राजमहल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजमहल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 3 नवंबर 2012

नागार्जुन एवं राजमहल ......Sirpur Chhattisgarh......... ललित शर्मा

राजमहल का दृश्य 
प्राम्भ से पढ़ें 
सिरपुर में उत्खनित सभी पुरा धरोहरों को एक गलियारा बना कर जोड़ने का कार्य प्रगति पर है। इसके बाद कहीं से भी रास्ता पकड़ लीजिये, आप सिरपुर की धरोहरों का दर्शन किसी से रास्ता बिना पूछे कर सकते हैं। सिरपुर में आज हमारा अंतिम दिन था, दोपहर तक हमें यहाँ से रवानगी डालनी थी। इसलिए सुबह ही तैयार होकर राजमहल परिसर के अवलोकनार्थ चल पड़े। जब सिरपुर दक्षिण कोसल के पांडूवंशियों की राजधानी थी तो राजप्रसाद भी होना अत्यावश्यक है तभी राजधानी होने का दावा पुख्ता होता है। महानदी के तट पर पूर्वाभिमुख राजप्रसाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं। अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में 2000-2001 में यह विशाल परिसर प्राप्त हुआ। पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर उन्होंने इसे राजप्रसाद घोषित किया।

राजसभा में राजीव एवं प्रभात सिंह 
यह राजप्रसाद सिरपुर के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के समीप है। जब हम यहाँ पहुचे तो इसके सामने हेलीपेड बना हुआ दिखाईदिया। इससे जाहिर होता है कि  आगमन से पूर्व किसी विशिष्ट विभूति का आगमन हो चुका है। एक तरफ जहाँ वर्तमान सिरपुर गाँव को विस्थापित करने की चर्चा चल रही है दूसरी तरफ शासन नवीन अस्पताल का निर्माण  कराया जा रहा है। राजप्रसाद की दीवारों को देखने से लगता है कि यह ईमारत बहुमंजिला रही होगी। पक्की ईंटो से निर्मित राज प्रसाद का प्रथम कक्ष प्रहरियों के लिए है, इसके पश्चात् स्वागत कक्ष, राजसभा, इसके चरों और गलियारा है, राजसभा में प्रवेश के लिए उत्तर की तरफ भी एक द्वार बना हुआ है। राज सभा में राजा का विश्राम कक्ष, सहयोगी कक्ष आस पास बने है। सभा गृह दो भागों में विभक्त है, पहले भाग में राजा के समीप मंत्री, महामंत्री एवं विशिष्ट सभासद स्थान पाते होंगे। उसके पश्चात् अन्य सभासदों के बैठने का स्थान है।

नागार्जुन निवास एवं स्तूप 
राजसभा के प्रथम खंड में लगभग 20 प्रस्तर स्तम्भ के अवशेष दिखाई देते हैं। राजसभा के गलियारे के बाद, मुख्य महिषी, पट्ट महिषी, अन्य परिचारिकाओं के कक्ष हैं, उत्तर दिशा में पाक शाला के अवशेष दिखाई देते  हैं. वास्तु  के अनुसार उत्तर- पश्चिम में पाकशाला होने का अनुमान जंचा नहीं। पाकशाला अवश्य ही आग्नेय कोण में होनी चाहिए। हो सकता है अगले किसी प्रयास में प्राप्त हो जाये। वर्तमान स्थिति को देखते हुए अनुमान होता है कि राजप्रसाद का क्षेत्र विस्तृत रहा होगा। पश्चिम का हिस्सा महानदी के चौड़े हुए पाट की भेंट चढ़ गया है। जब राजप्रसाद में राजा का निवास होगा तब महानदी के तट पर इस महल की रौनक देखते ही बनती होगी। महानदी से आते हुए पवन के ठण्डे झकोरे महल को शीतल रखते होंगे। 

राजमहल सिरपुर 
राजमहल से चल कर थोड़ी दूर पर स्थित नागार्जुन के निवास स्थल पर पहुंच गए। कहते हैं कि प्रसिद्द रसायनज्ञ नागार्जुन  सिरपुर आकर रहे थे। इस परिसर  में तीन निवास स्थान दिखाई देते हैं। प्रमुख निवास के सामने स्तूप के अवशेष प्राप्त हुए हैं। स्तूप का शीर्ष इस संरचना से ही उत्खनन में प्राप्त हुआ है। नागार्जुन का सिरपुर आना बड़ी बात है। नागार्जुन सिरपुर आकर रहे होगें तो अवश्य ही यह बौद्ध धर्मावलम्बियों के निवास का प्रमुख केंद्र था। सिरपुर में प्राप्त विहारों से नागार्जुन के सिरपुर आगमन को प्रमाणिक बल मिलता है। भारत में बौद्ध धर्म से सम्बंधित पुरातात्विक स्थलों पर मनौती स्तूप प्राप्त होते रहे हैं। यह स्तूप प्रस्तर एवं धातुओं के होते हैं, श्रद्धालु अपनी श्रद्धानुसार प्रस्तर या धातु के मनौती स्तूपों का निर्माण करते थे।

मनौती स्तूप 
ऐसा ही एक प्रस्तर मनौती स्तूप बाजार क्षेत्र के श्रेष्ठी के निवास (इसे धातु मूर्ति शिल्प कार्यशाला नाम दिया गया है) से प्राप्त हुआ है तथा  जहाँ से प्राप्त हुआ इसे उसी स्थान पर रख भी दिया है। मनौती मानने की परम्परा प्राचीन काल से लेकर आज तक चली आ रही है। लोग इष्ट स्थानों पर मनौती मानते थे और मनवांछित फल प्राप्त होने पर मनौती मने गए स्थान पर उन वस्तुओं का अर्पण  थे। जैसे कुछ स्थानों पर वर्त्तमान में बकरा और भैंसा मनौती के रूप में कटे जाते हैं. उसी प्रकार बौद्ध धर्मावलम्बी मनौती पूर्ण होने पर मनौती स्तूपों का निर्माण कर स्थापित करवाते थे। जो उनके नाम से जाना जाता था। यहाँ से हम अब एक नयी पुरातात्विक साईट के सर्वेक्षण के लिए चल पड़े।   ........... जारी है ........ आगे पढ़ें .........

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

उतेलिया पैलेस: उसी हवेली के दाम लगने लगे --- ललित शर्मा

तेलिया पैलेस का नाम सुनते ही हम तुरत-फ़ुरत उतेलिया की निकल पड़े। मैने सोचा कि राजस्थान के किलों या महलों जैसा ही कुछ होगा। उतेलिया गाँव के चौराहे पर पहुंच कर लोगों से पैलेस का रास्त पूछा। उतेलिया एक गाँव ही नजर आया। हमारे छत्तीसगढ के ग्रामीण अंचल जैसे ही कवेलू के घर और उसी तरह की बसाहट। खेती के औजार लोगों के घर के सामने रखे थे। पशु यहाँ वहाँ सड़क पर बैठे-खड़े थे। येल्लो जी पहुंच गए उतेलिया पैलेस। हमें बताया गया था कि यहाँ एक होटल है और हम पैलेस देखने के साथ दोपहर के खाने का मंसूबा लिए आ पहुंचे। देखने से लगा कि हमारे यहाँ के किसी मालगुजार का रिहायशी बाड़ा है। सामने कवेलू का ऊंचा सा बरामदा है, जिसमें कवेलू लगाने के लिए बांस का उपयोग किया है। कम ऊंचाई का लोहे का दरवाजा दिखा। बरामदे में कुछ ग्रामीण बैठे गपशप मार रहे थे।

गाड़ी की आवाज सुनकर एक बंदा बाहर निकला। मैने पूछा कि उतेलिया पैलेस यही है? उसने हाँ में जवाब देते हुए प्रश्न किया - किससे मिलना है? विनोद भाई ने कहा कि पैलेस देखना  है। बात करते हुए गेट खोल कर हम भीतर प्रवेश कर चुके थे। यह बंदा तो हमें मंगल ग्रह से उतरे एलियन जैसा ही समझ रहा था। तभी एक वृद्ध बाबा आए उन्होने हमें पैलेस के विषय में जानकारी दी। बताया कि इस पैलेस के मालिक ठाकुर अहमदाबाद में रहते हैं। यहां कभी-कभी आते हैं। इसकी मरम्मत करवा के होटल में तब्दील कर रहे हैं। वे हमें पैलेस के भीतर ले गए और सभी जगहों को दिखाया। होटल के लिए कमरे तैयार किए जा रहे हैं, ठेठ गुजराती स्टाईल में इंटिरियर का काम चल रहा है। बड़े-बड़े पीतल के हंडे सज्जा की दृष्टि से रखे हैं।

पूछने पर बाबा ने बताया कि उतेलिया स्टेट में 12 गांव आते हैं। मैने इतनी छोटी स्टेट नहीं देखी थी। हमारे छत्तीसगढ में तो 12 गाँव के मालिक को दीवान कहते हैं। अगर ऐसा ही होता तो हर 12 गाँव पर एक राजा होता। पैलेस के सिंह द्वार पर हार्स पोलो खेलने की स्टीक करीने स्टेंड में लगी थी। पैलेस के बगल में स्थित घुड़साल में दो मरियल घोड़ियाँ भी थी। अगर कोई जवान सवार ही हो गया तो घोड़ी रहेगी या वह खुद, अस्पताल जाना तय। बाबा ने बताया कि यह गुजरात की स्पेशल नस्ल कि घोड़ियाँ हैं। गजब हो गया, अब इससे भी अधिक स्पेशल नस्ल की घोड़ी मिल जाए तो वह कैसी होगी। मुझे सोचने पर मजबूर हो गया। मैं तो एक बार ही घोड़ी पर बैठने की सजा भुगत रहा हूँ, पता नहीं ठाकुर कितने बार भुगतेगें, हा हा हा।

मैने बड़े-बड़े पैलेस और किले देखे हैं, इसलिए इस पैलेस का महत्व कम करके आंक रहा हूँ। लेकिन इसका महत्व इस इलाके में कम नहीं है। उतेलिया पैलेस को देखकर किसी का एक शेर याद आ रहा है इस मौके पर - कल जिसने हजारों की किस्मतें खरीदी थी, आज उसी हवेली के दाम लगने लगे। पैलेस का मुख्य द्वार बुलंदी के साथ खड़ा है। दरवाजे पर गुजरात के सुथारों की परम्परागत कारीगरी दिखाई दे रही है। फ़र्नीचर पर भी बारीक खुदाई का काम दिखाई दिया। मुख्यद्वार पर उतेलिया राज्य का राज चिन्ह लगा हुआ है। पुरानी हवेली अभी भी शान से खड़ी है। हवेली की दो चार फ़ोटो लेकर हमने यहाँ से अहमदाबाद वापसी का विचार बनाया। अब भूख लगने लगी थी और उतेलिया पैलेस में खाने का कोई इंतजाम नहीं था। हम उतेलिया से अहमदाबाद की ओर बढ लिए।

चौराहे पर एक ढाबा नुमा रेस्टोरेंट दिखा दिया। हमने भोजन करने लिए यही गाड़ी लगाई। छाछ के साथ तन्दूर की रोटी, खीर और कोफ़्ते की सब्जी मंगाई। पहले ही इधर के ढाबों के नाम से अनुभव ठीक नहीं रहा। इसलिए थोड़ा डरते-डरते ही खाया। भोजन करके हम अहमदाबाद चल पड़े। शाम 4 बजे हम अहमदाबाद पहुंच गए। अब वापसी की टिकिट बनाने का समय हो चुका था। वैसे गुजरात तो घूमना बहुत था लेकिन मुझे आए 6 दिन हो चुके थे। अब घर जाने का मन हो गया। विनोद भाई से टिकिट बनवाने के लिए कहा और हम पहुंच गए अपने गेस्ट हाऊस में। जब उतेलिया में था तो अल्पना का फ़ोन आया कि उसका कुछ सामान अहमदाबाद में छूट गया है, अगर ले आएं तो ..........। हमने कहा ले आएगें भाई, कांई वांदो नथी। अब इंतजार था अगली सुबह का.......... आगे पढें

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

नव वर्ष की वेला पर बाहें फ़ैलाए यामिनी --- ललित शर्मा

चित्रकुट जलप्रपात रात का दृष्य (मेरे मोबाईल से)
म अब चित्रकूट जाना चाहते थे, शाम के 5 बज रहे थे। हमारी मंजिल 66 किलोमीटर दूर थी। सपाटे से चल पड़े क्योंकि थोड़ी देर में अंधेरा होने को था। जगदलपुर से 6 किलोमीटर पहले अंकल की सीमेंट ब्लॉक फ़ैक्टरी है। गेट खुला देखकर भीतर प्रवेश कर गए। वे फ़ैक्टरी में ही मिल गए। चाय पीते हुए पौन घंटा बीत गया। वहाँ पता चला कि चित्रकूट जलप्रपात रात में भी देखा जा सकता है। वहाँ शासन ने बिजली की सुविधा कर रखी है। यह हमारे लिए अच्छा हुआ। नहीं तो सुबह उठकर जाना पड़ता। रात को जलप्रपात देखना अच्छा रहेगा। हमने चित्रकूट का रास्ता पकड़ लिया। बरसात लगातार जारी थी। हम कुछ भीगे हुए थे। इसी चित्रकूट रोड़ पर अली सा का घर भी है। रास्ते में देखने पर समझ नहीं आया। हम आगे बढते गए। एक जगह चित्रधारा प्रपात का बोर्ड भी लगा था। यह चित्रकूट से अलग झरना है। पर हमें तो चित्रकूट जाना था। चित्रकूट का असली नाम चित्रकोट है, पर चित्रकूट ही बोला जाता है। गांव में पहुंचने से पहले देखा कि बिजली की अच्छी रोशनी की गयी है। सड़क पर बत्तियाँ लगी हुई है।


चित्रकुट जलप्रपात रात का दृष्य (मेरे मोबाईल से)
रास्ता एक गेट के सामने जाकर खत्म होता है, गेट बंद था, इसलिए हमने दायीं तरफ़ एक मार्ग देखा तो उधर चल पड़े। यह रास्ता चित्रकूट के रिसोर्ट को जाता है। हम जल प्रपात की जगह रिसोर्ट में पहुंच गए। वहाँ पूछने पर जल प्रपात उस गेट के समीप ही बताया गया। हम वापस आए, बरसात जारी रही, सड़क पर ही गाड़ी लगाकर जलप्रपात देखने उतर गए। जल प्रपात के सामने एक बड़ी फ़ोकस लाईट लगी हुई है, जिसमें पर्याप्त रोशनी नहीं है। फ़िर भी नजारा बहुत अच्छा था। गरजरी हुई नदी खड्ड में गिर रही थी। दुधिया फ़ुहार खड्ड में छाई  हुई थी। मैने अपने मोबाईल से 2 चित्र लिए। पर मोनु का हैंडी कैम काम नहीं कर पाया। उसका कहना था कि अगर जल्दी आते तो एक विडियो बन ही जाता। लेकिन समय हमारे पास इतना था। भाभी जी का कहना था अगर होट्ल से सामान साथ ले आते तो यहीं रिसोर्ट में रुक जाते और सुबह जलप्रपात देखकर वापस चले जाते। यहाँ रुकना अब संभव नहीं था। इसलिए हमें जगदलपुर ही वापस लौटना था।

चित्रकूट जलप्रपात (राजतंत्र के सौजन्य से)
चित्रकूट जल प्रपात को नियाग्रा प्रपात की संज्ञा दी गयी है। यहां इंद्रावती नदी 23 फ़िट की ऊंचाई से नीचे गिरती है और इसकी धुंध में बहुत ही सुंदर इंद्रधनुष बनता है। पर हम रात में पहुचे थे, इसलिए इंद्रधनुष दिखना संभव नही था, नदी अनवरत गर्जना कर रही थी। कुछ देर तक हम प्रपात के किनारे चट्टानों पर खड़े होकर उसका अदभूत रुप निहारते रहे। अधिक देर खड़े रहते तो बरसात में पूरे ही भीग जाते। वापस आते हुए जलप्रपात के किनारे एक जगह पर महादेव जी भी विराज मान हैं। बरसात के कारण पत्थरों पर फ़िसलन हो गयी थी इसलिए अधिक खतरा उठाना ठीक नहीं था। चित्रकूट जलप्रपात भारत में नियाग्रा के नाम से प्रसिद्ध हो चुका है। यहाँ स्वयं के वाहन एवं बस से आया जा सकता है। रुकने लिए रिसोर्ट की व्यवस्था है, हम चूक गए, लेकिन आप चूक न जाना। दुबारा आने पर यहीं रिसोर्ट में रुकने का कार्यक्रम जरुर बनाएगें। यहाँ पर एक हैलीपैड भी है जो सिर्फ़ सरकारी कार्यक्रमों में उपयोग में लाया जाता है। जलप्रपात दर्शन का आनंद लेकर हम जगलदलपुर चल दिए।

जगदलपुर महल में दंतेश्वरी मंदिर (रात का दृश्य)
हम जगदलपुर लगभग आठ बजे पहुंच चुके थे। रास्ते में मुझे एन्थ्रोपोलाजी म्युजियम दिखाई दिया। यह म्युजियम मोनु द्वारा गुगल पर सर्च होने पर दिखाई दिया। वह इसे देखना चाहती थी। लेकिन हमारे पहुंचने तक बंद हो चुका था। पिछली बार जब आया था तब ही इस म्युजियम में बिजली बंद थी और मैं देख नहीं पाया था। ध्यान आया कि यहीं पर आन्ध्रसमाजम का बालाजी मंदिर भी है। बालाजी मंदिर को यहाँ बहुत ढंग से बनाया गया है। शिल्पकारों ने दक्षिण शैली में मूर्तियाँ गढने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हम बालाजी मंदिर में दर्शन करने पहुंचे। एन्थ्रोपोलाजी म्युजियम के आगे ही अली सा दौलत खाना है। इनको मंदिर दर्शन के लिए छोड़ कर अली सा से मिलने पहुंचे। अली सा से मिलकर अच्छा लगा। एक और अच्छी बात हैं उनमें किसी सी विषय में पूछने पर विस्तार से समझाते हैं कि आप भूल ही नहीं सकते। समयाभाव के कारण हम चाय पीकर वहाँ से विदा हुए। अली सा ने बताया कि उन्होने अपने मछली पालन टैंक के पानी को कुछ कम कर दिया है। उसमें मछलियाँ भी है काम की।

दुधिया रोशनी में चमकता राजमहल
बालाजी मंदिर से आकर बाकी साथियों को साथ लेकर हम शहर में पहुचे। जगदलपुर में मुझे सारे चौक एक से ही दिखाई देते हैं। जब भी आता हूँ भटक जाता हूँ। अपना होटल ढुंढते हुए हम सीरासार चौक याने राजमहल के सामने पहुंच गए। राजमहल दुधिया प्रकाश में दूर से ही चमक रहा था। राजमहल के भीतर भी दंतेश्वरी माई का मंदिर है। नव वर्ष पर देवी दर्शन करने वालों की लाईन लगी थी। हम भी पहुचे दर्शन हेतू, पता चला कि महल का राजकक्ष बंद हो चुका है। उसे हम नहीं देख पाए। साढे नौ बज चुके थे। रेनबो में कल रात को खाए खाने का अनुभव ठीक नहीं था। तो हमने बाहर ही खाने का विचार किया। अली सा ने आकांक्षा होटल का पता दिया था। इस आकांक्षा होटल में 1990 में एक बार रुक चुका था। लेकिन मुझे तो नया साल सेलीब्रेट करना था। इसलिए मैने कहा कि मुझे अपने होटल तक छोड़ दो, फ़िर सारे आकांक्षा होटल में जाकर भोजन कर आओ।

ढलता सूरज अस्ताचल को
काऊंटर पर आते ही एक लम्बा आर्डर मार दिया और अपने रुम में पहुच गया। टीवी पर समाचार जारी थे, मित्रों के फ़ोन आने लगे। पता चला कि बरसात पुरे छत्तीसगढ में हो रही है। मैने सोचा था कि वन होने के कारण बस्तर में ही हो रही होगी। मेरा कयास गलत निकला। मंदरस के सिप के साथ नए वर्ष के आगमन का आनंद आने लगा। कुछ मित्रों को फ़ोन लगा कर नव वर्ष की शुभकामनाएं दी। कभी मित्रों के साथ नया साल मनाते थे, पिछले कुछ सालों में घर पर बच्चों के साथ मनाते हैं। घर फ़ोन लगाया तो पता चला कि भारी बरसात के कारण बिजली रुठ गयी है, केक यूँ ही पड़ा है टेबल पर, बच्चे इंतजार करके सो चुके हैं। हम इधर अकेले बैठ कर नव वर्ष का इंतजार कर रहे थे। कब आए और उसका स्वागत करें। गुगल, ब्लॉग, मेल-फ़ीमेल सब भूल गए। सूर्य के क्षितिज से मिलन के पश्चात नव वर्ष की वेला में बाहें फ़ैलाए यामिनी स्वागत के लिए तैयार थी। कितनी देर तक उसके आग्राह को टालता, आगोश में समा ही गया।

एक रात में ही एक साल बीत गया, पलक खुलते ही 2012 सामने था। कितना कुछ बदल गया, सुहानी सुबह हो गई। बीते हुए पलों के निशान कमरे में यत्र-तत्र बिखरे थे। अब समेटना था उन्हे, जाने का समय आ गया। सुबह के 7 बज रहे थे, बीती रात की खुमारी से सूर्यदेवता नहीं उबरे थे, वे भी ड्यूटी भूल कर 2012 के प्रथम रविवार को देर तक बिस्तर पर थे। अंधेरा कायम था, हमें तो चलना था इसलिए ठंडे पानी में ही डुबकी लगाई। रंगोली के कार्यक्रम में ए आर रहमान स्पेशल चल रहा था और हम थे लाईफ़ जैकेट लेकर जादू वाले नयनों में डूबने को बेताब, चैनल बदलना पड़ा। हमारे मन माफ़िक गाने चलने लगे। ये जिन्दगी उसी की है.........., हमे पता है भाई, ये जिन्दगी उसी की है। जैसे सूदखोर लाला रोज चौखट पर आकर बता जाता है ब्याज कितना हुआ है वैसे ही तुम भी रोज याद दिला जाते हो कि ये जिन्दगी उसी की है। सच है उधार कभी चैन नहीं लेने देती। सूरज रात भर चले न चले पर तुम्हारा सूद 24X7 कल्लाक चलता है। इसीलिए कबीर ने जस की तस धर दीनी चदरिया। हम जब भी जाएगें तुम्हारा मूल सूद समेत चुका कर जाएगें।


किर्रर्र किर्रर्र, किर्रर्र किर्रर्र की आवाज के साथ दरवाजा खुला तो बैरा नजर आया। "सर सामान नीचे गाड़ी में रखना है।" मन ही मन सोचता हूँ कि चैन के दो पल भी कोई लेने नहीं देता। सूद काफ़ी बढ चुका है मूल अब चुका ही देना चाहिए। सामान नीचे गाड़ी में पहुंचता है नए साल की सुबह की शुरुआत दही और शक्कर से करता हूँ। बिल काऊंटर पर भाभी जी नसीहतें दे रही थी, थोड़ी सी गहमा गहमी के बाद मामला फ़िट हो जाता है और हम चल पड़ते हैं अपने गंतव्य की ओर। बस्तर का गढवा शिल्प बहुत प्रसिद्ध हो चुका है। सागौन की लकड़ी में बस्तर की सांस्कृतिक विरासत की शिल्पकारी की देश भर में मांग है। इन्हे बड़े अधिकारियों के घर में ड्राईंग रुम की शोभा बढाते देखता हूँ। आज कल गिफ़्ट के रुप में इनका प्रचलन खूब बढ रहा है। भाभी जी के मन में आता है कि कुछ खरीदना चाहिए। हमें जगदलपुर से जल्दी बाहर निकलना था इसलिए मैने कहा कि कोन्डागाँव में ले लेगें। कोंडागाँव बस्तर जिले का ही एक ब्लॉक है, जिस दिन हम कोण्डागाँव पहुंच रहे थे उसी दिन यह जिला बन रहा है। 1 जनवरी 2012 को कोण्डागाँव ने विधिवत जिले का रुप ले लिया और हम उसके साक्षी बने...............।