रविवार, 12 मई 2013

तरीघाट में प्राचीन सभ्यता के अवशेष

 जे. आर. भगत 

भनपुर से 14 किलोमीटर की दूरी पर प्रवाहित खारुन नदी के बांए तट पर बसा है तरीघाट गाँव। तरीघाट जैसा की नाम से प्रतीत होता है कि यह कोई नदी का निचले किनारे स्थित घाट होगा, इसलिए तरीघाट कहलाता है। खारुन नदी रायपुर एवं दुर्ग जिले को विभाजित करती है। एक किनारा रायपुर जिले में है और दूसरा किनारा दुर्ग जिले में। खारुन नदी में पानी बारहों महीने रहता है और भिलाई या पाटन जाने के लिए इस नदी को डोंगी से पार करके जाना पड़ता था। फ़िर एक दशक पूर्व पास के गाँव वाले रपटा बना लेते थे और उससे जाने वाले से कुछ शुल्क लेकर कमाई करते थे। मैने मोटर सायकिल से खारुन नदी को कई बार पार किया और कभी इसके काई लगे पत्थरों पर बाईक सहित गिरकर घुटने भी फ़ोड़वाए। कुछ वर्षों पहले इस नदी पर पुल बन गया और आवागमन सहज होने लगा।

अतुल प्रधान, नरेन्द्र शुक्ल, जे. आर. भगत उत्खनन का शुभारम्भ  
अभनपुर से दुर्ग जाने के लिए इस रास्ते का प्रयोग सदियों से हो रहा है। अब इस अंचल से प्राचीन कालीन मानव बसाहट के अवशेष मिलने लगे हैं। रास्ते  के गाँव चंडी में देवी का प्रसिद्ध मंदिर है तथा इसका निर्माण भोसला राजाओं द्वारा किया प्रतीत होता है। मंदिर की दक्षिण दिशा में तालाब का भी निर्माण हुआ है तथा सैनिक बसाहट के भी चिन्ह मिलते हैं। इससे आगे चलने पर नदी के दांए तट पर परसुलिडीह गाँव एवं बांए तट पर तरीघाट गाँव बसा है। परसुलिडीह से ही नदी के उस पार बड़े बड़े टीले दिखाई देने लगते हैं। इन टीलों पर अकोल के वृक्षों की भरमार है। इन टीलों की सतह पर काले और लाल मृदा भांड के अवशेष पाए जाते हैं। जिससे सिद्ध होता है कि इस स्थान प्राचीन बसाहट रही होगी। ग्रामीणों ने यहाँ महामाया का मंदिर बना रखा है और एक टीले पर रावण भी विराजमान होने से यह रावण भाटा भी है।

पॉटरी यार्ड
छत्तीसगढ़ शासन के पुरातत्व विभाग के उप संचालन जे आर भगत ने विधिवत सर्वे कर शासन से इस स्थान पर उत्खनन की अनुमति प्राप्त की। 17 मार्च को लगभग सांय 4 बजे तत्कालीन पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के संचालक नरेन्द्र शुक्ला ने उत्खनन का शुभारंभ किया और इस स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। उत्खनन सहयोगी के रुप में अतुल प्रधान यहाँ मुस्तैदी से तैनात हैं। कुछ दिनों के बाद रावण भाटा वाले स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। 23 मार्च को मैं यहाँ पहुंचा तो बसाहट के चिन्ह उजागर हो चुके थे। यहाँ बसाहट के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रागैतिहासिक काल से लेकर मौर्य काल, शुंग काल, कुषाण काल एवं गुप्त काल तक के अवशेष प्राप्त हो रहे हैं। इससे यह तो तय है कि छत्तीसगढ़ में मल्हार के बाद पहली बार कहीं इतनी पुरानी सभ्यता के चिन्ह प्राप्त हो रहे हैं।

टीले पर उत्खनन और पार्श्व में खारुन नदी 
उत्खनन में सिरपुर जैसी कोई बड़ी संरचना तो प्राप्त नहीं  हो रही, परन्तु टेराकोटा के बर्तन, मूर्तियाँ, बीटस बड़ी मात्रा में प्राप्त हो रहे हैं। साथ ही लोहा, तांबा से बनी वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं। मानवोपयोगी दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुएं दिया, मटकी, सुराही, मर्तबान, सिल-बट्टा, सिरेमिक का एड़ी घिसने का बट्टा इत्यादि भी प्राप्त हो रहा है। सुत्रों से प्राप्त सूचना के आधार ज्ञात हुआ है कि कुषाण वंशीय तांबे के सिक्कों के साथ गुप्त कालीन सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। लोहे के औजारों में भालों के फ़ाल, ठेकी के मुसल का लोहा इत्यादि प्राप्त हुआ है। इन प्राप्तियों से छत्तीसगढ़ के इतिहास में परिवर्तन होगा एवं इतिहास समृद्ध भी होगा। जे आर भगत उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं से उत्साहित है और कहते हैं कि हो सकता है यहाँ 16 महाजनपदों में से किसी एक जनपद के अवशेष प्राप्त हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इस साईट की तिथि सिरपुर से भी आगे निकल गई है।

उत्खनन में प्राप्त संरचना का स्तर 
तरीघाट के आस-पास के गाँवों में भी पुरा सामग्रियाँ प्राप्त हो रही हैं। जिसका तत्त्कालिक उदाहरण ग्राम पंदर में मनरेगा के दौरान उत्खनन में प्राप्त वस्तुएं हैं। इससे जाहिर होता है कि सातवाहनों का प्रसार पाटन तक था एवं गाँव का पंदर नाम बंदर का अपभ्रंश हो सकता है। नदी के किनारे यहाँ पर पहले कभी डाक यार्ड रहा होगा। तरीघाट में स्थित इन 4 टीलों के चारों तरफ़ पत्थर के परकोटे बने हुए हैं। जब यहाँ बसाहट थी तो ये परकोटे सुरक्षा घेरे का काम करते थे। उत्खनन के दौरान ज्ञात हुआ कि सभी घर पंक्तिबद्ध रुप से बसे थे और उनके बीच चौड़ी सड़क के साथ गलियाँ भी थी। कई घरों से रसोई प्राप्त हुई है, जहाँ चुल्हे की राख के साथ के मिट्टी के दैनिक उपयोग के बर्तन प्राप्त हुए हैं। मिट्टी के दीये बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। उत्खनन सतत चल रहा है तथा प्राचीन सभ्यता के चिन्ह निरंतर अनावृत हो रहे हैं। मेरा अनुमान है कि नदी के किनारे इस स्थान पर सैनिक छावनियाँ हो सकती हैं। आगे उत्खनन से और भी स्थिति साफ़ होगी तथा ज्ञात होगा कि इस स्थान का इतिहास में क्या महत्व  था?

18 टिप्‍पणियां:

  1. जाने कितने ही ऐसे स्थल है जो कई ऐतिहासिक जानकारियां लिए हैं...... जानकारीपरक पोस्ट

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  2. एक और प्राचीन सभ्यता की पूरी सम्भावना प्रतीत होती है !
    रोचक !

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  3. छतीसगढ़ की इतिहास इन पूरा धरोहर में बिखरा है ,आपकी मेहनत इन कड़ियों को जोड़ने में रंग लाएगी .

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  4. भूगर्भ से उभरता समृद्ध इतिहास.....

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  5. बेहतरीन। मुझे गर्व है कि मैं आपसे मेहनत सीख रहा हूं।

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  6. बहुत सुंदर ललित जी, पुरातत्व पर आपका कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर है।

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  7. बहुत सुंदर और जानकारीपरक पोस्ट,आभार.

    रामराम.

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  8. बढ़िया जानकारी उस गड्ढे को देख कर लगता है ईसापूर्व तक के स्ट्रेटा तक पहुँच गए होंगे

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  9. पुरातत्व विभाग का सराहनीय प्रयास और आपका घुमंतू स्वभाव क्या कहने नमन योग्य *****

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  10. पुरातत्व विषय पर आपकी पकड़ और दृष्टि लगातार गहरी होती जा रही है .इस विषय पर आपके लेखों का संकलन पुस्तकाकार में हो सके तो ऐसे लोग भी लाभान्वित हो सकेंगे जो ब्लाग जगत से नहीं जुड़े हैं .

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  11. प्राचीन सभ्यता के इस बिखरे इतिहास को सहेजिये और पुस्तक का रूप दीजिये ताकि आने वाली पीढ़ी भी इसे जान सके...अभी तो इस स्थान की और जानकारी मिलेंगी आपसे...

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  12. इतिहास में एक ओर गोता, मेरी ओर से सत्यसंधान की शुभकामनायें।

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  13. न जाने और कहां कहां बिखरे पडे हैं ऐसे अवशेष ...

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  14. बढि़या महत्‍वपूर्ण जानकारी. 'बसाहट का माडल' का चित्र पॉटरी यार्ड जैसा प्रतीत होता है.

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  15. आज की ब्लॉग बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन पर मेरी पहली बुलेटिन में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर आभार।।

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  16. बेहतरीन जानकारी के लिए शुक्रिया |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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