आई फ़ोरगाट डे (भुलक्कड़राम दिवस) 2 जुलाई को मनाया गया। मनाना भी चाहिए, जब मुर्ख दिवस, मु्र्खाधिराज दिवस मनाया जा सकता है तो भुलक्कड़राम दिवस क्यों नहीं?
और इस दिन अपनी वर्ष भर की भुलक्कड़ी को याद करना चाहिए, भुली बिसरी चीजें आपके याद आ जाएं इसी बहाने। लेकिन क्या सभी भुलक्कड़राम होते हैं? या सारी चीजें-बातें याद रह जाती हैं।
हमें तो याद सब रहता है लेकिन जरुरत पड़ने पर भूल जाते हैं। जब हमें लगता है कि फ़लां चीज-वस्तु - कोई कागज, काम का है तो उसे संभाल कर ऐसे ठिकाने रख देते हैं कि जरुरत पड़ते ही मिल जाए।
लेकिन जब उसकी जरुरत पड़ती है तब भुल चुके होते हैं और सारा घर पलट डालते हैं पर वह नही मिलता। ऐसा ही होता है।
और इस दिन अपनी वर्ष भर की भुलक्कड़ी को याद करना चाहिए, भुली बिसरी चीजें आपके याद आ जाएं इसी बहाने। लेकिन क्या सभी भुलक्कड़राम होते हैं? या सारी चीजें-बातें याद रह जाती हैं।
हमें तो याद सब रहता है लेकिन जरुरत पड़ने पर भूल जाते हैं। जब हमें लगता है कि फ़लां चीज-वस्तु - कोई कागज, काम का है तो उसे संभाल कर ऐसे ठिकाने रख देते हैं कि जरुरत पड़ते ही मिल जाए।
लेकिन जब उसकी जरुरत पड़ती है तब भुल चुके होते हैं और सारा घर पलट डालते हैं पर वह नही मिलता। ऐसा ही होता है।
कुछ चीजें मैं भी भुल जाता हूँ, एक बार वकील साहब(हमारे मित्र अनुज) मेरे साथ बाईक पर कहीं गए थे। वापसी मैंने सीधे बाईक चालु की और एक किलोमीटर तक आ गया। जब किसी को देखकर रुका तो पीछे देखा, वकील साहब गायब थे।
इसका मतलब यह था कि या तो वे कहीं गिर गए या बाईक पर बैठे ही नहीं। मैं उस जगह पर वापस पहुंचा तो वे वहां बैठे हुए थे। मैने पु्छा "तुम यहां कैसे छुट गए?" तो उन्होने कहा कि "जैसे ही मैं बाईक पर बैठने लगा वैसे ही आप चल पड़े,मैं चिल्लाता रह गया।" बताईए हम जीते जागते चिल्लाते आदमी को भूल आए।
इसका मतलब यह था कि या तो वे कहीं गिर गए या बाईक पर बैठे ही नहीं। मैं उस जगह पर वापस पहुंचा तो वे वहां बैठे हुए थे। मैने पु्छा "तुम यहां कैसे छुट गए?" तो उन्होने कहा कि "जैसे ही मैं बाईक पर बैठने लगा वैसे ही आप चल पड़े,मैं चिल्लाता रह गया।" बताईए हम जीते जागते चिल्लाते आदमी को भूल आए।
मैं चाबियां भूल जाता हूँ अक्सर, इसलिए हमेशा बुलेट (रायल इन्फ़ील्ड) की चाबी में लम्बी चैन डाल कर रखता था कि कहीं दिख ही जाएगी। वह फ़िर भी खो जाती थी। जाते वक्त कुछ समय उसे ढुंढने में ही खराब हो जाता है। यह तो रोज का ढर्रा हो गया है।
एक बार मेरे बेटे को इन्ही बरसात के दिनों में बुखार हो गया। पैरासिटामॉल से बुखार नहीं उतरा तो डॉक्टर मित्र को फ़ोन लगाकर दवाई पु्छी। रात के लगभग 12 बज रहे थे। मुसलाधार बरसात हो रही थी, भीगते हुए गेट खोला कार निकाली और केमिस्ट को घर जाकर जगाया। फ़िर उससे दवाई लेकर, उसे घर छोड़ा। जल्दी-जल्दी दवाई लेकर घर पहुंचा। गाड़ी लॉक की, गेट बंद किया, घर के अंदर घुसते ही श्रीमति जी ने दवाई मांगी, देखा तो दवाई कार के डेशबोर्ड पर रख कर बाहर भुल आया हूँ।
दवाइ निकालने गया तो कार की चाबी गायब । चाबी मुझे इग्निशन में लगी हुयी दिख रही थी। कार चारों तरफ़ से लॉक, अब हो गये फ़जीते। कैसे दवाई निकाली जाए। इधर बच्चा बुखार में तप रहा है। फ़िर कुछ जुगाड़ याद आ गए जिससे लॉक खुल गया। तब दवाई निकाल कर बच्चे को दी। ऐसी भुलक्कड़ी मुसीबत में डाल देती है।
एक बार मेरे बेटे को इन्ही बरसात के दिनों में बुखार हो गया। पैरासिटामॉल से बुखार नहीं उतरा तो डॉक्टर मित्र को फ़ोन लगाकर दवाई पु्छी। रात के लगभग 12 बज रहे थे। मुसलाधार बरसात हो रही थी, भीगते हुए गेट खोला कार निकाली और केमिस्ट को घर जाकर जगाया। फ़िर उससे दवाई लेकर, उसे घर छोड़ा। जल्दी-जल्दी दवाई लेकर घर पहुंचा। गाड़ी लॉक की, गेट बंद किया, घर के अंदर घुसते ही श्रीमति जी ने दवाई मांगी, देखा तो दवाई कार के डेशबोर्ड पर रख कर बाहर भुल आया हूँ।
दवाइ निकालने गया तो कार की चाबी गायब । चाबी मुझे इग्निशन में लगी हुयी दिख रही थी। कार चारों तरफ़ से लॉक, अब हो गये फ़जीते। कैसे दवाई निकाली जाए। इधर बच्चा बुखार में तप रहा है। फ़िर कुछ जुगाड़ याद आ गए जिससे लॉक खुल गया। तब दवाई निकाल कर बच्चे को दी। ऐसी भुलक्कड़ी मुसीबत में डाल देती है।
बाहर टूर पर रहते हैं तो होटलों में सेविंग किट, ब्रशपेस्ट और अंडर वियर बनियान भूल जाते हैं। पिछले साल ठंड के सीजन में भुला हुआ मेरा एक शाल गुड़गांव के होटल में अभी तक पड़ा है।
एक बार जब एयरपोर्ट पहु्चे तो टिकिट ही घर भुल आए थे। गनीमत है कि रायपुर का एयरपोर्ट हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं है फ़ोन करके मंगवा ली गयी।
मोबाईल तो कई भुल कर गु्मा चुके हैं। इस तरह हम भी पूरी तरह भुलक्कड़ राम हो गए हैं। क्या आप भी ऐसे ही कुछ भूल जाते हैं? अगर भूल जाते हैं तो बन गए भुलक्कड़राम............!
एक बार जब एयरपोर्ट पहु्चे तो टिकिट ही घर भुल आए थे। गनीमत है कि रायपुर का एयरपोर्ट हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं है फ़ोन करके मंगवा ली गयी।
मोबाईल तो कई भुल कर गु्मा चुके हैं। इस तरह हम भी पूरी तरह भुलक्कड़ राम हो गए हैं। क्या आप भी ऐसे ही कुछ भूल जाते हैं? अगर भूल जाते हैं तो बन गए भुलक्कड़राम............!