मंगलवार, 21 जून 2011

हिमालय आयुर्वैदिक दवाखाना कैंम्प - नेशनल हाईवे - 43 से -- ललित शर्मा

शाम होते ही बादल गड़गड़ाने लगते हैं और बारिश की बौछार शुरु हो जाती है, नेशनल हाईवे 43 भी बारिश की बौछारों से अछूता नहीं है। इसे विगत 3 दशकों में पता नहीं कितनी बार नाप चुका हूँ। अगर आँख बंद कर के भी गाड़ी हांकू तो यह पता है कि कितनी देर में गतिअवरोधक आएगा और कितनी देर में गड्ढा। कहां पर रेल्वे क्रासिंग है तो कहाँ पर बस्ती? समझ लिजिए मेरे लिए गंगा ही है। प्रति दिन इसके आस-पास घटित की जानकारी ले ही लेता हूँ। कल इसी गंगा के किनारे हिमालय के वैद्य तम्बु लगाए दिखे। बड़े-बडे फ़्लैक्स लगा रखे हैं और सैकड़ों बीमारियों का नाम लिख  कर शर्तिया इलाज का दावा ये कर रहे है। बरसात की कुछ बूंदे पड़ी तो मैने बाईक रोक दी, इनका प्रचार वाला टेप चल रह था। मुझे जिज्ञासा हुई, सोचा थोड़ी देर इनसे चर्चा कर ही ली जाए। हो सकता है चरक की परम्परा से कुछ असाध्य रोगों के रामबाण ईलाज का नुस्खा मिल जाए।

बाईक किनारे लगा कर इनके टेंट में प्रवेश किया तो एक 20-22 साल का लड़का मिला। भीतर बहुत सारे कांच कूप्यकों में आयुर्वेदिक औषधियों के चूर्ण सजा रखे थे तथा मूल रुप में भी रखे हुए थे। बचपन से इनके टेंट देखते आ रहा हूँ, पहले इनके पास रिकार्डेड कैसेट नहीं होती थी तो ये मजमा लगा कर अपनी दवाईयों और तेल का बखान करते थे। उसका प्रदर्शन भी करते थे। लेकिन अब ये आधुनिक हो गए हैं। टेप बजा देते हैं और टेंट के भीतर आराम से बैठ जाते हैं। जैसे कोई धीवर नदी, तालाब में जाल फ़ेंक कर आराम से मछलियों के फ़ंसने का इंतजार करता है। दिन भर में मोटी मछली एक ही फ़ंस जाए, फ़िर तो बल्ले-बल्ले है। खर्चा निकल ही आता है। मेरे टेंट में प्रवेश करने पर वैद्य थोड़ा डरा हुआ दिखाई देता है। मेरे नाम पूछने पर उसने सतराम बताया और बोला बड़े वैद्य जी बाहर गए हैं। अगर आपको कुछ जानना है तो वही बताएगें। उसने अपना स्थायी ठिकाना सतना (मध्यप्रदेश) बताया।


थोड़ी देर की चर्चा से उसका डर सामने आ ही गया, वह पुलिस वाला समझ बैठा था। उसका शंका निवारण किया तो वह सामान्य हो गया। हिमालय की जड़ी-बूटियों के द्वारा शर्तिया इलाज के नाम पर ये कभी सांडे का तेल बेचते हैं तो कभी धात की बीमारी को ठीक करने वाला शर्तिया राम-बाण पाउडर। कांचकुप्यकों में हर्रा, बहेड़ा, आंवला, सनाय की पत्ती, लौंग, अजवाईन, काला नमक, मरोड़फ़ली, पित्ती का दाना, सफ़ेद मुसली, कुलंजन, अर्जुन छाल, अजगंध, गोखरु, अश्वगंधा, इंद्रायण, रीठा, चिरायता और संजीवनी भी रखी हुई थी। विभिन्न रोगों के हिसाब से इसका मिश्रण यौगिक भी तैयार कर रखा था। रोगी आने पर पुड़िया बांध के देने में सहुलियत होती है। फ़्लेक्स पर लिखा है-" शंकर हिमालय आर्युर्वेद दवाखाना कैम्प" और इस पर लिखा है जड़ी-बूटियाँ कठिन भस्म से तैयार की जाती है, दिमागी कमजोरी, पागलपन, शारीरिक कमजोरी, स्त्री को सफ़ेद पानी आना और ल्युकोरिया परदुस होना, शारीरिक दुबलापन होना और गुप्त रोगों का ईलाज करते हैं।" अर्थात मर्ज सब वही थे जिसे लोग बताने में हिचकते हैं और इनके पास टेंट में बता जाते हैं।

चर्चा के बीच में एक मरीज आ ही जाता है, बोरिया गाँव का रहवासी यादव। उसका कहना था कि शादी के 10 साल बाद भी उसके मामा-मामी के बच्चा नहीं हुआ। उसको इलाज करवाना है, जिससे बच्चा हो जाए। आप बोलेगें तो कल बुला दुंगा। बांस टाल में रहने वाली एक महिला से दवाई दो लोगों ने ली थी, उसमें एक के तो बच्चा हो गया, लेकिन उसके मामा-मामी को बच्चा नही हुआ। वैद्य ने कहा कि - कल बुला लेना, बड़े वैद्य जी नाड़ी देख लेगें और बता देगें। नाड़ी देखने की फ़ीस 10 रुपए लगती है। डॉक्टरों से हैरान-परेशान लोग आखिर इनके पास पहुंच ही जाते हैं। यह मुझसे कहने लगा कि पेट ठीक करने वाला चुर्ण ले लीजिए। अफ़ारा, गैस, बदहजमी, कब्ज, अपच की शर्तिया दवाई है। दो चार खुराक आप खाकर देखिए। आयुर्वैदिक दवाई का कोई साईड इफ़ैक्ट नहीं होता। मुझे कोई समस्या नहीं है- मैने कहा, हां! और आयुर्वैदिक दवाई का कोई साईड इफ़ैक्ट नहीं है तो जरा एक बीच जमालघोटा चबा जा। सारे इफ़ैक्ट दिख जाएगें।

अंग्रजी दवाईयों की बजाए लोग अभी भी आर्युवैदिक एवं परम्परागत नुस्खों पर विश्वास करते हैं। जब किसी वैद्य के पास पहुंच जाते हैं वह भी जेब काटने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखता। मंहगी-मंहगी भस्म जैसे स्वर्ण भस्म की शीशी थमा देता है (अब कैसे पता चले कि उसमें स्वर्ण भस्म है या नहीं)। कुल मिलाकर बात यह है कि भेड़ के उपर ऊन कोई नहीं छोड़ता। जो छोड़ दे वह बेवकूफ़। मैने उससे कुछ दवाई बनाने के नुस्खे जानने चाहे। मुझे लग रहा था कि इसके पास अधिक जानकारी नहीं है। कुछ दो चार आयुर्वैदिक के यौगिक बना रखे हैं, वही चूर्ण सबको थमा देते हैं। इसने बताया कि पेट की बीमारी के लिए छोटी हर्रे, बहेड़ा, अजवाईन, लौंग, सनाई की पत्ती, काला नमक का मिश्रण बना कर दिया जाता है। जोड़ों के दर्द के लिए मालिश का तेल बनाया जाता है, कपूर, अजवाईन, लौंग, लहसून, मरोड़फ़ली को सरसों के तेल में लाल होने तक पकाया जाता है, फ़िर मालिश के लिए इस्तेमाल किया जाता है। गले की खराश में कुलंजन का प्रयोग किया जाता है।

गुप्त रोगों के नाम से इन नीम-हकीमों का बहुत बड़ा कारोबार चल रहा है। सड़क या रेल मार्ग के किनारे ऐसे नीम-हकीमों के पूरे भारत में दीवारों पर विज्ञापन लगे हैं। ये भारतियों की मानसिकता जानते हैं, और यौन रोग को गुप्त रोग नामधर कर भया दोहन करते हैं। सभी स्तरों पर सालाना सैकड़ों करोड़ का कारोबार भारत में होता है। अखबारों में इन हकीमों के विज्ञापन आते रहते हैं। जबकि इनके इलाज से मर्ज ठीक भी नहीं होता और रोगी लुट-पिट जाता है। इसने मुझे संजीवनी बूटी दिखाई, बताया कि यह वही संजीवनी बूटी है जिसे हनुमान जी लेकर आए थे और लक्ष्मण की मुरछा दूर हुई थी। वह सूखी हूई थी, उसने बताया कि इसे पानी में डालने से 24 घंटे में हरी हो जाता है, इसके प्राण वापस आ जाते हैं। इसका उपयोग शरीर की गर्मी दूर करने में होता है और दुसरे बीमारी के चूर्ण में भी डाला जाता है। कुल मिलाकर भूल-भूलैया जैसे ही मामला था। जिस रोग का कोई इलाज नहीं होता, उसके हजार इलाज बताए जाते हैं। लेकिन काम एक भी नहीं आता। यह अवश्य है कि दादी-नानी के नुस्खे संकट काल में काम कर जाते हैं और मरीज को राहत देते हैं। 

पिछले दिनों जब रोहतक गया था तो वहाँ मुझे सर्दी हो गयी थी। कफ़ जैसा जम गया था और हरारत भी भी। अलबेला खत्री जी ने अपने सुटकेश से निकाल कर अजवाईन दी और गरम पानी के साथ एक खुराक चबा कर खाने को कहा। एक खुराक मैने रात को ली और एक सुबह खाली पेट। अगले दिन मेरी सर्दी और कफ़ गायब हो चुका था। इस तरह हम घरेलु नुस्खों से तुरंत राहत पा जाते हैं। केवल ने भी अजवाईन जैसे दाने मुझे दिए थे, वह उनके पांगी घाटी में ही होता है, उसकी एक खुराक ही सर्दी एवं पेट का अफ़ारा दूर करने के लिए काफ़ी थी। इन मर्जों के सहारे ही वैद्यों की दुकान चल रही है। सड़क के वैद्य एक मरीज आने पर अपने दिन भर की दिहाड़ी वसूल लेते हैं। अखबारों में एक विज्ञापन अक्सर देखने में आता है कि "शराबी को बिना बताए शराब छुड़ाएं।" जब इसकी खोज बीन की तो पता चला कि ये चार आने की ऐलोपैथी टिकिया को चूर्ण बनाकर शराब छुड़ाने के नाम पर हजारों वसूल लेते हैं। होटलों में रुक कर अपनी दुकान चलाते हैं, एक शहर से दुसरे शहर चक्कर काटते ही रहते हैं। बारिश थम चुकी थी, मैं पुन: अपनी यात्रा को आगे बढा कर चल पड़ा और सोच रहा था कि जब तक मरीजों में सही इलाज के प्रति जागरुकता नहीं आएगी तब तक ये हिमालयी टेंट सड़के किनारे लगे ही रहेंगे।

19 टिप्‍पणियां:

  1. bachpan se dekhte sunte aa rahe hain in tenton ko...aapne aaj puri khabar le hi li in vaidyon ki.

    Bahut badhiya aalekh. Lekin inka kaam to chalta hi rahega aur log bevkoof bante hi rahenge.

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  2. - ऐसे हमने भी सडक किनारे बहुत देखे है,
    ऐसी मूछॆ व तगडा शरीर थोडा सा मोटा पेट देखकर तो वो तो क्या हर कोई पुलिस वाला ही मानेगा।

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  3. जब अच्छे खासे दवाखाने और हॉस्पिटल मौजूद हों , दादी माँ के घरेलू नुस्खों का संचित ज्ञान है हमारे पास तो लोंग ऐसे टेंटों की ओर रुख कैसे करते हैं , मुझे यही हैरानी होती है ...

    रोचक अंदाज़ में लिखा आपने !

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  4. ऐसे टेंट हमने भी सडक किनारे बहुत देखे है|
     

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  5. कुछ बेवकूफ इनकी बातों में आकर इनका गारंटी कार्ड भी भर देते हैं और अपना पता ठिकाना इन्हें सौंप देते हैं. फिर ये उन्हें ब्लैकमेल करके खूब पैसा ऐंठते हैं. मिर्गी और दमा वगैरह ठीक करने के नाम पर ये एलोपेथिक दवाओं का चूर्ण मिली खुराकें देते हैं जिनसे अमूमन रोग के कुछ लक्षण तो ठीक हो जाते हैं पर कभी-कभी अनहोनी भी हो जाती है.

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  6. जब बड़े बड़े अस्पताल वाले ठगने में लगे है तो इन गरीब ठगों को क्यों मना किया जाय | अब तो कहीं भी चले जाईये डा.,वैध,हाकिम हर कोई रोग ठीक करने के बजाय पैसा बनाने में ज्यादा दिलचस्पी रखते है | यदि किसी मृत व्यक्ति की लाश भी अस्पताल ले जाकर उनसे कहा जाय कि इसका इलाज कीजिये तो अस्पताल वाले एक बार तो लाश को भी भर्ती कर लेंगे यह सोचकर कि कोई बेवकूफ बन रहा है तो बनावो |

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  7. har sahahar me baithe hain koi saamne to koi parde me, koi degree wala to koi degree se mukt.

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  8. कई स्थानों पर बैठे रहते हैं शक्ति बढ़ाने वाले। काश, इसी से ही भारत शक्तिशाली हो जाये।

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  9. बिजनेस का ओपन सीक्रेट, बस आस्‍थावान मरीज की देर है.

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  10. रोचक जानकारी के साथ यात्रा विवरण। शुभकामनायें।

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  11. ये हिमालयी टेंट जितना इलाज कर सकते हैं .. उससे अधिक तो हम दादी नानी के नुस्‍खों के बारे में जानकर इलाज कर सकते हैं .. पर इसके प्रति लोगों की जागरूकता समाप्‍त हो गयी है .. छोटी छोटी बीमारी में भी लोग एलोपैथी की दवाइयां लेना पसंद करते हैं .. आज की व्‍यस्‍त जीवनशैली में कभी कभी ये आवश्‍यक भी हो जाता है .. अच्‍छी रिपोर्टिंग की है आपने !!

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  12. अगर आँख बंद कर के भी गाड़ी हांकू तो यह पता है कि कितनी देर में गतिअवरोधक आएगा और कितनी देर में गड्ढा। कहां पर रेल्वे क्रासिंग है तो कहाँ पर बस्ती? समझ लिजिए मेरे लिए गंगा ही है
    .....main daave se kah sakta hun ki yaatra-vritant likhane me aapka koi javaab nahi hai...bahut badhiya post.

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  13. मुझे तो लगता है आपने कोई भी जगह नहीं रहने दी जहा आप गए नहीं ! अच्छा पोस्ट है !टाइम निकल कर कभी हमारे ब्लॉग पर भी आए !मेरे ब्लॉग पर आ कर मेरा मान रखे!
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  14. कुछ खरीदा तो नही ना,ललित।

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  15. पुसदकर जी ने उत्सुक्तता जगा दी है :)

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  16. शिकवा रहे गिला रहे हमसे,
    आरजु यही है एक सिलसिला रहे हमसे।
    फ़ासलें हों,दुरियां हो,खता हो कोई,
    दुआ है बस यही नजदीकियां रहें हमसे॥

    ये काफी अच्‍छा है।

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  17. khair barish ke bahane hi sahi is ajnabi jagah ki bhi sair kara di aapne.jo kabhi sambhav hi nahi thi....

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  18. आपकी खोजी और पारखी नजरों से वह बेचारा तम्बू में रहने वाला हिमालयी वैद्य भी नहीं बच पाया. हम ऐसे पारम्परिक वैद्यों के अनुभवजनित ज्ञान को परख कर उनसे भी काफी कुछ सीख सकते है.
    बहरहाल आलेख काफी दिलचस्प है.

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  19. रोचक प्रस्तुतिकरण ... नीम हकीम खतरा ऐ जान .. फिर भी गाँव के लोंग इनसे इलाज करवाते हैं ..अच्छी जानकारी मिली

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