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शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

विजयनगर साम्राज्य की गुप्तचर एवं दंड व्यवस्था : दक्षिण यात्रा 13

विजय नगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेव राय ने अपने जीवन काल में 14 युद्ध किए और उनमें विजय पाई। दक्षिण में उनका एक क्षत्र साम्राज्य स्थापित हो गया। यह समय हम्पी के लिए स्वर्णकाल माना जा सकता है। इस दौरान राज्य में निर्माण भी प्रचूर मात्रा में हुए। किसी भी साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उसकी गुप्तचर प्रणाली सुदृढ होनी चाहिए। गुप्तचर ही राजा के आँख-कान होते हैं, उनके माध्यम से ही राज्य का हाल चाल एवं षड़यंत्रों की सूचना राजा तक पहुंचती है। इन सूचनाओं का परीक्षण कर राजा शत्रुओं एवं षड़यंत्रकारियों से सचेत हो सकता है। वैसे भी इतिहास से ज्ञात होता है कि युद्ध विजयों में गुप्तचरों का विशेष योगदान रहा है।
राजा कृष्ण देव राय
गुप्त शब्द के साथ रोमांच जुड़ा हुआ है। हम्पी में भी कई गुप्त स्थान हैं, जहाँ राजा अपने गुप्तचरों एवं राज्य के विशेष अधिकारियों से गुप्त मंत्रणा करता था। शाही आवास क्षेत्र के मध्यम में एक भूमिगत गुप्त मंत्रणा कक्ष भी बना हुआ है। जिसकी छत वर्तमान में ढह गई है। इस कक्ष का निर्माण काले ग्रेनाईट से किया गया है। लगभग 15X15 लम्बाई चौड़ाई के इस कक्ष के चारों तरफ़ गलियारा है, तथा गलियारे में मशाल लगाने स्थान बने हुए हैं। वर्तमान में उन्मुक्त द्वार कभी गुप्त रहा होगा। कक्ष की छत धरती के समतल है जो वर्तमान में ढह गई है। राजा यहाँ सामरिक महत्व की चर्चा करने सेनापति और महामंत्री के साथ गुप्तचरों से भी भेंट करते रहे होंगे। कभी किसी विशेष कैदी को भी इस स्थान पर रखा जाता होगा।
गुप्त मंत्रणा कक्ष 
बाबू देवकी नंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता संतति में गुप्तचरों (एयारों) एवं गुप्त कक्षों के माध्यम राज काज का खाका खींचा गया है। बताया क्या है कि गुप्तचर एक राज्य के लिए कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। भूमिगत रास्ते, गुप्त मंत्रणा कक्ष, तहखाने, गुप्त यातना गृह एवं कारावास इत्यादि राज्य की व्यवस्था के आवश्यक अंग थे। प्रत्येक किले या दूर्ग के निर्माण के समय सुरक्षा की दृष्टि से कई भूमिगत गुप्त रास्तों का निर्माण किया जाता था। जो वर्तमान में भी हमें किलों में दिखाई देते हैं। इसके साथ खजाने को भी गुप्त रखने की व्यवस्था की जाती थी। जिसकी जिम्मेदारी किसी एक विश्वसनीय के पर होती थी तथा बीजक के माध्यम से खजाने का मार्ग दर्शाया जाता था।
गुप्त मंत्रणा कक्ष का द्वार
हम देखते हैं कि किलों एवं दुर्गों में स्थित कूपों में कई कक्ष एवं द्वार दिखाई देते हैं। कई तलों में इन कूपों का निर्माण किया जाता था तथा उन तक पहुंचने के लिए पैड़ियों का निर्माण किया जाता था। यह कूप भी एक तरह से गुप्त मंत्रणा के कार्य में लिए जाते थे। जब राज्य काज संबंधी कोई आवश्यक चर्चा करनी होती थी तब इन कूपों का उपयोग किया जाता था। इसलिए कूप खनन के दौरान भी उसमें गुप्त कक्ष बनाए जाते थे। चर्चा के दौरान आवाज गुंजित न हो इसलिए दीवारों को मोटा बनाया जाता था। कई स्थानों पर दीवारें कई हाथ मोटी दिखाई देती हैं। चुनारगढ़ के किले के कुंए में भी इस तरह के गुप्त द्वार दिखाई देते हैं। इस तरह राज्य की सूरक्षा के लिए गुप्त कक्ष एवं तहखानों का निर्माण होते थे। 
विजयनगर राज्य का राजकीय आवास क्षेत्र
राज्य को चलाने के लिए दंड विधान की आवश्यकता भी होती है। कभी मानव सभ्यता का एक काल ऐसा भी जब न राजा था, न राज्य था, न दंड था, न दंड था, न दंडी था और सभी लोग मानव धर्म के अनुसार एक दूसरे का सम्मान करते हुए रक्षा करते थे। (न राज्यं न च राजासीत न दण्डो न च दाण्डिकः। स्वयमेव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम ॥)  दंड की उत्पत्ति राज्यसंस्था की उत्पत्ति के साथ हुई। महाभारत के शांतिपर्व: (56.13-33) में यह कहा गया है कि मानव जाति की प्रारंभिक स्थिति अत्यंत पवित्र स्वभाव, दोषरहित कर्म, सत्वप्रकृति और ऋतु की थी। तब दंड की आवश्यकता ही नहीं थी।
हाथी द्वारा मृत्यु दंड
किंतु कालांतर में तामस्गुणों का प्राबल्य बढ़ने लगा, मनुष्य समाज अपनी आदिम सत्व प्रकृति से च्युत हो गया और मत्स्य न्याय छा गया। बलवान् कमजोरों को खाने लगे। ऐसी स्थिति में राज्य और राजा की उत्पत्ति हुई और सबको सही रास्तों पर रखने के लिये दंड का विधान हुआ। दंड राज्य शक्ति का प्रतीक हुआ जो सारी प्रजाओं का शासक, रक्षक तथा सभी के सोते हुए जागनेवाला था। अत: दंड को ही धर्म स्वीकार किया गया। राज्य धर्मानुसार दंड की व्यवस्था सभी पर समान रुप से लागु थी, इतिहास गवाह है कि राजाओं ने भी दंड को स्वीकार कर राज्य धर्म की रक्षा की। दंड का प्रयोग करनेवाला राजा भी यदि धर्म का उल्लंघन करे तो दंड का भागी होता था। धर्म अर्थात् विधि से परे कोई न था धर्म राजाओं का भी राजा था। राज्य का प्रधान राजा अथवा अन्य कोई शक्ति, यथा गणतंत्र का मुखिया न्यायिकय संगठन का प्रधान अवश्य था, किंतु विधि का प्रधान वह कभी नहीं हो सका और विधि के उल्लंघन करने पर दंड उस पर भी सवार हो जाता था। 
दंड के लिए हाथी को उकसाते हुए
दंड चार तरह के माने गए, 1- प्रतीकारात्मक - समाज की अत्यंत प्रारंभिक अवस्था प्रतीकारात्मक दंड की थी, जिसमें आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत (फोड़ देने और उखाड़ देने) का सिद्धांत चलता था। वैदिक साहित्य की "जीवगृभ" जैसी संज्ञाएँ इस बात की द्योतक हें कि भारतीय इतिहास के अत्यंत प्रारंभिक काल का न्याय कठोर और प्रतीकारात्मक ही था। इस सिद्धान्त की मान्यता है कि एक अपराधी को कठोर दण्ड देने से दूसरे लोग अपराध करने से डरते हैं।

2- निषेघात्मक - निषेधात्मक सिद्धान्त की मान्यता है कि अपराधी को दण्ड देने से जिसके प्रति अपराध हुआ है उसे उसका 'बदला' मिल जाता है। यह सभी सिद्धान्तों में सबसे बुरा सिद्धान्त है क्योंकि इसमें समाज का कल्याण या समाज की सुरक्षा की भावना नहीं है। 

3-अवरोधक -तीसरी अवस्था में दंड का स्वरूप प्रतीकारात्मक के बदले अवरोधक हो गया। इसका कारण था दोषी मनुष्य के प्रति दोष किए गए हुए मनुष्य का निपट लेने के बजाय दंड धारण करनेवाले राज्य का बीच में आ जाना। व्यक्तिगत बदले की भावना को समाप्त कर राजकीय दंड की महिमा को स्थापित करना राज्य का उद्देश्य और उसकी बढ़ती हुई शक्ति का द्योतक हो गया। दीवानी के मामलों में अर्थदंड आदि द्वारा दोष किए गए हुए व्यक्ति को कुछ बदला दिलाना यद्यपि वैध माना गया, फौजदारी के मामलों में बदला लेना अब असंभव था। किंतु कठोर - कभी कभी तो अत्यंत क्रूर और असभ्य दंडों का दिया जाना प्राय: नियम सा था। 
विजयनगर राज्य का सार्वजनिक दंड स्थल 
4- सुधारात्मक - चौथा और सर्वोत्तम दंड का प्रकार है सुधारात्मक। सभ्यता के विकास के क्रम में भी यद्यपि सभी देशों में संभावित दोषियों के प्रति दोषों के गंभीर परिणाम और दंडयातनाओं का भय उपस्थित करने के लिय कठोर अवरोधक दंड दिए जाते रहे हैं, पर कभी-कभी सुधारात्मक प्रवृत्तियाँ भी उठती रही हैं। प्राचीन रोम में दोषी की स्वतंत्रता का हरण (जेल में डाल देना) मात्र ही सबसे बड़ा दंड माना गया और उसके बाद कोई यातना आवश्यक नहीं समझी गई । भारतवर्ष में कौटिल्य ने काराग्रस्तों को प्रायश्चित्त कराने और अपने पापों का बोध कराने की व्यवस्था के द्वारा उन्हें विशुद्ध कराने का उल्लेख  किया है।
विजयनगर राज्य के सार्वजनिक दंड स्थल पर ब्लॉगर
आज दंड विधान की चर्चा करने का उद्देश्य था कि हम्पी यात्रा के दौरान प्राचीन विजयनगर राज्य में भी दंड की व्यवस्था के प्रमाण दिखाई देते हैं, जहाँ कारागार में निरुद्ध करने एवं सार्वजनिक रुप से दंड देने की प्रथा दिखाई देती है। राजमहल के लगे हुए दशहरा उत्सव स्थल के समीप सार्वजनिक रुप से दंड देने के लिए मुख्य मार्ग पर दो स्तंभ गड़े दिखाई देते हैं। इन स्तंभों के छिद्रों में लकड़ी डालकर अपराधी को हाथों से उसमें बांध दिया जाता था। यहाँ उसे प्रजा की उपस्थिति में सार्वजनिक रुप से दंड दिया जाता था। यह दंड सार्वजनिक रुप से कोड़े मारने से लेकर शीश विच्छेद तक का हो सकता था। किसी भी राज्य के संचालन के लिए साम, दाम, दंड एवं भेद की प्राचीन पद्धति लागु होती है। क्रूरतम अपराधी एवं राजद्रोही को कठोर दंड का विधान था। जारी है... आगे पढ़ें 

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

विजयनगर साम्राज्य का समृद्ध इतिहास : दक्षिण यात्रा 13

लते-चलते एक नजर विजयनगर साम्राज्य के इतिहास पर भी डालते हैं। वर्तमान के खंडहरों में जो विजयनगर राज्य का वैभव दिखाई देता है, उसे बनाने में कई पीढिया बीत गई। तब कहीं जाकर आज भव्य भवन, सुव्यवस्थित बाजार, नगर सुरक्षा, जल प्रबंधन, नगर प्रबंधन, सैनिक छावनी, शस्त्रागार, अन्नागार, वास्तु शिल्प एवं प्रतिमा शिल्प दिखाई दे रहा है। अगर उस काल में किसी भी राजा ने देखा होगा तो इसी तरह की राजधानी बनाने की कल्पना की होगी और यहाँ के एश्वर्य से अचम्भित अवश्य हुआ होगा। विजयनगर साम्राज्य (1336-1646) मध्यकालीन दक्षिण भारत का एक साम्राज्य था। इसके राजाओं ने 310 वर्ष राज किया। 
विरुपाक्ष मंदिर के पुजारी एवं कथा का सुत्रधार ब्लॉगर
विजयनगर राज्य का वास्तविक नाम कर्णाटक साम्राज्य था। इसकी स्थापना हरिहर प्रथम और बुक्का राय प्रथम नामक दो भाइयों ने की थी। दोनो भाई युद्ध प्रेमी एवं कुशल रणनीतिकार थे पुर्तगाली इसे बिसनागा राज्य के नाम से जानते थे।इस राज्य की 1567 में भारी पराजय हुई और राजधानी विजयनगर को जला दिया गया। उसके पश्चात क्षीण रूप में यह और 80 वर्ष चला। राजधानी विजयनगर के अवशेष आधुनिक कर्नाटक राज्य में हम्पी शहर के निकट पाये गये हैं और यह एक विश्व विरासत स्थल है। पुरातात्त्विक खोज से इस साम्राज्य की शक्ति तथा धन-सम्पदा एवं वैभव का पता चलता है।
विजयनगर साम्राज्य की भव्यता की दास्तान कहते खंडहर
विजयनगर राज्य में चार विभिन्न वंशों ने शासन किया। प्रत्येक वंश में प्रतापी एवं शक्तिशाली नरेशों की कमी न थी। युद्धप्रिय होने के अतिरिक्त, सभी हिंदू संस्कृति के रक्षक थे। स्वयं कवि तथा विद्वानों के आश्रयदाता थे। हरिहर तथा बुक्क संगम नामक व्यक्ति के पुत्र थे अतएव उन्होंने संगम सम्राट् के नाम से शासन किया। विजयनगर राज्य के संस्थापक हरिहर प्रथम ने थोड़े समय के पश्चात् अपने वरिष्ठ तथा योग्य बंधु को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया। संगम वंश के तीसरे प्रतापी नरेश हरिहर द्वितीय ने विजयनगर राज्य को दक्षिण का एक विस्तृत, शक्तिशाली तथा सुदृढ़ साम्राज्य बना दिया।
शाही आवास क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य ह्म्पी
हरिहर द्वितीय के समय में सायण तथा माधव ने वेद तथा धर्मशास्त्र पर निबंधरचना की। उनके वंशजों में द्वितीय देवराय का नाम उल्लेखनीय है जिसने अपने राज्याभिषेक के पश्चात् संगम राज्य को उन्नति का चरम सीमा पर पहुँचा दिया। मुसलमानी रियासतों से युद्ध करते हुए, देबराय प्रजापालन में संलग्न रहा। राज्य की सुरक्षा के निमित्त तुर्की घुड़सवार नियुक्त कर सेना की वृद्धि की। उसके समय में अनेक नवीन मंदिर तथा भवन बने। दूसरा राजवंश सालुव नाम से प्रसिद्ध था। इस वंश के संस्थापक सालुब नरसिंह ने 1487 से 1490 ई. तक शासन किया। उसने शक्ति क्षीण हो जाने पर अपने मंत्री नरस नायक को विजयनगर का संरक्षक बनाया।
स्तंभ एवं भग्नावशेष विजाय्नगर साम्राज्य हम्पी
यही नरस नायक, तुलुव वंश का प्रथम शासक माना गया है। उसने 1490 से 1509 ई. तक शासन किया और दक्षिण में कावेरी के सुदूर भाग पर भी विजयदुंदुभी बजाई। तुलुब वंशज कृष्णदेव राय का नाम गर्व से लिया जाता है। उसने 1509 से 1539 ई. तक शासन किया। वह महान प्रतापी, शक्तिशाली, शांतिस्थापक, सर्वप्रिय, सहिष्णु और व्यवहारकुशल शासक था। उसने नायक लोगों को दबाया, उड़ीसा पर आक्रमण किया और दक्षिण के भूभाग पर अपना अधिकार स्थापित किया। सोलहवीं सदी में यूरोप से पुर्तगाली भी पश्चिमी किनारे पर आकर डेरा डाल चुके थे। उन्होंने कृष्णदेव राय से व्यापारिक संधि की जिससे विजयनगर राज्य की श्रीवृद्धि हुई।
विहंगम दृश्य विजयनगर साम्राज्य ह्म्पी
तुलुव वंश का अंतिम राजा सदाशिव परंपरा को कायम न रख सका। सिंहासन पर रहते हुए भी उसका सारा कार्य रामराय द्वारा संपादित होता था। सदाशिव के बाद रामराय ही विजयनगर राज्य का स्वामी हुआ और इसे चौथे वंश अरवीदु का प्रथम सम्राट् मानते हैं। रामराय का जीवन कठिनाइयों से भरा पड़ा था। शताब्दियों से दक्षिण भारत के हिंदू नरेश इस्लाम का विरोध करते रहे, अतएव बहमनी सुल्तानों से शत्रुता बढ़ती ही गई। मुसलमानी सेना के पास अच्छी तोपें तथा हथियार थे, इसलिए विजयनगर राज्य के सैनिक इस्लामी बढ़ाव के सामने झुक गए। विजयनगर शासकों द्वारा नियुक्त मुसलमान सेनापतियों ने राजा को घेरवा दिया अतएव सन् 1565 ई. में तलिकोट के युद्ध में रामराय मारा गया। मुसलमानी सेना ने विजयनगर को नष्ट कर दिया जिससे दक्षिण भारत में भारतीय संस्कृति की क्षति हो गई। 
विरुपाक्ष मंदिर के समक्ष स्थापित भव्य नंदी
अरवीदु के निर्बल शासकों में भी वेकंटपतिदेव का नाम विशेषतया उल्लेखनीय है। उसने नायकों को दबाने का प्रयास किया था। बहमनी तथा मुगल सम्राट् में पारस्परिक युद्ध होने के कारण वह मुसलमानी आक्रमण से मुक्त हो गया था। इसके शासनकाल की मुख्य घटनाओं में पुर्तगालियों से हुई व्यापारिक संधि थी। शासक की सहिष्णुता के कारण विदेशियों का स्वागत किया गया और ईसाई पादरी कुछ सीमा तक धर्म का प्रचार भी करने लगे। वेंकट के उत्तराधिकारी निर्बल थे। शासक के रूप में वे विफल रहे और नायकों का प्रभुत्व बढ़ जाने से विजयनगर राज्य का अस्तित्व मिट गया।
सुरक्षा चौकी विजयनगर साम्राज्य हम्पी
विजयनगर के शासक गण राज्य के सात अंगों में कोष को ही प्रधान समझते थे। उन्होंने भूमि की पैमाइश कराई और बंजर तथा सिंचाइवाली भूमि पर पृथक्-पृथक् कर बैठाए। चुंगी, राजकीय भेंट, आर्थिक दंड तथा आयात पर निर्धारित कर उनके अन्य आय के साधन थे। विजयनगर एक युद्ध राज्य था अतएव आय का दो भाग सेना में व्यय किया जाता, तीसरा अंश संचित कोष के रूप में सुरक्षित रहता और चौथा भाग दान एवं महल संबंधी कार्यों में व्यय किया जाता था। इन शासको में कृष्णदेव राय का नाम अग्रणी रुप से लिया जाता है और कहा जाए तो उनका शासन विजयनगर साम्राज्य का स्वर्ण काल था।  जारी है आगे पढें…

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना विट्ठल मंदिर हम्पी : दक्षिण यात्रा 11

विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी को मंदिरों का नगर कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि यहां शैव, वैष्णव, शाक्त सभी पंथो का प्रतिनिधित्व करते हुए मंदिरों का निर्माण भव्यता के साथ हुआ है। विरुपाक्ष स्वामी मंदिर शिव को, विट्ठल मंदिर विष्णु को एवं माता मंदिर देवी को समर्पित है। इसके साथ ही जैन मंदिर एवं मठ भी है। इससे स्पष्ट होता है कि विजय नगर साम्राज्य में सभी पंथो का समान आदर था। अगर हम्पी नगर का भ्रमण करना है तो कम से कम पर्यटक के पास 3 दिन का समय होना चाहिए तथा वाहन भी। क्योंकि सभी मंदिर एवं स्मारक दो-चार किमी की दूरी पर है। यहाँ किराये पर सायकिल मिलती है, जिससे भ्रमण किया जा सकता है।
तलारी गट्टा द्वार
विरुपाक्ष मंदिर के दर्शनों के पश्चात हम विट्ठल मंदिर पहुंचे यह मंदिर से पूर्व दिशा की ओर लगभग 5 किमी की दूरी पर है। विट्ठल मंदिर के लिए तलारीगट्टा द्वार से होकर जाना पड़ता है। तलारी गट्टा का अर्थात चुंगी द्वार। इस द्वार से प्रवेश करने वाले व्यापारी से यहां चुंगीकर वसूल किया जाता था। 
बैटरी चलित वाहन को चलाती लड़की
यह मंदिर तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर है। यहां पहुंचने पर मंदिर एक किमी पहले वाहन पार्किंग में खड़े करवा लिए जाते हैं, इसके बाद यहां से बैटरी चलित वाहन से मंदिर तक ले जाया जाता है। इन वाहनों को यहां के गांव की लड़कियाँ चलाती हैं। मुझे कर्नाटक सरकार का यह कार्य पसंद आया। अधिक लड़कियां विद्यार्थी हैं, जो पार्ट टाईम में वाहन चलाकर कुछ खर्च जुटा लेती हैं।
विट्ठल मंदिर का दृश्य
कड़प्पा पत्थरों का शहर होने के कारण यहाँ के सभी भवन पत्थरों से ही निर्मित है। मंदिरों के प्रथम तल कड़प्पा पत्थरों से बने हुए हैं और ऊपर के तल में ईंटों का प्रयोग हुआ है। कड़प्पा पत्थर अधिक सख्त होता है, इसलिए इस पर नक्काशी का काम सावधानी एवं कठिन परिश्रम भी मांगता है। विट्ठल मंदिर के गोपुरम का शीर्ष भाग भग्न हो चुका है। इसकी निर्माण शैली में इस्लामिक प्रभाव नहीं है, यह विशुद्ध हिन्दू शैली में निर्मित है। इसके मुख्यद्वार पर शिलापट का उपयोग हुआ है। द्वार पदतल शिला पर दंडवत होकर प्रणाम करते हुए मनुष्यों का अंकन दिखाई देता है। स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर मूल दक्षिण भारतीय द्रविड़ मंदिरों की स्थापत्य शैली का प्रतिनिधित्व करता है।
हम्पी का लैंडमार्क गरुड़ रथ
इस मंदिर का निर्माण सोलहवीं सदी में राजा कृष्णदेव राय द्वारा किया गया बताया जाता है। मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर हम्पी के लैंडमार्क गरुड़ रथ का पार्श्व भाग दिखाई देता है। यह मंदिर के विशाल प्रांगण के मध्य में रखा हुआ है। इसे इस तरह स्थापित किया गया है कि मंदिर के गर्भगृह भगवान विट्ठल को गरुड़ रथ में विराजित होकर देखता रहे। मंदिर के गर्भगृह से गरुड़ रथ का द्वार दिखाई देता है। गरुड़ रथ का निर्मान एकाश्म चट्ठान से करने की बजाए, पत्थर से किया गया है। जिस तरह लकड़ी से रथ के सभी अंगों को बनाकर जोड़ा जाता है, इसी तरह गरुड़ रख में पत्थर से बनाकर रथ के सभी अंगों को जोड़ा गया। जिसे पत्थर के बने दो हाथी खींच रहे हैं। पहले इसे घोड़े खींचा करते। घोड़े को किसी ने भग्न कर दिया तो उसी पत्थरों को शिल्पकार ने हाथी की आकृति में बदल दिया। इसके प्रमाण स्वरुप रथ में जुते घोड़े की टांगे दिखाई देती हैं।
महामंडप - इसके ही स्तंभों से मधुर ध्वनि निकलती है।
मंदिर में महामंडप, रंग मंडप एवं अन्य कई मंडप हैं, महामंडप की छत भग्न हो चुकी है। इस महामंडप में जड़ित 56 स्तंभ हैं, जिन्हें थपथपाने मधुर संगीत सुनाई देता है। प्रत्येक स्तंभ से अलग तरह का स्वर निकलता है। सुरक्षा की दृष्टि से स्तंभो के थपथपाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। महामंडप के पश्चात गर्भगृह है, जो प्रतिमा विहीन है। मंदिर के गर्भगृह द्वार पर नदी देवियों के स्थान द्वारपाल बनाए गए हैं। द्वार शिलापट पर गजाभिषिक्त लक्ष्मी अंकित हैं। अधिष्ठान रिक्त है, यहां अवश्य ही विष्णु विग्रह रहा होगा। विट्ठल देव मंदिर हम्पी का सर्वाधिक अलंकृत मंदिर है। इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है। सिंह व्याल, गज व्यालादि का अंकन प्रस्तर भित्तियों पर दिखाई देता है।
रंग मंडप का भीतरी भाग
गर्भगृह की भित्तियों पर रामायण की कथा का चित्रण किया गया है। जिसमें राजा दशरथ द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ। अशोक वाटिका में हनुमान द्वारा सीता को राम मुद्रिका देना, वानर सेना का सीता जी खोज करने का अंकन प्रमुख है। इसके साथ ही लक्ष्मी नारायण इत्यादि को प्रदर्शित किया गया है। बाहरी भित्ति पर पद्मासन लगाए हुए ध्यानरत साधु का अंकन किया गया है। यह आद्य शंकराचार्य हो सकते हैं। इसके साथ ही रामायण के अन्य प्रसंगों का चित्रण भी महत्वपूर्ण है। इस मंदिर को देखने के लिए भरपूर समय चाहिए। पर हमारे पास समय की कमी थी, सांझ ढल रही थी, इसलिए हम जल्दी से जल्दी और अधिक से अधिक अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहते थे। फ़िर भी बहुत कुछ छूट गया। 
अशोक वाटिका में सीता जी
इससे तो सभी विज्ञ है कि प्राचीन काल में भारत में तकनीकि विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर था। जहाँ पुष्पक विमान से लेकर अन्य आश्चर्यचकित करने वाली तकनीकि सामने आई। विट्ठल मंदिर की बाहरी भित्ति में उत्कीर्ण एक प्रतिमा में दो चक्के का स्कूटर दिखाया गया है। जिसमें हैंडिल भी है और इक स्त्री इसे फ़र्राटे से संचालित करते हुए दिखाई दे रही है। उसने एक हाथ में स्कूटर का हैंडिल पकड़ा हुआ है और दूसरे हाथ में खड्ग दिखाई दे रही है। अवश्य ही यह युद्ध का चित्रण किया गया है, स्कूटर सवार वेगवती स्त्री हाथ में खडग लेकर जैसे अरिसेना को ललकार कर आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। इस तरह दो चक्कों के इलेक्ट्रानिक स्कूटर आज दिखाई देते हैं। वैसे भी स्कूटर का अविष्कार उन्नीसवीं सदी की औद्यौगिक क्रांति की देन है। परन्तु विट्ठल मंदिर का यह स्कूटर सोलहवीं शताब्दी में ही तैयार हो गया और संचालन नारी के द्वारा हो रहा है, इससे यह भी जाहिर होता है कि समाज में नारियों की स्थिति शीर्ष पर रही होगी। 
स्वचालित स्कूटर सवार स्त्री
विट्ठल मंदिर की भव्यता ऐसी है कि दर्शक ठगा सा खड़ा रह जाएगा। प्रस्तर स्थापत्य का अद्भुत कार्य यहाँ देखने को मिलता है। मंदिर की सुरक्षा परिखा काफ़ी मजबूत बनाई गई है। इसके साथ ही यहां फ़ूल बाजार भी है।  इस स्थान पर मंदिर में अर्पण करने एवं अन्य कार्यों के फ़ूलों का विक्रय होता था। इसके साथ ही अन्य सामान भी मिलता होगा। प्रस्तर स्तंभों से निर्मित बाजार की दुकानें अपने वैभव का गुणगान स्वत ही करती हैं। दुकानों के मध्य प्रतिमा विहीन एक मंदिर भी है। इस मंदिर किस देवता का विग्रह स्थापित था और किसे समर्पित था, इसकी जानकारी मुझे प्राप्त नहीं हो सकी। मंदिर का दर्शन करके हम सन सेट पाईंट की लौट गए।
राम मंदिर हम्पी का गोपुरम
सन सेट पाईंट एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ से अस्ताचल को जाते हुए सूर्य का दृश्य सुंदर दिखाई देता है। यहां बड़े परकोटे घिरा हुआ राम मंदिर भी है। यह अयोध्या की हनुमानगढ़ी से संचालित होता है। इस मंदिर का गोपुरम छोटा है तथा द्वार शीर्ष पर गजलक्ष्मी का अंकन है। भीतर प्रवेश करने पर चतुष्टिका में लगे हुए शिलालेख दिखाई देते हैं तथा एकाश्म प्रस्तर का एक स्तंभ भी गड़ा हुआ है। शायद इस पर गरुड़ विराजमान रहे होगें। परन्तु अभी उपर का हिस्सा रिक्त है। मंदिर का गर्भगृह एकाश्म चट्टान को खोद कर गुहानुमा बनाया गया है। तथा उसी चट्टान को निर्माण में सम्मिलित करते हुए महामंडप का निर्माण किया गया है। हम जब पहुंचे तो यहाँ रामचरित मानस का अखंड पाठ जारी था।
सुर्यास्त स्थल पर हनुमान जी
मंदिर के पीछे पहाड़ी से सूर्यास्त देखा जाता है। जब हम पहुंचे तो सुर्य अस्ताचल को जा चुके थे, थोड़ी सी लालिमा दिखाई दे रही थी। इस स्थान पर बहुत से पर्यटकों के पहले से ही डेरा जमा रखा रखा था। यहां एक चट्टान पर कई शिवलिंग बने हुए हैं। जिस पर लोग पुष्प चढा रहे। पर्यटक सूर्यास्त की फ़ोटो खींचने में व्यस्त थे। एक व्यक्ति गदाधारी हनुमान जी का रुप धरकर उनसे कुछ दक्षिणा मिलने की उम्मीद लगाए, पूंछ हिलाते खड़ा था। यहां की फ़ोटो लेते हुए अंधेरा होने लगा था। इसके बाद हम कमलापुर लौट आए। आर्कियोलॉजी के गेस्ट हाऊस में रुम खाली न होने पर हमने एक होटल में रुम लिया और पुन: अम्बेडकर सर्किल के होटल में भोजन कर विश्राम गति को पहुंच गए। जारी है, आगे पढें।