शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

धूर्त लोगों की चाल‍-विज्ञापनों का जंजाल ................. ललित शर्मा

जो दिखता है वह बिकता है, पुरानी कहावत है। कहावतें कभी व्यर्थ नहीं होती, अनुभव और तजुर्बों का निचोड़ होती है। हम बाज़ार जाते हैं तो दुकानों के सामने कुछ सैम्पल लटके या रखे दिख जायेगें, जिसे वर्तमान में डिस्प्ले का नाम दिया गया है। डिस्प्ले करना ही प्रथमत: अपनी वस्तु की बिक्री के लिए विज्ञापन करना है। विज्ञापन करने के लिए विभिन्न माध्यमों का सहारा लिया जाता है। जब कस्बे में टूरिंग टाकिज की कम्पनी आती थी तो सजधज कर कम्पनी का कर्मचारी अमीन सयानी की आवाज में फिल्म का धुंवाधार प्रचार करता था और भी इस अंदाज में कि दूर-दूर तक गाँव के फिल्मों के शौक़ीन खिंचे आते थे। चार आना, आठ आना की टिकिट लेकर फिल्म का भरपूर आनंद उठाते थे। इसी तरह का विज्ञापन थियेटर, सर्कस, ड्रामा, नौटंकी, लीलाओं आदि का होता था। विज्ञापन के तौर पर बांटे गए पर्चों को लोग संभाल कर रखते थे। सर्कस आता था तो खेल शुरू होने से एक घंटे पहले से उसकी सर्च लाइट जल जाती थी। इस लाइट के जलते ही आस-पास के 20-25 गाँवों के लोगों को पता चल जाता था कि सर्कस चालू होने वाला है, खा पी कर चला जाए। 

समय के साथ विज्ञापन के माध्यम बदले, टीवी, फिल्मो के टेलर, वीडियो, पत्र-पत्रिकाएँ, वाल रायटिंग, होर्डिंग्स, वस्तु मुफ्त देने का वादा, एक के साथ एक फ्री, दो फ्री और भी बहुत कुछ फ्री। बदलने को बहुत कुछ बदला, नहीं बदला तो वाचिक प्रचार (माउथ पब्लिसिटी) का तरीका नहीं बदला। आज भी हम किसी के मुंह से किसी चीज की बड़ाई सुन कर खरीद लाते हैं। भले ही वह वस्तु घटिया ही क्यों न हो। खरीदने के बाद चाहे गले की हड्डी क्यों न बन जाए। वाचिक प्रचार करने वाले बहुत दूर के नहीं होते, अपने करीबी यार, दोस्त, रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी ही होते हैं। जिनकी बातों पर हम सहज ही विश्वास कर लेते हैं। अविश्वास करने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसके साथ एक सोच यह भी रहती है कि "चलो यार अपने ही करीबी ने कहा है, अगर कुछ नुकसान भी हो गया तो सहन कर लेंगे।

वाचिक प्रचार प्रसार सबसे अधिक तन्त्र-मन्त्र एवं असाध्य रोगों की चिकित्सा का होता है। मुफ्त की राय देने वालों को आपकी कोई घरेलु या स्वास्थ्य की समस्या बस दिखाई या सुनाई देनी चाहिए। वे फटाफट आपको पचीसों नुस्खे और इलाज करने वालों के नाम बता देंगे। कैंसर, पीलिया, दमा, एड्स, क्षय रोग, गुप्त रोग, नपुंसकता, बाँझपन, लड़का होना इत्यादि के इलाज के लिए गाँव-गाँव में नीम हकीम बैठे हैं। जबकि इन असाध्य रोगों की चिकित्सा आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं के पास नहीं है। वे असाध्य रोगों की चिकित्सा का दावा खुले आम करते हैं। साथ ही यह प्रचार होता है कि ये शर्तिया इलाज करते हैं। इनके इलाज से मरीज को कोई फर्क नहीं पड़े,  इनकी भेंट दक्षिणा करते करते स्वर्ग सिधार जाये, घर वाले भले ही कंगाल हो जाएँ, परन्तु इनके चेलों का विश्वास कभी नहीं डिगता। वे और ग्राहक पकड़ लाते हैं। बाबाओं में धंधे भी इसी तरह वाचिक प्रचार के आधार पर चलते हैं। अब कुछ हाई टेक बाबा टीवी पर प्रचार करके माला-मोती रुद्राक्ष बेच लेते हैं।
 
विज्ञापन का सकारात्मक पहलू यह है कि बाजार में उपलब्ध वस्तुओं की जानकारी मिल जाती है। बस उनकी गुणवत्ता को परखने की जिम्मेदारी खरीददार की होती है, सावधानी हटी दुर्घटना घटी। दुकानदार का कुछ नहीं बिगड़ना, कटना तो खरबूजे को ही है। पहले अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं में VPP से रेडियो, कैमरा, टेपरिकार्डर, धमाके करने वाली पिस्तौल, आत्मरक्षा करने के उपकरणों के विज्ञापन खूब छपते थे। ऑर्डर देने पर VPP से भेजे जाते थे, पोस्ट आफिस से छुड़ाने पर सिर्फ खोखा ही मिलता था या दो चार बार इस्तेमाल करने के बाद कूड़े के हवाले किया जाता था। ठग अपना उल्लू सीधा कर लेते थे। वर्तमान में यह तरीका थोडा हाई टेक हो गया है। नेट के जरिए ठगी के मामले प्रकाश में आते हैं, लाखों करोड़ों की लाटरी के चक्कर में लोग अपनी जमा पूंजी भी गँवा बैठते है।  बाद में लुटे-पिटे छाती पीटते मिल जाते हैं।

पहले वैवाहिक विज्ञापन नहीं छपते थे, लोग सगे सम्बन्धियों के माध्यम से ही वर-वधु की तलाश करते थे। आवागमन के साधनों एवं फोन इंटरनेट ने दूरियों को नजदीकियों में बदल दिया। रविवारीय अख़बारों के तो दो-तीन पृष्ठ वैवाहिक विज्ञापनों से भरे रहते हैं। विज्ञापन के लिए अख़बार आज भी उपयुक्त साधन हैं, इनकी पहुच गाँव गाँव तक है। इनमे छपे कुछ विज्ञापन तो बहुत ही मजेदार होते हैं। कुछ अख़बारों में देखा कि अपने काम  के प्रभाव को लेकर ज्योतिषियों और तांत्रिकों के बीच प्रतियोगिता जारी है। बानगी देखिए ... फ्री सेवा, फ्री समाधान 15 मिनटों में, स्पेस्लिस्ट- मनचाहा वशीकरण, लव मैरिज, प्यार में धोखा, सौतन-दुश्मन से छुटकारा, मुठकरणी, गडाधन। नोट- मनचाही स्त्री-पुरुष प्राप्त करवाने की 100% गारंटी। साथ ही यह भी दावा है कि - मुझसे पहले काम करने वाले को 25 लाख का इनाम। (नाम-पता कुछ नहीं लिखा है सिर्फ मोबाईल नंबर छपा है।

अगला विज्ञापन है A 2 Z समस्या का समाधान। 17 वर्षों से स्थायी पता, पति-पत्नी में अनबन, मनचाहा वशीकरण, प्यार एवं विवाह, सौतन-दुश्मन से छुटकारा, लक्ष्मी प्राप्ति, कोर्ट कचहरी में सफलता, धोखा, शारीरिक पीड़ा, कर्ज मुक्ति, व्यापार में हानि, गृह क्लेश आदि A 2 Z समस्या का समाधान। अगले विज्ञापन दाता इनके भी बाप हैं .... पं.......शास्त्री (गोल्ड मेडलिस्ट) खुला चैलेन्ज, मेरे से पहले काम करने वाले को मुंह मांगा इनाम। गृह क्लेश,सौतन-दुश्मन से छुटकारा, पति-पत्नी में अनबन, लव मैरिज का गारंटेड 2 घंटे में समाधान। सभी समस्या का समाधान मात्र-700/- में। बिछड़ा प्यार दुबारा वापस लाने में स्पेस्लिस्ट। अगला विज्ञापन दाता इनका भी दादा निकला। (कोई फीस नहीं) पहले काम फिर इनाम, समस्या कैसी भी हो जड़ से खत्म घर बैठे। स्पेस्लिस्ट - मनचाही शादी, किया कराया, जादू टोना, संतान सुख, गृह क्लेश, मांगलिक/ काल सर्प पूजा, लाटरी सट्टा, सौतन-दुश्मन खात्मा, गड़ाधन। नोट- मुझसे पहले काम करने वाले को 51 लाख रुपए इनाम।100% गारंटेड समाधान। नकली लोगों से बच के रहें।

यह है विज्ञापनों का जंजाल, धूर्त लोग जाल फैलाये मुर्गा फंसने का इंतजार करते हैं और जिस दिन मुर्गा फंस जाये उस दिन त्यौहार मना लेते हैं। ये तो छोटे-मोटे लोग है जो लघु विज्ञापनों पर काबिज हैं। 5 सप्ताह में गोरा बनाने वाली बड़ी कम्पनियों के के करोड़ों अरबों के विज्ञापन छपते हैं। किसी को गोरा होते मैंने आज तक नहीं देखा। उत्तर भारत में गोरा करने वाली इन क्रीमों का अधिक असर नहीं पड़ता, पर दक्षिण भारत में लोगों का क्रीम पावडर का खर्च अधिक है। बेचारे बरसों से गोरा होने के लिए क्रीम लगा रहे हैं। पर गोरे एक भी नहीं दिखाई देते। गोरे होने की आदिम मानसिकता का फायदा बड़ी कम्पनियां उठा रही हैं। एक कम्पनी है हाईट बढ़ाने की दवाई के विज्ञापन करके अच्छी बिक्री कर रही है और लाभ कमा रही है। ऐसे ही हजारों विज्ञापन  ग्राहक को उल्लू बनाने के लिए ताक रहे हैं, इनके गोरख धंधे से जो बच जाये वही बुद्धिमान है।

13 टिप्‍पणियां:

  1. और कमाल देखिए 60% पढ़ेलिखे लोग भी फँसते हैं ।

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  2. विज्ञापनों का मायावी संसार भ्रमित ही तो करता है..... सचेत रहना आवश्यक है.....

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  3. आज शत प्रतिशत बाजार विज्ञापनों के चंगुल में है .. क्‍योंकि आम लोगों को अच्‍छे प्रोडक्‍ट्स या अच्‍छी सेवाओं की चर्चा के लिए समय नहीं ..ऐसे में विज्ञापन के द्वारा ही प्रोडक्‍ट और सेवाओं को लोग जान पाते हैं .. बिना विज्ञापन के किसी का बाजार में पैठ बनाना संभव ही नहीं !!

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  4. एक बहुत जरूरी ज्ञानवर्धक लेख, ललित जी ! कलयुग है, इंसान को पैसे ने अंधा कर के रख दिया ! खैर, आपको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये !

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  5. गजब का विज्ञापन और फंसने और फ़साने हम खुद . धंधा बुरा नहीं है.

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  6. इन विज्ञापनों को देखकर लगता है की धंधा कभी मंदा नहीं रहता होगा. आखिर सब तरह के ग्राहक मिल ही जाते हैं. फिर हींग लगे ना फिटकरी .
    आजकल इ मेल से भी आधुनिक तरीके के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं , पैसा ऐठने के लिए.

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  7. विज्ञापनों का अपना संसार, मन को प्रभावित करते चित्र।

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  8. आपका संकलन तो सराहनीय है .....

    चल पड़ा है इस क़दर विज्ञापनों का दौर

    आज कुछ बचे हुए संभ्रांत लोगों के खड़े

    होने के लिए बाख पाया है कहाँ कोई ठौर

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  10. १००% सत्य है ...ये ही तो मायाजाल का संसार है ..बस हमें ही संभलने की जरुरत है

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  11. ललित जी बहुत सुन्दर लिखा आपने ....... जब भी समय मिला मैं अवश्य ही आपके दुसरे लेख पढूंगा!!!

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