शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

बराकर का घोड़ा मंदिर समूह

आज का दिन हमारा बराकर घूमने का नियत था। मेरा यहाँ आने का उद्देश्य प्राचीन घोड़ा मंदिर देखना था। इस नगर की संरचना देखने के बाद लगता है कि यह नगर प्राचीन काल से ही आबाद है। अब किस राजा के अधीन था, इसकी जानकारी नहीं मिलती। नदी किनारे बसाहट और प्राचीन मंदिर समूह होने कारण मेरी धारण शत प्रतिशत सही बैठती है। धर्मशाला से दस मिनट चलकर हम घोड़ा मंदिर पहुंच गए। इसे घोड़ा मंदिर कहने का कारण, यहा पूर्व में लगने वाला तांगा स्टैंड है। तांगे स्टैंड में घोड़े मिलते थे, इसलिए इसे घोड़ा मंदिर कहा जाने लगा।
घोड़ा मंदिर समूह बराकर पश्चिम बंगाल
मंदिर परिसर में प्रवेश करने पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सूचना फ़लक में इन्हें 14 वीं सदी में उड़ीसा शैली में निर्मित बताया गया है। उड़ीसा शैली में मंदिर के आमलक एवं कलश की बनावट के साथ स्थापत्य अलग ही दिखाई देता है। प्रथम तीन मंदिर एक जैसे हैं। बनावट एवं सम्मुख स्थापित नंदी से प्रतीत होता है कि यह पूर्व में शिवालय रहे होगें, 
घोड़ा मंदिर समूह बराकर पश्चिम बंगाल का नंदी
इनके द्वार शिलापट पर शिव परिवार का अंकन है। वर्तमान में इनमें गणेश एवं लक्ष्मी विराजित हैं। मंदिरों भित्ति  में मत्स्य अवतार उत्कीर्ण दिखाई देता है। इसकी भित्तियों में प्रतिमाओं की संख्या न्यून है। इस  मंदिर की भित्ति पर नटराज की प्रतिमा है.
घोड़ा मंदिर नम्बर एक का द्वार शिलापट
इन मंदिरों के पीछे तरफ़ एक शिवालय मंदिर है, जिसका शिखर इनसे कम ऊंचाई का है। स्थापत्य एवं शिल्प की दृष्टि से यह सातवीं शताब्दी का हो सकता है। इस मंदिर का शिल्प भुवनेश्वर उड़ीसा के परशुरामेश्वर मंदिर जैसा ही है। इसके मंडप का पुनर्निमार्ण हो चुका है। कहते हैं कि भग्न मंडप का पुनर्निमार्ण अंग्रेजों के शासन काल में हुआ था। सभी मंदिर बलुआ पत्थरों से निर्मित हैं। जिनका धीरे धीरे क्षरण हो रहा है। 
घोड़ा मंदिर 2 का गर्भगृह
इस शिवालय की भित्तियों में वराह अवतार, नृसिंह अवतार, त्रिविक्रम, गज लक्ष्मी, भैरव, कीर्तिमुख, दिग्पाल, नृत्यांगनाएँ, वाद्यक, सहित अन्य प्रतिमाएं भी निर्मित है। विशेषकर कुत्ते एवं ड्रेगन जैसे सर्प की लड़ाई का अंकन रोचक है। एक कमरे में ग्रिल लगाकर कई प्रतिमाएं रखी हुई हैं।
घोड़ा मंदिर समूह का चौथा शिवालय
इन प्राचीन मंदिरों का कोई उचित रख रखाव नहीं है। सूचना फ़लक से इनके भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन होने की जानकारी मिली। लगता है कि बरसों से यहाँ संरक्षण कार्य नहीं हुआ है और न ही यहां के प्रांगण में बगीचा निर्मित किया गया है। जबकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास पृथक गार्डनिंग विंग भी है। 
स्वान एवं डेग्रन की लड़ाई
इन मंदिरों के शिखरों पर पीपल एवं वट जैसे महा वृक्षों ने स्थान बना लिया है। अगर इन्हें नही हटाया गया तो साल दो साल में ये प्राचीन स्मारक जमींदोज हो सकते हैं। सिर्फ़ सूचना फ़लक लगाने से जिम्मेदारी पुर्ण नहीं हो जाती। ये चारों मंदिर शिल्पकला की अनूठी मिशाल हैं। 
गज लक्ष्मी
मंदिरों के अवलोकन के पश्चात हम बाजार से होते हुए धर्मशाला में आ गए। रुम में पहुंचने के बाद देखा तो मोबाईल पर अनंत महेन्द्र का एक संदेश दिखाई दे रहा था। ये कल ही मेरी मित्र सूचि में जुड़े थे। उन्होने पूछा था कि आप बराकर में हैं क्या? मैने हाँ कहा। तो उन्होने पता पूछा। मेरे बताने के थोड़ी देर बाद वे रुम के द्वार पर थे। 
अनंत महेन्द्र 
हाथ में अमूल दूध एवं कुछ स्नेक्स भी लेकर आए थे। वे यहीं शिक्षक हैं। मेरी पोस्ट पढने के पर उन्हें पता चला कि बराकर में हूँ तो मिलने की इच्छा लिए पहुंच गए। अच्छी मुलाकात रहीं। इलाके के बारे में अच्छे से जानने मिला। उनकी ट्रेन का समय हुआ तो वे चले गए। शाम को बिकास के साथ बाजार घूमने गए। इस तरह आज का दिन व्यतीत हो गया। यात्रा जारी है … आगे पढें।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपके ब्लॉग में मुझे भी सचित्र स्थान मिला..मेरे लिए गर्व की बात..

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  2. आपके ब्लॉग में मुझे भी सचित्र स्थान मिला..मेरे लिए गर्व की बात..

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  3. घोड़ा मंदिर समूह बराकर पश्चिम बंगाल को जानना अच्छा लगा। . समय रहते संरक्षण कर लिया जाय तो ऐसे धरोहर को बचाया जा सकता है, वर्ना नाम ही रह जाएगा। ..

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