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बुधवार, 29 जनवरी 2025

ब्रह्मा ने इस दिन सृष्टि की रचना की थी

 मौनी अमावस्या हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है, जिसे माघ मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। यह दिन धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखता है। मौनी अमावस्या का नाम दो शब्दों ‘मौन’ और ‘अमावस्या’ से मिलकर बना है। इसका अर्थ है, अमावस्या के दिन मौन व्रत का पालन करना। यह परंपरा आत्मशुद्धि और मानसिक शांति प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाती है। मौनी अमावस्या को विशेष रूप से पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और ध्यान-साधना का दिन माना जाता है। इसे हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायक दिन माना गया है।

मौनी अमावस्या के दिन पवित्र नदियों, विशेष रूप से गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम में स्नान का विशेष महत्व है। यह दिन प्रयागराज  में कुंभ मेले के मुख्य स्नान पर्वों में से एक है। इस दिन लाखों श्रद्धालु संगम में स्नान करते हैं और पवित्र जल में डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति पाने की कामना करते हैं। यह विश्वास है कि इस दिन गंगा स्नान से सभी पापों का नाश होता है और आत्मा की शुद्धि होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

मौनी अमावस्या का आध्यात्मिक महत्व भी बहुत गहरा है। यह दिन आत्मचिंतन और ध्यान-साधना के लिए उपयुक्त माना गया है। मौन व्रत का पालन इस दिन की विशेष परंपरा है। मौन रहकर व्यक्ति आत्मविश्लेषण करता है और अपने भीतर के द्वंद्व और अस्थिरता को समाप्त करने का प्रयास करता है। मौन का पालन करने से मन शांत होता है और व्यक्ति की आत्मिक उन्नति होती है। यह दिन व्यक्ति को अपने आंतरिक सत्य और उद्देश्य को पहचानने का अवसर प्रदान करता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के लिए मौन रहकर तपस्या की थी। उनकी इस तपस्या के कारण इस दिन को मौन व्रत का दिन माना गया। एक अन्य कथा के अनुसार, महाभारत काल में भीष्म पितामह ने इस दिन गंगा नदी में स्नान किया था और युधिष्ठिर को इस दिन के महत्व के बारे में बताया था। ऐसी मान्यताएँ इस दिन को और भी पवित्र और महत्वपूर्ण बनाती हैं।

इसका संबंध कुंभ मेले से भी है। कुंभ मेला हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो हर बारह वर्षों में चार प्रमुख स्थानों – प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में आयोजित होता है। मौनी अमावस्या के दिन कुंभ मेले में स्नान का विशेष महत्व होता है। इस दिन लाखों श्रद्धालु संगम में स्नान करने के लिए एकत्रित होते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। यह दिन कुंभ मेले का मुख्य आकर्षण होता है और इसे महापर्व के रूप में मनाया जाता है।

इस दिन लोग ध्यान, योग और साधना का भी अभ्यास करते हैं। यह दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की आराधना के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति प्रकट करते हैं। यह दिन आध्यात्मिक जागृति और आत्मा की शुद्धि का अवसर प्रदान करता है।

इस दिन को मनाने की विधि भी अत्यंत विशिष्ट है। प्रातःकाल उठकर पवित्र नदियों में स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र धारण करना और मंदिरों में पूजा-अर्चना करना इस दिन की मुख्य क्रियाएँ हैं। लोग अपने घरों में दीप प्रज्वलित करते हैं और भगवान का ध्यान करते हैं। इस दिन मौन रहकर व्यक्ति अपने भीतर के विचारों को नियंत्रित करने और आत्मा की गहराई में झाँकने का प्रयास करता है।

मौनी अमावस्या का महत्व केवल धार्मिक और आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी है। यह दिन अमावस्या का दिन होता है, जब चंद्रमा और सूर्य एक ही राशि में होते हैं। इस खगोलीय घटना का प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है और नदियों तथा समुद्र में ज्वार-भाटे उत्पन्न होते हैं। यह समय प्राकृतिक ऊर्जा के प्रवाह को समझने और उसका उपयोग करने का अवसर प्रदान करता है। पवित्र नदियों में स्नान करने से शरीर और मन दोनों को ऊर्जा मिलती है और व्यक्ति को शारीरिक व मानसिक शुद्धि का अनुभव होता है।

इस दिन कई लोग अपने पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान भी करते हैं। यह दिन पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना गया है। पितरों की कृपा प्राप्त करने और उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए लोग गंगा नदी के तट पर पिंडदान करते हैं। यह परंपरा परिवार और समाज के प्रति व्यक्ति की जिम्मेदारी और कृतज्ञता को व्यक्त करती है।

मौनी अमावस्या का महत्व आधुनिक जीवन में भी बना हुआ है। यह दिन व्यक्ति को अपनी व्यस्त दिनचर्या से बाहर निकलकर आत्मचिंतन और आत्मविश्लेषण का अवसर प्रदान करता है। मौन व्रत का पालन व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को सुधारता है और उसे भीतर से मजबूत बनाता है। यह दिन हमें अपनी संस्कृति, परंपरा और धर्म के प्रति जागरूक होने का संदेश देता है।

इस प्रकार, मौनी अमावस्या का दिन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा और प्रकृति के साथ जुड़ने का एक अवसर है। यह दिन हमें हमारे मूल्यों, परंपराओं और आध्यात्मिक धरोहरों की याद दिलाता है। मौनी अमावस्या आत्मिक शुद्धि, मानसिक शांति और धर्म के प्रति आस्था को जागृत करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

जानिए क्या होता है बस्तर का लांदा और सल्फ़ी

जब भी बस्तर जाना होता है तब बस्तरिया खाना, पेय पदार्थ का स्वाद लेने का मन हो ही जाता है, चाहे, लांदा हो, सल्फ़ी हो या छिंदरस। बस्तर की संस्कृति पहचान ही अलग है। गत बस्तर यात्रा के दौरान अंचल के विशेष पेय पदार्थ एवं भोजन विकल्प सल्फी का रस तथा चावल का लांदा का स्वाद लिया गया। सल्फी का वृक्ष बस्तर अंचल में ही पाया जाता है. चावल को खमीर उठा कर उसका लांदा नामक पेय पदार्थ बनाया जाता है. हाट बाजार में ग्रामीण इसे बेचने आते हैं।

भाई चंद्रा मंडावी लांदा बनाने की रेसीपी और तरीका बताते हुए कहते हैं, लांदा बनाने के लिये चावल को पीस कर उसके आटे को भाप में पकाया जाता है, इसे पकाने के लिए चूल्हे के ऊपर मिटटी की हांड़ी रखी जाती है जिस पर पानी भरा होता है और हांड़ी के ऊपर टुकना जिस पर चावल का आटा होता है। इसे अच्छी तरह भाप में पकाया जाता है, फिर उसे ठंडा किया जाता है।

इसके पश्चात एक अन्य हंडी में पानी आवश्यकता अनुसार लेकर उसमे पके आटे को डाल देते है, साथ ही हंडी में अंकुरित किये मक्का (जोंधरा) के दाने, जिसे अंकुरित करने के लिये ग्रामीण रेत का उपयोग करते है। भुट्टे के अंकुरण के पश्चात उसे भी धुप में सूखा कर उसका भी पावडर बनाया जाता है। लेकिन इसे जांता (ग्रामीण चक्की) में पिसा जाना उपयुक्त माना जाता है। फिर इसे भी कुछ मात्रा में चावल वाले हंडी में डाल दिया जाता है। जिसका उपयोग खमीर के तौर पर किया जाना बताते है और गर्मी के दिनों में 2-3 दिन, ठण्ड में थोडा ज्यादा समय के लिए रख देते है। तैयार लांदा को 1-2 दिन में उपयोग करना होता है अन्यथा इसमें खट्टापन बढ़ जाता है। बस्तर में दुःख, त्यौहार या कहीं मेहमानी करने जाने पर भी लोग इसे लेकर चलते है। 

सल्फ़ी के विषय में बताते हुए चंद्रा मंडावी कहते हैं, वहीं सल्फी पेड़ का रस है, जो ताज़ा निकला मीठा होता है और दिन चड़ने के साथ इसमें भी कडवाहट आती जाती है। इसका उपयोग नशे के लिए तो किया जाता है पर सामाजिक क्रियाकलापों में इसकी भी भूमिका अहम् है।| इन दिनों सल्फी पेड़ की जड़ में एक बेक्टीरिया के संक्रमण के कारण सल्फी के पेड़ मर रहे है, जिस पर हमारे बस्तर के वैज्ञानिक शोध कर रहे है और जहाँ तक रोकथाम के उपाय भी खोज लिये गये है।

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

मिट्टी का कूकर : छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के बालोद जिला मुख्यालय से लगभग दस किमी दूर दिसम्बर 2010 में एक गांव में कुम्हार परिवार से मिलने गया था। गांव का नाम भूल रहा हूँ। उस कुम्हार ने मिट्टी के भाण्डों को नवोन्मेष कर नया रुप दिया था। 

उपरोक्त चित्र में दिख रहा मिट्टी का कूकर उसने तैयार किया था, जो धातु के कूकर जैसे ही कार्य करता है एवं इसमें पकाया गया भोजन माटी की सौंधी खुश्बू लिए होता है।
औद्योगिकरण ने सबसे अधिक चोट भारत के परम्परागत शिल्प पर की, जबकि यह हमारी प्राचीन अर्थ व्यवस्था की रीढ़ था। इसके एवज में मशीनें खड़ी की और परम्परागत शिल्प को मटियामेट कर दिया। 
जो कुशल हाथ अद्भुत कृतियों को गढ़ते थे वे जीवनयापन करने के लिए परम्परागत व्यवसाय को त्याग कर मजदूरी कर रहें हैं। आजादी के बाद की सरकारें अंग्रेजों की परिपाटी पर चली और परम्परागत शिल्प व्यवसाय चौपट हो गया।
नये शोध आने पर अब लोग पुनः जागरूक होते दिखाई दे रहे हैं, शहरों में मिट्टी के तवे बिकते दिखाई देते हैं। यह पता नहीं कि लोग इनकी खरीदी ड्राइंग रुम की शोभा बढ़ाने के लिए करते हैं या भोजन पकाने के लिए। 
वैसे भोजन पकाने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग स्वास्थ्य एवं देश की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी है। मिट्टी के बर्तनों में चूल्हे की धुंगिया खुशबू के साथ बने भोजन का कहना ही क्या है।

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

शौचालय के पहले जलस्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता

वर्तमान में जल संकट का सामना ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक मनुष्य को करना पड़ रहा है। नदियाँ सूख रही हैं, कूप एवं तालाब सूख जाते हैं, बांधों में जल का स्तर कम हो जाता है, घर घर में बोरवेल के कारण भूजल का स्तर भी रसातल तक पहुंच रहा है। जहाँ दस हाथ की खुदाई से जल निकल आता था वहाँ हजार फ़ुट में भी जल निकलने की संभावना नजर नहीं आती। 

इसके साथ ही हर वर्ष ग्रीष्म काल में जल संकट से वन्य प्राणियों के जान गंवाने के समाचार निरंतर आते रहते हैं, परन्तु लोग इस ओर ध्यान नहीं दे रहे। नलकूपों द्वारा जल का असीमित दोहन हो रहा है। दिनचर्या में सम्मिलित ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो जल के बिना सम्पन्न हो सके। जहाँ भी जल संकट आता है वहां के लोग शासन प्रशासन को लानते भेजना प्रारंभ कर देते हैं परन्तु स्वयं की जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं।

पहाड़ों की ये स्थिति है कि वहाँ भी पेयजल नहीं है। मीलों दूर से जल की व्यवस्था करने पर मजबूर हैं। चीड़ ने पहाड़ों का सारा जल निचोड़ लिया है। लोग मैदानों की तरफ भागे आ रहे हैं, पर कब तक चलेगा यह सब। इसकी भी एक सीमा है। जल के संसाधन पहाड़ों पर भी बचाने होंगे।

आज से तीस बरस पहले मीठे पानी का एक कुंआ ही गाँव भर की प्यास बुझा देता था, निस्तारी के लिए तालाब का जल उपयोग में आता था। जब आज सब नल जल के भरोसे हो गए तो कुंए, बावड़ियों, तालाबों आदि की दुर्दशा देखी नहीं जाती। 

कभी पेयजल का स्रोत रहे इन साधनों में वर्तमान में लोग कूड़ा कचरा फ़ेंकते दिखाई देते हैं, जिससे प्राकृतिक जल स्रोत प्रदूषित हो गए हैं या बंद हो गए हैं। तालाबों की भूमि अतिक्रमण के कारण सिमटती जा रही है और आबादी बढती जा रही है। लोग शतुरमुर्ग की तरह भूमि में गर्दन गड़ाए सभ्यता को समूल नष्ट करने वाले तूफ़ान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

जब भी किसी कुंए या प्राकृतिक जल स्रोत की दुर्दशा देखता हूँ तो आत्मा कलप जाती है और सोचता हूं कि मुर्ख मनुष्य अपनी ही जाति के समूल नाश का उद्यम कर रहा है। रजवाड़ों के काल में शासक, जमीदार एवं धनी मानी व्यक्ति कुंए, बावड़ियाँ, पुष्करी, तालाब आदि लोककल्याण के भाव से निर्मित करवाते थे तथा इस कल्याण का कार्य करने के लिए शास्त्र भी नेति-नेति कहकर उन्हें प्रोत्साहित करते थे। परन्तु वर्तमान में सब खत्म होते जा रहा है।

हम देख रहे हैं कि आज एक लीटर पानी की कीमत 20 रुपए हो गई है, जो लोग सहर्ष लेकर पीते हैं, घरों में आर ओ का जल आ रहा है। लोगों ने घरों में जल शुद्धि के आर ओ मशीने लगवा ली हैं। जबकि आर ओ में एक लीटर जल शोधन करने के लिए तीन लीटर जल व्यर्थ जाता है। इस वर्तमान को देखकर भविष्य की चिंता होती है कि आने वाला कल कितना भयानक हो सकता है।

पर्यावरण रक्षा के लिए असली नकली गुहारें होती दिखाई देती हैं। मानता हूँ कि पर्यावरण के साथ इको सिस्टम भी सुधारना आवश्यक है। परन्तु सबसे पहले गाँवों एवं शहरों के पुराने पेयजल के स्रोतों को भी बचाना आवशयक है। जो कुंए, तालाब बावड़ियाँ हैं, उनकी सफ़ाई करके उनका जल प्रयोग में लाना प्रारंभ करना चाहिए, जिससे वर्षाजल से धरती सींचित हो सके एवं भूजल का स्तर बढता रहे। 

स्थानीय शासन एवं सामाजिक संस्थाओं को सबसे पहले इस ओर ध्यान देना चाहिए। जो जल के प्राचीन स्रोत हैं, उनकी सफ़ाई करवा कर मरम्मत करवानी चाहिए जिससे उनका संरक्षण हो सके। अभी भी समय है, यह आवाज हर जगह उठनी चाहिए। जल है तो सब कुछ है, यह चराचर सृष्टि है, प्राण है, जीवन है, वन्य प्राणी हैं, इको सिस्टम है, वरना सब नष्ट हो जाएगा। 

बहुत देर हो जाएगी और आने वाली पीढी आपको कोसने एवं लानते भेजने के अलावा क्या कर सकती है। सरकार को भी चाहिए कि वह प्राचीन जल के स्रोतों को बचाने की कोई योजना बनाए जो कारगर हो एवं इसका लाभ जन जन को हो। शौचालय के पहले जल स्रोतों के संरक्षण की आवश्कता है।

रविवार, 17 दिसंबर 2017

शैव एवं वैष्णव सम्प्रदाय के मिलन का प्रतीक : हरिहर

शैवों एवं वैष्णवों पंथों के आपसी वर्चस्व की लड़ाई ने हिन्दू धर्म की बहुत हानि हुई। आपसी संघर्ष में भारी रक्तपात एवं एक दूसरे के पूजा स्थलों का नुकसान पहुंचाना भी सम्मिलित था। यह अनेकेश्वर वाद की देन प्रतीत होता है। वैसे तो हमारा दर्शन कहता है कि ईश्वर एक है, परन्तु इन पंथों की आपसी की वर्चस्व की लड़ाई ने अनेक देवता उत्पन्न कर दिए। एकेश्वर से बहुदेववाद चल पड़ा। हजारों वर्षों तक चले झगड़े में शैव एवं वैष्णव नामक दो धाराओं में खूब रक्तपात हुआ तथा इसी के चलते शाक्त धर्म की उत्पत्ति हुई। जिसने दोनो सम्प्रदायों में समन्वय का काम किया। 
शैव एवं वैष्णव सम्प्रदाय के मिलन का प्रतीक संघाट नंदी एवं गज विट्ठल मंदिर हम्पी कर्णाटक
जब आपस में मिलन हुआ तो वर्तमान में स्थिति यह है कि शैव, शाक्त एवं वैष्णवों में पता नहीं चलता कि कौन किस सम्प्रदाय का अनुशरणकर्ता है। कहा जाता है कि इनके समन्वय में अत्रिपुत्र दत्तात्रेय का प्रमुख स्थान है। इसके पश्चात में इनमें समन्व्य का कार्य आदि शंकराचार्य के हाथों हुआ। जब बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म के विस्तार के कारण हिन्दू धर्म का ह्रास हो रहा था। दीर्घावधि के प्रयास के पश्चात कालांतर में समन्यव ऐसा हुआ कि मंदिर निर्माण की पंचायतन शैली विकसित हुई। मूल देवता के मुख्य मन्दिर के साथ चारों कोनों में अन्य अनुषांगी देवों के मंदिर एक ही परिसर में बनने लगे। इसे पंचायतन शैली कहा गया। यह भी हम मान सकते हैं कि उत्तर एवं दक्षिण का मिलन हुआ।
हरिहर की संघाट प्रतिमा छत्तीसगढ़ पाली नवमी शताब्दी
आज हम देखते हैं कि शिवालयों में भित्तियों पर वैष्णव पंथ के देवताओं की उपस्थिति दिखाई देती है। शिवालयों में गर्भगृह के द्वारपट पर दशावतारों का अंकन प्रमुखता से दिखाई देता है, जिसमें विष्णु के अवतारों को स्थान दिया जाता है। वैष्णव मंदिरों में शिव परिवार के गणपति की उपस्थिति प्रमुखता से दिखाई देती है तथा कार्तिकेय एवं कीर्तिमुख भी हमें वैष्णव मंदिरों में दिखाई देते हैं। जो कालांतर में शिल्प परम्परा का आवश्यक अंग बन गए। दश दिक्पाल, सप्तमातृकाएँ महिषसुरमर्दनी की प्रतिमाएँ भी प्राचीन शिवालयों में प्रमुखता से दिखाई देती है। इसके पश्चात पुराणों और स्मृतियों के आधार पर जीवन-यापन करने वाले लोगों का संप्रदाय ‍बना जिसे स्मार्त संप्रदाय कहते हैं।
सपरिवार हरिहर मिलन राजा रवि वर्मा का चित्र
प्रतिमा शिल्प में भी संघाट प्रतिमाओं का निर्माण प्रारंभ हुआ, जिसमें हरिहर, हरिहरार्क, त्रिदेव एवं हरिहरार्कब्रह्म की प्रतिमाएँ भी हमे मिलती हैं। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले अंतर्गत मदकूद्वीप के उत्खनन में हम्रें स्मार्त लिंग प्राप्त होते हैं। पंकज दीक्षित जी Pankaj Dixit द्वारा लगाए गए चित्र ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया जिसमें गजारुढ़ विष्णु लक्ष्मी तथा नंदी सवार शिव पार्वती दिखाई दे रहे हैं। चित्रकार ने गज एवं नंदी को ऐसे चित्रित किया है कि दोनों के शीश आपस में मिले हुए हैं। ध्यान से देखने पर ही दोनो अलग दिखाई देते हैं। एक तरफ़ से गजमुख एवं दूसरी तरफ़ से नंदी मुख। यह दोनों सम्प्रदायों के मिलन के प्रतीक के रुप में देखा जा सकता है। 
हनुमान द्वारा शिवार्चन फ़णीकेश्वर महादेव फ़िंगेश्वर छत्तीसगढ़ परवर्ती काल
पंचायतन मंदिर शैली के अतिरिक्त में शिल्प में हरिहर की प्रतिमा हमें छतीसगढ़ के पाली स्थित शिवालय की भित्ति से प्राप्त होती है। राजिम फ़िंगेश्वर शिवालय फ़णीकेश्वर महादेव में भित्ति जड़ित एक प्रतिमा में हनुमान को शिवार्चना करते दिखाया गया है। मदकूद्वीप से हमें संघाट प्रतिमा के रुप में स्मार्त लिंग प्राप्त होता है। हम्पी के विट्ठल मंदिर एवं हजारा राम मंदिर में मुझे नंदी एवं गज की संघाट प्रतिमा मिलती है। यह सब शैव एवं वैष्णव सम्प्रदायों के सम्मिलन के प्रतीक चिन्ह हैं। जब दोनो सम्प्रदाय एकाकार हुए तब इस दर्शाने के लिए संघाट प्रतिमाओं का निर्माण प्रारंभ हुआ। हो सके यह आपको अन्य मंदिरों में भी दिखाई दे, जरा ध्यान दीजिएगा।

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

लोकपर्व गणगौर एवं निमाड़ का नृत्य

राजस्थान, मालवा, निमाड़, हरियाणा में होली के बाद मनाया जाने वाला प्रमुख लोकपर्व गणगौर है। जयपुर में मनाए जाने वाले गणगौर की झांकियाँ प्रसिद्ध है। यह चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तीज को आता है | इस दिन कुवांरी लड़कियां एवं विवाहित महिलायें शिवजी (इसर जी) और पार्वती जी (गौरी) की पूजा करती हैं | पूजा करते हुए दूब से पानी के छांटे देते हुए गोर गोर गोमती गीत गाती हैं।
ईस्सर जी 
राजस्थानी में कहावत भी है तीज तींवारा बावड़ी ले डूबी गणगौर। अर्थ है की सावन की तीज से त्योहारों का आगमन शुरू हो जाता है और गणगौर के विसर्जन के साथ ही त्योहारों पर चार महीने का विराम आ जाता है। यह त्यौहारों का अंतिम सत्र होता है, इसके बाद सीधे सावन की तीज आती है और त्यौहारों का पुन; आरंभ होता है। 
गोरजा 
पौराणिक आख्यान के अनुसार पार्वती ने शंकर भगवान को पति ( वर) रूप में पाने के लिए व्रत और तपस्या की। शंकर भगवान तपस्या से प्रसन्न हो गए और वरदान माँगने के लिए कहा। पार्वती ने उन्हें वर रूप में पाने की इच्छा जाहिर की। पार्वती की मनोकामना पूरी हुई और उनसे शादी हो गयी। बस उसी दिन से कुंवारी लड़कियां मनवांछित वर पाने के लिए ईसर और गौरा की पूजा करती है। सुहागिन स्त्री पती की लम्बी आयु के लिए पूजा करती है। लड़कियाँ सोलह दिन तक सुबह जल्दी उठ कर बाड़ी बगीचे में जाती है दूब व फूल लेकर आती है। दूब लेकर घर आती है उस दूब से दूध के छींटे मिट्टी की बनी हुई गणगौर माता को देती है। थाली में दही पानी सुपारी और चांदी का छल्ला आदी सामग्री से गणगौर माता की पूजा की जाती है तथा चांदी के छल्ले से गणगौर को पानी पिलाया जाता है। 
निमाड़ का गणगौर नृत्य 
आठ वे दिन ईसर जी पत्नी (गणगौर ) के साथ अपनी ससुराल पधारते है। उस दिन सभी लड़कियां कुम्हार के यहाँ जाती है और वहा से मिट्टी की झाँवली ( बरतन) और गणगौर की मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी लेकर आती है। उस मिट्टी से ईसर जी, गणगौर माता, मालन,आदि की छोटी छोटी मूर्तिया बनाती है। जहा पूजा की जाती उस स्थान को गणगौर का पीहर व जहाँ विसर्जित की जाती है वह स्थान ससुराल माना जाता है |
गणगौर नृत्य की लोक कलाकार 
गणगौर माता की पूरे राजस्थान में पूजा की जाती है। चैत्र मास की तीज सुदी को गणगौर माता को चूरमे का भोग लगाया जाता है। दोपहर बाद गणगौर माता को ससुराल विदा किया जाता है। यानी की विसर्जित किया जाता है । विसर्जन का स्थान गाँव का कुआ ,जोहड़ तालाब होता है। कुछ स्त्रियाँ जो शादी शुदा होती है वो अगर इस व्रत की पालना करने से निवर्ती होना चाहती है वो इसका उजणा (उधापन) करती है जिसमें सोलह सुहागन स्त्री को समस्त सोलह श्रृंगार की वस्तुएं देकर भोजन करवाती है।  
लोक कलाकार महाजन निमाड़ 
गणगौर माता की पूरे राजस्थान में जगह जगह सवारी निकाली जाती है जिस मे ईशर दास जीव गणगौर माता की आदम कद मूर्तीया होती है। जयपुर, उदयपुर की धींगा गणगौर, बीकानेर की चांद मल डढ्डा की गणगौर, प्रसिद्ध है। गणगौर राजस्थान में आस्था प्रेम और पारिवारिक सौहार्द का सबसे बड़ा उत्सव है। गण (शिव) तथा गौर(पार्वती) के इस पर्व में कुँवारी लड़कियां मनपसंद वर पाने की कामना करती हैं। विवाहित महिलायें चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर पूजन तथा व्रत कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।

निमाड़ अंचल में गणगौर नृत्य की परम्परा भी है। गणगौर पूजन में कन्यायें और महिलायें अपने लिए अखंड सौभाग्य, अपने पीहर और ससुराल की समृद्धि तथा गणगौर से हर वर्ष फिर से आने का आग्रह करती हैं।

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

दोगला : शब्द चिंतन ( ललित निबंध)

दोगला एक ऐसा शब्द है जिसका प्रचलन धड़ल्ले से होता दिखाई/सुनाई देता है। दोगला आदमी, दोगली राजनीति, दोगली बात, दोगला नेता, दोगली स्त्री इत्यादि बहुधा प्रयुक्त होता है। वर्तमान में यह शब्द धोखा देने वाले, दो मुंही बातें करने वाले, अविश्वसनीय व्यक्ति के लिए संदर्भ में लिया जाता है। 

जबकि भारत में पानी उलीचने की बांस कमचियों से बने टोकरे लिए दोगला शब्द संज्ञा के तौर पर प्रयुक्त होता है। इसे हिन्दी वांग्मय का शब्द माना जाता है। परन्तु यही शब्द फ़ारसी में पहुंच कर घातक होकर लड़ाई झगड़े की जड़ गाली बन जाता है तथा अर्थ बदलकर वर्णसंकर, जारज (प्रेमी/उपपति/आशिक से उत्पन्न होने वाला) हो जाता है।

शब्द की महिमा अपरम्पार है तथा पूर्व प्रचलित एकार्थी शब्द कालांतर में बहुअर्थी हो जाता है। जिस मानक अर्थ में प्रयुक्त होने के लिए शब्द ने जन्म लिया, कभी कभी तो उसके विपरीत अर्थ में भी प्रयुक्त होने लगता है। जैसे सम्भ्रांत - सम+भ्रांत। जो दशों दिशाओं से याने सब तरफ़ से विचलित (पागल) हो गया हो (निरुक्त) उसे सम्भ्रांत कहा गया। परन्तु वर्तमान में इसका प्रयोग कुलीन के समानार्थी होने लगा। किसी परिवार या व्यक्ति को सभ्य बताने के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है। 

लोकप्रचलित हिन्दी भाषा में विभिन्न भाषाओं के शब्दों को सहज स्वीकार किया गया है, वे अब इतने अधिक घुलमिल गए हैं कि पता ही नहीं चलता किस भाषा से इन शब्दों की व्युत्पति हुई है। अरबी, फ़ारसी, उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्द हिन्दी प्रवेश कर इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त कर गए हैं कि वार्तालाप या लेखन के समय कोई इनके समानार्थी शब्द भी नहीं ढूंढता एवं सहजता के साथ समाज भी स्वीकार लेता है। 

दोगले से मिलाजुला एक शब्द और है हरामजादा, इसका प्रयोग भी गाली के तौर पर होता है। इसका शाब्दिक अर्थ है हरम में जन्म लेने वाला। मुगल बादशाहों के हवसगाह होते थे हरम। जिसमें हजारों स्त्रियाँ रखी जाती थी। रखैल (रखी हुई) शब्द भी यहीं की व्युत्पत्ति है। इन स्त्रियों से जन्म लेने वाले हरामजादे कहे जाते थे। हरामजादे शब्द संज्ञा है, जब यही शब्द प्रवृत्ति बन जाता है तो हरामजदगी हो जाता है अर्थात जिसके स्वभाव में ही जन्म से दोगलापन है। 

हरामजादा या दोगला शब्द के अर्थ में संस्कृत में जारज: शब्द प्रयुक्त होता है। जार: (जारयति इति जृष् वयोहानौ धातौ: धञ, णिलुक् च) उपपति: (उपमित: पत्या) ये दो पुल्लिंग नाम मुख्य से भिन्न अप्रधान पति (यार) के हैं। अमृते भर्तरि जारज:, मृते भर्तरि जारजो गोलक:। (अमरकोश) जार से उत्पन्न संतान को जारज कहा गया है। इस तरह हम देखते हैं कि संज्ञा के लिए प्रयोग होने वाले शब्द प्रवृत्ति के रुप में प्रयुक्त होते हुए विशेषण बन गये और विशेषता बताने/जताने के लिए प्रयुक्त होने लगे तथा गाली के रुप में प्रतिष्ठित हो गए।

राम मनोहर लोहिया जी का कहा स्मरण हो आता है  कि तन का दोगला एक बार चलता है पर मन का दोगला घातक होता है अर्थात मन के दोगले को अधिक घातक बताया गया। मन का दोगला होना व्यक्ति की प्रवृत्ति हो गई। दोगला शब्द वर्तमान में प्रवृत्ति बन गया। वर्तमान समय में दोगले शब्द ने अन्य अर्थ ग्रहण कर लिया। अब इसका अर्थ 1. दो तरह की बातें करने वाला 2. जिसकी कथनी और करनी में विसंगति हो, में बदल गया। 

समाज में ऐसे मनुष्य (स्त्री/पुरुष) भी रहते हैं जिनकी कथनी और करनी में विसंगति होती है। ये मुंह के सामने मीठी-मीठी मुंह चोपड़ी बातें करते हैं और पीठ पीछे षड़यंत्र करने से बाज नहीं आते, मौका पाकर खंजर भी चला देते हैं। ऐसा नहीं है कि इनमें कोई दोष है, यह इनकी जन्मजात प्रवृति है, जो दिनचर्या में सम्मिलित है। दोगलई किये बिना ये रह ही नहीं सकते। ये व्यक्ति, समाज, देश, राष्ट्र किसी के साथ भी दोगलाई कर सकते हैं। इनकी दोगलाई की कोई सीमा चिन्हित या तय नहीं है।

मनोवैज्ञानिकों ने अनुभव किया कि कुछ लोग परिस्थितिवश दोगलई करना चाहते हैं, परन्तु कर नहीं पाते। क्योंकि उनकी प्रवृत्ति में नहीं है। प्रवृत्ति में होने के कारण सहजता होती है तथा प्रवृत्ति में न होने के कारण कृत्रिमता असहज कर देती है। और वे अपनी दोगलई को स्वत: ही प्रकट कर देते हैं। क्योंकि कबीर दास जी ने कहा है "सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदय सांच हें, वाके हिरदय आप॥" कहीं न कहीं उसके हृदय में आप है जो उसे दोगलई करने से रोक देता है। 

इतिहास में देखते हैं कि बहुत सारे राजे-महाराजे, यति-जति दोगलों की भेट चढ़ गए तथा वर्तमान में भी चढ़ रहे हैं। ऐसा नहीं है यह प्रजाति सिर्फ़ भारत में ही पाई जाती है। युरोप का उदाहरण हम ले सकते हैं, यीशु ने मनुष्यों को सन्मार्ग बताने में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया। जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया तो कहा- हे पिता (ब्रह्म), इन्हें माफ कर दे (जिन्होंने सूली पर चढ़ाया था) क्योंकि इन्हें नहीं मालूम है कि ये क्या कर रहे हैं। 

दोगले लोगों को ढूंढने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, वे आस-पास ही पाए जाते हैं, जो निकटस्थ होकर अपनी करनी करने तैनात रहते हैं। यीशु को सूली पर चढाने वाले दोगलई प्रवृत्ति से ग्रसित लोग थे। इसलिए यीशु ने उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना की। पर हर आदमी संत नहीं होता। लौकिक जीवन में दोगली प्रवृत्ति के लोगों को पहचान कर बचना ही श्रेयकर होता है। दोगला मनुष्य कितना भी सोने चांदी का मुलम्मा ओढ़ ले पर उसकी प्रवृत्ति बता देती है कि वह क्या है। इति दोगला शब्दाख्यान।

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

लोकपर्व : मालवा निमाड़ का संजा उत्सव

उत्सवों एवं उसकी रचनाधर्मिता से मनुष्य का आदिकाल से नाता रहा है, जिसकी प्राचीनता के प्रमाण हमें शैल चित्रों एवं भित्ति चित्रों के माध्यम से मिलते हैं। हमारे प्रत्येक पर्वों में मांडणे का अत्यंत महत्व है, जिसे हम पर्व की मान्यता के अनुसार मांडते हैं। ऐसा ही एक पर्व मुझे देखने मिला संजा बाई, जिसे मालवा एवं निमाड़ अंचल में कुँवारी बालाओं द्वारा मनाया जाता है।

मान्यता है कि संजाबाई पार्वती जी का ही एक रूप है। जिनकी श्राद्धपक्ष में सोलह दिनों तक पूजा की जाती है। भारत के कई प्रांतों में संजा अलग-अलग रूप में पूजी जाती है। महाराष्ट्र में यही संजा ‘गुलाबाई, फ़ूलाबाई’ बनकर एक माह तक अपने पीहर में रहती है तो वही राजस्थान में ‘संजाया’के रूप में श्राद्ध पक्ष में यह कुँवारी लड़कियों की सखी बन उनके साथ सोलह दिन बिताती है। कुँवारी लड़कियाँ संजाबाई की पूजा अच्छे वर की प्राप्ति के लिए करती है। 

भाद्रपद माह के शुक्ल पूर्णिमा से पितृमोक्ष अमावस्या तक पितृपक्ष में कुंआरी कन्याओं द्वारा मनाया जाने वाला पर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से मालवा-निमाड़, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र आदि में मनाया जाता है। संजा पर्व में श्राद्ध के सोलह ही दिनकुंवारी कन्याएँ शाम के समय एक स्थान पर एकत्रित होकर गोबर के मांडने मांडती हैं और संजा के गीत गाती हैं व संजा की आरती कर प्रसाद बांटती हैं। सोलह ही दिन तक कुंवारी कन्याएँ गोबर के अलग-अलग मांडने मांडती है तथा हर दिन का एक अलग गीत भी होता है।

मालवा में ‘संजा’ का क्रम पाँच (पंचमी) से आरंभ होता है। पाँच पाचे या पूनम पाटला से। दूसरे दिन इन्हें मिटाकर बिजौर, तीसरे दिन घेवर, चौथे दिन चौपड़ और पंचमी को ‘पाँच कुँवारे’ बनाए जाते हैं। लोक कहावत के मुताबिक जन्म से छठे दिन विधाता किस्मत का लेखा लिखते हैं, जिसका प्रतीक है छबड़ी।

सातवें दिन सात्या (स्वस्तिक) या आसमान के सितारों में सप्तऋषि, आठवे दिन ‘अठफूल’, नवें दिन ‘वृद्धातिथि’ होने से डोकरा-डोकरी और दसवें दिन वंदनवार बाँधते हैं। ग्यारहवें दिन केले का पेड़ तो बारहवें दिन मोर-मोरनी या जलेबी की जोड़ मँडती है। तेरहवें दिन शुरू होता है किलाकोट, जिसमें 12 दिन बनाई गई आकृतियों के साथ नई आकृतियों का भी समावेश होता है।

इन सोलह दिनों पितृ तर्पण के साथ संजा का उत्सव पितरों की याद की उदासी को उत्सव में बदल देता है। भित्ति पर मांडी गई संजा की पूजा करने के बाद प्रसाद बांटा जाता है। बालिकाएँ इस उत्सव को मनाकर प्रसन्नता प्रकट करती हैं तथा संजा उत्सव के नाम पर आज भी प्राचीन परम्परा को अक्षुण्ण रखना ही बड़ी बात है, वरना लोक परम्पराओं का लोपन गोपन हो जाना कोई बड़ी बात नहीं हैं, इसे जनमानस में जीवित रखना बड़ा काम है। इसके साथ ही गोबर से बनाई जाने वाली भित्ति चित्रकला भी उत्सव के माध्यम से बची हुई है जो पुर्वजों की आदिम कला से हमें जोड़ती है।

बुधवार, 5 जुलाई 2017

प्राचीन काल के प्रतिमा शिल्प में आभूषण अलंकरण

स्त्री एवं पुरुष दोनों प्राचीन काल से ही सौंदर्य के प्रति सजग रहे हैं। स्त्री सौंदर्य अभिवृद्धि के लिए सोलह शृंगार की मान्यता संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक चली आ रही है। कवियों ने अपनी कविताओं में नायिका के सोलह शृंगार का प्रमुखता से वर्णन किया है तो शिल्पकार भी क्यों पीछे रहते, उन्होंने भी प्रतिमा शिल्प में सौंदर्य वृद्धि की सभी युक्तियों को कुशलता के साथ उकेरा है। मंदिरों की भित्तियों में स्थापित जब हम प्रतिमा शिल्प को देखते हैं तो नख-शिख अलकंरण दिखाई देता है, जिसमें वस्त्राभूषण अलंकरण प्रमुखता से उकेरे गए हैं।
पायल धारिणी (राजा रानी मंदिर भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
गुप्तकाल से मंदिर शिल्प योजना में भित्तियों में प्रतिमा शिल्प का प्रयोग दिखाई देता है। इसके पश्चात के काल में प्रतिमा शिल्प के अलंकरण में भिन्नता स्पष्ट दिखाई देती है। वस्त्रों के छापे, पहने का ढंग एवं आभूषणों की बनावट भी पृथक दिखाई देती है। इन प्रतिमाओं में हम देखते हैं कि पुरुष सौंदर्य की वृद्धि के लिए केश विन्यास, वस्त्र, माला, बाजूबंद पहने दिखाई देते हैं। जबकि स्त्रियों के आभूषण अलग दिखाई देते हैं। जिस तरह वर्तमान काल में वस्त्रों एवं आभूषणों में बदलाव फ़ैशन के आधार पर होता है उसी तरह प्राचीन काल में बदलाव दिखाई देता है। 
संध्या काल ( सूर्य मंदिर कोणार्क उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
लगभग तीस वर्षों के भ्रमण काल में मैने विभिन्न कालों में निर्मित मंदिरों के स्थापत्य एवं प्रतिमा शिल्प को देखा है। आप प्रतिमा अलंकरण को देखकर उसके निर्माण काल का अंदाजा लगा सकते हैं। आभूषण (आभरण) प्राचीन काल से ही अलंकरण का साधन रहे हैं। भारत के निवासी प्राचीन काल से आभूषन प्रिय रहे हैं जो आभूषण केश से लेकर पैरों तक धारण करते थे। केशों में चिमटी, माथे पर बेन्दा, कानों में कुंडल, गले में हार, बाजू पर बाजूबंद, कलाई में चूड़ी, कमर में कमरधनी, उंगली में अंगूठी एवं पैरों में पायल का अलंकरण होता था। वर्तमान में इन आभूषणों का प्रयोग उसी रुप में विद्यमान है।
संध्या काल ( शिवालय देवर बीजा, जिला बेमेतरा छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा
प्रतिमाओं के शीर्ष पर कीरीट मुकुट दिखाई देता है। स्त्री एवं पुरुष कानों को समान रुप से विभूषित करते थे। तत्कालीन साहित्य में कुंडल एवं कर्णिका का वर्णन होता है। विविध धातुओं से निर्मित रत्नकर्णिका, दारुकर्णिका, त्रपुकर्णिका कहलाती थी। इसके अतिरिक्त आमुक्तिका आभूषण का उल्लेख मिलता है। इसमें कुंडल, आधुनिक झुमके, कर्णिका, बाली एवं आमुक्तिका को टॉप्स माना जा सकता है। घोंघे की खोल जैसे टॉप्स वर्तमान में भी दिखाई देते हैं।
नर्तकी (गणेश मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा
समकालीन साहित्य में कंठ में पहने जाने वाले विभिन्न प्रकार के हारों का उल्लेख है।  जिसमें सुवर्ण सूत्र, कंठ सूत्र, अर्ध हार, हार के साथ मुक्ता हारों में नील मुक्ताहार, लोहित मुक्ताहार एवं श्वेत मुक्ताहार तथा विभिन्न धातुओं से निर्मित रत्नहार, रुचक हार, हिरण्यहार, सुवर्णहार, दंतहार, काषार्पण हार चन्द्रहार प्रमुख हैं, इसके परवर्ती राजपूत काल में नौलखा हार की खूब धूम रही। कंठ आभूषणों में वनमाला का उल्लेख भी आवश्यक है। अधिकतर विष्णु की मूर्ति में वनमाला का अंकन मिलता है। बाजू में धारण करने वाले आभूषण वलय, केयूर एवं अंगद नाम से जाने गए। वलय हाथीदांत से युक्त होता था, केयूर स्वर्ण से बनता था तथा अंगद स्वर्ण एवं रजत के तारों से बनाया जाता था। 
कलश धारिणी देवी (जराय का मठ बरुआ सागर उत्तर प्रदेश) फ़ोटो ललित शर्मा
चूड़ियों को कटक वलय यादि कहा जाता था, इन्हें विभिन्न धातुओं से एवं आकारों में बनाया जाता था। अंगुली में पहने के लिए अंगुलिमुद्रा एवं मुद्रिका या अंगुलीयक होती थी। कई प्रतिमाओं में तो कई अंगुलियों में अंगूठी धारण किए हुए दिखाया गया है। इसके साथ ही मेखला कमर का आभूषण था इसे स्त्रियाँ धारण करती थी, यह रत्न एवं ताम्रयुक्त होती थी। इसे करधनी, किंकणी, कटक, सुवर्णसूत्र, रशना, कांची मेखला आदि कहा जाता है। घुंघरुयुक्त बजने वाली करधनी को कांचीगुण कहा गया है। पैरों में पैजनी, पायल इत्यादि धारण की जाती थी, यह लघुघंटिकायुक्त रजत एवं कांसे से निर्मित की जाती थी। 
नदी देवी गंगा ( देऊर मंदिर मल्हार जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा
प्रतिमा शिल्प में अप्सराओं, नायिकाओं एवं देवियों को भिन्न भिन्न तरह के आभूषणों से अलंकृत किया जाता था तथा उनके अनुचरों, परिचारको एवं परिचारिकाओं के शरीर पर आभूषण कम दिखाई देते हैं। उस काल में भी बड़े लोग स्वर्ण, रजत एवं बहुमुल्य रत्न जड़ित आभूषणों का प्रयोग करते थे। जिनके पास (दास दासियाँ) अधिक धन नहीं होता था वे रजत, कांसे एवं तांबे के आभूषण धारण करते थे। वर्तमान में यही परिपाटी दिखाई देती है। आभूषण हमेशा उच्चकुल एवं धनवानों के ही होते हैं।
शाल भंजिका ( मुक्तेशर मंदिर समूह भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
आभूषणों का महत्व सौंदर्य वृद्धि के साथ धार्मिक भी है, जिस प्रकार विवाहित स्त्रियां बेन्दा (टीका) धारण करती हैं, कुछ स्थानों पर मंगलसूत्र विवाहित एवं सौभाग्य का सूचक माना गया है। इसी तरह पुरुष भी ताबीज इत्यादि धारण करते थे। उत्खनन के दौराण अर्ध मूल्यवान रत्न अधिक प्राप्त होते हैं, जिनका आभूषणों में प्रयोग किया जाता था। स्वर्ण एवं रजत के आभूषणों में पत्थर भी जड़े जाते थे, जिन्हें रत्न कहा जाता है। गोमेद, जम्बुमणि, स्फ़टिक, सेलखड़ी, हाथी दांत, शीशा आदि जड़े जाते थे। इसके अतिरिक्त मिट्टी के मनके भी धारण किए जाते थे। 
चंवर धारिणी ( विट्ठल मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा
उपरोक्त आलेख के लिए मैने भारत के चारों ओर के विभिन्न मंदिरों की भित्तियों में जड़ित प्रतिमाओं के चित्रों को जुटाया है। इनमे एक चीज समान है, वह है कि किसी भी प्रतिमा की नाक में छिद्र नहीं है अर्थात प्राचीन काल में नाक में नथ, कील, लौंगादि आभूषण धारण नहीं किए जाते थे। कुछ विद्वानों का मत है कि कुषाण काल तक की प्रतिमाओं में नाक का आभूषण प्राप्त नहीं होता। मेरे द्वारा खींचे गए चित्रों में आठवीं शताब्दी से लेकर चौदहवी एवं पन्द्रहवी शताब्दी तक की प्रतिमाएँ जुटाई गई है। जिसमें किसी ने भी नाक का आभूषण नहीं पहना है।
क्षीर सागर में शेष शैया पर भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी (लक्ष्मीनारायण मंदिर ओरछा) फ़ोटो ललित शर्मा
अब प्रश्न यह उठता है कि महिलाओं द्वारा नाक में आभूषण कब से पहने जाने लगा। इसका जवाब भी मंदिरों से प्राप्त होता है। जब मैं ओरछा भ्रमण कर रहा था तब लक्ष्मीनारायण मंदिर की भित्तियों पर अठारवीं शताब्दी की भित्ति चित्रकारी दिखाई थी। इस चित्रकारी में रामायण के प्रसंगों से लेकर अंग्रेजों के साथ युद्ध तक को प्रदर्शित किया गया है। इन भित्ति चित्रों में कृष्ण राधा के उपवन विहार का प्रसंग भी दिखाई देता है, इस चित्र में सभी महिलाओं ने नाक में नथ पहन रखी है। शेष शैया पर विश्राम करते विष्णु के चित्र में भी लक्ष्मी की नाक में नथ पहनाई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि नाक में आभूषण पहनने की परम्परा मुगल काल में प्रारंभ हुई और अद्यतन जारी है।    

शनिवार, 1 जुलाई 2017

मानव का पक्षी प्रेम एवं शुक सारिका प्रसंग


क्षियों से मनुष्य का जन्म जन्मानंतर का लगाव रहा है। पक्षियों का सानिध्य मनुष्य को मन की शांति प्रदान करता है तो बहुत कुछ सीखने को उद्यत करता है। कुछ पक्षी तो ऐसे हैं जो मनुष्य से उसकी बोली में बात करते हैं और इन्होंने सामान्य नागरिक के गृह से लेकर राजा महाराजाओं के महलों के अंत:पुर एवं ॠषियों की कुटियों में भी स्थान पाया है। शुक एवं काग ऐसे पक्षी हैं, जो ॠषियों के सानिध्य में ज्ञानार्जन कर शुकदेव एवं कागभुसुण्डि के नाम से लोक में प्रतिष्ठित हुए। शुक के सम्बंध में एक धारणा यह भी है कि वह बहुत बुद्धिमान होता है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार शुक ने शिवजी का समस्त ज्ञान श्रवण द्वारा आत्मसात कर लिया था। वही अध्यात्म-पारंगत शुकदेव रूप में अवतरित हुआ।  इतिहास आलेख  शुक सारिका 
शुक सारिका खजुराहो 
विरहणी के एकांत के संगी के रुप में तोता-मैना लोक प्रसिद्ध हैं। अंत:पुर की विरह व्याकुल रमणी के द्वारा इन पक्षियों के संवाद से संस्कृत साहित्य भरा पड़ा है। तोता-मैना का लोक प्रसिद्ध कहानी एवं संवाद एक समय में यह युवा एवं युवती के मुंह से सुना जा सकता था। शुक-सारिका को लेकर बहुत ही कथाएं प्रचलित हैं, इन्हीं का लोक कथाओं में रूपान्तर ‘किस्सा तोता-मैना’ के नाम से हुआ जिसके विविध संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं। ये दोनो पक्षी मनुष्य की बोली में बोलने की क्षमता के कारण प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान तक मनुष्य के साथी बने हुए हैं।

ऐसे में ये पक्षी शिल्पकार की दृष्टि से कैसे ओझल हो सकते थे। तोता-मैना को शिल्पकारों में अपने शिल्प में शुकसारिका के रुप में स्थान दिया। प्राचीन मंदिर स्थापत्य में शुकसारिका का शिल्पांकन प्रमुखता से दिखाई देता है। शिल्पकारों ने शुकसारिका को अपने शिल्प का विषय बनाया, जिससे युगों युगों तक पक्षी एवं मनुष्य के सानिध्य, प्रेम एवं सहवास को आने वाली पीढियाँ जान सकें। मुझे भारत में आठवीं नवमी शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी तक के स्थापत्य में शुक सारिका का शिल्पांकन दिखाई देता है। ऐसे में शुक सारिका के शिल्पांकन से खजुराहो के मंदिर कैसे अछूते रह सकते हैं। जहाँ कामसूत्र का शिल्पांकन हो वहाँ शुक सारिका का शिल्पांकन अवश्य मिलता है क्योंकि कामसूत्र में शुक सारिकाओं के साथ आलाप करने कराना की क्रिया को चौसठ कलाओं में गिना गया है।
लोक में तोता ही एक ऐसा पक्षी एवं जीव है जो मनुष्य की वाणी का अनुकरण कर सकता है। इसे बोलना सिखाना पड़ता है या यह किसी भी बोलते हुए मनुष्य का अनुकरण कर रटता है, परन्तु मैना स्वत: बोलती है। बस्तर की पहाड़ी मैना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी आवाज में बात करके अचंभित कर दिया था। शुक सारिका लोक प्रसिद्ध हैं, शुक ख्याति तो ऐसी है कि इसे पालने वाले सबसे पहले राम राम, सीता राम बोलना सिखाना है। किसी के घर के शुक की वाणी सुनकर उस परिवार के आचार विहार का आंकलन किया जा सकता है कि परिवार कितना सुसंस्कृत एवं सभ्य है। 
मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर की शुक सारिका 
साहित्य में शुक ने प्रमुख स्थान पाया है, इसकी उपस्थित संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक प्राप्त होती है। जायसी के ‘पद्मावत’ में तोते को गुरु और मार्गदर्शक का पद प्राप्त है। ‘हीरामन’ नाम से वह रत्नसेन और पद्मावती को परामर्श भी देता है और उनके मिलन में सहायक भी होता है। रचना के अन्त में उसके बारे में स्पष्ट लिखा है—सूआ सोई जे पंथ दिखावा। बिनु गुरु जगत को निर्गण पावा।
मुंशी प्रेमचंद की कहानी आत्माराम में वेदीग्राम का सुनार महादेव तोते के साथ अपने एकाकीपन को बांट लेता है। तो प्राचीनकाल के अंत:पुर की रमणियाँ भी शुक के साथ संवाद कर अपने एकाकीपन को दूर करती थी। छत्तीसगढ़ के लोकगीतों में सुआ प्रमुख स्थान रखता है। यहाँ यह विरहणी का संवदिया बनता है और सुआ गीत एवं सुआ नृत्य के रुप में लोक में स्थापित एवं प्रतिष्ठित हो जाता है। 
तोते की चोंच (शुक चंचू) जैसी किंचित टेढ़ी नासिका सौंदर्य का प्रतीक बनती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की शुकनासिका और बिम्ब अधरों का बहुत ही आकर्षक चित्र खींचा है। एक तोते को उर्मिला के नाक के मोती पर होंठों की कान्ति पडऩे के कारण अनार के दाने की भ्रान्ति हुई। फिर नाक को देखकर सोचता है यह दूसरा तोता कहां से आ गयाकवियों ने तोते का अनेक रूपों में चित्रण किया है। बड़े शौक से पाला हुआ तोता भी कभी उपेक्षा का शिकार हो जाता है और काले कौवों को सम्मान मिलता है। बिहारी ने अन्योक्ति के रूप में इसका चित्रण किया है।
मरत प्यास पिंजरा पर्यो सुआ समै के फेर।
आदर दै दै बोलियत वाईसु बलि के बेर॥
शुक-सारिका तो अनादिकाल से ही घरों एवं आश्रमों की शोभा बढ़ाते रहे हैं। जगज्जनी जानकी की विदा के समय उनके द्वारा पाले हुए ये पक्षी इतने दुःखी हुए कि इन्होंने परिजनों को भी अधीर कर दिया—
सुक सारिका जानकी ज्याये। कनक पिंजरन्ह राखि पढ़ाये॥
व्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुवि धीरजु परिहरह न केही॥
शुक सारिकाएँ राज महलों या किसी विलासी नागरिक के बहिर्द्वार तक ही नहीं मिलती थी इनकी उपस्थिति तपोवन में ॠषि निवासों में भी होती थी। सुप्रसिद्ध वाणभट्ट ने अपने पूर्व पुरुष कुबेर भट्ट का परिचय देते हुए गर्व से लिखा है कि उनके गृह के शुकों एवं सारिकाओं ने समस्त वांग्मय का अभ्यास कर लिया था और यजुर्वेद एवं सामवेद का पाठ करते समय पद पद पर ये पक्षी विद्यार्थियों की गलतियां पकड़ा करते थे। कालांतर में तो शुक इतने प्रबुद्ध हो गए कि शास्त्रार्थ तक करने लगे। शास्त्रार्थ-दिग्विजय के लिए निकले आचार्य शंकर ने पनिहारिनों से मंडन मिश्र का घर पूछा तो उन्होंने यही तो कहा था—
स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं कीरांगना यत्र गिरो गिरन्ति।
द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धः जानाहितं मण्डन मिश्र धामम्॥
मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर में लेखक 
राष्टकवि दिनकर ने कहा था कि पक्षी और बादल। ये भगवान के डाकिये हैं। जो एक महादेश से। दूसरे महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं। मगर उनकी लाई चिट्ठियां/पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बांचते हैं। प्राचीन काल से लेकर अद्यतन पक्षियों एवं मनुष्य का साथ बना रहा और पक्षियों के माध्यम से मनुष्य ने अपनी वाणी को विस्तार दिया। इन पक्षियों ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के कारण साहित्य एवं शिल्प में महत्वपूर्ण स्थान भी पाया। प्रकृति के साथ जुड़े मनुष्यों का भविष्य में भी इनसे साथ बना रहेगा। इति शुक सारिका प्रकरणम्।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

बारूद के धमाकों से नहीं मिटती लोक संस्कृति : अबुझमाड़ में करसाड़

पच्चीस बरसों के बाद अबुझमाड़ के नारायणपुर मार्ग पर जा रहे थे, उबड़-खाबड़ इकहरी सड़क अब चिकनी और दोहरी हो चुकी है। मार्ग पर सन्नाटे की जगह, चहल पहल दिखाई दे रही है। मोटर सायकिलों की भरपूर आवा जाही हो रही है, जो उस समय यदा कदा ही दिखाई देती थी। लग रहा था कि काफ़ी कुछ बदल गया है और बदल रहा है। 
देवी राजटेक (राजेश्वरी) स्थान
हम नारायणपुर से भीतर जंगल के कोकोड़ी गाँव में  आदिवासियों के त्यौहार करसाड़ जात्रा में सम्मिलित होने जा रहे थे। जहाँ करंगाल परगना के पैंतालिस गांव के आदिवासी तीन दिवसीय त्यौहार करसाड़ मनाने के लिए एकत्रित हुए थे। 

मिलन, जय जुहार
हमें कच्ची सड़क पर धूल उड़ाते हुए बहुत सारे लोग मोटर सायकिलों पर जाते हुए दिखाई दे रहे थे। हम भी उनके पीछे पीछे मंदिर तक पहुंच गए। सरई के वृक्षों के बीच सैकड़ों मोटरसायकिलें खड़ी थी एवं खुले मैदान में खई खजाने की दुकाने सजी हुई थी। आदिवासी महिलाएं-पुरुष एक दूसरे से मिलकर जुहार (अभिवादन) कर रहे थे।

देव मांझी महेश्वर पात्र के साथ लेखक ललित शर्मा
राज टेका (राजेश्वरी) के मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी हुई थी। परगना से आए हुए देव एक स्थान पर विराजमान थे। साथ ही जगदलपुर से आए हुए राजा के देवता (पाट देवता) की पूजा हो रही थी। देव हाड़े हिड़मा उनकी पत्नी राज टेका ग्राम भ्रमण पर थे। करंगाल परगना के देव मांझी महेश्वर पात्र के संचालन में सभी प्रक्रियाएं संचालित हो रही थी। 
पाट देवता, जगदलपुर राजा के देव
करसाड़ (कोंडागाँव क्षेत्र में ककसाड़) का अर्थ देवक्रीड़ा होता है, जिसे देवता खेलाना कहते हैं। करसाड़ को गोंडी भाषा में "करसी हियाना" कहा जाता है। करसाड़, हल्बा एवं गोंड़ दो जनजातियों के सम्मिलन एवं समरसता का पर्व है। देव मांझी महेश्वर पात्र ने कहते हैं कि बूढा देव के भाई का नाम हाड़े हिड़मा (कोकोड़ी करिया) है। उन्होंने मावली देवी की पुत्री राजटेका से प्रेम विवाह किया था। 

ढोल पर नृत्य 
मावली माता हल्बा जनजाति की देवी हैं और बूढा देव गोंड़ जनजाति के देवता हैं। बूढा देव के भाई हाड़े हिड़मा (कोकोड़ी करिया) एवं मावली देवी की बेटी राजटेका (राजेश्वरी) के प्रेम विवाह द्वारा हल्बा एवं गोंड़ जनजाति का मिलन हुआ और करसाड़ को दोनो जनजाति मिलकर मनाते हैं। 
युवा महिलाओं द्वारा नृत्य
इस तीन दिवसीय पर्व के पहले दिन करंगाल परगना के सभी देव कोकोड़ी पहुंचते हैं, जिनमें हाड़े हिड़मा के बेटा बेटी एवं भाई बहन होते हैं। यहाँ पहुंचने पर देव मांझी उनका आगमन सत्कार सम्मान करते हैं ढोल बजाए जाते हैं। उसके बाद बेटी एवं बहनों को एक पक्ति में एवं बेटे और भाईयों को अगल पंक्ति में स्थान दिया जाता है।
देवी की डोलियाँ
रात को सामुहिक भोज होता है तथा अगले दिन जात्रा संयोजकों की तरफ़ से सबको एक समय पकाने खाने के लिए चावल दाल दिया जाता है। अगले दिन सुबह हाड़े हिड़मा एवं राजटेका ग्राम भ्रमण पर जाते हैं, प्रत्येक गृहवासी इनका तेल एवं हल्दी लगाकर स्वागत करता है। ग्राम भ्रमण के पश्चात इनको यात्रा स्थल पर लाया जाता है।
हर हर बाइक घर घर बाइक - बदलाव की लहर 
नगाड़ों की ध्वनि के से देवता खेलाने का कार्य प्रारंभ हो जाता है। वृक्षों के नीचे आराम कर रहे सभी लोग आयोजन स्थल पर पहुंच जाते हैं। महिलाएं नृत्य करती हैं एवं युवा ढोल बजाते हुए कदमों पर थिरकते हैं तथा इनके बीच देवता खेलते हैं। सिरहों पर देवताओं की सवारी आ जाती है। यह कार्य रात तक चलता है। 
हाड़े हिड़मा एवं राज टेका देवी के आगमन की प्रतीक्षा करते 
उसके पश्चात अगले दिन सुबह देवता तालाब में स्नान करते हैं एवं उनकी इच्छा के अनुरुप मुर्गा, बकरा, सुअर आदि की बलि दी जाती है। इसी स्थान पर बलि पकाई खाई जाती है। मंडादेव से नारायणपुर की मावली मड़ई की तिथि प्राप्त कर सांझ तक सभी देवता अपने अपने स्थान को रवाना हो जाते है एवं करसाड़ यात्रा सम्पन्न हो जाती।
सभी देवता एक स्थान पर 
इस जात्रा के दौरान नारायणपुर की प्रसिद्ध मावली मड़ई के आयोजन की तिथि देवताओं से पूछ कर तय की जाती है। उनकी इच्छा के अनुसार नियत तिथि को नारायणपुर में मावली मड़ई का आयोजन किया जाता है। यह मड़ई आगामी 21-22 फ़रवरी को आयोजित होगी। जात्रा में सम्मिलित होकर इस अवसर को अपने कैमरे में कैद करना एक सुखद अनुभव रहा तथा आदिवासी संस्कृति को समीप से जानने एवं समझने का अवसर मिला।
पटेल, लेखक, चालकी, डॉ राजाराम त्रिपाठी, राजीव रंजन प्रसाद, देव मांझी महेश्वर पात्र एवं शिव कुमार पान्डेय
जो इलाका बारुद की गंध से हमेशा सराबोर रहता है और जहाँ कब किसकी मौत आ जाए, इसका पता नहीं है। मौत एवं जीवन के इस खेल के बीच अपने त्यौहारों एवं पर्वों को मनाते हुए अपनी प्राचीन परम्परा अक्षुण्ण रखना जीवटता ही है। इससे साबित होता है  कि लोक संस्कृति की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि इन्हें मिटाना संभव नहीं। 

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

मीना बाज़ार का इतिहास एवं वर्तमान

नगर में मीना बाज़ार लगा हुआ है, सांझ होते ही उदय भैया का मन मीना बाजार घूमने का करता है। यहाँ  मनोरंजन के कई साधन जुटाए गए  हैं।

जिसमें कई तरह के झुले, मौत का कुंआ, नाचने वाली सोलह साल की नागिन के साथ खिलौनों, टिकुली फ़ुंदरी की दुकान एवं  खाने के लिए चाट पकौड़ी की दुकाने भी लगी हैं।

कुल मिलाकर बच्चों एवं महिलाओं के मनोरंजन का समस्त साधन जुटाया गया है। वैसे तो वर्तमान में मीना बाजार मेले-ठेलों में दिखाई देते हैं, परन्तु बरसाती खर्चा निकालने के लिए मीना बाजार वाले कस्बों का रुख कर लेते हैं।
मीना बाज़ार

भारत में मीना बाजार रजवाड़ों में लगाए जाते थे, जिसमें सिर्फ़ महिलाओं का प्रवेश ही होता था। रजवाड़ों की महिलाओं की सौंदर्य प्रसाधन एवं अन्य आवश्यकता की वस्तुओं की पूर्ति मीना बाजारों के माध्यम से की जाती थी।

आमेर के किले रनिवास में मीना बाजार लगने का उल्लेख मिलता है, जहाँ रनिवास की महिलाएँ, गहने गुंथे, चूड़ियां, कपड़े इत्यादि की खरीदी करती थी। इसके साथ ही मनोरंजन भी हो जाता था।

मीना बाजार नामकरण के पीछे प्रतीत होता है कि गहनों पर की जाने वाली मीनाकारी के नाम पर ही इसका नाम मीना बाजार पड़ा होगा। 
मीना बाज़ार

इतिहास में पीछे मुड़कर देखें तो अकबर में काल में मीना बाजार बहुत बदनाम हुए। अकबर की काम लालसा ने दिल्ली में मीना बाजार लगवाना प्रारंभ किया, जिसमें सिर्फ़ स्त्रियों का ही प्रवेश होता था और बाजार की चौकीदारी के लिए तातारी महिलाएं नियुक्त कर रखी थी।

बाजार में आने वाली कोई भी महिला उसे पसंद आ जाती तो उठवा लिया करता था। बीकानेर के राव कल्याणमल की पुत्रवधु सिसौदिया वंश की किरण कुंवर से लात खाने के बाद उसने मीना बाजार की नौटंकी बंद की।  
मीना बाज़ार

भोपाल में भी रिसायती दौर में मीना बाजार लगने की जानकारी मिलती है, जहाँ इसे परी बाजार कहा जाता था। ब्रिटेन की महारानी सन् 1909 में जब भोपाल आई तो प्रिंसेस ऑफ वेल्स क्लब की स्थापना हुई।

वर्ष 1916 में बेगम सुल्तानजहाँ ने महिला क्लब के माध्यम से मीना बाजार लगाया। बाजार में महिलाओं द्वारा निर्मित हस्तशिल्प सामग्री बिक्री के लिये रखी जाती थी उस दौर में मीना बाजार को परी-बाजार इसलिये कहा जाता था,

क्योंकि पढ़ी-लिखी बच्चियाँ सुंदर वस्त्र धारण कर परी के रूप में इन मेलों में भाग लेती थीं। पुराने भोपाल में आज भी एक मोहल्ला परी बाजार कहलाता है। 
मीना बाज़ार

इस तरह अन्य स्थानों पर नवाबों द्वारा मीना बाजार लगाने का उल्लेख मिलता है। लखनऊ के कैसर बाग से लेकर पाकिस्तान के लाहौर तक मीना बाजार महिलाओं की आवश्यकता वस्तुओं की पूर्ति करते थे।

राजे रजवाड़े खत्म हो गए, परन्तु आज भी मीना बाजार चल रहे हैं, उनकी वही रौनक है, जो पहले हुआ करती थी। अब मेलों-ठेलों में मीना बाजार दिखाई देते हैं, जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक सफ़र करते रहते हैं। 
मीना बाज़ार

कई स्थानों के हाट अब स्थाई बाजारों में बदल गए, सूरत का चौटा बाजार, रायपुर की टुरी हटरी, बिलासपुर का गोलबाजार इस तरह सभी स्थानों पर स्थाई बाजार हो गए हैं।

भले ही मीना बाजारों के ढांचे में बदलाव आया है परन्तु मीना बाजारों को देखकर लगता है कि इतिहास की एक महत्वपूर्ण परम्परा हमारे बीच जीवित है।