शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

चंद्रभागा के तट पर सांब की अर्क उपासना - कलिंग यात्रा

प्रारंभ से पढ़े…
मारे पास समय कम था और हमें भुवनेश्वर भी पहुंचना था। सूर्य मंदिर की हम एक परिक्रमा पूर्ण कर चुके थे। मेरे द्वारा मंदिर  निरीक्षण की मंदगति को देख कर बिकाश थक चुका था। इसक अहसास भी मुझे था। सूर्यमंदिर की जगती के अतिरिक्त भित्तियों में काम प्रधान प्रतिमाएं जड़ी हुई हैं। आकार में छोटी और बड़ी दोनो तरह की हैं। मैं सभी प्रतिमाओं के चित्र ले रहा था। मंडप का द्वार काले ग्रेनाईट से बहुत ही सुंदर बना है। लता, पुष्प वल्लरियों के साथ अन्य मानवीय चित्र भी अद्भुत हैं। मंडप का द्वार बंद कर दिया गया है। ब्रिटिश पुराविद फ़र्ग्यूसन ने जब 1837 में इस स्थान का भ्रमण किया था तो उस समय मुख्य मंदिर का एक कोना बचा हुआ था, जो अब नहीं है। मंडप के द्वार पर काले ग्रेनाईट के पत्थर पर अंग्रेजी में बंगाल के लेफ़्टिनेंट गर्वनर का आदेश लिखा हुआ है कि इस सुंदर संचरना के भीतरी भाग को बंद कर दिया गया है। आदेश की तारीख 1903 लिखी हुई है। इस मंडप के भीतरी भाग में रेत भर कर द्वार बंद कर दिया गया है।  
बंगाल के लेफ़्टिनेंट गर्वनर का आदेश 
अब जर्जर हुए इस मंडप को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एक बार फ़िर खोलने जा रहा है। इसकी मरम्मत का कार्य शुरु हो गया है। मुख्य मंडप से पत्थर गिरने के कारण इसे बंद कर दिया गया था। 2008 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे खोलने पर विचार करना शुरु किया। पुराविदों के तकनीकी अध्ययन में पता चला कि मुख्य मंडप में भरी गई रेत खिसककर नीचे आ गई है। इसी तरह आठ सौ साल पुराने इस मंदिर की दीवारों के दरारों में भरा गया मसाला भी निकल चुका है और दीवारें खोखली हो गई हैं। मंदिर का गर्भ गृह पहले ही गिर चुका है। वास्तुकार प्रतिमा बोस व इटली के पुरातत्वविद प्रोफेसर कोरोसी से रिपोर्ट तैयार कराई, जिसमें बताया कि मंदिर को संरक्षित कर गिरने से बचाया जा सकता है। संरक्षण कार्य के पश्चात इसे खोला जा सकता है।
सूर्यमंदिर परिसर का हाट
मैं जब चित्र खींच रहा था। तब शार्दूल की छांह में विक्रम भी ऊंघ रहा था। मैने जल्दी जल्दी चित्र खींचने का काम सम्पन्न किया और हम स्मारक से बाहर आ गए। स्मारक के रास्ते में हैंडलूम के सामान की दुकाने लगी हुई हैं, जैसे सभी प्रसिद्ध स्थलों पर होती है। यात्री इनसे कुछ सामान स्मृति के लिए खरीदकर ले जाते हैं। हमने कुछ नहीं खरीदा। अब हमें चंद्रभागा के तट पर जाना था। चंद्रभागा तट की दूरी यहाँ से लगभग 3 किलोमीटर है। बिकाश बाबू दही बड़ा का स्वाद लेने लगे और हमने पान बनवाया। उड़ीसा के पान में चूने की मात्रा थोड़ी अधिक होती है इसलिए चूना लगाने में थोड़ी कंजूसी बरतने के लिए पान वाले को कहना चाहिए, अन्यथा मुंह का भीतरी भाग भोजन करने लायक नहीं रहेगा। बाकी बनारस, इलाहाबाद, छत्तीसगढ़ में चूना एवं कत्था की मात्रा पान में संतुलित रहती है। पान खाकर हमने विकम का धन्यवाद करते हुए उससे विदा ली और 60 रुपए में आटो किराया करके चंद्रभागा तट की ओर चल पड़े।
चन्द्रभागा के तट पर बीजू बाबू
ुचंद्रभागा तट पर समुद्र दूर से ही दिखाई देने लगता है। तट पर सामने बीजू बाबू की विशाल प्रतिमा समुद्र की ओर संकेत करते हुए स्थापित की गई है। प्रतिमा देख कर ऐसा लगता है कि जैसे बीजू बाबू स्वयं ही चंद्रभागा तट का रास्ता बता रहे हों। आजादी के बाद के उड़ीसा में बीजू बाबू का महत्वपूर्ण स्थान है और यहाँ की जनता उन्हें खूब चाहती थी। इसी चाहत का फ़ायदा उठा कर नोबिन बाबू इतने बरसों से राज कर रहे हैं। जबकि उन्हें उड़िया भाषा भी बोलनी नहीं आती। उन्होने मुख्यमंत्री रहते हुए सिर्फ़ बीजू बाबू के पुतले ही प्रत्येक गाँव में लगाए हैं, यही उड़ीसा के विकास में एक महत्वपूर्ण काम हुआ है। लोग पुतलों को देख कर ही वोट दे देते हैं। उन्हे लिए यही अच्छे दिन हैं। बाकी तो जो है सो हैइए है। 
लहरों के साथ थोड़ी मस्ती हो जाए
समुद्र तट पर जलकिलोल करते बहुत सारे नर-नारी, युवा वृद्ध एवं नव विवाहित जोड़े भी दिखाई दिए। आज कल तो हर आदमी के हाथ में कैमरा है। बस खटा खट फ़ोटो खींचने का ही काम हो रहा था। कोई लहरों के साथ फ़ोटो खिंचवा रहा था कोई नई नवेली दुल्हिन के साथ। हम लोग भी कुछ देर समुद्र का आनंद लेते रहे। बड़ी लहरे आती और दूर तक सागर का विस्तार कर भिगो देती। बिकास बाबू फ़ोटू खींच रहे थे और मैं सोच रहा था कि यह वही स्थान है जहाँ आकर अर्क उपासना करने से साम्ब का कोढ दूर हुआ। लोगों को तो यह मालूम ही नहीं है कि यह स्थान पौराणिक दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है। पर्यटकों को भी इतिहास से अधिक मतलब नहीं रहता। उन्हें तो सिर्फ़ घूमने फ़िरने और खाने पीने से मतलब होता है और यही पर्यटन भी है।
बिकास बाबू चंद्राभागा के जल का आचमन करते हुए
कृष्ण के जांबवती से जन्मे पुत्र सांब अत्यन्त सुंदर थे। कृष्ण की स्त्रियाँ जहाँ स्नान किया करती थीं, वहाँ से नारद जी निकले। उन्होंने देखा कि वहाँ स्त्रियाँ सांब के साथ प्रेमचेष्टा कर रही है। यह देखकर नारद श्रीकृष्ण को वहाँ लिवा लाए। कृष्ण ने जब यह देखा तब उन्होंन उसे कोढ़ी हो जाने का शाप दे दिया। जब सांब ने अपने को इस संबंध में निर्दोष बताया तब कृष्ण ने उन्हें मैत्रये बन (मित्रवन) जाकर अर्क उपासना करने को कहा। यहाँ अर्क शब्द के कई अर्थ होते हैं। अर्क का अर्थ सूर्य, मदार एवं वनस्पति से तैयार औषधि भी होता है। श्राप के अनुसार सांब ने यहाँ रहकर अर्क (मदार) के अर्क (औषधि) का लेपन कर अर्क उपासना ( सूर्य रश्मि स्नान) बारह वर्षों तक किया। इस कठिन चिकित्सा से उसका कोढ ठीक हो गया। 
मछुवारों की बस्ती 
पुराणानुसार सांब की आराधना से प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिया। दूसरे दिन जब वे चंद्रभागा नदी में स्नान करने गए तो उन्हें नदी में कमल पत्र पर सूर्य की एक मूर्ति दिखाई पड़ी। उस मूर्ति को लाकर सांब ने यथाविधि स्थापना की और उसकी पूजा के लिये अठारह शाकद्वीपी ब्राह्मणों को बुलाकर वहाँ बसाया। पुराणों में इस सूर्य मूर्ति का उल्लेख कोणार्क अथवा कोणादित्य के नाम से किया गया है। कहते है कि रथ सप्तमी को सांब ने चंद्रभागा नदी में स्नानकर उक्त मूर्ति प्राप्त की थी। आज भी उस तिथि को वहाँ लोग स्नान और सूर्य की पूजा करने आते हैं और मेला जैसा वातावरण यहाँ दिखाई देता है। एक तरह से चंद्रभागा तट श्रद्धा के कारण पुण्य क्षेत्र माना गया है।
टाईटनिक की उड़ान - चल छैंया छैंया
इस तट से थोड़ा आगे चलकर मछुवारों की बस्ती है, जहाँ रंगबिरंगी सैकड़ों नावें रखी है। एक तरह से मान कर चलें तो यह नावों का अड्डा है। मछुवारे मछली मार कर आने के बाद उसे यहीं सुखाते है और उसे बाजार तक पहुंचाते हैं। हम इस बस्ती की ओर आ गए। कुछ मछुवारे अपने जालों की मरम्मत कर रहे थे और कुछ मदपान कर मस्त थे। यहां के वातावरण में मछली की गंध समाई हुई थी। हमने कुछ चित्र यहां पर लिए। सांझ हो रही थी और अर्करथ अस्ताचल की ओर चल पड़ा था। आसमान में लालिमा छाई हुई थी। हमें भी भुवनेश्वर पहुंचना था। शाम के 7 बजे अंतिम बस भुवनेश्वर की ओर जाती है। सार्वजनिक वाहन से यात्रा करने के लिए व्यक्ति को उसी के समय के हिसाब से चलना पड़ता है। हम बस अड्डे की ओर आ गए और थोड़ी देर में हमें भुवनेश्वर के बस मिल गई।  जारी है आगे पढ़ें……

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

सूर्य मंदिर कोणार्क के विध्वंस की कथाएं - कलिंग यात्रा

प्रारंभ से पढ़े…… जब इतिहास के पन्नों पर समय की गर्द जमा हो जाती है तो सत्यता भी प्रभावित होती है। तब बहुत सारी किंवदन्तियाँ, मिथक, कहानियां एवं गल्प कथाएं उसका स्थान लेकर सत्य को ढक कर भ्रमित कर देती हैं। यही स्थिति कोणार्क की भी है। इसके विध्वंस के पार्श्व में कई तरह के मिथक एवं लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। इनके बीच सत्यान्वेषण करना कठिन एवं दूरुह कार्य है। लिखित अभिलेख एवं प्रमाण मिलने पर सत्यता सामने आ जाती है, परन्तु प्रमाण न होने के कारण सिर्फ़ कयास ही लगाए जा सकते हैं या जनश्रुतियों एवं लोकमान्यताओं पर ही आधारित रहना होता है।

चुम्बक पत्थर - विध्वंस के पीछे जनश्रुति है कि सूर्य मंदिर के शिखर पर एक चुम्बक पत्थर लगा था, इसके प्रभाव से समुद्र से गुजरने वाले सागरपोत इस ओर खींचे चले आते थे जिससे उन्हें भारी क्षति होती थी और उनके दिशा निरुपण यंत्र चुम्बक के प्रभाव में आने के कारण भ्रमित हो जाते थे। जिससे दिशा भ्रम हो जाता था। इसलिए मुस्लिम नाविक इसे निकाल ले गए। केन्द्रीय शिला के स्थान पर यह चुम्बक प्रयुक्त होता था, इसे निकालने के कारण मंदिर की भित्तियों का संतुलन बिगड़ गया और दीवारे गिर पड़ी। इस घटना कोई आधार नहीं मिलता न कोई लिखित अभिलेख। सबसे पहले प्रश्च यह उठता है कि शिखर की टनों वजनी शिला को आवेशित कर चुम्बक किस तरह बनाया गया होगा? आठ सौ वर्षों पूर्व इतने बड़े चुम्बक बनाने का उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इससे प्रतीत होता है कि चुम्बकीय पत्थर की कहानी कपोल कल्पित है।

वास्तु दोष - कई वास्तु शास्त्री मानते हैं कि मंदिर निर्माण परिकल्पना में वास्तु दोष था। यह भवन वास्तु के नियमों के विपरीत तैयार हुआ था। वास्तु शास्त्री तर्क देते हैं कि - मंदिर का निर्माण रथ आकृति होने से पूर्व, दिशा, एवं आग्नेय एवं ईशान कोण खंडित हो गए। पूर्व से देखने पर पता लगता है, कि ईशान एवं आग्नेय कोणों को काटकर यह वायव्य एवं नैऋर्त्य कोणों की ओर बढ़ गया है। प्रधान मंदिर के पूर्वी द्वार के सामने नृत्यशाला है, जिससे पूर्वी द्वार अवरोधित होने के कारण अनुपयोगी सिद्ध होता है। नैऋर्त्य कोण में छायादेवी के मंदिर की नींव प्रधानालय से अपेक्षाकृत नीची है। उससे नैऋर्त्य भाग में मायादेवी का मंदिर और नीचा है। आग्नेय क्षेत्र में विशाल कुआं स्थित है। दक्षिण एवं पूर्व दिशाओं में विशाल द्वार हैं, जिस कारण मंदिर का वैभव एवं ख्याति क्षीण हो गई हैं। मै मानता हूं कि सूर्यमंदिर के पतन में कोई वास्तु दोष कार्य नहीं कर रहा था। यह मानव के दिमाग की उपज मात्र है। बिसु महाराणा उत्तम दर्जे का वास्तुकार था, उसके कार्य पर संदेश नहीं किया जा सकता।

राजा की अकाल मृत्यू - यह कई इतिहासकारों का मत है, कि कोणार्क मंदिर के निर्माणकर्ता, राजा लांगूल नृसिंहदेव की अकाल मृत्यु के कारण, मंदिर का निर्माण कार्य खटाई में पड़ गया। इसके परिणामस्वरूप, अधूरा ढांचा ध्वस्त हो गया। लेकिन इस मत को एतिहासिक आंकड़ों का समर्थन नहीं मिलता है। पुरी के मदल पंजी के आंकड़ों के अनुसार और कुछ १२७८ ई. के ताम्रपत्रों से पता चला, कि राजा लांगूल नृसिंहदेव ने १२८२ तक शासन किया। कई इतिहासकार, इस मत के भी हैं, कि कोणार्क मंदिर का निर्माण १२५३ से १२६० ई. के बीच हुआ था। अतएव मंदिर के अपूर्ण निर्माण का इसके ध्वस्त होने का कारण होना तर्कसंगत नहीं है। ऐतिहासिक प्रमाणों की दृष्टि से यह दावा भी खारिज हो जाता है।

शिल्पकार की मृत्यू - जन श्रुति है कि इस मंदिर में कभी पूजा नहीं हुई, एक दंतकथा प्रचलित है कि संपूर्ण प्रकार के निर्माण हो जाने पर शिखर के निर्माण की एक समस्या उठ खड़ी हुई। कोई भी स्थपति उसे पूरा कर न सका तब मुख्य स्थपति के धर्मपाद नामक 12 वर्षीय पुत्र ने यह साहसपूर्ण कार्य कर दिखाया। उसके बाद उसने यह सोचकर कि उसके इस कार्य से सारे स्थपतियों की अपकीर्ति होगी और राजा उनसे नाराज हो जाएगा, उसने उस शिखर से कूदकर आत्महत्या कर ली। इस मौत के पश्चात इस मंदिर में न प्राण प्रतिष्ठा हुई और न कोई पूजा हो सकी। इसलिए देख रेख के अभाव में मंदिर ढहते गया।

एक कथा के अनुसार, गंग वंश के राजा नृसिंह देव प्रथम ने अपने वंश का वर्चस्व सिद्ध करने हेतु, राजसी घोषणा से मंदिर निर्माण का आदेश दिया। बारह सौ वास्तुकारों और कारीगरों की सेना ने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा और ऊर्जा से परिपूर्ण कला से बारह वर्षों की अथक मेहनत से इसका निर्माण किया। राजा ने पहले ही अपने राज्य के बारह वर्षों की कर-प्राप्ति के बराबर धन व्यय कर दिया था। लेकिन निर्माण की पूर्णता कहीं दिखायी नहीं दे रही थी। तब राजा ने एक निश्चित तिथि तक कार्य पूर्ण करने का कड़ा आदेश दिया। 

बिसु महाराणा के पर्यवेक्षण में, इस वास्तुकारों की टीम ने पहले ही अपना पूरा कौशल लगा रखा था। तब बिसु महाराणा का बारह वर्षीय पुत्र, धर्म पाद आगे आया। उसने तब तक के निर्माण का गहन निरीक्षण किया, हालांकि उसे मंदिर निर्माण का व्यवहारिक ज्ञान नहीं था, परन्तु उसने मंदिर स्थापत्य के शास्त्रों का पूर्ण अध्ययन किया हुआ था। उसने मंदिर के अंतिम केन्द्रीय शिला को लगाने की समस्या सुझाव का प्रस्ताव दिया। उसने यह करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। लेकिन इसके तुरन्त बाद ही इस विलक्षण प्रतिभावान का शव सागर तट पर मिला। कहते हैं, कि धर्मपाद ने अपनी जाति के हितार्थ अपनी जान तक दे दी। सूर्य मंदिर से हम चंद्रभागा के तट की ओर चल पड़े ………   आगे पढ़े जारी है………