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गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

कहानी तीन दोस्तों की : एफ़. एम. 36 FM 36 Raipur

कहानी तीन दोस्तों की है, जिसमें दो #BE और एक #MBA। इन्होंने लीक से हटकर नौकरी करने की परम्पराओं के तोड़ते हुए व्यवसाय प्रारंभ किया। अधिक दिन तो नहीं हुए हैं पर इन दो महीनों में अपने हुनर से कुछ करने की चाह लिए लगन से आगे बढ़ रहे हैं और उम्मीद ही नहीं आशा भी है कि आगे चलकर कामयाब भी होगें।

हाँ जी! मैं रितेश पटेल, श्रीकांत नायक एवं ट्विंकल नामक नौजवानों की बात कर रहा हूँ। तीनो दोस्तों ने पढाई करने के बाद नौकरी तलाशने की बजाए रेस्टोरेंट/ होटल व्यवसाय में कदम रखा है। इन्होंने रायपुर के विवेकानंद आश्रम के सामने जी ई रोड़ पर दुकान किराए से ली और उसमें बढिया थीम बेस्ड इंटीरियर करवा कर #एफ़_एम_36 #FM_36 रेस्टोरेंट प्रांरभ किया। दुकान में जगह न होने के कारण इन्होंने इसका किचन वैन में सामने ही रखा है। 

एक शाम उदय भैया के आग्रह पर यहाँ तक जाना हुआ और हमने इनके रेस्टोरेंट में इंडियन, कान्टिनेंटल एवं चायनीज फ़ूड का आनंद लिया। आप यहाँ गिटार बजा कर अपना शौक पूरा कर सकते हैं, साथ ही इनके सेल्फ़ में कुछ पुस्तकें भी दिखाई दी। अपना भोजन आते तक आप पुस्तकों का भी आनंद ले सकते हैं। 

रेस्टोरेंट की खास बात है कि इन्होंने वेटर नहीं रखे तथा ग्राहक से ऑडर लेकर खुद ही टेबल तक पहुंचाते हैं और उनसे आत्मीय वार्तालाप कर फ़ीड बैक भी लेते हैं। जिससे ग्राहक के अनुकूल सेवाएँ देकर उसमें सुधार कर सकें और ग्राहक से सम्पर्क भी स्थापित हो।

इन तीनों द्वारा किया गया यह कार्य उन लोगों के लिए एक मार्ग दर्शन है जो पढ लिख कर रोजगार कार्यालय में नाम लिखाकर इंटरव्यू की प्रतीक्षा करते हुए सरकार को कोसते रहते हैं। इन्होंने जो कदम उठाया है यह अन्य शिक्षित लोगों के लिए प्रेरणा बनेगा। 

मैने इन्हें अपने होटल में एक घुमक्कड़ी की दीवार बनाने की सलाह दी, आशा है कि जब मैं जाऊंगा तो वह तैयार मिलेगी। अगर कभी आप रायपुर आएं तो इन तीनों से अवश्य मिलिए, आपको यहाँ का भोजन, स्नैक्स पसंद आएगा और इनसे मिलकर भी अच्छा लगेगा और इनका उत्साहवर्धन भी होगा। इनकी वेबसाईट http://foodmaster.in/ है।

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

समुद्र जैसा तालाब : बालसमुंद पलारी

तालाबों की कथा किसी तिलस्म से कम नहीं है, इनकी प्राचीनता के साथ कथा कहानियाँ भी जुड़ जाती हैं और पीढी दर पीढी अग्रेषित होती रहती हैं। ऐसा ही एक तालाब है जिसे बालसमुंद कहते हैं। यह रायपुर से बलौदाबाजार रोड़ पर 70 किमी की दूरी पर पलारी ग्राम की पहचान बना हुआ है। इस तालाब का विस्तार लगभग 120 एकड़ में बताया जाता है।  
बालसमुंद पलारी 
मानव निर्मित यह तालाब अपनी विशालता के कारण जलाशय कहलाता है। इसके बीच में एक टापू बना हुआ है, कहते हैं कि तालाब खोदने वाले संझाकाल में घर जाने वक्त अपनी मिट्टी फ़ेंकने की टोकरियाँ (बांस का झौंआ) झाड़ते थे। जिसके कारण इस टापू का निर्माण हो गया। इससे तालाब निर्माण के दौरान नियोजित श्रमिकों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

दक्षिण कोसल में ईंटों से मंदिर निर्माण की परम्परा रही है। इस तालाब के किनारे भी ईंटो बना हुआ सिद्धेश्वर नामक शिवालय है। पुराविद इसका निर्माण काल 7 वीं 8 शताब्दी निर्धारित करते हैं, इस पश्चिमाभिमुख मंदिर में द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा एवं यमुना अपने परिचारको के साथ त्रिभंग मुद्रा में प्रदर्शित की गई है।
शिवालय बालसमुंद पलारी 
 सिरदल पर त्रिदेवों का अंकन है। द्वारशाखाओं पर अष्ट दिक्पालों के अंकन के साथ प्रवेश द्वार के सिरदल पर शिव विवाह का सुंदर अंकन किया गया है। इस मंदिर का शिखर भाग कीर्तिमुख, गजमुख एवं व्याल की आकृतियों से अलंकृत है जो चैत्य गवाक्ष के भीतर निर्मित हैं। विद्यमान छत्तीसगढ़ के ईंट निर्मित मंदिरों का यह उत्तम नमूना है। 

कहते हैं कि इस तालाब का निर्माण घुमंतू नायक जाति के राजा ने छैमासी रात में करवाया था। घुमंतू नायक एक बार अपने लाव लश्कर के साथ इस स्थान पर डेरा लगाए। उस समय यह जंगल था और निस्तारी के लिए पानी उपलब्ध नहीं था। तब नायक राजा ने यहाँ तालाब बनवाने का निर्णय लिया। उसने 120 एकड़ में इस तालाब का निर्माण कराया, परन्तु तालाब में पानी नहीं भरा, वह सूखा का सूखा रहा। 
 नदी देवी शिवालय बालसमुंद पलारी 
तब सयानों के कहने पर नायक राजा ने अपने नवजात शिशु को परात में रख कर तालाब में छोड़ दिया। इस टोटके के बाद रात में तालाब भर गया और बालक भी परात सहित ऊपर आ गया। तब से इस तालाब का नाम बालसमुंद हो गया। इस तालाब में बारहों महीना पानी रहता है तथा यहाँ का जल नीला एवं निर्मल है। तालाब के किनारे खड़े होने पर जल का विस्तार देखकर समुद्र के किनारे खड़े होने का भान होता है। इसकी विशालता अपना नाम सार्थक करती है।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ का गढ़ मोंहदीगढ़

ई विद्वानों का मत है कि मध्यकाल में कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ों को लेकर छत्तीसगढ़ का निर्माण हुआ। ये गढ़ कलचुरी शासन काल में प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाई थे। कालांतर में कलचुरी दो शाखाओं में विभक्त हुए, शिवनाथ नदी के उत्तर में रतनपुर शाखा एवं दक्षिण में रायपुर शाखा का निर्माण हुआ। 
मोंहदीगढ़ के पठार की ओर ले जाती पैड़ियाँ
ये गढ़ इस प्रकार हैं - रतनपुर के १८ गढ़ : रतनपुर, उपरोड़ा, मारो, विजयपुर, खरौद, कोटगढ़, नवागढ़, सोढ़ी, ओखर, पडरभट्ठा, सेमरिया, मदनपुर, कोसगई, करकट्टी, लाफा, केंदा, मातीन, पेण्ड्रा एवं रायपुर के १८ गढ़ : रायपुर, पाटन, सिमगा, सिंगारपुर, लवन, अमेरा, दुर्ग, सारधा, सिरसा, मोहदी, खल्लारी, सिरपुर, फिंगेश्वर, सुवरमाल, राजिम, सिंगारगढ़, टेंगनागढ़, अकलवाड़ा।
मोंहदीगढ़ का पठार
समय ने करवट ली और कलचुरी राज का पतन हो गया। मराठों ने रायपुर शाखा के अंतिम शासक अमरसिंह की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र शिवराज सिंह को पांच गाँव (बड़गांव, मुढेना, भलेसर, गोईंदा, नांदगाँव) माफ़ी के देकर एवं पुर्वजों के प्रत्येक गांव से एक रुपया खर्च देकर इनका अधिकार समाप्त कर दिया।
ऊपर चढे चलो भाई
वर्तमान में इन कलचुरियों के वंशज महासमुंद जिले के इन पांच गांवों में निवास करते हैं। इनके विषय में वैसे तो मुझे पूर्व में भी जानकारी थी। परन्तु कलचुरी वंशजों से मिलना कल हुआ। लाल विजय सिंहदेव एक अरसे से मेरे फ़ेसबुक मित्र थे, परन्तु इनसे कभी मिलना, भेंटना नहीं हुआ था। कल महासमुंद से इनसे मुलाकात हुई। सरल स्वभाव के उर्जावान युवक हैं और अपने इतिहास एवं धरोहरों के प्रति भी जागरुक दिखाई दिए।
रायपुर कलचुरी वंशज लाल विजय सिंह देव
सुबह इनके साथ रायपुर शाखा के अठारह गढ़ों में से एक मोंहदीगढ़ जाना हुआ। यह महासमुंद से खल्लारी मार्ग पर 12 किमी की दूरी पर मोंहदी नामक ग्राम की डुंगरी पर है। यहाँ गढीन माई (चम्पई माता) का स्थान है। जिन्हें आस पास के ग्रामीण अपनी आराध्या मानते हैं और पूजन करते हैं। मोंहदी ग्राम के सरपंच खेमराज दीवान हैं, जो गौंटिया परिवार से ही हैं। इनके साथ हमने गढीन दाई के दर्शन एवं गढ के अवशेषों की खोज में डुंगरी पर चढाई की। 
मोंहदी सरपंच खेमराज दीवान
डुंगरी के शीर्ष पर पढार है, इससे जुड़ा हुआ अमली पठार भी है और उपर से बेलर गांव की तरफ़ जाने का रास्ता भी है। वर्तमान में हुए निर्माणों के अलावा अन्य प्राचीन निर्माण के अवशेष यहाँ दिखाई नहीं देते। परन्तु डुंगरी में सुरंग एवं गुफ़ाएं होने की कथा सुनाई देती है। ऐसी एक सुरंग नुमा खोह में चम्पई माता विराजित हैं। अनगढ़ पाषाण की यहाँ दो प्रतिमाएँ हैं, जिनमें आँखे जड़ी हुई हैं। नवरात्रि के अवसर पर यहाँ ज्योति जलाई जाती है और मेला भी भरता है।
मोंहदीगढ़ की कंदराएँ
यहाँ से पठार पर चलकर बेलर गांव के रास्ते में एक मानव निर्मित प्रस्तर भित्ति जैसी संरचना दिखाई देती है। जहाँ स्थानीय देवता विराजमान हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ दिखाई नहीं देता। अधिक जानकारी एवं शोध के लिए डुंगरी का चप्पा चप्पा छानना होगा। हो सकता है कि प्राचीन मानव बसाहट के चिन्ह मिल जाएं। 
झुरमुटों के बीच से रास्ता
समय कम होने के कारण मैं यह कार्य नहीं कर सका। डुंगरी से नीचे उतरने पर एक फ़र्लांग की दूरी पर दस पन्द्रह घरों की प्रस्तर नींव दिखाई देती है, जिससे लगता है कि कभी यहाँ मानव की बसाहट रही होगी। सरपंच खेमराज ने बताया कि यहाँ पर एक प्राचीन कुंआ भी है। 
चम्पई माता मोंहदीगढ़
वैसे छत्तीसगढ़ में मोंहदी नामक कई गांव मिलते हैं, परन्तु भौगौलिक परिस्थितियों को देखने पर प्रतीत होता है कि यही स्थान मोंहदीगढ़ रहा होगा। क्योंकि खल्लारी, सुअरमाल, फ़िंगेश्वर, सिरपुर आदि गढ़ इसके आस पास ही हैं। इस यात्रा के लिए लाल विजय सिंहदेव का आभार। फ़िर कभी समय एवं अवसर मिला तो इस क्षेत्र की तपास की जाएगी

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

बारूद के धमाकों से नहीं मिटती लोक संस्कृति : अबुझमाड़ में करसाड़

पच्चीस बरसों के बाद अबुझमाड़ के नारायणपुर मार्ग पर जा रहे थे, उबड़-खाबड़ इकहरी सड़क अब चिकनी और दोहरी हो चुकी है। मार्ग पर सन्नाटे की जगह, चहल पहल दिखाई दे रही है। मोटर सायकिलों की भरपूर आवा जाही हो रही है, जो उस समय यदा कदा ही दिखाई देती थी। लग रहा था कि काफ़ी कुछ बदल गया है और बदल रहा है। 
देवी राजटेक (राजेश्वरी) स्थान
हम नारायणपुर से भीतर जंगल के कोकोड़ी गाँव में  आदिवासियों के त्यौहार करसाड़ जात्रा में सम्मिलित होने जा रहे थे। जहाँ करंगाल परगना के पैंतालिस गांव के आदिवासी तीन दिवसीय त्यौहार करसाड़ मनाने के लिए एकत्रित हुए थे। 

मिलन, जय जुहार
हमें कच्ची सड़क पर धूल उड़ाते हुए बहुत सारे लोग मोटर सायकिलों पर जाते हुए दिखाई दे रहे थे। हम भी उनके पीछे पीछे मंदिर तक पहुंच गए। सरई के वृक्षों के बीच सैकड़ों मोटरसायकिलें खड़ी थी एवं खुले मैदान में खई खजाने की दुकाने सजी हुई थी। आदिवासी महिलाएं-पुरुष एक दूसरे से मिलकर जुहार (अभिवादन) कर रहे थे।

देव मांझी महेश्वर पात्र के साथ लेखक ललित शर्मा
राज टेका (राजेश्वरी) के मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी हुई थी। परगना से आए हुए देव एक स्थान पर विराजमान थे। साथ ही जगदलपुर से आए हुए राजा के देवता (पाट देवता) की पूजा हो रही थी। देव हाड़े हिड़मा उनकी पत्नी राज टेका ग्राम भ्रमण पर थे। करंगाल परगना के देव मांझी महेश्वर पात्र के संचालन में सभी प्रक्रियाएं संचालित हो रही थी। 
पाट देवता, जगदलपुर राजा के देव
करसाड़ (कोंडागाँव क्षेत्र में ककसाड़) का अर्थ देवक्रीड़ा होता है, जिसे देवता खेलाना कहते हैं। करसाड़ को गोंडी भाषा में "करसी हियाना" कहा जाता है। करसाड़, हल्बा एवं गोंड़ दो जनजातियों के सम्मिलन एवं समरसता का पर्व है। देव मांझी महेश्वर पात्र ने कहते हैं कि बूढा देव के भाई का नाम हाड़े हिड़मा (कोकोड़ी करिया) है। उन्होंने मावली देवी की पुत्री राजटेका से प्रेम विवाह किया था। 

ढोल पर नृत्य 
मावली माता हल्बा जनजाति की देवी हैं और बूढा देव गोंड़ जनजाति के देवता हैं। बूढा देव के भाई हाड़े हिड़मा (कोकोड़ी करिया) एवं मावली देवी की बेटी राजटेका (राजेश्वरी) के प्रेम विवाह द्वारा हल्बा एवं गोंड़ जनजाति का मिलन हुआ और करसाड़ को दोनो जनजाति मिलकर मनाते हैं। 
युवा महिलाओं द्वारा नृत्य
इस तीन दिवसीय पर्व के पहले दिन करंगाल परगना के सभी देव कोकोड़ी पहुंचते हैं, जिनमें हाड़े हिड़मा के बेटा बेटी एवं भाई बहन होते हैं। यहाँ पहुंचने पर देव मांझी उनका आगमन सत्कार सम्मान करते हैं ढोल बजाए जाते हैं। उसके बाद बेटी एवं बहनों को एक पक्ति में एवं बेटे और भाईयों को अगल पंक्ति में स्थान दिया जाता है।
देवी की डोलियाँ
रात को सामुहिक भोज होता है तथा अगले दिन जात्रा संयोजकों की तरफ़ से सबको एक समय पकाने खाने के लिए चावल दाल दिया जाता है। अगले दिन सुबह हाड़े हिड़मा एवं राजटेका ग्राम भ्रमण पर जाते हैं, प्रत्येक गृहवासी इनका तेल एवं हल्दी लगाकर स्वागत करता है। ग्राम भ्रमण के पश्चात इनको यात्रा स्थल पर लाया जाता है।
हर हर बाइक घर घर बाइक - बदलाव की लहर 
नगाड़ों की ध्वनि के से देवता खेलाने का कार्य प्रारंभ हो जाता है। वृक्षों के नीचे आराम कर रहे सभी लोग आयोजन स्थल पर पहुंच जाते हैं। महिलाएं नृत्य करती हैं एवं युवा ढोल बजाते हुए कदमों पर थिरकते हैं तथा इनके बीच देवता खेलते हैं। सिरहों पर देवताओं की सवारी आ जाती है। यह कार्य रात तक चलता है। 
हाड़े हिड़मा एवं राज टेका देवी के आगमन की प्रतीक्षा करते 
उसके पश्चात अगले दिन सुबह देवता तालाब में स्नान करते हैं एवं उनकी इच्छा के अनुरुप मुर्गा, बकरा, सुअर आदि की बलि दी जाती है। इसी स्थान पर बलि पकाई खाई जाती है। मंडादेव से नारायणपुर की मावली मड़ई की तिथि प्राप्त कर सांझ तक सभी देवता अपने अपने स्थान को रवाना हो जाते है एवं करसाड़ यात्रा सम्पन्न हो जाती।
सभी देवता एक स्थान पर 
इस जात्रा के दौरान नारायणपुर की प्रसिद्ध मावली मड़ई के आयोजन की तिथि देवताओं से पूछ कर तय की जाती है। उनकी इच्छा के अनुसार नियत तिथि को नारायणपुर में मावली मड़ई का आयोजन किया जाता है। यह मड़ई आगामी 21-22 फ़रवरी को आयोजित होगी। जात्रा में सम्मिलित होकर इस अवसर को अपने कैमरे में कैद करना एक सुखद अनुभव रहा तथा आदिवासी संस्कृति को समीप से जानने एवं समझने का अवसर मिला।
पटेल, लेखक, चालकी, डॉ राजाराम त्रिपाठी, राजीव रंजन प्रसाद, देव मांझी महेश्वर पात्र एवं शिव कुमार पान्डेय
जो इलाका बारुद की गंध से हमेशा सराबोर रहता है और जहाँ कब किसकी मौत आ जाए, इसका पता नहीं है। मौत एवं जीवन के इस खेल के बीच अपने त्यौहारों एवं पर्वों को मनाते हुए अपनी प्राचीन परम्परा अक्षुण्ण रखना जीवटता ही है। इससे साबित होता है  कि लोक संस्कृति की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि इन्हें मिटाना संभव नहीं। 

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

मासूल : खारुन नदी की रोमांचक यात्रा

कुकुर कोटना से आगे बढ़ने पर मुझे सूखी हुई वह घास दिखाई दी, जिसे मेले ठेले में लोग संजीवनी बूटी कह कर बेचते हैं। यह सूखी घास पानी में डालने पर फ़िर से हरी हो जाती है। रामकुमार ने बताया कि इसे भठेलिया (लाल खरगोश) चारा कहते हैं, यह भठेलियों का भोजन है। 
भालुओं का भोजन
यहां से हम आगे बढे ही थे कि मुझे पत्तों में  सरसराहट की आवाज सुनाई दी, मुड़ कर देखा तो एक बड़ा किंग कोबरा सरसराते हुए निकल रहा था। उसकी लम्बाई भी सात आठ फ़ुट रही होती, इसे गंउहा डोमी कहा जाता है। मैने साथियों को आवाज दी तो उन्होने उसे दूर भगा दिया।
जंगल का भठेलिया चारा, शहर की संजीवनी बूटी
नदी के कुछ स्थानों पर गांव वालों ने मछली पकड़ने का ठिकाना बना रखा है, उस ठिकाने पर कोई दूसरे गांव वाला मछली नहीं पकड़ सकता है,  यह जंगल का अघोषित नियम है। सब गांव वालों का अपना-अपना दहरा है। आगे बढ़ने पर चट्टानें बड़ी होती जाती हैं। इस स्थान को मासुल कहा जाता है। मासुल पहुंच कर नदी एक छोटे से झरने का रुप ले लेती है।
तिहारु राम सोरी बीज साफ़ करते हुए
यहाँ पर तिहारुराम कुछ फ़ल तोड़ लाया। उनको फ़ोड़ कर नदी के जल में बीजों को धोया और मेरे को खाने के लिए दिए। बीज देते वक्त उसके मन में प्रकट हो रहे भावों को मैं देख रहा था, ये वही भाव थे जो जिस भाव से सबरी ने रामचंद्र को बेर खिलाए थे। नितांत निश्छल प्रेमिल मुस्कान के साथ उसने बीज मेरी ओर बढाए। बीजों के उपर लगे गुदे का स्वाद कुछ कुछ सीताफ़ल के  जैसे था। मैं उस फ़ल का नाम भूल गया, परन्तु स्वाद अभी तक याद है।
भालु के पंजो के निशान
मासुल बहुत बीहड़ दिखाई देता है। पत्थरों के बीच की गुफ़ाएं भालुओं एवं अन्य जंगली जानवरों के छिपने के लिए आदर्श स्थान है। कउहा (अर्जुन) के ऊंचे पेड़ों पर मधुमक्खियों के बड़े बड़े छत्ते लटक रहे थे और पेड़ों पर भालूओं के पंजो के निशान भी। नीचे देखने पर नदी की रेत में भालुओं के पंजो के निशान दिखाई दिए। नदी के पार तीन भालु विचर रहे थे। साथियों ने मुंह से आवाज निकाल कर उन्हें भगाया क्योंकि हमें मासुल से उतर कर नदी पार करनी थी।
मासुल से खारुन नदी का नजारा
मासुल इस ट्रेकिंग का बहुत ही सुंदर एवं मनोरम स्थल है। यहाँ आकर मन रम गया। एक चट्टान काफ़ी ऊंचाई पर लगभग 12 फ़ुट तक बाहर निकली हुई है। उस पर बैठकर नदी का दृश्य आनंददायक दिखाई देता है। तिहारु राम ने मासुल नाम के विषय में बताया कि यह स्थान गहरा होने के कारण यहाँ से मछलियां ऊपर नहीं चढती। लोग यहां पर मछली मारने के लिए आते हैं। एक दिन पानी रोकने के लिए लकड़ी का लट्ठा ढूंढने लगे तो समीप ही दीमक लगा लट्ठा मिल गया। उन्होंने उठाकर उसे काम में ले लिया।
अर्जुन के वृक्ष पर भालु के पंजों के निशान
कुछ देर बात लट्ठे में हलचल हुई तो पता चला कि मासुल सर्प है। मासुल सर्प आलसी होने के कारण एक स्थान पर ही पड़ा रहता है। उसके मुंह के सामने जो कीड़े मकोड़े आ जाते हैं उन्हें खाता है। यहाँ तक कि उस दीमक भी चढ़ जाती है। उस दिन के बाद इस स्थान का नाम मासूल पड़ गया। कुछ देर यहां बैठकर भालुओं को भगाने के बाद हम धीरे-धीरे नदी में उतरे, क्योंकि आगे भालुओं का खतरा था।
मासुल का नजारा
नदी पार करके आधा किमी चलने के बाद खैरडिगी गांव का खार (खेत) आ गया। हमने गांव में पहुंच कर एक के घर में चाय बनवा कर पी। अब लौटने के लिए कोई साधन नहीं मिला। हमारी गाड़ी कंकालीन मंदिर में ही खड़ी थी। अब फ़िर पैदल चलकर लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था। हमने नदी का साथ छोड़ दिया और उसके बगल से चरवाहों वाले रास्ते से कंकालीन लौटने लगे। फ़िर उबड़-खाबड़ रास्ते का सामना किया। 

खारुन ट्रेकिंग का सुंदरतम स्थान मासुल
दिन ढलने से पहले हम कंकालीन पहुंच जाना चाहते थे। ट्रेकिंग के शौक ने आज खूब पैदल चला दिया था। दो घंटे लगातार चलने के बाद कंकालीन मंदिर दिखाई देने लगा और सूरज भी ढल रहा था। मन में खुशी थी कि आज हमने खारुन नदी की कठिन ट्रेकिंग कर ली थी।
उबड़ खाबड़ पत्थरों के बीच से मार्ग बनाते हुए वापसी
थकान बहुत अधिक हो गई थी, तिहारु राम सोरी भी नाहर डबरी से हमारे साथ लौट आया था। मैने उन्हें कुछ पैसे दिए और हम घर लौट आए कि बाकी ट्रेकिंग दो चार दिन बाद शुरु करेंगे। सुबह उठकर देखा कि दोनों पैरों के अंगुठे नीले हो कर फ़ुल गए हैं। देखते ही घबराहट बढ गई। तुरंत डॉक्टर के पास दौड़ा उसने दवाईयाँ दी। डर रहा था कि कहीं गैंगरिन न हो जाए। 
पैरों की हालत: अंगुठे के साथ दो अंगुलियों के नाखून भी नीले हो गए
तीन महीने बाद एक पैर के अंगुठे का नाखून थिम्पू में निकला और दूसरा दिल्ली में तथा आगे की ट्रेकिंग पर विराम लग गया। मेरा मानना है  कि लोग पहाड़ों पर जाते हैं ट्रेकिंग के लिए, परन्तु छत्तीसगढ़ में ऐसे स्थानों की कमी नहीं है, जहाँ आप अपना रोमांचक शौक पूरा न कर सें। कभी आप भी ट्रेकिंग करके देखिए।

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

कुकुर कोटना : खारुन नदी की रोमांचक पदयात्रा

चलते-चलते बन्नु सिंह अपनी कथा कहता जा रहा था "मुझसे धनी कोई नहीं है, ये पत्थर देखो। एक-एक पत्थर कितना मंहगा है। ये पेड़ देखो, जिसे दीमक खा रही है, यह कितना मूल्यवान है। जंगल वाले ही सारा जंगल काट कर ले गए। अब तो जलाऊ के लायक भी लकड़ी नहीं दिखाई देती। 

बन्नु सिंह और नारायन साहू
फ़ालतू का काड़ी-कचरा उगा हुआ है। अगर इन पत्थरों को ही गाड़ी मोटर में भर के शहर ले जाए तो लाखो-कड़ोरों रुपए के हैं। उधर देखो साहब, पेड़ों पर चारों तरफ़ नोट ही नोट लटके हैं। एक-एक पत्ता सौ-सौ का नोट है। अब बताओं आप, मुझसे अमीर कौन है? ये सारा जंगल मेरा है और मैं इसका मालिक हूँ। मेरे ही धन को लोग चोरा कर ले जा रहे हैं।" 
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हमारी अमानत
मैं बन्नु राम की बात सुनकर उससे सहमत होता हूँ, जंगल के मालिक तो वे ही हैं जो उनसे प्यार करते हैं, उसकी रखवाली करते हैं। जंगल कटने एवं खत्म होने का दर्द वही महसूस कर सकता है, जिसका जीवन उसके साथ जुड़ा है। जिस पेड़ को मैने लगाया है, उसे काटने की हिम्मत मैं जुटा नहीं पाता। इसके कारण मेरे घर परिसर में कई महावृक्षों ने विस्तार ले लिया है, जो अब हानि भी पहुंचा रहे हैं। फ़िर तो बन्नु सिंह जंगल का ही आदमी है। 
पथरीली नदी घाटी
वह मुझे मुक्त कंठ से एक रेलो गीत सुनाता है। जो जंगल में गूंजता है और मैं उसे रिकार्ड करता हूँ… "साय रेलो रे रेलो रे रेलो, नदी नादर निहिर निहिर ताघर ता, ओSS रोहुर झुहुर झुहुर बाजेर तिहिर तोर। गांवे रे गांवे रे घुमेर बाबू कहे नादर तोर। ओSS नादर लोहर लोहर लोघर तोर।" सुनसान जंगल में उन्मुक्त कंठ से गाया हुआ गीत बिना साज के ही सुहाना लग रहा था तथा आनंद दे रहा था। पहले रेडियो में बस्तर के रिलो गीतों का रायपुर से प्रसारण होता है, एक अरसे के बाद बन्नु सिंह के मुंह से गीत सुना। बन्नु सिंह के गीत मुझे जंगल के साथ जोड़ रहे थे। 
एक पड़ाव कुकुर  कोटना
वनवासी के गीतों ने मेरे अंतरमन को वन के साथ एकाकार कर दिया था, पर कदम उबड़-खाबड़ पत्थरों पर पड़ते हुए सावधान थे। सफ़र चल रहा है बलखाती इठलाती कुंवारी नदी के साथ। अइरी बुड़ान के बाद हम जिस स्थान पर पहुंचे, साथियों ने इस स्थान का नाम कुकुर कोटना बताया। यहाँ चट्टान को काटकर दो ढाई फ़ुट चौड़ी नाली सी बनाई हुई है। पहले जंगल में शिकार करने वालों के कुत्ते इस स्थान पर पानी पीने आते थे। कोटना के आगे थोड़ी गहराई है, इन चट्टानों के नीचे काले केकड़े छिप रहते हैं, एक साथी केकड़े पकड़ने के लिए पानी में उतर गया। 
कुकुर कोटना पर दोपहर का भोजन पानी
सूर्य सिर पर चढ गया था, हमने अपने खाने की पोटली खोल ली। रामकुमार के घर से बनाकर लाई हुई अंगाकर रोटी सभी लोगों ने आपस में बांट ली। अंगाकर रोटी छत्तीसगढ़ का पारम्परिक भोजन है। रोटी इतनी बड़ी होती है कि एक रोती चार आदमियों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है। कुकुर कोटना पर बैठकर भोजन समाप्त करते तक साथी ने कई केकड़े पकड़ कर अपने झोले के हवाले कर लिए। दोपहर का भोजन इतमिनान से हो गया। जारी है… आगे पढें।

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

भकाड़ू डबरी: खारुन नदी की रोमांचक पद यात्रा

भालु खांचा से आगे बढने पर घना जंगल प्रारंभ हो जाता है, पेड़ों पर लटकती लताओं की बेलें मोटी हो जाती हैं। दीमक की बांबियाँ आठ-दस फ़ुट ऊंची हो जाती हैं। इन बांबियों में सांपों का बसेरा रहता है और भालू भी इनके आस पास दीमकों की तलाश में पहुंचते हैं। 
पदयात्रा दल: लगभग दस फ़ुट ऊंची बांबी के साथ
नदी अब चट्टानों के बीच से होकर बहने लगती है। नदी के मार्ग में बड़े बड़े बोल्डर दिखाई देने लगते हैं। बोल्डरों पर से होकर चलना कठिनाई भरा था। पैर फ़िसलने पर चोट लगने की आशंका बढ जाती है। इसलिए चाल धीमी हो गई और हर कदम जमीन देख कर रखना पड़ रहा था।
भकाड़ू डबरी
आगे बढ़ने पर एक तालाब दिखाई दिया। पूछने पर बन्नु सिंह ने बताया कि इसे भकाड़ू डबरी कहते हैं। इसका निर्माण जंगलात वालों ने वन्य पशुओं के पानी पीने के लिए बनाया है। नामकरण के पीछे की कहानी पूछने पर रामकुमार ने कहा कि हमारे गाँव में निषाद जाति का भकाड़ू नाम व्यक्ति रहता था। उसका विवाह नहीं हुआ। गांव में अविवाहित आदमी की कोई कदर नहीं होती और भले ही न हो, पर उसे हमेशा नीयतखोर समझा जाता है। 
भकाड़ू डबरी में धुंए के छल्ले बनाता बन्नु सिंह
भकाड़ू की वृद्धावस्था में मृत्यु हो गई तो गांव वालों ने उसके दाह संस्कार के लिए गांव में जगह नहीं थी। जगह न देने की पीछे डर था कि मरने बाद वह रक्सा (कुंवारा प्रेत) बनकर गांव वालों को हलाकान करेगा। गांव वालों ने सहमति से इस तालाब के किनारे उसका दाह संस्कार किया। तब से इस तालाब को भकाड़ू डबरी कहा जाता है।
  
नदी में बेचांदी कांदा प्रसंस्करण: नाहर डबरी
बातचीत करते हुए हम संभल कर चल रहे थे। आगे चलकर नदी का पाट थोड़ा चौड़ा हो जाता है, दोनों किनारों पर बड़ी बड़ी चट्टाने हैं। इस जगह पर नदी का पानी थोड़ी गहराई लिए हुए ठहरता है। दूर से हमें कुछ लोग नदी के किनारे कुछ चमकीली सी चीज धोते हुए दिखाई दिए। समीप पहुंचने पर देखा कि ये लोग एक कंद की चिप्स बनाकर धो रहे थे। इस काम में चार पांच परिवार लगे हुए थे। चिप्स को धो कर चट्टानों पर सुखाया हुआ था। इस स्थान को नाहर डबरी कहते हैं।
बेचांदी कांदा की चिप्स धोते हुए
यहां हमारी भेंट तिहारु राम सोरी से हुई। उनका परिवार भी कंद का प्रसंस्करण कर रहा था। उसने इस कंद का नाम बेचांदी कांदा बताया तथा कहा कि इसमें बहुत नशा होता है। अगर इस कंद का गेंहूं के बराबर का दाना किसी को खिला दिया जाए तो उसके मांस पेशियां जाम हो जाती है अत्यधिक नशे में व्यक्ति शिथिल हो जाता है। 
नाहर डबरी: खारुन पदयात्रा
डाक्टरी इलाज से भी इसका नशा नहीं उतरता। जब इसके नशे की मियाद पूरी होती है तो स्वत उतरता है। इस कंद के चिप्स बनाकर ये बाजार में ले जाते हैं, जहाँ व्यापारी दवाई बनाने के लिए अस्सी रुपए किलों में खरीदते हैं। यहाँ आधे घंटे विश्राम कर हमने जल ग्रहण किया। अब हमारे दल में तिहारु राम भी जुड़ चुके थे।
अइरी बुड़ान
उबड़ खाबड़ चट्टानों पर चलना दुखदाई भी था, परन्तु आगे की सोच कर रोमांच भी हो रहा था। यही रोमांच हमें आगे खींच कर ले जा रहा था। आगे चलकर अरई बुड़ान नामक स्थान आया। यहाँ पर नदी की धार में एक छोटा सा रेतीला टीला है, जिसके आस पास काफ़ी जानवरों के खुरों के चिन्ह दिखाई दिए। 
नमकीन मिट्टी: यहां जानवर  नमकीन  मिट्टी चाटने आते हैं।
इस स्थान की मिट्टी नमकीन है, जिसे चाटने के लिए वन्य पशु आते हैं। इस स्थान पर मछलियां भी खूब मिलती है, इसलिए अइरी नामक पक्षी भोजन की तलाश में डेरा डाले रहते हैं। अइरी पक्षी के नाम पर इस स्थान का नाम अइरी बुड़ान हो गया।