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सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

भूटानी मुद्रा और टॉकिन : भूटान यात्रा 4

प्रारम्भ से पढ़ें 
भूटान की मार्केट में भारतीय मुद्रा उसी तरह स्वीकार की जाती है जिस तरह भारत में। परन्तु वे भारतीय मुद्रा रुपए के बड़े नोट लेकर भूटानी (नोगंत्रोम) मुद्रा वापस करते हैं। भूटानी नोटों का काजग अच्छा है, नेपाली मुद्रा जैसे गंदे नोट नहीं है। नेपाल के नोट तो जेब में रखने की इच्छा ही नहीं होती। वैसे भी नेपाल में भारत के 500 एवं 1000 के बड़े नोट प्रतिबंधित हैं। परन्तु भूटान में ऐसा नहीं है। वैसे मुद्रा का यह खेल ध्यान देने योग्य है। भूटान में तो भूटानी मुद्रा चलती ही है। परन्तु भारत के सीमांत क्षेत्र में भूटानी मुद्रा का काफ़ी प्रचलन है। भूटानी नोट तो देखने मिले, लेकिन सिक्के कहीं दिखाई नहीं दिए। वैसे विदेशी मुद्रा के प्रति मेरा आकर्षण नहीं के बराबर है और नहीं मैं विदेशी मुद्रा अपने पास रखने की कोशिश करता हूँ।
भूटानी 100 रुपया
भूटानियों के नाम बहुत कठिन लगे, उच्चारण एवं याद रखने में। मुझे जो भी भूटानी मिले, उनमें किसी का भी नाम याद नहीं और न ही मैं याद रखने के लिए दिमाग पर जोर डाला। मुझे कौन सा यहाँ बसना है, जो इतनी माथापच्ची करुं। यहाँ दुकानों के दरवाजे बड़े नहीं होते। भारत में जैसे घर के दरवाजे 3 फ़ुट चौड़े होते हैं वैसे ही यहाँ दुकानों के द्वार भी होते हैं। एक दुकानदार से चर्चा हुई, वह अच्छी हिन्दी बोलता था। उसने मुझे रुपए एवं भूटानी मुद्रा के खेल के विषय में बताया कि भारत और भूटानी मुद्रा नोंगत्रम में कोई खास अंतर नहीं है और जो अंतर है वह आम आदमी की समझ में नहीं आता। भारत के सीमांत क्षेत्र में धड़ल्ले से भूटानी मुद्रा का चलन होता है।
स्ट्रीट मार्केट
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी क्षेत्र के बेलपाड़ा, नांगड़ाकाटा, तेलीपाड़ा, बीनागुड़ी, दालगांव और इथेबाड़ी इत्यादि स्थानों में भूटानी मुद्रा का भारतीय मुद्रा की तरह ही चलन है। भूटान की सीमा फ़्यूशलिंग के इस पार जयगाँव में भूटानी मुद्रा के 500 और 1000 के नोटों का चलन नहीं है। अगर आप किसी दुकानदार देगें भी तो वह नहीं लेगा। लेकिन जयगाँव से 25-30 किलोमीटर दूर बसे गाँव एंव कस्बों हासीमआरा, अलीपुर द्वार, कालचीनी, कालपाड़ा, हाशिमआरा, नंगड़ाकाटा और बानरहाटा में भूटानी नोट आराम से चल जाते हैं। यहाँ के लोग इन नोटों से व्यापार व्यवहार कर लेते हैं। इन नोटों के चलन के पीछे बड़ा गिरोह भी हो सकता है जो काले धन को एक नम्बर का बनाने का काम करता है।
रेड वाईन "टॉकिन"
जबकि भारत में अन्य किसी देश की मुद्रा में व्यापार एवं व्यवहार करना कानूनन अपराध है, परन्तु सीमा क्षेत्र में मांग के अनुसार व्यापारियों को भूटानी मुद्रा में लेन देन करना पड़ता है। अन्यथा उनका व्यापार ठप्प हो जाएगा। ग्राहक जो भी मुद्रा दें, उसे स्वीकार करना उनकी मजबूरी है। हमने थिम्पू में भारतीय मुद्रा से ही खरीदी की। दुकानों का संचालन अधिक औरते ही करती हैं और टीवी पर भारतीय गानों के फ़िल्में भी देखती हैं। इसके कारण उन्हें हिन्दी बोलने एवं समझने में कोई अत्यधिक परेशानी नहीं होती। 
भूटानी दुकान के समक्ष ब्लॉगर
थिम्पू के बाजार में शराब के लिए कोई अलग से दुकान नहीं है। किराने की दुकानों में शराब मिलती है। कोई भी बालिग व्यक्ति शराब खरीद सकता है। लोग राशन के साथ शराब खरीदते हैं। भूटान की लोकल शराब "टॉकिन" है, जिसमें अल्कोहल 16% है। रेड वाईन जैसी इस शराब का प्रचलन अधिक है और इसे बिना पानी या सोडा के इस्तेमाल किया जाता है। कुछ कुछ आयूर्वैदिक आसव जैसा स्वाद है। साथ ही सस्ती भी है। 750 एम एल की एक बोतल 140 रुपए मे मिल जाती है। मेरे सामने ही कुछ भूटानी महिलाएं राशन के साथ एक-एक बोतल टॉकिन खरीद कर ले गई। 
एक दृश्य
रिसोर्ट में आने के बाद हम लोगों का भोजन बन कर तैयार हो गया था। भोजन करने के उपरांत हमने अपने बिस्तर की शरण ली। बाहर ठंड बढ रही थी। रिसोर्ट के केयर टेकर कह रहे थी कि आज की रात पारा - 14 पार कर जाएगा। ब्लू पाईन की लकड़ी से रुम का फ़र्श एवं दीवारे बने होने के कारण रुम गर्म था तथा वाताकूलन की व्यवस्था भी थी। बैड के गद्दे में लगे हीटर का बटन चालु करके सो गए तो रात को रजाई में पसीने आ गए। कुल मिला कर ठंड से बचने का इंतजाम उम्दा था। मैदानी लोगों को पहाड़ की ठंड बर्दास्त नहीं होती। अब बाकी कल देखा जाएगा। आज की रात तो गुलजार हो कर गुजर रही है। ……… जारी है, आगे पढ़ें 

शनिवार, 10 सितंबर 2011

न मे स्तेनो जनपदे, न कर्दयो, न मद्यपो -- ललित शर्मा


रेलवे स्टेशन पर ८ से १२ साल के बच्चों का एक समूह घूम रहा था. सभी ने गंदे कपडे पहन रखे थे और उनके हाथ में रुमाल के साइज का एक कपडा था. जिसे वे थोड़ी-थोड़ी देर में सूंघ रहे थे. उनकी आँखे लाल थी, जैसे कोई नशा कर रखा हो. उनके मुंह से सुना - "सिलोशन कम हो गया." ह्म्म्म तब मेरी समझ में आया कि इनके हाथ के रुमाल में एड्हेसिव है, जिससे ट्यूब में पंचर लगाया जाता है. तभी पुलिस वाला आया उसने एक बच्चे की जेब से बोनफिक्स की ट्यूब निकली. पता चला कि ये सब बोनफिक्स के सिलोशन को सूंघते हैं. अगर सिलोशन नहीं मिला तो स्टेशन के बाहर खड़ी गाड़ियों का पैट्रोल निकाल कर सूंघते हैं. उससे भी नशा होता है. इस खतरनाक नशे से ये धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ रहे है. नशे में यही लोग स्टेशन में अपराध करते हैं. इन्हें सिर्फ नशे के लिए पैसा चाहिए.


एक दिन दौरे में जा रहा था. दो मित्र भी साथ में थे. रास्ते में एक शहर में एक मित्र ने गाड़ी रुकवाई और मेडिकल स्टोर से खांसी की दवाई ली. कोंडागांव में जाकर होटल में डेरा डाला. सुबह जब सोकर उठा तो देखा कोरेक्स की वह शीशी खाली पड़ी थी. मैंने उससे पूछा कि शीशी पूरी कैसे खाली हो गई? दवाई गिर गई क्या? तो उसने कोई जवाब नहीं दिया. साथ वाले ने बताया कि उसने रात को पूरी शीशी की दवाई पी ली. मैंने कारण पूछा तो उसने बताया की खांसी की १०० ग्राम दवाई में दारू की आधी बोतल का नशा होता है और दारू की खुशबु भी नहीं आती. नशे की मौज ही रहती है. तब मैंने पहली बार जाना कि खांसी की दवाई का भी नशे के लिए प्रयोग हो रहा है. जानकारी लेने पर ज्ञात हुआ कि मेडिकल स्टोर्स में सबसे अधिक खांसी की दवाई ही बिकती है. पहले आयुर्वैदिक दवाई के रूप में मृतसंजीवनी सूरा का चलन था, शायद अब वह बंद हो गई है. आयोडेक्स का प्रचलन तो बहुत दिनों से नशे के रूप में हो रहा है. 

बरसों पहले दिल्ली में हम कुछ मित्रों के साथ पुरानी दिल्ली में रुकने का ठिकान ढूंढ़ रहे थे. सीनियर तिवारी जी बोले किसी धर्मशाला में रुकते हैं. फतेहपुरी के पास की एक दह्र्म्शाला में पहुचे तो उसने हमें आश्रय देना मंजूर कर लिया. जब भीतर जाने लगे तो हमारे साथ युसूफ भाई को देखकर उसने जगह होने से मना कर दिया. अब हम वही पर बगल के होटल में रुके. जब मैं फोन करने पंहुचा तो काउंटर पर मौजूद व्यक्ति के पास एक आदमी आया और उसने २५० रूपये दिये. जिसके बदले में काउंटर वाले ने एक छोटी सी पुडिया दी. कुछ खटका लगा कि गड़बड़ है. मैंने मित्रों को बताया और वह होटल रात को छोड़ दिया. पूछने पर पता चला कि वह ब्राउन शुगर बेच रहा था. आप आज भी देख सकते हैं चांदनी चौक से दरियागंज वाले चौक तक सड़क के फुटपाथ पर माचिस की तीलियाँ और एल्युमिनियम की पन्नियों के ढेर मिल जायेंगे. यही स्थिति कनाट प्लेस से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक है. खुले आम मौत का सौदा हो रहा है.

कुछ दिनों पहले सुमित दास ने एक लडके को बोनफिक्स के साथ पकड़ा. वह बोनफिक्स छोड़ ही नहीं रहा था. कई लोगों ने मिलकर उससे बोनफिक्स छिनी. वह नशे की गिरफ्त में इतना फँस चूका है कि नशे के अलावा कुछ भी नहीं सोच सकता. सिर्फ सिलोशन ही सिलोशन की रात लगाये हुआ था. सुमित कहने लगा कि इलाके के अधिकतर नौजवान लड़के नशे का शिकार होकर पागल हो चुके हैं. गांजे की चिलम पीने के कारण पायरिया आदि से दांत जल्दी गिर जाते हैं. कम उम्र के लोग नशे के शिकार होकर काल के गाल में समा रहे हैं. फिर भी इनका हश्र देखकर लोग चेत नहीं रहे हैं. नशीले रासायनिक पदार्थों की सहज उपलब्धता से नशेड़ियों की संख्या में वृद्धि हो रही है. नींद की गोलियों एवं दर्द निवारक दवाओं का धडल्ले से प्रयोग हो रहा है. जबकि गांजा या नशीले पदार्थ बेचने वाले के नारकोटिक्स एक्ट में जमानत ही नहीं है. नशीले पदार्थों का धडल्ले से बिकना बिना पुलिस संरक्षण के संभव नहीं है. 

वनस्पतियों से प्राप्त होने वाले मादक पदार्थों का प्रचलन प्राचीन काल से रहा है। गाँजा, अफ़ीम, भांग-धतुरा मद्य इत्यादि प्रचलन में था, आज भी है। आदिम काल में मानव इसका उपयोग चोट लगने पर दर्द से राहत पाने के लिए करता था। नशे से आनंदाभूति होने के कारण इसका दास बन गया। तथाकथित साधु संतों में इसका प्रचलन रहा है। मंदिरों में भांग-धतुरा, मद्य चढता है। लोगों ने नशीले पदार्थों को सामाजिक मान्यता देने के लिए धर्म से जोड़ कर रास्ते निकाल लिए। युद्धकाल में अफ़ीम(अमल) एवं मद्य का सेवन सैनिक करते रहे हैं। वर्तमान में सैनिको शराब देने का प्रचलन सेना में है। शराब देने के अन्य कारण भी हो सकते हैं। लेकिन नशाखोरी एवं नशाखोरों का अपना एक अलग इतिहास है। एक समय था कि समाज में नशा करने वाले को स्थान प्राप्त नहीं था। 


छान्दोग्य उपनिषद कहता है कि राजा विश्वपति ने गर्व से घोषणा की थी--" न मे स्तेनो जनपदे, न कर्दयो, न मद्यपो। नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुत:॥ (अर्थात -"मेरे राज्य में न चोर है, न कायर है, न मद्यपान करने वाले लोग हैं, न अग्निहोत्र न करने वाले लोग हैं, न मुर्ख हैं, न व्यभिचारी हैं, न व्याभिचारिणी हैं।") यही यथार्थ शासन का आदर्श होता था। नशे की बुराईयों को देखते हुए समाज ने इसे सहजता से ग्राह्य नहीं किया। कुछ पंथों ने स्वार्थवश इसे धर्म के साथ जोड़ कर मोक्ष दायी बना दिया। वैदिकों ने पुरुषार्थ चतुष्टय एवं अष्टांग योग के माध्यम से अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिविग्रहा यमा:, शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा: बता कर मोक्ष का मार्ग दिखाया। तो वाममर्गियों ने कहा -- मद्यं मांसम मीनं मुद्राम मैथुनम एव च.. एते पञ्च मकारा: स्योरमोक्षदे युगे-युगे.......... शराब पीने वालों को भी मोक्ष का मार्ग दिया..... पीत्वा पीत्वा पुन: पीत्वा यावत पतति भूतले, पुनारुत्थाय पुन: पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते. नशा करके मरना मोक्ष प्राप्ति का सरल मार्ग बताया है. पुरुषार्थ चतुष्टय एवं अष्टांग योग से पूरा जीवन लगा जाता है मोक्ष प्राप्त करने में.
गुजरात को छोड़ कर सभी राज्य सरकारें शराब बेच कर राजस्व कमा रही हैं। राजस्थान सरकार तो बाकायदा "हैरिटेज वाईन" बेच रही है। वर्त्तमान में नए तरह के नशे सामने आ रहे हैं जो बहुत ही हानिकारक हैं. छोटी उम्र के बच्चों में इनका प्रसार हो रहा है, जो उनके जीवन के लिए घातक है. इसके निवारण के क़ानूनी कार्यवाही के साथ सामाजिक जागरण की आवश्यकता है. जिससे नशे के शिकार लोगों का सामाजिक पुनर्वास हो सके. पालक अपने बच्चों पर सतत निगाह रखें. जिससे वे नशे जैसे दुर्व्याषा के चक्कर में ना पड़ें. तभी राजा विश्वपति जैसे गर्व से घोषणा करने के भागी बन सकते हैं. ऐसा न हो कि एक तरफ खुले आम नशे के सामान बेचकर राजस्व कमाया जाये, दूसरी तरफ उसी पैसे से नशा मुक्ति के शिविर लगाये जाएँ एवं नशामुक्ति का प्रचार-प्रचार प्रसार किया जाये.


मंगलवार, 21 जून 2011

हिमालय आयुर्वैदिक दवाखाना कैंम्प - नेशनल हाईवे - 43 से -- ललित शर्मा

शाम होते ही बादल गड़गड़ाने लगते हैं और बारिश की बौछार शुरु हो जाती है, नेशनल हाईवे 43 भी बारिश की बौछारों से अछूता नहीं है। इसे विगत 3 दशकों में पता नहीं कितनी बार नाप चुका हूँ। अगर आँख बंद कर के भी गाड़ी हांकू तो यह पता है कि कितनी देर में गतिअवरोधक आएगा और कितनी देर में गड्ढा। कहां पर रेल्वे क्रासिंग है तो कहाँ पर बस्ती? समझ लिजिए मेरे लिए गंगा ही है। प्रति दिन इसके आस-पास घटित की जानकारी ले ही लेता हूँ। कल इसी गंगा के किनारे हिमालय के वैद्य तम्बु लगाए दिखे। बड़े-बडे फ़्लैक्स लगा रखे हैं और सैकड़ों बीमारियों का नाम लिख  कर शर्तिया इलाज का दावा ये कर रहे है। बरसात की कुछ बूंदे पड़ी तो मैने बाईक रोक दी, इनका प्रचार वाला टेप चल रह था। मुझे जिज्ञासा हुई, सोचा थोड़ी देर इनसे चर्चा कर ही ली जाए। हो सकता है चरक की परम्परा से कुछ असाध्य रोगों के रामबाण ईलाज का नुस्खा मिल जाए।

बाईक किनारे लगा कर इनके टेंट में प्रवेश किया तो एक 20-22 साल का लड़का मिला। भीतर बहुत सारे कांच कूप्यकों में आयुर्वेदिक औषधियों के चूर्ण सजा रखे थे तथा मूल रुप में भी रखे हुए थे। बचपन से इनके टेंट देखते आ रहा हूँ, पहले इनके पास रिकार्डेड कैसेट नहीं होती थी तो ये मजमा लगा कर अपनी दवाईयों और तेल का बखान करते थे। उसका प्रदर्शन भी करते थे। लेकिन अब ये आधुनिक हो गए हैं। टेप बजा देते हैं और टेंट के भीतर आराम से बैठ जाते हैं। जैसे कोई धीवर नदी, तालाब में जाल फ़ेंक कर आराम से मछलियों के फ़ंसने का इंतजार करता है। दिन भर में मोटी मछली एक ही फ़ंस जाए, फ़िर तो बल्ले-बल्ले है। खर्चा निकल ही आता है। मेरे टेंट में प्रवेश करने पर वैद्य थोड़ा डरा हुआ दिखाई देता है। मेरे नाम पूछने पर उसने सतराम बताया और बोला बड़े वैद्य जी बाहर गए हैं। अगर आपको कुछ जानना है तो वही बताएगें। उसने अपना स्थायी ठिकाना सतना (मध्यप्रदेश) बताया।


थोड़ी देर की चर्चा से उसका डर सामने आ ही गया, वह पुलिस वाला समझ बैठा था। उसका शंका निवारण किया तो वह सामान्य हो गया। हिमालय की जड़ी-बूटियों के द्वारा शर्तिया इलाज के नाम पर ये कभी सांडे का तेल बेचते हैं तो कभी धात की बीमारी को ठीक करने वाला शर्तिया राम-बाण पाउडर। कांचकुप्यकों में हर्रा, बहेड़ा, आंवला, सनाय की पत्ती, लौंग, अजवाईन, काला नमक, मरोड़फ़ली, पित्ती का दाना, सफ़ेद मुसली, कुलंजन, अर्जुन छाल, अजगंध, गोखरु, अश्वगंधा, इंद्रायण, रीठा, चिरायता और संजीवनी भी रखी हुई थी। विभिन्न रोगों के हिसाब से इसका मिश्रण यौगिक भी तैयार कर रखा था। रोगी आने पर पुड़िया बांध के देने में सहुलियत होती है। फ़्लेक्स पर लिखा है-" शंकर हिमालय आर्युर्वेद दवाखाना कैम्प" और इस पर लिखा है जड़ी-बूटियाँ कठिन भस्म से तैयार की जाती है, दिमागी कमजोरी, पागलपन, शारीरिक कमजोरी, स्त्री को सफ़ेद पानी आना और ल्युकोरिया परदुस होना, शारीरिक दुबलापन होना और गुप्त रोगों का ईलाज करते हैं।" अर्थात मर्ज सब वही थे जिसे लोग बताने में हिचकते हैं और इनके पास टेंट में बता जाते हैं।

चर्चा के बीच में एक मरीज आ ही जाता है, बोरिया गाँव का रहवासी यादव। उसका कहना था कि शादी के 10 साल बाद भी उसके मामा-मामी के बच्चा नहीं हुआ। उसको इलाज करवाना है, जिससे बच्चा हो जाए। आप बोलेगें तो कल बुला दुंगा। बांस टाल में रहने वाली एक महिला से दवाई दो लोगों ने ली थी, उसमें एक के तो बच्चा हो गया, लेकिन उसके मामा-मामी को बच्चा नही हुआ। वैद्य ने कहा कि - कल बुला लेना, बड़े वैद्य जी नाड़ी देख लेगें और बता देगें। नाड़ी देखने की फ़ीस 10 रुपए लगती है। डॉक्टरों से हैरान-परेशान लोग आखिर इनके पास पहुंच ही जाते हैं। यह मुझसे कहने लगा कि पेट ठीक करने वाला चुर्ण ले लीजिए। अफ़ारा, गैस, बदहजमी, कब्ज, अपच की शर्तिया दवाई है। दो चार खुराक आप खाकर देखिए। आयुर्वैदिक दवाई का कोई साईड इफ़ैक्ट नहीं होता। मुझे कोई समस्या नहीं है- मैने कहा, हां! और आयुर्वैदिक दवाई का कोई साईड इफ़ैक्ट नहीं है तो जरा एक बीच जमालघोटा चबा जा। सारे इफ़ैक्ट दिख जाएगें।

अंग्रजी दवाईयों की बजाए लोग अभी भी आर्युवैदिक एवं परम्परागत नुस्खों पर विश्वास करते हैं। जब किसी वैद्य के पास पहुंच जाते हैं वह भी जेब काटने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखता। मंहगी-मंहगी भस्म जैसे स्वर्ण भस्म की शीशी थमा देता है (अब कैसे पता चले कि उसमें स्वर्ण भस्म है या नहीं)। कुल मिलाकर बात यह है कि भेड़ के उपर ऊन कोई नहीं छोड़ता। जो छोड़ दे वह बेवकूफ़। मैने उससे कुछ दवाई बनाने के नुस्खे जानने चाहे। मुझे लग रहा था कि इसके पास अधिक जानकारी नहीं है। कुछ दो चार आयुर्वैदिक के यौगिक बना रखे हैं, वही चूर्ण सबको थमा देते हैं। इसने बताया कि पेट की बीमारी के लिए छोटी हर्रे, बहेड़ा, अजवाईन, लौंग, सनाई की पत्ती, काला नमक का मिश्रण बना कर दिया जाता है। जोड़ों के दर्द के लिए मालिश का तेल बनाया जाता है, कपूर, अजवाईन, लौंग, लहसून, मरोड़फ़ली को सरसों के तेल में लाल होने तक पकाया जाता है, फ़िर मालिश के लिए इस्तेमाल किया जाता है। गले की खराश में कुलंजन का प्रयोग किया जाता है।

गुप्त रोगों के नाम से इन नीम-हकीमों का बहुत बड़ा कारोबार चल रहा है। सड़क या रेल मार्ग के किनारे ऐसे नीम-हकीमों के पूरे भारत में दीवारों पर विज्ञापन लगे हैं। ये भारतियों की मानसिकता जानते हैं, और यौन रोग को गुप्त रोग नामधर कर भया दोहन करते हैं। सभी स्तरों पर सालाना सैकड़ों करोड़ का कारोबार भारत में होता है। अखबारों में इन हकीमों के विज्ञापन आते रहते हैं। जबकि इनके इलाज से मर्ज ठीक भी नहीं होता और रोगी लुट-पिट जाता है। इसने मुझे संजीवनी बूटी दिखाई, बताया कि यह वही संजीवनी बूटी है जिसे हनुमान जी लेकर आए थे और लक्ष्मण की मुरछा दूर हुई थी। वह सूखी हूई थी, उसने बताया कि इसे पानी में डालने से 24 घंटे में हरी हो जाता है, इसके प्राण वापस आ जाते हैं। इसका उपयोग शरीर की गर्मी दूर करने में होता है और दुसरे बीमारी के चूर्ण में भी डाला जाता है। कुल मिलाकर भूल-भूलैया जैसे ही मामला था। जिस रोग का कोई इलाज नहीं होता, उसके हजार इलाज बताए जाते हैं। लेकिन काम एक भी नहीं आता। यह अवश्य है कि दादी-नानी के नुस्खे संकट काल में काम कर जाते हैं और मरीज को राहत देते हैं। 

पिछले दिनों जब रोहतक गया था तो वहाँ मुझे सर्दी हो गयी थी। कफ़ जैसा जम गया था और हरारत भी भी। अलबेला खत्री जी ने अपने सुटकेश से निकाल कर अजवाईन दी और गरम पानी के साथ एक खुराक चबा कर खाने को कहा। एक खुराक मैने रात को ली और एक सुबह खाली पेट। अगले दिन मेरी सर्दी और कफ़ गायब हो चुका था। इस तरह हम घरेलु नुस्खों से तुरंत राहत पा जाते हैं। केवल ने भी अजवाईन जैसे दाने मुझे दिए थे, वह उनके पांगी घाटी में ही होता है, उसकी एक खुराक ही सर्दी एवं पेट का अफ़ारा दूर करने के लिए काफ़ी थी। इन मर्जों के सहारे ही वैद्यों की दुकान चल रही है। सड़क के वैद्य एक मरीज आने पर अपने दिन भर की दिहाड़ी वसूल लेते हैं। अखबारों में एक विज्ञापन अक्सर देखने में आता है कि "शराबी को बिना बताए शराब छुड़ाएं।" जब इसकी खोज बीन की तो पता चला कि ये चार आने की ऐलोपैथी टिकिया को चूर्ण बनाकर शराब छुड़ाने के नाम पर हजारों वसूल लेते हैं। होटलों में रुक कर अपनी दुकान चलाते हैं, एक शहर से दुसरे शहर चक्कर काटते ही रहते हैं। बारिश थम चुकी थी, मैं पुन: अपनी यात्रा को आगे बढा कर चल पड़ा और सोच रहा था कि जब तक मरीजों में सही इलाज के प्रति जागरुकता नहीं आएगी तब तक ये हिमालयी टेंट सड़के किनारे लगे ही रहेंगे।

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

एक महामारी का रुप लेती शराब

समाज में शराब एक महामारी का रुप लेते जा रही है। युवा नशे की गिरफ़्त में आ रहे हैं। बेरोजगार होने पर यह बीमारी कोढ में खाज का काम कर रही है।

शराब खरीदने के लिए रुपए न  होने पर चोरी, डकैती, लूटपाट जैसे अपराध बढ रहे हैं। अपराध समाज के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द है। युवा अपराध की ओर बढ रहे हैं।

आपको प्राण रक्षक दवाएं कहीं उपलब्ध न हो पाएं पर शराब प्रत्येक जगह उपलब्ध है। कहीं भी सड़क के किनारे खड़े-खड़े भी शराब की तलब लग जाए, वहीं आपको उपलब्ध हो जाएगी।

यह सर्व सुलभ है। सरकारों के राजस्व प्राप्ति के लोभ ने इस महामारी को विकराल रुप दिया है। जिसके दुष्परिणाम बढते हुए अपराध के रुप में हमें देखने मिल रहे हैं।

अशोक बजाज ने रायपुर जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर रहते हुए 2007 में स्थानीय भाषा में नारा दिया “नशा हे खराब, झन पीहू शराब” (नशा है खराब,मत पीना शराब)। जब यह नारा सुनाई पड़ा तो मैने सोचा कि बहुत कठिन काम है शराब बंदी।

सिर्फ़ नारा देने से काम नहीं चलने वाला। शराब बंदी के लिए राजनैतिक और सामाजिक इच्छा शक्ति और आत्मबल की आवश्यकता भी है। अशोक बजाज जी ने नशा मुक्ति रैली का आयोजन किया जिसमें मुख्यमंत्री रमन सिंह जी, काबीना मंत्री बृज मोहन अग्रवाल, लता उसेंडी इत्यादि ने अपनी उपस्थिति दी थी।

अशोक बजाज जी नशा बंदी के लिए अपना जन जागरण अभियान, रैलियों, बैठकों, संचार माध्यमों, ट्रेक्ट पोस्टर इत्यादि के माध्यम से लगातार जारी रखा।

जन जागरण अभियान के फ़लस्वरुप छत्तीसगढ सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आगामी वर्ष में 250 शराब दुकानों को बंद करने का निर्णय लिया। सरकार के इस कदम का हम स्वागत करते हैं।

गाँवों में फ़ैल रही शराबखोरी की महामारी को रोकने में शराब दुकानों को बंद करने का कदम सहायक होगा। सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी। लेकिन जिन्हे शराब की लत लग चुकी है। उन्हे लत से बाहर निकालने के लिए सरकार और समाज को भी आवश्यक कदम उठाना होगा। तभी शराब बंदी लागू हो सकेगी।

नशा मुक्ति पुनर्वास केन्द्रों की स्थापना करनी पड़ेगी। जिससे आदतन शराबियों को नशा मुक्त किया जा सके।

“नशा हे खराब, झन पीहू शराब”, नारे ने शराब बंदी के लिए जमीन तैयार करने का काम किया। जिस पर देवजी पटेल ने कंधे से कन्धा मिला कर अशोक बजाज जी का साथ दिया. मजे की बता तो यह है कि उन्होंने बेवरेज कार्पोरेशन का अध्यक्ष बनते ही इस दिशा में कार्यवाही शुरु की।

शराब बंदी की ओर कदम उठाए। इसका मजबूत शराब लॉबी ने विरोध किया  किन्तु  इसे नजर अंदाज कर मुख्यमंत्री रमन सिंह जी की केबिनेट ने मुहर लगादी। पूर्ण शराब बंदी होना तो बहुत कठिन है। लेकिन जितनी भी शराब की बिक्री कम हो और उपलब्धता काम हो उतना ही समाज के लिए बेहतर है। सुलभ न होगी तो शराब सेवन भी कम होगा।

शराब बंदी के लिए कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। शराब बंदी के महत्वपूर्ण कदम के लिए हम मुख्यमंत्री जी, देवजी पटेल बेवरेज कार्पोरेशन एवं भाई अशोक बजाज (अध्यक्ष राज्य भंडार गृह निगम) को धन्यवाद देते हैं और आशा करते हैं कि नशा मुक्ति के लिए जन जागरण अभियान जारी रहे।