शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

विराट नगर का कलचुरी कालीन मंदिर

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लाहाबाद से रीवा की ओर बढ चले। एकबारगी तो हमने तय किया कि रीवा से जबलपुर, कवर्धा होते हुए रायपुर पहुंचे और जबलपुर पहुंच कर गाड़ी का ब्रेक सीधे ही तोप कारखाने के सामने लगाया जाए।। प्राचीन एवं नवीन ब्लॉगर मिलन हो जाएगा। परन्तु उधर के भी रास्ते के खराब होने का समाचार मिला तो हमने जबलपुर जाने का इरादा त्याग दिया। इलाहाबाद से इज्जतगंज होते हुए हम रीवा की ओर बढे। रास्ते में ट्रैफ़िक कमोबेश पहले जैसा ही था। एक स्थान पर आने वाले मार्ग पर जाम लगा हुआ था और हम अपनी साईड में चल रहे थे। तभी हमारे सामने एक उड़ीसा नम्बर की गाड़ी आ गई। जबकि उसे दिख रहा था कि सामने से गाड़ी आ रही है। पाबला जी ने अपनी गाड़ी वहीं रोक ली और सड़क न छोड़ने की ठान ली।

हमारी गाड़ी रुकने से पीछे भी जाम लग रहा था। थोड़ी देर बार जीप वाला तो गाड़ी नीचे से उतार कर ले गया। उसके पीछे पीछे एक ट्रक वाला भी घुस गया। अब पाबला जी की खोपड़ी खराब हो गई। उन्होने ट्रक वाले को बगल से जाने कहा। ट्रक वाला कच्चे में गाड़ी उतारने को तैयार नहीं था और पाबला जी भी अपने स्थान से टस से मस होने को तैयार नहीं थे। गुस्से के मारे चेहरा तमतमा रहा था और आँखे लाल हो गई थी। मेरी बात का कोई जवाब नहीं दे रहे थे। अब जाम पूरी तरह से लग चुका था। मैं सोच रहा था कि अगर इस जाम में फ़ंस गए तो फ़िर 2-4 घंटे की फ़ुरसत। क्योंकि जाम हमारी गाड़ी के कारण ही लग रहा था। मैंने पाबला जी को बहुत मनाया तब कहीं जाकर वे गाड़ी सड़क से नीचे उतार कर आगे बढे। नहीं तो हो गया था पंगा।

मध्यप्रदेश की सीमा तक सड़क ठीक थी। जैसे ही हमने मध्यप्रदेश की सीमा में प्रवेश किया वैसे बड़े बड़े गड्ढों वाली सड़क से सामना हुआ। आगे बढने पर सड़क ही गायब हो गई थी। सिर्फ़ गड्ढे ही गड्ढे थे। रीवा से कुछ दूर पहले हमें एक ठीक ठाक होटल नजर आया। रात के 9 बज रहे थे। सोचा कि यहीं भोजन कर लिया जाए। होटल किसी भाजपानुमा नेता का था। मध्यप्रदेश पहुंच कर लगा कि हम घर ही पहुंच गए हैं क्योंकि मध्यप्रदेश हमारा बंटवारा भाई जो है। लेकिन यह नहीं सोचा था कि सड़क इतनी खराब होगी। भोजनोपरांत मैने पीछे की सीट संभाल ली और सो गया। अब रात को गाड़ी कहाँ कहाँ और कैसे-कैसे चली उसका मुझे पता नहीं।

सुबह शहडोल के पहले मेरी नींद खुली अर्थात हम अनूपपुर पेंड्रा वाले मार्ग पर थे। तभी सोहागपुर में एक मंदिर दिखाई दिया। स्थापत्य की शैली से दूर से ही कलचुरी कालीन मंदिर दिख रहा था। मैने तत्काल गाड़ी रुकवाई। जैसे मनचाही मुराद मिल गई हो। इस मंदिर को विराट मंदिर कहा जाता है। कहते हैं कि महाभारत में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान जिस विराट नगर का वर्णन है वह यही विराट नगर है। यहाँ के सम्राट राजा विराट थे। समीप ही बाणगंगा में पाताल तोड़ अर्जुन कुंड स्थित है। शहडोल का पूर्व नाम सहस्त्र डोल बताया जाता है। कलचुरी राजाओं का राज जहाँ भी रहा उन्होने वहाँ सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया है।

मंदिर प्रांगण में प्रवेश करने पर यह पीछे की तरफ़ झुका हुआ दिखाई देता है। आगे बढने पर एक केयर टेकर मिला। उसने बताया कि वह फ़ौज से अवकाश प्राप्त है। लेकिन उसके पास भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का कोई परिचय पत्र नहीं था। उसने मुझसे कहा कि यहाँ फ़ोटो खींचने का 25 रुपए चार्ज लगता है तथा वह रसीद लेकर आ गया। मैने जब उसका मेन्युअल देखा तो उसमें वीडियो बनाने का चार्ज 25 रुपए लिखा था और फ़ोटो लेना फ़्री था। इस तरफ़ केयरटेकर पर्यटकों को ठग कर अतिरिक्त कमाई कर रहा है। गिरीश भैया और हम दोनो मंदिर के दर्शन करने के लिए आए और पाबला जी गेट के समीप ही रुक गए। उनके पैर की एडी में तकलीफ़ होने के कारण अधिक दूर चल नहीं पा रहे थे।

मंडप ढहने के कारण पुन: निर्मित दिखाई दे रहा था। केयर टेकर ने बताया कि 70 साल पहले मंदिर के सामने का हिस्सा धराशायी हो गया था, जिसे तत्कालीन रीवा नरेश गुलाबसिंह ने ठीक कराया था। उसके बाद ठाकुर साधूसिंह और इलाकेदार लाल राजेन्द्रसिंह ने भी मंदिर की देखरेख पर ध्यान दिया। अब यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। मंदिर का मुख्य द्वार शिल्प की दृष्टि से उत्तम है। मुख्यद्वार के सिरदल पर मध्य में चतुर्भुजी विष्णु विराजित हैं। बांई ओर वीणावादिनी एवं दांई ओर बांया घुटना मोड़ कर बैठे हुए गणेश जी स्थापित हैं। मंदिर का वितान भग्न होने के कारण उसमें बनाई गई शिल्पकारी गायब है।

मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित है। जिसकी ऊंचाई लगभग 8 इंच होगी तथा जलहरी निर्मित है एवं तांबे के एक फ़णीनाग भी शिवलिंग पर विराजित हैं। यह मंदिर सतत पूजित है। जब मैने गर्भ गृह में प्रवेश किया तो कुछ महिलाएं पूजा कर रही थी। मंदिर के शिखर पर आमलक एवं कलश मौजूद है। बाहरी भित्तियों पर सुंदर प्रतिमाएं लगी हुई है। दांई ओर की दीवाल पर वीणावादनी, पीछे की भित्ती पर शंख, चक्र, पद्म, गदाधारी विष्णु तथा बांई ओर स्थानक मुद्रा में ब्रम्हा दिखाई देते हैं। साथ ही स्थानक मुद्रा में नंदीराज, गांडीवधारी प्रत्यंचा चढाए अर्जुन, उमामहेश्वर, वरद मुद्रा में गणपति तथा विभिन्न तरह का व्यालांकन भी दिखाई देता है।

मिथुन मूर्तियों के अंकन की दृष्टि से भी यह मंदिर समृद्ध है। उन्मत्त नायक नायिका कामकला के विभिन्न आसनों को प्रदर्शित करते हैं। इन कामकेलि आसनों को देख कर मुझे आश्चर्य होता है कि काम को क्रीड़ा के रुप में लेकर उन्मुक्त केलि की जाती थी। यहाँ मैथुनरत स्त्री के साथ दाढी वाला पुरुष दिखाई देता है। इससे जाहिर होता है कि यह स्थान शैव तंत्र के लिए भी प्रसिद्ध रहा होगा। प्रतिमाओं में प्रदर्शित मैथुनरत पुरुष कापालिक है। कापालिक वाममार्गी तांत्रिक होते हैं। वे पंच मकारों को धारण करते हैं - मद्यं, मांसं, मीनं, मुद्रां, मैथुनं एव च। ऐते पंचमकार: स्योर्मोक्षदे युगे युगे। कापालिक मान्यता है कि जिस तरह ब्रह्मा के मुख से चार वेद निकले, उसी तरह तंत्र की उत्पत्ति भोले भंडारी के श्रीमुख से हुई। इसलिए कापालिक शैवोपासना करते हैं।

ज्ञात इतिहास के अनुसार उन्तिवाटिका ताम्रलेख के अनुसार जिला का पूर्वी भाग, विशेषकर सोहागपुर के आसपास का भाग लगभग सातवी शताब्दी में मानपुर नामक स्थान के राष्ट्रकूट वंशीय राजा अभिमन्यु के अधिकार में था. उदय वर्मा के भोपाल शिलालेख में ई. सन् 1199 में विन्ध्य मंडल में नर्मदापुर प्रतिजागरणक के ग्राम गुनौरा के दान में दिये जाने का उल्लेख है. इससे तथा देवपाल देव (ई. सन् 1208) के हरसूद शिलालेख से यह पता उल्लेख है कि जिले के मध्य तथा पश्चिमी भागों पर धार के राजाओं का अधिकार था. गंजाल के पूर्व में स्थित सिवनी-मालवा होशंगाबाद तथा सोहागपुर तहसीलों में आने वाली शेष रियासतों पर धीरे-धीरे ई.सन् 1740 तथा 1755 के मध्य नागपुर के भोंसला राजा का अधिकार होता गया. भंवरगढ़ के उसके सूबेदार बेनीसिंह ने 1796 में होशंगाबाद के किले पर भी अधिकार कर लिया. 1802 से 1808 तक होशंगाबाद तथा सिवनी पर भोपाल के नबाव का अधिकार हो गया, किंतु 1808 में नागपुर के भोंसला राजा ने अंतत: उस पर पुन: अधिकार कर लिया।

वर्ष 1817 के अंतिम अंग्रेज-मराठा युध्द में होशंगाबाद पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया तथा उसे सन् 1818 में अप्पा साहेब भोंसला द्वारा किए गए अस्थायी करार के अधीन रखा गया. सन् 1820 में भोंसला तथा पेशवा द्वारा अर्पित जिले सागर, तथा नर्मदा भू-भाग के नाम से समेकित कर दिए गए तथा उन्हें गवर्नर जनरल के एजेंट के अधीन रखा गया, जो जबलपुर में रहता था. उस समय होशंगाबाद जिले में सोहागपुर से लेकर गंजाल नदी तक का क्षेत्र सम्मिलित था तथा हरदा और हंडिया सिंधिया के पास थे. सन् 1835 से 1842 तक होशंगाबाद, बैतूल तथा नरसिंहपुर जिले एक साथ सम्मिलित थे, और उनका मुख्यालय होशंगाबाद था. 1842 के बुंदेला विद्रोह के परिणाम स्वरूप उन्हें पहले की तरह पुन: तीन जिलों में विभक्त कर दिया गया।

इस मंदिर के आस पास कई छतरियाँ (मृतक स्मारक) बनी दिखाई देती हैं। मंदिर के मंडप में अन्य स्थानों से प्राप्त कई प्रतिमाएं रखी हुई हैं। जिनमें पद्मासनस्थ बुद्ध की मूर्ति भी सम्मिलित है। मंदिर का अधिष्ठान भी क्षरित हो चुका है। इसका सरंक्षण जारी दिखाई दिया। विराट मंदिर के दर्शन करके मन प्रसन्न हो गया। कलचुरीकालीन गौरव का प्रतीक विराट मंदिर सहस्त्र वर्ष बीत जाने पर भी गर्व से सीना तानकर आसमान से टक्कर ले रहा है। अगर इसका संरक्षण कार्य ढंग से नहीं हुआ तो यह ऐतिहासिक धरोधर धूल में मिल सकती है। यहाँ से हम अपने मार्ग पर चल पड़े।

7 टिप्‍पणियां:

  1. हमारे शहर जबलपुर के आस पास ही हैं आप...कलचुरी काल की अनेक विरासतें..इसे सही मायने मेम समझने की जरुरत है...जैसे की हमारे ओशो के प्रवचन....जो न समझे उस चिन्तन और दर्शन को..वो गरीब!!

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  2. खजुराहो भी गये ही होगे..

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  3. लोग समय लिखते हैं औ’ मैं काल लिखता हूँ...
    लोग सोच लिखते हैं, और मैं हाल लिखता हूँ...
    -सोच नहीं- अब हाल को सुधार की दरकार है!!
    -समीर लाल ’समीर’

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  4. बहुत खूब पाबला जी से बोलियेगा गुस्सा कम किया करें :) !

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  5. स्थापत्य कला के अद्भूभूत काल के दर्शन मिले

    आपकी यायावरी और पाबला जी संग गिरीश भाई के यात्रा को नमन

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  6. विराट नगर मंदिर के बारे में पढ़कर मेरा भी मन प्रसन्न हो गया ।

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