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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

छत्तीसगढी प्रशासनिक शब्दकोश: एक टिप्पणी

किसी भी भाषा के प्रशासनिक शब्दकोश का निर्माण महत्वपूर्ण कार्य है। छत्तीसगढ विधानसभा ने प्रशासनिक शब्दकोश का निर्माण का सराहनीय कार्य किया है। इसका परीक्षण, परिमार्जन एवं प्रकाशन छत्तीसगढी राजभाषा आयोग ने किया। राज्य निर्माण के पश्चात छत्तीसगढी भाषा को 8 वीं अनुसूची में दर्ज करने की माँग निरंतर जारी है। हमारे प्रदेश का राज-काज छत्तीसगढी भाषा में होने से 8 वीं अनुसूची में छत्तीसगढी भाषा का स्थान पाने का दावा पुख्ता होगा। मेरी जानकारी में छत्तीसगढी राज-काज की भाषा कभी नहीं रही। इसलिए हिन्दी एवं अन्य भाषाओं की तरह राज-काज के शब्द उपलब्ध नहीं हैं। राज-काज के लिए मानक शब्दों का निर्धारण करना होगा। यह एक श्रम साध्य एवं कठिन कार्य है तथा प्रथम प्रयास में ही मानक शब्दकोश तैयार नहीं हो सकता। 

छत्तीसगढी बोली में हिन्दी एवं उर्दू के शब्द इस तरह से घुलमिल गए हैं कि हम उन्हे अलग नहीं मान सकते तथा नित्य व्यवहार में भी हैं। मुझे लगता है कि प्रशासनिक शब्दावली में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री परिषद, अधिकारी तंत्र, अपेंसनी/गैर पेंसनी, अधिसूचित क्षेत्र, अविज्ञापित, अभिलेखापाल, अभियंता/इंजीनियर, लायसेंस धारी, प्रत्यायन, प्रशासन अधिकारी इत्यादि अनेक शब्दों को ज्यों का त्यों या अपभ्रंश रुप में ग्रहण करना पड़ेगा। क्योंकि हम राज-काज की भाषा में इन्ही शब्दों को व्यवहार में लाते है। जिस तरह हिन्दी के राष्ट्रभाषा बनने के बाद भी राजस्व की कार्यवाही में उर्दू का प्रयोग वर्तमान में भी चल रहा है। तहसीलदार, नायब तहसीलदार, खसरा, रकबा, खतौनी, पटवारी, नकल, अर्जीनवीस, खजाना, नाजिर, खसरा पाँच साला, फ़ौती, मोहर्रिर, मददगार, हवालात, कोतवाली इत्यादि शब्द प्रचलन में है।
वर्तमान शब्दकोश में हिन्दी के शब्दों के स्थान पर प्रयोग करने के लिए छत्तीसगढी शब्द ढूंढने के परिश्रम करने की बजाए अधिकतर हिन्दी शब्दों को ही अपभ्रंश रुप में लिख दिया गया है। अमानक लिए अजारा शब्द उपयुक्त लगता है। अधिशेष के लिए उपराहा, अश्लील के लिए बेकलाम, अल्पवय के लिए लईकुसहा, आरोप लगाना के लिए बद्दी लगाना, उलटना के लिए लहुटाना, उत्कृष्ट के लिए सुग्घर, एक राशि/एक मुश्त के लिए चुकता, कमी के लिए खंगा, करार के लिए बदना, कामगार के लिए कमिया/कमइया, छिद्रान्वेषण के लिए खोदी इत्यादि शब्द प्रचलन में है। इन शब्दों का उपयोग शब्दकोश में किया जा सकता है। 
प्रशासनिक शब्दकोश को देखने से लगता है कि इसका निर्माण जल्दबाजी में हुआ है तथा इसमें संशोधन की महती आवश्यकता है। विमोचन के अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह, विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक और नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे ने भी इस बात को स्वीकार किया। किसी भी शब्दकोश का निर्माण एक दिन में होने वाली प्रक्रिया नहीं है। अंग्रेजी के शब्दकोश में भी वर्तमान प्रचलन में आने वाले नवीन शब्दों को जोड़ा जाता है। प्रशासनिक शब्दकोश के निर्माण में छत्तीसगढी के साहित्यकारों का सहयोग लेना चाहिए। साथ ही गाँव में आपसी व्यवहार में प्रचलित बोली के शब्दों को जोड़ना चाहिए।  
छत्तीसगढी के संत कवि पवन दीवान, डॉ विनय पाठक, पं श्यामलाल चतुर्वेदी, डॉ परदेशी राम वर्मा, लक्ष्मण मस्तुरिहा, पं पालेश्वर शर्मा, पं कृष्णारंजन, नन्दकिशोर शुक्ल, नंदकिशोर तिवारी "लोकाक्षर वाले" हरिहर वैष्णव, डॉ बलदेव,  डॉ बिहारी लाल साहू, ब्लॉगर संजीव तिवारी, दशरथ लाल निषाद, पुनुराम साहू, जीवन यदु, पीसीलाल यदु, सुशील भोले, सुशील यदु आदि विद्वानो का सहयोग लिया जाना चाहिए, साथ ही प्रोफ़ेसर रमेशचंद्र मेहरोत्रा एवं डा श्रीमती कुंतल गोयल का सहयोग शब्दकोश के परिमार्जन में लिया जा सकता है। यह सूची बनाने का प्रयास नहीं, उदाहरणार्थ फ़ौरी याद आने वाले नाम हैं। डॉ सोमनाथ यादव, डॉ चंद्रकुमार चंद्राकर द्वारा तैयार छत्तीसगढी शब्दकोश से सहायता मिल सकती है। लगभग सौ वर्ष पहले हीरालाल काव्योपाध्याय ने छत्तीसगढी भाषा का व्याकरण तैयार किया था यह ग्रंथ भी शब्दकोश निर्माण में अहम भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही प्रदेश में स्थित विश्वविद्यालयों के भाषा विज्ञान विभाग के प्राध्यापकों का सहयोग भी शब्दकोश निर्माण में लेना चाहिए चाहिए। 
नि:संदेह शब्दकोश का निर्माण बड़ा कार्य है। वर्तमान में छत्तीसगढी प्रशासनिक शब्दकोश का पहला खंड ही प्रकाशित हुआ है। अभी दो खंड प्रकाशित होने बाकी है। भले ही अगले दो खंडों के प्रकाशन में समय लगे, पर दुरुस्त होने चाहिए। शब्दकोश के निर्माण में ब्लॉगर्स से ऑनलाईन सहयोग लिया जाना चाहिए तथा फ़ेसबुक और ब्लॉग पर शब्दों को लिख कर उन पर प्रतिक्रिया ली जानी चाहिए। प्रकाशन के पूर्व प्रशासनिक शब्दकोश का मसौदा इंटरनेट पर जनसहयोग एवं संशोधन के लिए खुला उपलब्ध रहे तो सच्चे अर्थों में इससे जनभाषा सम्मान में वृद्धि होगी। राज्य मे शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद छत्तीसगढ ने स्थानीय बोलियों पर पाठ्य सामग्री तैयार करने का कार्य किया है। एक समिति बनाकर राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद माध्यम से वर्तमान शब्दकोश का संशोधन किया जा सकता है। प्रशासनिक शब्दकोश में त्रुटियां होने के बाद भी निर्माणकर्ता साधूवाद के पात्र हैं। उनके श्रम को नकारा नहीं जा सकता। क्योंकि उन्होने जो एक धरातल तैयार किया है, इस पर सभी विद्वानों के सलाह मशविरे से एक उत्कृष्ट शब्दकोश रुपी भवन खड़ा होगा । 

शनिवार, 14 जनवरी 2012

कोलावरी कोलावरी डी "राग बैंड" ------------ ललित शर्मा

प्रकृति में संगीत फ़ैला हुआ है, झरनों की कल कल ध्वनि से लेकर पक्षियों की मधुर चहचहाहट तक, समुद्र की दहाड़ से लेकर भंवरे के गुंजन तक प्रकृति के कण कण में संगीत समाया है। संगीत का अर्थ ही लयबद्धता है। जिस तरह प्रकृति में लय बद्धता है उसी तरह मानव जीवन भी लय बद्ध होने से सुखद हो जाता है। ढोलक की थाप पर कदम नृत्य के लिए उठने लगते हैं तो बंसरी की मधुर तान पर मन शांत हो ध्यान की ओर अग्रसर होता है। संगीत में इतनी ताकत है कि चरवाहे की बंसी की तान को पशु भी सुनकर आनंदित हो उठते हैं और डार से बाहर नहीं जाते। संगीत का मानव के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है।

शायद ही कोई अभागा हो इस संसार में जिसे संगीत से प्रेम न हो और वह मन मस्तिष्क की थकान उतारने के लिए संगीत की शरण नहीं लेता हो। प्रकृति से ताल मिलाने के लिए संगीत वाद्यों का जन्म हुआ। मानव ने वाद्यों के माध्यम से प्रकृति की ताल से ताल मिलाना सीख लिया। चाहे परम्परागत शास्त्रिय संगीत हो या वेस्टर्न म्यूजिक, सबके चाहने वाले हैं। ऐसे ही छत्तीसगढ के युवा कलाकारों से आपका परिचय करवाता हूँ। प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती, जिनमें प्रतिभा है वे अपना रास्ता बना लेते हैं। भीड़ में उनकी पहचान अलग होती है। सफ़र के दौरान मेरी मुलाकात जिन लोगों से होती रहती है, उनके बारे में जानने की जिज्ञासा बनी रहती है निरंतर।

ऐसी एक मुलाकात रायपुर के गवर्मेन्ट इंजीनियरिंग कॉलेज प्रतिभावान के छात्रों से हुई। इंजीनियरिंग की पढाई के दौरान अनुराग, अजय, सोम ,हर्षित, अपूर्व, समीर और लक्की मिलते हैं। इन सब का शौक वेस्टर्न म्युजिक में है। समान रुचि के होने के कारण इन्होने अपने अध्ययन काल 2008 में एक बैंड की स्थापना की और उसका नाम "राग बैंड" रखा। इसका प्रथम प्रदर्शन इंजीनियरिंग कॉलेज के वार्षिकोत्सव के दौरान किया। उसके बाद इन्होने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। इंजीनियरिंग की पढाई करते हुए इन्होने शौकिया तौर पर शुरु किए "राग बैंड" को व्यावसायिक बनाया और बैंड को लगातार मिलती शोहरत के कारण इन्होने व्यावसायिक तौर पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया।

छत्तीसगढ के कार्पोरेट सेक्टर के लोग इनके बैंड को विशेष अवसरों पर प्रदर्शन के बुलाने लगे। कार्पोरेट सेक्टर में इनका बैंड बहुत पसंद किया जाने लगा। इससे इनकी कमाई बढने लगी और फ़िर बैंड में ही रम गए। रेड़ियो माय एफ़ एम, रंगीला, मिर्ची इनकी सेवाएं निरंतर लेने लगा। ये विभिन्न क्लबों के कार्यक्रमों में भी गाने लगे। 2010 में इंजीनियरिंग कॉलेज से पास आऊट होने के बाद इन्होने स्वयं का रिकार्डिंग स्टुडियों भी प्रारंभ कर दिया। लगभग 250 छत्तीसगढी लोकगीतों एवं गानों को डीजे इफ़ेक्ट देने का काम भी इन्होने किया। अब वे गाने डीजे पर गाँव गाँव में अपनी धूम मचा रहे हैं।

इन्होने छत्तीसगढी लोकगीतों में वेस्टर्न धुन की छौंक लगाई और उसे प्रचारित प्रसारित करने का कार्य किया। कोलावरी डी का छत्तीसगढी संस्करण तैयार किया। बैंड लीडर अनुराग कहता है कि - जब कोलावरी डी के गुजराती और पंजाबी वीडियो आ गए तो हमने भी छत्तीसगढी कोलावरी बनाया, कोलावरी डी की धुन में "लाईफ़ लाईक छत्तीसगढी छत्तीसगढी जी" तैयार किया। जिसे बहुत ही अधिक प्रतिसाद मिला। हमारे द्वारा गाए गए छत्तीसगढी कोलावरी जी को लोगो ने बहुत पसंद किया। हम छत्तीसगढी के लोकगीतों के वेस्टर्न फ़्युजन के साथ और भी वीडियो बनाएगें। हमारी पहचान छत्तीसगढी है, हमारी अस्मिता छत्तीसगढी है और हमें छत्तीसगढी के लिए ही आगे काम करना है।"

अनुराग कहता जाता है और मैं सुनता जाता हूँ, थोड़ा शर्मीला सा नौजवान है, लेकिन अपना काम मुस्तैदी से और मनोयोग से करता है। संगीत के लिए साधना की आवश्यकता होती है। जिसने साथ लिया उसके करोड़ों चाहने वाले हो जाते हैं। मुझे इस नौजवान की प्रतिबद्धता पर गर्व होता है। आज तो माँ बाप अपने बच्चों को लाखों रुपए फ़ीस देकर इंजीनियर बनाते हैं और ये बने बनाए इंजीनियर म्यूजिक बैंड चला रहे है। अब बात निकल पड़ी है कि बच्चों पर अपना आदेश थोपने की बजाए उनसे पूछा जाए कि वे क्या करना चाहते हैं? जो वे कैरियर के तौर पर अपनाना चाहते हैं उन्हे वही कैरियर बनाने देना चाहिए। जहाँ वे कुशलता से मन लगा कर रोजगार परक कार्य कर सकें।

कालेज के दिनों से लेकर राग बैंड के सभी साथी आज तक साथ में ही कार्य करते हैं। सबने अलग-अलग काम संभाल लिया है, अनुराज मार्केटिंग, कम्पोजिंग एवं प्रोडक्शन, सोम म्युजिक अरेंजिंग, रिदम अरेंजिंग का कार्य लक्की और समीर तथा नेट मार्केटिंग का कार्य अजय करते हैं। मैं इनसे मिलने जब स्टुडियो पहुचा तो सभी लोग वहाँ पर थे। इन्होने अपना स्टुडियो और सारे सिस्टम दिखाए। जब मैने इनका वीडियो यू ट्यूब पर देखा तो अच्छा लगा। जबकि मैं 1972 के पहले के ही गीत सुनता हूँ उसके बाद के गीत मुझे पसंद ही नहीं आते। इनका काम मुझे इनके स्टुडियो तक खींच कर ले गया। मतलब काम में दम है। ये अपने काम के दम पर ही माता-पिता और छत्तीसगढ का नाम रोशन कर रहे हैं। "राग बैंड" की धुन दिगदिगांतर में गुंजे तथा युवाओं के लिए प्रेरणा कार्य करे।

(लाईफ़ लाईक छत्तीसगढी जी (सुने और यहाँ से डाऊनलोड करें)


वीडियो देखें

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

जन-गण-मन --- ललित शर्मा

राज्य स्थापना दिवस की 11वीं वर्षगांठ के अवसर आज राजभवन के दरबार हाल में राज्यपाल श्री शेखर दत्त ने छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील स्वरूप एवं गौरवशाली परंपरा को दर्शाने वाली तथा राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' पर आधारित लघु फिल्म का विमोचन किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और संस्कृति मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल भी उपस्थित थे। इस फिल्म का प्रदर्शन राज्य के टॉकीज हॉलों में चलचित्रों के प्रारंभ होने के पहले किया जाएगा।
विमोचन
    राज्यपाल श्री दत्त ने इस अवसर पर अपने उदगार में कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य कला, संगीत और साहित्य के नजरिये से संपन्न है। यहां का गौरव यहां की समृध्द संस्कृति, कला और परम्पराओं में प्रदर्शित होता है। आपसी प्रेम, सद्भावना और शान्ति के साथ जीवन जीने का यहां का आदर्श और अतीत हमें विकास और भविष्य की उज्ज्वल राह दिखाती है। यहां के रीति-रिवाजों, परंपराओं और पर्वों की अपनी एक अलग विशेषता है। यहां के काष्ठ शिल्प, लौहशिल्प, कोसा वस्त्र, मृताशिल्प तथा बेलमेटल के शिल्प भी पूरे देश में प्रसिध्द है। उन्होंने कहा कि चलचित्र या सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिए किसी भी प्रकार की सूचना और योजना बड़ी आसानी से तथा प्रभावकारी ढंग से लोगों तक पहुंचाई जा सकती है। उन्होंने उम्मीद व्यक्त करते हुए कहा कि यह फिल्म आम लोगों को काफी प्रभावित करेगी और उपयोगी साबित होगी।

कवि लक्ष्मण मस्तुरिहा, पद्मश्री सुरेन्द्र दुबे, ब्लॉ. ललित शर्मा
    मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने विमोचन समारोह के अध्यक्षता करते हुए कहा कि आज का दिन एक गौरवशाली दिन है। हमारा राज्य अपनी स्थापना का 11वीं वर्षगांठ मना रहा है। ऐसे में इस फिल्म का विमोचन सराहनीय प्रयास है। उन्होंने कहा कि ऐसे ही रचनात्मक सोच, छत्तीसगढ़ की विभुतियों और राज्य की विशेषताओं को लेकर छोटे-छोटे प्रयासों से राज्य के विकास, कला, संस्कृति, भाषा-बोली और विशेषताओं को देश और दुनिया के सामने बताया जा सकता है। संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने विशेष अतिथि के रूप में कहा कि छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थल, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थल, प्राकृतिक सौंदर्य और महत्वपूर्ण स्थल न केवल गौरवशाली और महत्वपूर्ण है बल्कि यह राज्य को पहचान भी दिलाते हैं।

राहुल सिंह जी द्वारा सिंहावलोकन
    इस अवसर पर मंच पर राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष श्री अजय चंद्राकर तथा मुख्य सचिव श्री पी.जॉय उम्मेन भी उपस्थित थे। कार्यक्रम के प्रारंभ में संस्कृति सचिव श्री मनोहर पांडे ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालक संस्कृति श्री नरेन्द्र शुक्ला ने बताया कि इस फिल्म निर्माण में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि छत्तीसगढ़ के प्रमुख ऐतिहासिक स्मारकों, पुरातात्विक, धार्मिक एवं प्राकृतिक पर्यटन स्थलों का समावेश हो साथ ही इसमें राज्य की कृषि, उद्योग, सिंचाई, खेल, शिक्षा आदि क्षेत्रों में हुई प्रगति की झलकियां, जो मनमोहक, रोचक एवं सकारात्मक हों। इस फिल्म से देश, राज्य, समुदाय, व्यक्ति विशेष की छवि विपरीत रूप से प्रभावित न हो तथा राष्ट्रगान के संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन न हो, इस बात का भी विशेष ध्यान रखा गया है। इस लघु फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु सेंसर प्रमाण-पत्र भी प्राप्त कर लिया गया है। इस लघु फिल्म के लोकार्पण के पश्चात इसका नि:शुल्क प्रसारण 2 नवंबर से छत्तीसगढ़ के समस्त सिनेमा घरों में प्रत्येक फिल्म प्रदर्शन के ठीक पूर्व किया जाना अनिवार्य होगा।

अनुप रंजन पांडे - बस्तर बैंड के निर्देशक
    इस फिल्म का निर्माण करने वाले श्री दीपक उज्ज्वल ने बताया कि महाराष्ट्र में फिल्म प्रारंभ होने के पहले राष्ट्रगान का गायन अनिवार्य रूप से किया जाता है। इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ में इस फिल्म के माध्यम से यह प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रम का संचालन छत्तीसगढ़ी फिल्म के कलाकार श्री अनुज शर्मा ने किया। विमोचन के उपरांत फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया। विमोचित लघु फिल्म का छायांकन राज्य के अनेक महत्वपूर्ण स्थानों में किया गया है। इसमें पुरखौती मुक्तांगन, ताला, मैनपाट, विवेकानंद सरोवर, बारनवापारा अभ्यारण्य, गंगरेल, भिलाई, राजिम, भोरमदेव, चित्रकोट, मदकूदीप, गौरव पथ, रायपुर, मैत्री बाग और सिरपुर भी शामिल है।

महत्वपूर्ण कलाकारों ने भी कार्य किया

    इसी तरह इस फिल्म के निर्माण में विभिन्न विधाओं के कलाकारों ने अपना योगदान दिया है। इसमे पद्म भूषण तीजन बाई, संजय बत्रा, जाकिर हुसैन, सुमेधा कर्महे, भईयालाल हेडाउ, पद्मश्री जे एम नेल्सन, अल्का चंद्राकर, अनुज शर्मा, सतीश जैन, प्रभंजय चतुर्वेदी, भालचंद्र शेगेकर, ऋतु वर्मा, पद्मश्री सुरेंद्र दुबे, लक्ष्मण मस्तुरिया, राजेश चौहान, सत्यजीत दुबे, ओंकारदास मानिकपुरी, अमित सना, योगेश अग्रवाल और कविता वासनिक भी शामिल हैं।