बुधवार, 6 जुलाई 2016

हम्पी का शाही स्नानघर, पुष्करणी एवं महानवमी उत्सव : दक्षिण यात्रा 12

आज हमें हम्पी नगर का बहुतेरा भाग देखना था। पाबला जी ने निर्णय ले लिया था कि 10 बजे तक हम्पी छोड़ देगें। हमने तैयार होकर उड़ूपी रेस्तरां में इडली का नाश्ता किया, तब तक हमारा गाईड गंगाधर भी आ गया था। सबसे पहले हम शाही स्नानघर पहुंचे। रानियों के स्नान के लिए विशेष कुंड का निर्माण किया गया था जिसमें बाहर की दीवारों में ढके हुए झरोखे हैं जिनसे हवा का आवागमन हो सके।  चौरस रानी कुंड की लम्बाई चौड़ाई 30 मीटर है, जिसमें 15 मीटर लम्बाई चौड़ाई एवं डेढ मीटर गहराई है। इसमें चारों तरफ़ झरोखे बने हुए हैं, जहां बालकनियाँ भी बनी हुआ हैं और सुंदर अलंकरण किया गया है। 
शाही स्नान घर हम्पी
इसके चारों तरफ़ बरामदा है जिसकी छत मेहराबों पर टिकी हैं। इस इमारत पर मुस्लिम स्थापत्य का पूर्ण प्रभाव दिखाई देता है। इसकी छतों सुंदर आकृति का वितानालंकरण दिखाई देता है। कुंड से जल निकासी एवं जल भराव की व्यवस्था प्रणालिकाओं द्वारा की गई है, जिससे सदैव निर्मल जल प्राप्त हो सके। गर्मी के दिनों में यह स्थान बहुत सुकून देता होगा। आज सिर्फ़ अहसास ही किया जा सकता है। जब जलती बलती ग्रीष्म ॠतु में यहाँ जल किलोल किया जाता होगा तो यह स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता होगा। 
शाही स्नान घर का भीतरी दृश्य
शाही स्नान घर से कुछ दूरी पर सैनिकों की बैरकें हुआ करती थी। यहां सैनिकों के लिए किसी स्थाई संरचना का निर्माण नहीं दिखाई देता। परन्तु उनके भोजन करने के लिए जल की व्यवस्था दिखाई देती है। यहाँ तुंगभद्रा का जल प्रणालिकाओं के माध्यम से पहुंचाया जाता है, जिससे सैनिक जल द्वारा अपना नित्य कार्य स्नान भोजन इत्यादि कर सकें। स्थान का निरीक्षण करने पर प्रतीत होता है कि सैनिकों के रहने के लिए तंम्बु आदि की अस्थाई व्यवस्था की जाती रही होगी। वर्तमान में भी सैनिकों के अस्थाई निवास के लिए तम्बुओं की व्यवस्था ही होती है।
महानवमी उत्सव मंच हम्पी
यहां से हम शाही आवास परिसर की ओर चल दिए। विदित हो कि विजयनगर साम्राज्य (हम्पी) के तुलुवा वंश के राजा कृष्ण देव राय वैष्णवधर्मी थे। परन्तु उन्होनें सभी पंथो एवं धर्मों का आदर किया। उनके कार्यकाल में बने हुए भवनों के वास्तुशिल्प में यह स्पष्ट परिलक्षित होता है। हिन्दू शैली के साथ मुगल शैली का समावेश निर्माण में हुआ है। उनमें उत्सव धर्मिता की भी कमी नहीं थी। महानवमी (रामनवमी) पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता था जिसमें राज्य भर की प्रजा उपस्थित होकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ उत्सव का आनंद लेती थी। उनके कार्यकाल में राज्य में विदेशियों का आगमन भी होता था। वे व्यापार करने, घोड़े बेचने एवं अपने कला कौशल प्रदर्शित करने के लिए आते थे।

नृत्य उत्सव का प्रदर्शन
उत्सव के आयोजन के लिए राज परिसर में भव्य मंच का निर्माण किया गया था। जिसे महानवमी दिबा कहा जाता है। यह वर्गाकार मंच 22 फ़ुट ऊंचा एवं 80 फ़ुट लम्बा एवं चौड़ा वर्गाकार है। इसे राजा कृष्ण देव राय ने उड़ीसा के गजपति शासकों की विजय पर स्मृति के रुप में बनवाया था। इस पर चढने के लिए सामने से पैड़ियाँ बनी हुई हैं और पार्श्व में दस फ़ुट ऊंचा द्वार बना हुआ है, जिससे भीतर से इस पर पहुंचा जा सकता है। हो सकता है इसका प्रयोग राजा के आगमन एवं कलाकारों के मंच पर पहुंचने के लिए किया जाता होगा। जब अचानक कलाकर मंच पर पहुंचता होगा तो दर्शक विस्मय से देखते होते होंगे।

चतुरंगिणी सेना का प्रदर्शन
इस मंच के निर्माण में कला कौशल का भरपूर प्रयोग किया गया है, यह भी वहां उपलब्ध कड़प्पा प्रस्तर से ही बनाया गया है। ऊंचे अधिष्ठान के ऊपर गजथर का निर्माण किया गया है। इसके बाद अन्य पशुओं एवं उनके कारनामों को दिखाया गया है। छोटे गवाक्षों के साथ नृत्यरत सुंदरियों को दिखाया गया है। युद्धरत सैनिकों एवं हाथियों के करतबों को मंच की भित्तियों में स्थान दिया गया है। इनके राज्य में विदेशी राजदूत भी आते थे, उनका भी चित्रण किया गया है।  हिन्दुओं के त्यौहारों का शिल्पांकन किया गया है। विशेषकर होली पर ढफ़ बजाते हुए एवं नृत्य करते  हुए दिखाया गया। 
जल प्रबंधन के लिए प्रस्तर प्रणालिकाएँ
इस मंच का उपयोग कौतुक प्रदर्शन से लेकर, गायन, वादन, नृत्य एवं अन्य प्रतियोगिताओं के संचालन के लिए होता था। मंच के समक्ष बैठ कर देखने के लिए काफ़ी बड़ा मैदान है तथा इसके सामने पुष्करी का निर्माण भी किया गया है। जिससे आने वाले दर्शकों को पेयजल उपलब्ध हो सके। मंच की बांई तरफ़ की दीवार पर चतुरंगणी सेना को दिखाया गया है, जिसमें हाथी, घोड़े ऊंट एवं पैदल सेना का चित्रण किया गया है। इससे जाहिर होता है कि राजा के पास सुदृढ सेना थी, जिसके बल पर उसने पूरे दक्षिण भारत को फ़तह कर लिया और विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। उत्सव के लिए इतना बड़ा मंच मुझे अन्य किसी स्थान पर देखने नहीं मिला। महानवमी का त्यौहार अवश्य ही राजकीय त्यौहार के रुप में मनाया जाता रहा होगा।
शाही आवास क्षेत्र स्थित पुष्करणी
महानवमी दिबा के समक्ष पुष्करणी एवं कुंआ बना हुआ है। तुंगभद्रा नदी का जल नहरों एवं प्रस्तर प्रणालिकाओं के माध्यम से योजनाबद्ध रुप से सारे नगर में पहुंचाया जाता था। पुष्करणी में जल निकासी एवं भराव की व्यवस्था दिखाई देती है। इसका निर्माण काले पत्थर से किया गया है। जिसमें समकोण बनी हुई पैड़ियां पुष्करणी की सुंदरता में चार चाँद लगाती दिखाई देती हैं। इसके आगे ही चौरीसी स्तंभों की इमारत है। जिसके स्तंभों के चिन्ह मात्र दिखाई देते हैं बाकी पुरा परिसर काल के गाल में समा गया है। समय की मार से सब ढह गया। जो कुछ बचा है, उसे आज पर्यटक देखने आते हैं। जारी है…… आगे पढें।

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैने अधिकतर किला अथवा एतेहासिक महल समान्य से ज्यादा ऊंच्चे स्थानो पर बने देखे है । जैसे ग्वालियर, भोपाल,जबलपुर आदि जगहो मे ।यह किस प्रकार के स्थान पर है ।

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  2. एक बार फिर जाना है
    बहुत कुछ छूट गया

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