रविवार, 18 दिसंबर 2016

खारुन नदी की रोमाचंक पदयात्रा

वनांचल के निवासी निरंतर प्रकृति से जुड़े रहते हैं, नदी, पर्वत, वन एवं वन्य पशुओं के साथ अपनी संस्कृति एवं परम्पराओं के पोषक होते हैं। शुद्ध वायु के साथ हरियाली सेहत को बनाए रखती है। शहर का व्यक्ति भी प्रकृति से जुड़ना चाहता है, उसे देखना, समझना एवं परखना चाहता है, परन्तु जीवन की आपा-धापी में उसके पास भौतिक सुविधाओं की कमी नहीं है, परन्तु प्रकृति से जुड़ने के लिए समय नहीं है। फ़िर भी वह व्यस्ततम समय में से कुछ समय चुरा कर वनों की तरफ़ चल पड़ता है। कुछ ऐसा ही हाल मेरा भी है, मुझे जंगल, नदी, पर्वत हमेशा आकर्षित करते हैं और इनकी समीपता पाने का प्रयत्न करता रहता हूँ। समय मिलते ही निकल जाता हूँ प्रकृति को जानने, मानव संस्कृति समझने।
कंकालीन मंदिर पेटेचुआ
इसी कड़ी में एक दिन खारुन नदी की ट्रेकिंग करने का ख्यान मन में आया। क्योंकि सभ्यताएँ, संस्कृतियाँ नदियों के किनारे ही पुष्पित पल्लवित हुई और उनका पतन भी हुआ। उनके अवशेष इन स्थानों पर मिलते हैं। खारुन नदी रायपुर शहर की प्राणदायिनी है। शहर में पेय एवं उद्योगों आदि के लिए इसी नदी से जल लिया जाता है। इसलिए तय हुआ कि खारुन नदी के उद्गम से संगम तक की पदयात्रा की जाए, इस पदयात्रा से खारुन द्वारा पोषित ग्रामों का इतिहास, संस्कृति एवं वर्तमान जान पाऊंगा। 
खारुन उद्गम पेटेचुवा में नारायण साहू के साथ
अब बारी थी योजना को अमलीजामा पहनाने की। नये स्थान से पदयात्रा प्रारंभ करना और जहाँ कोई पहचान का भी न हो तो काफ़ी कठिन कार्य हो जाता है, यदि स्थानीय निवासियों का सहयोग न मिले तो। इस विषय में एक दिन मैने मित्र नारायण साहू से चर्चा की, वे तैयार हो गए। मैने तय किया था कि उद्गम तक मोटर सायकिल से जाएंगे। परन्तु नारायण साहू  ने कहा कि कार से चलेंगे। मामला फ़िट हो गया और  अगले दिन सुबह हम खारुन के उद्गम की ओर चल दिए। खारुन का उद्गम पेटेचुवा ग्राम में है, जिसे स्थानीय लोग कंकालीन भी कहते हैं। रायपुर से पेटेचुआ की दूरी 115 किमी है।  चारामा घाट के नीचे से मरका टोला नामक ग्राम है, यहाँ से पेटेचुवा लगभग तीन-चार किमी की दूरी पर है।
खारुन नदी 
हमने ठंड से बचने का सामान ले लिया था, परन्तु ओढने एवं बिछाने के सामान का ध्यान नहीं रहा। इसकी जरुरत वहाँ पहुंचने पर पता चली। पेटेचुवा हम दोपह्रर को पहुंचे, कंकालीन माता के मंदिर के समीप गाड़ी खड़ी की। मंदिर के समीप ही सायकिल पंचर बनाने की एक दुकान एवं छोटा सा चायपानी का होटल था। इस ग्राम में हम पहली बार आए थे, इसलिए कोई पहचान का नही था। 
मंदिर परिसर का भीतरी पैनारामा दृश्य
होटल में चाय बनवाई और चाय पीते हुए खारुन नदी के उद्गम की चर्चा की। सायकिल दुकान वाला हमें खारुन नदी के उद्गम पर ले जाने के लिए तैयार हो गया। उसके साथ हम पैदल चलकर नायक तालाब पहुंचे, इस तालाब से झरिया से पानी निकलता है, जो खेतों से बहते हुए आगे चलकर कंकालीन नाले का रुप ले लेता है। यह नाला मंदिर के दाईं तरह से होकर जंगल में चला जाता है और मैदान में पहुंच कर खारुन नदी नाम पाता है।
खारुन नदी के प्रारंभ स्थल पर 
तालाब बहुत बड़ा था, मंदिर के पुजारी रामकुमार ने बताया कि इस तालाब का रकबा सत्रह एकड़ है। पुरखे बताते थे कि इसका निर्माण नायक लोगों ने कौड़ी पैसे में कराया था, पहले इस जगह पर एक झरिया था, जिसमें पेड़ का खोल गाड़ा हुआ था, ग्रामवासी उसी जल से अपना निस्तार करते थे। प्राचीन काल में नायक बंजारे अपनी गाड़ियों में सामान भर कर बेचने आते थे। उनके काफ़िले के लिए पानी की जरुरत पड़ती थी,

नायक तालाब पेटेचुवा, इसी तालाब से खारुन नदी का उद्गम हुआ
पानी की जरुरत को पूरा करने के लिए उन्होंने गांव वालों को मजदूरी देकर इस तालाब का निर्माण कराया, जिसके कारण इसे नायक तालाब कहा जाता है। रामकुमार की बातों से पता चला कि यह तालाब प्राचीन है। छत्तीसगढ़ में अन्य स्थानों पर भी बनजारों ने तालाबों का निर्माण कराया। अभनपुर के जनपद के एक ग्राम का नाम ही नायकबांधा है। अवश्य ही इसका संबंध नायकों द्वारा बनवाए गए तालाब से ही है। इसके बाद मुझे नायकबांधा नामक एक अन्य ग्राम महासमुंद के समीप भी मिला तथा पिथौरा में नायक लोग अभी भी रहते हैं।
नायक तालाब का निरीक्षण करते हुए
कंकालिन मंदिर से खैरडिगी ग्राम की दूरी लगभग सात किमी है। इस सात किमी में सघन वन है, इसके बाद मैदानी क्षेत्र प्रारंभ हो जाता है। हमारी नदी ट्रेकिंग का यही कठिन हिस्सा था। इसलिए हमने ट्रेकिंग को अगले दिन पर टाल दिया और रात के खाने का सामान लेने गुरुर ग्राम चले गये। हमारे साथ धमतरी से सुनील बरड़िया भी आये थे, उन्हें भी गुरुर से धमतरी वापसी के लिए बस पकड़वा दी। हम रात का खाना लेकर कंकालीन लौट आये। जारी है… आगे पढे

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

बहुत कठिन है डगर पनघट की

धरती के सभी प्राणियों का जीवन कठिनाईयों से भरा है। जीवन जीने के लिए नाना प्रकार के उद्यम सभी को करने पड़ते हैं। शास्त्रोक्त जरायुज, अंडज, स्वेदज एवं उद्भिज जातियाँ धरा पर हैं, इनमें मानव ही एकमात्र बुद्धिमान योनि मानी गई है, जिसका सभी प्राणियों से अलग जीवन अपनी संस्कृति है और सभ्यता है। इन सभी जातियों में एक चीज समान है, वह है उत्पत्ति, स्थित एवं विनाश (मृत्यु)। मृत्यु को जीवन का सबसे बड़ा सच माना गया है, कहते हैं उसे एक दिन आना ही है। सब ठाठ धरा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा। जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु होनी ही है, इसे कोई नहीं टाल सकता। यह प्रकृति का नियम है। प्रिय से भी प्रियतम को जाना है, बस धरती पर रहने वाला आँखों में आंसू लिए हठात देखता रहता है।
मेरे छोटे भाई देवराज की पैट्रोल पंप में बैठे हुए अंतिम फ़ोटो - चित्र उदय शर्मा
मैने बचपन से अपने प्रियजनों को इस धरती से जाते देखा। छोटा था, अबोध था, बस इतना बोध था कि जान गया था मृत्यु क्या होती है। दादा जी की मृत्यु को देखा, याद है, मैं रोया नहीं, घर भर के लोग रो रहे थे। शायद तब मुझमें वह भाव नहीं पैदा हुआ होगा, जिससे प्रकट होने से आँखों में आँसू आते हैं। दादा जी चले गए। मैं बड़ा हो रहा था। संयुक्त परिवार में हम सात भाई बहन एक साथ बढ रहे थे। सात में चार हम (दो भाई मैं और राजु, दो बहन दुर्गा एवं शारदा) एवं तीन चचेरे भाई बहन (दो भाई देवराज, कीर्ति एवं एक बहन वीणा) थे। मैं सबमें बड़ा हूँ, बाकी सब मुझसे छोटे। समय अपनी गति से उड़ रहा था। 
महाविद्यालय में द्वितीय वर्ष की शिक्षा चल रही थी, अचानक एक दिन पौ फ़टे हृदयाघात से पापा चल बसे। लगा कि वज्राघात हो गया। समझ नहीं आया क्या हुआ? दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। बचपन उसी दिन खत्म हो गया और उनके साथ ही चला गया। जिन्दगी की गाड़ी के जुड़े में जुत गया। आँखों से आँसू नहीं निकले। भीतर ही भीतर रोता रहा। अगर मेरी आँख से आंसू निकले तो छोटे भाई बहनों का मनोबल कमजोर हो जाएगा। रात को नींद में अचानक हृदय भर आता और लावा अंधेरे में उमड़ कर बाहर निकलता। अंधेरे में आँखे पोंछ्कर फ़िर सो जाता। इसी तरह जिन्दगी चलती रही।
दस वर्षों के भीतर दादी चल बसी, उन्होने अपनी उम्र पूरी की। शरीर अशक्त हो गया था, मेरे सामने ही उनकी सांसे थमी। शरीर से निकलते हुए हंस को तो नहीं देख पाया, पर कायोत्सर्ग देखा। सांसे धीरे-धीरे लम्बी हुई, फ़िर एक झटके से रुक गई। हंसा अपने देश चला गया। जहाज का पंक्षी, जहाज पर पहुंच गया। रह गए हम सब रोते बिलखते। इसके बाद बुआ जी चली गई और कुछ दिनों के बाद चाचा जी भी। मेरे सामने इतने लोग एक-एक करके धरती छोड़ते गए। वो आए थे, इसलिए चले भी गए। सभी से मेरी बेइन्तिहा मुहब्बत थी और आज तक भी है। उन्हें रोकना मेरे बस में न था। 
अभी तक जितने भी लोग दुनिया छोड़ गए वे सब मुझसे उम्र में बड़े थे, जैसे तैसे करके मैने मन को समझाया और लग गया अपने कामों में। संसारिक उलझने एवं कर्तव्य गहरे से गहरे घाव को भी भर देती हैं, जब बड़ा दर्द मिलता है तो छोटा दर्द आदमी भूल जाता है। यही मानवी प्रकृति एवं प्रवृति है। मनोवैज्ञानिक तौर मंथन करके दर्शन शास्त्रियों ने इन सब घटनाओं को झेलने के लिए शास्त्रों के पन्ने पर पन्ने भर रखे हैं। पर हृदय की चोट का दर्द असहनीय होता है।
राजस्थान के दौरे का पहला दिन 15 नवम्बर 2016 था, रात बारह बजे फ़ोन को चार्जिंग में लगा कर सोया। दूसरा फ़ोन आलमारी में रखा था। रात को एक बार फ़ोन की घंटी बजी, पर थकान के कारण फ़ोन नहीं उठाया। सुबह  16 नवम्बर 2016 उठने पर रात की कॉल की याद नहीं रही। रतन सिंह जी, देवेन्द्र कोठारी एवं मैं आपस में चर्चा करते हुए आज की यात्रा का प्लान बना रहे थे। तभी मैने फ़ोन खोल कर देखा तो  वाटसएप पर छोटे भाई राजु का मैसेज था कि "देवराज की तबियत रात को अचानक खराब हो गई, उसका बीपी लो हो गया था। अस्पताल में भर्ती किया है और डॉक्टर जैसे तैसे बीपी सामान्य रखने की कोशिश करता रहा, अब उसे वेंटिलेटर पर रखा गया है, ईश्वर जाने क्या होगा?"
मैसेज देख कर पिंडलियाँ कांप गई। तुरंत वापसी के लिए रास्ता देखने लगा। कोठारी जी तुरंत जयपुर से दिल्ली एवं दिल्ली से रायपुर की एयर इंडिया की टिकिट कर दी और तत्काल जयपुर की ओर लौट चले। रास्ते में एक जगह नाश्ता करने का विचार आया और ढाबे पर गाड़ी रोक ली। पराठे का पहला टुकड़ा तोड़ कर खाया था और दूसरा हाथ में था, तभी फ़ोन की घंटी बजी और दुखद सूचना मिली। छाती खाली हो गई और मस्तिष्क सुन्न हो गया। हम तुरंत चल पड़े। बचपन से लेकर तीन दिन पहले तक की सभी घटनाएँ चलचित्र की तरह मस्तिष्क में चल रही थी। मेरा छोटा भाई हम सब को छोड़ कर चला गया। 
घर की चिंता सताने लगी, परन्तु ऐसा कोई साधन नहीं था कि मैं तत्काल घर पहुंच जाता और सबको धीरज बंधाकर संभालता, छाती से लगाता। बस यहीं पर आकर मनुष्य परवश हो जाता है। चलते-चलते ही अंतिम संस्कार की व्यवस्था फ़ोन से की और हम आगे बढते रहे। नोटबंदी के दूसरे दिन शाम को मैं और उदय दोनो कैमरा लेकर फ़ोटो खींचने निकले थे। पांच सौ पैट्रोल भराने के लिए पैट्रोल पंप पर गए तो उदय ने बताया कि चाचा वहाँ बैठे हैं। मैने कहा एक फ़ोटो ले ले यहीं से चाचा की। वो उदय को फ़ोटो लेते देख मुस्काता रहा और उदय ने फ़ोटो ली। 
आज इस घटना को एक महीने होने जा रहे हैं, मन और तन दोनो काबू में नहीं है। मैने उसे गोदी में खिलाया था, स्कूल में भी भर्ती मैने ही कराया था। जैसे कल की बात हो। आज वह हमारे साथ नहीं है। किसी और के साथ कोई दुर्घटना होती है तो दिलासा दे लेते हैं, जब खुद के साथ घट जाय तो मन को समझाना बहुत कठिन हो जाता है। शोक, महाशोक में बदल जाता है। सभी अपने - अपने सुख को रोते हैं, मैं भी अपने सुख को रो रहा था कि मेरा भाई था। मेरी एक भुजा कट चुकी है और मैं फ़ड़फ़ड़ा रहा हूँ, बार बार आँखें भर आती है, थोड़ा सा भी कहीं एकांत मिलता है तो आँखों में भर आए पानी से दिखाई देना बंद हो जाता है। 
अपना दुख भुलाने को इस बीच मैं दो बार दो-दो दिन के लिए जंगल की यात्रा भी कर आया। पर कोई घर से कितनी दूर बाहर रह सकता है। आखिर लौटकर घर में आना ही है, यहाँ भी बहुत जिम्मेदारियाँ है, काम हैं। उनको भी निभाना है। पर मेरे लिए यह धक्का बहुत बड़ा है। जिसे झेल नहीं पा रहा। पापा जी के जाने के बाद बचपन चला गया और ये मेरा बाकी जीवन रोते रोते काटने का बंदोबस्त कर गया, बड़ा निष्ठुर निकला, जो मेरे पीछे से चला गया। आखरी वक्त में मुंह भी नहीं दिखाया। जीवन भर आत्मा रोते रहेगी। भाई-बहन तो भाई-बहन ही होते हैं…, माँ-बाप का मिलना तो भगवान तय करता है, पर भाई बहन किस्मत से ही मिलते हैं।