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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

जानिए क्या होता है बस्तर का लांदा और सल्फ़ी

जब भी बस्तर जाना होता है तब बस्तरिया खाना, पेय पदार्थ का स्वाद लेने का मन हो ही जाता है, चाहे, लांदा हो, सल्फ़ी हो या छिंदरस। बस्तर की संस्कृति पहचान ही अलग है। गत बस्तर यात्रा के दौरान अंचल के विशेष पेय पदार्थ एवं भोजन विकल्प सल्फी का रस तथा चावल का लांदा का स्वाद लिया गया। सल्फी का वृक्ष बस्तर अंचल में ही पाया जाता है. चावल को खमीर उठा कर उसका लांदा नामक पेय पदार्थ बनाया जाता है. हाट बाजार में ग्रामीण इसे बेचने आते हैं।

भाई चंद्रा मंडावी लांदा बनाने की रेसीपी और तरीका बताते हुए कहते हैं, लांदा बनाने के लिये चावल को पीस कर उसके आटे को भाप में पकाया जाता है, इसे पकाने के लिए चूल्हे के ऊपर मिटटी की हांड़ी रखी जाती है जिस पर पानी भरा होता है और हांड़ी के ऊपर टुकना जिस पर चावल का आटा होता है। इसे अच्छी तरह भाप में पकाया जाता है, फिर उसे ठंडा किया जाता है।

इसके पश्चात एक अन्य हंडी में पानी आवश्यकता अनुसार लेकर उसमे पके आटे को डाल देते है, साथ ही हंडी में अंकुरित किये मक्का (जोंधरा) के दाने, जिसे अंकुरित करने के लिये ग्रामीण रेत का उपयोग करते है। भुट्टे के अंकुरण के पश्चात उसे भी धुप में सूखा कर उसका भी पावडर बनाया जाता है। लेकिन इसे जांता (ग्रामीण चक्की) में पिसा जाना उपयुक्त माना जाता है। फिर इसे भी कुछ मात्रा में चावल वाले हंडी में डाल दिया जाता है। जिसका उपयोग खमीर के तौर पर किया जाना बताते है और गर्मी के दिनों में 2-3 दिन, ठण्ड में थोडा ज्यादा समय के लिए रख देते है। तैयार लांदा को 1-2 दिन में उपयोग करना होता है अन्यथा इसमें खट्टापन बढ़ जाता है। बस्तर में दुःख, त्यौहार या कहीं मेहमानी करने जाने पर भी लोग इसे लेकर चलते है। 

सल्फ़ी के विषय में बताते हुए चंद्रा मंडावी कहते हैं, वहीं सल्फी पेड़ का रस है, जो ताज़ा निकला मीठा होता है और दिन चड़ने के साथ इसमें भी कडवाहट आती जाती है। इसका उपयोग नशे के लिए तो किया जाता है पर सामाजिक क्रियाकलापों में इसकी भी भूमिका अहम् है।| इन दिनों सल्फी पेड़ की जड़ में एक बेक्टीरिया के संक्रमण के कारण सल्फी के पेड़ मर रहे है, जिस पर हमारे बस्तर के वैज्ञानिक शोध कर रहे है और जहाँ तक रोकथाम के उपाय भी खोज लिये गये है।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

तीरथगढ़ जलप्रपात बस्तर

बड़े बूढे कह गए हैं कि जल, वायू और अग्नि से कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए और न ही इनकी शक्ति को कम करके आंकना चाहिए। खासकर बरसात के दिनों में नदी, नालों, झरनो में वर्षा जल कब बढ़ जाए इसका पता नहीं चलता। नदी किलोमीटरों दूर से बहकर आती है इसलिए अगर 25 किलोमीटर दूर मुसलाधार वर्षा हो रही हो और आप जहाँ है वहाँ वर्षा न हो रही हो तो नदी का जल तेज गति से आकर आपको घेर सकता है। इसलिए नदी, नालों एवं झरनों में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। 
तीरथगढ़ जलप्रपात बस्तर
अब बात करते हैं तीरथगढ़ जलप्रपात की, यह जल प्रपात जगदलपुर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में 35 किमी की दूरी पर स्थित है। तीरथगढ़ की ऊंचाई 300 फ़ुट होने के कारण यह भारत के सबसे ऊँचे झरनों में से एक है। कुछ दिनों पूर्व हम तीरथगढ़ जलप्रपात घूमने चले गए। गहराई में उतरने से पहले हम ऊपर से ही फ़ोटो लेने लगे, तभी बारिश आ गयी। हम लोगों ने वहीं पर बनी एक जर्जर ईमारत की शरण ली। वहाँ से देखा कि कुछ लोग झरने में नीचे उतरे हुए हैं और बारिश होने के कारण वहीं पर बनी एक छोटी सी पुलिया के नीचे घुस गए। 
तीरथगढ जलप्रपात बस्तर में पुलिया के नीचे लोग
उनके हाथ में मोबाईल था जिससे खेलते हुए बारिश रुकने का इंतजार करने लगे। बारिश रुकने पर हम नीचे गए और अच्छी लोकेशन देख कर कुछ चित्र लिए। बस्तर में मानसून पहुंचने के कारण पिछले 48 घंटों तक लगातार बारिश हुई। जगदलपुर से बैंक ऑफ़ इंडिया के मैनेजर के परिवार के 4 सदस्य अपरान्ह 3 बजे तीरथगढ़ पहुंचे और जलप्रपात में नीचे उतर गए। उन्हें पहुंचे 15 मिनट ही हुए थे कि बरसात शुरु हो गयी, तो वहां के मंदिर के पुजारी ने बारिश से बचने के लिए उन्हें अपने पास बुला लिया। इसके बाद जो मुसलाधार बारिश शुरु हुई कि रुकने का नाम ही नहीं लिया। 
तीरथगढ़ जलप्रपात में रेस्क्यू ऑपरेशन
झरने में जल का स्तर बढ़ने से वे टापू पर फ़ंस गए और वापस भी नहीं आ सकते थे। मोबाईल का नेटवर्क भी नहीं बता रहा था। किसी तरह थोड़ा नेटवर्क आने पर उन्होने अपने परिचित फ़ोन किया और उन्होने पुलिस को। पुलिस की रेस्क्यू टीम वहां रात को पहुंच गई। लेकिन जल का बहाव तेज होने के कारण कार्यवाही करने में अक्षम हो गई। उन्होने सुबह होने का इंतजार किया। 16 घंटे मौत के साये में गुजारने के बाद उन्हें पुलिस की रेस्क्यू टीम ने बचाया। इसलिए बारिश के मौसम में नदी, नालों एवं झरनों में अतिउत्साह में खतरा मोल न लें।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

रानी माई की रहस्यमय दुनिया: बस्तर अंचल

गोड़ मा पैरी, माथा म लाली वो SS, कान मा झुमका तिकोनी वाली होSS मोर गांवे म हाबे मड़ई, देखे ल आबे वोSS… वाहन में बज रहा छत्तीसगढ़ी गीत बसंत के इस मौसम में गाँव की मड़ई देखने का निमंत्रण दे रहा था।
हम भी गांव की ओर जाने वाली सर्पीली सड़क पर गीत सुनते हुए बढ़े जा रहे थे, मड़ई वाला गाँव था रायपुर राजधानी से एक सौ चालिस किमी दूर कांकेर जिले की चारामा तहसील का हल्बा टिकरापारा।

यह गाँव रानी डोंगरी ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम है, बस हमारी कहानी इस गाँव की ही कहानी है। हमारी गाड़ी जब गाँव में पहुंचती है तो बच्चे गाड़ी के पीछे दौड़ने लगते हैं, ऊंघती दोपहरिया में लोग चौकन्ने हो जाते हैं। एक घर के सामने कुछ आदमी औरतें बीड़ी बनाते दिखाई देते हैं और हमारी गाड़ी यही रुक जाती है।
हल्बा टिकरापारा की दुपहरिया
सरपंच तिलक राम कुंजाम के आने के बाद चर्चा शुरु होती है। इस इस गाँव में लगभग 150 छानी (छतें) हैं, जिनमें बसने वाले सर्वाधिक गोंड़ जनजाति के लोग हैं, उसके बाद अधिक जनसंख्या कलार जाति के लोगों की है। धोबी, लोहार के साथ एक घर साहू जाति का भी है। गाँव में पेयजल का साधन नलकूप हैं और बाकी निस्तारी दो तालाबों से होती हैं।

गांव में दो-तीन मंदिर भी हैं, जिसमें शीतला माता, शिव जी के साथ हनुमान जी भी विराजित हैं। प्रायमरी तक का स्कूल शिक्षा के लिए है, इसके बाद पास के ही हल्बा कस्बे में शिक्षा हेतू जाना पड़ता है।

गैर अपासी गाँव होने के कारण सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है, इसलिए बरसात पर आधारित धान की खेती करनी पड़ती है, वर्षा पर ही यहाँ का जीवन आधारित है, अन्य कोई रोजगार के साधन यहां उपलब्ध नहीं है।
रानी डोंगरी
ग्राम पंचायत रानी डोंगरी नाम लोकदेवी देवी रानी माई के नाम से है, रानी माई आस पास के सात आठ गाँव की देवी हैं। जो टिकरापारा से लगभग 3 किमी की दूरी पर जंगल में डोंगरी की गुफ़ा में विराजती हैं,

ग्राम परम्परा के अनुसार वहाँ पूजा करने के लिए बैगा किरपा राम सोरी नियुक्त है। जब भी देवी की पूजा करनी होती है या उन्हें ग्राम में आमंत्रित करना होता है तो बैगा के माध्यम से ही इस कार्य को सम्पन्न किया जाता है।

मड़ई के दिन सारे गाँव वासी रानी माई होम धूप देकर गाँव आने का निमंत्रण देते हैं, तथा उसके आदेश के बाद मड़ई की डांग लेकर गाँव आया जाता है, देवी मड़ई के कार्य को सफ़ल बनाने के लिए गाँव में पधारती हैं, साथ ही अनुषांगी देवता भी ग्राम में पहुंचते हैं।
रानी माई के दरबार का रास्ता
सरपंच, बैगा एवं ग्राम के पूर्व निवासी चंदूलाल जैन के साथ देवी स्थान पहुंचते हैं, यहाँ विशाल चट्टानों की छोटी सी डोंगरी है। डोंगरी के सामने ही सामुदायिक भवन बना दिया गया है, जिससे इसकी सुंदरता को ग्रहण लग गया है।

देवी के स्थान तक पहुंचने के लिए पैड़ियों का निर्माण भी कर दिया गया है। नवरात्रि में यहाँ मेला लगता है और देवी का आशीर्वाद लेने के लिए वृहद संख्या में भक्त जन आते हैं तब यह वनांचल गुलजार हो जाता है माता के सेवा गीतों से।

पैड़ियां जहाँ जाकर समाप्त होती हैं वहीं लगभग 50 फ़ुट ऊंची एकाश्म चट्टान है और इस चट्टान पर एक बड़ी चट्टान छत की तरह प्राकृतिक रुप से रखी हुई है। यहाँ खुले में रानी माई का स्थान है, इनकी कोई प्रतिमा नहीं है, यहाँ सिर्फ़ आभासी रुप में विराजमान होकर बैगा के माध्यम से अपना पर्चा देती हैं। 
रानी माई के दरबार में बैगा किरपा राम सोरी
बैगा किरपाराम बताते हैं कि देवी भीतर गुफ़ा में विराजित हैं, एकाश्म चट्टान के ऊंचाई में फ़ट जाने के कारण गुफ़ा तक पहुंचने का स्थान बंद हो गया, इसके पीछे के तरफ़ से गुफ़ा में जाने का स्थान है, परन्तु वहाँ भी बड़ी चट्टानों के गिरने के कारण रास्ता बंद हो गया है, सिर्फ़ भालू ही इस गुफ़ा में शरण लेते हैं।

रानी माई के स्थान पर उनकी सेवा के लिए घोड़ा रखा गया है और पोला के दिन लोग यहाँ पर मिट्टी के बैल भी चढाने आते हैं।  रानी माई आस-पास के रानी डोंगरी, टिकरापारा, कुरुभाट, कोटेला, टोंकोपाट आदि सात गांव की आराध्या हैं। इन गांव के लोग किसी दैवीय समस्या के निवारण के लिए रानी माई के स्थान पर आते हैं।
रानी माई के दरबार में चंदूलाल जैन, उनके भानजे, उनके मित्र, सरपंच तिलकराम कुंजाम एवं श्रीकांत दामले
मान्यता है कि रानी माई का आगमन बस्तर से हुआ है, ये महानदी के साथ आई और इनके साथ बावन कोरी (52X20=1040) देवता भी आए। इन्होने ने इस डोंगरी को उपयुक्त जानकर अपना निवास बना लिया।

इसके बाद इनका सारा परिवार पति देशमात्र,बेटा कुंवर पाट एवं बहु बिजली कैना, जोगड़ा बाबा, गढ़ हिंगलाज देवी, राजाराव देव भी आ गए हैं। इस तरह रानी माई का पूरा कुनबा ही इस स्थान पर जुट गया। बावन कोरी में बाकी देवता महानदी के पास ही रह गए, उनकी पूजा उनके ठहरने के स्थान पर जाकर ही की जाती है।

यहां रानी माई के पति देशमात्र नहीं रहते, उन्हें अन्य स्थान पर रहना पड़ रहा है। बैगा बताते हैं कि इस स्थान पर एक बूढा सिंह भी रहता था जो देवी के स्थान के ईर्द गिर्द ही मंडराता रहता था। जब कोई पूजा करने आता था तब बह गुफ़ा में चला जाता था और पूजा करके लौटने पर फ़िर बाहर निकल आता था। लगभग बारह वर्षों से अब सिंह दिखाई नहीं देता। शायद गुफ़ा में बंद हो गया होगा।
रानी माई दरबार के पार्श्व की गुफ़ा से निकलते हुए लेखक
रानी माई ने अपने पति देशमात्र को इस स्थान से भगा दिया, जिसके कारण उसे यहाँ से लगभग 12 किमी की दूरी पर भिरावर के पहाड़ पर बसना पड़ा। इसके पीछे कहानी है कि रानी देवी भक्त वत्सल हैं और वे प्रतिदिन सुबह उठकर भक्तों की फ़रियाद सुनती हैं।

उनके पति देशमात्र ने खेत जोतने के लिए हल में भैंसा फ़ांद रखा था और खेत जोत रहे थे, उन्हें भूख लगने लगी, इधर रानी माई को भक्तों की फ़रियाद सुनते हुए विलंब हो गया और खाना पहुंचाने में देर हो गई। खाना न लाते देख देशमात्र नें भूख के कारण भैंसे का सींग तोड़ कर आग में भूंज लिया और उसे खाने लगे।

रानी तभी खाना लेकर पहुंची तो उन्हें हड्डी जलने की बदबू आई, देखा कि उनका पति भैंसे का सींग तोड़ कर भूंज कर खा रहा है, उन्हें गुस्सा आ गया और उसे अपने स्थान पर कभी न आने चेतावनी दे दी। इससे देशमात्र भिरावर की पहाड़ी पर बस गए, उन्हें लगभग 12 गांव के लोग अपने अराध्य के रुप में मानते हैं।
रानी माई के दरबार का मनोरम दृश्य
उपरोक्त कथा से पता चलता है कि ग्रामीण भक्तों का रानी माई से मानवीय संबंध है, वे अपने सुख दुख ही हर बात उनसे करते हैं और रानी माई उनका निदान भी करती है।

पौराणिक देवताओं की तरह कोई बहुत बड़ा प्रभामंडल नहीं है, वे मानवीय गुणों से परिपूर्ण देवी हैं, उनका स्वभाव इससे ही पता चलता है कि पति द्वारा अनैतिक कार्य करने पर उसे भी उन्होने ने नहीं बख्शा तथा बेटे और बहू को अपने स्थान पर साथ ही रखा है। उनकी बहू बिजली कैना अर्थात बिजली की कन्या भी उनके साथ ही बेटी की तरह रहती है।

सजा का भागी सिर्फ़ उनका पति ही बनता है। देवी के इस मनोरम स्थल पर पहुंच कर मन प्रसन्न हो जाता है। बस बिना किसी योजना के यहां शासकीय निर्माण कार्य इस स्थान की सुंदरता में धब्बा लगा रहे हैं। इस स्थान को प्राकृतिक रुप में रखने की आवश्यकता है तभी इसकी सुंदरता कायम रह सकती है। सांझ ढ़ल रही थी और हम भी विहंगों के साथ अपने नीड़ की ओर लौट रहे थे।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

राजा तालाब : हल्बा टिकरापारा जिला कांकेर

बात 1956-57 की है, बस्तर नरेश प्रवीण चंद भंजदेव वर्तमान कांकेर जिले के हल्बा गाँव के टिकरापारा पहुंचे, उनके स्वागत में सारा गाँव इकट्ठा हुआ। गाँव की चौपाल में उनके लिए खाट बिछाकर ग्रामीणों ने स्वागत किया, वे आकर खाट पर विराज गए। राजा के आगमन पर गाँव के सभी नागरिक इकट्ठे हो गए। राजा उनसे समस्याओं पर चर्चा करने लगे। यह आजादी के बाद का दौर था, जिसमें देश का लोकतंत्र अपना स्वरुप ग्रहण कर रहा था और विकास के पायदान गढ़े जा रहे थे। 

ग्राम के सरपंच तिलकराम कुंजाम उस दिन को याद करते हुए कहते हैं कि " हम लोग उस समय बच्चे थे, लेकिन समझने लायक हो गए थे, राजा  सफ़ेद कुर्ता पैजामा पहना हुआ था और उनके लम्बे बाल कंधे पर झूल रहे थे। ग्रामीणो ने कहा कि गाँव में निस्तारी के लिए पानी समस्या है और कोई भी तालाब नहीं है, कुछ कुंओं एवं नाले के पानी पर ही आश्रित हैं। तब राजा ने ग्राम वासियों को 500/- रुपए दिए और तालाब बनाना शुरु करने को कहा। राजा के पैसों एवं ग्रामीणों के श्रमदान से तालाब का निर्माण शुरु हो गया। 
तालाब के लिए स्थान का चयन करने के बाद सारा गाँव तालाब निर्माण में जुट गया, खंती लग गई। तालाब निर्माण का काम लगभग 3 बरस तक चला तब कहीं जाकर 3 एकड़ की भूमि में "राजा तालाब" का निर्माण हुआ। निर्माण कार्य के दौरान रुपयों की कमी पड़ने पर गांव के कुछ लोग जगदलपुर जाते और राजा से रुपए लेकर आते। इस तरह कुल बारह हजार रुपयों में तालाब का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। राजा तालाब की पार पर शिवालय का निर्माण भी ग्रामवासियों ने किया।

तालाब बनने के बाद समझ आया कि इसके लिए उपयुक्त स्थान का चयन नहीं किया गया। तालाब के चारों तरफ़ खेत थे, इसमें पानी आने का कोई साधन नहीं था, वर्षा जल पर ही इसका भराव संभव होता था। जैसे ही पूस माघ का समय आता है इस तालाब का पानी रिसकर खेतों में चला जाता है। तालाब की मिट्टी भी रेतीली है जिसके कारण पानी नहीं ठहरता॥ हमने जाकर देखा तो तालाब का पानी अंटकर मटमैला हो गया था तब भी लोग उसमें निस्तारी कर रहे थे। 
चंदू लाल जैन कहते हैं कि इस तालाब के निर्मान के बाद ग्रामवासी एक मास्टर में खुद की भूमि में तालाब बनवाया, इसे "मास्टर तालाब" के नाम से जाना जाता है। मास्टर तालाब में पानी ठहरता है, निजी तालाब होने के बावजूद भी मास्टर जी ने कभी ग्राम वासियों को तालाब का पानी उपयोग करने के लिए मना नहीं किया। तालाब में पानी कम होने पर उसे नलकूप जल से उसे भर दिया जाता है, ग्राम में पानी के व्यवस्था के लिए कई बोरिंग भी हैं, जिससे निर्वहन हो जाता है। 

आजादी के बाद भी बस्तर राजा द्वारा निजी धन से तालाब खुदवाने की जानकारी मुझे यहाँ प्राप्त हुई, बस्तर राजा प्रवीर चंद भंजदेव प्रजावत्सल थे, प्रजा के सुख दुख में सम्मिलित रहते और उसके दुखों एवं समस्याओं का निवारण करने का प्रयास स्वयं करते थे, इसलिए आज भी उन्हें बस्तर अंचल में भगवान की तरह पूजा जाता है। बस्तर के गाँव गाँव में उनकी स्मृतियाँ बगरी हुई हैं और 1966 के बस्तर महल कांड की यादें भी ग्रामीणों की स्मृति में अभी तक ताजा हैं।   

शनिवार, 30 जनवरी 2016

बारसूर (बस्तर) की विनायकी प्रतिमा


बाणासुर की नगरी बारसुर (बस्तर छत्तीसगढ़) के संग्रहालय में गणेश की कई प्रतिमाएं रखी हुई हैं, इनकी फ़ोटो लेते वक्त मुझे स्त्री रुप में गणेश जी की प्रतिमा दिखाई दी। यहाँ गणेश की लगभग 20-25 प्रतिमाएँ होगीं तथा सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा भी यहीं पाई जाती है। स्त्री गणेश प्रतिमा को देख कर जिज्ञासा हुई तो थोड़ी खोजबीन की गई। हम जानते हैं कि सनातन धर्म में भगवती ही मूल आदि शक्ति के नाम से विख्यात हैं। अलग अलग शक्तियों को स्त्री रूप में पूजा जाता है जैसे विद्या की देवी मां सरस्वती, धन की देवी महालक्ष्मी और समस्त शक्तियों की स्वामी देवी दुर्गा। महादेव को अर्धनारीश्वररूप में पूजा जाता है, तो श्री हरि ने भी जग की भलाई के लिए मोहिनी रूप धारण किया था।

भगवान गणेश के अनेकों नामों में से उनका एक नाम विनायकी भी है अर्थात गणेश-लक्षणों युक्त स्त्री। धर्म शास्त्रों में गणपति को स्त्री रूप में पूजते हुए उन्हें विनायकी, गजानना, विद्येश्वरी और गणेशिनी भी कहा गया है। ये सभी नाम गणेश जी के संबंधित नामों के स्त्रीलिंग रूप हैं। उनकी हाथी जैसी विशेषताओं के कारण, उन्हें आम तौर पर बुद्धि की हाथी जैसी सिर वाले भगवान- गणेश से संबंधित माना गया है, उनका कोई स्थिर नाम नहीं है और उन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है – जैसे गणेशी, विनायकी, गजानना, विघ्नेश्वरी और गणेशणी, ये सभी नाम गणेश के संबंधित नामों के स्त्रीलिंग रूप हैं । इन अभिचिह्नों से उन्हें शक्ति का रूप माना गया है यानी – गणेश का स्त्री रूप या उनसे मिलता-जुलता रूप ।
विनायकी को कभी-कभी चौसठ योगिनियों में से एक भी माना जाता है । बहरहाल, विद्वान कृष्णन का विचार है कि हाथी के सिर वाली देवी विनायकी, गणेश की ब्राह्मणी शक्ति है और तांत्रिक योगिनी तीन विशिष्ट देवियाँ हैं । एक स्वतंत्र देवी के रूप में, हाथीमुख देवी को जैन और बौद्ध परंपराओं में भी देखा जा सकता है । बौद्ध ग्रंथों में उन्हें गणपतिह्रदया कहा गया है । सबसे पहले ज्ञात हाथीमुख देवी की प्रतिमा रैढ़, राजस्थान में पाई गई । यह एक विकृत टैराकोटा फलक था जो पहली सदी बीसीई से लेकर पहली सदी सीई से संबंधित है । इस हाथीमुखी देवी की सूंड दाईं ओर मुड़ी है और उनके दो हाथ हैं । चूँकि उनके हाथों में प्रतीक और अन्य विशेषताएँ विकृत रूप में हैं, उन्हें देवी के रूप में अभिचिह्नित करना संभव नहीं है ।
हाथीमुखी देवी की अन्य मूर्तियाँ दसवीं सदी के बाद से पाई गईं हैं । विनायकी की एक सबसे प्रसिद्ध मूर्ति चौसठ योगिनी मंदिर, भेड़ाघाट, मध्य प्रदेश में इकतालिसवीं योगिनी के रूप में है । यहाँ इस देवी को श्री-ऐंगिनी कहा जाता है । यहाँ इस देवी के झुके हुए बाएँ पैर को एक हाथीमुखी पुरुष, संभवत: श्री गणेश ने सहारा दिया हुआ है । विनायकी की एक दुर्लभ धातु मूर्ति चित्रपूर मठ , शिराली में मिली है । वे गणेश की तरह नहीं, बल्कि इकहरी हैं । उन्होंने अपनी छाती पर यग्नोपवीत और गले में दो आभूषण पहना है । उनके हाथों में अभया और वरदा की मुद्राएँ बनी हैं । उनके दो कंधों पर तलवार और फंदा बना हुआ है । उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई है । यह प्रतिमा संभवत: उत्तरी-पश्चिमी भारत (गुजरात / राजस्थान) से 10वीं सदी की लगती है और तांत्रिक गणपत्य धारा (जो गणेश को सर्वोच्च भगवान मानते हैं) या वामाचार देवी की पूजा करने वाले शाक्त धारा से संबंधित लगती है ।
बिहार की पाला विनायकी भी तोंदयुक्त नहीं हैं । यह चार हाथों वाली देवी गदा, घटा, परशु और संभवत: मूली लिए हुए है । प्रतिहारा चित्र में तोंदयुक्त विनायकी को दर्शाया गया है जिसमें उनके चार हाथों में गदा-परशु, कमल, एक पहचान-रहित वस्तु और मोदकों की थाली है जिन्हें उनका सूंड उठा रहा है । दोनों चित्रों में, सूंड दाईं ओर मुड़ा हुआ है । क्षतिग्रस्त चार हाथों या दो हाथों की विनायकी की प्रतिमाएँ रानीपूर झारियल (ओड़ीसा), गुजरात और राजस्थान में भी पाईं गई हैं । सतना में प्राप्त एक दूसरी प्रतिमा में विनायकी पाँच पशुरूपी देवियों में एक हैं । बीच में गौमुखी योगिनी, वृषभा अपने हाथों में बाल गणेश लिए हुए है । विनायकी जिनकी प्रतिमा छोटी है, तोंद लिए हुए है और गणेश की तरह हाथ में अंकुश लिए हुए है । श्री बालसुब्रमण्या स्वामी मंदिर, चेरियनाड, अलापुझा, केरल में भी विनायकी की प्रतिमा मिलती है।
गणेश जी के जन्म से संबंधित एक कहानी में, हाथीमुखी असुर मालिनी, पार्वती जो गणेश की माँ हैं, के स्नान का पानी पीने के बाद गणेश को जन्म देती है । स्कंद पुराण में, धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी को शाप दिया जाता है कि उनका सिर हाथी के जैसे हो जाए, जिससे वह प्रायश्चित करते हुए भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर छुटकारा पाती हैं । इन्हें विनायकी नहीं कहा गया है और माँ (मालिनी) या उसके समरूप (कुछ प्रतिमाओं में लक्ष्मी) के रूप में गणेश से बहुत कम संबद्ध किया गया । हरिवंश, वायु पुराण और स्कंद पुराण में भी हाथी मुखी मात्रिका, ग्रह और गणों का वर्णन किया गया है जिनके गजानन, गजमुखी और गजस्य जैसे नाम हैं । इसके बावजूद, कृशन ने इन मात्रिकाओं को ज्येष्ठा, दुर्भाग्य की देवी जिन्हें हाथीमुखी बताया गया है, से जोड़ा है ।
मत्स्य पुराण में वे एक मात्रिका हैं जिन्हें गणेश जी के पिता भगवान शिव ने राक्षसी अंधका को पराजित करने के लिए सृजित किया था । इस प्रसंग में, उन्हें गणेशजी के बजाय, शिव की शक्ति के रूप में देखा जा सकता है । केवल उनका नाम "विनायकी" जिसका अर्थ "विनायक/गणेश से संबंधित" है, उनसे संबंधित होने का संकेत करता है । लिंग पुराण में भी, शक्तियों की सूची में उनका नाम है । अग्नि पुराण पहला पुराण है जिसमें गणेश की शक्तियों को सूचीबद्ध किया गया है, तथापि, विनायकी उनमें नहीं है, न ही उनमें से कोई गजमुखी है, लेकिन, इसी पुराण में चौसठ योगिनियों की सूची में विनायकी अवश्य हैं ।
बहरहाल, उप-पुराण देवी पुराण में गणेश की शक्ति के रूप में गणनायिका या विनायकी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है जिसमें उनके हाथीनुमा सिर और गणेश की तरह विघ्नों को दूर करने की क्षमता बताई गई है और उन्हें नौवीं मात्रिका के रूप में शामिल किया गया है । हांलाकि मूर्तियों और साहित्य में मात्रिकाओं की संख्या सात दर्शाई गई है, फिर भी पूर्वी भारत में नौ मात्रिकाएँ अधिक लोकप्रिय हैं । शास्त्रीय सात मात्रिकाओं के अलावा, आठवीं और नौंवी मात्रिका के रूप में क्रमश: महालक्ष्मी या योगेश्वरी और गणेशणी या गणेशा को शामिल किया गया है ।

मध्यकालीन नाटक गोरक्षसंहिता में विनायकी को गजमुखी, तोंदयुक्त, तीन आँखों और चार भुजाओं वाली देवी बताया गया है जिनके हाथ में परशु और मोडकों की थाली है । श्रीकुमार की सोलहवीं सदी की मूर्तिभंजक शोध प्रबंध पुस्तक शिल्परत्न में गणेश (गणपति) के स्त्री रूप का वर्णन है जिन्हें शक्ति-गणपति कहा गया गया है जो विंध्य में रहती थीं । इस देवी का सिर हाथी के जैसे था और उनके दो सूंड थे । उनका शरीर युवती का था, रंग सिंदूरी लाल था और दस भुजाएँ थीं । उनकी छोटी तोंद थी, स्तन विस्तारित थे और सुंदर श्रोणियाँ थीं । यह प्रतिमा संभवत: हिन्दू देवी की पूजा करने वाली धारा, शक्तिवाद से संबंधित थी । बहरहाल, दो सूंडों के कारण इस रूप को भी गणेश और उनकी शक्ति का संयोजन माना गया ।
बौद्ध साहित्य जिसे आर्यमंजुश्रीमुलकल्प कहा जाता है, में इस देवी को विनायक की सिद्धि कहा गया है । उनमें गणेश के कई अंतर्निहित अभिलक्षण हैं । गणेश की तरह, वे विघ्नों की दूर करती हैं, उनका सिर भी हाथी के जैसा है और एकदंत है । उन्हें भगवान शिव का एक रूप, भगवान ईशान की बेटी भी कहा गया है ।

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

बस्तर की माटी से जुड़ा कवि: डॉ राजाराम त्रिपाठी

भाषा की अन्य विधाओं की तरह कविता भी जगत को समझने का एक शक्तिशाली उपक्रम हैं, गद्य की अपेक्षा काव्य एवं उसमें निहीत तत्वों को साधारण मनुष्य भी सरलता एवं सहजता से समझ जाता है। क्योंकि कविताओं में रसाधिक्य होता है एवं भाव प्रधान होती हैं। कहीं पर कविता हास्य बोध उत्पन्न करती है तो कहीं पर सौंदर्य रसास्वादन करती नजर आती है। तो कहीं पर आक्रोश के साथ जोश भी प्रकट करती है। कविता मनुष्य के मन मस्तिष्क में चल रही उथल-पुथल और उसके भावों को समक्ष प्रकट करती है। कविता के माध्यम से चराचर में व्यक्ति अपने मनोभावों को प्रसारित करता है। कम शब्दों में अधिक बात कहने की क्षमता कविता ही प्रदान करती है। इसका अपना अनुशासन भी है।

मेरे समक्ष कोण्डागाँव निवासी डॉ.राजाराम त्रिपाठी का काव्य संग्रह "मैं बस्तर बोल रहा हूँ" है। बस्तर में जन्मे डॉ.राजाराम त्रिपाठी इस काव्य संग्रह के माध्यम से बस्तर की व्यथा कथा को समक्ष लेकर आते हैं। संग्रह में 27 कविताएं संकलित हैं। इस काव्य संग्रह की प्रतिनिधि कविता का शीर्षक ही काव्य संग्रह का शीर्षक है। प्रथम कविता हैं  - "हाँ मैं बस्तर बोल रहा हूँ/ अपने जलते जख्मों की कुछ परतें खोल रहा हूँ।" यह दो पंक्तियाँ चावल के उबले एक दाने के सामान बस्तर के यथार्थ से रुबरु कराने में सक्षम हैं। शोषण से उपजे हालातों पर आगे कहते हैं कि "बारुदों से भरी हैं सड़कें,  हरियाली, लाली में बदली, खारे हो चले सारे झरने।" श्रम का फ़ल तो मीठा होता है, फ़िर झरने खारे क्यों हो चले? बारुद की मचाई तबाही से इतने अधिक लोगों ने प्राण गंवा दिए कि मानवता के अश्रुजल से झरने भी खारे हो गए। कवि इन खारे झरनों में मिश्री की डली डाल कर पुन: मिठास लाना चाहता है।

बंदूकों की उगती फ़सल से ने बस्तर का सुख चैन छीन लिया कोयलें भी खामोश हो गई धमाकों के बीच। वर्तमान व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए अगली कविता कहती है " कुपोषण से देश मर रहा, सेठ बेचारा चूर्ण खाए, लँगोटी, रोटी को तरसे, सूट-बूट तंदूरी खाए।" यह व्यंग्य मिश्रित आक्रोश वर्तमान हालातों को सामने ला रहा है। बारुदे के धमाकों ने गांवों को कब्रिस्तान बना दिया। पर लोग अभी भी शोषण से बाज नहीं आ रहे। बारुद के धमाकों एवं सत्ता की गोलियों के बीच जीवन बचाना कठिन है। इस संग्रह में कवि सौंदर्य या इश्क मिजाजी की कविताएँ नहीं कहता। कवि भावुक होकर कहता है कि "कविता मेरे लिए, मात्र दु:खों की अभिव्यक्ति है/ कविता अगर बांसूरी की तान है/ तो मेरे लिए दिल के छेदों से निकली पुकार है।"

सरकारी आबंडरों से हलाकान सोमारु समाज का वह पात्र है जो हर गांव में पाया जाता है। सारी योजनाएं सोमारु को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं। पर योजना आने पर मसालों की गंध मुखिया के घर से उड़ती हुई सोमारु तक पहुंचती है। कविता "सोमारु की सुबह" का एक अंश हैं -"मुखिया के यहाँ से उठती है, मसालों की सुगंध! सोमारु फ़िर परेशान है। शाम  देर तक पिछवाड़े, लड़ते हैं कुत्ते झूठी पत्तलों पर।" कवि संकेतों के माध्यम यथार्थ बयान कर देता है कि शासकीय योजनाओं का क्या हश्र हो रहा है।

संग्रह की प्रत्येक कविता में बस्तर ही समाया हुआ है। कवि, इस कालखंड को अपने काव्य के माध्यम से समय की किताब के पन्नों में दर्ज कर रहा है। बस्तर की नक्सल समस्या से प्रत्येक बस्तरिहा निजात पाना चाहता है, साथ ही प्रश्न भी करता है "फ़ैसला लेना होगा अब, ये चलेगा कब तक, बस्तर की छाती पर मूँग दलोगे कब तक? फ़िर कवि पूछता है "मुझे मेरा बस्तर कब लौटा रहे हो? वापस ले लो अपनी नियामतें, उठा ले जाओ चाहे, अपनी सड़कें, खम्भे, दुकानें। उठा ले जाओ चाहे, बिना सांकल के बालिका श्रम, बिना डाक्टर के अस्पताल, बिना गुरुजी के स्कूल, बंद कर दो चाहे भीख की रसद, ये सस्ता चावल, चना, नमक की नौटकीं।" मेरा बस्तर मुझे लौटा दो।

"बस्तर के सप्तसुर" कविता में बस्तर के साहित्य शिल्पी लाला जगदलपुरी को श्रद्धांजलि अर्पित है। काव्य संग्रह की अन्य कविताएँ भी पाठक के मन पर अपना गहरा असर छोड़ती हुई प्रतीत होती हैं। डॉ राजाराम त्रिपाठी कवि के रुप में शब्द जाल नहीं बुनते पर उनकी नई कविताएं सहज एवं सपाट रुप से बस्तर के दर्द, दुख, व्यथा को मुखर करने में सक्षम है। जब कविता में भाव प्रधान होता है तो शिल्प गौण हो जाता है। डॉ त्रिपाठी विशुद्ध अपनी शैली में शब्द बिंब गढते हैं और कविताएँ चित्र रुप में चलचित्र सी दृश्यांकन प्रस्तुत करती प्रतीत होती हैं। अवश्य ही आगे चलकर बस्तर का यह कवि अपनी कविताओं के माध्यम से साहित्य फ़लक पर दैदिप्यमान होने की उर्जा रखता है।

प्रकाशक: छत्तीसगढ़ साहित्य परिषद (कोण्डागाँव) बस्तर
रचनाकार : डॉ राजाराम त्रिपाठी
मूल्य: 80/- रुपए
पृष्ठ: 52
पता: 151 हर्बल स्टेट, डी, एन के, कोण्डागाँव - बस्तर (छ ग)

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

बारुद के धमाकों के बीच संस्कृति को बनाए रखने का प्रयास : मुलमुला


मुलमुला! हां यही नाम लिया अनुज ने। मुलमुला चलना है भैया 21 दिसम्बर को वहां "अनुज नाईट" का आयोजन है। छत्तीसगढ़ी फ़िल्म स्टार अनुज शर्मा ने फ़ोन पर निमंत्रण दिया। मुलमुला गाँव का नाम मैने पहले भी सुना था। यह गाँव अकलतरा क्षेत्र में है। अनुज शर्मा ने बताया कि हमें जिस मुलमुला जाना है वह कोण्डागाँव (बस्तर अंचल) से लगभग 17 किलोमीटर की दूरी पर है। मेरे घर से कोण्डागाँव तक का सफ़र लगभग 4 घंटे का है. कोण्डागाँव निवासी साहित्यकार एवं ब्लॉगर हरिहर वैष्णव जी से मिलने एवं चर्चा करने का लोभ भी मेरे मन में उत्पन्न हो रहा था। उन्हे फ़ोन लगा कर कोण्डागाँव आने की सूचना दी। उन्होने कहा कि वे भी हमारे साथ मुलमुला चलेगें। चलो ये भी सोने में सुहागा हो गया। अब काफ़ी समय मिलेगा चर्चा करने के लिए। 
बस के यात्री
दोपहर अनुज का फ़ोन आने के बाद मैं तैयार था अनुज शर्मा नाईट की टीम के साथ सफ़र करने को। सड़क पर आकर देखा तो बड़ी लक्जरी बस दिखाई दी। प्रवेश करने पर उसमें अनुज की सारी टीम अपने साज-ओ-समान के साथ मौजूद थी। अब मैं भी इनकी टीम का हिस्सा बन चुका था। अनुज को छोड़ कर बाकी चेहरे मेरे लिए अनजान थे। ऐसी स्थिति में मुझे पुस्तकों की  याद आई। होता तो यही है किसी से प्रथम मिलने के पहले वे अनजान ही होते हैं। मिलने पर जानपहचान के साथ स्वभावानुसार मित्रता होती है। सफ़र के दौरान समय काटने का सर्व प्रचलित साधन बावनपरी को माना जाता है। 
अनुज नाईट - मुलमुला
चाहे रेलगाड़ी के दैनिक यात्री  हों या फ़िर बस के लम्बे सफ़र के यात्री। जेब से ताश  की गड्डी निकालने के बाद खिलाड़ी मिल ही जाते हैं। चाहे वे किसी अन्य प्रांत के भी निवासी हों। हमारी बस में भी यही चल रहा था। ताश के कुछ खेल पूरे भारत में खेले जाते हैं भले ही उन्हे अन्य नामों से पुकारा जाता हो। एक दो बाजी देखने के बाद समझ में आ जाता है कि कैसे खेला जा रहा है और इस खेल के क्या नियम हैं। मुझे याद नहीं कि मैने कब ताश खेली होगी क्योंकि ताश के लिए समय नहीं मिल पाता और इतने निठल्ले लोग भी नहीं मिल पाते जिनके साथ ताश खेली जा सके। आज मैं कुछ घंटों के लिए निठल्ला ही था। मैं भी ताश युद्ध में सम्मिलित हो गया। दोपहर का भोजन गुरुर की पुलिया के दाएं तरफ़ बने ढाबे में था।
बोरियों पर जमे दर्शक
लगभग 25-30 लोगों को एक साथ भोजन कराने में ढाबे वाले को अच्छी कवायद करनी पड़ती है। साथ ही एक फ़ायदा भी रहता है कि पुराना-धुराना जितनी भी सब्जी-दाल इत्यादि सामग्री है वह भी खप जाती है। अगर दाल कम पड़ गयी तो थोड़ा पानी डालकर नमक मिर्च का तड़का लगा कर बढाई जा सकती  है। भोजनोपरांत हम आगे चल पड़े। केसकाल घाट पार करने के बाद मैंने हरिहर वैष्णव जी को फ़ोन लगाया तो उन्होंने सभी को चाय का निमंत्रण दिया। लेकिन साथ चलने के वादे से मुकर गए। यह एक झटका ही था मेरे लिए। कोण्डागाँव के आगे चलकर जगदलपुर मार्ग पर पर्यटन विभाग के रिसोर्ट में चाय नास्ते का इतंजाम था बस को रवाना कर दिया गया, उसमें सांउड लाईट का सारा सामान था। हमारे पहुंचने से पहले साऊंड लाईट सब तैयार हो जानी थी और हमें छोटी गाड़ियों से हमें मुलमुला जाना था।
अनुज शर्मा का गायन
हम 10 बजे मुलमुला के लिए चले। रास्ते में मोटर सायकिलों पर तीन-तीन, चार-चार सवारियाँ एवं जिसको जो भी साधन मिला वह उसी से अनुज शर्मा नाईट का आनंद लेने के लिए मुलमुला की ओर जा रहे थे। कार्यक्रम स्थल पर पहुचने पर देखा कि ठंड के मौसम में खुले आसमान के नीचे नर-नारियों की भीड़ देख कर आश्चर्य में पड़ गया। सभी बेसब्री से कार्यक्रम प्रारंभ होने का इंतजार कर रहे थे। जब दर्शक मनोयोग से कार्यक्रम देखना-सुनना चाहे तो कलाकार को प्रस्तुतीकरण में आनंद आता  है। अनुज शर्मा नाईट के मैनेजर एम के गुप्ता मुस्तैदी से कार्य में लगे हुए थे। इस उम्र में उनकी उर्जा देखते ही बनती है। लगभग 11 बजे हीरो की एन्ट्री के साथ दर्शकों  में कौतुहल जागता है। मंच पर आक्टोपेड पर नरेन्द्र, ढोलक पर डॉ एस के लाहोर एवं बिक्कु, आर्गन पर यदुनंदन एवं नवनीत के साथ साऊंड लाईट की व्यवस्था मनोज साऊंड द्वारा हो चुकी थी।
ज्ञानिता द्विवेदी का प्रस्तुतिकरण
मुझे जानकारी नहीं थी अनुज अभिनय के साथ गाते भी हैं। उन्होने दर्शकों को अपने गीतों से बांध लिया। सहयोगी गायकों के रुप में अनुराग शर्मा एवं ज्ञानिता द्विवेदी ने मनमोहक प्रदर्शन किया। महिला बाल विकास मंत्री लता उसेंडी ने कार्यक्रम में उपस्थित होकर सभी को दियारी तिहार की बधाई दी। कार्यक्रम स्थल पर प्रशासन द्वारा सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गयी थी। 11 बजे रात्रि से प्रारंभ हुआ कार्यक्रम विद्युत बाधा के साथ सतत 2 बजे तक चलता रहा। दर्शक रात भर सुनना चाहते थे। लेकिन वे क्या जाने कि अनुज शर्मा नाईट सिर्फ़ 3 घंटे की होती है। साजिदों ने सामान समेट लिए। लेकिन दर्शक अभी तक अपनी बोरियों पर जमें थे। इस कार्यक्रम में अनुज को सुनने के लिए 50-50 किलो मीटर से भी दर्शक आए थे।
दर्शकों की भीड़
दीवाली त्यौहार बीतने के एक माह के बाद मनाए जाने वाले दियारी तिहार के विषय में मेरी जानने की उत्सुकता थी। हरिहर वैष्णव जी ने बताया कि दियारी तिहार बस्तर अंचल का प्रसिद्ध तिहार है। जिस तरह हम दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा करते हैं उसी तरह बस्तर अंचल में पूष एवं माघ के महीने में कृषि कार्य से निवृत्त होने पर स्थानीय निवासी प्रत्यके ग्राम समूह में दियारी तिहार का उत्सव मनाते हैं। प्रत्येक गाँव में तिहार मनाने का दिन निश्चित होता है और निश्चित दिन ही मनाया जाता है।

अनुज नाईट की टीम
इस तिहार में ग्राम वासी अपने निकट संबंधियों एवं मित्रों को निमंत्रित करते हैं और सबकी उपस्थिति में उल्लासपूर्ण ढंग से पूजा पाठ कर दियारी उत्सव को मनाया जाता है। जिस दिन तिहार मनाना निश्चित होता है उसकी पूर्व रात्रि को चरवाहा (यहाँ पशु चराने का कार्य (गांदा) गाड़ा जाति करती है) ग्राम के प्रत्येक घर में जाकर पशुओं को "जेठा" (सोहाई) बांधता है। जेठा बांधने आए हुए चरवाहे का सम्मान द्वार पर आरती उतार कर किया जाता है।
जरा नच के दिखा
इसके पश्चात अगले दिन सभी पशुओं को नहला कर पूजा की जाती है तथा विभिन्न तरह की सब्जियों एवं अनाज से तैयार खिचड़ी खिलाई जाती है। तत्पश्चात इस खिचड़ी को तिहार के प्रसाद के रुप में गृह स्वामी एवं परिजन ग्रहण करते हैं। चावल के आटे से घर की दुआरी में पद चिन्ह बनाए जाते हैं। जो लक्ष्मी के आगमन का सूचक होता है। इसके बाद गोवर्धन भाटा में गांव का बुजुर्ग एक बैल पर सिंगोठा (सिंगबांधा) बांध कर दौड़ाता है  जिसे चरवाहे को पकड़ना होता है। अगर चरवाहा बैल  को पकड़ लेता है तो उसे पुरस्कार दिया जाता है यदि चरवाहा बैल को नहीं पकड़ पाता तो उसे दंड दिया जाता है। 
दियारी तिहार के गाड़ा गाड़ा बधई
मैदान में एक स्थान पर चरवाहे की पत्नी दीया जलाकर बैठती है, यहां पर ग्राम वासी उसे दक्षिणा स्वरुप अन्न-धन देते हैं। (बैल पकड़ने की प्रथा विवाद होने के कारण वर्तमान में कई गांवों में बंद करा दी गई है। सिर्फ़ परम्पराओं का ही निर्वहन किया जाता है। अत: दियारी तिहार को मैं कृषि से जुड़ा हुआ त्यौहार ही मानता हूं। रात तीन बजे रिसोर्ट में पहुंच कर भोजन किया। भोजनोपरांत अपने गंतव्य की ओर लौट चले दियारी तिहार मना कर…… बंदुक की गोलियों एवं बम के धमाकों के बीच परम्पराओं को निभाने की जद्दोजहद जारी है बस्तर अंचल में ………। 

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

मोटल पंडवानी ----Motel Pandwani----- ललित शर्मा

पंडवानी मोटल का खूबसूरत दृश्य
छत्तीसगढ़ अंचल पर्यटन की दृष्टि से सम्पन्न राज्य है। यहाँ हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, लहराती बलखाती नदियाँ, गरजते जल प्रपात, पुरासम्पदाएं, प्राचीन एतिहासिक स्थल, अभ्यारण्य, गुफ़ाएं-कंदराएं, प्रागैतिहासिक काल के भित्ती चित्रों के साथ और भी बहुत कुछ है देखने को, जो पर्यटकों का मन मोह लेता है। यहाँ की धरा किसी स्वर्ग से कम नहीं है। वनों से आच्छादित धरती पर रंग बिरंगी तितलियों के साथ शेर की दहाड़ एवं हाथियों की चिंघाड़ भी सुनने मिलती है। मन करता है कि कभी इस पावन भूमि को अपने कदमों से चलकर उसका एक-एक इंच भाग के दर्शन कर लूँ, यहाँ के नजारे अपनी आँखों में संजो लूँ। न जाने फ़िर कभी किसी जन्म में देखना संभव हो भी या नहीं। मेरे जैसे घुमक्कड़ को ऐसे ही स्थान पसंद आते हैं। मैं हमेशा प्रकृति के समीप ही रहना पसंद करता हूँ क्योंकि प्रकृति ही मुझे आगे चलने के लिए उर्जा प्रदान करती है। प्रकृति के नजारों का आनंद ही मेरी यायावरी का ईंधन है।

सुसज्जित शयन कक्ष
छत्तीसगढ नया राज्य है, इसका निर्माण हुए 11 वर्ष ही हुए हैं। इतने कम समय में सरकार के पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा की दृष्टि से बहुत कार्य किए हैं। इन कार्यों में प्रमुख हैं पर्यटन स्थलों के समीप प्राकृतिक वातावरण में मोटल एवं रिसोर्ट का निर्माण। पूर्व में छत्तीसगढ अंचल में पर्यटन करने पर ठहरने और खाने के लिए ग्रामीण होटलों का सहारा लेना पड़ता था। स्थान-स्थान पर अंग्रेजों के बनाए विश्राम गृह तो है, पर वे मध्यप्रदेश के जमाने से लोकनिर्माण विभाग के अधीन हैं और पर्यटक जब रात को थका हारा विश्राम करने लिए यहाँ पहुंचता था तो पहले किसी अन्य नाम से यहाँ से कमरे बुक मिलते थे। भले ही कोई वहाँ रहने के लिए रात भर नही आए, परन्तु सरकारी आरक्षण तो आरक्षण होता है। ऐसी दशा से निपटने के लिए पर्यटकों को सुविधा देने की दृष्टि से पर्यटन स्थलों पर मोटलों एवं रिसोर्ट्स का निर्माण पर्यटन विभाग द्वारा किया गया। लगभग सभी पर्यटन स्थलों पर मोटल या रिसोर्ट हैं। जहाँ ठहरने के साथ भोजन की उत्तम सुविधा भी उपलब्ध है। कुछ विश्राम गृह भी लोकनिर्माण विभाग ने पर्यटन मंडल को हस्तांतरित किए हैं।

सुव्यवस्थित रसोई घर
पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न पर्यटन स्थलों पर 21 मोटलो का निर्माण किया है। जहाँ भोजन के साथ ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। ऐसा ही एक मोटल रायपुर-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर ग्राम केन्द्री (अभनपुर) के समीप निर्मित हुआ है। इस मोटल का नाम छतीसगढ की प्रसिद्ध काव्य लोक गाथा पंडवानी पर रखा गया है। पंडवानी मोटल रायपुर से 22 किलोमीटर अभनपुर से 5 किलोमीटर और नवीन राजधानी से अधिकतम 5 किलोमीटर पर स्थित है। पंडवानी मोटल को केन्द्र में रख कर अगर हम समीपस्थ पर्यटन स्थलों पर गौर करें तो राजिम लोचन मंदिर 23 किलोमीटर, प्रसिद्ध तीर्थ बल्लभाचार्य की जन्म भूमि चम्पारण 23 किलोमीटर, छत्तीसगढ की सांस्कृतिक झलक पुरखौती मुक्तांगन 3 किलोमीटर, एयरपोर्ट 7 किलोमीटर, नवीन क्रिकेट स्टेडियम 10 किलोमीटर, प्रस्तावित टायगर सफ़ारी 3 किलोमीटर एवं नैरोगेज का रेल्वे स्टेशन केन्द्री में आधे किलोमीटर पर स्थित है।

रेस्टोरेंट से बाहर का नजारा
राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप होने से यहाँ से यात्रा के साधन बस, टैक्सियाँ हमेशा उपलब्ध हैं। रात को ही अगर कहीं अचानक जाना पड़े तो आवा-गमन के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं। पंडवानी मोटल से 2 किलोमीटर पर छत्तीसगढ की महत्वाकांक्षीं सिंचाई परियोजना "महानदी उद्वहन सिंचाई परियोजना ग्राम झांकी" स्थित है। परियोजना स्थल की ऊँचाई समुद्र तल 324.25 मीटर है। इसका निर्माण 1978 में हुआ था। उस समय यह एशिया की पहली उद्वहन सिंचाई परियोजना थी। मोटल के समीप होने से इस स्थान का भ्रमण किया जा सकता है। महानदी यहाँ से 16 किलोमीटर पर प्रवाहित होती है। इसके तीर पर बसे पद्म क्षेत्र राजिम की मान्यता विश्व भर में है। राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष यहाँ पर राजिम कुंभ उत्सव मनाया जाता है। जिसमें देश-विदेश के पर्यटक आते हैं। माघ मास की पूर्णिमा से लेकर शिवरात्रि तक चलने वाले इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया जा सकता है।

विशाल हॉल
पंडवानी मोटल में पर्यटकों सुविधाओं की दृष्टि से ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। साफ़-सुथरे एसी और नान एसी रुम हैं। रुम के अलावा एसी डोरमैट्री भी उपलब्ध है। जेब जितना खर्च करना चाहे उतने खर्चे में ही मोटल में ठहरने का लाभ उठाया जा सकता है। लगभग 5 एकड़ में बगीचा लगा हुआ है, जिसमें बच्चों के मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। एक कृत्रिम गुफ़ा के साथ ही स्वीमिंग पूल की व्यवस्था भी है। स्नान के लिए गर्म पानी और खाने के लिए साफ़ सुथरा शाकाहारी रेस्टोरेंट भी है, अन्य होटलों की तरह किचन में मुझे गंदगी नहीं दिखाई दी। साफ़ सुथरा रसोई घर होने से उत्तम भोजन मिलने की संभावना रहती है। पंडवानी मोटल में "बार" की सुविधा नहीं है और न ही यहाँ मांसाहारी भोजन मिलता है। रुम सर्विस के लिए पर्याप्त स्टॉफ़ की व्यवस्था है। घर से दूर शांत वातावरण में रह कर आस-पास के पर्यटन स्थलों की सैर करने की दृष्टि से यह स्थान उत्तम है। पर्यटन विभाग ने मोटल का संचालन निजी हाथों में दे रखा है, इसलिए पर्यटकों को अच्छी सेवा मिलने की उम्मीद की जा सकती है।  

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

भई, कार्यक्रम हो तो ऐसा ----- ललित शर्मा

ई अब तो लिखना ही पड़ेगा कि कार्यक्रम हो तो ऐसा! अनिल पुसदकर ने एक महीने पहले फ़ोन कर के बताया कि उनकी कृति "क्यों जाऊं बस्तर? मरने! का विमोचन 31 मार्च को होना है, साथ ही यह भी कहा कि "31 मार्च को कहीं दूसरी जगह का कार्यक्रम न बनाना और कार्यक्रम में उपस्थित होना है। मैं निमंत्रण पत्र भिजवा रहा हूँ। मैने कहा कि - निमंत्रण पत्र की आवश्यकता नहीं है, आपका फ़ोन ही काफ़ी है। मैं समय पर पहुंच जाऊंगा। उसके बाद अनिल भाई भी व्यस्त हो गए विमोचन के इंतजाम में और हम भी अपनी निठल्लाई में लग गए। अनिल भाई से लगाव तो सदा से ही रहा है। उनकी साफ़गोई पसंद आती है। मन भेद कभी रहा नहीं।

पुस्तक विमोचन का प्रचार कार्य जोरों पर चल रहा था। 31 मार्च 2012 का वह दिन भी आ गया। पुस्तक के प्रकाशक सुधीर शर्मा जी का भी मैसेज आया था कि यह उनके प्रकाशन की 300 वीं पुस्तक है जरुर आना है। हम दोपहर 12 बजे ही पंहुच गए, भई कार्यक्रम अपना ही था, इसलिए जल्दी भी पहुंचना जरुरी था। पुस्तक का विमोचन छत्तीसगढ के यशस्वी मुंख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के हाथों होना था। स्थान मेडिकल कॉलेज का सभागृह था। पुस्तक विमोचन कार्यक्रम 4 बजे होना था। हम (राहुल सिंह, जी के अवधिया, राकेश तिवारी, अरुणेश दवे) भी मेडिकल कॉलेज 4 बजे ही पंहुच गए। पंहुचते ही अनिल भाई मिले और हमने उन्हे शुभकामनाएं दी। व्यस्तता के बीच उन्होने हमें समय दिया। हमने अपना स्थान ग्रहण किया।

थोड़ी ही देर मे सभागृह खचाखच भर चुका था। नेता, अभिनेता, अधिकारी, कर्मचारी, आम नागरिक, खास नागरिक, डॉक्टर्स, यार दोस्त सभी, याने छोटे बड़े हर तबके से लोग पहुंच चुके थे। जितने लोग भीतर बैठे थे उतने ही बाहर खड़े थे। ऐसा वृहद और गरिमामय पुस्तक विमोचन समारोह मैने पहली बार देखा। यह सब अनिल भाई के व्यक्तिगत संबंधों का प्रताप था। उपस्थित जनों को देखकर इनके सामाजिक संबंधों के दायरे का पता चलता है। सभी लोगों से सहज भाव से मिलना और उसे आत्मीयता का अहसास करा देना अनिल भाई की खूबी है। जिसका परिचय कार्यक्रम में उपस्थिति से पता चलता है।

अनिल भाई के बचपन एवं स्कूल-कॉलेज के मित्रों ने मोर्चा संभाल रखा था। कार्यक्रम के मुख्यातिथि छत्तीसगढ के यशस्वी मुंख्यमंत्री डॉ रमन सिंह, मुख्य वक्ता राज्यसभा सदस्य तरुण विजय थे एवं विशेष अतिथि बस्तर के आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा थे। कार्यक्रम 2 घंटे विलंब से शुरु हुआ। उपस्थित महानुभावों के द्वारा पुस्तक का विमोचन किया गया तथा पुस्तक पर चर्चा हुई।

मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि इस कार्यक्रम में आने के लिए कई लोगों ने मुझे मना किया। मुख्यमंत्री ने कहा यह कोई सरकारी आयोजन नहीं है। एक पत्रकार का आयोजन है इसलिये मैं यहां आया। उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूं ऐसे कार्यक्रम जगह-जगह आयोजित हो , स्वस्थ्य बहस हो और नक्सल समस्या का शीघ्र समाधान निकले। शीर्षक और मुद्दे पर कम चर्चा हुई, किन्तु अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर उन्होंने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई बडी़ बात नहीं है। सरकार ने नियम बना दिये हैं कि शहीद के परिजनों को तब तक पूरा वेतन दिया जायेगा, जब तक शहीद की उम्र रिटायर्ड तक पूरी नहीं हो जाती।

कार्यक्रम में महेन्द्र कर्मा ने कहा कि नक्सल समस्या अब अकेले कांग्रेस या भाजपा या फिर किसी एक पार्टी के बस की बात नहीं है। सबको मिलकर इसका समाधान खोजना होगा। सरकार को दांव पर भी लगाना पड़ सकता है। विशेष यह था कि अनिल भाई ने पुस्तक के कुछ अंश को पॉडकास्ट भी किया। गंभीर आवाज में पुस्तक का वाचन बहुत अच्छे ढंग से किया गया। अनिल भाई को मेरी तरफ़ से एक बार पुन: बधाई एवं शुभकामनाएं। ये सच है कि ऐसा पुस्तक विमोचन कार्यक्रम मैने कभी देखा नहीं।     

रविवार, 8 जनवरी 2012

बचा लो भगवान, बचा लो, बस्तर यात्रा की समापन किश्त -- ललित शर्मा

ढोकरा कला कृतियाँ
प्रारंभ से पढें
यदेव जी के घर से निकले ही थे कि बहन का फ़ोन आ गया। उसने बताया कि खाना बनकर तैयार है विलंब न करें। दो शिल्प खरीदे गए थे, बिजली न होने के कारण उन पर पालिश नहीं हो पाई, जयदेव जी के पुत्र ने पालिश के लिए बिजली आने का इंतजार करने कहा। तब तक हमने भोजन करना ही जरुरी समझा। बहन के घर पहुंचे, वह बेताबी से इंतजार कर रही थी। बहनोई मनोज जी भी मधुप रस लाकर तैयार थे। उन्हे दो दिन पहले ही आर्डर कर दिया था। थोड़ा स्वाद चख कर भोजन किया। कोण्डागाँव में हरिहर वैष्णव जी रहते हैं। इन्होने हल्बी भाषा पर बहुत काम किया है। अभी बस्तर के परम्परागत संगीत पर कार्य कर रहे हैं। इनसे भी मिलना था, कर्ण जयदेव जी के यहां गया और मैं और मनोज जी, हरिहर वैष्णव जी के घर। इनका घर सरगी पाल मोहल्ले में है। मनोज जी को घर का पता था इसलिए सीधे इनके घर ही पहुंच गए।

श्री हरिहर वैष्णव जी
फ़ोन लगाने पर उनका बालक बाहर निकला। हमें बैठक में बिठाया, थोड़ी देर में हरिहर वैष्णव जी पटका पहने उपस्थित हो चुके थे। मेरी उनसे पहली भेंट थी। चलभाष पर चर्चा तो होते रहती है पर रुबरु अभी ही हुए। इन्होने 12 किताबें बस्तर पर लिखी हैं, और विदेशी शोध कर्ता इनके सम्पर्क में रहते थे। मैने इन्हे "मोहनी" को लेकर फ़ोन किया था। अगर कोई मोहनी बनाने वाला मिले तो उसके विषय में कुछ सत्यान्वेषण किया जाए। मोहनी के विषय में चर्चा करने वे ठठा कर हँस पड़ते हैं। बोले कि - एक व्यक्ति मेरे साथ काम करता है। उसने पूछा किसके लिए बनाना है? तो मैने उसे टाल दिया। मैने कहा कि कभी समय मिला तो उनसे सम्पर्क करेगें। "मोहनी" के विषय में बचपन से सुनता आया हूँ लेकिन जिज्ञासा अभी तक शांत नहीं हुई है। अभी तक इसकी खोज में हूँ। कहीं उचित माध्यम मिले तो बताऊंगा। छत्तीसगढी का गीत भी है "का तैं मोला मोहनी डार दिए गोंदा फ़ूल" और भी कई गीत मोहनी को लेकर रचे गए हैं।

दंतेवाड़ा मंदिर में फ़ोटो ग्राफ़र का कलर प्रिंटर
नेट के विषय में वैष्णव जी से चर्चा होती है कि वे अपने काम को ऑन लाईन करें, जिससे उनका काम दुनिया तक पहुंचे।  वे कहते हैं कि - मैं वन विभाग में एकाऊंटेंट था, सेवानिवृति के 4 वर्ष पूर्व ही वी आर एस ले लिया। वी आर एस लेने का कारण यह था कि मेरे पास शोध कार्य के लिए समय कम है और काम अधिक है। नौकरी में रहते हुए इस कार्य को नहीं कर सकता था। इसलिए मुझे वी आर एस लेना पड़ा। उनके पास कम्पयुटर एवं नेट की सुविधा है, वे अपना लेखन कार्य कम्पयुटर पर ही करते हैं। छोटी सी मुलाकात के दौरान दो बार साथियों के फ़ोन आ जाते हैं कि अब चलना चाहिए। मैं उनसे इजाजत लेता हूँ तो वे चाय का आग्रह करते हैं। मैं चाय के लिए मना करता हूँ, लेकिन वे नहीं मानते। तो लाल चाय बनाने के लिए कहता हूँ। थोड़ी देर में लाल चाय बन कर आ जाती है। चाय पीकर हम उनसे विदा लेते हैं, वे आग्रह करते है दुबारा भेंट के लिए। हम चल पड़ते है।

बहन के घर पर पहुंचकर देखता हूँ कि जाने की सब तैयारी हो चुकी है। बहन बार-बार मेरे दोहरे से इकहरे होने का राज जानना चाहती है। मैं कहता हूँ राज को राज ही रहने दो तो ठीक है। फ़िर आने का आश्वासन देकर वहाँ से चल पड़ते हैं। बारिश फ़िर शुरु हो चुकी है। चित्रकूट आते हुए भीगे होने के कारण हमने गाड़ी के काँच बंद कर लिए थे तो सांसों की भाप से विंड स्क्रीन के अंदर की तरफ़ भाप जम जाती थी। उसे लगातार साफ़ करना पड़ता था। हीटर चलाने पर और बढ जाती थी। आज हमने काँच खुले रखे, इससे विंड स्क्रीन पर भाप नहीं जमी। जगदपुर के रास्ते में कोण्डागाँव से केसकाल के बीच में कुछ वृक्ष सड़क के किनारे ही हैं। एक दम डामर रोड़ से सटे हुए। मैने कई वृक्षों पर दुर्घटना के चिन्ह देखे। अगर आपने अपनी लैन थोड़ी सी भी छोड़ी तो इन वृक्षों से टकरा कर दुर्घटना ग्रस्त हो सकते हैं। मैने इस मार्ग पर पेड़ों से टकरा कर कई गाड़ियाँ दुर्घटना ग्रस्त होते देखी है। इस रास्ते पर गाड़ी संभाल के ही ड्राईव करनी पड़ती है।

पुन: केसकाल घाट पहुंचते है, बादलों और बारिश के कारण दिन ढलने का पता ही नहीं चल रहा। धीरे-धीरे घाट से गाड़ी उतारते हैं। कर्ण को बताते जा रहा हूँ कैसे चलना है और घाट पर गाड़ी कैसे उतारना है। घाट पार करके हम कांकेर पहुंचते है, फ़िर वही बायपास पकड़ लेते है। शहर के बीच नहीं जाना पड़ता। पिछली बार जब बरसात के समय कांकेर आया था तो नदी के पुल पर भीड़ लगी थी। देखने के लिए रुका तो नदी में अठखेलियाँ करता एक बड़ा अजगर साँप दिखाई दिया। इतना बड़ा अजगर मैने अपनी आँखों से नहीं देखा था। वह कभी नदी के इस किनारे पर जाता कभी उस किनारे पर। थोड़ी देर बाद मैं आगे बढ लिया। लेकिन दूसरे दिन नई दुनिया समाचार पत्र में उसकी फ़ोटो और समाचार छपा था। वन विभाग वालों ने बड़ी मशक्कत से उसे पकड़ा था। कांकेर से आगे माकड़ी ढाबे में पुन: खीर खाने की योजना बन जाती है। लेकिन मैं खीर की बजाए सिर्फ़ चाय ही लेता हूं। क्योंकि मेरी भी जासूसी हो रही है जासूसों द्वारा। मीठा नहीं खाना चाहिए। चाहे हमारे जासूस रोज हलवा खाएं चोरी छुपे।

श्री एवं श्रीमती विनोद चौहान
कांकेर से चारामा के आगे छोटा सा घाट पड़ता है। अंधेरा हो चुका था, गाड़ी की लाईटें रोशन कर ली गयी। मैं मोनु से ब्लूटूथ पर कुछ फ़ोटुंए मांग रहा था। सुबह से कर्ण ही गाड़ी चला रहा था। उसके पापा मम्मी पीछे बैठे थे और मैं उसकी बगल में सामने। चाराम घाट का मुझे ध्यान नहीं रहा। जगदलपुर से घाट शुरु होते ही घाट के पहले मोड़ को चौड़ा कर दिया गया है और उसके बीच में सीमेंट के ब्लॉक रख कर डिवाईडर बना दिया गया। अचानक गाड़ी डिवाईडर पर चढते दिखाई देती है। पीछे से मोनु की आवाज आती है "बचा लो भगवान, बचा लो भगवान।" गाड़ी डिवाईडर पर चढ गयी लेकिन थोड़ी देर में संभलने के बाद एक जगह के निकले हुए ब्लॉक से फ़िर रास्ते पर आ गयी। कर्ण के होश गुम हो चुके थे। गाड़ी साईड में रुकवा कर मैने टार्च से गाड़ी के नीचे देखा। सामने से चेचिस तगड़ी रगड़ खा गया था। दाहिने तरफ़ की लाईट बंद हो गयी थी। अभी पता न था कि गाड़ी चलने की स्थिति में है या नहीं। थोड़ी देर गाड़ी को अच्छे से देखा, तभी छोटे भाई का फ़ोन आया। उसने हाल चाल पूछा और कहा कि -मैने सोचा आप गाड़ी ड्राईव कर रहे होगें इसलिए फ़ोन नहीं किया।

उदय नयी यूनिफ़ार्म में
अब चौहान जी ने गाड़ी संभाली, धीरे-धीरे गाड़ी चलाते हुए बातें शुरु हो गयी। चौहान जी एक बात अपने बेटे से कही - दुर्घटनाएं सीख देती हैं। अब तुम बिना कहे की संभल कर चलोगे। सही है जब तक स्वयं गड्ढे में न गिरे तब तक गड्ढे का पता नहीं चलता। घर फ़ोन करके खाने की सूचना दी, हम लगभग 9 बजे घर पहुंचे। बच्चों को एक साल बाद देखते ही रौनक आ गयी। सभी को नव वर्ष की शुभकामनाएं दी, उदय ने पूछा कि उसकी स्कूल यूनिफ़ार्म सिली की नहीं? हा हा हा जिस दर्जी को उसकी यूनिफ़ार्म दी गयी है। लगता है वह एक साल में सिल कर लाएगा। मैने उसे आश्वासन दिया कि 2012 में पक्की सिल जाएगी। अभी तो तुम्हारे पास है ही काम चलाने के लिए। भोजनोपरांत चौहान जी का कारवां आगे बढ गया और बच्चों के साथ मशगुल हो गए। मैं सोच रहा था कि दर्जी के लिए कौन सा फ़ार्मुला फ़िट किया जाए जिससे वह उदय की स्कूल यूनिफ़ार्म सिल कर ले आए। आखिर कपड़े दिए 4 महीने हो गए, हद है भाई..................

शनिवार, 7 जनवरी 2012

शिल्पगुरु डॉ जयदेव बघेल :- नाम ही काफ़ी है ------- ललित शर्मा

जयदेव बघेल जी के घर (चित्र राहुल सिह जी के सौजन्य से)
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स्तर, भानपुरी से चल कर हम कोण्डा गाँव पहुंचते हैं, नाके के पास गाड़ी रोक कर एक पान वाले से जय देव बघेल जी का घर पूछते हैं। तो वह कहता है कि सीधे हाथ की तरफ़ जो रास्ता जा रहा है उस पर चले जाईए। उनके नाम का बोर्ड लगा है। हम रास्ते पर आगे बढते हैं, गली में दोनो तरफ़ टेराकोटा के बने हुए शिल्प रखे हुए दिखते हैं। एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर अंगेजी में Dr. Jaydev Baghel लिखा दिखाई देता है, साथ उन्हे प्राप्त सम्मान भी लिखे हैं। सीमेंट की चार दीवारी पर टेराकोटा एवं पत्थर से बनी विभिन्न आकृतियाँ लगी दिखाई देती हैं। घर देखने से ही लगता है कि यह किसी शिल्पकार का घर है। गाड़ी की आवाज सुनकर नीले रंग के पेंट से पुता हुआ परम्परागत छत्तीसगढी नौबेड़िया दरवाजा खुलता है और एक नवयुवक बाहर आता है, मैं कहता हूँ, जय देव बघेल जी से मिलना है। वह बैठक का दरवाजा खोलता है और हमें बैठने को कहता है। बरसात के कारण आंगन में कीचड़ हो गया। मैं भीतर बैठक में पहुंचता हूँ तो सामने की दीवाल पर उन्हे प्राप्त सम्मान पत्र लगे हैं। इंदिरा जी से लेकर बड़े बड़े नेताओं से सम्मान पाते उनके चित्र एवं 2003 में रविशंकर विश्वविद्यालय से डी लिट की मानद उपाधि प्राप्त करते हुए भी एक चित्र लगा है।

डॉ जयदेव बघेल जी के साथ लेखक
थोड़ी देर में भीतर से कुर्ता और धोती पहने एक वृद्ध आते हैं, उन्होने स्टीक का सहारा ले रखा है। पहचान जाता हूँ यही जयदेव बघेल जी हैं। राम राम जोहार के पश्चात स्नेह से मुझे अपने समीप बैठाते हैं और आने का कारण पूछते हैं। मैं कहता हूँ कि नए साल में आपसे मिलने लिखा था ईश्वर ने, इसलिए चला आया। अन्यथा सैकड़ों बार इस रास्ते से गुजरना हुआ लेकिन पहुंच नहीं पाया। सरल मृदू भाषी जयदेव जी को देख कर कोई नहीं कह सकता कि ये वही जयदेव बघेल हैं जिनके ढोकरा शिल्प का डंका पुरे विश्व में बजता है। वे मुझसे स्नेह के साथ चर्चा करते हैं। अपने पुत्र एवं नाती से परिचय करवाते हैं। पुत्र भी इनकी विरासत को आगे बढा रहा है। कुछ माह पहले साउथ अफ़्रीका में 3 माह तक शिल्प का प्रशिक्षण देकर आया है। सच में इनसे मिलना मुझे आल्हादित कर गया। उनका पुत्र सहयात्रियों को घड़वा शिल्प दिखाता है और मैं जयदेव जी के संस्मरण सुनने में व्यस्त हूँ। वे बताते जा रहे हैं और मैं सुनता जा रहा हूँ।  उनका सारा जीवन योगी की तरह शिल्प साधना को समर्पित है।

घर में लगे सम्मान पत्र
चर्चा करते हुए वे पुरानी यादों में खो जाते हैं, कहते हैं कि उनका परिवार अबुझमाड़िया है और हम गढवा जाति के हैं। पिताजी अबुझमाड़ से आकर इस जगह पर बसे थे। इस जगह को भेलवांपदर पारा कहते हैं यह पारा मेरे पिताजी ने ही बसाया है। हम परम्परागत शिल्पकार हैं। मेरे पिताजी और माता जी ढोकरा शिल्प के कार्य को करते थे। 1960 के सर्वे में मेरे पिताजी पूरे बस्तर जिले में वरिष्ठ शिल्पी थे। उसी समय बंगाल की प्रथम राज्यपाल पद्मजा नायडू ने पिताजी सम्मान किया और नेहरु जी को बताया कि घड़वा शिल्पी बस्तर में हैं। प्रख्यात मूर्ति शिल्पी मीरा मुखर्जी जर्मनी में शिल्प कला सीख रही थी। उसके बाद किसी के कहने से मेरे पिताजी के पास मूर्ति शिल्प सीखने आई। 1961 से 64 तक प्रत्येक वर्ष 2 महीना पिताजी के पास रहकर काम सीखती थी। फ़िर वह बड़ा काम करने लगी। 10-20 फ़िट की बड़ी मुर्तियाँ बनाने लगी।मोरारजी देसाई के समय 1977 में मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला तो मै पुरस्कार पाने वालों में सबसे कम उम्र का था, मेरी उम्र 24 साल थी, उस समय 40 से लेकर 80-85 साल के लोगों को ही सभी राज्यों में से चयन करके राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाता था।

मुरिया मारिन (ढोकरा शिल्प)
मैं युरोप में बहुत घुमा हूँ सबसे पहले 1977 में मास्को के शिल्पमेला में भारत सरकार ने भेजा। उस समय लता मंगेश्कर ने वहाँ रशिया नाईट में गाया था, वे हमारे ग्रुप में ही गयी थी। भारत से 4 लोगों को भेजा गया था। उनका संगीत का काम था इसलिए वे जल्दी आ गयी और मैं 3 महीना मास्को में रहा। क्योंकि मुझे अपना काम दिखाना था। उसके बाद से मैं यूरोप में बहुत रहा। लंदन में 4 बार चार-चार महीने तक रहा। ग्लास्गो स्कूल ऑफ़ आर्टस में 3 बार चार-चार महीने तक वहाँ के विद्यार्थियों को काम सीखाया। स्विटजरलैंड में 3 माह रहा। जर्मनी की हेडनवर्ग युनिर्वसिटी में 3 माह रहा। आस्ट्रेलिया के सिडनी, मेलबोर्न, केनबरा में 2 साल तक 2-2 महीना तक, इटली, पेरिस, नीदरलैंड,सिंगापुर, थाईलैंड आदि स्थानों पर लम्बे समय तक रहा। इसके पश्चात लांसएजिल्स में 4 महीने रहा। उस समय वहाँ कबीर बेदी रहते थे। वे मेरी प्रदर्शनी में भी आए। सब चित्र मेरे पास याददास्त के तौर पर हैं। बैठक को पक्का बनाऊंगा तब सब दीवालों पर वह चित्र लगाऊंगा।

शेर (ढोकरा शिल्प)
जिस समय मैं लांसएंजिल्स में था उस समय ही रजनीश को अमेरिका से निकाला जा रहा था। वहां रजनीश ने रजनीशपुरम बसा रखा था और विनोद खन्ना वहीं मुझसे मिले थे। मेक्सिकों में 15 दिन रहा। सभी जगह काम के सिलसिले में ही गया। नीदरलैंड और इटली से आने के बाद डायबिटिज के कारण मेरा पैर कट गया। ये जयपुर वाला पैर लगाया हूँ। अब शुगर डाऊन हो जाती है। कभी 200 रहती है तो कभी 50-40 तक हो जाती है।जापान के ओसाका क्वेटो नारा में तीन बार दो-दो माह तक रहा। जापान की पुरानी राजधानी नारा है। वहाँ नदी के किनारे ढाई तीन हजार हिरण बैल-कुत्ता जैसे घुमते रहते थे। जो जापानी दोस्त हैं वो मेरे घर आकर ठहरते हैं। बहुत सारे विदेश मित्र आकर यहाँ काम सीखते हैं।

नंदी बैल (ढोकरा शिल्प)
टोकियों  के म्युजियम का नाम नेशनल शतग्या म्युजियम है। वहाँ म्युजियम में काम किया। मैं हर जगह ही म्यूजियम जाकर काम करता था। जब 1987 में स्विटजरलैंड के बाजल शहर के म्युजियम में गया तो वहां पर पिताजी के 35 काम रखे थे 87 के 50 साल पहले के। मैने जब उन्हे कहा कि यह मेरे पिताजी का काम है तो उन्हे विश्वास नहीं हुआ। वहाँ पर मेरे पिताजी की फ़ोटो भी लगी हुई है। जब मैने अपने पिताजी की एलबम रखी हुई फ़ोटो दिखाया तब उन्हे विश्वास हुआ। फ़िर वहाँ के बाजल टाईम्स में मेरे उपर जर्मनी भाषा में आर्टिकल लिखा गया। उसकी प्रति मेरे पास है। मेरे पिताजी द्वारा किया लगभग 75 साल पुराना काम बाजल के म्युजियम में रखा है। ब्रिटेन के एल्बर्ट म्युजियम में हमारे ढोकरा शिल्प का काम रखा हुआ है। उनका कहना है कि यह काम ढाई हजार साल पुराना है।

 काम करते हुए एक पु्राना चित्र
म्युजियम ऑफ़ मेन्स ने मेरा एक साढे चार फ़िट का काम 2500 पौंड में खरीदा। लेकिन वह रुपया मुझे इसलिए नहीं मिला कि मैं उस काम को 5000 में गर्वमेंट को बेच चुका था। वह रुपया गर्वमेंट के खाते में गया। मै सरकार की ओर से गया था इसलिए उस पैसे पर मेरा हक भी नहीं बनता था। मैं इतनी जगह गया, कहीं भी गड़बड़ नहीं किया। अपने देश का नाम नहीं डुबाया, देश की बदनामी नहीं किया। देश का नाम ऊंचा ही करके आया। डांसिग फ़िगर सैकड़ों सालों से हमारे पूर्वज बनाते आ रहे हैं। मोहन जोदरो और हड़प्पा में भी ढोकरा शिल्प जैसा शिल्प ही मिला है। इससे जाहिर होता है कि ढोकरा शिल्प हमारी प्राचीन कला है। अखबारों में सिरपुर के विषय में पढता हूँ पता चला है कि वहाँ भी कुछ कांस्य शिल्प मिला है। मै एक बार वहाँ जाना चाहता हूँ। पैर कटने के कारण गाड़ी में ही जाना पड़ेगा।

पारम्परिक कारीगर
1982 में मैने एक आलेख ढोकरा शिल्प पर लिखा था। जिसका अंग्रेजी अनुवाद एक किताब में छपा है। टाटा पब्लिकेशन ने भी परम्पराग शिल्पकार नामक किताब में हम 4 शिल्पियों के विषय में प्रकाशन किया है। जिसमें सबसे पहले मेरे विषय में लिखा है फ़िर श्री काला हस्ती की कलम कारी के विषय में, बिहार की मधुबनी पेंटिंग के विषय में और एक लेख पॉटरी पर लिखा गया है। जिसका एक-एक लाख हम चारों को दिया था और बाकी पैसा हम लोगों ने चैरिटी में दे दिया। यह किताब 1500 रुपए की है। 1992 में माधवराव सिंधिया जी बुलवा कर यहीं शिल्पग्राम का उद्घाटन करवाया था। यहाँ सभी तरह के शिल्प लकड़ी, टेराकोटा, मैटल पत्थर, बुनकरी, पेंटिग, बांस शिल्प आदि 10 तरह के शिल्प कार्य का प्रशिक्षण दिया जाता था। फ़िर जितना भी शिल्प का कार्य था मैने उसे पूरे घर में लगा दिया। दूर से ही पता चल जाता है कि एक शिल्पकार का घर है।

डॉ जयदेव बघेल जी के साथ लेखक
जयदेव बघेल जी से चर्चा के दौरान चाय के लिए कहते हैं और मै मना करता हूँ। मुझे अभी बहुत दूर जाना था। खपरैल  की बैठक में कवेलु से पानी चूह रहा था। वे कहते हैं कि मेरे पिताजी की बनाई हुई निशानी है इसलिए तोड़कर बनाना  नहीं चाहता। घर तो इसके पीछे बना लिया पर इसे ज्यों का त्यों ही रख दिया। इस साल इसे भी पक्का कर दुंगा। उनकी कार्यशाला भी देखता हूँ जहाँ पर ढलाई का कार्य किया जाता है। जीवन भर इतना बड़ा काम करने के बाद भी उन्हे घमंड रत्ती भर भी नहीं छू पाया। जब उनका पैर कटा तो स्थानीय सरकार के संस्कृति विभाग ने इलाज के लिए उनकी आर्थिक सहायता की।  जयदेव बघेल जी जैसी हस्ती से मिलकर अच्छा लगा। वे मुझे छोड़ने गेट तक आते हैं और मेरा कारवां आगे बढ जाता है।---------- आगे पढें