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मन की उड़ान |
धरती में दफ़्न जब किसी प्राचीन नगर, मंदिर देवालय या अन्य संरचना के बाहर आने की सूचना मिलती है तो रोमांचित हो उठता हूँ। निर्माण करने वाले शिल्पकारों की कारीगरी देखने की इच्छा जागृत होकर व्याकुल कर देती है। कल्पनाओं के घोड़े दौड़ने लगते हैं, अनगिनत सवाल मन में उठने लगते हैं। सारे जवाब पाना संभव नहीं। कल्पनाओं की अलग ही दुनिया है। जहाँ राजमहल होते हैं, वहाँ कल्पनाए राजा रानी की कहानियां गढने लगती हैं, सेनापति और दरबारी सामने दिखाई देने लगते हैं। उनका खान-पान, बोली, वेशभूषा कैसी होगी? जहां कब्रिस्तान होते हैं वहाँ कल्पना उठने लगती है कि कौन सोया है इन कब्रों में। कैसा होगा यह अपने जमाने और भी नाना प्रकार की बाते। खाली खोपड़ी में बहुत कुछ उपजते हुए एक चल चित्र सा चलने लगता है। ऐसा ही कुछ मेरे मन मस्तिष्क में सिरपुर के विषय में उमड़ता-घुमड़ता रहता है।
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बड़े गुरुजी बेदांती महाराज (मध्य में) |
छत्तीसगढ के महासमुंद जिले में महानदी के तटीय इलाके के उत्खनन में श्रीपुर नामक राजधानी प्राप्त हुई है। वैसे तो यहाँ पूर्व में कई बार जा चुका था। तब देखने लायक आँखे नहीं थी। जब आँख खुली तब सवेरा समझा और फ़िर खुली आँखों से देखने लगे। गत 16 से 18 जनवरी तक छत्तीसगढ की नदी घाटी सभ्यता पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन संस्कृति विभाग छत्तीसगढ शासन के सौजन्य से था। देश के विभिन्न स्थानों से पुराविद, इतिहासकार, शोधार्थी सम्मिलित होने पहुंचे थे। तीन ब्लॉगर भी थे इस सेमिनार में। 18 जनवरी का दिन सिरपुर भ्रमण के लिए तय हुआ था। बड़े गुरुजी ने कहा था कि मैं अगर सिरपुर भ्रमण पर जाऊंगा तो वे भी जाएगें। मैने भी सोचा कि येल्लो भाई, हो गया कबाड़ा, इस जनम में तो पीछा छूटने वाला नहीं। पता नहीं यह शनि कैसे सिर पर सवार हो गया। कोई तो बचाओ इससे।
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यहीं खोपड़ी थी |
बड़े गुरुजी सुनकर खिसिया गए, बोले- मोर खंगे रहिस त तोर ले भेंट होए है ( कुछ बाकी था, इसलिए तुम्हारे से मुलाकात हुई।) क्या बाकी था गुरुदेव, बुढौती तक तो सब निपट गया। गुरुजी बोले - एक बार की बात है, गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। पूजा पाठ करके अपना गुजर-बसर करता था। ब्राह्मण कहीं से जजमानी करके आ रहा था तो उसे रास्ते में मनुष्य की एक खोपड़ी पड़ी दिखाई। उसने सोच कर कि इस का कुछ संस्कार बाकी है, उस खोपड़ी को अपने पंछे में बांध लिया और घर ले आया। देखा जाए कि क्या बाकी है? ब्राह्मण ने पत्नी से छिपाकर उस खोपड़ी को खपरैल में रख दिया। दूसरे दिन ब्राह्मण अपनी कथा पूजा में चला गया। पत्नी को खपरैल में कुछ पंछे में बंधा दिख गया। उसने जिज्ञासावश पंछे को खोला तो खोपड़ी दिखाई दी। उसने माथे पर हाथ मारा और कहने लगी कि आने दे पंडित को आज उसकी खबर लूंगी, जादू टोना शुरु कर दिया है।
पंडित के आने से पहले गुस्से में पंडिताईन ने उस खोपड़ी को खलबत्ता (इमामदस्ता) में कूट कर चूर-चूर करके नाली मे बहा दिया और पंडित का इंतजार करने लगी। सांझ को पंडित लौटा, उसके ढूंढने पर खपरैल के छप्पर में वह खोपड़ी दिखाई नहीं दी। पंडित ने पत्नी से पूछा तो वह उस पर भड़क गयी। क्या पंडिताई से पेट नहीं भरता जो अब जादू टोना करने चले हो। मैने उस खोपड़ी को खलबत्ता में कूट पीस कर नाली में बहा दिया। पंडित बोला - बहुत अच्छा किया। मै तो यह देखने के लिए खोपड़ी को उठा लाया था कि इसका क्या होना बचा है? उस खोपड़ी का तुम्हारे हाथों की यह संस्कार होना बाकी था इसलिए यहाँ तक पहुंच गयी। बड़े गुरुजी ये कहानी सुना कर कुछ इस अंदाज में मुस्काए जैसे विक्रम अब वेताल को फ़िर से कंधे पर उठाकर चल पड़ेगा, मेरी तरफ़ देखते हुए। मै भी मुस्कुराता हूँ और सोचता हूँ कि इस डोकरा का मेरे हाथों क्या खंगा है?

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जय हो बेदांती महाराज की |
बेदांती महाराज की दोस्ती अब मजबुरी बन गयी, इनके दर पर आदतन हो गया पहुंचना। चेतन फ़िर ध्यान भंग करने पहुंच गया - और क्या लाऊँ? बेदांती महाराज बोले- मेरे लिए स्माल और महाराज के लिए फ़ुल्ल। चेतन आर्डर लेकर चला गया। बेदांती महाराज से चर्चा चलते रही, मुंह कड़ुवा होते ही मीठा बोलने लगे, बड़े प्रेम से ब्लॉग कहानी सुनाने लगे। ब्लॉगिंग पर गंभीर चर्चा होने लगी। बेदांती महाराज बोले- मैने तो कमेंट करना बंद कर दिया है। जिसकी पोस्ट मुझे अच्छी लगती है वहीं कमेंट करता हूँ। मैने कहा कि कभी एकाध कमेंट मेरी पोस्ट पर भी कर दिया करो। तो बोले - तैं मोर मन के लायक लिखथस त कमेंट करथौं (तुम मनभावन लिखते हो तब कमेंट करता हूं) धन्य हुए देव! एक साल में आपके मन के लायक एक पोस्ट भी नहीं लिखे। काहे ये नालायक चेला को फ़िर याद करते हो। चेतनSSS- अगला आर्डर कैंसिल। चलो अब बहुत टैम हो गया घर जाना है। बेदांती महाराज उठते और कहते हैं - कल कितने बजे चलना है सिरपुर? तैं के बजे आबे? बिहनिया आठ बजे अजायबघर में मिलना। मिलन का करार होने के बाद दोनो अपने-अपने रास्ते चल देते हैं। :)
दांत काटी, हमप्याला-हमनिवाला.
जवाब देंहटाएंवाह गुरूजी हों तो ऐसे
जवाब देंहटाएंहा हा हा ....कथा सुनने और सुनाने लायक है पूरी...और समझने वाली भी...
जवाब देंहटाएं“बेदांती महाराज की दंत कथा एवं सिरपुर भ्रमण katha samapat hui , bolo bloger maharaj ki jai.... prasad witaran ke liye dhanywad.... jankari ka prasad u hi witrit karte rahiye..... badhai........
जवाब देंहटाएंसाथ ले जाईये, दर्शन गहन हो जायेंगे..
जवाब देंहटाएंचलिए इस साल तो एक कमेन्ट कर ही देंगे गुरु जी..
जवाब देंहटाएंचलिए वेदांती महाराज को साथ ले सिरपुर चलते हैं.
जवाब देंहटाएंमनोरंजक प्रस्तुति .
जवाब देंहटाएंसिरपुर के वृतांत का इंतज़ार रहेगा . आपके ही मन सी जिज्ञाषा जगी है.
जवाब देंहटाएंमनोरंजक प्रस्तुति ...समय मिले कभी तो ज़रूर आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
जवाब देंहटाएंhttp://mhare-anubhav.blogspot.com/
मनोरंजक कथा... देखना है अब आगे क्या होता है...
जवाब देंहटाएंसही है बिलकुल :).
जवाब देंहटाएंजय हो बेदांती महाराज की...:)
जवाब देंहटाएंरोचक अंदाज है आपके लेखन का. कला व पुरातत्व में मेरी भी रुची है. अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी.
जवाब देंहटाएंबहुत चटखारे ले ले कर लिखा है अच्छी कहानी थी और भी कुछ होना baaki thaa ....khair गुरूजी भी कमेंटिया ही देंगे ये जरूर अच्छा lagegaa
जवाब देंहटाएंकई महत्त्वपूर्ण 'तकनिकी जानकारियों' सहेजे आज के ब्लॉग बुलेटिन पर आपकी इस पोस्ट को भी लिंक किया गया है, आपसे अनुरोध है कि आप ब्लॉग बुलेटिन पर आए और ब्लॉग जगत पर हमारे प्रयास का विश्लेषण करें...
जवाब देंहटाएंआज के दौर में जानकारी ही बचाव है - ब्लॉग बुलेटिन
मजेदार कथा ..शुक्रिया
जवाब देंहटाएं"सोचता हूँ कि इस डोकरा का मेरे हाथों क्या खंगा है?"
जवाब देंहटाएंबिल्कुल सही सोचते हो ललित! और यही मैं भी सोच रहा हूँ कि पता नहीं मेरा तुम्हारे हाथों क्या खंगा है? जब जो मर्जी आए बना देते हो मुझे, बड़े गुरुजी बनाया, जी.के. को बदल कर पी.के. किया, बेदांती बनाया और आगे भी जाने आगे क्या क्या बनाओगे?
मेरी टिप्पणी के बिना तुम्हारा ब्लोग अपडेट नहीं हो रहा है सो टिप्पणी कर दी। अब कुछ अच्छा पोस्ट लिखकर तुम भी कुछ अच्छा बन जाओ।
ha ha anand aa gaya ...bahut sundar
जवाब देंहटाएंha ha anand aa gaya ...bahut sundar
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रस्तुति .
जवाब देंहटाएंगुरु हों तो ऐसे :):) रोचक प्रस्तुतीकरण
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