सोमवार, 16 दिसंबर 2013

न तो कारवां की तलाश है, न तो हमसफ़र की तलाश है

नुष्य सब कुछ साध लेता है पर प्रकृति को नहीं साध पाया। वह अपनी मन मर्जी से चलती है, कहीं धूप कहीं छाया, कहीं बारिश कहीं सर्दी। सफ़र पर निकलने से पहले सोचता हूँ कि सामान कम हो, क्योंकि सामान का बोझ मुझे ही उठाना है। पीठ पर जितना सामान कम होगा, सफ़र उतनी आसानी से तय होगा। यदि 2 कपड़ों  में काम चल जाए तो एक ही रखना पसंद करुंगा। नवम्बर-दिसम्बर में उत्तर भारत में कड़ाके ठंड पड़ने लगती है। रेगिस्तानी इलाके में रात ठंडी होने से रेत ठंडा हो जाता है और ठंड बढ जाती है। गुलाबी होती हुई ठंड लाल होकर जला देने की क्षमता प्राप्त कर लेती है। जब ढेर सारे गर्म कपड़े लेकर जाता हूँ तो उनकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती और जब ठंड के कपड़े कम रखता हूँ तो जान लेवा ठंड का सामना करना पड़ता है। इस तरह के मौसम घुमक्कड़ी में आड़े आते हैं। अबकि बार गर्म ओव्हर कोट रख लिया, जो किसी रजाई से कम नहीं है। पहनकर सोने पर ओढने की जरुरत नहीं पड़गी।
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डिस्पले पर गाड़ी का नम्बर और कोच नम्बर दिखाई देने लगा, वरना आधे घंटे से मरणासन्न पड़ा हूआ था। अपना सामान उठा कर निर्धारित स्थान पर ले आया और स्तम्भ के सहारे टिक कर बैठ गया। साथ ही एक अधेड़ महिला पुरुष का जोड़ा भी बैठा हुआ था। तभी करीना कपूर जैसी जीरो साईज वाला लड़का आ पहुंचा, उसने महिला और पुरुष का चरण स्पर्श किया तथा भृकूटी एवं हाथ संचालित करते हुए उनसे बात करने लगा। हर शब्द पर उसकी भाव भंगिमा बदल जाती थी। होठों से अधिक सैन से बातें कर रहा था। गजब के संकेत दिखाई दे रहे थे उसके चेहरे पर मुख मुद्रा के साथ। लगा कि उसमें स्त्री आत्मा का प्रतिशत कुछ अधिक है, हारमोनल बैलेंस बिगड़ गया। उसकी मम्मी ध्यान से सुन कर उसे घर जाने की हिदायत दे रही थी। वो भी बेचारी क्या करे, बेटी जैसा बेटा जनने की तकलीफ़ तो उठानी पड़ेगी। बाप सिर झुकाए शायद सोच रहा था कि वह कौन सी घड़ी थी, जब दुर्घटनावश गर्भाधान हुआ होगा।
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प्लेटफ़ार्म का डिस्पले नम्बर बदल गया। जहाँ बैठे थे वहाँ से एक फ़र्लांग दूर हमारा डिब्बा लगेगा। क्या करते हम? अपना सामान लादे पहुंच गए नियत डिसप्ले के समीप। रेल्वे वालों को किराया बढाने से सरोकार है, यात्रियों सुविधाओं की ओर कोई ध्यान नहीं है। ट्रेन आने के समय पर प्लेटफ़ार्म बदल देते हैं। उस वक्त सवारियों को कितनी तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है। सवारियों में कई व्याधिग्रस्त भी होते हैं जो सहजता से प्लेटफ़ार्म नहीं बदल सकते। वे रिजर्वेशन टिकिट होने के बाद भी ट्रेन नहीं पकड़ पाते। उनका हर्जाना कौन देगा? भारतीय रेल भी भगवान भरोसे चल रही है। करोड़ों मुसाफ़िर अपनी जान जोखिम में डाल कर यात्रा करते हैं। थोड़ी देर के लिए प्लेटफ़ार्म पर हल-चल मच जाती है। जैसे कोई तूफ़ान आ गया हो। सवारियाँ भी अपने साथ अतिरिक्त सामान लेकर यात्रा करती हैं, जिसका खामियाजा ऐसे वक्त ही उठाना पड़ता है। ट्रेन आ गई। मैने अपने लिए 30 नम्बर की बर्थ ली थी। उपर की बर्थ पर आराम से सो कर सफ़र काटा जा सकता है। न किसी की किच-किच न किसी की झिक-झिक।
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ट्रेन ने सरकना शुरु किया। सांझ ने साथ छोड़ दिया और निशा ने अपनी ड्यूटी संभाल ली। बैग सिरहाने लगाया और लेट गया। अब बर्थ पर आने के बाद निशा से मिलन होने पर निद्रा रानी का आना भी तय था। वह प्यार से मेरे बाल सहलाती रही। कभी कान में फ़ुसफ़ुसाती, कभी वन, टू, थ्री, फ़ोर का गाना सुनाती। उसका मधूर स्वर मादक होकर कानों में रस घोल रहा था। मैं उसकी चूड़ियों से खेलने लगा। जैसे पहली कक्षा में पढ़ते वक्त मनके वाली स्लेट से गिनती करता था। सावधानी इतनी थी कि चूड़ियाँ आपस में टकरा कर कहीं खनक न जाएं। यहाँ प्यार की पाठशाला में पढाई शुरु थी कि निद्रा रानी ने अब अपने बाहूपाश में बांध लिया। न कुछ सुनाई दे रहा था न कुछ दिखाई। कभी-कभी कानों में ट्रेन की पहियों की आवाज सुनाई दे जाती। सफ़र जारी था, ट्रेन के पहियों की आवाज कब दूर चली गई पता न चला। निद्रा रानी ने स्वप्न द्वार उनमुक्त कर दिया। 
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मर्द के सपने में औरतें दिखाई देती हैं या फ़िर वे जो उसके कभी अत्यधिक करीबी थे और इस दुनिया में नहीं रहे। कइयों से सुना कि सपने में फ़िल्मी अभिनेत्रियाँ आती हैं। मेरे साथ तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि कैटरीना कैफ़ या करीना कपूर आकर गले में बाँहे डाल कर लटक गई हों। कभी सपनों में स्त्री की जगह भैंस क्यों नहीं दिखाई देती। आखिर वो भी स्त्रीलिंग है। लेकिन ऐसा नहीं होता। दिन में जो घटता है वह चेतन मन से होकर अवचेतन की ओर सफ़र करता दिखाई दे जाता है। सपने भी बड़े अजीब होते हैं, फ़िल्म की तरह चलते हैं। लेकिन सपनों की फ़िल्म चलाने वाला प्रोजेक्टर मिस्त्री बड़ी गड़बड़ करता है। कहीं की रील कहीं जोड़ देता है। मैं देख रहा हूँ कि स्कूल की क्लास लगी हुई है, टीचर पढा रहे हैं, तत्कालीन सारे सहपाठी दिखाई दे रहे हैं। मैं  हांफ़ते हुए कक्षा में पहुंचता हूँ, टीचर कहते हैं - इतने लेट क्यों आए हो? क्या बताऊँ सर! ये श्रेया-श्रुति (दोनो बेटियाँ) रोज बदमाशी करती हैं, कभी जूता-मोजा तो कभी किताबें छिपा देती हैं। इसलिए विलंब हो जाता है। अब इस स्वप्न में तीनों काल जुड़ जाते हैं। कहीं की रील कट कर कहीं जुड़ जाती है। सपने जारी रहते हैं…………
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रंग बदलते सपने तो सपने बदलते रंग होते हैं। सूर्य सी चमकीली रोशनी नीले, पीले, हरे, लाल, नारंगी, बैगनी रंगों में बदलती हैं। कभी बादलों में उड़ते हुए नीचे झांकने पर समंदर दिखाई देता है तो थरथरी आ जाती है। कहीं पहाड़ की ऊंचाई से खाई की तरफ़ देखने से पिंडलियों में सनसनी भर जाती है। अभी पैर फ़िसला और गिर जाऊंगा अंतहीन गहराई में। कभी ब्लेक होल में घुस कर कहीं से कहीं निकल जाता हूँ ,यह सपनों की दुनिया भी अजीब है। जहाँ शरीर नहीं पहुंच पाता वहाँ रुह पहुंच जाती है। अनंत का सफ़र भी कर आती है। करवट बदलते चोभा मीची में रात गुजर जाती है। चे गरम, चे गरम, पेप्योर, पेप्योर की कर्कश पुकार से दिन की शुरुवात होती है। आवाज सुनकर आँखें मलता हुआ अपनी हथेलियों को देखता हूँ, कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती, कर मूले गोविंदम्, प्रभाते कर दर्शनम्। किसी अन्य का मुंह देखने से पहले अपनी भाग्य रेखा, हृदय रेखा पर नजर दौड़ा लेता हूँ। ये दोनो रेखाएं सही रही तो जीवन रेखा तो स्वमेव ही सही चलते रहेगी। 
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ए चाय, एक इधर भी देना। कितने पैसे हुए? 7 रुपए, इलायची वाली चाय है। पैसे देते हुए सोचता हूँ साले इलायची का सत डालकर चाय पिला रहा है पावडर दूध की और बखान ऐसे कर रहा है जैसे शिलाजीत डाल रखा हो। पेप्योर पेप्योर, पेपर भी दे देना। कौन सा? जिसमें कम पैसे अधिक पन्ने हों। वह 2 रुपए में भारी सा अंग्रेजी अखबार टिका देता है। चाय की चुस्कियों के साथ अंग्रेजी खाने का प्रयास करता हूँ, अंग्रेज जब हिन्दूस्तान को खा गए तो क्या मैं अंग्रेजी नहीं खा सकता है। लेकिन भाषाएं अजीब बला होती हैं। जितना खाओ, उतना ही विस्तृत होती जाती हैं। समझ आता है, खाने से अंग्रेजी खत्म नहीं होने वाली। जब तक अंग्रेजी राज-काज की भाषा बनी रहेगी, अंग्रेजी सिखाने वाले कोचिंग सेंटर फ़लते फ़ूलते रहेगें और गुलामी लदी रहेगी। बिग बॉस के घर जैसे रेल में सुबह किसी अच्छे गाने से होनी चाहिए। चे गरम और पेप्योर की कर्कश ध्वनि से नहीं। सुबह अच्छी हो तो सफ़र में दिन तो रुमानी बना रहेगा। चाय की उड़ती हुई भाप से सुनाई दे रहा था … न तो कारवां की तलाश है, न तो हमसफ़र की तलाश है, आगे पड़ाव आ रहा है, मंजिल का पता नहीं………

9 टिप्‍पणियां:

  1. एक अरसे के बाद इतना अच्छा और सार्थक लेख पढने को मिला..ऐसा ही लिखा करिए मित्र,,

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  2. एक अरसे के बाद इतना अच्छा और सार्थक लेख पढने को मिला..ऐसा ही लिखा करिए मित्र,,

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  4. बहुत लंबे समय बाद आज आपकी पोस्ट के माध्यम से इंडियन ट्रेन का चित्रण महसूस करने को मिला। सच इतना पैसा खर्च करने के बाद भी यात्रियों के लिए कोई सुविधा नहीं है वहाँ...अगर कुछ है तो सिर्फ परेशानी

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  5. बहुत रोचक, प्रवाहमय वृतांत है। भारतीय रेक, सपने सभी की जीवंत प्रस्तुति।

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