मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

सरगुजा का सतमहला

प्रारंभ से पढ़े 
खनपुर फ़ोन लगाने पर पता चला कि अमित सिंह देव को अम्बिकापुर आना है। इसलिए हम अम्बिकापुर के रायपुर आने वाले चौक पर ही रुक गए। उनके साथ कलेक्टर दफ़्तर तक जाकर वापस लखनपुर आए। अमित लखनपुर के जमीदार परिवार से हैं। लखनपुर में इनकी जमीदार कोठी है, जिसे अंचल वासी महल कहते थे। अब वह पुराना महल हो चुका है। महल के सामने ही इनका नया घर और बगीचा है। जिसमें आम आदि के वृक्ष लगे हैं। महल अब खंडहर हो चुका है। सामने का परकोटा बस बचा है। बाकी धराशायी हो चुका है। पुराने जमाने की ईंटों, सुरखी एवं चूने से निर्मित यह महल कभी स्थानीय सत्ता का केन्द्र हुआ करता था। लोकशाही की स्थापना के साथ-साथ जिस तरह राजशाही, जमीदारियां नेपथ्य में चली गयी, उसी तरह महलों की ड्योढी का महत्व भी घटता चला गया। जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन हो गया। राजा और प्रजा सब एक बराबर हो गए। मजदूर एवं बेगार को भी एक वोट देने का हक मिला और राजा को भी एक वोट का ही अधिकार मिला। 
लखनपुर का महल 
हम इनके निवास पर चाय पीने के लिए पहुंचे, जहाँ बाबूजी अजीत प्रताप सिंह देव से मुलाकात हुई। चाय के साथ चर्चा के दौरान उन्होने बताया कि उनकी उच्च शिक्षा बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में हुई। उसके साथ ही बनारस के संस्मरणों का खजाना खुल गया। उनसे मिल कर ज्ञान रंजन हुआ। कभी समय मिला तो अवश्य ही उनके अनुभव की पिटारी से कुछ चुराना चाहुंगा। इस उम्र में भी लगातर पढते हैं। स्वाध्यायाम  न प्रमदति की सुक्ति को चरितार्थ करते हुए उनका स्वाध्याय का सफ़र जारी है। यहीं स्थानीय प्रत्रकार मुन्ना पाण्डे से भेंट होती है। उन्हे क्षेत्र की भौगौलिक स्थिति की अच्छी जानकारी है। अमित सिंह देव की रुचि भी अपने इतिहास एवं संस्कृति में है। जो व्यक्ति अपने इतिहास और संस्कृति को संजोने का प्रयास करता है वही सही  मायने त्रिॠणों के उॠण होने का अभ्यासी होता है। 
लखनपुर के मंदिर 
कहावत है कि लखनपुर में लाख पोखरा। कभी लखनपुर जमीदारी में लाख तालाब थे। लेकिन वर्तमान में 360 तालाबों मे    लखनपुर बस्ती के आस-पास बैगाई डबरी, मटकोरना डबरी, ढोड़िहा डबरी, सेमर मुड़ा, सिंवार तलवा, भावा ढोड़हा, देव तालाब, केसरुवा डबरी, दलदली तालाब इत्यादि हैं। राजमहल के रास्ते में ही प्राचीन शिवालय है, जिसकी रेख देख ट्रस्ट करता है। इसकी स्थापना स्थानीय जमीदारों ने ही कराई थी। परिसर में बजरंग बली भी विराजमान हैं। यहां जलकुंड है, कहते हैं कि इस स्थान के समस्त तालाब एक दुसरे से भूमिगत जल मार्ग से जुड़े हुए हैं। महल के दायीं तरफ़ महामाया मंदिर है। महामाया रकसेल राजवंश की कुल देवी हैं। इसके समीप  ही ठाकुर बाड़ी है।
श्री अजीत प्रताप सिंह देव
कोरिया राज्य के दीवान रघुबीर प्रसाद द्वारा लिखित झारखंड झंकार में सरगुजा की पाँच रियासतों सरगुजा, उदयपुर, जशपुर, कोरिया, चांगभखार का वर्णन किया है। ये रियासतें 1905 तक बंगाल प्रांत के अतंर्गत थी फ़िर इन्हे मध्यप्रदेश में शामिल किया गया। उपरोक्त पांचो रियासतों के नरेश क्षत्रिय थे। सरगुजा नरेश को "महाराजा" की एवं उदयपुर नरेश  को "भैया" की उपाधि वंशानुगत है। 1905 मे उदयपुर राज्य की एक सड़क के अलावा किसी भी राज्य में सड़क नहीं थी। आज हम उसी सड़क से चाय के उपरांत हम सतमहला की ओर चल पड़े। लौटकर उदयपुर के रेस्ट हाऊस में पंकज एवं राहुल से भेंट होनी थी।
देवगढ़ 
लखनपुर से थोड़ा आगे चलकर हम बायी तरफ़ नहर के कच्चे रास्ते पर चल पड़े। मुन्ना पांडे हमें छोटे रास्ते से सतमहला ले जा रहे थे। सतमहला से पूर्व हम देवगढ पहुंचे। यह स्थान रेंड नदी के किनारे पर स्थित हैं। दूर से देखने पर नवीन निर्माण दिखाई दे रहा था। समीप पहुंचने पर वट वृक्ष की जड़ो में फ़ंसे हुए मंदिर के अवशेष दिखाई दिए। यहाँ पर बलुई पत्थरों  से निर्मित शिव मंदिर समूह दिखाई दिया।। निर्माण में प्रयुक्त हुए पत्थरों रेत के मोटे दानों से बने हैं। जिसके कारण भुरभुरे एवं घिसे हुए दिखाई दे रहे थे। भग्न मंदिरों के अवशेष यत्र-तत्र बिखरे हुए पड़े हैं। मंदिर विनष्ट होने के कारण स्थानीय निवासियों ने एक मुखी शिवलिंग पर नवीन मंदिर का  निर्माण करवा दिया। यहाँ प्रतिवर्ष शिवरात्रि को तीन दिवसीय मेला भरता है। पास ही एक मंदिर के गर्भगृह में हनुमान की प्रतिमा स्थापित है। भग्न मंदिरों के आमलक भूमि पर पड़े हुए हैं।
सतमहला का शिवालय 
हम यहां से सतमहला की ओर चल पड़े। गांव के कच्चे रास्ते से चलकर सतमहला मंदिर समूह पहुंचे। कलचा-भदवाही ग्राम स्थित इस स्थान को सतमहला नाम दिया गया है। इससे प्रतीत होता है कि कभी यहाँ पर सप्त प्रांगण का महल रहा होगा। लेकिन वर्तमान में जो मंदिरों के समुह दिखाई देते हैं उनसे लगता है कि सप्त मंदिरों के समुह होने के कारण इस स्थान का नाम सतमहला रुढ हुआ होगा। यहाँ पर तालाबों की भरमार हैं। तालाबों में कमल खिले हुए दिखाई दे रहे थे। मंदिर समूह के समीप ही ईंटों से निर्मित एक षटकोणिय प्राचीन बावड़ी दिखाई देती है। एक ग्रामीण ने बताया कि इस स्थान पर संरक्षित करने का कार्य जी एल रायकवार तत्कालीन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के द्वारा हुआ है। मैने रायकवार जी को फ़ोन लगा कर उनसे इस स्थान के विषय में जानकारी ली। यहाँ उत्खनन का कार्य ताला डीपाडीह वाली जोड़ी रायकवार जी एवं राहुल सिंह जी ने किया। 
अष्टकोणिय प्राचीन बावड़ी
ग्राम सतमहला में सन् 1964-65 में बैजनाथ गिरी गोस्वामी के द्वारा स्थानीय लोगों की मदद से टीलों की खुदाई कराई गयी। इस स्थान पर देवबोरा तालाब, पखना तालाब, मांझी तालाब, मंझियाईन तालाब, डोकरा डबरी, आदि तालाबों के नाम गिनाए जाते हैं। इस स्थान पर पंचायतन शिव मंदिर दिखाई देता है जिसके स्तंभ खड़े हैं और अधिष्ठान सलामत हैं। द्वार पर नदी देवियाँ बनी हुई हैं। देखने से लगता है कि यह मंदिर भव्य रहा होगा। इस मंदिर समूह के अवशेष पूरे टीले में बिखरे हुए हैं। साथ ही आवासीय संरचना भी दिखाई देती है। इसके साथ ही पंचायतन शिवालय के सामने दाईं तरफ़ वृक्ष के नीचे बड़े पत्थरों से निर्मित एक संरचना में छत बनी हुई  है जिसमें शिवलिंग के साथ त्रिशुल इत्यादि भी रखे हुए हैं। कुछ पत्र पुष्प भी अर्पित किए हुए दिखाई दिए।
ताराकृति मंदिर 
इस स्थान से थोड़ा आगे चलने पर प्रस्तर के अधिष्ठान पर निर्मित भग्न ताराकृति मंदिर दिखाई देते हैं। एक मंदिर पूर्वाभिमुख है तथा दूसरा मंदिर पश्चिमाभिमुख। इस मंदिर के खंडित अवशेषों से कोई जानकारी नहीं मिलती कि यह किस देवता को अर्पित था और यहां कौन देवी देवता विराजते थे। हम लोग यहाँ कयास लगाते रहे लेकिन जानकारी नहीं मिल पाई। देवगढ़, सतमहला एवं ताराकृति मंदिर 8-9वीं शताब्दी के कलचुरी कालीन माने जाते हैं। अब यहाँ दोपहर हो चुकी थी और हमें वापसी की यात्रा के लिए काफ़ी मार्ग तय करना था। अब पक्की सड़क से हम उदयपुर विश्राम गृह पहुंचे जहाँ पर पंकज एवं राहुल प्रतीक्षा में थे। दोपहर का नाश्ता करके मित्रों से विदा लेते हुए हम अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गए। अभी सरगुजा का भ्रमण सम्पन्न नहीं हुआ है। मिलते हैं अगले दौरे के बाद कुछ ही दिनों में।

7 टिप्‍पणियां:

  1. ये खण्ड़हर देखकर ही इनकी वैभवता का पता लग जाता है।

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  2. रेन नदी के बायें तट पर फैली हमारी सांस्‍कृतिक विरासत.

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  3. ऐतिहासिक इमारतों की दुर्दशा देख कर दुःख होता है , मगर जहाँ हर गाँव में ऐसी इमारतें है , सबका रखरखाव मुश्किल ही है .
    रोचक वृतान्त !

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  4. दुर्लभ जानकारी उपलब्‍ध हुईं ....

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  5. स्थापत्य और संस्कृति के चिन्ह अभी भी विद्यमान हैं..

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  6. प्राचीन विरासत है हमारी. धन्यवाद दिखाने के लिये.

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