी रिसायती दौर में मीना बाजार लगने की जानकारी मिलती है, जहाँ इसे परी बाजार कहा जाता था। ब्रिटेन की महारानी सन् 1909 में जब भोपाल आई तो प्रिंसेस ऑफ वेल्स क्लब की स्थापना हुई।

वर्ष 1916 में बेगम सुल्तानजहाँ ने महिला क्लब के माध्यम से मीना बाजार लगाया। बाजार में महिलाओं द्वारा निर्मित हस्तशिल्प सामग्री बिक्री के लिये रखी जाती थी उस दौर में मीना बाजार को परी-बाजार इसलिये कहा जाता था,

क्योंकि पढ़ी-लिखी बच्चियाँ सुंदर वस्त्र धारण कर परी के रूप में इन मेलों में भाग लेती थीं। पुराने भोपाल में आज भी एक मोहल्ला परी बाजार कहलाता है। 
मीना बाज़ार

इस तरह अन्य स्थानों पर नवाबों द्वारा मीना बाजार लगाने का उल्लेख मिलता है। लखनऊ के कैसर बाग से लेकर पाकिस्तान के लाहौर तक मीना बाजार महिलाओं की आवश्यकता वस्तुओं की पूर्ति करते थे।

राजे रजवाड़े खत्म हो गए, परन्तु आज भी मीना बाजार चल रहे हैं, उनकी वही रौनक है, जो पहले हुआ करती थी। अब मेलों-ठेलों में मीना बाजार दिखाई देते हैं, जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक सफ़र करते रहते हैं। 
मीना बाज़ार

कई स्थानों के हाट अब स्थाई बाजारों में बदल गए, सूरत का चौटा बाजार, रायपुर की टुरी हटरी, बिलासपुर का गोलबाजार इस तरह सभी स्थानों पर स्थाई बाजार हो गए हैं।

भले ही मीना बाजारों के ढांचे में बदलाव आया है परन्तु मीना बाजारों को देखकर लगता है कि इतिहास की एक महत्वपूर्ण परम्परा हमारे बीच जीवित है।