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शनिवार, 6 अगस्त 2011

मिस्टर टेटकू राम! स्वस्थ पारिवारिक मनोरंजन --- ललित शर्मा

छत्तीसगढी फ़िल्म उद्योग छालीवुड के नाम से पहचाना जाता है, छालीवुड नाम की पहचान बनाने में "मोर छंइया भुंईया" नामक फ़िल्म की महती भूमिका है। नए राज्य छत्तीसगढ के निर्माण के साथ ही इस फ़िल्म का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ और इसने सफ़लता के झंडे गाड़ दिए। इस फ़िल्म ने अनुज शर्मा की मुख्य अभिनेता के रुप में पहचान बनाई। फ़िल्म के निर्देशक सतीश जैन थे, फ़िल्म के गीत भी कर्णप्रिय थे। इस फ़िल्म की सफ़लता के पश्चात छालीवुड में फ़िल्म निर्माण का सिलसिला प्रारंभ हो गया। मनु नायक की "कहि देबे संदेश" जैसी उत्कृष्ट फ़िल्म की असफ़लता के पश्चात छत्तीसगढी भाषा की फ़िल्मे एक लम्बे समय से बनना ही बंद हो गयी थी। मृतप्राय सी छत्तीसगढी फ़िल्मकारों की आशाओं को "मोर छंइया भुंईया" ने एकाएक जगा दिया। सन 2000 से लेकर 2010 तक छालीवुड ने एक लम्बा सफ़र तय किया। फ़िल्म निर्माण की तरफ़ लोगों का ध्यान खींचा एवं टाकीजों से मुंह मोड़ चुके दर्शक पुन: फ़िल्म देखने के लिए टाकीजों की तरफ़ चल पड़े।

फ़िल्म  का एक सीन
छालीवुड में बाक्स ऑफ़िस पर भीड़ जुटाने छत्तीसगढी फ़िल्में कामयाब रही। स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का भरपुर मौका मिला। रंगमंच से जुड़े कलाकार भी सुनहले पर्दे पर दिखाई देने लगे। उनकी भी पूछ परख होने लगी। दस वर्ष के सफ़र के पश्चात छालीवुड में फ़्लाप फ़िल्में आने लगी। लगा कि गाड़ी पटरी से उतर रही है। इसी दौरान अनुज शर्मा ने अभिनय के साथ फ़िल्म निर्माण का फ़ैसला लिया और मनोज वर्मा के निर्देशन में महत्वाकांक्षी फ़िल्म मिस्टर टेटकूराम बना डाली। इस फ़िल्म के कुछ गानों की शुटिंग प्रदेश से बाहर जाकर हिमाचल की सुरम्य वादियों में की। शायद यह पहला मौका था जब छत्तीसगढी कलाकार प्रदेश के बाहर जाकर किसी  अन्य लोकेशन पर फ़िल्म की शुटिंग कर रहे थे। इसकी सूचना कुछ मित्रों से मिली थी। मिस्टर टेटकू राम का प्रीमियर शो 5 अगस्त को प्रभात टाकीज में हुआ। प्रीमियर शो देख कर निकले दर्शकों ने फ़िल्म की भूरि-भुरि प्रशंसा की।

पुष्पेन्द्र सिंह (फ़त्ते) और ललित शर्मा
इस फ़िल्म की प्यार एवं हास्य मिश्रित पटकथा अच्छी बन पड़ी है। फ़िल्म में अनुज शर्मा ने टेटकू राम, पुष्पेंद्र सिंह ने मकान मालिक फ़त्ते, पूजा साहू ने टुनकी, शिवकुमार दीपक ने दादा, हेमलाल कौशल ने टॉमी, संजय महानंद ने गुग्गी, आशीष शेंद्रे ने टेटकू राम के पिता की भूमिका निभाई है। फ़िल्म की कहानी मकान, मकान मालिक एवं किराएदारों के ईर्द-गिर्द ही घूमती है। फ़त्ते के मकान में कुछ किराएदार रहते हैं, जिसमें टेट्कूराम नगर निगम में अधिकारी के पद पर कार्यरत है, इसे एक रेड़ियो जॉकी की आवाज इतनी मधूर लगती है कि आवाज सुनकर उससे प्यार पींगे बढाने लगता है, फ़त्ते की लड़की अपने बाप से छिपकर रेड़ियो जॉकी का काम करती है। गाजा बजाना फ़त्ते को पसंद नहीं है, इसकी बड़ी लड़की ने एक तबला वादक से विवाह कर लिया, तब से फ़त्ते उससे नाराज होकर संबंध तोड़ चुका है। टुनकी अपने पिता के सगीत विरोधी होने के कारण उसे स्कूल में काम करना बताती है। घर में रहने वाले किसी किराएदार को टुनकी के कार्य के विषय में जानकारी नहीं होती।

संजय महानंद (गुघ्गी)
फ़िल्म में छत्तीसगढ में किसानों की जमीन बिल्डरों द्वारा खरीदे जाने पर भी गहरा कटाक्ष किया है। गुघ्गी एक जमीन दलाल है और वह फ़त्ते के मकान की जमीन पर नजर गड़ाए रहता है। उसका एकमात्र ध्येय किसी तरह फ़त्ते की जमीन खरीदना रहता है, वह उसे रुपए का लालच देता है, लेकिन फ़त्ते मकान बेचना स्वीकार नहीं करता और उसे घर से भगा देता है। इसी बीच टेटकू राम की मोबाईल बातचीत रेड़ियो जॉकी से होती है। जब वह उससे नाम पूछती है तो उसे अपना नाम टेटकू राम बताने में शर्म आती है। वह नाम नहीं बताता, टॉमी की सलाह से टेटकू राम से शार्ट नेम लगा कर टी.आर.साहू हो जाता है। अपने माँ-बाप से नाम के विषय में पूछता है तो उसकी माँ बताती है कि उसके बच्चे जन्म लेने के बाद नहीं रहते थे इसलिए इस बच्चे का नाम टोटका स्वरुप टेटकू राम रख दिया। फ़त्ते और टेटकू राम का बाप टुनकी और टेटकू का रिश्ता आपस में तय कर देते हैं। जिससे टेटकू राम एवं टुनकी दोनो नकार देते हैं। क्योंकि टेट्कू नहीं जानता था कि टुनकी ही रेड़ियो जॉकी है और टुनकी नहीं जानती थी कि जिस मोबाईल कॉल वाले लड़के से प्यार की पींगे बढा रही है वह और कोई नहीं टेटकूराम ही है।

अनुज शर्मा और हेमलाल यादव
एक दिन टुनकी और टेटकू मिलकर एक दुसरे के विषय में जान जाते हैं। इसी बीच किराएदारों में शामिल दादा के पोते की तबियत खराब होने के कारण उसे अस्पताल में दाखिल कराया जाता है, तब टेटकू अपने पिता से कहके गाँव चला जाता है और फ़त्ते अपना घर गुग्गी को बेच देता है। इससे सारे किराएदार उसे लानत-मलानत भेजते हैं, भला-बुरा कहते हैं। तभी टेटकू सबको आकर बताता है कि दादा के पोते की किडनी खराब हो गयी है और उसके इलाज के लिए ही फ़त्ते ने अपना मकान बेच दिया है। वह कहता है कि उसने डाक्टर को रुपए चुका दिए हैं अब मकान बेचने की आवश्यकता नहीं है। टेटकू गाँव का मकान बेचकर बच्चे की जान बचाने का संवेदनात्मक मानवीय पक्ष उजागर करता है। गुग्गी को रुपए वापस कर देते हैं तो उसे यह नागवार गुजरता है। इसके बाद फ़िल्म बंबईया मसाला फ़िल्मों जैसे क्लाईमैक्स की ओर बढ जाती है। अंत में ढिसुम-ढिसुम के पश्चात फ़त्ते अपनी लड़की टुनकी का हाथ टेटकू राम के हाथ में दे देता है। फ़िल्म अपनी गति की ओर बढ जाती है।

पूजा साहू
जहाँ अनुज शर्मा के अभिनय में परिपक्वता है, वहाँ फ़त्ते के रुप में पुष्पेंद्र सिंह का सशक्त अभिनय है, संवाद के साथ चेहरे के हाव-भाव मेल खाते हैं, इनके अभिनय में रंगमंच के मंजे हुए कलाकार की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। नायिका की दोहरी भूमिका में पूजा साहू का अभिनय ठीक रहा। टामी का पात्र निभाने वाले हेमलाल कौशल का प्ले मैने देखा था, उस दिन लगा था कि इसका चेहरा-मोहरा राजपाल यादव से मिलता जुलता है। वैसी भूमिका इसने फ़िल्म में भी निभाई है।  गुग्गी के रुप में संजय महानंद ने पंजाबी भाषा का छत्तीसगढी के साथ मिश्रण करके उम्दा हास्य संवाद प्रस्तुत किया। शिव कुमार दीपक ने वृद्ध दादा की भूमिका अच्छे से निभाई। उपासना वैष्णव एवं बाल कलाकर आयुष का भी प्रदर्शन बेहतरीन रहा। आशीष शेंद्रे ने भी टेटकूराम के पिता की भूमिका में कोई कसर नहीं छोड़ी। फ़िल्म निर्देशन भी अच्छा है।फ़िल्म में टायटिल सांग प्रयोग किया गया है।

पुष्पेन्द्र सिंह फ़त्ते की भू्मिका में
सुनील सोनी के संगीत के साथ मशहूर छत्तीसगढी गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया एवं कुबेर गीतपरिहा ने.गीत लिखे हैं, गीतों को स्वर सुनील सोनी, अलका चंद्राकर, विजया राऊत एवं अनुज शर्मा ने दिया तथा फ़िल्मांकन दिनेश ठक्कर ने किया है। कुछ गीत धूम मचा सकते हैं। कुल मिलाकर फ़िल्म में वह सब मसाला है जिससे फ़िल्म चला करती है। चुटीले हास्य के साथ प्रेम कहानी का उम्दा प्रयोग किया है। स्वस्थ मनोरंजन से भरपुर परिवार के साथ बैठकर देखने लायक फ़िल्म है। आशा है मिस्टर टेटकूराम एक सफ़ल फ़िल्म साबित होगी तथा 2011 में मील का पत्थर बनकर छालीवुड को फ़्लाप फ़िल्मों के दौर से बाहर लेकर आएगी।  भरपुर हास्य का मजा लेना है तो एक फ़िल्म देखें। अभ्युदय इंटरटेनमेंट एवं शर्मा एवं वर्मा की समस्त टीम की हार्दिक शुभकामनाएं। फ़िल्म का प्रोमो यहाँ पर देखें


NH-30 सड़क गंगा की सैर

सोमवार, 27 जून 2011

फ़िल्मी चक्कर --- ललित शर्मा

जय संतोषी माँ फ़िल्म का पोस्टर
फ़िल्मों का भी एक जमाना था, जब घर भर के लोग बैलगाड़ी में चढ कर फ़िल्म देखने गांव से शहर जाते थे। मेला-ठेला में एवं कस्बे में टुरिंग टाकिज आते थे, जो कनात से मैदान घेर कर फ़िल्म दिखाने की व्यवस्था करते थे। एक प्रोजेक्टर रात के दो शो दिखाया करता था। मैने पहली फ़िल्म टाकिज में संत ज्ञानेश्वर देखी थी। इस तरह की धार्मिक फ़िल्में गांव देहात में चला करती थी। मुझे याद है रायपुर के शारदा टाकिज में हम लोग सपरिवार जय संतोषी माँ फ़िल्म देखने गए थे। वहाँ लोग परदे पर ही सिक्के फ़ेंकने लग जाते थे। इनके लिए अलग से दान पेटी की व्यवस्था की गयी थी। फ़िल्म शुरु होने से पहले आरती की जाती थी। तब फ़िल्म शुरु होती थी। जब "मत रो मत रो आज राधिके सुन ले बात हमारी" गीत बजने लगता तो महिलाएं रोने लगती कि छोटी बहु कितनी तकलीफ़ सह रही है और जेठानियाँ उसके साथ कपट व्यवहार कर रही हैं। कुछ ऐसी दास्तान तब के सिनेमा की थी। फ़िल्में सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली मनाया करती थी।

टाकिज में पोस्टर देखते दर्शक
स्कूल-कालेज में पढने वाले विद्यार्थी फ़िल्म का पहला शो देखने के लिए रात से ही टाकिज की टिकिट खिड़की में लाईन लगा लेते थे। टिकिट ब्लेक हुआ करती थी। फ़िल्मों के प्रति लोगों को दीवानगी के किस्से सुने जाते थे। जब भी कोई फ़िल्म नई फ़िल्म आती थी तो उसकी कहानी की किताब गानों के साथ मिला करती थी। हम गाँव से फ़िल्म देखने नहीं जा पाते थे तो उन किताबों को पढ कर फ़िल्म की कहानी का पता लगा लिए करते थे। जब कोई दोस्त फ़िल्म देख कर आता और उसके किस्से सुनाता तो हम भी उसकी कहानी सुना कर रौब गांठ लिया करते थे। आडियो कैसेट पर भी फ़िल्मों की पूरी कहानी दो-तीन कैसेटों में मिल जाती थी, उसे टेपरिकार्डर पर चला कर सुना जाता था, जैसे टाकिज में बैठ कर फ़िल्म देख रहे हों, वो भी एक जमाना था।

डबल धमाल का एक सीन
कालांतर में वीडियो कैसेट वी सी आर का जमाना आ गया। 100-200 रुपए में वी सी आर किराए पर लाकर रात भर फ़िल्में देखी जाती थी। गाँव में परिवारिक उत्सव के समय नाच गाना बन्द हो गया और छट्ठी त्यौहार आदि में वीडियो का चलन हो गया। 21 इंच के रंगीन टीवी पर गांव भर के लोग रात भर बैठ कर फ़िल्म देखने का आनंद लेते थे। तालाब की पार में बैठ कर गुड़ाखु घिसते हुए नौजवान फ़िल्मों का रस लेते घंटो बतियाते रहते थे। टाकिज तक जाना कम हो गया था। वीडियो ने टाकिज के दर्शकों का अपहरण कर लिया, रही सही कसर टीवी ने पुरी कर दी। दुरदर्शन भी सप्ताह में दो फ़िल्मे मुफ़्त दिखाने लगा था। टाकिज के दर्शक कम होते गए। शहर की कई टाकिजें बंद हो गयी और उसकी जगह बड़े-बड़े व्यावसायिक काम्पलेक्स खुल गए। 

शिव टाकिज बिलासपुर छत्तीसगढ
वी सी आर की जगह अब सीडी ने ले ली, 1000 रुपए का सीडी प्लेयर और 10 रुपए की कैसेट ने टाकिजों के बारह बजा दिए। घर-घर में कम्पयुटर हो गए, नेट से फ़िल्म डाउन लोड करने की सुविधा मिल गयी। सेटेलाईट टीवी चैनलों ने दिन में 50 से 100 फ़िल्में दिखाने शुरु कर दी, इस तरह टाकिज के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने का काम चैनल वालों ने कर दिया। मुझे बरसों हो गए टाकिज में फ़िल्म देखे, अंतिम फ़िल्म पिछले जुलाई में नागपुर में "रावण" देखी थी। शुक्रवार को मैने मॉल के आईनोक्स में फ़िल्म देखी, भेजा फ़्राई। इस फ़िल्म ने भेजा फ़्राई ही कर दिया। आईनोक्स में लगभग 200 से अधिक ही सीटे होगीं। टिकिट दो आदमियों की 260 रुपए और 180 रुपए स्नेक्स के कम्बो पैक के दिए। कुल मिलाकर 440 रुपए में दो लोग फ़िल्म देखने लगे। जब अंदर गए तो गेट कीपर ने हमारे सीट नम्बर पर बिठाया, वहां एक जोड़ा पहले से बैठा था। पूरा टाकिज खाली था। फ़िल्म शुरु होने पर एक जोड़ा और आ गया। टाकिज में 6 लोगों ने बैठ कर एक शो देखा।

शिव टाकिज में दर्शकों की भी
इधर खबर मिली की धमाल टु याने डबल धमाल भी रिलीज हुई है। इस फ़िल्म में संजय दत्त, मल्लिका शेरावत, कंगना, सईद जाफ़री, अरशद वारसी आदि कलाकार है। मैने जाना कि फ़िल्म की कहानी चलने के लायक है। परसों शाम को 6 बजे का शो बिलासपुर के शिव टाकिज में देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी, जैसे कोई मनमोहन सिंह ने गैस सिलेंडर का रेट 100-200 कम दिया हो। बताते हैं कि टिकिट खिड़की में 50 मीटर लम्बी लाईन लगी थी। इस भीड़ को देखने के बाद लगता है कि टाकिजों के दिन बहुर रहे हैं। लगता है वर्तमान में युवाओं का रुझान टाकिजों की तरफ़ बढ रहा है। टाकिजों का व्यवसाय मंदी के दौर से बाहर निकल रहा है। वैसे भी अधिकांश टाकिजों में प्रोजेक्टर और फ़िल्म रोल का काम खत्म हो गया है। शो के समय सीधे सेटेलाईट से ही फ़िल्म दिखाई जाती है। अगर यही हालात रहे तो टाकिजों का स्वर्णिम युग लौट सकता है।

चित्र - बिलासपुरिहा मित्र के सौजन्य से
NH-30 सड़क गंगा की सैर

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

लड़की को बदमाशों ने मार दिया पापा----ललित शर्मा

टीवी के कार्यक्रमों का बाल मन पर गहरा असर हो रहा है। इन कार्यक्रमों से बच्चों के क्रियाकलाप भी प्रभावित होते हैं। बच्चों का पूरा समय टीवी देखने में ही लग रहा था। पढाई चुल्हे में गई। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के क्रिकेट मैच के दिन मैने टीवी चालु किया। अन्यथा टीवी बंद ही था।  टी वी बंद करने का अनुकूल असर भी बच्चों पर पड़ा। वे पढाई करने लगे थे। डिश तो शुरु नहीं किया पर डी डी वन चालु है।  उदय अभी 8 साल का है, अब वह समझने लगा है, गत दो सप्ताह से टीवी देख रहा है। पहले रात को नौ बजते ही सो जाता था, लेकिन फ़िल्म देखने के लिए रात 12 बजे तक जगा रहता है। कल भी उसने एक फ़िल्म  देखी। आज दोपहर वह फ़िल्म देख रहा था और मैं इधर नेट पर काम कर रहा था। मिस्टर इंडिया फ़िल्म चल रही थी, समीप होने के कारण उसके डायलाग मुझे सुनाई दे रहे थे। तभी अचानक उदय ने टी वी बंद कर दिया और बिजली के प्लग से भी उसका तार निकाल कर बाहर भाग गया।

टीवी की आवाज बंद होने पर मैने मुड़ कर देखा तो वह बाहर जा रहा था। मैने आवाज देकर उसे बाहर जाने का कारण पूछा। तो वह बोला कि "बम से लड़की को बदमाशों ने मार दिया पापा।" तब मुझे फ़िल्म का सीन याद आया कि मोगेम्बो कहता है"सारे भारत में खिलौनो में और कारों में भर कर बम लगा दो। सब तरफ़ त्राहि त्राहि मचने दो। खून की होली खेलेगें।" समुद्र के किनारे एक टेडी बियर में बम रखा था और उसे एक लड़की उठाती है और बम ब्लास्ट हो जाता है और लड़की मर जाती है। उदय इस दृश्य से सहम जाता है इसलिए टी वी बंद करके बाहर चला जाता है। मैं उसे आवाज देकर बुलाता हूँ और टीवी बंद करने का कारण पूछता हूँ। वह सहमे-सहमे कह्ता है " पापा, वह लड़की बम फ़ूटने से मर गयी तो मुझे अच्छा नहीं लगा। मै टीवी नहीं देखुंगा।" मैने टी वी फ़िर चालु किया और उसे बताय कि वह सीन निकल चुका है तु अभी बैठ कर देख। वह फ़िर टीवी देखने लगता है।

मैं टी वी देखते हुए उसकी भाव-भंगिमाओं पर नजर रखता हूँ। उसके चेहरे से मुझे लग रहा था कि वह डरा हुआ है। आराम से बैठ कर फ़िल्म नहीं देख रहा है। फ़िल्म के एक सीन ने उसके कोमल मन पर असर किया। कल सुबह उठेगा तो सामान्य हो जाएगा। इस तरह की घटना प्रत्येक बच्चे के साथ होती है। वर्तमान में बनने वाले टीवी कार्यक्रम एवं फ़िल्मों में हत्या, डकैती, ब्लात्कार, षड़यंत्र नग्न दृश्य इत्यादि ही फ़िल्माए जा रहे हैं। घर में पूरा परिवार एक साथ बैठ कर नहीं देख सकता। जिन बच्चों ने पुरानी फ़िल्मे नहीं देखी है उन्हे वर्तमान की फ़िल्में ही अच्छी लगती हैं। समाज में भी फ़िल्मों के प्रभाव वाले पहनावा और रहन सहन चल रहा है। टीवी और फ़िल्मों के दुष्प्रभाव से बच्चों में नकारात्मकता भरते जा रही है। जिस तरह फ़िल्मी बच्चे अपने माँ बाप से व्यवहार और संवाद करते हैं, उसी तरह का संवाद आज बच्चे अपने माँ बाप से करने लगे हैं। टीवी फ़िल्मों की नकल करने लगे हैं। रामायण एवं शक्तिमान धारावाहिक का असर तो हमने प्रत्यक्ष देखा है, पता नहीं धनुष के तीर से कितने बच्चों ने आंखे फ़ुड़वाई हैं और कितनों ने उड़ने की कोशिश में छत से छलांग लगाई है।

महलों से लेकर झोंपड़ी तक टीवी की पहुंच हो गयी है। लोग टीवी के साथ अब डिस्क एंटीना भी लगा रहे हैं। मैने बंजारों के अस्थाई टैंटो में भी डिश एन्टीना लगा हुआ देखा है। सास बहु के संवाद तो वैसे ही मशहूर हैं लेकिन अब टी वी सीरियल वाले बाकायदा संवाद लिख कर सास-बहु तक पहुंचा रहे हैं। अब सास-बहु और मियां बीबी के झगड़े में सीरियल के संवाद ही सुनाई देने लगे हैं। पॉंन्डस टैल्कम पावडर का एक विज्ञापन दिखाया जा रहा है, जिसमें जींस टॉप वाली लड़की बाईक पर आकर लड़के को भगा कर ले जा रही, जब लड़का अपने घर की तरफ़ देखता है तो कहती है " शादी भले ही हम भाग कर करेगें,पर रिसेप्शन घर वालों की सहमति से ही करेंगें।" मुझे यह समझ नहीं आया कि टैल्कम पावडर के विज्ञापन से भगौड़ी शादी का क्या संबंध है?  डी डी बन पर तो हर 15 मिनट में कंडोम और माला डी के विज्ञापन आ रहे हैं। गर्भनिरोधक गोलियों के वि्ज्ञापन चल रहे हैं। व्याभिचार को बढावा दिया जा रहा है। 

हम लोगों ने भी टीवी पर फ़िल्में देखी है, 74-75 से लेकर 92 तक पूरा परिवार एक साथ बैठ कर टीवी के कार्यक्रम देखता था और मोहल्ले वाले भी आ जाते थे रविवारीय फ़िल्म देखने के लिए। साफ़ सुधरी फ़िल्में दिखाई जाती थी जिसे सभी एक साथ बैठ कर देखते थे और फ़िल्मों का आनंद लेते थे। डिस्क के चलन से ही सारा गुल गपाड़ा हुआ है। घटिया कार्यक्रम चला कर लोगों की मानसिकता खराब करने का कार्यक्रम बेधड़क जारी है। फ़िल्म निर्माता भी ऐसे दृश्य फ़िल्मा रहे हैं कि जिन्हे बैठ कर वे भी परिवार के साथ नहीं देख सकते। उन्हे तो पैसा मिल रहा है समाज में विकृति फ़ैलाने का। क्या हिंसा और अश्लील दृश्यों के बिना फ़िल्मे बन एवं चल नहीं सकती? फ़िल्म फ़्लाप होने का रिस्क कौन ले? जो दिखता है वह बिकता है। वर्तमान पीढी को इस महामारी से कैसे बचाया जाए यह एक यक्ष प्रश्न है। पूरे कुंए में ही भांग पड़ी है। पता नहीं उदय जैसे कितने बच्चे इन कार्यक्रमों और फ़िल्मों को देख कर सहमते होगें?

(मैने चुपके से उदय चित्र लिए, जिसमें उसके चेहरे के भाव स्पष्ट दिख रहे हैं, फ़िल्म के सीन के हिसाब से उसकी मुख मुद्राएं बदल रही हैं)