बुधवार, 25 मई 2011

दलाई लामा का घर मैक्लोडगंज और अमेरिकी डालर --- ललित शर्मा

आरम्भ से पढ़ें आज ४ मई २०११ है, हमने मैक्लोडगंज घुमने का कार्यक्रम बनाया. दाड़ी से बस से धर्मशाला बस स्टैंड पहुचे.  फिर हमने धर्मशाला के लिए जीप टैक्सी पकड़ी. अब धर्मशाला से मैक्लोडगंज की दुरी १० रूपये की हो गयी है. केवल ने मैक्लोडगंज में अपने एक मित्र को फोन कर दिया था. हमने तय किया थी कि दोपहर का खाना मैक्लोडगंज में ही खायेंगे. रास्ते में एक जगह पर आर्मी कैम्प भी है. मैक्लोडगंज पहुच कर केवल ने मित्र को फोन किया तो वह आ गया. वह एक अच्छे होटल में भोजन करने के लिए ले गया. हमने वहां रूफ टॉप पर ही डेरा जमाया. हमारे पहुचने से पहले एक एंग्लोइन्डियन जोड़ा पहले से मौजूद था. जो हमारे पहुचने पर थोडा असहज महसूस कर रहा था. अब उनके चक्कर में हम अपना टाइम क्यों ख़राब करें? हम भी वहीँ जम गए.खाने का आर्डर दिया गया. सबने आखिर तय किया कि बिरयानी का मजा लिया जाये.

रूफ टॉप से मैक्लोडगंज का नजारा देख रहे थे. सामने धौलाधार की पहाड़ियों पर जमी हुयी चमकदार बर्फ के बीच त्रिउंड भी दिख रहा था. वहां तक बहुत सारे यात्री जाते हैं. केवल के मित्र का पेशा ही ट्रेकिंग करना है. वह त्रिउंड तक यात्रियों के दल को लेकर जाता है. जब मैंने वहां तक जाने का इरादा जताया तो उसने कहा कि अभी मौसम ठीक नहीं है. पहाड़ों पर जमी हुयी बर्फ मनमोहक होती है. पहाड़ हमेशा मनुष्यों को चुनौती देकर आकर्षित करते हैं. लेकिन होते बड़े क्रूर हैं. थोड़ी ही गफलत में जान ले लेते हैं. कभी कोई यात्री दल फंस गया तो बर्फीला तूफान उन्हें निगल जाता है. लाश भी मिलना कठिन हो जाता है. इसलिए पहाड़ों पर ट्रेकिंग करने के लिए उत्साह और जोश के साथ सावधानियां भी बरतनी आवश्यक हो जाती हैं.

आस पास तिब्बती मन्त्र लिखे ध्वज लहरा रहे थे. इसके पीछे मान्यता है कि हवा में मन्त्रों का प्रसार होते रहे और वे कल्याणकारी हों. पास में ही एक व्यक्ति छत पर  कपडे रंग कर सुखा रहा था. यहाँ तिब्बतियों ने अपने धंधे खोल रखे हैं, आने वाले पर्यटकों से इन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है. केवल का कहना था कि खाने का खर्च इन्हें भारत सरकार है और कपडे अमेरिका से आ जाते हैं. कुल मिला कर मौज है. लेकिन वतन से बिछुड़ने का इनका दर्द भी इसके साथ जुड़ा है. यही विश्वविख्यात दलाई लामा भी रहते हैं. हमने संपर्क किया था तो पता चला कि वे अमेरिका गए  हैं. इसलिए मुलाकात नहीं हो सकती थी. फिर कभी मुलाकात करने की कोशिश करेंगे.

खाना आ चूका था. खाने के साथ-साथ चर्चा भी हो रही थी. केवल ने बताया कि जाट जी भी आने वाले हैं. वे झरना देखना चाहते हैं. मैंने कहा कि अगर अभी आ लेते तो झरना दिखा ही देते. हमारे आस-पास बहुत से झरने हैं. वैसे भी सभी के अपने-अपने झरने होते हैं. जरा सा दुःख आया नही की झरने शुरू हो जाते हैं, दुःख के झरने एवं सुख के झरने के जल का स्वाद एक जैसा ही होता है. दुःख के झरने का जल आदमी पी जाता है और सुख के झरने का जल छलक जाता है. छलकता हुआ जल दिख ही जाता है. चाहे लाख कोशिश करो रुकता ही नहीं है. जाट जी थे नहीं. अन्यथा एक झरना तो बह ही जाता खली वाला. उसके फोटो-शोटो लग जाते ब्लॉग पर. नीरज भी सयाना बंदा है. खली का नाम सुनते ही डर गया. बोला कि खली के जाने के बाद ही आऊंगा.

भोजन के बाद हम पहुच गए बुद्ध मंदिर में. वहां एक पुस्तकालय भी है. मैंने उस पुस्तकालय में कुछ तिब्बती साहित्य देखना चाहा. क्योंकि तिब्बती तंत्र विद्या की काफी चर्चा होती है. लेकिन वहा पर हिंदी में कुछ भी नहीं था. तिब्बती या अंग्रेजी में पुस्तकें थी. मैंने उनसे पूछा कि और कहाँ मिल सकती हैं तो उसने कोई माकूल जवाब नहीं दिया. हम मंदिर में ऊपर की तरफ बढ़ गए. तिब्बती लोग मंदिर की परिक्रमा कर रहे थे. बीचों बीच स्वर्ण मंडित बुद्ध की प्रतिमा लगी है और उसके सामने ही दलाई लामा की गद्दी भी है. उसे अभी ढक कर रखा गया था. शायद दलाई लामा के आने के बाद उसकी चादर हटाते होंगे. एक बूढ़ा लामा सर पर विचित्र सी टोपी लगाये हुए था. जो उलटे सूप या छाज जैसी थी. मैंने पूछा तो पता चला कि सामने की और बढ़ी हुयी टोपी से चहरे पर बरसात का पानी नहीं गिरता. इसलिए टोपी का डिज़ाइन इस तरह का बना है.

मंदिर के सामने लाइन से बड़े-बड़े पट रखे हुए थे. जिस पर एक लामा और एक लड़की दंडवत कर  रहे थे लगातार. मैं खड़े होकर देखता रहा. तब तक उन्होंने ५० दंडवत तो कर ली होगी. इस विषय पर कोई ठोस जानकारी देने वाला नहीं मिला. शायद इनकी उपासना का एक अंग होगा. जिसमे शरीर सौष्ठव बना रहे. पहाड़ी लोग वैसे भी मजबूत होते हैं. पहाड़ की जिन्दगी बड़ी कठिन होती है. दिनचर्या मेहनत भरी होती है. लकड़ी काटने से लेकर पानी भरने तक सिर्फ चढ़ना और उतरना ही है. मैदानी इलाके के लोगों को पहाड़ों में थकान हो जाती है तो पहाड़ी इलाके के लोगों को मैदानों में. दोनों ही एक दुसरे के वातावरण में कठिनाई से ही चल पाते हैं. इसलिए शारीरिक रूप से मजबूत होना भी आवश्यक है.

बुद्ध मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बोर्ड लगा है. जिसमे पेंछन लामा के विषय में लिखा है और बताया गया है कि पंछेन लामा चीन की कैद में विश्व का सबसे कम उम्र का बंदी है. पेंछन लामा का जन्म २५ अप्रेल १९८९ को हुआ था.१८ मई १९९५ को दलाई लामा ने गेंधुन छोयकी नीमा को १० वें पेंछन लामा के स्थान पर पेंछन लामा घोषित किया. २८ मई १९९६ को चीनी अधिकारियों  ने स्वीकार किया कि पेंछन लामा उनके पास है, चीन सरकार ने एक बार उसकी फोटो जारी की थी उसके बाद उसकी कोई खोज-खबर नहीं है. तिब्बती उन्हें कैद से छुड़ाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं. उन्हें पेंछन लामा की जान की चिंता सता रही है.

आज से ५० वर्ष पूर्व तिब्बती शरणार्थी असम के रस्ते भारत में आये थे. ठन्डे प्रदेशों में रहने वालों को भारत की गर्म आब-ओ-हवा रास नहीं आई. जिसके कारण कईयों की मृत्यु भी हो गयी. तब भारत सरकार ने इन्हें ठन्डे प्रदेशो एवं उनके अनुकूल वातारवरण में रहने की इजाजत दे दी, इसके पश्चात् तिब्बतियों ने कर्णाटक, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, छत्तीसगढ़ के मैनपाट, एवं अन्य ठन्डे स्थानों में बसेरा किया. धर्मशाला को मुख्यालय बनाया गया. यहाँ इनकी निर्वासित सरकार भी निवास करती है. जिसके प्रधानमंत्री लोबसंग सांगये हैं. इनका मंत्री मंडल भी है जो तिब्बत की आजादी को लेकर ५० वर्षों से गाँधीवादी तरीके आन्दोलन कर रहा है.

तिब्बत से आये हुए अधिकांश शरणार्थी अब मर-खप गए. उनकी संताने भारत में बसी हुयी हैं. एक तिब्बती प्रोफ़ेसर से मेरी मुलाकात हुयी, वे अब केंद्रीय विश्वविध्यालय से सेवानिवृत हो चुके हैं. उन्होंने बताया कि वे भारत आये थे तब माँ के पेट में थे, उन्होंने भारत आकर ही जन्म लिया. ल्हासा के बारे में सुना है. देखा कभी नहीं. अब तो हम भारत के ही होकर रह गए हैं. तिब्बत की स्वतंत्रता की आस लगाये एक पीढ़ी तो ख़त्म ही हो गयी.दलाई लामा बुद्ध की 2500 वीं जयंती के अवसर पर 1956 में जब वे भारत आये थे. तब २४ बरस के थे. अब वे ७४ बरस के हो गए हैं. अर्ध शताब्दी बीत गयी भारत में.    

मंदिर की हमने भी परिक्रमा की, वहां पर बड़े-बड़े घुमने वाले डोलों में मंत्र भरे थे. उन्हें एक बार घुमाने से लाखों मन्त्रों के जाप का फल मिलता है."ॐ मणि पद्मे हूँ " बीज मंत्र है. इसी का जप सारे तिब्बती करते हैं. वैसे तो मैं पूर्ण आस्तिक हूँ, लेकिन मूर्ति पूजा के प्रति मेरी आस्था कम ही है. कर्मकांड भी नहीं झेलता...."दिल के आईने में है तश्वीरे यार, जब जरा गर्दन झुकाई देख ली." बस यही स्थिति है अपनी. हमने भी घुमा लिए डोले, जब घुमाने से ही फल मिल जाता है कौन करे फालतू मेहनत. मामला आस्था का ही है. केवल ने लिए चित्र और फिर हम मंदिर से चल पड़े. हमारे सामने दो गोरियां थी. लेकिन इन लोगों ने सलवार कुरते पहन रखे थे. भारतीय परिधानों का कोई जवाब नहीं है.

यहाँ मंदिर में भी मुझे छत्तीसगढ़िया परिवार काम करते मिला. मेरे यहाँ आने से पहले अगर ये मिल जाते और बताते कि दलाई लामा के घर में काम करके आये हैं तो मैं विश्वास नहीं करता और उनको लबरा घोषित कर देता. लेकिन अब मानना पड़ेगा कि छत्तीसगढ़िहा की पहचान दूर-दूर तक है. दलाई लामा के घर से चल कर हम बाज़ार में आ गए. जिसे जोगीवारा सडक कहते हैं. इस सड़क पर दोनों तरफ दुकाने हैं. तिब्बती दुकानदार ग्राहकों से मोल भाव करते नजर आ रहे थे. तो कुछ विदेशी गोरे मौज मस्ती में थे. उन्हें यहाँ पर मौज मस्ती के सारे साधन उपलब्ध हो जाते हैं. दम मरो दम कुसंस्कृति के लोग धार्मिक स्थलों को ख़राब कर रहे हैं. हमने तो अधिक अन्दर तक झाँकने की कोशिश नहीं कि वरना सारा भेद पता लगा लेते और उतना समय भी नहीं था मेरे पास..

बाज़ार में एक गोरी तो अधनंगी ही घूम रही थी. पता नहीं उसके कपडे किसी ने चुरा लिए या उसे गर्मी अधिक लग रही थी. आखिर वह मेरे गुप्त कैमरे की जद में आ ही गयी. लोग मुंह फाड़े देख रहे थे बिना टिकिट का तमाशा. भले ही गोरों की संस्कृति वैसी ही हो पर भारत में आकर उपहास का हेतु तो बन ही जाते हैं. फिर इनकी देखा देखि हमारे काले भी गोरे होने की राह पर चल पड़ते है. धोती से तो कच्छे में आ ही गए. एक गोरी दुकान के सामने उदास बैठी थी. शायद किसी आने वाले ने वादा करके धोखा दे दिया था. मुंह उतरा हुआ था. बार-बार सड़क की तरफ देख रही थी. अब परदेश में कोन सहाय हो. अगर कोई हो गया तो उसके ही गले पड़ सकती है. हमने तो राम राम की और आगे बढ़ लिए.

बस स्टैंड के चौराहे पर एक बौद्ध मंदिर है.यहाँ भी दर्शनार्थी पहुचते हैं.  बुद्ध का दर्शन था कि शरीर को इतना कष्ट मत दो कि साधन ही ख़त्म हो जाये और इतना भी इस पर आश्रित न होवो कि गुलाम ही हो जाओ. उन्होंने माध्यम मार्ग सिखाया. धम्म की शरण में ले गए. बाज़ार से निकलते हुए हमने दुकानों में बिकते सामान देखे. ये सामान सभी टूरिस्ट प्लेस पर मिल जाते हैं. सभी जगह एक जैसे ही सामान मिलते हैं. हिन्दुस्तानी ग्राहकों पर दूकानदार कम ही निगाह डालते हैं. उन्हें तो गोरों की जेब खली करवानी रहती है और फिर उन्हें तो गोरों से डालर मिलते हैं. सारा मामला डालर का ही है.

अब हमने बस स्टैंड से टैक्सी पकड़ी और वापस नीचे धर्मशाला की ओर चल पड़े.टैक्सी में पीछे सीट पर कुछ महानुभाव थे. वे भारतीय राजनीती पर गरमा गरम चर्चा कर रहे थे. मैंने भी अपने कान उनकी तरफ लगा दिए. एक ने कहा कि भ्रष्ट्राचार ने देश का बेडा गर्क कर दिया. दुसरे कहा कि बाबा रामदेव अच्छा काम कर रहे हैं. वो आन्दोलन चला रहे हैं, विदेशी बैंकों से धन वापस लाने के लिए. अच्छा काम कर रहे हैं. देश में बिना घूस दिए तो जायज काम भी नहीं होता. साले सभी चोर हैं. लाखों करोड़ रुपया राजा खा गया. मनमोहन सिंह कुछ कर नहीं रहे हैं. एक ने कहा कि वह तो रबर स्टेम्प है, क्या कर सकते हैं? मैं भी सोच रहा था कि भ्रष्ट्राचार की चर्चा अब आम आदमी के द्वारा भी होने लगी है. इसका अर्थ यही है कि आने वाले दिनों में देश कि जनता कुछ माकूल कदम उठाएगी. हम मैक्लोडगंज की यात्रा सम्पन्न करके डेरे पर आ रहे थे.......दक्षिण के मैक्लोडगंज बायालकूपे की सैर यहाँ करेंआगे पढें

23 टिप्‍पणियां:

  1. ढेरों रंग भरी यात्रा.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मैक्लोडगंज देखकर पुराने दिन याद दिला दिए ललित भाई-- शुक्रिया एक बार फिर धर्मशाला की यात्रा कर के ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. हिन्दू धर्म के विरोध में या यूँ कहें कि इसके समानांतर अन्य कई धर्मों /पंथों का जन्म हुआ जो तथाकथित ब्राह्मणवादी मूर्तिपूजा और पाखंड से उकताए हुए थे , लेकिन देख रही हूँ कि दूसरे धर्म भी कर्मकांड से अछूते नहीं रहे हैं ...स्वर्णजडित बड़ी- बड़ी मूर्तियाँ तो यहाँ भी हैं !
    आम आदमी बात कर सकता है , कर लेता है ..जो जेब भर सकता है , भर लेता है!

    रोचक वृतांत !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया लगा आपका यह यात्रा वृतांत | तन्मयता से पढ़ गए |

    उत्तर देंहटाएं
  5. भाई जी , १९९५ में गए थे । लग रहा है जैसे वहीँ घूम रहे हों । सुन्दर यात्रा विवरण ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सही रहा यह जानना भी आपके यात्रा वृतांत के माध्यम से जानना भी...

    उत्तर देंहटाएं
  7. हमें भी बहुत अच्छा लगा था वहाँ पर।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी यह यात्रा 2011 की है या 2001 की? आपने प्रारम्‍भ में 2001 लिखा है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. @ajit gupta
    टंकण त्रुटि की और ध्यान दिलाने का आभार

    उत्तर देंहटाएं
  10. छत्तीसगढिया वंहा भी,कंहा नही।बढिया रही यात्रा।

    उत्तर देंहटाएं
  11. सफल और यादगार यात्रा...
    शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  12. भईया, सुकून और मेहनत से तैयार, खूबसूरत दृश्यावलियों की तरह ही खूबसूरत पोस्ट.... पढकर आनंद आ गया.... सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  13. मनोरंजक यात्रा वृतांत...... यात्रा करने का रोचक अंदाज भी आप सीखा दिए //प्रणाम//

    उत्तर देंहटाएं
  14. जल्दी ही अपनी किताब पूर्ण करें और उसमे तिब्बती लोगो की संस्क्रुती पर एक अध्याय जुड़ जाये तो मजा बढ़ जायेगा

    उत्तर देंहटाएं
  15. आपने १० साल पहले की याद ताजा करा दी जब मई जोगिन्दर नगर की सैर को गया था आपका धन्यवाद !!!

    उत्तर देंहटाएं
  16. ek yatra me itane rang...aisa laga ham bhi vaha ho aaye..

    उत्तर देंहटाएं
  17. bahut badiya manoranjak yaatra vratant.. photo bhi bahut badiya lage....

    उत्तर देंहटाएं
  18. ek pal ko laga ki jaise khud hi yatra kar rahe ho.....

    jai baba banaras....

    उत्तर देंहटाएं
  19. ख़ूबसूरत यात्रावृत्तान्त| मैक्लोडगंज के ख़ूबसूरत नज़ारे भी दर्शनीय हैं|

    उत्तर देंहटाएं
  20. मुझे आपके रिपोर्ताज बहुत अच्छे लगते हैं,लगता है जैसे मै भी आपके साथ ही घूम रहा हूँ.लाल किले का दबा छुपा इशारा भी आमंत्रित करता है ...

    उत्तर देंहटाएं
  21. आघातो घुमक्कड जिज्ञासा...

    उत्तर देंहटाएं
  22. अच्छा लगा यह संस्मरण भी .देखें , छत्तीसगढ़ के व्हेनसांग आगे और क्या -क्या बताने वाले हैं !

    उत्तर देंहटाएं