शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

इनकी उनकी नाक कटन्ना, उनने इनकी नार हरन्ना -- ललित शर्मा

जय लंकेश
गतांक से आगे
रावण को मैदान में छोड़कर मैं घर चले आया। उदय ने मुझसे कहा कि-"पापा सोनपत्ती तो आप लाए ही नहीं, फ़िर से जाओ और रावण जलने के बाद सोनपत्ती लेकर आना।" अब पुत्र का आदेश मानना ही पड़ा। दुबारा रावण भाटा जाकर रावण के मरने का इंतजार करने लगे। इस दौरान कुछ लोग चर्चा कर रहे थे कि इस बार का रावण दुबला नजर आ रहा है। पिछले साल तो अच्छा मोटा तगड़ा था। रमेसर ने कहा कि- "26 रुपया में तो रावण इतना ही मोटा होगा। अगर अधिक मोटा और बड़ा करना है तो आलुवाले से बात करो, कुछ गरीबी रेखा की राशि बढे तो इसका भी खर्चा चले।" माहौल कुछ शांत होने पर चचा भी घर से चले आए। तो उनसे पता चला कि रावण बनाने के लिए उन्हे 1500 रुपए दिए थे कमेटी वालों ने। एक बार तो गाय रावण के 4 सर फ़ोड़ गयी और दुसरी बार उसका पैजामा खा गयी। दो सौ रुपए जेब से भरने के बाद रावण तैयार हुआ। अब इतने कम बजट में तो रावण ऐसा ही बनेगा। अब रावण की सेहत की असलियत सामने आ गयी थी। राम दल और रावण सेना के मंच पर आने में देरी थी। इस बीच मैं उदय को घर से ले आया गोल गप्पे खिलाने के लिए।

राजु गुप्ता - सिमरन चाट सेंटर
सार्वजनिक उत्सवों के स्थल पर एक छोटा-मोटा मेला लग जाता है। गुब्बारे वाले, चाट वाले, पान वाले, मिठाई वाले, साईकिल स्टैंड वाले अपनी दुकान लगा लेते हैं। लोग भी तफ़री के साथ मुंह का स्वाद बदल लेते हैं। उदय को लेकर राजु के गोलगप्पे के ठेले पर पहुंचा और उसे गोलगप्पे खिलाने को कहा। इस बार इसके रेहड़ी की रौनक बदल गयी। सब कुछ नया और साईन बोर्ड के साथ "गुप्ता चाट भंडार" से नाम बदल कर "सिमरन चाट सेंटर" रख दिया था। पहले तो मुझे शक हुआ कि कहीं इसने दीवाला तो नहीं निकाल दिया है। फ़िर सोचा कि इसके पास इतनी सम्पत्ति तो है नहीं कि दीवाला निकाल सके। जब सेठों के पास धन होता है तभी दीवाला निकालते हैं और एक बेटी की शादी का जुगाड़ हो जाता है। लाला जी ने मुझे एक बार बताया था कि उन्होने 5 बार दीवाला निकाल कर 8 बच्चों की शादी कर दी थी। जब किसी के यहाँ लड़की का रिश्ता लेकर जाते थे तो संबंधी सबसे पहले यही पूछता था कि-" लाला जी कै बार? तो लालाजी गर्व से बताते 5 बार। बस तुरंत रिश्ता तय हो जाता। क्योंकि संबंधी इससे अंदाजा लगा लेता था कि एक बार के दीवाले में सेठ जी ने कितना माल अंदर किया है। तुम्हारी भी जय जय हमारी भी जय जय।

भीषम-गोपाल-गोबरधन
राजु के ठेले के बगल में भीषम ने अपनी नयी मुंगफ़ली की दुकान लगा थी, उसके बगल मे गोबरधन ने पुरानी मुंगफ़ली की दुकान लगायी थी। शांति लाल मुंगफ़ली सेकने के लिए पंखा हिला-हिला कर सिगड़ी सिलगा रहा था पर लकड़ी कच्ची होने के कारण धूंवा दे रही थी। भीषम बचपन से ही बस स्टैंड में अपना पसरा (दुकान) लेकर बैठता था, जिसमें उबली हुई शकरकंद एवं चना-चबेना रख कर बेचता था। जब हम प्रायमरी स्कूल में पढते थे तो वह रोज 5-7 रुपया कमा लेता था। हमारी दृष्टि में वह उस समय पैसा वाला था। कभी अपने साथ होटल में समोसा भी खिला देता था। वह आज भी नहीं बदला, बिलकुल वैसा ही है, मेरे पहुंचते ही लड़के को बुलाकर मेरे लिए पान मंगवाया। कहने लगा, महाराज के स्वागत मे कोई कमी नहीं होनी चाहिए। गोबरधन मेरे से उम्र में बड़ा है। यह बस स्टैंड पर कांच की बरनी में संतरे की टिकिया लेकर बसों में बेचता था अब दारु भट्टी के सामने फ़ल्ली और मौसमी चखने की दुकान लगाता है।

गुब्बारे वाले, मेले की शान
पिछले बरस के बाद आज गांव के सार्वजनिक कार्यक्रम में पहुंचा था। सभी पुराने मित्र लोग यहीं मिल रहे थे और उनसे मिल कर आनंद भी आ रहा था। मुझे सामने से प्रताप सिंह लंगड़ाते हुए आता दिखाई दिया। आँखों पर मोटा चश्मा लगा रखा था। जय जोहार होने के बाद उससे हाल-चाल पूछा तो कहने लगा कि शुगर की बीमारी हो गयी है और इसके कारण किडनी खराब हो गयी और आंखों में मोतियाबिंद उतर आया। खेत बेचकर इलाज करवाया है, अब ठीक है। एक बेटे और दो बेटियों की शादी कर दिया, एक बेटा और बचा है कुंवारा, अब के सीजन में उसकी भी शादी करना है। जब हम आठवीं में पढते थे तो प्रताप की शादी हो गयी थी और नवमी पहुंचते-पहुंचते एक बेटा भी। जब ग्याहरवीं पास हुए तब तक प्रताप तीन बच्चों का बाप बन चुका था। एक तरह कुछ जल्दी ही बूढा हो गया। मैने उससे घर आकर ठीक से मिलने का वादा किया। अब उसने पान गुटखा खाना भी बंद कर दिया है। डॉक्टर ने कहा है कि अब खाएगा तो दुनिया की कोई दवाई उसे नहीं बचा सकती।

रंग बिरंगी मिठाई
मिठाई वाले की दुकान में रंग बिरगीं मिठाईयाँ सजी थी। नारियल की बरफ़ी, खाजा, पेठा, शक्करपारे, सलोनी, सेव भुजिया, जलेबी, बालुशाही आदि। साथ में गुटखे भी बेच रहा था, बगल में उसकी बीबी ने अलग दुकान लगा रखी थी। बेटे की बहू दोनो दुकानों में काम देख रही थी। एक ग्राहक के पूछने पर उसने जलेबी का मुल्य 20 रुपए पाव बताया। मंहगाई बहुत बढ गयी, दो साल पहले ही 30 रुपए किलो जलेबी आती थी। बस एक मिठाई से ही बाकी का अंदाजा लग गया। तभी कहीं से तितलियों का एक झुंड उड़ कर आया और मिठाईयों पर छा गया। बस फ़िर दुकानदार व्यस्त हो गया। किसी ने शक्करपारे लिए तो किसी ने बालुशाही। मेले की असली मौज तो यही है जो अच्छा लगे खाओ और खरीदो बिंदास होकर। मिठाईयों में रंग बहुत अधिक डाल रखा था। दूर से ही देख कर मन ललचा जाए खाने को, पर सेहत का भी ध्यान रखना पड़ता है। रंग सेहत को नुकसान पहुचाते हैं।

रावण है तैयार - जय लंकेश
कुछ हो हल्ला होने लगा, बैलगाड़ियों पर सवार रावण सेना नगर भ्रमण कर आयोजन स्थल पर पहुच रही थी, बैलगाड़ियों को देखकर भीड़ ने रास्ता बना दिया। रावण की सेना के पीछे-पीछे राम की सेना भी पहुंच गयी। माईक पर उद्घोषणा होने लगी, शीघ्र ही रामलीला शुरु हो रही है। मैं जब स्टेज पर पहुंचा तो रावण और राम की सेना आमने-सामने विराजमान हो चुकी थी। विदूषक रामायण जी की आरती कर रहे थे। रावण महाराज अपने दसशीश को गोद में रखे बैठे हुए थे। मेरे आग्रह करने पर उन्होने शीश धारण किया जिससे मैं फ़ोटो ले सका। सामने के मंच पर राम दल था। राम और लक्ष्मण शांत नजर आ रहे थे पर हनुमान एवं अंगद उछल कूद कर रहे थे। अंगद का पात्र मेरा पुराना मित्र है। बचपन से राम लीला में अपनी भूमिका निभाता है। माईक पर घोषणा हो रही थी कि अहिरावण वध, अंगद रावण संवाद, और लंका विजय के पश्चात ही रावण दहन होगा।

अब अंगद है तैयार - दिया रावण को ललकार
कुछ वर्षों से नयी परम्परा चली है कि रावण का वध राम के द्वारा न हो कर रामलीला के मुख्यातिथि के द्वारा किया जाता है। रावण वध का अधिकार राम से कब छिन गया पता ही न चला उसे। अब पुतले में आग लगाने के लिए मंत्री-संत्री का इंतजार किया जाता है। पुलिस संरक्षण में प्रतिवर्ष रावण को मारा जाता है पर किसी पर कोई कार्यवाही नहीं होती। भाऊ बोले कि- पिछले साल रावण एवं रामलीला कमेटी की मांग पर मंत्री जी ने चबुतरा बनाने की घोषणा की थी पर अभी तक चबुतरे का निर्माण नहीं हो पाया है। अरे भैया, सरकारी काम सरकारी जैसे होता है। मंत्रियों का काम तो घोषणा करना है। घोषणा करने के लिए तो इन्हे मंत्री बनाया जाता है। राम लीला सम्पात्ति की ओर थी। मुख्यातिथि का कहीं पता नही। पब्लिक घर वापस जाने लगी। इस बीच हम भी एक चक्कर घर का लगा आए। फ़ेस बुक पर एक फ़ोटो चेप कर ताजा अपडेट दे आए रामलीला मैदान का मित्रों को।

राधाकृष्ण टंडन- अशोक बजाज- किसन शर्मा
आखिरकार चचा की मेहनत रंग लाई। उन्होने मंच पर जाकर रामलीला को थोड़ा विस्तार दिया,जिससे समय व्यतीत हो सके। मंत्री जी न आने पर रावण दहन के लिए अशोक भाई को फ़ोन लगाया। वे दुसरे शहर में रावण दहन कर रहे थे। सूचना मिलते ही तत्काल पहुच गए। उनकी शुभकामनाओं के साथ रावण का दहन हुआ। ग्रामवासियों ने लंका विजय का उत्सव मनाया। एक दुसरे को सोन पत्ती भेंट पर यथा योग्य आशीर्वाद लिया और विजयादशमी पर्व की बधाई दी। रावण दहन का कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद भी चचा के मत्थे एक उलाहना मढ ही दिया गया कि रावण के पुतले में पटाखे कम डाले गए। पटाखों के पैसे चचा अंदर कर गए। हमने चचा का पक्ष लिया। जब दिल्ली में बैठे नेता लाखों करोड़ रुपए जनता का खा गए तो चचा ने इतनी मंहगाई में दो-चार पटाखे कम लगा कर कौन सा गुनाह कर डाला। कैसे भी हो, विजयादशमी का उत्सव तो मनवा दिया, रावण का दहन तो करवा दिया अन्यथा साल भर फ़िर रावण से हलकान होना पड़ता। चचा कह रहे थे - राम रवन्ना दुय जानना, एक क्षत्रिय, एक बम्हन्ना, इनकी उनकी नाक कटन्ना, उनने इनकी नार हरन्ना,फ़िर दोनों में हुई लडन्ना, तुलसीदास ने रची पोथन्ना। चचा ने सभी पाठकों को विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं देने कहा है, चचा की शुभकामनाएं ग्रहण कर ली तो अब हमारी भी बधाई स्वीकार करें।


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24 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुती
    "श्री छोटी-खाटू हिंदी पुस्तकालय" द्वारा "साहित्य का सम्मान".....एक "ब्लोगर" का भी "सम्मान
    http://vijaypalkurdiya.blogspot.com/2011/10/blog-post.html

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  2. वाह ! पढ़ने के बाद लग रहा है हम भी आपके गांव के रावण दहन समारोह में शामिल थे|
    विजयादशमी उत्सव सफलतापूर्वक संपन्न कराने के लिए चचा को बधाई के साथ शुभकामनाएँ|

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  3. क्या सजीव चित्रण है बाज़ार का ....
    लगता है मैं वहीँ था !
    आभार आपका !
    :-)

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  4. आपकी कलम ने सब ज्वलंत मुद्दे को कितनी सफाई से समेटा है इसके लिए आपको हार्दिक बधाई. केवल अच्छा पोस्ट कहना बिलकुल सही नहीं है. फिर...बधाई..

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  5. रावण दुबला हो गया, मंहगाई ने किसी को नहीं छोड़ा।
    वर्णन तो रनिंग कमेंट्री जैसा है। मजा आ गया।

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  6. दशहरा पर्व के अवसर पर आपको और आपके परिजनों को बधाई और शुभकामनाएं...

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  7. बड़े विस्तार से वर्णन किया है ...
    रोचक !

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  8. सुंदर प्रस्तुती
    दशहरा पर्व के अवसर पर आपको और आपके परिजनों को बधाई और शुभकामनाएं

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  9. बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है आपने, ठेठ देसी तरीके से।

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  10. घर बैठे रावण दहन का, गांव के मेले का, मेले की दुकानों का, पूरे माहौल का और रावण दहन के पीछे की कलियुगी कथा का सरस अंदाज में वर्णन करके दशहरा मनवा दिया।

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  11. बेहद सजीव चित्रण..और ये चाट का ठेला...इस तरह की तस्वीरें लगाने का आपको कोई हक नहीं :):)

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  12. जीवंत... जीवंत वर्णन....
    इस दौरान कुछ लोग चर्चा कर रहे थे कि इस बार का रावण दुबला नजर आ रहा है...
    दुबरावत दुबरावत सिरा जाय ए हर ताभेच बात बनही....
    विजयादशमी की सादर बधाईयां....

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  13. बेहद सजीव चित्रण... आज तक ऐसा माहौल देखने का मौका नहीं मिला लेकिन आपकी पोस्ट के माध्यम से आज सब कुछ देखा जैसा लग रहा है... सुन्दर वर्णन...

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  14. वाह ! क्या खुबसुरत आँखों देखा हाल हैं --ऐसा लग रहा हैं की हम खुद वही खड़े विजय उत्सव देख रहे हैं ......जलेबी कल हमारे यहाँ २०० रु बिकी ..जय हो ..

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  15. वैसे रावण के किरदार में आप काफी जंचते, कभी रामलीला में पार्ट खेला है क्या ???

    अगले साल तिराई मारिये :)

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  16. वाह वाह ललित भाई । गाँव का मेला देखकर मज़ा आ गया ।
    सुन्दर विवरण ।

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  17. @ दीपक बाबा जी ,
    वास्ते ,वैसे रावण के किरदार में आप काफी जंचते :)

    क्या गज़ब का आब्जर्वेशन है मैं भी यही सोच रहा था काजल कुमार जी के दशहरे वाले कार्टून को देख कर :)
    http://kajalkumarcartoons.blogspot.com/

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  18. बहुत बढ़िया प्रस्तुति पढ़ कर पूरा चल चित्र सा उतार आया आँखों में विजय दशमी महोत्सव का आभार आपका....एक और बात कहूँगी जो आपने अलग शब्दों में लिखी है मगर बात एक ही है की
    "बा ने बाकी तिरया चुराई
    रावन्ना था मारा गया
    और तुलसी लिख गए पोथन्ना" हमारी और से भी बधाई स्वीकार करें देर से ही सही मगर आपको और आपके परिवार को हमारी ओर से विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनयें ....

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  19. बहुत बढ़िया प्रस्तुति....तस्वीरों को देख छत्तीसगढ़ याद आ गया ...

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  20. bahut saral aur manoranjak baaten likhi hai ......behad achcha laga.

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  21. सुन्दर वर्णन..
    टिप्पणियों से भान होता है कि शायद इस तरह की संक्षिप्त रामायण कहने का प्रचलन सभी हिन्दीभाषी क्षेत्रों में अपनी-२ बोली में है.. जैसे कि बुन्देली में कहते हैं- ''एक राम हते, एक रामन्ना.. एक क्षत्री हते एक वामन्ना.. उनने इनकी नार हरी और इनने उनकी मार धरी.. तुलसीदास ने लिख कें रख दओ पोथन्ना...'' :)

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  22. एक हरियाणवी मित्र तो और भी संक्षेप में बताता था -
    एक था रावण,
    एक रामड़ा,
    उसने इसकी बीर हरी,
    इसने फ़ूंक दिया उसका गामड़ा।

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