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शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

कैम्प में फ़ायर एवं पारो का खतरनाक एयरपोर्ट : भूटान

आरम्भ से पढ़ें 
अब आगे की कथा यह है कि फ़ुंतशोलिन से टीका राम वर्मा जी अपने घुटनों की दशा बताते हुए हमेशा नीचे का रुम ही मांगते रहे और समस्या यह थी कि उनसे पैड़ी नहीं चढी जाती। वो आज टायगर मोनेस्ट्री की खड़ी चढाई चढकर सकुशल नीचे तक पहुंच गए और मैं आधी दूर से लौट आया। इससे मुझे लगा कि कुछ लोग जानबूझकर ही मौज लेते हैं। आज की रात कैम्प फ़ायर का आयोजन किया गया था। हमारी बस आते ही हम रिसोर्ट में लौट आए। जब मैं अपने रुम का ताला खोलने पहुंचा तो ठंड के मारे मुझे कंपकंपी चढ़ गई। टूर आपरेटर तुरंत चाय लेकर आए और मै तीन कंबल रजाई ओढकर सो गया, सांसे लम्बी लम्बी चल रही थी। थामने से रुक नहीं रही थी। एक घंटे के बाद जाकर कहीं तबियत ठिकाने लगी।
कैम्प फ़ायर पारो भूटान
कैम्प फ़ायर की लकड़ियां जल रही थी, परन्तु वहां कोई नहीं था। मैने सबको आवाज देकर बुलाया। स्टीरियो की व्यवस्था भी की गई थी। परन्तु उनके पास भूटानी गानों के अलावा हिन्दी गाने नहीं थे और मेरे पास भी मुकेश के सैड सांग के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी गाने थे। मोबाईल की चिप निकाल कर लगाने पर छत्तीसगढी गाने बजने लगे। छत्तीसगढ़ी गानों का आनंद की कुछ अलग है। माधुरी अग्रवाल जी ने कहा कि इसे बंद कर दो, मेरा सिर दर्द होने लगा है, अगर हिन्दी गाने हैं तो लगाओ। बाकी लोग छत्तीसगढ़ी गाना सुनना चाहते थे। यहीं से कैम्प फ़ायर का वातावरण खराब होना शुरु हो गया। इस तू-तू मैं-मैं से सब चुप हो गए। जिस आनंद लेने के प्रयोजन से एक क्विंटल लकड़ी जलवाई गई थी वो स्वाहा हो गई।
आग तापते हुए
इतने में टूर आपरेटर ने कहा कि कल सुबह हम जल्दी आठ बजे निकल जाएंगे, क्योंकि कल हमको न्यू जलपाईगुड़ी तक जाना है, यह लम्बी दूरी का सफ़र है, तो द्वारिका प्रसाद जी कहने लगे कि आपने आज हमारा दिन खराब कर दिया, हम नहाए भी नहीं, सबसे पहले तैयार हो गए थे और योग भी छूट गया।  हम तो योग करके निकलेंगे चाहे नौ बज जाए। संतराम तारक जी ने कहा कि आपको सबका ध्यान रखना चाहिए। दल में आप अकेले ही नहीं है। तो द्वारिका प्रसाद जी बोले कि आप लोग चले जाना हम अपनी गाड़ी करके आ जाएंगे। इस तरह नाहक ही ठंड में वातावरण गर्म हो गया। 

टीका राम वर्मा जी एवं द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी
मुझे द्वारिका प्रसाद जी का यह व्यवहार बिलकुल पसंद नहीं आया। जो प्रभा मंडल उनकी आत्मकथा पढकर बना हुआ था वो सारा एक पल में ही चूर चूर हो गया। इसके बाद सभी रात का भोजन करने चले गए। रात की बात आई गई हो गई। सभी भोजन करने के उपरांत सोने चले गए। हम भी अपने बिस्तर के हवाले हो गए। अकेले दुकेले मित्रों के साथ 1985 से सफ़र कर रहा हूँ, भारत में तो डेढ सौ लोगों को भी एक साथ लम्बा टूर करवा चुका हूँ परन्तु पन्द्रह बीस लोगों को अपनी जिम्मेदारी लेकर पहली बार विदेश लेकर आया था, इसलिए बहुत कुछ सीखने भी मिला।
पारो की हवाई पट्टी
छ: अप्रेल की सुबह सभी नहा धोकर आठ बजे निवृत हो गए। बस तक सामान पहुंचाने एवं निकलने वही नौ बज गए। पारो से हम जब निकल रहे थे यहां का एयरपोर्ट भी देखना था। इस एयरपोर्ट को दुनिया के दस खतरनाक हवाई अड्डों में से एक माना गया है। हमारी बस जब एयरपोर्ट से निकल रही थी तो एक प्लेन लैंड कर रहा था। बहुत ही सुंदर अवसर था विमान की लैंडिग देखने का। यह कभी कभी ही मुनासिब हो पाता है, जब आप निकल रहे हो और आपको टेक ऑफ़ करता या लैंड करता प्लेन दिख जाए। एक स्थान पर हमने बस रुकवा ली। सभी उतरकर यह नजारा अपने कैमरे में कैद करने लगे।
लाल घेरे में लैंड करता हूआ प्लेन
इसे खतरनाक माने जाने का कारण यह है कि यह चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरा है और यहाँ विमान उतारना एवं उड़ाना दोनो ही कठिन है। इसलिए यहाँ सिर्फ़ रायल भूटान की फ़्लाईट उसके कुशल पायलटों द्वारा उतारी जाती है। यहाँ के राजा के पास दो प्लेन हैं, जो कोलकाता से सवारियां लाने ले जाने का काम करते हैं। ये प्लेन अस्सी सीटर हैं, परन्तु सुरक्षा के लिहाज से सत्तर सवारियों को ही स्थान दिया जाता है, दस सीटें खाली रखी जाती हैं। यहाँ के पायलटों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, इन पायलेटों एक भूटान के राजा के ससुर भी हैं। जो बड़ी जिम्मेदारी के तहत निरंतर पारो से विमान उड़ान का कार्य करते हैं।
ड्रुक एयर भूटान
यह विमानतल पारो नदी के तट पर उसके कैचमेंट एरिया में बना हुआ है। यहाँ से थिम्पू राजधानी की दूरी एक डेढ घंटे की है। हवाई जहाज से आने वाले यात्रियों को पारो में उतरकर थिम्पू जाना पड़ता है। हवाई अड्डे की सजावट किसी बौद्ध मोनेस्ट्री जैसी ही की गई है। प्लेन का हवाई पट्टी पर उतरना बड़ा ही रोमांचक लगा, जब छोटी सी हवाई पट्टी पर पारो नदी के किनारे विमान लैंड कर रहा था। यहाँ की फ़्लाईट की बुकिंग ऑन लाईन नहीं होती, कुछ एजेंटों के माध्यम से मनमाने मुल्य पर टिकिटें बेची जाती है। चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरे होने के कारण विमान यात्रा रोमांचक हो जाती है और चाहे नास्तिक ही क्यों न हो, यात्री एक बार तो अपने ईष्ट देव को स्मरण कर ही लेते हैं। जारी है आगे पढें…॥

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

रहस्यमय टायगर मोनेस्ट्री की ट्रेकिंग : पारो भूटान

आरम्भ से पढ़ें 
सुबह तैयार होकर हमने टायगर मोनेस्ट्री जाना तय किया। बस हमें वहां तक छोड़ आएगी फ़िर बाकी साथियों को पारो घुमाकर शाम को हमें वापस लेने आ जाएगी। इसे भूटान की रहस्यमय मोनेस्ट्री माना जाता है। यह भूटानी पर्यटकों  का प्रमुख आकर्षण है। यह मठ पारो से उत्तर दिशा में 12 किमी की दूरी पर है, पारो से यहाँ पहुंचने में आधा घंटा लगता है। इस स्थान को ताकसंग कहते हैं।  ताकसंग से टाइगर नेस्ट तक जाने के लिए ट्रेकिंग करनी पड़ती है। पहाड़ की चोटी पर स्थित यह मोनेस्ट्री 3120 मीटर (10240 फ़ुट) की ऊंचाई पर है। पहाड़ के किनारे पर बना हुआ यह मठ चारों तरफ़ घूमते बादलों से ढका रहता है। यहाँ तक पहुंचना ही रोमांचक अहसास कराता है।
बादलों से घिरी हुई दिखाई देती टायगर मोनेस्ट्री
विदेशी यात्री तो पारो हवाई अड्डे से सीधे यहाँ पहुंच कर ट्रेकिंग आरंभ कर देते हैं और मोनेस्ट्री की यात्रा करके लौट जाते हैं, उनके लिए भूटान में मुख्य आकर्षण यह मोनेस्ट्री ही है। जो भूटान यात्रा पर गया और उसने यह मोनेस्ट्री नहीं देखी, तो उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा, जो प्राकृतिक सौंदर्य नहीं देख पाया। मोनेस्ट्री के लिए चढाई ताकसंग से प्रारंभ होती है, पहाड़ की तराई में यह स्थान है, यहाँ पोनी भी मिलते हैं जो आधी चढाई ( कैफ़ेटेरिया ) तक पहुंचाते हैं, फ़िर आपको अपने दम पर ही आगे बढना पड़ता है।

टायगर मोनेस्ट्री
अब जरा टाईगर मोनेस्ट्री का इतिहास जानते हैं, इस स्थान की खोज आठवीं सदी में भारतीय गुरु पद्म संभव ने की थी, वे तिब्बत से लाए गए थे। किंवदन्ति है कि सम्राट पूर्व पत्नी येशे सोग्याल स्वेच्छा से गुरु रिम्पोचे (पद्म संभव को कई नामों से जाना जाता है) की शिष्य बन गई और खुद को बाघिन के रुप में बदल लिया और गुरु रिम्पोचे को अपनी पीठ पर सवार कर इस स्थान पर लेकर आई। कहते हैं कि यह बाघिन दुर्गम गुफ़ा तक उड़ कर पहुंची और गुरु रिम्पोचे को यहाँ तक पहुंचाया।
कैफ़ेटेरिया से टायगर मोनेस्ट्री
यहाँ आठ गुफ़ाएं है, जो भिन्न भिन्न गुरुओं के नाम से जानी जाती है। आठवीं सदी में यहाँ आकर गुरु पद्मसंभव (रिम्पोचे) ने तीन साल, तीन महीने, तीन सप्ताह, तीन दिन और तीन घंटे के लिए प्रचंड ध्यान साधना की।  भूटान में बौद्ध धर्म प्रारंभ करने का श्रेय इन्ही पद्म संभव को दिया जाता है। यहाँ की मोनेस्ट्री में बुद्ध के साथ इनकी प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती है। इन्हें द्वितीय बुद्ध कहा जाता है। बुद्ध की प्रतिमा एवं इनकी प्रतिमा में सिर्फ़ मूंछो का ही अंतर है, इनके मुख पर पतली मूंछे बनाई जाती है और इन्हें भूटान का संरक्षक देवता माना जाता है।

टायगर मोनेस्ट्री की ट्रेकिंग पर अंकित मिश्रा
गुरु पद्मसंभव ने घाटी में आकर इसे बुरी ताकतो से निजात दिलाई और पवित्र किया। इनके सम्मान में त्यौहार आयोजित किया जाता है, यह त्यौहार पारो घाटी में मार्च या अप्रैल के दौरान मनाया जाता है। वर्तमान में दिखाई देने वाले मठ का निर्माण तेनजिन राब्ग्ये ने 1692 में कराया। तेनजिन राब्ग्ये के रुप में गुरु पद्म संभव का पुनर्जन्म माना जाता है, उन्हें भी उतनी ही मान्यता और सम्मान मिला। कहा जाता है कि तेनजिन के पास ऐसी शक्ति थी कि वे थोड़े से भी भोजन से हजारों भक्तों को संतुष्ट कर देते थे। चाहे कितने ही भक्त आ जाएं, वे अपनी छोटी सी थाली से सबको भोजन बांटते और भोजन खत्म नहीं होता था और उनके प्रभाव से फ़िसलन भरी इस घाटी में कभी कोई फ़िसलकर नहीं गिरा।
अपन पोनी पर
बस वाला हमें ताकसग तक छोड़ कर चला गया। चढाई के प्रारंभ में भूटानी महिलाएं दुकान लगा रखी हैं, यहां पहाड़ की चढाई के लिए सहयोगी सामान मिलता है, जैसे पानी एवं स्टिक (नुकीली लाठी)। हमने स्टिक 50 रुपए में खरीदी। यहाँ हर चीज मंहगी है, जो सामान भारत में 10 रुपए का मिल जाता है, उसकी कीमत यहाँ 100 रुपए मान कर चलिए। कोई भी दुकानदार इससे कम में सामान देने को तैयार नहीं होता। यहाँ सामान के भाव सौ से शुरु होते हैं।
टायगर मोनेस्ट्री
हमने नौ बजे ट्रेकिंग प्रारंभ कर दी। हमारे साथ इस ट्रेकिंग में रायपुर से बिकास शर्मा, अंकित मिश्रा, नवीन तिवारी, ललित वर्मा एवं टीकाराम वर्मा जी थे। बजरंग बली का स्मरण करके चढाई प्रारंभ कर दी गई। अन्य यात्रियों के दल भी साथ चल रहे थे, जो फ़्रांस, अमेरिका, जापान, इंडोनेशिया, भारत, फ़िलिपिंस से आए हुए थे। उनके साथ गाईड और पोनी भी थे। रास्ते में प्राकृतिक पेयजल की व्यस्था भी है, जहां आप पहाड़ से आ रहे मिनरल वाटर (शुद्ध खनिज जल) का सेवन कर सकते हैं।

बाईकर हरकिशन लाल मेहता के संग
एक किमी चलने के बाद चढाई प्रारंभ हो गई। चढाई में मेरा दम फ़ूलने लगा तो बिकास एक घोड़े वाले को पांच सौ रुपए में तय करके ले आया। ये आगे बढ गए और मैं घोड़े पर सवार होकर चल पड़ा। घोड़े वाले ने कैफ़ेटेरिया तक पहुंचा दिया और कहा कि घोड़ा यहीं तक जाता है, इसके आगे आपको पैदल ही जाना होगा। मुझे लग रहा था कि इस ऊंचाई तक स्वास्थ्य साथ नहीं देने वाला तो बिकास और अंकित को आगे भेज कर मैं कैफ़ेटेरिया में ही रुक गया। मोनेस्ट्री तक पहुंचने के लिए पतली सी पगडंडी है, जिस पर संभल कर चलना होता है, अगर पैर फ़िसला तो हजारों फ़ूट गहरी खाई में राम नाम सत्य समझो। चीड़ के सघन वन से रास्ता गुजरता है।

रास्ते में भारत से आए हुए कई दल मिले। एक दल में कुछ कॉलेज के लड़के लड़कियां थे। वे आगे चलने पर अपने दल की एक लड़की को छोड़ कर आगे चले गए, वो लड़की चलने के लिए संघर्ष कर रही थी। पर आगे नहीं बढ़ पा रही थी। आगे पहुंचे पर उनका दल मिला। पूछने पर वो बोले कि वह अपने आप आ जाएगी। चिंता करने की  जरुरत नहीं है। मैं कैफ़ेटेरिया में ही बैठा रहा, बिकाश और अंकित मोनेस्ट्री की ओर चले गए। इनका मुझे तीन घंटे तक इंतजार करना पड़ा। यह कैफ़ेटेरिया बहुत मंहगा है। एक चाय के एक सौ तीस रुपए लगते हैं, भोजन के साढे पांच सौ। 

फ़्रांसिसी फ़्रेंड के साथ लौटते हुए
मैं कैफ़ेटेरिया में बैठ कर फ़ोटो खींचने लगा। यहाँ विदेशों से कई दल आये हुए थे। वो भी यहां बैठकर मोनेस्ट्री की फ़ोटों खींच रहे थे। इनके साथ भूटानी गाईड भी थी। थोड़ी देर बाद एक उड़िया स्त्री पहुंची, उसने सिर पर भीगा हुआ रुमाल डाल रखा था। चेहरे से लग रहा था कि पीड़ा में हैं। पूछने पर पता चला कि पोनी से गिरने के कारण चोट लग गई। गनीमत रही कि खाई में नहीं गिरी। इसके साथ बेटी और पति भी थे, वो इसे छोड़ कर मोनेस्ट्री चले गए। इसके बाद बंगाली दादा के साथ एक व्यक्ति आए, उन्होने परिचय कराया। ये बाईकर हरकिशन लाल मेहता थे, इन्होने बाईक से विश्व भ्रमण किया है। इनके नाम तीन बार गिनिज वर्ड रिकार्ड भी है। अच्छा लगा इनसे मिलकर, आधा घंटा साथ रहे और बातचीत भी हुई। 
टायगर मोनेस्ट्री के रास्ते में मार्केट
एक कोल्ड ड्रिंक भी पी। तब तक  हमारा यात्री दल भी आ गया। यहीं एक फ़्रांस की महिला से भी परिचय हुआ, हम साथ साथ, धीरे धीरे नीचे की ओर चल पड़े। लाने के लिए घोड़ा था परन्तु लौटना तो पैदल ही था। नीचे पहुंचने पर बिकाश बाबू ने दुकानों से कुछ सामान खरीदा, मैने भी एक हंटिंग नाईफ़ लिया। जंगल यात्रा के समय जरुरत पड़ती है। उसके बाद हमारी बस आ गई और हम अपने रिसोर्ट में पहुंच गए। जारी है...  आगे  पढ़ें 

सोमवार, 15 अगस्त 2016

नेशनल मेमोरियल चोर्तेन एवं भूटान के वृद्ध

आरम्भ से पढ़ें 
हम नेशनल मेमोरियल चोर्तेन देखने पहुंचे। भूटान आने वाला हर यात्री इस स्थान पर पहुंच ही जाता है।  ड्रुक ग्यालपो किंग जिग्मे दोरजी वांगचुक (1928-1972) अजदहा (डेग्रन) के देश भूटान के तीसरे ड्रुक थे। उन्हें आधुनिक भूटान का जनक माना जाता है। राजधानी थिम्पू के मध्य भारतीय सैनिक अस्पताल के समीप उनकी याद में एक स्मारक बना हुआ है, जिसे "नेशनल मेमोरियल चोर्तेन" कहा जाता है। इस स्मारक परिकल्पना तिब्बती बौद्ध परम्परा के अनुसार थिनले नोरबू ने की, परन्तु इसका निर्माण ड्रुक की माता फ़ुंतसो चोडेन वांगचुक ने 1974 में कराया था।
नेशनल चोर्तेन थिम्पू
यहां बने हुए स्तूप में अन्य स्तूपों की तरह राजा की कोई खास सामग्री (अस्थियाँ) नहीं रखी गई है। अन्य स्तूपों के विपरीत यहाँ सिर्फ़ ड्रुक की तश्वीर रखी हुई है। किंग जिग्में दोरजी वांगचुक के मन में ऐसा स्मारक बनाने की इच्छा थी जो बौद्ध धर्म का प्रतिनिधित्व करता हो और थिम्पू शहर की एक पहचान (लैंड मार्क) के नाम से जाना जाए। उनकी इच्छा की पूर्ती राजमाता ने की। यहाँ श्रद्धालू आते हैं और अपने धार्मिक कर्मकांड पूर्ण करते हैं।

शिखर छूने की चाह: राजेश सेहरावत
इस स्थान पर 4 बड़े मणिचक्र भी स्थाप्ति है, चारों तफ़ खुला स्थान है जिसमें बगीचा बना हुआ है और फ़ूलों की क्यारियाँ सजाई गई है। शहर के वृद्ध यहाँ आकर सप्ताहांत का दिन बिताते हैं और नौजवान बौद्ध धर्म के अनुसार आराधना करते हैं। इस स्तूप का स्वर्ण कलश आकाश को छूता हुआ प्रतीत होता है। यहाँ एक घंटा भी लगाया गया है जिसे विशेष अवसरों पर बजाया जाता है। 2004 में इसका नवीनीकरण किया गया था था तथा यह भूटान के धार्मिक चिन्हों के रुप में जाना जाता है।

भूटान के वृद्ध
रविवार का दिन होने के कारण यहां बहुत सारे वृद्ध दिखाई दे रहे थे। वे चोर्तेन की परिक्रमा करते हेउ जाप कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि भूटान वृद्धों का ही देश है। मैने वहां उपस्थित लोगों से वृद्धों के विषय में चर्चा करके भूटानी समाज में उनकी स्थिति के विषय में जानकारी ली। लोगों ने बताया कि भूटान में वृद्धों की हालत अन्य स्थानों बेहतर है। स्वास्थय सुविधाओं एवं प्रदूषण मुक्त प्राकृतिक वातावरण ने इनकी उम्र बढाई है।  

भूटान के वृद्ध
यहाँ के अधिकांश वृद्धों का समय आमतौर पर या तो माला जपते हुए बीतता है, या फिर मंदिर-देवालयों में परिक्रमा कर इष्ट-देवों को प्रसन्न करते हुए। उम्र के साथ ईश्वर के प्रति आस्था का बढ़ना एक सहज प्रक्रिया है। भूटान के अधिकतर नागरिक बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं, अतः लोगों की, विशेष तौर पर उम्र के ढलते पड़ाव पर पहुँच गये व्यक्तियों के जीवन में धर्म अत्यंत विशेष महत्त्व रखता है.

दंडवत करते हुए युवती
अन्य समुदायों की तरह भूटानी समाज भी वृद्ध व्यक्तियों के अनुभव और सूझ-बूझ को आदर भाव से देखता है,  घर के मुखिया मन-मुटाव दूर करवाने वाले सलाहकार के रूप में पारिवारिक-सामाजिक इकाई का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यही कारण है कि वहां बुज़ुर्ग समाज इज्ज़तदार जीवन व्यतीत करता है. परन्तु, वर्तमान में आधुनिकरण, शहरीकरण और पाश्चात्य संस्कृति की आंधी ने भूटानी पारिवारिक इकाई को भी अपनी चपेट में ले लिया है, और वृद्धावस्था बदलते पारिवारिक ढांचे, पलायन और बदलती जीवनशैली के बीच खुद को असहाय खड़ा पा रही है।

पुत्र वल्लभा
चूँकि स्थानीय लोग अधिक संख्या में शहरों की ओर कूच कर रहे हैं, इसलिए घर के बुज़ुर्ग प्रायः ही गाँव में पीछे छूट जाते हैं. अपने भरण-पोषण की संपूर्ण ज़िम्मेदारी वृद्धावस्था में भी उनके कन्धों पर ही आ पड़ती है। नगर-शहरों में एकल परिवार की संस्कृति सुरसा की भांति संयुक्त परिवारों को निगल रही है। ये बदलती परिस्थितियाँ परिवार में बुजुर्गों की अहमियत तो कमतर करती जाती है, जिसके कारण पारिवारिक इकाईमें उनका स्थान महज़ एक विकल्प बनता जाता है. यही कारण है कि उनकी बेबसी के साथ ही जीवनयापन के लिए उनकी आश्रयता दिन-पर-दिन बढती जा रही है।

परिक्रमा करते हुए भक्त जन
मित्र थिनले से इस विषय पर चर्चा हुई उनके अनुसार, हालाँकि भूटानी लोग ‘कुल राष्ट्रीय प्रसन्नता’ (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) के इकाई स्तर पर स्वयं का मूल्यांकन करते हैं और समता,न्याय इत्यादि का दम भरते हैं, परन्तु समाज का एक छोटा सा तबका ऐसा भी है जो प्रगति की इस दौड़ में बिना सहायता के भाग नहीं ले सकता। यद्यपि गांवों में अभी भी बड़े-बुजुर्गों की ज़रूरतों का मिलजुलकर ध्यान रखा जाता है, पर कानूनी तौर पर कुछ ऐसी नीतियाँ लागू करना अत्यावश्यक है जो समाज के इस वर्ग को स्वाभिमान का जीवन जीने की सुविधाएं उपलब्ध करवा सकें”।
्होरी भजो मन्ना
फ़िर भी भूटान के वृद्ध बेहतर अवस्था में हैं। आधुनिकीकरण की आंधी के बावजूद उन्हें भीख मांगने के लिए सड़क पर नहीं छोड़ा जाता। भूटान के विभिन्न शहरों एवं गांवों में भ्रमण के पश्चात मुझे एक भी वृद्ध भीख मांगते नहीं मिला। इससे जाहिर होता है कि समाज एवं उनका परिवार वृद्धों की आवश्यकता की पूर्ति करता है, उनका ख्याल रखता है और वृद्ध नाम जपते हुए, मणि चक्र फ़िराते हुए अपना बुढापा काट रहे हैं। नेशनल चोर्तेन से हम लोगों ने चिड़ियाघर पहुंच कर भूटान के राष्ट्रीय पशु टॉकिन को देखा। इसके विषय में अन्य जानकारी एवं किंवदंतियां मेरी इस पोस्ट में लिखी है। जारी है … आगे पढें…

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

हम हिन्दुस्तानी चले भूटान

हमारा विशाल भारत देश विश्व के किसी अन्य देश की तुलना में इक्कीस ही बैठता है, यहाँ बारहों महीने सभी मौसम मिल जाएगें, कहीं बारिश तो कहीं सूखा तो कहीं हरियाली से आच्छादित भू प्रदेश। सड़कों पर तफ़री करते बादल यहाँ भी मिलते हैं। शायद ही कोई पर्यटन का शौकीन ऐसा होगा जिसमें पूरा भारत घूम लिया होगा। फ़िर भी लोगों की इच्छा एक बार विदेश यात्रा करने की होती है। अगर वे भारत के एक-एक प्रांत की घुमक्कड़ी विदेश समझ कर ही कर लें तो उन्हें बहुत कुछ जानकारी एवं आनंद मिल जाएगा। परन्तु वे तो सिर्फ़ विदेश घूमना चाहते हैं।
भूटान की वादियां
हमारे कई मित्र विदेश घूमना चाहते थे। पर समस्या पासपोर्ट एवं वीजा की आती है। पहले पासपोर्ट बनवाना पड़ता है फ़िर संबंधित देश से वीजा (अनुमति) लेनी पड़ती है। परन्तु कुछ ऐसे देश हैं, जहाँ भारतीयों के लिए पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती। जिनमें से भूटान एवं नेपाल हैं। नेपाल में राजनैतिक उथल पुथल के साथ सांस्कृतिक प्रदूषण भी बहुत अधिक हो चुका है। वहां कब हड़ताल हो जाए और कब मार्ग बंद हो जाए, जिसमें पर्यटक फ़ंस जाएँ, पता नहीं चलता। इसलिए घुमक्कड़ी के लिए भूटान को ही प्रथम वरीयता देना चाहता हूँ। वैसे तो गत वर्ष हमने भूटान की सैर की थी, परन्तु समयावधि कम थी, सिर्फ़ सड़कें नापना ही हुआ।
भूटान की वादियां
इस वर्ष मित्रों से चर्चा करके अप्रेल के प्रथम सप्ताह में भूटान घुमक्कड़ी का कार्यक्रम बनाया गया और इसे "हम हिन्दुस्तानी सम्मेलन" का नाम दिया गया। इसकी तैयारी हमने अक्टुबर माह से ही प्रारंभ कर दी थी। टूर आपरेटर से चर्चा होने के पश्चात  एडवांस परमिट का फ़ार्म भी भरवाना प्रारंभ कर दिया था। एडवांस परमिट लेने से काफ़ी सुविधा हो जाती है और समय खराब नहीं होता। ज्यों ज्यों यात्रा का समय समीप आ रहा था त्यों त्यों अफ़रातफ़री मचती जा रही थी। कोई फ़ार्म भरने के बाद भी समस्या बता कर हाथ झाड़ रहे थे। कोई नए लोग जुड़ते जा रहे थे। हमसे समय चयन में थोड़ी गलती हो गई थी। मार्च का अंतिम सप्ताह एवं अप्रेल का प्रथम सप्ताह भारत में लेखा वर्ष का अंतिम समय होने के कारण काफ़ी व्यस्त रहता है। इसलिए बहुत सारे मित्र इस कार्यक्रम में नहीं जा पाए।
भूटान की वादियां
मुंबई से रायपुर होते हुए "कर्म भूमि एक्सप्रेस" गोहाटी जाती है। जो हमें सीधे हासीमारा पहुंचाती देती है। जिससे कलकत्ता रुक कर अगली यात्रा के लिए दिन भर का समय खर्च करने की बचत हो जाती है। इसलिए हम सब ने जहां तक हो सका कर्मभूमि एक्सप्रेस की टिकिट ही बनवाई थी। हमारी भूटान यात्रा छ: दिन की थी। इससे अधिक दिन का परमिट भूटान सरकार पर्यटकों को नहीं देती तथा वह पर्यटकों के लिए सीमित परमिट ही साल भर में देती है। ऐसा नहीं है कि कोई भी जब भी आ जाए, उसे परमिट दे दिया जाए। भूटान के राजा अपने देश में किसी तरह का प्रदूषण फ़ैलने नहीं देना चाहते। चाहे वह सांस्कृतिक हो या पर्यवर्णीय प्रदूषण हो। भूटान यात्रा से पहले मैं और पाबला जी दक्षिण की यात्रा कर आए थे। इस बीच तैयारी करने के लिए थोड़ा ही समय बचा था।
भूटान की वादियां
हम कुल 21 लोग हो रहे थे, जिसके लिए सारी व्यवस्था कर ली गई थी। कलकत्ता से हमारी कैटरिंग सर्विस भी जा रही थी। जो हमें भूटान में खाना बनाकर खिलाएगी। कर्मभूमि एक्सप्रेस 31 मार्च को रायपुर से सुबह 6 बजे थी। छोटा भाई मुझे सुबह जल्दी स्टेशन पहुंचा आया था। यहाँ से नवीन तिवारी जी, पथिक तारक जी सपत्नी, ललित वर्मा जी, टीकाराम वर्मा जी एवं मैं ट्रेन में सवार हुए। अकलतरा से अजय खंडेलिया जी को बिलासपुर आकर ट्रेन में चढना था, सुबह मैने कई बार फ़ोन लगाया लेकिन उन्होने नहीं उठाया। 
आत्मकथा के लेखक द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी
बिलासपुर से द्वारिका प्रसाद जी सपत्नी एवं नातिन, राजेश अग्रवाल जी ट्रेन में चढे, पर अजय खंडेलिया जी नहीं आए। रायगढ से प्रकाश यादव जी को छुट्टी नहीं मिली एवं अंतिम समय गिरीश बिल्लौरे जी एवं बैकुंठपुर से चंद्रकांत पारगीर जी ने आवश्यकर कारण बताते हुए मना कर दिया। इस तरह हमारे चार यात्री यहीं कम हो गए। हमारी टोली के राजेश सेहरावत जी पहले पहुंच चुके थे। द्वारिका प्रसाद जी के साले, सलहज,  अंकित मिश्रा एवं हेमंत पाणिग्रही को हासीमारा में तथा बिकास शर्मा को न्यू जलपाई गुड़ी में मिलना था।
हासीमारा स्टेशन 
हम एक अप्रेल को सुबह साढे नौ बजे न्यु जलपाईगुड़ी पहुंचे, यहां बिकास शर्मा मिल गए। आगे चलकर दस बजे करीब राजेश सेहरावत भी पहुंच गए। हमारी ट्रेन विलंब से चल रही थी। हम लगभग पौने दो बजे हासीमारा स्टेशन पर पहुंचे। अंकित और हेमंत यहां नही पहुंच पाए थे। यहां से जयगांव होते हुए भूटान की सीमा आधे घंटे की दूरी पर है। चार गाड़ियों में सवार होकर हम पन्द्रह लोग फ़ुंसलिंग की ओर चल पड़े। हमें जाने की जल्दी इसलिए थी कि द्वारिका प्रसाद जी नातिन एवं उनके साले, सलहज का वीजा ऑन एरायवल बनवाना था। यह ऑफ़िस चार बजे बंद हो जाता है। फ़ुंसलिंग पहुंच कर सीमा पर स्थित ऑफ़िस में द्वारिका प्रसाद जी एवं उनके परिवार को छोड़ कर हम होटल मिडटाऊन पहुंच गए।
सीमा पर भूटान गेट
यह फ़ुंसलिंग का एकमात्र स्विमिंग पुल वाला तीन मंजिला होटल है। यहां हमारा स्वागत होटल की परिचारिकाओं ने फ़ूल एवं रोली से किया। होटल वालों ने सभी को उनके कमरे बांट दिए गए। ऊपर की मंजिल में पांच लोगों के रहने के लिए सुईट जैसा था वह द्वारिका प्रसाद जी को दे दिया गया। सभी लोग स्नानादि दैनिक क्रिया में लग गए और मैं अपने रुम में आ गया। उसके बाद सिलीगुड़ी से अंकित का फ़ोन आया कि कहां पहुंचना है, उसे पता बताया गया। उन लोग भी शाम सात बजे तक होटल पहुंच गए। तब तक द्वारिका प्रसाद जी भी परमिट की व्यवस्था कर लौट आए। होटल पहुंच कर मैने देखा कि चश्मा ही गायब है, हासीमारा से आते समय कहीं गिर गया। मेरी समस्या को देखते हुए द्वारिका प्रसाद जी ने अपना चश्मा दिया, उसके बाद मैने सारा भूटान उनके चश्मे से ही देखा।
फ़ुंतशोलिन का होटल (फ़ाईल फ़ोटो)
उन्होने मुझसे ऊपर के कमरे की शिकायत की। उनकी श्रीमती जी की बायपास सर्जरी हुई है, इसलिए सीढियाँ चढने में तकलीफ़ का होना बताया। अब सभी लोग अपने कमरे में शिफ़्ट हो चुके थे, इसलिए नई व्यवस्था करना संभव नहीं था। यहां सिर भोजन करके एक रात गुजारना था। इसलिए आगे से नीचे का कमरा देने की बात कही। टीकाराम वर्मा भी शिकायत करने लगे कि उनसे ऊपर के कमरे लिए सीढियाँ चढने में तकलीफ़ होती है। आगे चलकर इनकी समस्याओं का समाधान हो सकता था। आज तो किसी हालत में संभव नहीं था।
होटल से तारसा नदी
हम कुल सत्रह लोग थे, टूर आपरेटर ने सामिष एवं निरामिष खाने वालों के बारे में पूछा तो मैने कह दिया कि दोनो तरह का भोजन आधा-आधा तैयार करवा लो। जो-जो निरामिष में चम्मच डालेगा, वह नोट कर लेना और अगले दिन से उतने लोगों के लिए निरामिष एवं सामिष भोजन बना लेना। वैसे भी मुझे लग रहा था कि सिर्फ़ दो-चार लोग ही निरामिष खाने वाले थे। नीचे डायनिंग हॉल में खाना बनकर तैयार था। सभी डायनिंग हॉल में आ गए। भोजन प्रारंभ हुआ, निरामिष खाने वालों की संख्या हमारी सोच से दुगने से भी अधिक निकली। आंकड़ा दस से अधिक पार कर गया। अब कैटरिंग वाले को भी आंकड़ा मिल गया था। जारी है आगे पढें…

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

शांगरी-ला : भूटान यात्रा - अंतिम किश्त

प्रारम्भ से पढ़ें 
सिलीगुड़ी में सुबह हुई, शहर घूमने का कार्यक्रम बना। सिलीगुड़ी में काफ़ी हिन्दी भाषी लोग भी रहते हैं और यहीं से नार्थ ईस्ट के लिए सभी गाड़ियाँ जाती है। गंगटोक, दार्जलिंग जाने वालों को यहीं आना पड़ता है। गोवाहाटी के लिए भी यहां से बस सेवा है। हमारी गाड़ी रात को न्यूजलपाईगुड़ी से थी। सिलीगुड़ी में चाईना मार्केट है और ऐसी ही एक मार्केट बस स्टैंड में भी है जहाँ वही सामान मिलता है जो चाईना मार्केट में मिलता है। हमने कुछ गर्म शाल खरीदे। नार्थ ईस्ट का डिजाईन कुछ अलग होता है और काफ़ी सुंदर भी दिखता है। इसलिए सोचा कि यादगार के तौर पर ले लिया जाए। क्योंकि भूटान में तो कैमरे के लिए सेल और चार्जर लेने में ही 1800 खर्च हो गए थे। वहां यह समान काफ़ी मंहगा मिला। अगर मुझे वहाँ पर ड्यूरो सेल मिल जाते तो दो ढाई सौ में ही काम चल जाता और 500 का सामान 1800 में नहीं खरीदना पड़ता।
सिलीगुड़ी में डाभ का स्वाद
मार्केट से लौटकर भोजन किया और बाकी साथी बागडोगरा एयरपोर्ट मार्केट चले गए और मैं होटल में ही बैठा रहा। ये अंधेरा होने पर पहुंचे। मुझे 5 घंटे बैठे बैठे गुजारने पड़े। इनके आते ही हम आटो लेकर न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पहुंच गए। सिलीगुड़ी से न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है और यही एकमात्र है स्टेशन है जो उत्तर पूर्व को भारत से जोड़ता है। न्यू जलपाईगुड़ी में हमारी ट्रेन लग चुकी थी। मैने खाना नहीं नहीं खाया था। स्टेशन पर ही जल्दी से चावल और सब्जी लेकर खाई और ट्रेन में सवार होते ही ट्रेन अगली मंजिल की ओर चल पड़ी।
न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन
सुबह हम 9 बजे हावड़ा जंक्शन में पहुंचे। यहां रिटायरिंग रुम में रुम के लिए इंतजार करना पड़ा। बिना नहाए धोए दिन की शुरुवात करना ठीक नहीं लगता पर मजबूरी थी। क्या करते, कुछ देर बाद नम्बर आया तो पता चला कि रुम चार्ज 1200 रुपए है। हमें तो सिर्फ़ सामान ही रखना था और फ़्रेश होना था। अब फ़्रेश होने के लिए सार्वजनिक शौचालय का उपयोग करना पड़ा और सामान क्लार्क रुम में रख कर हम हावड़ा स्टेशन की जेट्टी की ओर चल दिए। हमारे साथियों को हावड़ा पुल देखना था और ऐसे स्थान की टिकिट लेनी थी जिसका स्टीमर हावड़ा पुल के नीचे से गुजरता हो। 5-5 रुपए में हमने गोलाघाट की टिकिट ली और हावड़ा ब्रिज की खूब फ़ोटुएं खींची।
लैंडमार्क ऑफ़ कोलकाता हावड़ा ब्रिज
इसके पश्चात कुछ अन्य स्थान देखने के लिए बाबू घाट की ओर चल पड़े। स्टीमर ने हमें बाबू घाट छोड़ा और सड़क पर आकर हम बिछड़ गए। भूटान में ठंड के कारण न ठीक से पानी पीया जा रहा था और न ठीक भोजन कर पाया था। बाबू घाट की पटरी पर स्ट्रीट फ़ुड की दुकाने हैं, जहां मैने देखा कि एक स्थान पर गर्मागर्म चावल, दाल, 3 सब्जी, चटनी सलाद के साथ भोजन दिया जा रहा है। बस मैने वहीं बेंच संभाल ली और पेट भर भोजन किया आत्मा तृप्त हो गई। पैसे देते समय मूल्य पूछा तो होटल वाले ने सिर्फ़ 40 रुपए लिए। इस 40 रुपए के भोजन में वह आनंद आया जो 15 दिनों के फ़ाईव स्टार के ढकोसलों में नहीं आया। इसके बाद बस से मैं हावड़ा आकर साथियों का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद वे भी आ गए और हम अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए शालीमार स्टेशन आ गए।
घाटशिला रेल्वे स्टेशन
शालीमार से हमारी ट्रेन सही समय पर चल पड़ी। मैं अपनी बर्थ पर थोड़ी देर के लिए सो गया। हल्ला गुल्ला होने के बाद नींद खुली तो पता चला कि ट्रेन किसी स्टेशन में खड़ी है और यह अब आगे नहीं जाने वाली। मैने स्टेशन मास्टर से पूछा तो पता चला कि आगे राउरकेला पास कहीं पर कोई विधायक रेल की पटरियों पर अपने सर्मथकों के साथ बैठे और रेल रोको आन्दोलन चला रखा है। सवारियों को ट्रेन छोड़ने की सलाह बार बार माईक से दी जा रही थी। एलाऊंस किया जा रहा था कि यह ट्रेन वापस शालीमार जाएगी और जिन्हें वहां जाना है वह इस ट्रेन से जा सकते हैं और जिन्हे नहीं जाना है वे ट्रेन छोड़ दे। हम झारखंड के सिंहभूम जिले के घाटशिला प्रखंड में थे।
बिलासपुर - आखिर छत्तीसगढ़ पहुंच गए
हमारे साथी तय नहीं कर पा रहे थे कि क्या किया जाए। पर मैने ट्रेन छोड़ना तय कर लिया था और अपना सामान लेकर प्लेटफ़ार्म की बेंच पर बैठ गया। वे भी कुछ देर में स्थिति को समझ कर आ गए। घाट शिला में रिश्तेदारों को फ़ोन किया और वे हमें लेने के लिए स्टेशन आ गए। इस तरह नेता जी एवं रेल्वे विभाग की कारस्तानी के कारण हमें जबरदस्ती एक दिन और 2 रात घाटशिला में गुजारनी पड़ी। इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं था। अगले दिन हमने कुर्ला हावड़ा की टिकिट ली और रात को घर पहुंचे। खुबसूरत भूटान की खुबसूरत यात्रा करके लौट आए। मुझे नेपाल से भूटान बहुत ही अच्छा लगा। कभी समय मिला तो कुछ दिन भूटान में और गुजारना चाहुंगा। आखिर इसे "सांगरिला" (स्वर्ग भूमि) जो कहते हैं। 

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

बुद्धा टॉप - भूटान यात्रा -7

प्रारम्भ से पढ़ें 
दिन अभी ढलने में कुछ घंटे बाकी थे। हमारी सांझ की सैर भूटान के राष्ट्रीय संग्रहालय से प्रारंभ होने वाली थी। थिम्पू चू के किनारे चलते हुए हमारी बस घाटी के दूसरी तरफ़ स्थित एक पहाड़ी की ओर चल पड़ी। थिम्पू चू का पानी एक दम साफ़ था। यह नदी यहाँ पर उथली है और इसके दोनो तरफ़ ही नगर बसा हुआ है। पहाड़ी पर संग्रहालय बना हुआ है। इसमें प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति 25 रुपए है। संग्रहालय के कर्मचारी जल्दी कर रहे थे क्योंकि 5 बजे संग्रहालय बंद होने का समय है। सभी ने शुल्क देकर टिकिट ली और संग्रहालय में प्रवेश किया। संग्रहालय में कुछ खास तो दिखाई नहीं दिया। परन्तु भूटानी संस्कृति एवं उसके कुछ योद्धाओं के विषय में जानकारी अवश्य मिली। इसके पश्चात हम बाजार की ओर चल पड़े।

राष्ट्रीय संग्रहालय थिम्पू भूटान
भूटान का बाजार भारतीय एवं चीनी सामानों से अंटा पड़ा है, भारतीय सामान कोलकाता के रास्ते यहाँ तक पहुंचता है और चीनी सामान नेपाल होते हुए सिलीगुड़ी के रास्ते भूटान के बाजारों तक आता है। गर्म कपड़े यहाँ पर अच्छे मिलते हैं, खासकर चमड़े एवं रैग्जिन की जैकेटें काफ़ी उम्दा है, लेकिन इनका मूल्य भी आम आदमी की पहुंच के बाहर है। जूते भी कई रंगों के मिलते हैं, विशेषकर महिलाओं एवं बच्चों के। हिमालय क्षेत्र का देश होने के कारण यहाँ पैरों को गर्म रखने के लिए जूते अनिवार्यत: पहने जाते हैं। थिम्पू का यह बाजार मुझे मंहगा लगा। इस बाजार में वस्तुओं के मूल्य पर्यटक स्थलों की तरह ही कुछ अधिक हैं। यहाँ की अधिकतर दुकानदार महिलाएं ही हैं।
पारो का बाजार
दो-तीन घंटे बाजार की सैर करके जब हम बस के समीप पहुंचे तो कई सदस्य बस तक नहीं पहुंचे थे। बाजार में ही घूम रहे थे। एक घंटे से अधिक खड़े होने के कारण ड्रायवर को 50 रुपए पार्किंग चार्ज देना पड़ा। इसलिए इनके विलंब को लेकर वह बड़बड़ाने लगा और सबसे 100 रुपए इकट्ठे करके देने को कहने लगा। कल भी उसने ही पार्किंग चार्ज दिया था। मेरी हल्की फ़ुल्की उससे बहस भी हो गई। किसी तरह सबके लौट आने पर हम रिजोर्ट में लौट आए। जो भूटान का सिम हमने खरीदा वह किसी काम नहीं आ रहा था। फ़ोन कभी लगता था कभी नहीं। लौट कर आने के बाद उसके बैलेंस के 200 रुपए मैने घर बात करके खत्म कर दिए।
संग्रहालय में भूटानी सिपाही
रात सबको भोजन के वक्त बता दिया गया था कि उन्हें सुबह जल्दी तैयार होकर पारो के लिए चलना है और इसी रास्ते में पड़ने वाले कुछ स्थानों की सैर कराई जाएगी। बस इसे ही ध्यान में रख कर हम सुबह जल्दी उठ गए।  सभी ने तैयार होकर अपने सामान बस में लाद दिए और बस पारो के लिए चल पड़ी। हमारी बस सबसे पहले भूटान के चिड़ियाघर पहुंची। यहाँ पर कुछ पैदल चलना पड़ता है। लगभग आधा किलोमीटर पैदल चलने के पश्चात तारों की फ़ेंसिग से घिरा एक बाड़ा दिखाई दिया जिसमें भूटान का राष्ट्रीय पशु "टाकिन" रखा गया था। इसका पीछे का आधा हिस्सा गाय जैसा एवं सिर बकरे के जैसा है। ऐसा लगता है किसी ने गाय और बकरे को जोड़ दिया हो।
बस के यात्री
ऐसा जानवर मैं पहली बार देख रहा था। इसके विषय किंवदन्ती है कि सन् 1455 के आसपास एक चमत्कारी लामा जी को एक दिन गाय और बकरी की हड्डियां बिखरी पड़ी मिली। उन्हें चमत्कार दिखाने को कहा गया। लामा ने बिखरी हड्डियों को जोड़कर उन पर प्राण का संचार किया तो वह टाकिन बन कर जंगल में भाग गया। ये टाकिन उसी के वंशज बताए जाते हैं। इस लामा के चमत्कार की कई कहानियां बताई जाती हैं। इस प्रकार उत्तरी भूटान के जंगलों में टाकिन पाया जाता है तथा इसके नाम पर ही भूटान की रेड वाईन का नामकरण किया गया है। इसके मैने कई फ़ोटो लिए और हम वापस बस में लौट आए। 
भूटान का राष्ट्रीय पशु - टॉकिन
इसके बाद हमारी बस शहर में ही बने एक मंदिर चंगघा ल्हाखंग में पहुची। इसे लोग हनुमान मंदिर भी कह रहे थे। यहाँ लोग अपने बच्चों के स्वास्थ्य की कामना करते हुए लामा से आशीर्वाद दिलाने आते हैं। इसके बाद हम वांगचुग मेमोरियल पहुचे। यहाँ पर हमें हिन्दी भाषी श्री लंका में शिक्षित भूटानी गाईड कुमार मिला। उसने बताया कि इस स्मारक को तीसरे राजा ड्रूक ग्यालपो किंग जिग्मे दोरजी वांगचुक की याद में उसकी माता रानी फ़ुंत्शो चोदेन वांगचुक ने 1974 में बनवाया था यह स्मारक बहुत ही सुंदर है। इसमें भूटानी संस्कृति की झलक दिखाई देने के साथ अपने राजा के प्रति अथाह सम्मान भी दिखाई देता है। इस अवधि में मुझे भूटान में एक भी भिखारी नहीं दिखाई। नहीं कोई पैसे लिए हाथ फ़ैलाते दिखा। 
पुण्यार्थी - शुभदा पाण्डे, कुसुम वर्मा, डॉ नित्यानंद पाण्डे, रविन्द्र प्रभात, कृष्णकुमार यादव, मनोज पाण्डे
इस मंदिर से हम लोग बुद्धा टॉप की सैर पर चले। इस पहाड़ की चोटी पर चीन सरकार के सहयोग से भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध (शाक्य मुनि) की 169 फुट (51.5 मीटर) ऊंची प्रतिमा विशाल कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है। अवश्य ही कुछ वर्षों के बाद यह स्थान भूटान टुरिज्म का एक लैंड मार्क बनकर तैयार होगा तथा भूटान को पहचान दिलाएगा। बुद्ध की कांस्य प्रतिमा यहाँ पर आकाश से होड़ लगाती दिखाई देती है। इसके समक्ष बहुत बड़ा मैदान है जिसमें टाईल्स बिछाने का काम चल रहा था। यात्री दल ने यादगार के लिए यहाँ पर कई चित्र खींचे एवं खिंचवाए। इस स्थान पर अगर बगीचा बना दिया जाता और उसमें कुछ फ़ूल एवं फ़ल के वृक्ष लगा दिए जाते तो यह स्थान काफ़ी मनोरम हो जाएगा। अब यहाँ से हमारा अंतिम पड़ावा पारो था। जहाँ हमें एक रात व्यतीत करनी थी।
भूटान यात्रा दल बुद्धा टॉप में
बुद्धा टॉप से हम चल पड़े पारो की ओर, अभी तक का सफ़र सुनीता दो लाईनर कविताओं के साथ कट गए। कृष्णकुमार यादव जी एवं कुसुम वर्मा जी इसमे पूर्ण रुपेण सहभागी बनी थी। पप्पू अवस्थी जी खड़े खड़े इसे रिकार्ड कर रहे थे। उन्हें रिकार्डिंग में आनंद आ रहा था और मुझे सुनीता की कविताओं में तीसरी लाइन जोड़ने का मजा आ रहा था। इस तरह सफ़र मजे से कट रहा था। लम्बे सफ़र की यही मौज है कि बोलते बतियाते कट जाता है और यदि कवि, लेखक या गायक कलाकारों का संग हो तो तख्ते लंदन तक का सफ़र बस में कट जाएगा। अब एक यात्रा ऐसे ही मित्रों के साथ शिप में अंडमान की करनी है जहाँ सारे रास्ते भर कविताएं बरसती रहेगीं। जारी है, आगे पढ़ें 

शनिवार, 7 मार्च 2015

मोक्षार्थियों द्वारा लिंग पूजा की परम्परा………… भूटान यात्रा - 6

प्रारम्भ से पढ़ें 
थिम्पू में होटल ताज के सामने भूटान की स्ट्रीट मार्केट है। जहां भूटान के हस्त शिल्प की झलक मिलती है तथा हस्त शिल्प की बिक्री भी होती है। सभी दुकानदार महिलाएं ही हैं और आगे की कहानी इसी स्ट्रीट से प्रारंभ होती है। मैने देखा की इन दुकानों में विभिन्न तरह से सजाए हुए एवं बिना सजावट के भी "पुरुष लिंग" विक्रय के लिए रखे हुए थे। इस तरह खुले आम दुकानों में सामने रख कर पहली बार मैंने कहीं लिंग बिकते देखे। साथ में घूम रही भारतीय महिलाएं एवं पुरुष देख कर झिझक रहे थे। हमारे यहाँ सेक्स को टैबू समझा जाता है। यह प्रदर्शन की वस्तु नहीं मानी जाती और सेक्स से संबंधित चर्चा भी करना वर्जित समझा जाता है। इस तरह खुले आम लिंगों की बिक्री देख कर मेरी जिज्ञासा बढी और मैने दुकानदारों से इस विषय में चर्चा करना उपयुक्त समझा। उनसे ही सही जानकारी मिल सकती थी। 

भूटानी नाम मुझे बड़े कठिन लगे, याद ही नहीं रहते इसलिए दुकानदार का नाम तो मुझे याद नहीं पर उसने बताया कि उनके यहाँ लिंग की पूजा होती है। प्रतीक के रुप में छोड़े लिंगविग्रह से लेकर बड़े बड़े लिंग बनाए जाते हैं। आंखों वाले लिंग एवं मानवाकृति में दाढी मूंछ वाले लिंग बनाए जाते हैं। ड्रेगन जैसे लिंग भी मिलते है। इन्हें कपड़े आदि पहना कर सजाया जाता है तथा रिबन से बांधा जाता है, जैसे कोई गिफ़्ट आयटम बांधा जाता है। भूटान में लिंग को सृजन का कारक एवं रचनात्मक सकारात्मक उर्जा का प्रतीक माना जाता है। प्रत्येक घर में इसे रखा जाता है। घर के द्वार के दोनों तरफ़ लिंग चित्रित किए जाते हैं। इनके चित्र बड़े ही कलात्मक एवं सुंदर ढंग से चटक रंगों से तैयार किए जाते हैं। इन्हें सुख समृद्धि का द्योतक माना जाता है। भूटानी लिंग को अपने घरों में इसलिए टांगते हैं कि बुरी आत्माओं से बचाव होता रहे एवं मर्दों में सेक्स की क्षमता में इजाफ़ा हो।

लिंग पूजन तो भारत में लगभग 8 वीं 9 वीं शताब्दी से हो रहा है। हमारे यहां लिंग योनिपीठ में स्थापित होता है। लिंग एवं योनि दोनों की ही पूजा होती है। इसके साथ ही वाममार्ग में जननांगों की पूजा का विशेष महत्व है। पंच मकारों में मैथुन को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा इसे मोक्ष का साधन माना गया है। "मद्यं मांसं मीनं मुद्रां मैथुनं एव च, ऐते पंचमकार: स्योर्मोक्षदे युगे युगे।" भूटान हमारा पड़ोसी देश है जो हमारी धरती से भी जुड़ा हुआ है। किसी जमाने में सुदूर देशों से भी विद्याथी, विद्याध्ययन के लिए भारत आते थे। ऐसे में यहाँ के संस्कारो एवं संस्कृति का भी विशेष प्रभाव उन पर पड़ता ही होगा और वाममार्गी लिंग पूजन इसी रास्ते से भूटान पहुंचा होगा। ऐसी मेरी मान्यता है।

यहाँ से खोज-बीन आगे बढ़ती है तो पता चलता है कि मनुष्य ने सेक्स के जरिए मोक्ष का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया। मोक्ष मिला या नहीं। इसकी तो कहीं जानकारी नहीं मिलती पर सेक्सजनित रोगो से परलोक अवश्य सिधार गए होगें। वाममार्गियों से लेकर आचार्य रजनीश तक ने सेक्स के माध्यम से मोक्ष का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया और इस पर खुली चर्चा भी की। संभोग से समाधि तक उनका प्रवचन भी काफ़ी प्रसिद्ध रहा तथा युवाओं में यह प्रवचन चर्चित भी रहा। ऐसे ही एक संत 500 वर्ष पूर्व भूटान में भी हुए। भूटानी संत द्रुकपा कुनले का भी मानना था कि सेक्स के माध्यम से मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। कहते हैं इस संत ने 5000 महिलाओं से यौन संबंध स्थापित किया।

कुनले का जन्म 1455 में तिब्बत के पश्चिमी क्षेत्र सांग में बौद्ध धर्म के ग्या वंश के रालुंग मांनेस्ट्री में हुआ था। उसे कुनगा लेगपाई जैगपो के नाम से भी जाना जाता है। उसके पिता का नांग सो रिन चेन जांग पो थे। दंतकथा के अनुसार कुनले में दुष्टों को भी रक्षा करने वाले देवताओं में बदल देने की शक्ति थी। वह मात्र अपने लिंग को छुआकर ऐसा करिश्मा कर दे्ता था। कुनले के लिंग को थंडरबोल्ड ऑफ फ्लेमिंग विजडम कहा जाता था। कुनले का दावा था कि वह पुरोहितों के पाखंड को दूर करना चाहता है। वह शराब पीकर मस्त रहने के समर्थक था। दुनिया के कई देशों से महिलाएं उसका आशीर्वाद पाने के लिए इस विचित्र बौद्ध संन्यासी के मठ में आती थीं। उसने बहुत ही कम समय में बड़ी ख्याति प्राप्त कर ली थी। संन्यासी कुनले के उपदेश का प्रभाव आज भी हमने भूटान में देखा, यहां विभिन्न तरह के लकड़ी से बने हुए लिंग दिखाई देना कुनले की ही परम्परा है।

भूटान के लोगो के अनुसार बौद्ध धर्म में जन्म लेकर कुनले ने अपनी एक अलग शाखा बना ली बौद्ध मत के अन्दर जो कि लिंग कि पूजा किया करते थे। कुनले सबको एवं खासकर स्त्रियों के साथ सेक्स करके उन्हें आशीर्वाद दिया करता था। वह तिब्बत, भूटान आदि देशों में घूम घूमकर स्त्री और कन्याओ का कौमार्य तोड़ता था और सबके साथ सेक्स करता था। उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण लोगो ने उसके सम्मान में उसका एक मंदिर भी बना दिया। कुनले  ने एक बुरी, मांसभक्षी स्त्री के साथ सेक्स कर उसका गर्भ ठहरा दिया था जिसका मंदिर भी कुनले के साथ ही बनाया गया है।

लोगो के अनुसार कुनले स्त्री प्रेमी था और हमेशा उनका भला चाहता था.. आज भी भूटान के लोग उसके मंदिर में जाते हैं और वहां भिक्षु उनको पुरुष लिंग से आशीर्वाद देता है ताकि उनकी सेक्स लाइफ अच्छी चलती रहे। इस तरह हमने भारतीय वाममार्गी दर्शन का प्रभाव कुनले के माध्यम से भूटान में भी देखा। जो सेक्स के माध्यम से मोक्ष प्राप्त कराना चाहता था और भूटान में आज भी पूजनीय है और परम्परा में समाहित होने के कारण यह लिंग पूजा सहत्राब्दियों तक चलते भी रहेगी। भले ही विदेशियों के लिए भूटान में सार्वजनिक रुप से लिंग प्रदर्शन कौतुहल का कारक बनता हो परन्तु भूटानियों के लिए सामान्य जन-जीवन का एक हिस्सा है। जारी है …… आगे पढ़ें