बुधवार, 20 जुलाई 2011

बरसात की एक रात का चिंतन --- ललित शर्मा

मैने रात 1 बजे बारिश की आवाज रिकार्ड की।  बारिश की बूंदो की आवाज के साथ झिंगुरों का स्वराघात बादलों की गड़गड़ाहट के कारण रहस्यमय संगीत पैदा कर रहा था। बारिश का संगीत सुनिए फ़ुहारों के साथ। कुछ आवाजे शुन्य में प्रगट हो रही हैं। जैसे कोई सरसराती आवाज में कुछ कह रहा हो। 



मौसम बरसाती बना हुआ है, थोड़ा बहुत बरस कर बादल रह जाते हैं, पहले 5-10 दिनों की झड़ी बनती थी, अब वह नहीं बन रही। हां! बरसाती बीमारियाँ जरुर पहुंच गयी। डॉक्टर फ़सल काटने में लगे हुए हैं और मरीज जेब खाली करने में। भगवान रोटी-रिजक सबको देता है सभी व्यवसाय एक दूसरे पर ही निर्भर हैं। आधी रात हो चुकी है, खिड़की के सामने खड़े-खड़े बारिश देखते हुए, कुछ दिमाग में चलने लगता है, लोग कहते हैं कि जिन्दगी में खालीपन होता है, मैं कहता हूँ कि कभी नहीं होता। हां! दिमाग चेतना अवश्य खो सकता है, विक्षिप्तता में वह कुछ भी सोच सकता है और कर सकता है। सबके अपने-अपने कर्म हैं। कोई स्वयं को रिक्त समझ सकता है पर ब्रह्माण्ड में खाली कुछ भी नहीं, खाली को शुन्य कहते है, पर खाली वह भी नहीं। शुन्य ही सृष्टि का आरंभ है। हर चीज भरी हुई है, कभी-कभी दिमाग खाली हो जाता है, कहें तो चेतना चली जाती है, फ़िर लौट आती है। दिमाग अपने काम में लग जाता है।

दो दिन की बरसाती अस्वस्थता ने काफ़ी परेशान किया। वैसे बारिश में भीगने पर भी बुखार नहीं आता, पर कहीं से जरासिम आ जाएं तो अपना काम कर ही जाते हैं। रात गहराने के साथ नींद कोसों दूर भागती जा रही है। आसमान में बादल गरज रहे हैं, बारिश की फ़ुहारें शुरु हो गयी। खिड़की से बिजली की चमक दिखती है। यही समय होता है बिजली रानी के रुठने का। बिजली के रुठते ही बल्ब भी बुझ जाता है, जैसे मंत्री के कुर्सी से उतरते ही चमचों के चेहरे का नूर स्वत: चले जाता है। पावर स्टेशन से ही करेंट चला जाए तो फ़िर बंदा करे क्या? नींद नहीं आई तो खिड़की के सामने खड़ा हो जाता हूँ, उस पार से बौछारें आ रही हैं ठंडी हवा के साथ। अच्छा लगता है, जब बिजली चली जाए और ठंडी हवा चलती रहे। अंधेरे में समय बिताने के लिए कोई और साधन भी तो नहीं। ऐसे में प्रकृति की ताल से ताल मिलाना ही ठीक है।

खिड़की के पार से बिजली चमकी और बादल जोर गड़गड़ाने लगे। कूलर की चद्दर पर पड़ती हुई पानी की लय बद्ध बूंदों से संगीत पैदा हो लगा। मेरा ध्यान टप-टप, डुम-डुम, डुड़ुम-डुड़ुम डुड़ुम, टप-टप की ध्वनि करती बूंदो पर है। कितनी मधुर लय है, इन बूंदो की तान में। सधा हुआ सुर आनंदित कर रहा है। अंधेरे में भी आँखे बंद करके सुनने का मजा ही कुछ और है। बिलकुल गुंगे के गुड़ जैसा, जिसे स्वाद आता गुड़ का पर वर्णन नहीं कर सकता। मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही  है। अगर जीवन लय बद्ध है तो जीवन संगीत का आनंद आता है। परिवार में तालमेल न हो और सुर बिगड़ा हो तो त्रैलोक्य में भी आनंद नहीं, तृप्ति नही। आनंदानुभुति एवं तृप्ति के लिए स्वर का लय बद्ध होना आवश्यक है।

बूंदों के साथ झिंगुरों का सुर में सुर मिलाना गजब है। जैसे उन्हे पता है कि अभी तबला कौन से ताल में बज रहा है और उसके साथ सरगम कौन सी मिलानी है। अंधेरे में खिड़की पार बिजली चमकती है, पेड़ों की छाया रहस्यमयी प्रतीत होती है। मुझे मसखरी सूझती है, जिसे लोग शुन्य, नीरवता, सन्नाटा, खाली पन कहते हैं उसकी आवाज रिकार्ड करने लगता हूँ, शुन्य में पैदा हुई आवाज को सुनना चाहता हूं। शुन्य से कैसी आवाजें आती हैं आज तक सुना नहीं। अनहद नाद जैसा ही होगा। चमकती हुई दामिनी के चित्र लेने चाहिए। फ़िर कभी ऐसी बरसात न हुई तो। चमकती हुई बिजली के चित्र लेना भी धैर्य का काम है। पहले बिजली चमकती है फ़िर उसके एक मिनट बाद बादल गरजते हैं। जैसे ही बिजली चमकती थी और मैं क्लिक करता था तो अंधेरे के अलावा कुछ चित्र में आता ही नहीं था। प्रयास जारी रहा, कभी तो एकाध फ़्रेम में बिजली फ़ंसेगी।

रिकार्डिंग बंद करके जैसे ही मुड़ता हूँ, बिजली की चमक से कमरे में लगे दर्पण से टकरा कर रोशनी का प्रतिबिंब लौट कर मुझे चौंका देता है। अंधेरे में जरा से उजाले से चौंक पड़ता हूं। थोड़ी सी रोशनी से दर्पण में दिखाई देते प्रतिबिंब एवं दिन की रोशनी में दिखाई देने वाले प्रतिबिंब में जमीन आसमान का अंतर है। थोड़ी सी चमक ने दर्पणाकृति रहस्यमयी बना दी। तभी एक जगह लिखा याद आता है - "दिन में ऐसे कर्म करो कि रात को चैन से सो सको, और रात को ऐसे कर्म करो कि सुबह किसी को मुंह दिखा सको।" सच कहा है, अगर मनुष्य अपना चेहरा ही गौर से देखे आंशिक प्रकाश में तो रुप कितना विकृत दिखाई देता है। इसलिए जीवन में प्रकाश का होना निहायत ही जरुरी है। जीवन में प्रकाश तभी रहेगा जब कथनी और करनी में अंतर नहीं होगा। तभी तन-मन-जीवन आलोकित होगा।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

31 टिप्‍पणियां:

  1. गरज-चमक, छीटें-फुहारें सब कुछ.

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  2. सावन की बरसात का पूरा आनंद ले लिए .

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  3. मेंहा आडिओ ल चालू करके लेख ल पढ़े म भुला गेंव....
    पढ्त पढ्त दू तीन घांव मुड उठा उठा के कांच के ओ पार घलो देखेंव के पानी गिरे कस लागत हे कहिके.... सड़क ल सुक्खा देख के सुरता आईस तोर आडिओ के.... जतका सुग्घर अवाज ल रिकार्ड करे हस वईसनच सुग्घर शब्द मन के बोंवाई करे हस गा...
    सादर...

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  4. एक ठन बात ल तो कहे बार भुला गेंव...
    खिड़की म खडा होके बौछार के मज़ा ल जादा झन लूटबे...
    जूड हवा पानी हर बुखार ल आउ बढ़ा दिही न...
    राम राम, अभी तें कर अराम
    बने हो के दौउडबे जमो धाम

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  5. बरसात का अपना मज़ा है मगर फोटो खींचना और आवाज रिकार्ड करना सबसे अलग है

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  6. घन घमंड नभ गरजत घोरा, पियाहीन दरपत मन मोरा।
    दामिनी चमक रही मन माहीं,..

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  7. बरसात का पूरा मजा लिया जा रहा है ........

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  8. मजा आ गया.मुझे भ्रम था की मूंछ वालों का फलसफा से कोई नाता नहीं होता. क्षमा.

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  9. Barsaat me manoram jhankiyon ke saath sundar aalkeh prastuti ke liye aabhar!

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  10. जय हो महाराज
    आज तो कृतार्थ हुये
    पोस्ट बहुत पसन्द आयी और सन्देश भी

    प्रणाम स्वीकार करें

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  11. बहुत अच्‍छा लिखा आपने. कई भाव संग-संग.

    दुनाली पर देखें-
    अन्‍ना को मनमौन की जवाबी चिट्ठी

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  12. याद रहेगी आपकी ये बरसात की रात .
    आखिर बिजली और रौशनी , मेरा मतलब बिजली की रौशनी को पकड़ ही लिया रात के अँधेरे में, कैमरे में .
    बहुत सुन्दर दृश्य .

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  13. अरे ललित भाई क्या कमाल करते हैं आप! पूरी पोस्ट में ऎसा वर्णन किया है कि पढ़कर लगा मैने ही लिखी है। एक बार ऎसे ही मैने भी तेज़ तूफ़ान से झूमते पेडो और चमकती बिजली की तस्वीरे ली थी। ऎसे ही बारिश की बूँदों का आनन्द लिया था जब बिजली भी चली गई थी। गाँव में अक्सर बिजली बारिश के साथ ही गायब हो जाती है...:)

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  14. जीवन में प्रकाश का होना निहायत ही जरुरी है। जीवन में प्रकाश तभी रहेगा जब कथनी और करनी में अंतर नहीं होगा। तभी तन-मन-जीवन आलोकित होगा...

    जितनी सुन्दर पोस्ट लिखी है आपने उतना ही सुन्दर सन्देश भी है...

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  15. बादल बिजली ....और बरसात का आँखों देखा वर्णन ....मन को भा गया

    बहुत बार अपने आँगन में खड़े हो कर बरसात का मज़ा लिया

    सोचा भी ..पर लिखा नहीं कभी...भाई जी आपको पढने के बाद ऐसा लगा की

    काश उस वक़्त खुद को लिख लिया होता????

    बहुत खूबसूरती से व्याख्या की है आपने हर बात की ........आभार

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  16. अच्छा चिंतन , बरसात के बहाने.

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  17. लगता है यह सारा आनंद चुपके-चुपके ही लिया गया है। नहीं तो पीछे से आवाज जरूर आती कि बिमारी में फिर बरसाती हवा से और बिमार पड़ना है क्या :-)

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  18. सच कहा है, अगर मनुष्य अपना चेहरा ही गौर से देखे आंशिक प्रकाश में तो रुप कितना विकृत दिखाई देता है। इसलिए जीवन में प्रकाश का होना निहायत ही जरुरी है। जीवन में प्रकाश तभी रहेगा जब कथनी और करनी में अंतर नहीं होगा। तभी तन-मन-जीवन आलोकित होगा।
    बने लिखे सार बात इही आय……।प्रकृति संग बने बिताये रात………नीरवता कहूं नई ये भाई………बड़ सुग्घर लेख……

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  19. 'जैसे मंत्री के कुर्सी से उतरते ही चमचों के चेहरे का नूर स्वत: चले जाता है।'
    हा हा हा खूब लिखा है भाई ! बिजली के फोटो बहुत सुन्दर आये हैं,आप ने जब ठान ही लिया की कमरे में कैद करना है बिजली को तो.......उसे कैद होना ही था ,वो भी जानती है की या तो मैं चमकना बंद क्र दूँ या कैद हो जाऊं नही तो ये बंदा रात भर नही सोने वाला.इसलिए....हमे फोटो देखने को मिल गए यूँ बिजली के फोटो कई बार देखे किन्तु जब वो फोटो कोई अपने के द्वारा खींचे हुए हो तो सचमुच बहुत अलग अहसास,खुशी होती है.बहुत खूब शब्द-चित्र खिंचा है आपने बरसती नीरव रात्री के.कलाकार हो.पर अब जल्दी अच्छे हो जाओ.खांस रहे थे फोन पर सुन रही थी आवाज.डाँट लगाऊँ? इतना जागना जरूरी था? फिर कहोगे 'ऐसिच है ये तो बहु की मेल आईडी काम में लेती है.फिर भी झगडती है.
    क्या करूं?ऐसिच हूँ मैं तो -इंदु -

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  20. कुछ दिनों पहले घनघोर वर्षा हुई. मुझे वे दिन याद गये, जब अपनी नानी के यहां बरसात देखता था. खूब भीगता था. पोखर भर जाते थे और सड़क किनारे गड्ढ़े भी. नदिया उफना जाती थीं. सामने बाग में जामुन के पेड़ पर काली-काली जामुनें नीचे गिर जाती थीं और हम उन्हें उठाते थे. छोटे छोटे शंख निकल आते थे मिट्टी में से. हरियाली झूम के आती थी. ठंडी हवा और चारों ओर हरा रंग. बरसात से मिट्टी पर बूंदों के गिरने से बने निशान. कागज की नाव. क्या दिन थे. सोचकर ही आनन्द आ जाता है और दुख होता है कि न तो अब मैं वे दिन देख पाऊंगा और मेरी पीढ़ियां तो कतई नहीं...

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  21. "दिन में ऐसे कर्म करो कि रात को चैन से सो सको, और रात को ऐसे कर्म करो कि सुबह किसी को मुंह दिखा सको।"
    सही कहा ललित भाई.......

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  22. कितनी मधुर लय है, इन बूंदो की तान में। सधा हुआ सुर आनंदित कर रहा है।


    जिंदगी भर नहीं भूलेगी ये बरसात की रात ......
    पता नहीं क्यों ये गीत याद आ गया....

    बाकी पंडित जी, बारिश का ऐसा जीवन्त वर्णन तो याद नहीं कभी पढा हो........

    शुभकामनाएं .

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  23. अगर मनुष्य अपना चेहरा ही गौर से देखे आंशिक प्रकाश में तो रुप कितना विकृत दिखाई देता है। इसलिए जीवन में प्रकाश का होना निहायत ही जरुरी है। जीवन में प्रकाश तभी रहेगा जब कथनी और करनी में अंतर नहीं होगा। तभी तन-मन-जीवन आलोकित होगा।

    गहन चिन्तन एवं जीवन दर्शनयुक्त संस्मरण .....

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  24. barsati rat ka asli maja liya aapne...varnan bahut rochak hai...sath hi usme dhoondhe gaye phalsafe...sone par suhaga..

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  25. बरसात की रात ...बिना बिजली के कितना चिंतन मंथन कर डाला ...

    इसलिए जीवन में प्रकाश का होना निहायत ही जरुरी है। जीवन में प्रकाश तभी रहेगा जब कथनी और करनी में अंतर नहीं होगा। तभी तन-मन-जीवन आलोकित होगा।

    निष्कर्ष सटीक और सार्थक ..

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  26. "दिन में ऐसे कर्म करो कि रात को चैन से सो सको, और रात को ऐसे कर्म करो कि सुबह किसी को मुंह दिखा सको।" सच कहा है,
    पर होता कहा है ऐसा ?
    खुबसुरत बिजली रानी की खुबसुरत अदा ! उसपर ये पानी की फोहारे क्या कहने ...

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  27. बरसात का पूरा मजा लिया जा रहा है शुभकामनाएं .

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