गुरुवार, 11 नवंबर 2010

पैमाने में व्यग्र होते सोडे के बुलबुले ---- ललित शर्मा

शब-ए-रोज यह वाकया घटता है मेरे साथ, तेरे घर के सामने लगे नियोन ब्लब की नीली रोशनी दूर से ही दिखाई देती है,जब तेरे घर से सामने से गुजरता हूँ तो वह खींचता है मुझे। कदम ठिठकते हैं एकाएक गाड़ी के ब्रेक पर पैर टिक जाता है, मैं कहता हूँ चला जाए अंदर, मन कहता है, रुकना नहीं है जाना है। मन जीत जाता है, मैं रुकता नहीं, चलते जाता हूँ। कहता हूँ कि फ़िर कभी आऊंगा। कांच के पैमाने में तेरा अक्स देखने।

कुछ मील चलने के बाद एकबारगी तेरी याद फ़िर आती है, रास्ते में एकांत ढूंढता हूँ जहाँ आराम से बैठ कर उन गलियों के चक्कर काट आऊँ जहाँ कभी मैं गुजरा करता था। अलियों से खेला करता था। लेकिन मन कहता है कि रुकना नहीं है चलते जाना है। मन व्यर्थ ही दुश्मन बना हुआ है, कहीं रुकने ही नहीं देता। उसके कहने से फ़िर मैं चल पड़ता हूँ और चलता ही जाता हूँ।

रास्ते में यमदूतों से भेंट होती है, सड़क  के बीच जुगाली करते हुए, निश्चिंत होकर बैठे हैं। जैसे संसद में किए गए प्रश्न का जवाब मिलने के बाद तन्मयता से निरीक्षण कर रहे हों। या फ़िर उपर की कमाई को गिनते हुए कोई सिपहिया और बाबू। एक संतोष का भाव दिखता है इनके चेहरे पर। अब कोई भिड़ जाए तो उसकी आई थी। बच जाए तो भी राम राम है। बात तो तब है जब तु रहे साथ और ये यमदूत आ जाएं। लेकिन तुझे देख कर आते नहीं हैं। अरे जान का डर सबको है। चाहे दूत हो या यम दूत।

गाना बज रहा है एफ़ एम पर रात 12 बजे। मैं कार में रिकार्ड नहीं सुनता इस समय। एफ़ एम स्टेशन वालों को शायद मेरी पसंद का अंदाजा है और  रात के 12 बजे के बाद शायद मेरे जैसे ही कुछ श्रोता होगें जो सुनते होगें। “एक  दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल लल्ला ल ल ल ला” फ़िर एक और गीत बजता है “ चांदी की दिवार न तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया’ फ़िर रेड़ियो कहता है “घुंघट के पट खोल,तोहे पिया मिलेंगे” बस सुन कर गहरे उतर जाता हूँ, पट नहीं दिखते।

सड़क दि्खाई देनी बंद हो जाती है। कार हवा में तैरते जाती है। बस तैरते जाती है हाईवे पर, जैसे बिना ड्रायवर के चल रही हो। मैं पुतले की तरह स्टेयरिंग पर हाथ धरे गीतों में मुग्ध हो जाता हूं। किसी वाहन से टकराने का खतरा उठा कर। वैसे टकराना तो मेरी फ़ितरत में शामिल हो गया है। कभी टकरा जाता हूं तो कभी सलामत घर तक पहुंच जाता हूँ। सोचता हूँ कि यह कातिल तो कभी जान लेकर ही छोड़ेगा। लेकिन जान निकलती नहीं है। जीवटता रग-रग में भरी है। दुश्मनों की छाती पर मुंग दलने के लिए फ़िर बच जाता हूँ।

यही सोचते सोचते फ़िर तेरा घर आ जाता है जहाँ तू मिलती है। ब्रेक पर पैर पहुंच जाते हैं, मन कहता है रुकना मना, लेकिन अबकि बार मन पर मैं विजय पा लेता हूँ और ब्रेक लग जाता है। राम लाल सैल्युट दागता है, बरसों का सेवक है। मेरी पसंद और नापसंद का ख्याल रखता है और यह भी जानता है कि मुझे कब क्या चाहिए। कोठरी में तिपाई सजा देता है पानी, सोडा गिलास और चखना के साथ तेरे दीदार होते हैं। बेसब्री से होठों से लगाता हूँ, एक कड़वाहट पूरे वजूद में भर जाती है। आज के बाद तुझसे फ़िर कभी नहीं मिलुंगा। सच कह रहा हूँ।

कमरे में जलती मोमबत्ती रो रही है, लौ थरथरा रही है,आंसू पिघल कर तिपाई पर गिर रहे हैं। जैसे कहती हो कैसे हो पाएगा तुमसे बिछोह, ये तो तुम रोज कहते हो। साक्षी हूँ मैं पल पल की।

तभी एक मच्छर गुनगुनाता हुआ अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाता है। “तुम अगर मुझको न चाहो तो कोइ बात नहीं” शायद उसकी गुनगुनाहट की धुन कुछ ऐसी ही थी। बस अब वो भी मस्त है और मैं भी मस्त हूँ। कड़ुवाहट कुछ क्षण की थी अब आनंद का सागर हिलोरें लेने लगा। मोबाईल पर निगाहें चली जाती हैं। नम्बरों पर सरसरी निगाह दौड़ाता हूँ। धीरे धीरे नम्बर भी आकार लेने लगे। अरे कितने दिन हो गए इस नम्बर से बात किए, लेकिन रात के एक बज रहे होगें, कोई तुम्हारी तरह येड़ा तो नहीं है। चलो आगे बढते हैं किसी और नम्बर की तरफ़ जो मुझ जैसा होगा।

प्याले में मोमबत्ती की लौ का प्रतिबिंब झिलमिलाता है। जैसे हिलते हुए नदी किनारे के घाट के पत्थर पर बैठने पर नदी हिलती हुई दिखती है। आज मोमबत्ती की लौ थिरक रही है। शायद तुम्हारा चेहरा स्पष्ट दिखाना चाहती है जो अंधकार में छुपा हुआ है। फ़ोन के नम्बर चलते ही रहते हैं, सहसा एक जगह रुकते हैं नम्बर, डायल करने पर कहती है कि “ इस रूट की सभी लाईने व्यस्त हैं, कृपया थोड़ी देर बाद कोशिश करें।“ कोशिश करने के लिए समय कहाँ है अपने पास। अधीरता बढ जाती है। पैमाने में बुदबुदाते सोडे के बुलबुले व्यग्र हो उठते हैं। शायद कहते हों महाराज बहुत झेलाता है भाई, कह दो आगे पानी से ही काम चला लिया करे। कुछ तो तमीज होनी चाहिए मयखाने की। ऐसे कैसे पट खुलेगें?

27 टिप्‍पणियां:

  1. यादों से वो गुजरे जमाने नहीं जाते।
    आपने तो महाराज पैमाने की कड़ुवाहट के जरिये कांटे से कांटा निकाल लिया, जिनपर पैमाने भी बेअसर हों, वो दीवाने कहां जायें?
    मस्त रवानी है शर्मा जी आज की पोस्ट में।

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  2. घाट,नदी,पत्थर,मयखाना फ़िर ललित शर्मा...............
    सिर्फ़ आपके लेबल का क्रम बदला /ठीक किया है (व्यग्र होते बुलबुलों के कारण)......हा हा हा

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  3. जद्दोजहद से गुजरा हूँ खुद को यहाँ लाने में
    देखिये आज फिर आ बैठे हैं मयखाने में

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  4. बुलबुलों की व्यग्रता का उचित समाधान हुआ कि नहीं...

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  5. यह बढ़िया रही ...ड्राइविंग से लेकर सोडे तक ..पढ़ लिया ! मगर सर खुजा रहा हूँ ...
    हार्दिक शुभकामनायें !

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  6. मेरे एफएम पर गीत बज रहा है- 'मैं तो चला, जिधर चले रस्‍ता'.

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  7. दिलचस्प ,लेकिन आगे क्या हुआ ?

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  8. @Swarajya karun

    आगे की कथा गालिब के कल्लु खाँ सुनाएंगे।
    कृपया सम्पर्क करें।:)

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  9. ड्राईविन्ग मे पीना मना है कहीं चालन न हो जाये। रोचक रचना। बधाई।

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  10. @निर्मला कपिला जी
    प्रेस लिखी गाड़ी का कभी चालान नहीं कटता है |

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  11. बहुत खूब ..अलग अंदाज़ दिखा आपके लिखे का इस में ....बहुत बढ़िया

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  12. प्रस्तुति और अभिव्यक्ति बहुत बढिया लगी जी
    एक बात है कई दोस्तों में देखी है कि पीने के बाद किसी ना किसी को फोन करने की क्या याद आ जाती है।

    प्रणाम

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  13. मय रहे मीना रहे ...गर्दिश में पैमाना रहे ... मेरे साकी तू रहे ... आबाद मयखाना रहे !!
    खूब मूड है दादा !

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  14. अरे भैया , यमदूत से ज्यादा खतरनाक हैं मयदूत ।
    ज़रा थोड़ी थोड़ी पिया करो ।

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  15. धत तेरे की.... यह तो मयकदा निकला हम समझे की उसका घर है...



    प्रेमरस पर:
    खबर इंडिया पर व्यंग्य - जैसे लोग वैसी बातें!

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  16. लगता है बड़ी मेहनत से लिखी गई स्टोरी है .

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  17. aap ki lekhan mai ye kash baat hai ki jo padta hai usme duoob jata hai.

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