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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

दोगला : शब्द चिंतन ( ललित निबंध)

दोगला एक ऐसा शब्द है जिसका प्रचलन धड़ल्ले से होता दिखाई/सुनाई देता है। दोगला आदमी, दोगली राजनीति, दोगली बात, दोगला नेता, दोगली स्त्री इत्यादि बहुधा प्रयुक्त होता है। वर्तमान में यह शब्द धोखा देने वाले, दो मुंही बातें करने वाले, अविश्वसनीय व्यक्ति के लिए संदर्भ में लिया जाता है। 

जबकि भारत में पानी उलीचने की बांस कमचियों से बने टोकरे लिए दोगला शब्द संज्ञा के तौर पर प्रयुक्त होता है। इसे हिन्दी वांग्मय का शब्द माना जाता है। परन्तु यही शब्द फ़ारसी में पहुंच कर घातक होकर लड़ाई झगड़े की जड़ गाली बन जाता है तथा अर्थ बदलकर वर्णसंकर, जारज (प्रेमी/उपपति/आशिक से उत्पन्न होने वाला) हो जाता है।

शब्द की महिमा अपरम्पार है तथा पूर्व प्रचलित एकार्थी शब्द कालांतर में बहुअर्थी हो जाता है। जिस मानक अर्थ में प्रयुक्त होने के लिए शब्द ने जन्म लिया, कभी कभी तो उसके विपरीत अर्थ में भी प्रयुक्त होने लगता है। जैसे सम्भ्रांत - सम+भ्रांत। जो दशों दिशाओं से याने सब तरफ़ से विचलित (पागल) हो गया हो (निरुक्त) उसे सम्भ्रांत कहा गया। परन्तु वर्तमान में इसका प्रयोग कुलीन के समानार्थी होने लगा। किसी परिवार या व्यक्ति को सभ्य बताने के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है। 

लोकप्रचलित हिन्दी भाषा में विभिन्न भाषाओं के शब्दों को सहज स्वीकार किया गया है, वे अब इतने अधिक घुलमिल गए हैं कि पता ही नहीं चलता किस भाषा से इन शब्दों की व्युत्पति हुई है। अरबी, फ़ारसी, उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्द हिन्दी प्रवेश कर इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त कर गए हैं कि वार्तालाप या लेखन के समय कोई इनके समानार्थी शब्द भी नहीं ढूंढता एवं सहजता के साथ समाज भी स्वीकार लेता है। 

दोगले से मिलाजुला एक शब्द और है हरामजादा, इसका प्रयोग भी गाली के तौर पर होता है। इसका शाब्दिक अर्थ है हरम में जन्म लेने वाला। मुगल बादशाहों के हवसगाह होते थे हरम। जिसमें हजारों स्त्रियाँ रखी जाती थी। रखैल (रखी हुई) शब्द भी यहीं की व्युत्पत्ति है। इन स्त्रियों से जन्म लेने वाले हरामजादे कहे जाते थे। हरामजादे शब्द संज्ञा है, जब यही शब्द प्रवृत्ति बन जाता है तो हरामजदगी हो जाता है अर्थात जिसके स्वभाव में ही जन्म से दोगलापन है। 

हरामजादा या दोगला शब्द के अर्थ में संस्कृत में जारज: शब्द प्रयुक्त होता है। जार: (जारयति इति जृष् वयोहानौ धातौ: धञ, णिलुक् च) उपपति: (उपमित: पत्या) ये दो पुल्लिंग नाम मुख्य से भिन्न अप्रधान पति (यार) के हैं। अमृते भर्तरि जारज:, मृते भर्तरि जारजो गोलक:। (अमरकोश) जार से उत्पन्न संतान को जारज कहा गया है। इस तरह हम देखते हैं कि संज्ञा के लिए प्रयोग होने वाले शब्द प्रवृत्ति के रुप में प्रयुक्त होते हुए विशेषण बन गये और विशेषता बताने/जताने के लिए प्रयुक्त होने लगे तथा गाली के रुप में प्रतिष्ठित हो गए।

राम मनोहर लोहिया जी का कहा स्मरण हो आता है  कि तन का दोगला एक बार चलता है पर मन का दोगला घातक होता है अर्थात मन के दोगले को अधिक घातक बताया गया। मन का दोगला होना व्यक्ति की प्रवृत्ति हो गई। दोगला शब्द वर्तमान में प्रवृत्ति बन गया। वर्तमान समय में दोगले शब्द ने अन्य अर्थ ग्रहण कर लिया। अब इसका अर्थ 1. दो तरह की बातें करने वाला 2. जिसकी कथनी और करनी में विसंगति हो, में बदल गया। 

समाज में ऐसे मनुष्य (स्त्री/पुरुष) भी रहते हैं जिनकी कथनी और करनी में विसंगति होती है। ये मुंह के सामने मीठी-मीठी मुंह चोपड़ी बातें करते हैं और पीठ पीछे षड़यंत्र करने से बाज नहीं आते, मौका पाकर खंजर भी चला देते हैं। ऐसा नहीं है कि इनमें कोई दोष है, यह इनकी जन्मजात प्रवृति है, जो दिनचर्या में सम्मिलित है। दोगलई किये बिना ये रह ही नहीं सकते। ये व्यक्ति, समाज, देश, राष्ट्र किसी के साथ भी दोगलाई कर सकते हैं। इनकी दोगलाई की कोई सीमा चिन्हित या तय नहीं है।

मनोवैज्ञानिकों ने अनुभव किया कि कुछ लोग परिस्थितिवश दोगलई करना चाहते हैं, परन्तु कर नहीं पाते। क्योंकि उनकी प्रवृत्ति में नहीं है। प्रवृत्ति में होने के कारण सहजता होती है तथा प्रवृत्ति में न होने के कारण कृत्रिमता असहज कर देती है। और वे अपनी दोगलई को स्वत: ही प्रकट कर देते हैं। क्योंकि कबीर दास जी ने कहा है "सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदय सांच हें, वाके हिरदय आप॥" कहीं न कहीं उसके हृदय में आप है जो उसे दोगलई करने से रोक देता है। 

इतिहास में देखते हैं कि बहुत सारे राजे-महाराजे, यति-जति दोगलों की भेट चढ़ गए तथा वर्तमान में भी चढ़ रहे हैं। ऐसा नहीं है यह प्रजाति सिर्फ़ भारत में ही पाई जाती है। युरोप का उदाहरण हम ले सकते हैं, यीशु ने मनुष्यों को सन्मार्ग बताने में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया। जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया तो कहा- हे पिता (ब्रह्म), इन्हें माफ कर दे (जिन्होंने सूली पर चढ़ाया था) क्योंकि इन्हें नहीं मालूम है कि ये क्या कर रहे हैं। 

दोगले लोगों को ढूंढने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, वे आस-पास ही पाए जाते हैं, जो निकटस्थ होकर अपनी करनी करने तैनात रहते हैं। यीशु को सूली पर चढाने वाले दोगलई प्रवृत्ति से ग्रसित लोग थे। इसलिए यीशु ने उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना की। पर हर आदमी संत नहीं होता। लौकिक जीवन में दोगली प्रवृत्ति के लोगों को पहचान कर बचना ही श्रेयकर होता है। दोगला मनुष्य कितना भी सोने चांदी का मुलम्मा ओढ़ ले पर उसकी प्रवृत्ति बता देती है कि वह क्या है। इति दोगला शब्दाख्यान।

मंगलवार, 9 मार्च 2010

बिन पेंदे का लोटा--ना किसी के काम का

लोटा एक साधारण सा शब्द है लेकिन इसकी महिमा निराली है.........मनुष्य के जीवन से जुड़ा हुआ है...... इसके बिना काम चलना बहुत ही कठिन है........लोटे के लुढ़कने से लोटना शब्द का भी निर्माण हुआ होगा...........मनुष्य जब पी कर मदमस्त हो जाता है तो कहीं पर भी लोट जाता है........चाहे वह सड़क, घुरा, या नाली ही क्यों ना हो. बच्चा जब जिद करता है किसी चीज के लिए तो वह भी धरती पर लोटने लगता है.........

अगर किसी को किसी से इर्ष्या है तो साँप भी लोटने लग जाता है छाती पर..... अगर आदमी ना होकर गधा है तो वह भी नहलाने धुलाने के बाद धुल में लोटता है. भैंस को कितना भी साफ पानी से धो लीजिये लेकिन मौका मिलते ही कीचड़ में जरुर लोटेगी......   ... उसे कीचड़ में लोटने से अपूर्व आनंद की अनुभूति होती है........

एक मुहावरा है कि लोटा लेकर आये थे और बहुत कमा लिए . एक सेठ भी लोटा लेकर आये थे उन्होंने इतनी तरक्की की थी पूरा एक शहर ही बसा दिया. लोटा की महिमा ही निराली है.. बिना लोटा के किसी का काम ही नहीं चलता  .... .... सुबह उठ कर सीधा लोटा ही याद आता है.........अगर कोई एक मिनट रुकने के लिए कह दे तो रुका नहीं जा सकता क्योंकि हाथ में लोटा है.............उसे फिर लौटाया नहीं जा सकता इस लिए लोटा लेकर भागना ही पड़ता है......

लोटा जीवन का एक आवश्यक अंग है........पहले के ज़माने में आदमी अगर कहीं किसी गांव में जाता था तो लोटा साथ ही रख कर ले जाता था............अगर पानी पीना है, नहाना है, कुछ गरम कर के पीना है तो काम आता था. अगर यात्रा में कहीं पर रूपये पैसे ख़त्म हो गये या चोरी हो गए तो लोटे को बेच कर अपने वापसी के लिए या भोजन के लिए रूपये पैसे जुटाए जा सकते थे....इस तरह यात्रा में लोटा बहुत ही काम आता था.

हमारे ३६ गढ़ में परम्परा है कि यदि कोई मेहमान आपके घर आता है तो उस घर की बहु पहले लोटा में पानी लेकर आती हैं और उसे अतिथियों के सामने रख कर सबको प्रणाम करती हैं..........यह संकेत है कि अब आप लोटे के पानी से हाथ मुंह धोकर अपनी थकान मिटा सकते हैं और आराम से बैठ सकते हैं....मेहमानी कर सकते हैं......लोटे में अतिथियों को पानी देना एक शुभ कार्य माना जाता है......आव भगत का यह आवश्यक अंग है.

घर में जब कथा पूजा होती है तो लोटा कलश के काम आता है......उसमे जल भरकर आम की पॉँच पत्तियां लगा कर मंगल कलश का रूप दिया जाता है तथा उसका पूजन होता है...... इस तरह मंगल कार्य की शुरुवात लोटे से ही होती है...... जब हम गंगा तीर्थ करने जाते हैं तो गंगा जल लोटे में ही लेकर आते हैं जिसे गंगा जली कहते हैं....

लोटा से क्रोध भी प्रदर्शित किया जाता है..........अगर गुस्सा आ गया तो लोटा फेंक कर मारा भी जा सकता है........यह किसी का सर भी फोड़ सकता है........अब यहाँ पर यह किसी बम से कम काम नहीं करता है........अगर इसको फेंकने वाला कोई बलशाली है तो बस समझ लो यह मिसाईल है..... सीधा ही निशाने पर लगती है. 

लोटा जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के काम आता है और मनुष्य के साथ अंतिम तक जुड़ा रहता है. लोटे कई धातु के आते हैं व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार खरीद सकता है.......कांसे का लोटा ज्यादा पवित्र माना गया है. पूजा पाठ एवं विवाह से लेकर अंतिम संस्कार तक काम आता है. तांम्बे का लोटा पानी को कीटाणु विहीन करता है.

पीतल का लोटा भी विकल्प के रूप में उपयोग में लाया जाता है. हमारे यहाँ विवाहादि में कांसे का लोटा गिलास और कांसे की थाली लड़की को देने का रिवाज है. चाहे कितना भी गरीब से गरीब क्यों ना हो.

अब बात आती है लोटे के पेंदे की. तो लोग पेंदा वाला लोटा ही लेना ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि लुढकेगा नहीं और उसमे रखी वस्तु गिरेगी नहीं, बरबाद नहीं होगी............इसी से कहावत भी बनी है बिन पेंदे का लोटा........

अब यहाँ पर लोटा मनुष्यों पर सवार हो गया..........बिन पेंदे का लोटा कहने से समझ में आ जाता है कि अमुक व्यक्ति विश्वसनीय नहीं हैं...... यह कहीं पर भी आपको धोखा दे सकता है....... आपकी बनी बनाई खीर बिखेर सकता है...... रायता भी फैला सकता है..........इसलिए इससे दूर रहा जाये........

अस्थिर चित्त व्यक्ति किसी की भी चुगली कर सकता है और समबन्धित व्यक्तियों के बीच वैमनस्य फैला सकता है...... इसलिए उसे इस ख़िताब से नवाजा गया है. इसलिए लोटा बनने वाले इसमें पेंदा लगना नहीं भूलते........

पहले के ग्रामीणों के घरों में कपडे रखने की आलमारी या पेटी नहीं होती थी इसलिए वो लोटे के बड़े भाई मटके का उपयोग अपने रोजमर्रा के पहनने या विशेष अवसर पर पहने जाने वाले कपड़ों को रखने में करते थे.......लेकिन सूती के कपडे मटके में रखने के कारण सलवटों से भरे रहते थे.......अब उन्हें पहनने लायक बनाने में भी लोटा ही काम आता था..........

मोटे पेंदे के लोटे में गरम कोयले भरकर उन कपड़ों की सलवटे दूर की जाती थी और व्यक्ति मजे से बाबु साहब बनकर विशेष अवसरों पर सज जाता था......पहले इसे कपड़ों पर लोटा करना कहते होंगे... जिसे आज प्रेस करना या इस्त्री करना कहते हैं........यह लोटा बड़े काम की चीज है.........अगर इसमें पेंदा लगा हो तब.

प्राचीन काल से लेकर आज तक लोटा अपनी सेवाएं दे रहा है.......... आज भी हम इसका उपयोग अपने दैनिक जीवन में करते ही हैं........भले कितने ही तरह तरह के जग घरों में प्रवेश कर गये, लेकिन लोटे के बिना काम चलता ही नहीं है.......

हम इसका आधुनिक उपयोग भी कर सकते है.......इसमें छेद करके छोटे स्पीकर लगा कर इको साउंड पैदा किया जा सकता है.....घुंघरू की खनक के साथ गाने सुने जा सकते हैं......... लोटे में नलकी लगाने के बाद इसका नाम बदल कर सागर हो जाता है....... जो नलकी से तरल पेय पदार्थ पीने के काम आता है. इसमें नलकी लगने के बाद यह प्राकृतिक चिकित्सा में जल नेति करने के काम आता है.... 

जीवनपर्यंत लोटा कभी साथ नहीं छोड़ सकता अगर वो पेंदे वाला हो...........बच्चा पैदा होता है तो उसको प्रथम स्नान लोटे से ही कराया जाता है और मनुष्य के अंतिम संस्कार के समय लोटे में ही घी डाल कर कपाल क्रिया संपन्न करायी जाती है........ इस तरह लोटा जन्म से मृत्यु तक साथ निभाता है........ लोटे का कर्ज कभी लौटाया नहीं जा सकता... इसकी महिमा अपार है........

गुरुवार, 4 मार्च 2010

सज्जनों के साथ दुर्जनों की वंदना आवश्यक

संसार का निर्माण हुआ ...........उसके साथ मानव सृष्टि का भी आरम्भ हुआ........इस मानवीय सृष्टि में सज्जन और दुर्जन भी आये.........दोनों के कार्य विपरीत थे..........भगवान की लीला भी अपरम्पार है......अगर दुर्जन ना होंगे तो सज्जन की पहचान कैसे होगी?........इसलिए दुर्जन को भी मान्यता मिल गई........

हमारे शास्त्रों में तो दुर्जनों की भी वंदना करने की आज्ञा दी गई है..और कहा गया है कि.....दुर्जनम प्रथम वन्दे सज्जनम्  तदनंतरम् , मुख प्रक्षालनात पुर्वम् गुदा प्रक्षालनात वरम्............अब कहीं कहीं विघ्न ना हो इसलिए इनकी भी वंदना होने लगी........ 

तुलसी दास जी ने जब रामचरित मानस रचना की थी तो उन्होंने प्रारंभ में ही भूसुर वंदना लिखी थी.........बंदऊ प्रथम महिसुर चरना........के साथ खल वंदना भी की......

जब हम कोई शुभ कार्य करते हैं तो गणपति को मनाऊ कह कर गणपति का ध्यान करते हैं............. यज्ञ के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित सभी जड़ चेतन देवों को मनाया जाता है उनका आह्वान किया जाता  है कि यज्ञ संपन्न करने में सहायक बने.......और यज्ञ कार्य सफल हो.......

गाँवो में परंपरा है कि प्रथम मनाऊ गणेश से लेकर वराह देव तक किसी को नहीं छोड़ा जाता. सबको मनाते है,...........सभी की आवभगत की जाती है  पत्र पुष्प मिष्ठान इत्यादि से, लेकिन कहीं अज्ञानतावश  किसी भी देव को भूल  गए तो उस देव क्रोधित हो जाते है........क्योंकि वो देव अपनी उपस्थिती बताना चाह रहे हैं..... और हम भूल चुके हैं..........फिर हमें याद कैसे आयेंगे?...........

जब तक वो क्रोधित हो  कर अपनी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट ना करा दें... क्रोध की पुनरावृत्ति भी हो सकती  है........क्यों ना हो भाई? उन की भी कोई अहमियत है इस संसार में, इस संसार को बसाने में उनका भी कुछ हाथ-पैर लगा है............और आप उनकी उपेक्षा किए जा रहे हैं यह उन्हे कैसे मंजुर होगा? 

आखिर देव हैं वो आपको कुछ देना चाहते हैं............देव अर्थात देने वाला......देने वाला तैयार है लेकिन हम अज्ञानतावश भूल बैठे........... इसलिए इन्हें आप कभी ना भूलें..... 

पहले कवि जब भी कोई कवित्त रचते थे तो पहले गणेश  और सरस्वती जी का स्मरण करते थे......तदुपरांत लेखन कर्म प्रारंभ करते थे............और हम मुरख आज इनको  भूल चुके हैं...........इसलिए उत्पात हो जाते हैं... ..... और ये चाहते हुए भी सहायक नहीं हो पाते............

कभी कभी देवों के भेष में भूत पिशाचों के भी उत्पात शुरू हो जाते हैं...........और हम देव मानकर उन्हें पूजते रहते है.......लेकिन पिशाच प्रवृति है ही उत्पाती......... फिर उससे निपटने के महाबली हनुमान का सुमिरन करना पड़ता है................ .महाबली हनुमान को यह नहीं पता कि उनमे अतुलित बल है, एक श्राप के कारण भूल बैठे है...........जब उन्हें स्मरण करके उनके द्वारा किये गये महान कार्यों की याद दिलाई जाती है तब वो जागृत होते हैं......

अतुलितबलधामम् हैमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि॥.....और  भूत पिशाच निकट नहीं आवै महावीर जब नाम सुनावे-नासी रोग हरे सब पीर जपत निरंतर हनुमत वीरा.....तथा........को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो.......आदि आदि गुणगान करके उन्हें प्रसन्न करना पड़ता है.........तब हनुमान जी गदा से दुष्टों को सुधारते है .......... अन्यथा इनके मायावी रूप दृष्टिगोचर होते रहते है........... जिन्हें पहचान पाना आम मनुष्य के बस की बात नहीं है..........

राम चरित मानस में वर्णन है कि जब हनुमान जी लंका में लघु रूप धर कर प्रवेश कर रहे थे तब रावण के गढ़ की रक्षा करने वाली लंकिनी ने इन्हें प्रवेश करने से रोका..........तब हनुमान जी ने लंकिनी को एक मुष्टिका प्रहार से चित्त कर दिया----

मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ तब दुष्ट पिशाच लंकिनी ने इन्हें मार खाते ही पहचान लिया........ इसलिए कभी भी देव-पिशाच-दुर्जन को नहीं भूलना चाहिए.......अन्यथा उत्पातों का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए  सबकी वंदना करनी चाहिए......अन्यथा मन की शांति भंग हो सकती है.