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शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

देशी एंटी वायरस (व्यंग्य)

का बताएं भैया! हम तो ठेठ गंवईहा ठहरे. कछु कहत हैं तो लोग मजाक समझत हैं. अरे भाई हमको मजाक आती ही नहीं है. लेकिन जो बात दिल से कह देत हैं (बिना दिमाग लगाये) वो मजाक बन जात है ससुरी. अगर हम बात दिमाग लगा के करत हैं तो लोगन का रोवे का परत है, का बताएं बड़ी समस्या हो गई है. अभी हम देखत रहे समस्या चहुँ ओर ठाडी है. टरने को नांव ही नहीं लेत है. लेकिन हम ठहरे गंवईहा बिना समस्या टारे हम ना टरे.

अब देखिये ना कितना शोर मचा रहता है कि कम्पूटर मा  कोई जिनावर घुस गवा है. जिसके कम्पूटर मा घुस जात है उसको कम्पूटर ठाड़ हो जात है, बिगाड़ हो जात है. कच्छू करई नई देत है. हम एक भैया से पूछे भैया ये कौन सा जिनावर है जो कम्पूटर को और तुमाये को भी हलाकान कर डारे है? तो उन्होंने बताये के वायरस होत है. एक तरह को कीट है. तो हमने पूछो "कम्पूटर में कीट को काय काम है?" तो बोले जब इंटरनेट चलत है तो जो दुश्मन बैरी होय ना, वो अपनों जासूस भेज देत है हलाकान करबे के लिए. ये कीट भी दो तरह के होत हैं, एक है मित्र कीट दुसर है दुश्मन कीट, फेर दुश्मन कीट के हटाने के लाने मित्र कीट को बुलाओ फेर दुनो में लड़ाई होत है और मित्र कीट दुश्मन कीट को खा के ख़तम कर देत है. बस इत्ती सी बात है. अब वा के लिए तो इत्ती सी बात है और हमारे जैसे देहाती गंवईहन के लिए इत्ती सारी बात है. हमारे तो भेजे में ही नहीं घुसी. चलो भलो हुवो भेजे मे नहीं घुसी, नहीं तो माथ अलग पिराई और डाक्टर की भेट पूजा अलग होती.

अब जो हमारे मित्र रहे कम्पूटर वारे, वो बड़े बुलागर रहे. कम्पूटर मा लिखत रहे, लिख लिख के बहुत बड़े लेखक बन गए. बड़ो नांव हो गयो वा को. हमने एक दिन पूछो बताओ तो भैया का लिखत हो? हमको तो कछु पतों चले. तो भईया उनने कम्पूटर खोल के दिखायो और वो बांचन लागे हम मूड हिला -हिला के सुनत रहे. एक जगह लिखे रहे,  हमकू चड्डी खरीदना है. पुरानी वाली फट गई है, वो हरे नीले पट्टे वाले कपडे की बनी थी अब वो कपड़ा नहीं मिल रहा है. हम बहुत ढूंढ़ डारे, हमारे सारे आस-पास के मित्र भी ढूंढ़ डारे, उनको भी नहीं मिल रही है. हम आपसे गुजारिश कर रहे है.कि कोई हमें बता दे कि ये चड्डी को पट्टा वाला कपडा कहाँ मिलेगो. तो बताने वारे को हम बहुत बहुत धन्यवाद देंगे. हम ये चड्डी का कपड़ा इसलिए ढूंढ़ रहे हैं कि इसको धारण करने के बाद स्वर्गिक आनंद आत है. मिल जाये तो आप भी इस्तेमाल करके देखें.

एक जगह वो लिखे रहे हमारी भैंसिया गुम गई है. तालाब में गई थी नहाने. चरवाहों वही भूल गवो, कल से नहीं आई है. हम गांव में बहुत ढूंढ़ लिए, नहीं मिल रही है. भैंसिया जाने के गम में हमारी अम्मा ने रात को दूध नहीं पियो है. उनको बड़ा सदमा लगो है, सुबह-सुबह गश खा के गिर पड़ी. इधर हमारी बीवी भी परेशान किये दे रही है. उनके मईके से दो सारे आये हुए है. गांव में  पहलवानी करते हैं. उनको दूध की जरुरत है. जब से ये आये है इनको देख के भैंसिया फरार हो गई है. अब ये सारे हमारे महीने भर की तनखा को दूध तीन दिन में पी जावेगे. मोल को दूध बहुतै मंहगो परत है. ये सारेन को देख के हमरो तो बी पी बढ़ जात है. 

श्रीमती कह रही है के दूध लेके आओ हमारे भैया लोगों के लिए, नहीं तो हम मईके जात हैं और भईया लोगो दूध नहीं मिलत है तो ये बौरा जात है कहत रहे की दूध नहीं मिलो तो जीजी! आज जीजाजी को राम-नाम-सत् समझो. तुम्हारे लिए नयो जीजा ढूंढ़ देंगे. अब बताओ भैया हम फँस गए है. एक तरफ कुंवा दूसरी तरफ खाई, और ये खाई भी हमने एक होंडा के चक्कर में खुदाई. तो भईया बाकी बात तो मैं बाद में भी लिख देगें. अभी हमारी भैंसिया को पता बताय दो. आपकी मेहरबानी होगी. मुर्रा नसल की भैंस है टेम्पलेट का रंग काला है. अगल बगल में विजेट लगे हैं. दो कान, दो सींग एक मुहं, दो आंख, चार पैर, एक पूंछ है और एक निशानी है उसके पहचान की, वो जहाँ कही भी जात है, दांत निपोर के पगुरावत रहत है. 

हमने भी कहा क्या बढ़िया लिखते हैं मान गए भैया. आप तो हमारे शहर की नाक है. अब हमें भी कुछ लिखना सीखा दीजिये ना कंप्यूटर में. देखिये अभी एक सुन्दर गजल उतर रही है. लिख तो देंगे लेकिन छापेंगे कहाँ? इस लिए हमें भी ये बुलागरी सीखा दीजिये. 

अब उनसे गुरु मन्त्र पा के नर्मदा मैईया को नांव ले के बुलागरी चालू कर दी. अब जैसे ही हमने दो चार गजल लिखी हमारे कम्पूटर पे भी दुश्मन कीट को हमला हो गवो. हमने इंजिनीयर बुलावो तो उसने बताया कि इन दुश्मन कीटों को मारने के लिए एक हजार को खर्च है  मित्र कीट की फ़ौज बुलानी पड़ेगी. हम तो डर गए थे. दे दिये हजार रूपये, भईया वो इंजिनीयर हजार रूपये की सीडी लाया और हमारे कम्पूटर में लगा के बोलो "अब ठीक हो गया है कोई समस्या नहीं है." कुछ दिन भईया बढ़िया चलो कम्पूटर, फेर एक दिन ठाड़ हो गवो. चल के नहीं दे. हमने सोचा इंजिनियर बुलाएँगे, वो फेर हजार रूपये ले जायेगा. मित्र कीट डाले हैं करके मूरख बना के चले जायेगो. 

तो हमने भी जुगत लगाईं और इसकी देशी दवाई करबे की सोची. भाई जब अंगरेजी दवाई काम नहीं करत है तो देशी दवाई बहुत फायदा करत है. बस रोग पकड़ में आ जाये. हमारे घर में लकड़ी के चक्का वारी बैल गाड़ी है. वा में जब चक्का जाम हो जाय, तब कालू राम काला वाला मोबिल आईल पॉँच रूपये का डालते रहे हैं. गाड़ी भी बढ़िया चलत है और बैलान को भी आराम है. वो भी दुआ दे रहे हैं. तो हमने ठान लिया देशी इलाज करना है कम्पूटर का. पाँच रूपये का तेल मंगाए और डाल दिये कम्पूटर में. 

बस फिर क्या था? तब से हमारा कम्पूटर शानदार चल रहा है. अब बता देते हैं का चमत्कार हुआ? जैसे ही हमने काला मोबिल आईल डाला, सारे दुश्मन कीट (वायरस) का मुंह काला हो गया. अब उनको डर हो गया. अगर बाहर निकले तो पहचाने जायेंगे, काला मुंह लेके कहाँ जायेंगे? जो देखेगा वो दुत्कारेगा. और बिरादरी वाले भी बोलेंगे.  कहाँ काला मुंह करवा के आये हो? इसलिए उस दिन से वो हमारे कम्पूटर में दुबके बैठे है. बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर रहे और हम मजे से बुलागरी कर रहे हैं. अगर आपको भी कम्पूटर में कोई वायरस की समस्या हो तो देशी ईलाज करके देखो. हमने किया है और उसका भरपूर लाभ उठा रहे है. बुजुर्ग कहत रहे "फायदे की चीज हो तो सबको बताओ और घाटे की है तो हजम कर जाओ, इसलिए ये बात हम बुजुर्गों का सम्मान करते हुए कह रहे हैं. भईया हम तो गंवई ठहरे…………।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

नए साल का धमाल-जूतम पैजार बवाल ………… ललित शर्मा

चौपाल में डीजे लगाकर नया साल मनाने के लिए मोहल्ले के नवयूवक मनहरण, लीलू, चंदू, डॉक्टर, तहसीलदार, थानेदार, कोरकु, फ़ागु इत्यादि तैयारियों में जुटे हैं। (डॉक्टर, तहसीलदार, थानेदार नाम है इनके। कहीं पेशे से न समझ लेना। गाँव में जो नाम अच्छा लगता है वह रख लिया जाता है।) आपस में मिलकर चंदा किया और खाने पीने के साथ नाच-गान का पिरोगराम भी बनाया। शाम होते ही डीजे बजा कर नाच गान का रेसल शुरु हो गया। कोलावरी कोलावरी डी, मार धमा धम धमाचौकड़ी शुरु हूई। लखन काका, रमलु लोहार, चमरु यादव समेत के गाँव के मनमौजी बुजुर्ग भी मौज ले रहे थे। चमरु कका ने महुआ ढकेल रखा था। कोलाबारी ने उन्हे भी खींच लिया, धोती को उपर टांग कर वे भी शुरु हो गए छोकरों के साथ। आहो बेंदरा के मारे नइ बांचय कोलाबारी रे। उधर मद्रासी गाना और इधर चमरु कका का ठेठ देशी गाना चल रहा था। दोनों गानों का फ़्युजन हो गया और फ़्युज उड़ गया। छोकरों ने चमरु कका मना किया। अंग्रेजी में देशी मत मिलाओ रिएक्शन हो जाएगा। पर चमरु कका तो चमरु कका ठहरे।

तहसीलदार ने तमक कर चमरु कका को डीजे मंच से उतार दिया। छोकरे की धृष्टता बुढउवों को नागवार गुजरी। परबतिया भौजी भी तमाशा देख रही थी, यह किसी को हंसते-खिलखिलाते मौज करते नहीं देख सकती। उसने लखन कका का कान फ़ूंक दिया और घर की तरफ़ खिसक ली। अब लखना कका और रमलु लोहार भी चढ गए डीजे पर। डीजे वाले को निर्देश देने लगे - गाना लगा तो रे, रोंगोबोती रोंगोबोती कोनो कोरोता। डीजे बजा रहे फ़ागु ने मना कर दिया बोला - ये पुराना गाना नही है उसके पास। दुबारा फ़रमाईश हुई - त लगा पान वाला बाबू रे। अब पान वाला बाबू गीत बजने लगा। चमरु कका फ़िर डीजे पर कूद फ़ांद करने लगे। दो चार डोकरे जो टुन्न होकर बैठे थे वे भी आ लिए डांस-डांस पिरोगराम में। कहते हैं बंदर कितना भी बूढा हो जाए गुंलाटी मारना नही छोड़ता, साथ ही किसी जवान स्त्री का कान फ़ूंका डोकरा और भी खतरनाक हो जाता है। पुरानी रगों में दौड़ता महुआ कुछ अधिक ही काम कर गया। इन बुढउवों से छोकरे हलकान हो गए। चंदा देने के तो 5 रुपए इनसे निकलते नहीं। डीजे का मजा मुफ़्त में ले रहे हैं।

डॉक्टर का मुड खराब हो गया, वह बहुत देर से बुढउवों का तमाशा देख रहा था उसे सहन नहीं हुआ। बंद करो डीजे, बंद करो। इसमें डोकरों का पैसा नही लगा है। खर्चा हम करें और मुफ़्त में मजा लेने के लिए आ गए। चमरु कका ने डीजे बंद होते ही उन्हे गरियाना शुरु कर दिया। …… साले क्या समझते अपने को, तुम्हारा डीजे बंद करवा दुंगा। भिखारी समझते हो क्या मुझे, ऐसे हजार डीजे खरीद कर बजवा सकता हूँ। डीजे वाले की तरफ़ मुखातिब होकर कहा - बोल कितने का है तेरा डीजे, अभी खरीदता हूँ। रंग में भंग होते देख कर छोकरों के क्रोध की सीमा नहीं रही। उन्होने चमरु कका के अन्य बुढउ संगवारियों को डीजे से नीचे ढकेल दिया। इस धक्का मुक्की में लखन काका की धोती खुल गई और वह गिर पड़ा। किवाड़ की ओट से बस इसी समय का इंतजार परबतिया भौजी कर रही थी। जिस तरह ब्लॉग जगत में कुछ घटने के बाद फ़टाफ़ट मेल चल जाती है कमेंट प्रहार का निमंत्रण देने के लिए ठीक उसी तरह फ़ीमेल भी चल पड़ी गाँव में फ़साद करवाने के लिए।

अरे बरातु, ओ बरातु, फ़िरतु कहाँ हो रे तुम लोग। वहाँ तुम्हारे बाप को छोकरे लोगों ने मार डाला, पटक-पटक कर गरुवा जैसे धुन रहे हैं। जल्दी चल रे रोगहा, उसकी जान चली जाएगी। बस फ़िर क्या था चमरु कका टोला के सभी लोग, जिन्हे जो भी लाठी, डंडा, बेलन, चिमटा, टंगिया फ़रसा जो भी मिला, लेकर कार्यक्रम स्थल की ओर दौड़ पड़े। हो हल्ला सुनकर लड़के भी सतर्क हो गए। उन्होने भी अपने हथियार संभाल लिए और परबतिया भौजी की किरपा से नव वर्ष का कार्यक्रम स्थल कुरुक्षेत्र बन गया। जो जिसे पा रहा था, उसे ही पीट रहा था। भीषण युद्ध प्रारंभ हो गया, किसी का सिर फ़ूटा तो किसी की टांग टूटी, मार-पीट गाली गलौज सुनकर गाँव के अन्य लोग भी उठ गए। उन्होने बीच बचाव कर लड़ाई खत्म कराई। परबतिया भौजी कोने में खड़े होकर मन ही मन मुदित थी। वह जो चाहती थी वह हो गया।

सुबह होने पर ग्राम प्रंचायत की बैठक हुई, पंचपरमेश्वर रात की घटना पर सलाह मशविरा करना चाहते थे, गाँव में पहले कभी इस तरह की घटना नहीं हुई थी जिससे आपसी सद्भाव समाप्त हो जाए। सरपंच ने लड़कों से पूरा ब्यौरा लिया। उन्होने बताया कि हमारा कोई इरादा नहीं था। मार पीट करने का, चमरु कका लोग पीने के बाद जान बूझ कर मस्ती कर रहे थे। हमने उन्हे डीजे से नीचे उतारा बस था। कहीं हमने मार पीट धक्का मुक्की नहीं की इनके साथ। चमरु ने भी इस बात की हामी भर ली और दारु पीकर नाचने की अपनी गलती स्वीकार ली। सरपंच ने पूछा - फ़िर मारपीट का कारण क्या था? सभी ने कहा कि हमें नहीं मालूम। बरातू ने बताया कि परबतिया भौजी ही आकर हल्ला मचा कर गयी थी कि तुम्हारे बाप को गरुवा जैसे पटक-पटक मार रहे हैं। अब कैसे सहन होगा? कोई हमारे बाप को मारे और हम खड़े-खड़े देखते रहें।  जोश में आकर हम भी लड़कों पर पिल पड़े।

परबतिया भौजी कहाँ है? सरपंच ने पूछा। परबतिया तो ढूंढने लगे तो वह गायब मिली ठीक उसी तरह जैसे मंथरा गायब हो गई थी। राम को वनवास दिलाने के लिए कैकयी का कान भर कर। ह्म्म! यह आग उस परबतिया की लगाई हुई है। हम अपने कान को न टटोल कर कौंवी के पीछे भागते रहे। उसक दुष्परिणाम भी देख लिया। मनहरण बोला  - परबतिया भौजी का काम यही है। जब देखो तब किसी न किसी की चुगली करके लड़वाते रहती है और अपना उल्लू सीधा करती है। आगे से सभी उसका ध्यान रखना और उसकी बातों के झांसे में न आना वरना किसी की जान भी हरण करवा सकती। नए साल पर सब सकंल्प लो कि कभी आपस में नहीं लड़ेगें और सद्भाव से त्यौहार मनाएगें। डीजे का किराया सरपंच ने देने की घोषणा की और नव वर्ष धूम धाम से मनाया जाएगा। गिले शिकवे दूर कर महफ़िल खूब सजी। परबतिया भौजी की कलई खुल चुकी थी। वह किवाड़ के पीछे छिपकर रंग रंगीला कार्यक्रम देख कर किसी नयी खुराफ़ात की उधेड़ बुन में लगी थी।