सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

फ़र्जी वंशावली लेखकों के गोरख धंधे

फ़र्जी पंडा नम्बर--1
आर्यो में प्राचीन काल से ही वंशावली लेखन का कार्य हो रहा है। विभिन्न जातियों एवं उपजातियों की वंशावली गोत्र एवं गाँव के नाम से वर्गीकृत की जाती है।

वंशावली तीन स्थानों पर मिलती है। 1-जन्म वंशावली— बड़वा (राव भाट, जागा, वृध्दावलि) 2- अस्थि विसर्जन का रिकार्ड रखने वाले पंडे। 3- गया जी में पितृ मोक्ष तर्पण कराने वाले पंडे के पास।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार व्यक्ति इन स्थानों पर अवश्य जाता है तथा इनके पास कुल-गोत्र के समस्त रिकार्ड दर्ज रहते हैं। सभी जातियों के वंशावली लेखक पृथक होते हैं।

हजारों वर्षों के रिकार्ड को सहेज कर रखना भी एक महत्वपूर्ण कार्य है। विगत दिनों देश भर के वंशावली लेखक नर्मदा के किनारे मंडला में एकत्रित हुए।

वहां इनसे और भी गहन जानकारी मिलती। लेकिन एक मित्र के काका जी का देहावसान होने के कारण मैं सम्मेलन में सम्मिलित नहीं हो पाया। फ़िर कभी बड़वा (वंशावली) लेखकों का सम्मेलन हो्गा तो वर्षों से गुप्त कुछ राज जानने की कोशिश करुंगा।

कहते हैं जिस जाति का उल्लेख राव-भाटों की बही में नहीं है। उसे जाति ही नहीं माना गया है। वंशावली लेखन का कार्य राजाओं से ही प्रारंभ हुआ होगा। फ़िर सभी जातियों को इसमें शामिल किया होगा।

हमारे भी कुल की वंशावली के लेखक राव-भाट हैं। इनके बही खातों से पता चलता है कि हमारा वंश  ने भारत में कहाँ-कहाँ  निवास किया  और अब देश के किस-किस स्थान पर हैं। मुझे राव-भाटों के वंशावली लेखन के कार्य प्रति जिज्ञासा रही है।

यजमान द्वारा दी गयी दक्षिणा पर ही इनके परिवार का भरण पोषण होता है। इसके लिए कोई सरकारी अनुदान इन्हे प्राप्त नहीं होता। जब वंशावली लेखक किसी के घर आता है तो उसका आदर सत्कार किया जाता है एवं यथा योग्य दक्षिणा भी दी जाती है।

हमारे कुल में अस्थि विसर्जन गढ मुक्तेश्वर (गढ ) में किया जाता है। खानदानी पंडे मृतकों की जानकारी  के साथ परिवार अन्य जीवित सदस्यों की जानकारी भी रखते हैं।

चाचा जी के देहावसान पर फ़ूल (अस्थि) लेकर जाने की बारी मेरी थी। गढ पहुंच कर मैने गंगा में अस्थि विसर्जन किया और फ़िर गढ गाँव गया। वहाँ चौक पर पंडे बैठे थे। मैने गाँव एवं गोत्र बताया तो पंडों ने मुझे अपने कुल के पंडे के पास पहुंचा दिया।

जहाँ काली स्याही से लिखे उसके बही खाते में पापा जी एवं चाचा जी के हस्ताक्षर थे। हमारे परिवार के सभी सदस्यों का नाम लिखा था।

मुझे उन पर विश्वास हो गया कि सही जगह आया हूँ। यदा योग्य दान दक्षिणा कर के उनसे विदा ली। इस तरह मैं अपने खानदानी पंडे से परिचित हो गया।

वर्तमान में फ़र्जी पंडे भी समाज में घुम रहे हैं। आज से दो वर्ष पूर्व मेरे घर पर भी दो फ़र्जी पंडे आए थे। उस वक्त मैं दिल्ली में था। शाम को जब घर पहुंचा तो माता जी बताया कि गढ से दो पंडे आए थे। उसने तुम्हारे पिता जी दादा जी एवं तुम्हारे सबके नाम बताए। मैने उनका सत्कार कर दक्षिणा दे दी।

मुझे शक हुआ तो मैने माता जी से पूछा कि उन्होने मेरे परदादा, षड़दादा एवं उदय आदि का नाम पढा की नहीं। नहीं पढा-माता जी ने बताया। तो मैने कहा कि वे पंडे फ़र्जी थे। अगर मुझे मिल जाएं तो उनको सुधार दूँ।

हमारे पंडे कॉलेज में मैथ्स डिपार्टमेंट के एच ओ डी हैं एवं उन्हे इतनी फ़ुरसत नहीं है कि वे दो चार सौ रुपए के लिए 1500 किलो मीटर आएं। बात आई गयी हो गयी।

एक सप्ताह पश्चात मुझे सारंगढ के सांसद का फ़ोन आया कि उनकी बेटी की शादी पलारी में है और मुझे जरुर उपस्थित होना है। मेरी भी आदत है कि यदि कोई अनुराग एवं आदर से बुलाए तो समय होने पर अवश्य ही उस कार्यक्रम में उपस्थित होता हूँ स्थान की दूरी की परवाह किए बिना।

मैने सोचा कि सुबह ट्रेन से भाटापारा जाएं फ़िर वहां से गाड़ी लेकर पलारी शाम को आराम से जा सकते हैं। शादी में भी हो आएगें और रिश्तेदारों से भी मिल लेंगे। सुबह मैं भाटापारा पहुंचा, जाकर बैठा ही था कि दो लोग धोती-कुर्ता-सदरी पहने एवं चंदन चोवा लगाए भीतर आकर सोफ़ा पर विराजमान हो गए।

बाबू जी को पूछने लगे। बाबूजी के आते ही उन्होने उल्हाना देना शुरु कर दिया कि आप हरिद्वार नहीं आते। हम आपके पंडे हैं। कभी तो आना चाहिए?

इनकी बातें सुनकर मुझे माताजी द्वारा बताई गई घटना याद आ गयी। मैने बाबू जी भीतर आने का इशारा किया और उनसे पूछने कहा कि वे किधर से पधार रहे हैं? और अभनपुर भी गए थे क्या?

अगर गए थे किनसे मिले। बाबू जी उनसे पूछा तो उन्होने बताया कि वे अभनपुर गए थे। ललित शर्मा के यहाँ उनकी माता जी मिली थी। बहुत दान दक्षिणा पाए।

बाबू जी ने पूछा कि आप ललित जी को पहचानते हैं तो उन्होने बताया कि ललित जी कहीं प्रवास पर थे। इसलिए नहीं मिल पाए। बात साफ़  हो गयी थी कि ये फ़र्जी डॉट कॉम हैं और अब सही जगह मिल गए। क्योंकि हमारे और ससुराल के पंडे कभी एक जगह हो ही नहीं सकते।

मैने उनसे कहा कि-“महाराज हमारी वंशावली सुनाओ? तो उन्होने उतना ही सुनाया जितना अभनपुर में सुनाया था। मैने उनसे पूछा कि” आपको यह नाम कहाँ से मिले? उन्होने कहा कि अपनी बही से उतार कर लाए हैं।

मैने उनकी डायरी छीन ली और उसमें लिखे नामों को पढने लगा। अचानक एक जगह पर मेरी नजर ठहर गयी और इनकी चतुराई का भंडाफ़ोड़ हो गया। सामाजिक प्रत्रिका में हमारी जानकारी प्रकाशित हुई थी, वह कहीं से इनके हाथ लग गयी और ये उसी को जस का तस लिख लाए थे।

उस पत्रिका में कई लोगों का नाम गलत लिखा था। इन्होने उसे जस का तस ही उतार लिया था। बस फ़िर क्या था। मैने एक झन्नाटेदार चमाट लगाया, पूरा कमरा गूंज उठा। अप्रत्याशित मिले सम्मान से वे भौंचक्के रह गए।

फ़र्जी पंडा नम्बर--2
उसने पूछा कि- मार क्यों रहे हो, हम हरिद्वार के पंडे हैं। मैने दूसरे का गाल भी सेंक दिया। बाबू जी ने मारने से मना किया। मैने कहा कि - अभनपुर में तुम गढ गंगा के पंडे बने हुए थे और भाटापारा में हरिद्वार के बन गए।

तुमने जो नाम डायरी में कहां से लिख रखे हैं, उसका भी मुझे पता है। अब तुम जेल जाओगे इससे कम कुछ नहीं हो सकता। उठो मत यहीं बैठ जाओ। अभी तुम्हारा और आदर सत्कार होगा। इतन कह कर मैने मित्र स्थानीय एस डी ओ पी को फ़ोन लगाया।

उन दोनो ने उठ कर मेरे पैर पकड़ लिए। एक बार माफ़ कर दीजिए, आईन्दा यह गलती नहीं होगी। उसका साथी पंडा अपने साथी से ही कहने लगा कि-“महाराज गलत काम मत किए करो।

अपने साथ मुझे भी पिटवा दिया। चलो माफ़ी मांगो।“ उसने पैंतरा बदल दिया था। बाबूजी के कहने पर मैने उन्हे चेतावनी देकर छोड़ दिया था कि अब इलाके में दिखाई नहीं देना। वे चले गए और ट्रेन पकड़ो निकल लो, भलाई चाहते हो तो।

चोर की चोरी एक दिन पकड़ी ही जाती है। अभनपुर में ठगी की और भाटापारा में पकड़े गए। उनकी किस्मत खराब थी। मैं न शादी में जाता तो वे पकड़े नहीं जाते।

भगवान ने अजब संयोग मिलाया। कल इस घटना की पुनरावृति हो गयी। दोपहर में आराम कर रहा था तभी माता जी ने कहा कि- दो पंडे आए हैं हरिद्वार से। मैं बाहर निकला तो उन पंडो जैसी वेशभूषा में दो आदमी दिखाई दिए।

मुझे देखते ही कहने लगे कि हम ब्राह्मणों के पंडे हैं और हरिद्वार से आए हैं। आप लोगों ने हरिद्वार आना ही छोड़ दिया है। मेरी लड़की की शादी है।

इसलिए कुछ सहयोग मिल जाए तो अच्छा रहेगा। मैने कहा जरुर करते हैं जी, सहयोग में कोई कमी नहीं होगी। उसकी उमर 35-37 साल होगी और साथी की 20 साल के आस पास। मुझे उन पर शक हो गया।

मैने पूछा कहाँ कहाँ घूम आए महाराज? तो उसने मेरे छोटे भाई का नाम लिया, मैने उनसे कहा कि हमारे पंडे गढ गंगा में हैं। हरिद्वार से हमें क्या लेना देना। इतनी देर में छोटा भाई भी आ गया।

उनके सामने ही उसने बताया कि इन्होने उसे गढ मुक्तेश्वर से आना बताया था। अब आमने सामने ही पकड़े गए। उन्होने छोटे भाई से हमारे अन्य रिश्तेदारों का पता पूछ कर डायरी में नोट कर रखा था।

मैने उनसे डायरी छीन ली और उसे देखा। उसमें अन्य ब्राह्मणों के भी पते लिखे थे। आज ठंड अधिक थी इसलिए चमाट लगाने का मन नहीं हुआ, उन्हे बख्शने का मन बना लिया था। वह कहने लगा कि उसके साथी के मामा जी गढ मुक्तेश्वर में रहते हैं। यह भी गढ मुक्तेश्वर में रहा है।

उनकी डायरी का एक पृष्ठ
छोटे भाई ने कहा कि-अभी तो तुम अपने चाचा के बारे में कह रहे कि वे गढ मुक्तेश्वर में रहते हैं। 15 मिनट में मामाजी पर आ गए।

मैने कहा कि अब झूठ बहुत अधिक हो गयी। इनकी थोड़ी थोड़ी दंड सेवा कर दो। जिससे ठंड भी दूर हो जाएगी और दीमाग भी काम करेगा।

सुनकर दोनो जाने के लिए उठ लिए। मैने कहा ठहरो महाराज दान दक्षिणा तो लेकर जाओ। खाली हाथ भेजने का नियम हमारे यहाँ भी नहीं है।

जो भी यथा योग्य सेवा होगी करेंगे और तृप्त करके भेजेगें। उन्हे हमारा सेवा भाव समझ में आ रहा था। कहने लगे कि अब इन पतों पर हम नहीं जाएगें। आपसे माफ़ी मांगते हैं। तब तक मेरा मोबाईल कैमरा काम कर चुका था। फ़र्जी पंडे कैद हो चुके थे। मैने उन्हे जाने दिया।

हमारा समाज धर्म भीरु है। अपनी परम्पराओं की रुढियों में जकड़ा हुआ है। जिसके कारण ठग लोग अपनी कलाकारी दिखा ही जाते हैं और जो वास्तविक हकदार है उसका नुकसान हो जाता है।

अगर हमारी वंशावली लेखक राव-भाट या वास्तविक पंडे आते तो उनका सम्मान करना फ़र्ज बनता है। क्योंकि वे एक स्वयंसेवी संस्था हैं, जो पीढी दर पीढी हमारी वंशावली सहेज रहे हैं और उसके एवज में  कुछ दान-दक्षिणा देने का हक हमारा भी बनता है। जिससे उनका भी जीवन यापन हो सके।

मैं तो कहता हूं कि धन्य है यह वंशावली लेखक जिन्होने श्रम पुर्वक जातियों की वंशावली को संभाल कर सहेज कर रखा है। इनके बही खातों की वंशावली को अदालत भी कुटुम्ब के जमीन जायदाद के विवाद के अवसर पर प्रमाण के तौर पर मानती है।

अगर ये फ़र्जी पंडे बिना कोई कहानी ग़ढे ही सौ-पचास मांग लेते तो दे देता, लेकिन लेकिन झूठ बोलकर फ़ंस गए। चोर-डकैत भी हो सकते हैं, किसका  क्या पता? शीघ्र ही किसी असली वंशावली लेखक से आपको मिलाते हैं और तब तक आप इन फ़र्जियों को पहचाने एवं मिल जाएं तो खूब खातिरदारी करें।    

29 टिप्‍पणियां:

  1. अभिलेखन परम्‍परा के प्रति आपकी भावना सम्‍मान योग्‍य है, दी गई जानकारी भी महत्‍वपूर्ण है.

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  2. बेचारे आपका अभिलेख दर्ज करने आए थे आपने गालों पर अभिलेख दर्ज़ कर दिया...:)

    वैसे जो इन अभिलेखों को वास्तव मे संरक्षित करते हैं उनका कार्य सराहनीय है। लोगों की धर्म के प्रति निष्ठा मे कमी इस कर्म को प्रभावित कर सकती है

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  3. धर्मभीरु बिना सोचे समझे किसी की भी बात का विश्वास कर लेते हैं और ऐसे पाखंडियों के कारन इमानदारी से अपना काम करने वाले भी विश्वास खो देते हैं ...
    अच्छी जानकारी!

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  4. अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर यह आलेख वास्तव में काफी महत्वपूर्ण है.
    नर्मदा के पावन तट पर वंशावली लेखकों के सम्मेलन की खबर भी ध्यान आकर्षित करती है.

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  5. इन पण्‍डों से हम भी परेशान हैं, साल में दो बार चले आते हैं कभी कहते हैं कि बाढ़ आ गयी है तो सहायता करो और कभी कहते हैं कि कन्‍या का विवाह है। इनके पास तो कोई वंशावली भी नहीं होती। कई वर्ष पूर्व जब ये पहली बार आए थे तब हम लगा था कि हमारे पूर्वजों की यह श्रेष्‍ठ परम्‍परा थी इसलिए हमने इन्‍हें सहयोग दे दिया लेकिन अब तो इनसे पीछा छुड़ाना ही भारी हो जाता है।

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  6. ठग भी नये-नये पैतरें अपनाने लगे हैं।
    असली पंडे तो बहुत ही कम जाते हैं जी जजमानों के पास, जब ही जाते हैं जब उन्हें सचमुच सहायता की दरकार होती है।
    आपने सही सबक सिखाया उन्हें।

    काश पंडों की भी आर्थिक दशा में कुछ सु्धार आये और इनके कार्य को भी उचित सराहना मिले।
    शायद वो दिन भी आयेगा जब पंडे भी लैपटॉप लेकर डाटा फीड किया करेंगे।

    प्रणाम स्वीकार करें

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  7. bilkul sahi sabak sikhaayaa....vaise pande nakli hi hote hain...by the way asli bhi nikale to unaki koi ahamiyat nahi rah gayee hai.....panda pratha bhi band hona chaahiye.

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  8. नमस्कार ललीत जी आजकल ऐसे कई लोग ढ़ोग बनाकर घुम रहें हैं आपने सही किया इनके बारे में बता कर आपको उनकी सही खातीर करनी चाहिए थी ताकी वो किसी दुसरे को परेशान नहीं करते

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  9. lalit bhaiya aapki muchhe badi shandaar hai
    acha laga aapki muche dekhkar

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  10. बाप रे, हम तो लुट ही जाये, अगर यह गधे हमारे सामने अ जाये, लेकिन आप का लेख पढ कर तो हम असली पांडे को भी ठोंक बजा कर देखेगे :)
    पिता जी जब गुजरे तो हम हरिदुवार गये थे, सुना था वहां बहुत ठग हे, अस्थि विसर्जन के बाद किसी को नही पता था कि हमारा पांडा कोन हे? ओर हम चल पडे मुंह ऊठा कर, तभी एक हमारी उम्र का साईकिल सवार हम से टकराया, ओर उस ने पुछा आने का कारण, फ़िर हमारा गोत्र ओर जात, गांव सब पुछा,छोटे भाई को यह सब नही मालुम था, लेकिन मुझे सब मालुम था तो मैने उसे बताया, तो उस भले मानस ने हमे हमारे पांडे का सही पता दिया, साथ मे चेतावनी भी दी की सब से पहले उस से आप अपने दादा परदादा का नाम भी पुछ लेना, यह सब भी मुझे मालूम था, ओर मैने इस आदमी को यह सब नही बताया था, ओर फ़िर हम सही पांडे के पास पहुच गये, ओर उस ने मेरे ताऊ चाचा यानि पुरे खानदान का रिकार्ड मेरे सामने रख दिया, ओर कोन कब आया यह भी बता दिया, लेकिन मै हेरान था उस साइकिल वाले से, जो अचानक हमे मिला तो सही जगह पहुचा दिया

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  11. अब ये पंडे आपके पास तो क्या अपाके नामराशि वाले के पास भी नही फ़टकेंगे.:)

    रामराम.

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  12. बढ़िया सबक सिखाया आपने ,ढोंगियों के साथ यही व्यवहार होना चाहिए

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  13. ये पांडे वाकई जान आफत में कर देते हैं ..अच्छी जागरूक करती पोस्ट.

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  14. क्या महाराज,
    ठंड अधिक थी इसलिए चमाट ज्यादा लगाने थे:)

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  15. महत्वपूर्ण विषय पर महत्वपूर्ण आलेख !

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  16. ये तो बहुत रोचक जानकारी है। कई बार जानने की उत्सुकता रही इस लूट बाजार के बारे मे लेकिन लगता है अब जान जायेंगे। ललित भाई जरूर खोज लायेंगे इन वही खातों का राज़्\ धन्यवाद।

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  17. मैं तो जाग ही गया ।

    आइये हमारे साथ उत्तरप्रदेश ब्लॉगर्स असोसिएसन पर और अपनी आवाज़ को बुलंद करें .कृपया फालोवर बनकर उत्साह वर्धन कीजिये

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  18. पाठकों को जागरूक करती पोस्ट हेतु आभार | हमारे यंहा इस प्रकार के पंडे आने का चांस बहुत कम है क्यों कि हरिद्वार वाला पंडा इतना साधन संपन्न है कि वह यंहा आने के बारे में सोच भी नहीं सकता है | ओर हो भी क्यों नहीं पुराने समय में बहुत ज्यादा दान दक्षिणा जो पाई है | उसके खुद की धर्मशाला ओर होटल है |

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  19. सही चमटा दिए, कुछ पता नही होता इन्हे परेशां करते है अलग से.

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  20. अपनी टिप्पणी लिखें... वेसे मे राव जाती को बहोत ऊतम मानता हू और उनके कार्यशैली कौ मेरा पृणाम

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  21. भाई हमे भी कोई ब्लॉग लिखना सिखा दो बताने के लिये फोन करै 9027292260 पर

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  22. आपने लिखा के वंशावली के लिए बडवा जी होते है और फिर आगे लिख रहे है राव भाट । श्रीमान आपको राव ,भाट, बडवा में अंतर समझना चाहिए । चंदिशा भाट एव बडवा जी द्वारा राव लगा लेने से वो राव नही हो जाते है । आपने कहा देखा के राव आपकी वंशावली कर रहे है। राव जाती ने न कभी वंशावली का कार्य ही नही किया है अपितु राज्य हित एव शाशन के लिए सलाहकार का कर्तव्य निभाया है(बेताल भट्ट) , समाज को ज्ञान दिया है(सूरदास), काव्य द्वारा उन्हें सहिमार्ग पर लाया है( नल सिंह बख्तावरसिंह,कविराव मोहनसिंह) तो मात्रभूमि और मित्रता के लिए प्राणों की आहुति भी दी है (कवी चंदवरदाई)। राज्य के लिए शीश कटाने में भी नही हिचकने वाले गोविन्ददास के कुवर कल्याण के बारे में आप क्या कहेंगे जिसके बारे में स्वय आमेर महाराजा मान सिंह ने कहा था " ज्यो ज्यो जगतो मान को ,हिंदुत्व को सुलतान। त्यों त्यों गोविन्ददास रो आगे कुवर कल्याण । जिन्होंने काबुल युद्ध में अपना पराक्रम दिखाते हुए बलिदान हुए थे । कृपया बताये के इनमे से कितनो को आप वंशावली करते हुए देखे है एव सुने है । अगर नही तो कृपया राव समाज को वंशावली समाज के साथ न जोड़े । बडवा जी का सभी बहुत आदर करते है एव करना भी चाहिए परन्तु , इन सभी को एक साथ समझना ये गलत है । कृपया अपनी जानकारी बढ़ाऐ एव इस बात को समझे के किसी के राव लगाने से वह राव नही हो जाता । वहिवंचक समाज एव राव समाज में बहित भिन्नता है ।
    जय माताजी रि सा
    धन्यवाद

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    1. स्वागत है मनोहर सिंह जी, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि यह लेख विस्तृत भारत के संबंध में है और आप इसे भूगोल के क्षेत्र विशेष पर केन्द्रित करके देख रहे हैं। वंशावली लेखकों को छत्तीसगढ़ में राव-भाट कहा जाता है। इसलिए इस लेख में राव-भाट शब्द का समावेश हुआ है एवं आपकी बात राजस्थान के संदर्भ में है। क्षेत्र बदलने से जातियों के नाम एवं कार्य भी बदल जाते हैं, इसलिए इसे किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित न करके विस्तृत दृष्टि से देखें तथा महूड़ा वाले (उदयपुर) राव श्री भवानी सिंह जी मेरे मित्र है उनसे इस संबंध में चर्चा होते रहती है।

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