छत्तीसगढ़ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
छत्तीसगढ़ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

छत्तीसगढ़: सबरी का सबरीनारायण

जिसका मन सुंदर हो, उसे सारी दुनिया सुंदर नजर आती है। मन से सभी तरह के भेद मिट जाते है। ईश्वर की बनाई सारी रचना खूबसूरत जान पड़ती है। ऐसे ही भगवान राम हैं, उनके दर्शनों के लिए व्याकुलता से प्रतीक्षा करती सबरी से राम जी की भेंट का वर्णन करते हुए बाबा तुलसीदास कहते हैं - "कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।" 

राम जी सबरी को "भामिनि" कह संबोधित करते हैं। भामिनि का अर्थ यहां पर "सुंदरी" होता है। राम की बात सुनकर सबरी गदगद हो जाती है और "प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।" 

राम जी के वचन सुनकर सबरी के मुंह से बोल नहीं फ़ूटते, वह मगन हो जाती है। यहीं सबरी से भगवान राम उसके चखे बेर खाते हैं। जहाँ यह मिलन होता है, यह स्थान छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण कहलाता है।

सुबह नीलकमल वैष्णव जी के निवास पर नाश्ता किए, सूर्यनारायण आसमान में प्रभा बिखेर रहे थे और हम कोसीर से भटगांव होते हुए शिवरीनारायण पहुंच गए। 

महानदी के तट पर स्थित प्राचीन शिवरीनारायण नगर जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि. मी., बिलासपुर से 64 कि. मी., कोरबा से 110 कि. मी., रायगढ़ से व्हाया सारंगढ़ 110 कि. मी. और राजधानी रायपुर से व्हाया बलौदाबाजार 120 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। 

यहां महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी का त्रिधारा संगम प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम उदाहरण है। इसे ''प्रयाग'' जैसी मान्यता है। मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में अपने अप्रतिम सौंदर्य के कारण और चतुर्भुजी विष्णु मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे ''श्री नारायण क्षेत्र'' और ''श्री पुरूषोत्तम क्षेत्र'' कहा गया है। 

प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से यहां एक बृहद मेला का आयोजन होता है, जो महाशिवरात्रि तक लगता है। 

मान्यता है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं और पुरी के भगवान जगन्नाथ के मंदिर का पट बंद रहता है। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। 

तत्कालीन साहित्य में जिस नीलमाधव को पुरी ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किया गया है, उसे इसी शबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से पुरी ले जाने का उल्लेख 14 वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने किया है। इसी कारण शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ पुरी कहा जाता है. 

शिवरीनारायण दर्शन के बाद राजिम का दर्शन करना आवश्यक माना गया है क्योंकि राजिम में ''साक्षी गोपाल'' विराजमान हैं। इसी कारण यहां के मेले को ''छत्तीसगढ़ का कुंभ'' कहा जाता है जो प्रतिवर्ष लगता है।

शबरी का असली नाम श्रमणा था, वह भील सामुदाय के शबर जाति से सम्बन्ध रखती थीं। उनके पिता भीलों के राजा थे। बताया जाता है कि उनका विवाह एक भील कुमार से तय हुआ था, विवाह से पहले सैकड़ों बकरे-भैंसे बलि के लिए लाये गए जिन्हें देख शबरी को बहुत बुरा लगा कि यह कैसा विवाह जिसके लिए इतने पशुओं की हत्या की जाएगी। 

शबरी विवाह के एक दिन पहले घर से भाग गई। घर से भाग वे दंडकारण्य पहुंच गई। दंडकारण्य में ऋषि तपस्या किया करते थे, शबरी उनकी सेवा तो करना चाहती थी पर वह हीन जाति की थी और उनको पता था कि उनकी सेवा कोई भी ऋषि स्वीकार नहीं करेंगे। 

इसके लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला, वे सुबह-सुबह ऋषियों के उठने से पहले उनके आश्रम से नदी तक का रास्ता साफ़ कर देती थीं, कांटे बीन कर रास्ते में रेत बिछा देती थी। यह सब वे ऐसे करती थीं कि किसी को इसका पता नहीं चलता था।

एक दिन ऋषि मतंग की नजऱ शबरी पर पड़ी, उनके सेवाभाव से प्रसन्न होकर उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में शरण दे दी, इस पर ऋषि का सामाजिक विरोध भी हुआ पर उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में ही रखा। 

जब मतंग ऋषि की मृत्यु का समय आया तो उन्होंने शबरी से कहा कि वे अपने आश्रम में ही भगवान राम की प्रतीक्षा करें, वे उनसे मिलने जरूर आएंगे। मतंग ऋषि की मौत के बात शबरी का समय भगवान राम की प्रतीक्षा में बीतने लगा, वह अपना आश्रम एकदम साफ़ रखती थीं। 

रोज राम के लिए मीठे बेर तोड़कर लाती थी। बेर में कीड़े न हों और वह खट्टा न हो इसके लिए वह एक-एक बेर चखकर तोड़ती थी। ऐसा करते-करते कई साल बीत गए।

एक दिन शबरी को पता चला कि दो सुकुमार युवक उन्हें ढूंढ रहे हैं। वे समझ गईं कि उनके प्रभु राम आ गए हैं, तब तक वे बूढ़ी हो चुकी थीं, लाठी टेक के चलती थीं। लेकिन राम के आने की खबर सुनते ही उन्हें अपनी कोई सुध नहीं रही, वे भागती हुई उनके पास पहुंची और उन्हें घर लेकर आई और उनके पाँव धोकर बैठाया। 

अपने तोड़े हुए मीठे बेर राम को दिए राम ने बड़े प्रेम से वे बेर खाए और लक्ष्मण को भी खाने को कहा। लक्ष्मण को जूठे बेर खाने में संकोच हो रहा था, राम का मन रखने के लिए उन्होंने बेर उठा तो लिए लेकिन खाए नहीं। कहते हैं कि इसके परिणाम स्वरुप राम-रावण युद्ध में जब शक्ति बाण का प्रयोग किया गया तो वे मूर्छित हो गए थे।

यह नगर सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर, द्वापरयुग में विष्णुपुरी और नारायणपुर के नाम से विख्यात था जो आज शिवरीनारायण के नाम से चित्रोत्पला-गंगा (महानदी) के तट पर कलिंग भूमि के निकट दैदीप्यमान है। 

यहां सकल मनोरथ पूरा करने वाली मां अन्नपूर्णा, मोक्षदायी भगवान नारायण, लक्ष्मीनारायण, चंद्रचूड़ और महेश्वर महादेव, केशवनारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा से युक्त श्री जगदीश मंदिर, राधाकृष्ण, काली और मां गायत्री का भव्य और आकर्षक मंदिर है। 

कुल मिलाकर त्रिवेणी संगम पर स्थित यह नगर मंदिरों का नगर है। इसके साथ ही कुछ दूर पर स्थित खरौद में भी प्राचीन मंदिर हैं।

हम यहाँ मंदिरों के दर्शन करते हुए, महंत जी के मठ में पहुंचे। यह एक अति प्राचीन वैष्णव मठ है जिसका निर्माण स्वामी दयारामदास ने नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों से इस नगर को मुक्त कराने के बाद किया था। 

रामानंदी वैष्णव सम्प्रदाय के इस मठ के वे प्रथम महंत थे। तब से आज तक 14 महंत हो चुके हैं, वर्तमान में इस मठ के श्री रामसुन्दरदास जी महंत हैं। नगर के नामकरण के विषय में मान्यता है कि शबरों को वरदान मिला कि उसके नाम के साथ भगवान नारायण का नाम भी जुड़ जायेगा.. 

पहले ''शबर-नारायण'' फिर शबरी नारायण और आज शिवरीनारायण यह नगर कहलाने लगा। मठ में स्थित मंदिरों की फ़ोटो लेते हुए हम खरदूषण की नगरी खरौद ओर चल पड़े………। ( इस यात्रा में कोसीर निवासी मित्र नीलकमल वैष्णव एवं पत्रकार साहित्कार लेखक लक्ष्मीनारायण लहरे जी संगवारी बने )

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

बहुत शर्मिन्दा हूँ


अखबार में जब से समाचार पढा, तब से स्वयं को शर्मिन्दा महसूस कर रहा हूँ। शर्मिन्दगी भी जायज है, गैरतमंद व्यक्ति को शर्मिन्दा होना पड़ता है। जिसकी कोई गैरत नहीं वह क्या शर्मिन्दा होगा? कहावत है नकटा बूचा, सबसे ऊंचा। नकटा की नाक कटे, एक हाथ और बढ़े। शर्मिन्दगी इतनी है कि शर्म से धरती में गड़ना चाहता हूँ पर धरती में शर्म के मारे गड़ा भी नहीं जाता। अजीब विडम्बना है, जो धरती में गड़ना चाहता है उसे लोग गाड़ना नहीं चाहते। जो गड़ना नहीं चाहता उसे पकड़ धकड़ कर रस्सों से बाँध कर आयोजन सहित गाड़ दिया जाता है।

शर्म से धरती में गड़ने की ही बात है। पड़ोस के राज्य में प्रधानाध्यापक के घर पर आर्थिक अपराध शाखा का छापा पड़ा। उसके घर से 4 करोड़ की सम्पत्ति मिली। चपरासी के घर छापा पड़ा उसकी 8 करोड़ की सम्पत्ति मिली। क्लर्क के यहाँ से 40 करोड़ की सम्पत्ति मिली। कितने धनाढ्य लोग रह्ते हैं उस प्रदेश में। कहीं हाथ डालो वहीं रुपया ही रुपया। हमारे यहाँ उस धनाढ्य प्रदेश में सेवा कर चुके एक आई ए एस के यहाँ छापा पड़ा तो 400 करोड़ का मामला सामने आया। कमाल उस प्रदेश के पूण्य जल का है। जहाँ की एक-एक सांस भी धन उगलती है।

शर्म से डूब मरने की बात है कि मेरे जैसे गैरतमंद इंसान के लिए। हमारे यहाँ छापे में लोकनिर्माण विभाग के बड़े अधिकारी के यहाँ से भी करोड़ दो करोड़ मिलते हैं। इन लोगों ने नाक कटवा कर धर दी है। जब कभी धनाढ्य प्रदेश में चले जाते हैं तो लगता है कि उन्हे मुंह दिखाने के लायक भी नहीं रहे। वे बड़े चटखारे लगा कर शादियों की महफ़िलों में अपने प्रदेश के गुणगान करते हैं और मैं इसका उसका मुंह ताकते रहता हूँ, झेंप मिटाने के लिए। आखिर अपनी नाक कब तक कटते देख सकता हूँ इसलिए महफ़िल से रफ़ुचक्कर होने में ही भलाई समझता हूँ।

हमारा प्रदेश भारत का सिरमौर प्रदेश बन रहा है। बटवारे में मिले भीषण झंझावातों के बावजूद भी विकास की गंगा बह रही है। सड़कें, शिक्षा, उद्योग, पर्यटन, कृषि के क्षेत्र में नए आयाम गढ़ रहा है। पाँच रुपए में पेट भर खाना, एक रुपए दो रुपए किलो चावल, चना के साथ अमृत रुपी नमक दिया जा रहा है और तो और सरकार ने भोजन के अधिकार को कानूनी जामा पहना दिया है। अगर कोई भूखा है तो अब हक से भोजन मांग सकता है। इसका असर यह हुआ कि एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त आई ए एस अधिकारी ने शादी के वक्त दहेज में मिले 50 हजार रुपए भी अपने श्वसुर को लौटा कर ईमानदारी मिसाल कायम कर दी। दिए। ऐसा उदाहरण तो सारे संसार में कहीं नहीं मिलेगा। 

लगता है कि हमारे यहाँ किसी को मेरी नाक की चिंता ही नहीं है। चिंता हो भी कैसे? मेरे जैसे न जाने कितने नासमझ हैं यहाँ। एक घर खुसरा लेखक होने नाते सरकारी कामों से मेरा कभी वास्ता ही नहीं रहा। पहले जब पत्रकारी करते थे तो तहसील, थाना और अस्पताल का चक्कर लग जाता है। कभी कोई छोटा-मोटा काम पड़ा किसी अधिकारी से तो वे लेखकीय वरियता को ध्यान में रखकर कर देते थे। उनके बाबुओं ने मुझे शर्मिन्दगी से बचाने के लिए प्रयास करते हुए कूट संकेत दिए थे। 

हम ठहरे विशुद्धमूढ़मतिमहाभट्टारकपाषाणमस्तिष्कखल्वाटखोपड़ीलौहशिरस्त्राणधारी। उनका संकेत हमारी समझ में तत्काल नहीं आया। पुराना रिसीवर होने के कारण कूट संकेत शीघ्र पकड़ में नहीं आते। एक हफ़्ते बाद जब वे टाल-मटोल करने लगे और फ़ाईल-फ़ाईल खेलने लगे तब थोड़ा समझ आया। अभी तक हम पूरे संकेत नहीं पकड़ पाए हैं। मुझे लगता है ये मुझे शर्मिन्दगी से बचाने का उद्यम करेगें लेकिन बचा नहीं पाएगें।हमारे जैसे फ़ालतु आदमी को संकेतों से समझाने की कौन मगजमारी करेगा? खुल के बोल नहीं सक्ते। लेखक का क्या भरोसा? कौन सी व्यंग्य, कहानी या कविता में रगड़ के धर दे।

हमारा प्रदेश प्रगति के नए आयाम गढ़ रहा है। प्रदेश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लोहा पूरा भारत देश मान रहा है। केन्द्र सरकार भी इनाम इकराम से नवाज रही है। अन्य प्रदेशों के मंत्री और मुख्यमंत्री सार्वजनिक वितरण प्रणाली सीखने के लिए छत्तीसगढ़ आते हैं। कुछ लोग हल्ला मचाते है कि भ्रष्टाचार हो रहा है। लगता है निठल्लों को कोई काम ही नहीं है। देखो भ्रष्टाचार ने अन्य प्रदेशों में कितनी अधिक प्रगति की है। कितने सोपान गढ़े हैं। कुछ महीने के लिए एक बार सत्ता हाथ लगते ही झारखंड जैसे प्रदेश में चरदिनिया मुख्यमंत्री ने 4 हजार करोड़ कमा लिए। बताईए हम कितने पीछे रह गए हैं। है कि नहीं शर्म की बात। अगर यही रफ़्तार रही तो अगले 20 सालों में भी इनकी बराबरी नहीं कर सकते।

मेरी नाक बचाने का प्रयास कुछ पटवारी सरीखे लोग अवश्य कर रहे हैं। इनसे आम जनता का पाला हमेशा पड़ता रहता है। खाता-खतौनी की नकल, फ़ौती चढाने एवं नामांतरण इत्यादि में 5-10 हजार मांग लेते हैं। कुछ दिन पहले ही एक मास्टर जी कह रहे थे कि उनकी पुस्तैनी जमीन नाम चढाने के नाम से पटवारी ने 5 हजार लूट लिए। हमने कहा कि- मास्टर जी शर्म कीजिए, 5 हजार देकर इतना हल्ला मचा रहे हैं। नाहक बदनाम कर रहे हैं, शर्म की बात है। अगर वह पटवारी 20-25 हजार आपसे लेता तो कुछ रुतबे की बात बनती। अपने पड़ोसी राज्यों के समकक्ष खड़ा करने में इनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। ये हमे सम्मान के रास्ते पर ले जा रहे हैं।

एक बाबु ने काम के एवज में मुझसे कहा कि "आप हमारे लिए क्या करेगें? मैने कहा कि - आपको बढिया बढिया श्रृंगार रस की कविता सुनाएगें और होली का मौसम आ रहा है, फ़ाग सुनाएगें अगर इससे भी पेट नहीं भरा तो होले भी पढ सकते हैं। इसके अतिरिक्त हमारे पास क्या मिलेगा करने को। बिजली का बिल तो भरने की क्षमता नहीं है, जब देखो तब बिजली वाले नसैनी लिए आ जाते हैं और हमें पसीना आ जाता है। कब इनकी कैंची चले और कब हमारे घर अंधेरा हो जाए पता नहीं। इतना होने पर भी शर्मिदा हूँ। न जाने इस प्रदेश में मेरे शर्मिन्दगी दूर करने का उद्यम कब होगा? कब मेरा प्रदेश इस लायक होगा जिससे मैं मूंछों में ताव देकर अपने पड़ोसियों को गर्व से कह पाऊंगा कि हम तुम्हारे से कम नहीं है।  

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

छत्तीसगढ़ खाद्यान्न सुरक्षा कानून 2012 : भोजन का कानूनी अधिकार


छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद वीरनारायण सिंह ने 1857 में अकाल के कारण भुखमरी की स्थिति पैदा होने के पर अंग्रेजों को सूचना देकर हजारों किसानों के साथ लेकर कसडोल के जमाखोरों के गोदामों को खोल कर दाने-दाने को तरस रही प्रजा भुखमरी से बचाने के लिए अनाज बांट दिया। जिसके परिणाम स्वरुप अंग्रेजों ने देशद्रोही व लुटेरा होने का बेबुनियाद आरोप लगाकर उन्हें बंदी बना लिया। 10 दिसम्बर 1857 को रायपुर के चौराहे वर्तमान में जयस्तंभ चौक पर बांधकर वीरनारायण सिंह को फांसी दी गई। बाद में उनके शव को तोप से उड़ा दिया गया। ये अकाल के कारण भुखमरी से उपजे हालात का दुष्परिणाम था।

एक प्रत्रिका में पढा था कि छत्तीसगढ़ का एक परिवार गरीबी और भुखमरी से तंगहाल रोजी रोटी की तलाश में आसाम की ओर जा रहा था। रास्ते में भूख से तड़पती बेटी चल बसी, उसे चलती हुई रेलगाड़ी से कलकत्ता के पहले गंगा माई में अर्पण करना पड़ा। भूख से व्याकुल परिवार की दूसरी बेटी भी मरणासन्न थी। थोड़ी देर बाद उसने भी भूख से तड़पते हुए प्राण त्याग दिए। इस बेटी को भी भारी मन से कलपते हुए पिता ने चलती हुई रेलगाड़ी से रास्ते में पड़ने वाली पद्मानदी में विसर्जित कर दिया। दो बेटियों को खोने के बाद परिवार आसाम पहुंच गया लेकिन दुर्भाग्य एवं भूखमरी ने यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा। स्त्री पुरुष दोनों को भूख कारण पैदा हुई व्याधियों ने घेर कर काल का ग्रास बना दिया। उनकी दस वर्ष की बच्ची अकेली पड़ गई। यह छत्तीसगढ़ के अनाथों का सहारा मिनिमाता के नाना-नानी का परिवार था।

पेट की ज्वाला क्या नहीं करवाती? चोरी, झूठ, स्वाभिमान की हत्या, जिस्मफ़रोशी से लेकर पलायन तक। जो यह सब नहीं कर पाता उसे मरना पड़ता है। लोक कल्याणकारी राज्य का कर्तव्य होता है कि वह हर हाथ को काम एवं भूखे को भोजन उपलब्ध कराए। नैतिक रुप से काम एवं भोजन उपलब्ध कराने की जवाबदारी सरकार की बनती है। वर्षों से माँग उठती रही है कि रोजगार के अधिकार को भी संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को प्रदत्त मूल अधिकारों में सम्मिलित किया जाए। जिस व्यक्ति ने भारत में जन्म लिया हो उसे रोजगार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी सरकार की हो। इसी तरह गरीबों को भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी सरकार की होनी चाहिए।

भविष्य में भूखमरी से किसी व्यक्ति या परिवार को संकट का सामना न करना पड़े इसे ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने एतिहासिक लोक कल्याणकारी पहल करते हुए प्रत्येक व्यक्ति को भोजन उपलब्ध कराने को अपना नैतिक दायित्व मानकर विधानसभा में छत्तीसगढ़ खाद्य सुरक्षा विधेयक 2012 शीतकालीन सत्र 21 दिसम्बर 2012 में पारित कर कानून बनाया एवं भारत गणराज्य में खाद्य सुरक्षा देने वाले प्रथम राज्य होने का गौरव प्राप्त किया है। छत्तीसगढ़ खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का उद्देश्य राशन की वर्तमान पात्रता को कानूनी अधिकार प्रदान करना है ताकि हर गरीब और जरुरतमंद को भोजन का अधिकार प्राप्त हो सके। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार नागरिकों को पूर्ण गरिमा के साथ जीवन का अधिकार है। जीवन हेतु भोजन सबसे महत्वपूर्ण एवं मूलभूत आवश्यकता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 47 के अनुसार नागरिकों के पोषाहार स्तर और जीवन के स्तर में सुधार कर लोक स्वास्थ्य में सुधार करना राज्य का दायित्व है।

केन्द्र सरकार द्वारा अपने खाद्य सुरक्षा कानून में ग्रामीण क्षेत्र की 75% जनसंख्या एवं शहरी क्षेत्र की 50% जनसंख्या को खाद्यान्न देने का प्रावधान किया गया है।  ग्रामीण क्षेत्र की 75% जनसंख्या में से प्राथमिकता वाले परिवार के नाम से मात्र 46 % जनसंख्या को गरीब परिवार तथा शेष 29 % जनसंख्या को सामान्य या गरीबी रेखा के उपर का परिवार माना गया है। इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों की 50% जनसंख्या मे से मात्र 28% जनसंख्या को गरीब तथा शेष 22% को जनसंख्या को सामान्या या गरीबी रेखा के उपर का परिवार माना गया है।

केन्द्र सरकार के इस कानून के लागू होने से छत्तीसगढ़ राज्य के मात्र 23 लाख 64 हजार परिवारों को बीपीएल परिवार माना जाएगा और केन्द्र सरकार मात्र इतने ही परिवारों के लिए रियायती अनाज देगी। एक बात उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा बिना विचार किए पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों के 46% और शहरी क्षेत्रों के 28% परिवारों  को गरीब मानकर कानून बनाया जा रहा है। जबकि तेंडुलकर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में 13.1% जम्मू कश्मीर में 13.2% केरल में 19.7%, गोवा में 25% और पंजाब में 20.9% परिवारों को बीपीएल माना गया है। केन्द्र सरकार का खाद्य सुरक्षा कानून लागु होने से इन राज्यों के एपीएल परिवार भी बीपीएल राशन के पात्र हो जाएगें जबकि छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्य में कई पात्र और जरुरतमंद परिवार रियायती दर की राशन सुविधा से वंचित हो जाएगें। छत्तीसगढ़ सरकार के मुखिया डॉ रमन सिंह ने दूरदर्शितापूर्ण सोच रखते हुए इस विसंगति को दूर करने के लिए छत्तीसगढ़ का पृथक खाद्य सुरक्षा कानून बनाया।

केन्द्र सरकार का खाद्यान्न सुरक्षा कानून गरीब के साथ छलावा होने साथ परेशानी बढाने वाला प्रतीत होता है। इससे गरीब परिवारों की समस्या कम होने की बजाए और बढ जाएगीं। इस कानून में प्रति परिवार की बजाए प्रतिव्यक्ति अनाज देने का प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार प्राथमिकता वाले गरीब व्यक्ति को प्रतिमाह 7 किलो और सामान्य परिवार के व्यक्ति को 3 किलो अनाज देने का प्रावधान किया गया। केन्द्र सरकार के इस प्रावधान से 5 व्यक्तियों के छोटे परिवार को 35 किलो से कम अनाज प्राप्त होगा जबकि सामान्य परिवार को अधिकतम प्रतिमाह 15 किलो अनाज प्राप्त होगा। इससे छोटा परिवार रखने वाले अनावश्यक दंडित होगें तथा यह कानून देश की परिवार कल्याण नीति और जनसंख्या नीति के विरुद्ध दिखाई देता है। इस कानून के लागु होने से अन्त्योदय योजना भी समाप्त होती दिखाई दे रही है।

राज्य सरकार के खाद्य सुरक्षा कानून में 11 लाख अन्त्योदय अथवा विशेष रुप से कमजोर समूह के परिवारों के लिए 1 रुपए किलो की दर से हर महीने 35 किलो चावल का प्रावधान किया गया है। शेष गरीब परिवारों के लिए 2 रुपए किलो में प्रति माह 35 किलो खाद्यान्न की व्यवस्था है। इसके अलावा राज्य सरकार के खाद्य सुरक्षा कानून में 42 लाख गरीब परिवारों को हर महीने 2 किलो नि: शुल्क नमक, अनुसूचित क्षेत्रों में 5 रुपए किलो की दर से 2 किलो चना और गैर अनुसूचित क्षेत्र में 10 रुपए किलो की दर पर 2 किलो दाल देने की व्यवस्था की गई है। केन्द्र सरकार के कानून में इसकी कोई व्यवस्था नहीं की गई है।

इस योजना का पात्र कौन होगा, गरीब परिवारों के अंतर्गत किन्हें शामिल किया जाएगा, इसका स्पष्ट उल्लेख केन्द्र सरकार के कानून में नहीं है। छत्तीसगढ खाद्य सुरक्षा कानून में यह प्रावधान है कि प्रदेश में कोई भी व्यक्ति भूखा न रहे। इसके लिए सभी निराश्रित, आवासहीन, प्रवासी, प्राकृतिक आपदा प्रभावित लोगों के लिए इस कानून में भोजन की व्यवस्था की गई है। महिलाओं एवं बच्चों के लिए पोषण युक्त आहार का भी प्रावधान है। छात्रावासों एवं आश्रमों रहने वाले छात्र-छात्राओं के लिए भी रियायती दर पर अनाज की व्यवस्था की गई है। राज्य ने खाद्य सुरक्षा कानून के क्रियान्वयन के हेतू खाद्य वितरण के लिए 1 हजार 904 करोड़ रुपए की सब्सिडी, नमक के लिए 97 करोड़ रुपए की सब्सिडी, चना के लिए 208 करोड़ की सब्सिडी, दाल के लिए 132 करोड़ रुपए की सब्सिडी प्रतिवर्ष उपलब्ध कराने का प्रावधान किया है। 

छत्तीसगढ़ राज्य देश का प्रथम राज्य है जिसने अपना खाद्यान्न सुरक्षा कानून बना कर हितग्राही परिवारों को भोजन का अधिकार कानूनी रुप से प्रदान किया है तथा यह व्यवस्था की है कि राज्य में कोई भूखा न रहे। केन्द्र सरकार का खाद्यान्न सुरक्षा कानून कितने परिवारों को खाद्यान्न सुरक्षा दे पाएगा यह तो अभी तय नहीं है पर छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने एक कदम आगे बढाकर राज्य के निवासियों को भोजन प्राप्त करने का कानूनी अधिकार देकर यह सुनिश्ति कर दिया कि राज्य में सभी को जीवनोपयोगी राशन प्राप्त हो सके तथा राशन की कालाबाजारी रोकने के लिए इस कानून में कड़े प्रावधान भी किए गए हैं। जिससे हितग्राही तक राशन पहुंचने और छत्तीसगढ़ राज्य में कोई भूखा न रहे।

सोमवार, 21 जनवरी 2013

सामत सरना एवं टांगीनाथ ……… ललित शर्मा

बिजली विभाग का चीफ़ इंजीनियर
प्रारंभ से पढें
म्बिकापुर से 73 किलोमीटर शंकरगढ से आगे जाने पर डीपाडीह का सामत सरना टीला आता है। हमारी गाड़ी गेट पर रुकती है। राहुल और पंकज मुझसे पहले प्रवेश करते हैं और मै थोड़ी देर पश्चात रास्ते में लगी हुई  मूर्तियों को देखते हुए आगे बढता हूँ। यहीं पर मेरी मुलाकात सामत सरना मंदिर समुह के चौकीदार जगदीश से होती  है। हँसमुख व्यकित्व का धनी जगदीश मुझे मूर्तियों के विषय में जानकारी देता है। मैं कुछ चित्र लेता हूँ। मुख्य मंदिर के समक्ष राहुल एक पंडित नुमा व्यक्ति को अपनी हस्त रेखाएं दिखा रहा था और उससे सवाल कर रहा था। राहुल की शादी के विषय में उसने बताया कि अब  के फ़ागुन में हो जाएगी। राहुल प्रसन्न भए और दस रुपया दक्षिणा किए। इनके संवादों से मेरा ध्यान भी उनकी तरफ़ चला गया।

सामत सरना मे अमित सिंह देव
खल्वाट खोपड़ी, माथे एवं गले में रोळी चंदन, हाथ में कुछ कागज-कापी, पेन के साथ दो फ़िल्मी नायिकाओं के चित्र के साथ अगरबत्ती रखे हुए था। शर्ट के साथ कटिवस्त्र धारित उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली लगा। मेरे चर्चा होने पर उसने बताया कि वह बिजली विभाग का चीफ़ इंजीनियर था, बिजली के खंभे पर चढने दौरान उसे बिजली का झटका लग गया। तब से नौकरी छोड़ दिया है। हाथ  में रखी नायिका की फ़ोटो दिखाकर कहता है कि - यह मेरी पत्नी है और यह बेटी है। दूसरी फ़ोटो को इंदिरा गांधी कह रहा था। इससे जाहिर हो गया कि उसका दिमाग फ़िरा हुआ है। फ़िरे हुए दिमागी से इस सिरफ़िरे को और भी चर्चा करने की इच्छा हो रही थी। लेकिन हमारे पास समय कम था। इसलिए अपने उद्धेश्य की ओर मुड़ गए।

गज लक्ष्मी अंकन
डीपाडीह का यह सामत सरना मंदिर समूह है। मुख्य मंदिर का द्वार अलंकरण की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सिरदल के ललाट पर पद्मासन में बैठी हुई गजलक्ष्मी के साथ दोनो तरफ़ शिव का अंकन है। द्वार शाखाओं पर नदी देवी गंगा एवं यमुना का अंकन है। बांयी द्वार शाखा पर नदी देवी यमुना के साथ ही चैत्य गवाक्ष के उपर मिथुन अंकन भी दिखाई देता है। दायीं द्वार शाखा में इस स्थान पर वीणावादिका दिखाई देती है। मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग एवं जलहरी खंडित है। इस मंदिर में अन्य मूर्तियां भी स्थापित हैं जिनमें नृवराह, भैरव, गौरी, ब्रह्मा, नृत्य गणेश, कार्तिकेय, महाविष्णु, महिषासुर मर्दनी प्रमुख हैं। भग्नवशेषों से प्रतीत होता है कि इन मंदिरों के अनुपम शिल्प सौंदर्य को देख कर मुसाफ़िर अपनी धड़कन भूल जाया करता होगा।

परशुधारी शिव- सामत राजा
मुख्य मंदिर के सामने बहुत सारे छोटे-छोटे शिवमंदिर हैं।  संख्या में ये लगभग 40 होगें।  मंदिर समूह के निकट ही दो नदियों (गलफ़ुल्ला एवं कन्हर) दो नदियों का संगम है। गलफ़ुल्ला नामकरण पर राहुल सिंह का कहना है कि इस नदी के जल के उपयोग से गला फ़ूलने जैसी कोई बीमारी मानव एवं पशुओं में हो जाती होगी। इसलिए गलफ़ुल्ला नाम प्रचलन में आया होगा। सामत सरना समूह परिसर में  परशुधर शिव की सबसे ऊंची प्रतिमा रखी हुई है। इसे स्थानीय जन सामत सरना राजा रहते हैं। यह प्रतिमा चतुर्भुजी है। अलंकरणो के साथ बांया पैर घुटने से टूटा हुआ है तथा दायां पैर जंघा से खंडित है। बाएं पैर के नीचे परशु दिखाई देता  है। प्रतीत होता है कि यह पैर परशु पर रखा होगा।

मुख्य मंदिर का दृश्य
किंवदंतियों से ज्ञात होता है कि सामत सरना एवं झारखंड राज्य में स्थित टांगीनाथ के मध्य युद्ध हुआ था। जिसमें सामत सरना राजा वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके बाद सामत सरना की सभी रानियों ने परिसर में स्थित बावड़ी में डूब कर प्राण त्याग दिए। परिसर में स्थित परशुधारी शिव की प्रतिमा को स्थानीय जन सामत सरना मान कर पूजा करते हैं। सरगुजा के आदिवासी अंचल में सामत सरना एवं टांगीनाथ के विषय में जनश्रुतियाँ बिखरी पड़ी हैं। ये दोनो स्थानीय निवासियों की श्रद्धा के केन्द्र बन गए हैं। सामत सरना मंदिर के समक्ष शत लिंग स्थापित है। इसके समीप ही एक आमलक भी पड़ा है। मुख्य मंदिर के सामने विशाल नंदी स्थापित है। शिल्पकार ने नंदी प्रतिमा का बहुत सुंदर निर्माण किया है।

विष्णु सिंह देव, शत लिंग एवं केयर टेकर जगदीश
जगदीश कहता है कि पहले यहाँ बहुत सारे पोखर-तालाब इत्यादि थे। अब थोड़े ही बचे हैं। ब्रह्मा की प्रतिमा पगड़ीधारी है साथ ही लिंग भी दिखाई देता है। शिल्पकार ने इस प्रतिमा को अंतिम रुप नहीं दिया है। पत्थर पर छेनी की मार के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं। स्तम्भों पर मिथुन अलंकरण भी दिखाई देता है। साथ ही इस स्थान पर शतलिंग भी दिखाई देता है। खंडहरों से अनुमान होता है कि कभी यह मंदिर समूह भव्यता लिए होगा। सामत सरना समूह का अवलोकन कर हम शंकर गढ की ओर लौट चले। हमारा दोपहर का भोजन शंकर गढ के विश्राम गृह में था। शंकर गढ का विश्राम गृह अधिक पुराना नहीं है। लगभग 30 साल हुए होगें इसका निर्माण हुए। इसके केयर टेकर ने बताया कि विश्राम गृह के आरंभ से ही वह यहाँ पर पदस्थ है। भोजन करने के पश्चात हम आगे की यात्रा पूर्ण करने के लिए चल पड़े। ……… आगे पढें … जारी है।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

सामत सरना डीपाडीह की ओर यायावर


बिलासपुर टेसन
यात्राएं चलते रहती हैं जीवन के साथ। जीवन भी एक यात्रा कहा जाता है। मैने देखा कि यात्राओं का कोई कारण होता है। कोई निमित्त होता है, अकारण यात्राएं भी अकारथ नहीं होती। इस यात्रा का कारण पंकज का 27 नवम्बर 2012 की रात का फ़ोन संदेश बना। शाम को पंकज का फ़ोन आता है और वह कहता है कि आज रात को नेपाल चलते हैं कार से। बहुत दिन हो गए कहीं गए। रात को और सीधे नेपाल हीं, नहीं मुझे नहीं जाना है। फ़िर कहीं भी चलिए लेकिन आज ही चलना है। कल सुबह आता हूँ उसके बाद सरगुजा चलते हैं। वहीं के स्मारकों एवं जंगल की सैर करते हैं। कई दिनों से वहां के मित्र बुला भी रहे हैं। सही मौका है उधर ही चला जाए। सरगुजा भ्रमण तय हो जाता है। अगले दिन हमें सरगुजा जाना है। यहाँ जाने का कार्यक्रम बाईक से क्वांर नवरात्रि के समय भी बन गया था। लेकिन पंकज की तरफ़ से ढिलाई होने के कारण रह गए।

सुंदरवन
सरगुजा जाना पहले भी हुआ है। लेकिन जी भर के नहीं देखा था। घने जंगलों के बीच सुरम्य वादियाँ और उतने ही स्नेही निवासी मुझे हमेशा आकृष्ट करते रहे हैं। बिलासपुर पहुंच कर पता चला कि शाम को 4 बजे चलना है। तो मुड खराब हो गया। बना बनाया प्लान चौपट। मुझे रास्ते में चैतुरगढ और कलचुरियों की प्राचीन राजधानी तुम्माण भी देखना था। वैसे नवम्बर-दिसम्बर के माह में दिन छोटे हो जाते हैं। अब 4 बजे निकलने के बाद पाली पहुंचते तक ही शाम हो जाएगी। इसके बाद तुम्माण देखना तो संभव ही नहीं है। दोनो जगहों को देखते हुए हमें रात 8 बजे तक कटघोरा के विश्रामगृह में पहुंचना था। कटघोरा पहुंचते तक अंधेरा हो चुका था। अब हमें उदयपुर तक जाना था तथा हमारा रात्रि विश्राम उदयपुर के विश्रामगृह में तय हुआ। लखनपुर के अमित सिंहदेव ने वहाँ व्यवस्था कर दी थी।

दूरियाँ बताता सूचना फ़लक

अमित सिंह देव लखनपुर ने बताया कि कटघोरा से उदयपुर की दूरी लगभग 70 किलो मीटर होगी। कटघोरा से अम्बिकापुर वाली सड़क पर पहुंच कर यह लगा कि हमने सड़क मार्ग द्वारा अम्बिकापुर जाने की बहुत बड़ी भूल कर दी। सड़क की हालत देखकर लगा कि 70 किलो मीटर का रास्ता अगर रात भर में तय हो जाए तो बहुत बड़ी बात है। सड़क कहीं है ही नहीं, सिर्फ़ गड्ढे ही गड्ढे। कहना चाहिए गड्ढों में सड़क ढूंढना भी बहुत कठिन कार्य है। छत्तीसगढ में इतनी गंदी सड़क पहली बार देखी है। ऐसा लग रहा था किसी अन्य राज्य की सीमा में प्रवेश कर गए। पता नहीं सरगुजा की इस सड़क के प्रति सरकार सौतेला व्यवहार क्यों कर रही है। जब ओंखली में सिर दे ही दिया तो अब मुसल का प्रहार भी सहना पड़ेगा। मै पिछली सीट पर लेट गया, पंकज और राहुल दोनो पायलेट और नेवीगेटर की भूमिका में थे।


उदयपुर विश्राम गृह
रास्ते में भूख लगने लगी। एक ढाबा देख कर गाड़ी को किनारे लगाया और ढाबे में पहुंच गए। ढाबा छोटा ही था, लोग हिलते डुलते नजर आ रहे थे। रात का समय हो और जंगल के निवासी हिलते डुलते नजर न आएं तो समझना चाहिए कि हम वन क्षेत्र में नहीं है। आज कुछ स्पाईसी खाने का मन था। हमने भी जंगली खाने का आडर दिया। उसने कुक्कड़ बहुत बढिया बनाया।  मनवांछित भोजन मिलने के बाद आत्मा तृप्त हो गयी। अन्य सहयात्रियों ने भी खाने की तारीफ़ की। भोजन जैसा महाआयोजन सफ़ल हो गया। इससे हम भी धन्य हो गए। गाड़ी फ़िर सड़क पर आ गयी। मै पिछली सीट पर लेट गया। क्योंकि इस सड़क पर सोते हुए चलना ही ठीक है। जागते हुए तो रास्ता भी नहीं कटता। मेरी आँख 11 बजे उदयपुर रेस्ट हाऊस के मुख्यद्वार पर पहुंच कर खुली। रेस्ट हाऊस के गृह मंत्री ने गेट खोला। ठंड अच्छी थी मै बिस्तर के हवाले हो गया।

सामत सरना शिवमंदिर एवं विष्णु सिंह देव
सुबह चौकीदार लाल चाय बनवा कर ले आया। सुबह की चाय के बाद थोड़ी नींद की खुमारी उतरी। चाय के बाद रेस्ट हाऊस का एक चक्कर लगाया तो आस पास के शहरों दी दूरियाँ बताता हुअ एक सूचना फ़लक दिखाई दिया। जिसमें कटघोरा से उदयपुर की दूरी 112 किलो मीटर लिखी थी। चौकीदार गरम पानी ले आया और हम स्नानाबाद से लौटकर आगे की यात्रा के लिए तैयार हो गए। सुबह से दो बार अमित सिंह देव का फ़ोन आ गया था। हम रेस्ट हाऊस से बिना नाश्ता किए ही लखनपुर चल पड़े। अमित सिंह देव लखनपुर में रहते हैं। इनके विषय में चर्चा बाद में की  जाएगी। इन्होने अम्बिकापुर के युवा नेता विष्णु सिंह देव को साथ लिया। जायसवाल होटल में नाश्ता करके डीपा डीह की ओर चल पड़े। अम्बिकापुर से शंकरगढ 60 किलोमीटर पर एवं शंकरगढ से डीपाडीह 15 किलोमीटर पर स्थित है। डीपाडीह पुरातात्विक स्थल है, जहाँ उत्खनन कार्य राहुल सिंह के द्वारा हुआ॥

विष्णु सिंह देव, अमित सिंह देव, ललित शर्मा
लगभग 10 बजे हम डीपाडीह के लिए चले, अम्बिकापुर से डीपाडीह की सड़क अच्छी है। सड़क को देख कर हम कटघोरा से अम्बिकापुर आने का दर्द भूल चुके थे। विष्णु सिंह देव शंकरगढ जमीदारी से हैं। उन्हे इस इलाके की अच्छी जानकारी होने के कारण उनका साथ हमारे जैसे जिज्ञासु के लिए अच्छा रहा। यह सुरम्य वन आच्छादित इलाका है। डीपाडीह के सामत सरना समूह को देखने इच्छा कर दिनों से थी। कई बार जाने का प्रयास हुआ लेकिन समयाभाव के कारण सफ़लता नहीं  मिली। आज समय आ गया हमारे डीपाडीह पहुचने का। कुछ वर्षों पूर्व इस इलाके में नक्सलियों की आमद हो चुकी है। यह इलाका नक्सल प्रभावित माना जाता है। चर्चा के दौरान हम 12 बजे शंकर गढ पहुंच कर विष्णुसिंह देव के चाचा जी से मिले। उसके बाद हम डीपाडीह के सामत सरना समूह पुरातत्विक स्थल पर पहुंचे।

आगे पढ़ें 

मंगलवार, 15 जनवरी 2013

पृथ्वी पर जीवोत्पत्ति के चिन्ह छत्तीसगढ़ में…Sirpur……… ललित शर्मा

रती का निर्माण कैसे हुआ? धरती पर जीव कैसे आए? यह जिज्ञासा साधारण मनुष्य के मन में उत्पन्न होती है। इस विषय पर विभिन्न धर्मों के निजी दर्शन है तो वैज्ञानिकों ने शोध द्वारा अपने विभिन्न मत प्रगट किए। परन्तु सभी विज्ञानिक यह मानते हैं कि पृथ्वी पर प्रथम जीवोत्पत्ति एक कोशिय थी। अरबों वर्ष पूर्व वातावरण जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं से कोएसरवेट्स  नामक संरचना बनी और धीरे-धीरे इसमें जीवन के लक्षण आ गए। इन्ही से प्राथमिक जीवन की उत्पत्ति हुई जिनमें जीवन के सारे लक्षण थे।
राम मंदिर राजिम का स्तम्भ 
इन पदार्थों से प्रोटोवायरस,, वायरस, प्रोकैरियाटिक कोशिकाएं रसायन संश्लेषी  कोशिकाएं प्रकाश संश्लेषी कोशिकाएं, युकैरियाटिक कोशिकाएं क्रमश: बनी होगीं। प्राणिजगत्‌ में दो प्रकार के जीव, एककोशिक और बहुकोशिक, होते हें। एककोशिक जीव प्रोटोज़ोआ (Protozoa) हैं, जो एक कोशिका में ही सभी प्रकार के जीवनव्यापार संपन्न कर लेते हैं। बहुकोशिक जीव मेटाज़ोआ (Metazoa) हैं, जिनमें प्रत्येक कार्य के लिये अलग अलग कोशिकासमूह होता है।वैज्ञानिकों ने चट्टानों का रेडियोमएट्रिक डेटिंग कर अध्ययन किया।
राजीव लोचन मंदिर का स्तम्भ 
जिससे जीवश्मों द्वारा पृथ्वी के निर्माण का काल निर्धारण हुआ। एक अरब वर्ष से पूर्व एक कोशिय जीवों का धरातल पर जन्म हो चुका था। धरती पर जीवन के प्रथम चिन्ह छत्तीसगढ में एककोशिय जीवाणुओं के जीवाश्मों के रुप में प्राप्त होते हैं। सिरपुर में शिल्पकारों द्वारा निर्माण में प्रयुक्त किए गए पाषाणों में कुछ का क्षरण विशेष तरह से हो रहा है। आनंद प्रभ कुटी की मूर्तियाँ और प्रस्तर स्तम्भों में चकते दिखाई दे रहे थे तथा चकतों के आस पास के पत्थर का क्षरण हो रहा है और चकते इतने कठोर हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ा है। अगर हम ध्यान से देखेगें तो यह दिखाई देता है। लगता है कि ये पत्थर कमजोर हैं।
सिरपुर से उत्खनन में प्राप्त प्रतिमा 
भूविज्ञानी ग़्यानी बादाम से चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ कि इन पत्थरों का निर्माण एककोशिय जीवों के जीवाश्म से हुआ है। जीव निर्माण के समय अरबों वर्ष पूर्व छत्तीसगढ यह भूमि कटोरे जैसी थी। इसमें अमीबा जैसे एककोशिय जीव उतपन्न हुए। जीवों के मल एवं पेड़ पौंधों के पत्ते करोड़ों वर्षों तक एक ही स्थिति में रहे जिससे दलदल धीरे-धीरे चट्टान में परिवर्तित हो गया। इन पत्थरों जो चकते दिखाई देते हैं वे अमीबा जैसे एक कोशिय जीवों का मल है।  मल के जीवाश्म कठोर है जिससे वे स्पष्ट दिखाई देती हैं। उनका क्षरण नहीं हुआ है। इस तरह इन चट्टानों के रुप में पृथ्वी पर प्रथम जन्म लेने वाले जीवाणुओं के चिन्ह जीवाश्म के रुप में मिलते हैं।
सुरंग टीला का स्तम्भ 
सिरपुर के लगभग सभी स्मारकों में इस जीवाश्म युक्त पाषाण पर निर्माण दिखाई देता है। जबकि चूना पत्थर एवं बलुई पत्थर एवं अन्य पत्थरों पर भी निर्माण मिलता है। आनंद प्रभ कुटी, सुरंग टीला, तीवरदेव विहार, गंधेश्वर मंदिर के स्तंभ, नदी तट पर स्थित युगल शिवमंदिरों के स्तम्भों एवं मूर्तियों में तथा अन्य संरचनाओं में इसी जीवाश्म युक्त पत्थर का प्रयोग हुआ है। सिरपुर के अलावा राजीव लोचन मंदिर, कुलेश्वर महादेव मंदिर, राम मंदिर राजिम इत्यादि में निर्माण में इसी पत्थर का प्रयोग  हुआ है। रतनपुर की बीस दुवरिया के द्वारों की चौखट में इस पत्थर के टुकड़ों का प्रयोग हुआ है। सिंघा धुरवा में भी मुझे इसी पत्थर से निर्मित एक प्रतिमा देखने मिली। इससे सत्यापित होता है कि छत्तीसगढ में पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति के प्रथम चिन्ह जीवाश्म के रुप में हमें प्राप्त होते हैं।

आनंद प्रभ कुटी सिरपुर का जीवाश्म स्तम्भ 
महानदी के त्रिवेणी संगम स्थित कुलेश्वर महादेव मंदिर की प्रतिमाओं एवं स्तम्भों में भी इसी पत्थर का उपयोग हुआ है। अवश्य ही जीवाश्म युक्त पत्थरों का उत्खनन स्थल (खदान) इन इलाकों के आस पास ही होगी।

श्री ज्ञानी बादाम एवं ब्लॉगर सेमीनार स्थल रायपुर में

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

इहै नगरिया तू देख बबुआ …………… ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
प्राचीन राजधानी श्रीपुर के अवशेषों को देखने पर्यटक आते हैं, जरा चर्चा वर्तमान सिरपुर गाँव की भी कर ली जाए। प्राचीन राजधानी के वैभव को तो मैने देखा नहीं परन्तु उसके खंडहरों को देखकर उसके वैभव एवं महत्ता को महसूस किया है। वर्तमान में सिरपुर ग्लोब पर 21.40’51.13 उत्तर एवं 82.10’54.07 पूर्व में रायपुर से 81 किलोमीटर की दूरी पर महासमुंद तहसील, जनपद एवं जिलान्तर्गत आता है। इसका थाना क्षेत्र तुमगाँव है। सिरपुर के ढाई किलो मीटर पर नैनी नाला, 7 किलोमीटर पर मखमल्ला एवं खरखर नाला, 8 किलोमीटर पर धसकुड़ नाला एवं 12 किलोमीटर पर सुकलई नाला है। ये नाले महानदी में जाकर मिलते हैं। सुकलई नाला महासमुंद एवं बलौदाबाजार जिले की सीमा रेखा है।
महानदी के तीर सिरपुर एवं रायकेरा  तालाब 
पुष्पा बाई यादव सिरपुर ग्राम पंचायत की सरपंच एवं शंकर ध्रुव उपसरपंच हैं। सेनकपाट एवं खमतराई सिरपुर ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम हैं। 20 वार्डों में विभाजित इस पंचायत में लगभग 1700 मतदाता एवं 200 घर है। जिनमें 50% गोंड़ आदिवासी 30% कवंर एवं अन्य 20% में ब्राह्मण, राजपुत, चंद्राकर (कुर्मी) सतनामी, मोची, नाई, यादव, धीवर, निषाद, गिरी-पुरी आदि निवास करते हैं। यहाँ के 50% निवासी कृषक और 50% सरकारी कर्मचारी हैं।आस-पास के गाँवों का केन्द्र होने के कारण कर्मचारियों ने सिरपुर में निवास करना उपयुक्त समझा। ऐसा कोई घर नहीं है जिसमें किराएदार न बसे हों।
सिरपुर विहंगम दृश्य 
समीप के गाँवों अमलोर, पासिद, सुकुलबाय, लंहगर, बोरिद आदि का मुख्य बाजार सिरपुर ही है। यहाँ धान की खेती के साथ सब्जी का भी व्यवसाय बड़ी मात्रा में होता है। साप्ताहिक बाजार गुरुवार को भरता है जिसमें समीपस्थ गाँवों के निवासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की साप्ताहिक खरीदी खरीदी करते हैं। सिरपुर के मुख्य चौराहे पर 3 होटल हैं जिनमें जलपान की व्यवस्था है। विश्राम गृह के समीप सोनवानी होटल में दोपहर एवं रात का खाना उपलब्ध हो जाता है। ग्रामीण आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए 2 मेडिकल स्टोर्स, 4 किराना दुकान, 3 कपड़ा दुकान, गाड़ी का पंचर बनाने की 2 दुकान, मोटर सायकिल मेकेनिक 2, इलेक्ट्रिकल दुकान 3 मोबाईल शॉप 4 एवं 2 फ़ोटो स्टुडियो, पैट्रोल पंप भी हैं। इस तरह आवश्यकता की समस्त सामग्री एवं सहायता सिरपुर में उपलब्ध है।
सिरपुर का रास्ता 
शैक्षणिक दृष्टि से सिरपुर के निवासियो ने अधिक तरक्की नहीं की है। विद्युत विभाग के इकलौते जुनियर इंजीनियर के अतिरिक्त कोई भी अधिकारी नहीं बन पाया। वन विभाग, पुलिस विभाग, शिक्षा विभाग में कुछ लोग सेवारत हैं। शिक्षा के साधन के रुप में 2 प्राथमिक सहशिक्षा स्कूल, 1 कन्या माध्यमिक शाला, 1 बालक माध्यमिक शाला, 1 सहशिक्षा हायरसेकेंडरी स्कूल, 1 आदिम जाति कल्याण विभाग का आश्रम एवं गुड शेफ़र्ड नामक अंग्रेजी माध्यम का स्कूल भी है। अंग्रेजी माध्यम का स्कूल होने का अर्थ है कि सिरपुर के निवासी अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा का महत्व समझ रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर उप स्वास्थ्य केंद्र, आर्युवैदिक औषधालय है। यहाँ छोटी-मोटी बीमारी  का ईलाज हो जाता है। गंभीर बीमारी होने पर रायपुर या महासमुंद ही एक मात्र विकल्प है। पशुओं की चिकित्सा एवं कृत्रिम गर्भाधान के लिए पशुचिकित्सालय की व्यवस्थित है। पर्यटकों के लिए सूचना केंद्र है जिससे छत्तीसगढ पर्यटन के होटल, मोटल, एवं रिसोर्ट बुक किए जाते हैं और पर्यटन संबंधी सूचनाएं दी जाती हैं।
महानदी के तीर प्राचीन आश्रम 
सिरपुर में सरकारी कार्यालय के नाम पर ग्रामीण बैंक, सहकारी समिति, पुलिस चौकी, विद्युत सब स्टेशन, लकड़ी डीपो, पटवारी निवास, फ़ारेस्टर का निवास है। इसके अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए महासमुंद जाना पड़ता है। पर्यटकों एवं ग्रामीणों के मनोरंजन की सुविधा के लिए अंग्रेजी एवं देशी शराब के ठेके भी हैं। विडम्बना है कि शराब ठेके गाँव के मध्य में स्थित हैं और पुलिस चौकी गाँव की सीमा के बाहर। यात्रियों के निवास के लिए पीडब्लुडी का एक मात्र विश्राम गृह है। जिसके आरक्षण के लिए महासमुंद उप जिलाधीश या संबंधित विभाग के उच्चाधिकारियों से समपर्क करना पड़ता है। वर्तमान में पर्यटन मंडल द्वारा एक रिसोर्ट का निर्माण कराया जा रहा है। जो कि रिहायश से बाहर है। आवगमन की सुविधा के लिए सड़कों की  हालत बढिया है और स्कूल के खेल मैदान में एक हैलीपैड स्थित है। जिस पर विशिष्ट लोगों के आगमन हेलीकाप्टर उतारा जाता है।
हेलीपेड 
ग्राम विकास एवं पुरासामग्री की चोरी रोकने के लिए सिरपुर प्रवेश द्वार पर नाका लगाया गया है। फ़िर भी मूर्तियाँ चोरी होने की घटना हो चुकी है। नाके में प्रति 4 चक्के एवं उससे बड़ी गाड़ी के आगमन पर 10 रुपए टैक्स लिया जाता है तथा गाड़ी का नम्बर रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। इससे पता चल जाता है कि कितनी गाड़ियाँ सिरपुर में प्रतिदिन आ रही  हैं। ग्रामवासी  कहते हैं कि विद्युत व्यवस्था में ही समस्या है। बिजली कब चली जाए और आ जाए इसका पता नहीं चलता। यह भी विडम्बना है कि जितने दिन मैंने सिरपुर में निवास किया कभी बिजली नहीं गयी। पैट्रोल-डीजल भी कभी उपलब्ध रहता है कभी नहीं। उपलब्धता की निरंतरता नहीं  है। ऐसी स्थिति में स्थानीय दुकानदारों से अधिक मूल्य पर खरीदना पड़ता है।
सिरपुर के घोंघा बसंत 
माघ माह की पूर्णमासी को सिरपुर में मेला लगता है तथा तीन दिवसीय शासकीय कार्यक्रम "सिरपुर महोत्सव"  मनाया जाता है। मेले के दौरान सभी जाति समाजों के लोग जुटते हैं और अपनी जातिय समस्याओं का बैठक करके हल निकालते हैं। सिरपुर धर्म की ही  नगरी है। यहाँ वर्तमान में लगभग सभी समाजों के अपने मंदिर एवं धर्मशालाएं हैं। जिनमें पटेल मरार समाज का राधाकृष्ण मंदिर, कोसरिया यादव समाज का कृष्ण मंदिर एवं दुर्गा मंदिर, कोसरिया पटेल समाज का दुर्गा मंदिर, निषाद समाज का राम जानकी मंदिर, बेलदार समाज का रामजानकी मंदिर, कंवर समाज का रामजानकी मंदिर, धीवर समाज  का रामेश्वर शिव मंदिर, सेन समाज का राधाकृष्ण मंदिर, सतनामी समाज की गुरु घासीदास की गद्दी, झेरिया यादव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, कबीर पंथियों की कबीर कुटी, वैष्णव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, साहू समाज का कर्मा मंदिर, गोंड़ समाज का प्राचीन शिव मंदिर, समलेश्वरी मंदिर एवं 2 जगन्नाथ मंदिर, रविदास मंदिर(मेला स्थल), चंडी मंदिर (गंधेश्वर महादेव मंदिर के समीप) दुर्गा मंदिर (सुरंग टीला से विस्थापित) भी हैं। इसके अतिरिक्त स्थानीय ग्रामदेवता के रुप में  महामाया, शीतला, ठाकुरदेव, सांहड़ादेव भी हैं।
 रायकेरा  तालाब 
सिरपुर में तालाबों की भरमार है, शायद ही कोई ऐसा प्राचीन मंदिर हो जिसके समीप पोखरी या तालाब नहीं है।  निस्तारी के  लिए नित्य उपयोग में आने वाले प्रमुख तालाब रायकेरा बंधवा एवं कमार डेरा तरिया हैं। रायकेरा बंधवा के विषय में जन श्रुति है कि प्राचीन काल में एक साधु था, उसके पास एक गाय थी। साधु ने स्थानीय चरवाहे को गाय चराने के लिए दी। एक दिन साधु ने चरवाहे की सेवा से उसे प्रसन्न होकर एक पत्थर दिया। चरवाहा में पत्थर तो ले लिया पर मन-मन साधु को कोसने लगा कि बरसों की सेवा के दिया तो एक पत्थर। चरवाहे सोचा कि इस पत्थर का क्या किया जाए। उसने रायकेरा तालाब में जाकर पत्थर से अपनी कुल्हाड़ी मांजा और पत्थर तालाब में फ़ेंक दिया। जब चरवाहा घर पहुंचा और कांधे से कुल्हाड़ी उतारी तो देखा वह सोने की हो गयी थी। वहा आश्चर्य चकित रह गया और अपने भाग को कोसने लगा।
महानदी के तीर पर ब्लॉगर मंडली राजीव रंजन, ललित शर्मा एवं आदित्य सिंह
उसने तालाब में जाकर खूब डुबकियाँ लगाई पर वह पत्थर नहीं मिला। यह जानकारी गाँव से प्रारंभ होकर राजा तक पहुंची। राजा के मन में पारस पत्थर प्राप्त करने के लिए लोभ जागृत हो गया। एक पारस पत्थर राजा की दशा सुधार सकता था और उसके सेना समेत राज्य को बना सकता था। यही सोच कर राजा ने चरवाहे को बुलाकर सत्यता की जाँच की। चरवाहे सारी घटना का वर्णन राजा से किया। राजा ने हाथी के पैर में लोहे की जंजीर बांध कर तालाब में घुमाने का आदेश दिया। हाथी सारे दिन तालाब को मथता रहा। शाम को जब उसे तालाब से बाहर निकाला गया तो उस लोहे  की जंजीर की एक कड़ी सोने की हो गयी थी। उसके बाद से किंवदंती चल रही है कि रायकेरा तालाब में पारस पत्थर है। यह वर्तमान सिरपुर है। जारी है … आगे पढे।

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

इन आँखों की मस्ती के ............... ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं …… मेरे चलभाष फ़ोन ने धुन बजाई। आदित्य सिंह जी का फ़ोन था, तब कुहरी मोड़ 25  किलोमीटर दूर था। मैने उनसे कुहरी मोड़ आने के लिए कह दिया। वे सिरपुर में मेरे मेजबान थे और मैं उनका मेहमान। बस कंडक्टर को बता दिया कि कुहरी मोड़ पर मुझे उतार दे। लगभग डेढ़ बजे मैं कुहरी मोड़ पर पहुंचा। प्यास जोरों की लग रही थी। मालकिन ने घर से खाना बना कर भी दिया था। भूख अभी तक लगी नहीं थी। मोड़ पर एक छोटा सा होटल है, जहाँ उपलब्धता एवं आवश्यकता पर चाय नाश्ता मिल जाता है। यहीं मैने पानीग्रहण कर आदित्य सिंह जी को फ़ोन खड़काया। आप जिन्हें कॉल कर रहे हैं वो कवरेज एरिया के बाहर हैं जवाब फ़ोन कम्पनी की बाला ने दिया। सिरपुर की तरफ़ जाने वाली बस खड़ी थी। सवारियाँ ठसाठस भरी थी। एक बारगी तो मन  हुआ  कि इसी बस से सिरपुर चला जाए अगर सिर्फ़ पैर रखने  की  जगह मिल जाए। सोच ही रहा था तभी तूफ़ानी वेग से जापानी-भारतीय लाल वर्णसंकर घोड़े पर सवार आदित्य सिंह दिखाई दे गए।  


उन्होने घोड़े की लगाम ढीली  कर दी। घोड़ा मेरे समीप ही आकर रुका। उन्होने मुंह हिला कर मेरा अभिवादन स्वीकार किया और मेरे सवार होते ही घोड़े को एड़ लगा दी। घोड़े फ़िर वही अपनी तूफ़ानी गति पकड़ ली, वेग से चल पड़ा सिरपुर की ओर। मैं बात करता था और आदित्य सिंह जी जवाब में सिर हिला देते। मुझे कोफ़्त होने लगी …… अरे भारी पीक तो बाहर करो या फ़िर मौन व्रत ले रखा है। मेरे कहने से उन्होने ढेर सारा पीक उगल  कर धरा संग मुझे भी धन्य किया। अब बात बन गयी। कुहरी से सिरपुर के बीच बाबा किशा राम की समाधि होने की जानकारी देता बोर्ड दिखाई देता है। परन्तु इस स्थान पर कभी नहीं जा पाया। मैने आदित्य सिंह जी से यहाँ जाने की इच्छा प्रगट की। थोड़ी देर बाद हम सागौन के प्लांटेशन के बीच से होकर जंगल में बाबा किशा राम की समाधि पर पहुंचे। यहाँ पर समाधि स्थल बना हुआ है। साथ ही कांक्रीट से निर्मित एक बड़ा परिसर भी दिखाई दिया। एक हैंड पंप भी लगा हुआ  है।


बाबा किशाराम की समाधि पर देहावसान की तारीख 7/7/77 लिखी थी। संयोग  ही था जब इन्होने देहत्यागी तो  तारीख 7 जुलाई 1977 थी। इस दिन यहाँ इनके अनुयायी और परिवार के लोग आकर प्रतिवर्ष बरसी मनाते हैं एवं लंगर भंडारे का आयोजन किया जाता है। इनके विषय में कहा जाता है कि ये संत प्रवृति के थे तथा देहत्यागने के अवसर इन्होने अपने परिजनों को कहा कि उनकी देह का दाह संस्कार न किया जाए। मृत देह को घने जंगल में छोड़ दिया जाए, जिससे वह मांस भक्षी पशु पक्षियों के आहार के काम आ सके। उनकी अंतिम इच्छानुसार यही हुआ। कुछ दिनों पश्चात उनकी अस्थियों को समेट कर इसी स्थान पर समाधि बना दी गयी। यहाँ पर उनकी पत्नी की समाधि है। लोग यहाँ पहुंच कर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हमारी सिरपुर यात्रा का दूसरा चरण यहीं से प्रारंभ हो चुका था।

हम घर पहुंचे तो मेजबान के सारे परिजन छुट्टियों के पश्चात महासमुंद लौट रहे थे। घर पर सामान रख कर हम पैदल ही सिरपुर भ्रमण पर चल पड़े। सिरपुर गाँव के बीच में बस स्टैंड हैं जहाँ कसडोल रायपुर महासमुंद जाने वाली बसें आकर सवारी लेती हैं। रायपुर के लिए सीधी बस सुबह और दोपहर को ही मिलती है। इसके बाद महासमुंद जाने वाली बसों में तुमगाँव मोड़ तक या कुहरी मोड़ तक आना पड़ता फ़िर वहाँ से रायपुर-महासमुंद या सराईपाली-रायपुर मार्ग की बसें या टैक्सियाँ मिल जाती है। पान दुकान पर पहुंचने पर वह पहचान जाता है क्योंकि इससे पहले भी दो तीन बार पहले भी ताम्बुल सेवन यहीं से हो चुका है। 

यहीं पर अमलोर में पदासीन प्रधानाध्यापक प्रद्युम्न प्रसाद पाण्डे जी से भेंट होती है। सोनवानी भौजी के होटल से  चाय ग्रहण कर हम तीनों सिरपुर के पुरावशेषों को देखने चल पड़ते हैं। महासमुंद से शैलेंद्र दुबे ने भी फ़ेसबुक पर अपने सिरपुर पहुंचने का जिक्र किया था। उनकी भी हमें प्रतीक्षा थी और वे चलभाष पर समपर्क में थे। महासमुंद निवासी शैलेन्द्र इतिहास और पुरातत्व में काफ़ी रुचि रखते हैं तथा घुमक्कड़ी के साथ स्टेज पर भी अपनी कला दिखाते हैं अर्थात रंगकर्मी हैं, प्ले भी करते हैं। इनसे मेर्री मुलाकात फ़ेसबुक पर हुई थी। इन्होने संदेश दिया था कि सिरपुर पहुंचने का समाचार इन्हे दूँ तो वे सिरपुर भेंट करने आ जाएगें………जारी है  …………

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

रमई पाट में गर्भवती सीता ........ ललित शर्मा


पुजारी प्रेम सिंह एवं यायावर 
त्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 84  किलो मीटर दक्षिण-पूर्व दिशा में  20.57,06.28" उत्तर एवं 82.07,51.56" पूर्व में फ़िंगेश्वर से छूरा मार्ग पर सोरिद ग्राम के समीप रमई पाट है। सोरिद गॉंव पहुचने पर दाहिने हाथ की तरफ़ रमई पाट जाने का मार्ग  है। थोड़ी सी चढ़ाई पर पहाडियों के बीच रमई पाट देवी का मंदिर सुरम्य वन क्षेत्र में है। यहॉं कई मंदिर हैं, जिनमें प्रमुख शिवालय एवं रमई पाट देवी का स्थान है। इस स्थान पर पहुंचने के लिए पक्की डामर की सड़क बनी हुई है। सड़क का अंत मंदिर के द्वार पर ही पहुंच कर ही होता  है। यहॉं पहुचने पर मुझे कहीं ऊंचे स्थान से पानी गिरने की आवाज आती है। थोड़ी ही दूर पर आम के पेड़ की जड़ से रिस कर बहता हुआ जल एक कुंड में इकट्ठा हुआ दिखाई देता है। कुंड का यही निर्मल जल लगभग 100 फ़ुट जमीन के भीतर चल कर आगे एक चट्टान से नीचे गिरता है। जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है।

गूगल से रमई पाट 
यहॉं मेरी मुलाकात बखरी में घास नींद रहे पुजारी प्रेम सिंह ध्रुव से होती है। प्रेम सिंह का परिवार इस स्थान की देखभाल कई पीढियों से कर रहा है। दुलार सिंह, झरियार सिंह, सुमेर सिंह के बाद चौथी पीढी में  में प्रेम सिंह का स्थान आता है। कदम-कदम पर गाँवों में कहानियॉं, किंवदन्तियॉं बिखरी हैं। ग्रामीण जन-जीवन मे इनका अत्यधिक मह्त्व है। दिन भर की हाड़ तोड़ मेहनत के बाद इन कहानियों किस्सों का रोमांच ही उर्जा देता है तथा ग्रामीणों के मनोरंजन का साधन भी कहानियॉं होती हैं। ग्रामीण अंचल के किस्से कहानी कोरी गप्प नहीं होते। उनके पीछे कभी कोई ठोस आधार भी दिखाई देता  है। एक कहानी मुझे छत्तीसगढ़ के फ़िंगेश्वर क्षेत्र के सोरिद ग्राम के समीप वनांचल में स्थित रमई पाट देवी मंदिर  के पुजारी प्रेम सिंह ध्रुव ने सुनाई।

काल भैरव 
मंदिर  के प्रांगण में खुले आसमान के नीचे काल भैरव अपने स्वान के साथ विराजमान हैं। समीप ही महिलावेश में हनुमान जी अहिरावण को अपने पैर से दबाए हुए खड़े हैं। मंदिर के सामने ही एक पाषाण विग्रह पर बहुत सारी लोहे की सांकल बंधी हुई हैं, इसे प्रेम सिंह कचना धुरवा देव बताते हैं। मनौती पूर्ण होने पर इनको सांकल चढाई जाती है। गर्भ गृह के द्वार पर सिंह प्रतिमा स्थापित है। इसे नरसिंह माना जाता है। गर्भ गृह में प्रस्तर की रामचंद्र, सीता एवं विष्णु की तीन मूर्तियॉं एक ही स्थान पर स्थापित हैं। रामचंद्र एवं सीता की मूर्ति को चांदी के मुकूट पहनाए हुए हैं। समीप ही प्रस्तर रुप  में बैगा-बैगीन भी विराजमान हैं। गर्भ गृह से थोड़ा अलग हट कर शिवालय भी बना हुआ है, जहां काले पत्थर का शिवलिंग स्थापित है।

शिव लिंग 
सभी देवी-देवता एक ही स्थान पर विराजित होने से थोड़ा कौतुहल मेरे मन में जागृत होता है। प्रेम सिंह चटाई बिछाते हैं और हमारी चर्चा प्रारंभ होती है। प्रेम सिंह कह्ते हैं कि जब रामचंद्र जी ने सीता का त्याग किया, तब वे गर्भवती थी। त्यागने पर लक्ष्मण उन्हें इस सघन वन में लाकर छोड़ गए। यहॉं सीता जी अकेली रह गयी। मन में सीता के प्रति अनुराग होने पर भगवान राम ने लक्ष्मण से उनका हाल-चाल पूछा। कुशलता बताने पर उनका मन नहीं माना। इधर भगवान द्वारा सीता जी के परित्याग करने पर देवलोक में हलचल हो रही थी। सभी देवता सीता जी से मिलने के लिए चल पड़े। भगवान राम भी व्यथित मन से सीता जी से मिलने के लिए यहॉं आए।

रामचंद्र जी, सीता जी, विष्णु जी 
सबसे पहले भगवान राम पहुंचे, इनके पीछे-पीछे विष्णु जी, शिव जी, नरसिंह जी, गरुड़ जी, काल भैरव जी, हनुमान जी भी पहुंचे। विष्णु जी ने भगवान राम को यहॉं पहले पहुंचे देखकर पूछ लिया कि परित्याग करने के पश्चात भी आप यहॉं कैसे आए? भगवान राम ने सीता के प्रति अपने अनुराग को उनसे मिलने आने का कारण बताया। भगवान राम तो सीता जी से मिल कर चले गए, पर बाकी देवता लौटना  नहीं चाह्ते थे। इसलिए सीता जी ने उन्हें अपने समीप ही रहने का स्थान दिया। तभी से सारे देवता इसी स्थान पर विराजमान हैं। हनुमान जी स्त्री रुप में होने के कारण बताते हुए कहते हैं कि यह रुप हनुमान जी  ने राम एवं लक्ष्मण को अहिरावण से मुक्त कराने दौरान धरा था। वे इसी रुप में यहॉं पर स्थापित हैं। कुछ दिनों पश्चात वाल्मिकी ॠषि का इस स्थान पर आगमन हुआ, उन्होने सीता माता को पहचान लिया और उन्हे अपने तुरतुरिया आश्रम में ले गए। जहॉं लव-कुश का जन्म हुआ। 

पेट पर हाथ रखे सीता जी 
इस स्थान की विशेषता यह है कि यहॉं गर्भवती सीता की सतत पूजित प्रतिमा स्थापित है। पुराविज्ञानी श्री जी एल रायकवार से चर्चा करने पर उन्होने बताया कि प्रतिमा विज्ञान में गर्भवती स्त्री की मूर्ति नहीं बनाई जाती। अगर किसी कारणवश बना भी दी जाती है तो उसकी पूजा नहीं होती। ऐसी प्रतिमा अपूजनीय होती है। गर्भवती सीता की प्रतिमा के विषय में मेरी अन्य विद्वानों से भी चर्चा हुई, उन्होने इस तरह की अन्य कोई प्रतिमा अन्य किसी स्थान पर पाए जाने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की। इस मंदिर की लगभग सभी मूर्तियॉं खंडित हैं जिनकी बाद में सीमेंट से मरम्मत की गई है। इन देवताओं के अतिरिक्त यहॉ पर घाट में कुंवर बिछलवा, बूड़ती में शीतला माई (पश्चिम दिशा) उगती में ठाकुर ठकुराईन (पूर्व दिशा) बरमदेव, बरदे बाबा एवं घटुरिया देव आदि स्थानीय देवी देवता भी निवास करते हैँ।

नरसिंह 
सीता जी का रमई पाट नाम पड़ने के पीछे की मान्यता है कि उनका परित्याग होने के पश्चात इस स्थान में आने के कारण सभी देवता यहीं रम गए। इसलिए इस स्थान को रमई पाट कहा जाने लगा। इन मूर्तियों को प्रेम सिंह 9वीं, 10 वीं शताब्दी की बताते हैं, पर मूर्तियों का शिल्प देख कर लगता नहीं है कि यह मूर्तियां इतनी पुरानी होगीं। शायद फ़िंगेश्वर के फ़णीश्वर महादेव सी प्राचीनता दर्शाने के लिए इन्हें  9वीं, 10 वीं शताब्दी का बताया जा रहा है। बाल बंधने के समय (गर्भ पूजा तिहार) एवं हनुमान जयंती को यहॉं से वर्ष में दो बार जात्रा निकाली जाती है। तब पूजा के समय फ़िंगेश्वर राज के राजा-रानी आकर पूजा करते हैं तथा बकरे की बलि भी दी जाती है। पहले तो यहीं मंदिर के सामने बलि दी जाती थी। इसे राजा ने बंद करवा दिया। इसलिए यहॉं पर सिर्फ़ बकरे को चावल चबवाया जाता है। बलि थोड़ी दूर ले जाकर दी जाती है। लोग अपनी मनौती पूर्ण होने पर बकरे की बलि देते हैं। सदियों से यह परम्परा चल रही है और मान्यतानुसार आगे भी चलते रहेगी।
स्त्री वेश में हनुमान