गुरुवार, 5 जुलाई 2012

रामटेकरी (मनसर-महाराष्ट्र) ------------ ललित शर्मा

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पृथ्वीसेन द्वितीय के बाद प्रवरपुर पर बौद्धों का कब्जा हो गया। पैलेस को बौद्ध विहार का रुप दे दिया गया। पैलेस के चारों ओर छोटी छोटी कुटिया बना दी गयी। जिसमें बौद्ध साधू निवास करने लगे। बौद्ध धर्म से संबंधित शिक्षाएं दी जाने लगी। बौद्ध धर्म की धार्मिक शिक्षाओं का केन्द्र बन गया। कहते हैं कि यहाँ बोधिसत्व नागार्जुन ने कुछ समय निवास किया था। इसी किंवदंती के सहारे बौद्धों ने जापान की सहायता से यहाँ पर उत्खनन करवाया। लेकिन उत्खनित इतिहास तो बहुत दूर तक जाता है। कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। वाकटक राजाओं का इतिहास एवं उनका महल भी निकल आया।
प्रवरपुर पैलेस पर विध्वंस के चिन्ह, अग्निदाह एवं भूकम्प का प्रमाण

महल पर आज भी भूकंप के द्वारा विनाश के चिन्ह एवं नल राजाओं द्वारा जलाए जाने के चिन्ह दिखाई देते हैं। वीराने में प्रवरपुर का पैलेस अपने विध्वंस की गाथा स्वयं कहता है। बस इसे देखने एवं सुनने के लिए नजर होनी चाहिए। भग्नावेश से जाहिर होता है कि कभी यह स्थान भी अपनी बुलंदी पर रहा होगा। जहाँ बैठ कर राजा लोगों की किस्मत खरीदता होगा। प्रजा की किस्मत का लेखा-जोखा करता होगा। पर काल से आज तक कोई नहीं बच पाया। चाहे वह कितना ही बड़ा एवं कीर्तिवान क्यों न रहा हो। काल ने सबको धराशायी कर दिया। उससे बड़ा पहलवान ब्रह्माण्ड में दूसरा कोई नहीं। इसलिए कहते हैं "द्वितीयोनास्ति"।
प्रवरपुर पैलेस के  शिखर से दृश्यावलोकन

राजा प्रवरसेन की नगरी मनसर (प्रवरपुर) से जब हम रामटेक (रामटेकरी) की ओर बढे तो सूरज आग बरसा रहा था। प्यास बहुत जोरों से लग रही थी। मनसर पैलेस में हमारे अलावा कोई दूसरा पर्यटक नहीं था। मनसर देखने का आनंद अद्भुत था, इसी आनंद ने हमें भीषण गर्मी को झेलने लायक बना दिया। अन्यथा सड़क पर कोई दिखाई नहीं देता था। गर्मी में सब अपने एसी और कुलर चालु करके घरों के भीतर कैद थे। भूख भी जोरों की लग रही थी। सड़क के किनारे एक होटल देख कर गाड़ी रोकी गयी। पर वहाँ कोई त्यौहार होने के कारण रसोईया नहीं था। हम आगे बढ गए। महाराष्ट्र में लगभग हर होटल और ढाबे में परमिट बार है। गरमी के मौसम को देख कर पुराने दिनों  की याद आ गयी।
हिडिम्बा टेकरी पर श्री सत्येन्द्र शर्मा एवं संध्या शर्मा जी

जब दो ठंडी बीयर उदरस्थ कर गर्मी कम कर ली जाती थी। शरीर लू के थपेड़े झेलने लायक हो जाता है। फ़िर तो आग में से भी निकला जा सकता था। लेकिन समय को देखते हुए अब हमें राजा बेटा बनना ही पड़ गया। ललक तो कभी-कभी जोर मार देती है। पर आत्मबल रोक लेता है। ललचाई नजरों से देखते रहे ठंडी बीयर लोगों को पीते हुए। हाय रे हमारी किस्मत! ये न थी हमारी किस्मत, विसाले बीयर होता…… :) जिल्ले इलाही ने सर पर शमशीर लटका रखी थी। जहाँ भी होटल के भीतर जाता था। शर्मा जी पीछे आ जाते थे। आखिर हमने ईरादा त्याग दिया और एक होटल में भोजन करने पहुंच गए। 
प्रवरपुर पैलेस में दो ब्लॉगर

सुबह से लगभग 10 लीटर पानी पी चुका था। एक लीटर पानी एक बार में अंदर हो जाता और आधे घंटे में भाप बनकर उड़ जाता है। गर्मी के मारे बुरा हाल था। भोजन करके हम रामटेक के मंदिर की ओर चल पड़े। मंदिर पहाड़ी पर स्थित है। रामटेकरी में प्रवेश द्वार के पहले मोटरसायकिल एवं कार स्टैंड बना हुआ है। जहाँ गाड़ी खड़ी करने पर दस रुपए प्रति वाहन की दर से वसुला जाता है। हमने यहां अपनी बाईक खड़ी की। सामने ही ओ3म के आकार का कालीदास स्मारक बना हुआ है। मंदिर के मार्ग में यहाँ भी बंदरों की सेना से सामना हुआ। रास्ते के दोनो तरफ़ पूजा के सामान एवं चना चबेना की दुकानें लगी हुई हैं।
राम टेकरी के प्रवेश द्वार पर मजार

बेर को कूट कर बनाया गया "बोरकुट" बड़ी मात्रा में बिक रहा था। हमने 10 रुपए की एक थैली ली। जिसका स्वाद बढिया था। पहले जब घर में बेर सुखाते थे तो उनका मुठिया बनाया जाता था। जो खाई-खजानी के रुप में बच्चों का मन बहलाता था। अब वो दिन नहीं रहे। यहाँ बोरकुट देख कर उन दिनों की याद आ गयी। जब गाँव से दरोगा की डोकरी बोईर का मुठिया बनाकर लाती थी और हम उसका इंतजार करते थे। मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप एक कब्र है जिसपर चादर चढाई हुई थी। यह कब्र किसकी थी और यहाँ क्यों मौजूद है? इसके विषय में कोई माकूल जानकारी नहीं मिली।
रामटेकरी के प्रवेश द्वार पर हेयर कटिंग सेलुन

मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक नाई ने सिट डाउन ओपन हेयर कंटिंग सेलून खोल रखा है। जब हम पहुंचे तो वह एक व्यक्ति की दाढी मुड़ रहा था। मंदिर के प्रथम दरवाजे पर भैरव और शिरपुर दरवाजा लिखा है। इस मंदिर को यहाँ गढ मंदिर कहा जाता है। बलुआ पत्थर से निर्मित मंदिर में कोई विशेष कारीगरी एवं अलंकरण नहीं दिखाई दिया। जैसा भोरमदेव, नकटा मंदिर जांजगीर में दिखाई देता है। गढ मंदिर के चारों तरफ़ परकोटा बना हुआ है। मुख्यमंदिर बीच में बना है। जहां फ़ोटो खींचने की मनाही है, लिखा था। मैने एक कोशिश की, पर पुजारी ने रोक दिया।
गर्मी से बेहाल भगवान के लिए वाताकूलन की व्यवस्था

मंदिर के भीतर एसी लगा हुआ है। भगवान भी गर्मी से बेहाल थे, तभी गर्मी से राहत दिलाने के लिए एसी का प्रबंध किया गया था। दिन भर की घुमक्कड़ी के कारन थकान हो गयी थी। मैने वहीं मंदिर के फ़र्श पर एक नींद लेने का विचार बनाया और सो गया। भोजन के नशे ने साथ दिया और एक घंटे की अच्छी नींद आई। जब नींद को आना हो तो मखमल के गद्दे की जरुरत नहीं पड़ती। कठोर चट्टान पर भी आ जाती है। एक घंटे के बाद जब नींद खुली तो तबियत एकदम फ़्रेश हो चुकी थी। बैटरी रिचार्ज हो चुकी थी। 
भोंसला राजाओ द्वारा निर्मित प्रवेश द्वार

मंदिर से बाहर आने पर सामने विशालकाय वराह देव की मूर्ती दिखाई दी। वराह देव की इतनी बड़ी मूर्ति मैने और कहीं दूसरी जगह नहीं देखी। वाकटक राजा धर्माभिमानी एवं सहिष्णु वृत्ति के थे, रुद्रसेन द्वितीय की पट्टरानी प्रभावती सम्राट चंद्रगुप्त की बेटी थी। प्रभावती गुप्त वैष्णव पंथ की अनुयायी थी। इसके पुत्र और पौत्रों ने रामगिरि पर नृसिंह, त्रिविक्रम, वराह तथा गुप्तराम आदि मंदिरों का निर्माण कराया। देवगिरि के यादव राजाओं ने यहाँ राम-लक्ष्मण मंदिरों का निर्माण किया।
विष्णुअवतार वराह देव मंदिर

कहते हैं महानुभाव पंथ के निर्माता चक्रधर स्वामी  ने यहां धर्मोपदेश किया। एक नजर पुन: गढ मंदिर पर डाल कर हमने वराह एवं नृसिंह मंदिर देखा। संध्या जी ने कालीदास स्मारक देखने की इच्छा जाहिर की। कालिदास स्मारक का निर्माण महाराष्ट्र सरकार द्वारा पर्यटन को बढावा देने के उद्देश्य से किया गया है। इसके साथ कहीं कोई प्राचीन कथानक जुड़ा हुआ नहीं है। नव निर्माण सुंदर है लेकिन देख-रेख के अभाव में खंडहर होने की आशंका है। स्मारक के मैदान की दूब सूख चुकी है। जिसके कारण यह उजड़े हुए चमन के अलावा कुछ भी नहीं है। हमने सोचा था कि कालिदास से संबंधिक कुछ जानकारियाँ यहाँ पर प्राप्त होगी पर ऐसा कुछ नहीं था।
राम लक्ष्मण मंदिर

रामगिरि की पहाड़ियों बीच एक झील है। जो सड़क से बहुत ही सुंदर दिखाई देती है। इसे अबांळा तालाब कहा जाता है। इस तालाब की गणना स्थानीय प्रवित्र तीर्थ के रुप में की जाती है। इस तालाब का जीर्णोद्धार एवं इसके किनारे मंदिरों का निर्माण भोसलें राजाओं ने किया था। तालाब के चारों तरफ़ बने हुए मंदिर माला में गुंथे हुए मनकों की तरह सुंदर दिखाई देते हैं। तालाब के चारों तरफ़ बस्ती बसी हुई है। यहाँ पंडों के स्थाई निवास है। विभिन्न जातियों ने अपने समाज की सुविधा की दृष्टि से धर्मशालाएं एवं ठहरने का स्थान बना रखा है।
कालिदास स्मारक पर सूर्यास्त का विहंगम दृश्य

मृत्योपरांत यहाँ कर्मकांड एवं पिंडदान किए जाते हैं। भोजन भट्ट पंडे यहीं  मिल जाते हैं, बस उन्हे नगद दे दीजिए फ़िर सारी व्यवस्था यहीं हो जाती है। इस तालाब में प्रवेश करने के लिए एक बड़ा प्रवेश द्वार है। मेरे कैमरे की बैटरी चुक गयी थी। आज दिन भर में बहुत अधिक चित्र ले लिए थे। इसलिए इस स्थान के सीमित ही चित्र मिले। अबांळा तालाब से जब हम वापस हो रहे थे तो सूर्यास्त हो रहा था। पहाड़ियों के बीच से अस्ताचल की ओर जाता सूरज कह रहा था कि - मैने तुम्हे बहुत तपा दिया। पता नहीं तुम किस मिट्टी के बने हो जो अभी तक घुमक्कड़ी कर रहे है। मै तो थक गया, अब चलता हूँ आराम करने। तुम जो चाहे करो तुम्हारी मर्जी, पर आज की लड़ाई तुम जीत चुके हो।    
अंबाळा तालब के घाट पर ब्लॉगर

हमने रामगिरि तीर्थ से विदा ली और चल पड़े नागपुर की ओर सपाटे से। क्योंकि जितनी दूर आ गए, उतनी दूर हमें लौटना भी था। मनसर एवं रामटेक की यात्रा शर्मा दंपत्ति के साथ आनंदायी रही। वापसी में कामठी की रेल्वे क्रांसिग के पास से मैं साथियों से आगे निकल गया। तभी मेरा मोबाईल बजा, शर्मा जी कह रहे थे कि वापस लौट आओ। उनकी गाड़ी बंद हो गयी थी। वापस लौटने पर देखा कि उनकी गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो रही है। वे पास ही मिस्त्री ढूंढने गए, हम वहीं खड़े रहे।
पहाड़ी से अंबाळा तालब का दृश्य

बाईक में पिस्टन प्रेसर ही नहीं बना रहा था। जिससे किक लगे और वह स्टार्ट हो। मिस्त्री ने मगजमारी कर ली। अब लगा कि बाईक यहीं मिस्त्री के पास ही छोड़ कर जाना पड़ेगा। चलो एक बार धक्का मारकर चालु करने का प्रयास कर लिया जाए। धक्का मारने पर बाईक स्टार्ट हो गयी। एक बारगी चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। रात के नौ बज रहे थे। घर पहुंचने की भी जल्दी थी। बाईक ने फ़िर साथ नहीं छोड़ा। घर पहुचा कर ही दम लिया। इस तरह महाराष्ट्र के मनसर एवं रामटेक के प्राचीन स्थल की सैर निर्विघ्न सम्पन्न हुई।    ( यात्रा-सम्पन्न)

22 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया ऐतिहासिक जानकारी एवं चित्र.....

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  2. बड़े बड़े फोटो देखकर बढ़िया लगा, विवरण पढ़ कर काफी कुछ जानकारी मिली, बाइक वाली बात हो जाती है ऐसी भी घटना?

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  3. वाह... अच्छी जानकारी.... बढ़िया फोटोग्राफ्स....

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  4. काल से बड़ा पहलवान नहीं, सच कहा आपने..काल के ध्वंस के निशान ये बड़े आकार अब भी दिखा रहे हैं।

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  5. बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि रेगिस्तान में भरी गर्मी में और पहाड़ी इलाकों में शीत ऋतु में जाना ही पर्यटक की सही पहचान है . मानसर यात्रा यही बता रही है !
    भग्नावेश प्रत्येक सजीव या निर्जीव की क्षणभंगुरता का संकेत देते हैं , प्रकृति तो हर रूप में कुछ न कुछ सिखाती ही है ...
    रोचक वृतांत , खूबसूरत तस्वीरें !

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  6. चलो संगती का कुछ तो असर हुआ ..हा हा हा हा ...बढियां फोटू देखने को मिले ...

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  7. @बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि रेगिस्तान में भरी गर्मी में और पहाड़ी इलाकों में शीत ऋतु में जाना ही पर्यटक की सही पहचान है . मानसर यात्रा यही बता रही है !

    :-))))

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  8. रोचक भ्रमण-वृतांत एवं सुन्दर चित्र....

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. Ghumakkado ke liye dhup, barish , sardi mayne nahin rakhti,
    maine apke kai blog padhe hain.
    apka prastutikaran hamesha accha rahta hai.
    Dhanyabad!!!

    http://yayavar420.blogspot.in/

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  11. पंडित जी, इतिहासकार बनते जा रहे हैं, जारी रखिये,


    रामटेकरी पर जानकारी के लिए साधुवाद.

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  12. आपकी ये एतिहासिक पोस्ट्स पढकर तो आत्मा तृप्त हो जाती है.

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  13. कल 06/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  14. "इन ऐतिहासिक धरोहरों की तरह आपका लेखन भी ब्लॉग जगत के लिए बहुमूल्य धरोहर है" चलते रहिये यही शुभकामना है...आपकी यायावरी के माध्यम से हम भी इन ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा का आनंद उठा सके, वैसे तो रामटेक कई बार जाना हुआ लेकिन इतनी जानकारी कभी नहीं मिली जितनी आपकी पोस्ट द्वारा प्राप्त हुई...

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  15. अच्छी रिपोर्ट....ठीक किए जो बीयर नहीं पिए...वरना इतना सब याद भी नहीं रहता....शरीर में फुर्ती खतम हो जाती....मंदिर में 1 घंटे की जगह 4 घंटे सोए पड़े रहते....बंद हुई बाइक में धक्का भी नहीं लगा पाते...फिर तो शर्मा दंपति को आपको ही धक्का लगाना पड़ता....

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  16. बहुत सुंदर फोटोग्राफ्स ! केमरे की बैटरी चुक जाने के बाद भी पर्याप्त फोटो देखने को मिले और दिलचस्प जानकारी भी।

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  17. 'जहां फ़ोटो खींचने की मनाही है, लिखा था। मैने एक कोशिश की, पर पुजारी ने रोक दिया।'
    (- संतोष रहेगा, हमने अपनी तरफ़ से तो कोशिश कर ली)
    वर्णन दृष्यात्मक है खोजपूर्ण जानकारी से परिपूर्ण .आभार !

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  18. @ बढ़िया फोटो बढ़िया विवरण पढ़ कर काफी कुछ जानकारी मिली रामटेकरी के बारे में
    ....खोजपूर्ण जानकारी के लिए आपका बहुत बहुत आभार ललित जी !

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  19. ऐतिहासिक मंदिर की बहुत बढ़िया जानकारी मिली .... चित्रमय पोस्ट बढ़िया लगी

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  20. राम टेकरी पर इतने विस्तार से जानकार मन प्रसन्न हुआ. आभार.

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  21. दो ब्लॉगर अतीत में झांकते हुए और वर्तमान का आकलन करते हुए ......कितना रोचक होता है अपने इतिहास और वैभव को जानना .....!

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