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बुधवार, 13 दिसंबर 2017

गणपति का समर्पित पूजारी : सिरती लिंगी अरुणाचल

डिब्रुगढ़ असम से तिनसुकिया होकर रोइंग अरुणाचल का सफ़र लगभग पांच घंटे का है। ब्रह्मपुत्र पर दस किमी लम्बा पुल बन जाने के कारण यह दूरी जल्दी तय होने लगी वरना यहाँ पहुंचने के लिए दिन भर लग जाता था। रोइंग लोवर दिबांग वैली का जिला मुख्यालय भी है। 
इन्जानो लोवर दिबांग वैली अरुणाचल का गणपति मंदिर एवं टिकेश्वर कौशिक 
यहाँ के विवेकानंद केन्द्र विद्यालय में रात रुकने के बाद हम सुबह मोटरसायकिल से सुनपुरा (लोहित) जिले की ओर चल दिए। रास्ते में रोईंग से लगभग 15 किमी की दूरी पर नदी पार करने पर अनोबोली इंजनों नामक गांव आता है। इस गांव के निवासी श्री सिरती लिंगी जी ने अपने फ़ार्म हाऊस में गणेश जी का मंदिर बना रखा है। 

इनकी चर्चा करना इसलिए आवश्यक है कि अरुणाचल में जिस तरह क्रिस्तानी विस्तार हो रहा है और गांव के गांव क्रिस्तानी हो गए उसके बीच सनातन धर्मी का मिलना नखलिस्तान में पानी की एक बूंद मिलने जैसा है। हम इनके संतरे फ़ार्म हाऊस में पहुंचे तब सिरती लिंगी जी पूजा पाठ में लगे थे। 
सिरती लिंगी गणपति भक्त 
अरुणाचल में सूर्योदय जल्दी हो जाता है तथा सूर्यास्त भी शाम चार बजे के लगभग। इसलिए यहां यात्रा जल्दी ही प्रारंभ करनी होती है। सिरती लिंगी जी के मंदिर में पहुंच कर गणपति भगवान के दर्शन किए और उन्होंने केले का प्रसाद दिया, तिलक किया और रक्षा सूत्र भी बांधा। 

चर्चा होने पर उन्होंने बताया कि इस फ़ार्म हाऊस को उन्होंने बेच दिया था। खरीदने वाले ने जब यहाँ खुदाई प्रारंभ की तो लगभग चार फ़ुट की गणेश प्रतिमा जमीन से बाहर निकली। जब इन्हें पता चला तो जिसे जमीन बेची थी उसे लौटाने की प्रार्थना की और दुगनी कीमत में जमीन वापस खरीदी। इसके पश्चात यहाँ मंदिर बनवाया।
उत्खनन में प्राप्त गणपति 
मंदिर बनाने के पश्चात लगभग पचीस वर्ष पूर्व सिरती लिंगी जी गणपति का पूजा विधान सीखने मुंबई गए। उन्हें पता चला था कि महाराष्ट्र में गणपति पूजा अधिक की जाती है। मुंबई जाकर वहाँ के पुजारियों से तीन महीने गणपति पूजा विधान सीखा और अध्यात्म की दीक्षा ली। इसके पश्चात यहाँ लौटकर विधि विधान से नित्य गणपति पूजा करते हैं।

सुबह चार बजे अपनी कार से फ़ार्म हाऊस पहुंचते हैं, मंदिर की धुलाई पोंछाई खुद ही करते हैं। इसके पश्चात मंत्रोच्चारण के साथ पूजा करते हैं तथा दिन भर मौन रहकर ध्यान साधना करते हैं। शाम की आरती एवं भोग लगाने के बाद चार बजे मंदिर बंद कर घर चले जाते हैं। पच्चीस वर्षों से यही इनकी नित्य की दिनचर्या है।
रक्षा सूत्र बांधते हुए सिरती लिंगी 
प्रतिमा शिल्प से उत्खनन में प्राप्त गणेश जी पन्द्रहवीं सोलहवीं शताब्दी की प्रतीत होती है। इन्होंने बताया कि जब उन्होंने मंदिर बनवाकर पूजा प्रारंभ की तो उनके रिश्तेदारों ने बहुत परेशान किया कि तुम हिन्दू हो गए हो, यह ठीक नहीं है। विभिन्न तरीकों से दबाव बनाने का प्रयास किया पर वे विचलित नहीं हुए और अपनी पूजा निरंतर जारी रखी। 

इनके मंदिर में स्थानीय लोग नहीं आते, बाहर से आने वाले लोग ढूंढ कर इस स्थान में पहुंचते हैं। सिरती लिंगी जी के परिवार ने मांस मंछली, प्याज लहसून आदि तामसिक पदार्थों का सेवन छोड़ दिया और कहते हैं कि इसका सेवन करने वालों से वे बात भी नहीं करते और दूर से ही नमस्ते कर लेते हैं। शाकाहार के विषय में कहते हैं कि शेर मांस खाता है तो उसकी उम्र 30 बरस होती है और हाथी शाकाहार करता है तो उसकी उम्र 100 बरस से अधिक होती है इसलिए शाकाहार में अधिक शक्ति है।
सिरती  लिंगी एवं लेखक 
सावन के महीने में माह भर ये मौन व्रत के साथ उपवास रखते हैं एवं शाम को सिर्फ़ फ़लादि का सेवन करते हैं। इनकी उम्र 70 वर्ष है और इनके दो बेटे इंजीनियर है, जो बाहर रहते हैं। गणपति भगवान ने इन्हें बहुत कुछ दिया, वरना ये बहुत गरीब थे। आज इनके पुत्रों का पचीस तीस लाख का पैकेज है और गणपति आराधना करते हुए समय व्यतीत हो रहा है। 

लौटते हुए जब हम इनसे पुन: मिलने आए तो संझा आरती पूजा की तैयारी कर रहे थे। मंदिर में ही इन्होंने स्वच्छ जल का कुंड बना रखा है। जिसमें गंगाजल डाला हुआ एवं उसी जल का प्रयोग पीने एवं भोजन बनाने में किया जाता है। हमें भी उसी कुंड का जल पिलाया और फ़िर पूजा की तैयारी करने लग गए। हमें भी अंधकार में एक उजाले की किरण दिखाई दी और प्रणाम कर आगे बढ़ गए।

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

आकाश में जन्म लेने वाला पक्षी खंजन

खंजन पक्षी को देखते ही अमृतलाल नागर की उपन्यास खंजन नयन याद आती है। जाड़े के दिनों का प्रारंभ होते ही यह पक्षी दिखाई देने लगता है। तुलसी दास जी किष्किंधा कांड में प्रकृति का वर्णन करते हुए इस पक्षी को नहीं भूलते और कहते हैं कि "रस रस सूख सरित सर पानी, ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥ जानि सरद रितु खंजन आए, पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥" 

हमारे पुरखों ने इसे नाम दिया खंजन क्योंकि शरद ॠतु प्रारंभ होते ही यह किसी सुनहली भोर को आकाश से अवतरित हुए होंगे एवं आकाश से अवतरित तब हुए होंगे जब इन्होंने आकाश में जन्म लिया होगा। आकाश में जन्म लेने के कारण इनका नाम धरा गया खंजन। 

खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निजपति कहेउ तिन्हहिं सियँ सयननि।। ग्रामीण स्त्रियाँ उनके साथ के दोनो पुरुषों के विषय में पूछती है तो वे भी खंजन नयन का जिक्र करते हुए बड़ा संकोचकर मृग के नयनों वाली सुंदर सीता कोयल जैसी प्रिय वाणी में कहती हैं - जो सहज स्वभाव के सुंदर और गोरे हें वे मेरे छोटे देवर लक्षमण हैं। 

फिर संकोच के कारण बड़े जतन से अपने मुंह को आंचल से छुपाकर अपने पति की ओर भंवे तिरछी करके इशारा करते हुए खंजन पक्षी की आंखों जैसे सुंदर नेत्रों को तिरछा करके कहा – ‘‘और यह मेरे पति हैं’।’

अरण्यकांड में सीता हरण के पश्चात् राम जब आश्रम लौटकर आते हैं और सीता को वहां नहीं पाते हैं तो सीता के विरह में पागल के समान पेड़-पौधों तक से सीता का पता पूछने लगते हैं और कहते हैं "खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।" 

खंजन पक्षी, शुक कपोत, कमल, आदि सभी सीता के चले जाने से बड़े प्रसन्न हैं क्योंकि सीता उनसे भी अधिक सुंदर हैं और सीता के सामने उनकी सुंदरता तुच्छ है। खंजन पक्षी के नयनों की सुंदरता एवं चंचल चपल होने के कारण इसे साहित्य में स्थान दिया गया है। 

तुलसी दास जी ने रामचरित के माध्यम से इसे अमर कर दिया। हिंदी में इसे धोबन भी कहा जाता है। पंजाब में इसे बालकटारा, बांग्ला में खंजन, आसाम में बालीमाटी और तिपोसी और मलयालम में वेल्ला वलकुलुक्की कहते हैं। 

शकुन अपशकुन विचार शास्त्र में खंजन पक्षी को स्थान दिया गया है, इसे प्रात: सूर्योदय के समय देखना अत्यंत शुभ एवं लाभकारी बताया गया है एवं सूर्यास्त के समय अशुभ। तो देखिए खंजन पक्षी को और जानिए इसके विषय में।

रविवार, 10 दिसंबर 2017

मनमोहक पहाड़ी गाँव चौपाल : हिमाचल

जून 2017  में जब हम अपनी बाईक यात्रा में उत्तराखंड एवं हिमाचल की पहाड़ियों में घूम रहे थे तो रात्रि विश्राम नेरवा में किया। सुबह नेरवा से आगे बढे तो सिर्फ़ चढाई ही चढाई थी। लगता था सड़क हमें बादलों के पार पहुंचाने के लिए कमर कसे हुए है। जब टॉप पर पहुंचे तो एक पहाड़ी गाँव चौपाल दिखाई दिया।  

चौपाल, शिमला से कुफ़री ठियोग होते हुए नेरवा से आगे 126 किमी पर हिमाचल प्रदेश का खूबसूरत स्थल है। यहाँ जून माह में जाना हुआ था। चारों तरफ़ हरियाली बिखरी हुई थी एवं ठंड भी थी। यह समुद्र तल से 2550 मीटर (8370 फ़ुट) की ऊंचाई पर है।

गर्मी के दिनों में जब शिमला, मनाली एवं अन्य स्थानों पर पर्यटकों की बाढ आई हुई थी तब यहाँ शांति एवं सुकून का वातावरण था। जून की चमकीली सुबह मनमोहक थी ऐसा लग रहा था कि दो चार दिन डेरा यहीं डाला जाए। पर समयाभाव एवं आगे की यात्रा तिथि निर्धारित होने के कारण संभव नहीं था। 

यहाँ पहुंच कर लगा कि जब अन्य पहाड़ी स्थलों पर जब भीड़ एवं मारामारी हो तो यहाँ तसल्ली से कुछ समय गुजारा जा सकता है। इस समय शिमला में पर्यटकों की भीड़ के कारण पार्किंग भी एक बड़ी समस्या बनी हुई थी। उस समय चौपाल कोलाहल से दूर शांत था। जबकि यह शिमला से 275 मीटर अधिक ऊंचाई पर है। 

यदि हम शिमला के नजदीक स्थित पर्यटन स्थलों जैसे कुफरी, फागू, नालदेहरा, चायल आदि से इस क्षेत्र की तुलना करें तो यहां पर्यटन की उन क्षेत्रों से ज्यादा संभावनाएं हैं। इस क्षेत्र में विद्यमान वन, जल, चोटियां घाटियां, नदी-नाले, झरने, किले, सांस्कृतिक धरोहर, मेले, त्योहार, मंदिर, रीति-रिवाज, पकवान आदि अनुपम हैं। 

बस अब गर्मी के दिनों का इंतजार है, जब चौपाल पहुंचकर कुछ दिन बिताना चाहुंगा और यहाँ कि प्राचीन संस्कृति, कला और धरोहरों से परिचित होना चाहुंगा। अन्य भीड़ भरे पर्यटक स्थलों से यह स्थान मुझे उत्तम लगा। अगर इस स्थान का आनंद लेना है तो कभी शिमला से आगे बढ़िए और प्रकृति की गोद में छिपेे इस अनुपम हीरे से परिचित होइए।

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

पूस का महिना और फ़ूस की छानी : अरुणाचल

पूस का महिना प्रारंभ हो चुका। पहाड़ी क्षेत्र की बर्फ़बारी होने लगी और बर्फ़ीली हवाएँ मैदानों की तरफ़ रुख करने लगी हैं। मने की ठंड जोरों पर शुरु हो गई है। गाँव में घर पक्के दिखाई देने लगे हैं, पर सभी नहीं। पक्के घर शीतल हवा को रोकने में सक्षम हैं। द्वार और रोशनदान बंद कर दो तो एक कंबल ठंड रोकने के लिए काफ़ी है। पर फ़ूस के घर में कथरी गोदरी और रजाई की जरुरत पड़ जाती है। 

घर बनाने के लिए जहाँ जो संसाधन उपलबध होता है उससे बना लिया जाता है। कहीं दीवारें मिट्टी की होती हैं और छत फ़ूस की तो कहीं दीवारें बांस की खपच्चियों की होती हैं और छत फ़ूस की। दीवारों के दोनो तरफ़ लिपाई चिकनी मिट्टी से करनी पड़ती है, जिससे कीड़ा कांटा और ठंडी गर्म हवा प्रवेश न करे। छानी के लिए डाला गया फ़ूस तीनों मौसम में साथ निभा देता है, पर दो चार बरस में उसकी देखभाल करनी पड़ती है।

अरुणाचल असम के तराई के इलाकों में बांस बहुत ही अच्छी गुणवत्ता के पाए जाते हैं, जो मोटे होते हैं और गांठे सीधी होती हैं, इनका प्रयोग लकड़ी के स्थान पर धड़ल्ले से होता है। मकान बनाने का तरीका भी सरल ही है। पहले बांस के पायों पर जमीन से चार पांच फ़ुट ऊपर प्लेटफ़ार्म बना लिया जाता है, फ़िर उस पर बांस के खंभे खड़े करके छत बांध ली जाती है। परछी जरा लम्बी होती है तथा छत की अधिक ढलान वर्षा रोकने के बनाई जाती है।

मकान के कई भाग होते हैं, जिनमें जलाऊ लड़की से लेकर मवेशियों के लिए स्थान होता है। परछी के बाद एक लम्बा हॉल और उसके पीछे एक छोटा कमरा एक परिवार के गुजर बसर के लिए मुफ़ीद होता है। मकान के नीचे खाली जगह में जलाऊ लकड़ियाँ और मवेशी स्थान पाते हैं और ऊपर मनुष्य रहते हैं। 

कपड़े रखने के लिए बांस की अरगनी होती हैं। जिसमें कपड़े टाँग दिए जाते हैं। हॉल में ही एक स्थान पर चूल्हे बना होता है जिस पर भोजन बनाकर सभी एक स्थान पर ही बैठकर भोजन करते हैं और चूल्हे के ऊपर धुंआ देकर संरक्षित करने के लिए मांस लटका दिया जाता है। चूल्हा मध्य में बना होने के कारण घर में ताप बना रहता है जिसे रोकने का काम फ़ूस की छत करती है। बांस का उपयोग अधिक होने के कारण कम खर्च में घर बनकर तैयार हो जाता है एवं बांस का भी उपयोग हो जाता है। 

हरियाली के बीच ये घर बहुत सुंदर दिखाई देते हैं। जंगली केले के गाछ हर जगह दिखाई देते हैं। हमने देखा कि इस समय केले में फ़ूल फ़ूट रहे थे जो केले फ़रने की प्रारंभिक अवस्था है। पथिक को अगर परदेश में ऐसी शरण स्थली मिल जाए तो किसी स्वर्ग से कम नहीं है। पूस के महीने में ठंड में सिर छिपाने के लिए फ़ूस की छत, खाने के लिए भात और तेंगामाछ, पीने के लिए ओपोंग और सुतने के लिए कोदो पैरा का गद्दा, ओढने के लिए कथरी तो सारे जहान की दौलत वारी जा सकती है। पर अरुणाचली #दाव से बचके। 😃

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

नवीन मित्रों की वैवाहिक वर्षगांठ पार्टी : सुंदरबन यात्रा

दिन भर की सुंदरबन सफ़ारी के बाद हमारा स्टीमर जेट्टी से आ लगा, आज विशेष दिन भी था। कोलकाता से आए हमारे नए साथी नबारुन दत्ता एवं श्री दत्ता की वैवाहिक वर्षगांठ भी थी, इन्होंने हम सभी को इस खुशी के अवसर पर सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया था कुछ स्नेक्स एवं बेवरीज का इंतजाम भी अपनी तरफ़ से शक्ति के अनुसार किया था। हमारा भी फ़र्ज बनता था कि हम किसी की खुशी में सम्मिलित हों।
नबारून और श्री टाइटैनिक पोज 
रिसोर्ट में पहुंचकर पार्टी सजाई गई, थ्री चीयर्स के साथ शुभकामनाएं की बौछार सभी मित्रों ने दोनों पर की। कुछ गाने गए और कुछ नृत्य का मजा लिया गया। इस तरह पार्टी में रौकन आ गई। इसे ही कहते है कि मनुष्य किसी भी स्थान पर किसी भी परिस्थिति में रहे वह आनन्द का अवसर ढूंढ ही लेता है। हमारे प्रवीण सिंह ने इस अवसर को खूब इनज्वाय किया। इस तरह सभी ने मिलकर इस जोड़े की सालगिरह को अविस्मरणीय बना दिया।
झारखाली  जेट्टी 
अगले दिन हमें लौटना था इसलिए रात्रि विश्राम हुआ,  सुबह उठकर आस पास का जायजा लिया गया। हमारी गारी कोलकाता से दोपहर तक आनी थी, इसलिए दोपहर के भोजन के उपरांत हम कोलकाता के लिए चल पड़े। अब हमें पुन; चार घन्टे का सफ़र तय करके गोड़खाली एवं कैनिंग होते हुए कोलकाता पहुंचना था। वहाँ हमारे ग्रुप घुमक्कड़ी दिल से के सुपर एडमिन किशन बाहेती जी प्रतीक्षा कर रहे थे।
झारखाली  की सुबह 
टैक्सी वाले हमको हावड़ा स्टेशन छोड़ दिया, हमारी ट्रेन रात को दस बजे थी, तब तक कोलकाता घूमने के लिए हमारे पास समय था। लेकिन सबसे बड़ी समस्या सामान रखकर खाली हाथ घूमने की थी। अनिल रावत किसी की शादी में सम्मिलित होने चले गए, मैं, राजु दास, ज्ञानेन्द्र पाण्डेय आदि किसन जी के साथ उबेर लेकर कोलकाता का चक्कर लगाने निकल पड़े। रास्ते में तय हुआ कि इतना अधिक समय नहीं है कि हम कुछ देख सकें।

स्ट्रीट फ़ूड का मजा किशन जी, राजू, ज्ञानेंद्र पाण्डेय 
मैने कहा कि आज कोलकाता के स्ट्रीट फ़ुड का आनंद लिया जाए, बस फ़िर क्या था, किशन जी हमको पार्क स्ट्रीट ले गए और वहाँ हमने झालमुड़ी से स्वाद लेना प्रारंभ किया, फ़िर पनीर रोल खाते हुए एक स्थान पर पकोड़ी और चीला खाने पहुंचे। यहाँ पहुंचने पर ज्ञानेन्द्र भाई ने अपना बैग ठेले वाले पास रख दिया और हम पकोड़ी खाने लगे। तभी मेरे घूमने से बैग उसकी गरम तेल की कहाड़ी से भिड़ गया और कड़ाही उलटने से सारा गरम तेल बैग पर गिर गया।
लस्सी सेवन - प्यार बांटते चलो 
इस दुर्घटना से मेरा दिमागी संतुलन क्षणिक बिगड़ गया, अगर वह गरम तेल किसी व्यक्ति पर गिर जाता तो बहुत बड़ी दुर्घटना घट सकती थी। बैग पर तेल गिरने से खाने का मन भी नहीं रहा। पहले बैग का तेल झाड़ा गया और एक बैग का निकाल कर उसे फ़ेका गया। यहाँ से चलकर लस्सी चाय पी और अंतिम में मटका कुल्फ़ी खाकर हम स्टेशन लौट आए। गाड़ी प्लेटफ़ार्म पर लग चुकी थी, जब गाड़ी चलने को हुई तो अनिल रावत भी दौड़ कर पहुंचे… गाड़ी चल पड़ी और हमारी सुंदरबन सफ़ारी सम्पन्न हो चुकी थी………

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

विशाल जलराशि के बीच स्टीमर में सफ़ारी : सुंदरबन यात्रा

स्टीमर में सवार होकर सुंदरबन के डेल्टा की अथाह जलराशि के बीच हम आगे बढ रहे थे, कैमरे अभी भी सजग ही थे, न जाने कब कहाँ और क्या मिल जाए, इसलिए फ़ोटोग्राफ़र को हमेशा सजग मोड में रहना पड़ता है सफ़ारी के दौरान। कभी तो ऐसा होता है कि जैसे ही पैकअप किया और वह जानवर सामने आ जाता है जिसके लिए हमने सफ़ारी की थी और कैमरा चालु करते तक वह आँखों से ओझल हो जाता है।
हमारे सुपर फोटोग्राफर प्राण चड्डा जी 
हम सुंदरबन बाघ देखने आए थे, परन्तु बाघ दिख नहीं था तो प्राकृतिक दृश्यों, चिड़ियों की फ़ोटोग्राफ़ी हो रही थी। संजेखाली वाच टावर से हम सुधन्याखाली वाच टावर पहुंचे। जैसे ही हम पहुँचे तो लगभग 200 फुट की दूरी पर काली चट्टान के जैसे कुछ दिख रहा था। मैंने तीन चित्र लिए। तीसरा चित्र लेने के बाद जब यह काली चट्टान उड़कर वृक्ष पर बैठ गयी तब समझ आया कि यह पक्षी है। 
Changeable hawk Eagle
यह काफ़ी Changeable hawk Eagle बड़ा पक्षी था, इसकी ऊंचाई लगभग ढाई फुट होगी और सामान्य ईगल से काफी बड़ा था। यह मान सकते हैं कि ईमू से थोड़ा छोटा होगा। फोटो लेते वक्त यह तालाब में स्नान कर रहा था। यह सद्यस्नात का चित्र है। खुशी कि बात यह है कि मेरे कैमरे में दुर्लभ पक्षी पकड़ में आया।

वन देवी 
इस द्वीप के निवासी बाघ एवं जंगली जानवरों से बचने के लिए वन देवी की पूजा करते हैं और फ़िर समुद्र में उतरते हैं। जिससे मन में कोई दुर्घटना घटने की आशंका नहीं रहती। इस वाच टावर में सुंदरबन में होने वाले कई तरह के पेड़ पौधों की प्रजातियों को प्रदर्शित किया गया है।
स्टीमर टाइगर 
यहाँ लोहे का बना टायगर नामक ब्रिटिशकालीन छोटा जहाज भी ग्राऊंड किया हुआ है। जो अपनी सेवा से निवृत्त होकर जंग खाते पड़ा है। एक अरसे के बाद जंग एवं खारा पानी इसे खत्म कर देगा। यहाँ कोई जानवर देखने नहीं मिला।
जंगली सूअर 
यहाँ से अगले टावर की ओर हम बढ़ गए, रास्ते में खाना खाया, जिसमें दाल भात, चोखा, चिंगरी माछ इत्यादि का सम्मिलित था। आगे बढते हुए एक स्थान पर जंगली सुअर दिखाई दिए, थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर चीतल भी। फ़िर आगे चलकर एक स्थान पर दलदल में बाघ के पद चिन्ह दिखे। जिससे लग रहा था कि बाघ जलराशि को लांघकर दूसरे जंगल की ओर गया है। चलो हम इतने से ही संतुष्ट हो गए कि बाघ नहीं तो बाघ के पद चिन्ह तो दिखे। 
वाच टावर 
आगे चलकर हमारा स्टीमर अंतिम पड़ाव दोबांकी कैम्प वाच टावर पहुंचा। यहाँ वाच टावर पर पहुंचने पर एक बड़ी गोह वृक्ष के नीचे धूप सेकते हुए दिखाई दी। सुंदरबन में गोह बड़ी संख्या हैं, हमें यह कई स्थानों पर दिखाई दी। ये गोह काफ़ी बड़ी थी। पूंछ से सिर तक की लम्बाई सात फ़ुट से अधिक रही होगी। इनका शरीर छिपकली के जैसा होता है, परन्तु उससे काफ़ी बड़ा होता है।
गोह 
गोह छिपकिलियों की निकट संबंधी हैं, जो अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, अरब और एशिया आदि देशों में फैले हुए हैं। ये छोटे बड़े सभी तरह के होेती है, जिनमें से कुछ की लंबाई तो 10 फुट तक पहुँच जाती है। रंग प्राय: भूरा रहता है, शरीर छोटे छोटे शल्कों से भरा रहता है। जबान साँप की तरह दुफंकी, पंजे मजबूत, दुम चपटी और शरीर गोल रहता है। इनमें कुछ अपना अधिक समय पानी में बिताते हैं और कुछ खुश्की पर, लेकिन वैसे सभी गोह खुश्की, पानी और पेड़ों पर रह लेते हैं। ये सब मांसाहारी जीव हैं, जो मांस मछलियों के अलावा कीड़े मकोड़े और अंडे खाते है।
गोह 
गोह पानी में रहती है। तराकी में दक्ष है यह, साथ में तेज धावक व वृक्ष पर चढने में माहिर होती है। पुराने समय में जो काम हाथी-घोडे नहीं कर पाते थे, उसे गोह आसानी से कर देती थी। इनकी कमर में रसा बाँधकर दीवार पर फेंक दिया जाता था और जब ये अपने पंजों से जमकर दीवार पकड लेती थी, तब सैनिक रस्सी के सहारे ऊपर चढ जाते थे। हमने गोह की फ़ोटो ली। तब तक सांझ ढलने लगी थी एवं जानवरों के जलस्रोतों की ओर लौटने का समय हो गया था।
चीतल हिरण 
वाच टावर से दिखने वाले टैंक पर एक नर चीतल का आगमन हुआ, सभी अपने कैमरे से फ़ोटो लेने लगे। मुझे पता था कि नर चीतल हालात का जायजा लेने आया है, सब कुछ सही मिलने पर दल के बाकी सदस्य भी पहुंचने वाले हैं। थोड़ी देर बाद मादा चीतल एवं उसके शावक भी पानी पीने के लिए पहुंचे, हमने जी भर के फ़ोटो खींचे। इसके बाद वापस स्टीमर में आ गए। सांझ हो रही थी सूरज ढल रहा था। हमारा स्टीमर वापसी की राह पर था।
लौटते हुए राजू दास मानिकपुरी 
एक स्थान पर खारे पानी का मगरमच्छ विश्राम करते दिखाई दिया। स्टीमर उसकी तरफ़ मोड़ कर ले जाया गया जिससे हम उसकी फ़ोटो ले सकें।  कुछ जंगली सुअर भी दलदल में विचरण करते दिखाई दिए। परपल हेरोन, ग्रेट इगरेट इत्यादि पक्षियों के साथ तोते भी उड़ान भर रहे थे। मछली मारने वाली, शहद बटोरने वाली नौकाएं भी लौट रही थी। सुंदरबन के जंगलों से स्थानीय निवासी प्रतिवर्ष लगभग 10 हजार टन शहद निकालते हैं। जब सूरज अस्ताचल की ओर जाता है, सारा जगत अपना काम खत्म करके विश्राम के मुड में होता है और हम भी अपनी जेट्टी की तरफ़ जा रहे थे। जारी है ..... आगे पढ़ें 

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

टीम चायना गेट मिशन सुंदरबन पर : सुंदरबन यात्रा

सुबह मेरे उठने से पहले ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, प्रवीण सिंह, प्राण चड्डा जी रिसोर्ट के आस पास फ़ोटो खींचने चले गए। गाँव वालों ने बताया कि चार दिन पहले बाघ उनके गाँव तक आ गया था। कभी कभी बाघ बफ़र जोन में भी आ जाते हैं इसलिए गांव से दूर सावधानी के साथ जाना चाहिए। वैसे दूर जाने के मनाही भी है।  
तीन पहिया जुगाड़ में जेट्टी की ओर 
सुबह हम तैयार होकर सफ़ारी के लिए तीनगोड़िया फ़टफ़टिया में बैठकर जेट्टी की ओर चल पड़े। जेट्टी पर हमारा स्टीमर प्रतीक्षा कर रहा था। यह दो मंजिला बड़ा स्टीमर था, जिसमें शौचालय के साथ भोजन बनाने की सुविधा भी थी। सोमनाथ दा ने हमारा भोजन जेट्टी पर चढवा दिया साथ ही आरो वाटर की बोतलें भी। इस गाँव का पानी खारा होने के कारण सभी लोग आरो वाटर का प्रयोग करते हैं।
टीम चायना गेट :)
हर हर महादेव के उद्घोष के साथ हमारी सुंदरबन यात्रा प्रारंभ हो गई। हमारे साथ नबारुन दत्ता एवं उनकी पत्नी भी इस सफ़ारी में शामिल हो गए। यहाँ पर हम विद्याधरी नदी से समुद्र की ओर बढ रहे थे। विद्याधरी नदी का पाट बहुत चौड़ा है, इसमें पहुंचने के बाद यही समुद्र सा अहसास करवाती है। 
टीम चायना गेट मिशन पर 
सभी ने बोट में अपना स्थान ग्रहण कर लिया और कैमरा लेकर मुस्तैद हो गए, अभी तो सफ़र शुरु ही हुआ था। परन्तु लग रहा था कि पानी में बहुत दूर आ गए और अभी ही हम लोगों को बाघ दिख जाएगा। जबकि बाघ का कोसों दूर कोई पता नहीं था। प्राण चड्डा जी ने गाईड को कहा कि अगर वो बाघ दिखाएगा तो उसे पाँच सौ रुपए देंगे।
कमांडर ऑफ़ टीम चायना गेट प्राण चड्डा जी 
अचानक प्राण चड्डा जी का मन बोट ड्राइव करने का हो गया और काकपिट से पायलेट को बाहर निकाल खुद ही बोट उड़ाने लगे। खैर हम तो अनुभवी हैं इसलिए कोई खास अंतर नहीं पड़ा परन्तु बोट का असली पायलेट सदमे में आ गया क्या पता फ्लाइट के दौरान पायलेट को बाहर निकाल प्लेन उड़ाने लग जाएं तो सवारियों का क्या होगा? भले ही हमें सफ़ारी बाघ दिखे या न दिखे, परन्तु प्राण चड्डा जी ने बोट चला कर बाघ देखने के इतना रोमांचित तो जरुर कर दिया। जब सफ़र में साथ जिन्दादिल हों तो उसका मजा ही कुछ और है। 
समंदर में स्टीमर 
हम देखते हैं कि डेल्टा क्षेत्र में कई द्वीपों को मिलाकर सुंदरबन का निर्माण प्रकृति ने किया है। मैनग्रोव के वृक्षों से भरे ये द्वीप बंगाल टाइगर की आदर्श शरणस्थली बने हुए हैं। पानी में तैरकर शिकार करने वाले ये बाघ आदमखोर कहे जाते हैं एवं मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर हमला करने में भी नहीं चूकते। बड़ा शिकार न मिलने पर ये बाघ मत्स्य आखेटकर भक्षण करने में भी सिद्ध हैं। 
मैंग्रोव जंगल 
सबसे पहले हम सजनेखाली वाच टावर में उतरे। यहाँ तारघेरा लगाकर कुछ मगरमच्छ एवं गोहों (मानिटर लिजार्ड) को रखा गया है। इसके साथ ही एक छोटी सी प्रदर्शनी सुंदरबन के विषय में लगाई गई है। जिससे आने वाले को सुंदरबन की सम्पूर्ण जानकारी मिल सके। 
सजने खली वाच टॉवर 
बंगाल हैडीक्राफ़्ट का छोटा सा विक्रय केन्द्र भी है। मुझे यहां बहुत बड़ी गोह दिखाई दी। इतनी बड़ी गोह मैने नहीं देखी भी। हम लोगों ने कुछ फ़ोटो लिए और फ़िर लौटने का समय हो गया। जेट्टी पर हमारा स्टीमर लग चुका था। स्टीमर में सवार होकर हम आगे बढ गए।
मॉनिटर लिजार्ड - गोह 
सुंदरबन सफ़ारी के दौरान दूर सुनसान किनारे पर दलदल में एक धब्बा सा दिखाई दिया। पहचान में नहीं आ रहा था कि वह मनुष्य है या जानवर। मैने कैमरा जूम करके एक चित्र लिया तब तक बोट आगे बढ गयी और वह धब्बा आँखों से ओझल हो गया। खींची गई फ़ोटो देखने पर पता चला कि वह धब्बा सा एक महिला है। जो उकड़ू बैठकर केकड़े फ़ंसा रही है। 
केकड़े पकड़ती महिला मौत की आहट से बेखबर 
जिस वन में आदमखोर बाघ रहते हैं और वे कब हमला कर दें इसका पता नहीं वहां जान पर खेलकर केकेड़े पकड़ना बहादुरी का नहीं विवशता का कार्य है। इस अंचल के निवासियों का मुख्य व्यवसाय मछली, झींगे, केकड़े आदि पकड़ कर एवं शहद निकालकर जीवन निर्वहन है। आसपास के गाँव के मछुवारे ज्वार भाटे एवं मौसम का ध्यान रखते हुए अपनी नाव लेकर मछली पकड़ने निकल जाते हैं एवं बाघ का शिकार बनते हैं।
 यह भी एक अंदाज है कातिलाना 
गत वर्ष ही कैनिंग के समीप दत्ता झील के किनारे केकड़े पकड़ रहे एक मांझी पर बाघ हमला करके उसे खींच कर जंगल में गायब हो गया। उसके मांझी के साथियों ने बाघ का पीछा किया, लेकिन वह मांझी को अपने जबड़ों में दबाए जंगल में कहीं गायब हो गया एवं उसका शव तक बरामद नहीं हुआ। आखिर पेट की भूख प्राणों पर भारी पड़ ही जाती है परन्तु यह विवशता है कि इनके पास इसके अतिरिक्त जीवन निर्वाह करने के लिए अन्य कोई कार्य भी नहीं है। 
बंगाल का बाघ 
वैज्ञानिकों का मानना है कि पानी में खारे पानी की अधिकता के कारण मैन्ग्रोव की सुंदरी प्रजाति नष्ट होते जा रही है, जिसके कारण हिरणों की संख्या भी कम होने की आशंका जताई जा रही है। जहाँ हिरण कम होंगे तो वहां बाघों के लिए भोजन की समस्या प्रारंभ हो जाएगा और बाघों पर वैसे ही शिकारियों का खतरा मंडराता रहा है.
टाइग्रेस इन एक्शन : श्री दत्ता 
अब यह नई समस्या भी जन्म लेने लगी हैं। मानव एवं बाघ दोनों का बसेरा है सुंदरबन में। दोनों को एक दूसरे के अस्तित्व स्वीकार कर अपना निर्वहन करना है। फ़िर व्यक्ति कितनी भी चतुराई कर ले, जंगली जानवर का शिकार बन ही जाता है। न मानव जंगल छोड़ सकता न बाघ।  जारी है, आगे  पढ़ें  

रविवार, 16 अप्रैल 2017

छत्तीसगढ़ रॉयल टायगर सुंदरबन में : सुंदरबन यात्रा

सुंदरबन एक मैन्ग्रोव का जंगल है, जहाँ के रॉयल बंगाल टायगर प्रसिद्ध हैं। इसका चालिस प्रतिशत भाग हिन्दुस्तान में एवं साठ प्रतिशत भाग बंगलादेश में है। कई वर्षों से सुंदरबन जाने की प्रबल इच्छा थी। पर संयोग वर्ष 2017 के जनवरी के माह के अंतिम सप्ताह में बना।

सुंदरबन के यात्री प्रवीण सिंह, ललित शर्मा, राजुदास, ज्ञानेन्द्रा पाण्डेय, निखिलेश, दिगेश्वर एवं अनिल रावत
इस तरह हम लोगों की टीम सुंदरबन तैयार हो गई, बलौदाबाजार से निखिलेश त्रिवेदी, प्रवीण सिंह, दिनेश ठाकुर, बिलासपुर से प्राण चड्डा, रायपुर से ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, अनिल रावत एवं कवर्धा से राजुदास मानिकपुरी सुंदरबन जाने के लिए तैयार हुए। लिस्ट में कुछ नाम और भी थे परन्तु आकस्मिक कार्यों के कारण वे नहीं जा सके।

विद्यासागर सेतु हावड़ा की सुबह
छब्बीस जनवरी को हम लोग ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस से हावड़ा के लिए रवाना हुए। अगली सुबह हावड़ा में हमारे टूर आपरेटर तैयार सुमंत बसु सारी तैयारियों के साथ मौजूद थे। हम हावड़ा से सात बजे सुंदरबन के लिए चल पड़े। हमारा पहला पड़ाव कनिंग था। इसके बाद हम सुंदरबन के ग्राम झाड़खाली पहुंचे।

प्राण चड्डा जी सुन्दरबन में
यहाँ सोमनाथ दा के होम स्टे रिसोर्ट में हमारा ठहराव था। झाड़खाली वैसे तो छोटी जगह है, परन्तु यहाँ से सुंदरबन के लिए बोट मिलती हैं और जेट्टी भी है। यहाँ से सुंदरबन की सफ़ारी कराई जाती है। दोपहर एक बजे हम नहा धोकर तैयार हुए और भोजन के पश्चात आराम करके झाड़खाली के चिड़ियाघर देखने गए। 
ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, कुछ खरीदा जाए
झाड़खाली में एक चिड़ियाघर बनाया गया है, जिसमें दो रायल बंगला टायगर को रखा गया है। जाली में बंद टायगर की फ़ोटो खींचने में बड़ी तकलीफ़ होती है। दो जालियों के बीच फ़ोकस करके फ़ोटो लेना बहुत ही कठिन काम है। 
अनिल रावत एवं राजुदास मानिकपुरी
जू में बनाई गई नहर में कुछ मगरमच्छ भी छोड़े हुए हैं। हमने इन सबकी फ़ोटोग्राफ़ी की और फ़िर जेट्टी तक घूमने गए। जेट्टी पर कुछ फ़ोटो खींच कर लौट आए। इस दिन हमारे साथ कोलकाता से आया हुआ एक जोड़ा नबारुन दत्ता एवं श्रीदत्ता भी ठहरे हुए थे। दोनो स्वभाव से मिलनसार लगे। इन्होने हम लोगों से दोस्ती गांठ ली।
झाड़खाली जू का मगरमच्छ
रात को हमारे लिए बाऊल नृत्य गान का आयोजन किया गया था। हमने रात को बाऊल नृत्य गान का आनंद लिया। बाऊल नृत्यगान वैष्णव पंथी कृष्ण भक्ति पर आधारित है। धीमे साज पर एकतारा के साथ गाया जाता है तो ऐसा लगता है कि गायक एकदम डूब कर गा रहा है। 
रायल बंगाल टायगर पिंजरे में
सोमनाथ दा ने भोजन में सभी तरह की तैयारी कर रखी थी। जिसमें सामिष एवं निरामिष दोनो भोजन था। होम स्टे में एक फ़ायदा यह होता है कि घरेलू भोजन कराया जाता है, जिसमें नमक, मिर्च एवं तेल की मात्रा सही होती है। अधिक तेल और ग्रेवी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही हैं। 
तन्मयता से फ़ोटोग्राफ़ी दिनेश ठाकुर
सुंदरबन के आसपास के गाँव के कुछ लोग पर्यटन व्यवसाय से भी जुड़ गये हैं, जिससे कुछ आमदनी हो जाती है अन्यथा मांझी की नाव समुद्र के ज्वार भाटा का आंकलन कर सुरक्षित समय में खाना पानी लेकर मछली मारने निकल जाती है। इनकी नाव में खाना बनाने के लिए चूल्हा भी होता है। जाल डालने के बाद चूल्हे पर माछ भात तैयार कर लेते हैं और दो-चार दिन मछली मारने के लिए दूर तक निकल जाते हैं।
मांझी की नाव एव किनारा
इसे हैरिटेज साइट घोषित करने के कारण बफ़र जोन में भी पक्की छत का मकान बनाना वर्जित है। अधिकांश घरों में फ़ूस के छप्पर दिखाई देते हैं। बांस की खप्पचियों की दीवार बनाकर उसकी दोनो तरफ़ से मिट्टी की छबाई कर दी जाती है एवं फ़ूस की छत की ढलान अधिक होती है जिससे उसमें पानी नहीं ठहरता। मार्च के अंतिम सप्ताह से यहाँ गर्मी प्रारंभ हो जाती है। जो जुलाई अगस्त तक जारी रहती है। ऐसे समय में फ़ूस की छत एवं मिट्टी की दीवारें वाताकूलन का कार्य करती हैं।
सुंदरबन के साथी नबोरुन दत्ता, श्री दत्ता एवं राजुदास मानिकपुरी
घर के भीतर खाना बनाने के लिए चुल्हा, पकाने के चार बर्तनों के साथ चार-छ: बर्तन, बांस का मचान जैसा सोने का जुगाड़ एक नाव एवं मछली पकड़ने का जाल, यही इनकी कुल पूंजी है। फ़ारेस्ट एक्ट प्रभावी होने के कारण यहाँ बिजली नहीं है, बिजली की पूर्ति के लिए यहाँ सौर्य उर्जा का सहारा लिया जाता है। जिससे एक सीएफ़एल जला लेते हैं एवं मोबाईल इत्यादि चार्ज कर लिया जाता है। घरों के आस पास छोटे छोटे तालाब हैं, जिनमें बरसात का मीठा पानी जमा किया जाता है और उनमें मछली पालन किया जाता है। साथ निस्तारी के लिए इस जल का उपयोग किया जाता है। 
रात्रिकालीन आयोजन बाऊल नृत्यगान सभा
पशुओं की संख्या कम ही है, इसलिए गांव में दूध उपलब्ध नहीं हो पाता। बकरियों के अधिक यहाँ कुत्तों की संख्या दिखाई दी। इसको पालने का कारण भी यह है कि हिंसक जानवरों के गाँव की ओर आने की चेतावनी कुत्ते पहले ही दे देते हैं। जिससे ग्रामीण अपने जान माल की सुरक्षा का प्रबंध कर लेते हैं। नहीं तो क्या पता, सुंदरबन के छुट्टे आदमखोर बाघ कब किसका लिल्लाह पढवा दें और बॉडी भी न मिले। बाऊल नृत्य के पश्चत हम भोजन करके सोने चले गए। अगले दिन सुबह नौ बजे से हमें सफ़ारी पर जाना था। जारी है … आगे पढें…

नोट: यह यात्रा 26 जनवरी 2017 से 30 जनवरी 2017 के बीच की गई।