रविवार, 27 सितंबर 2015

सैर कर गाफ़िल जहां कि जिन्दगानी फ़िर कहाँ ……

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 27 सितम्बर 1980 से विश्व पर्यटन दिवस मनाने की शुरुआत की थी। इस दिन 1970 में विश्व पर्यटन संगठन का संविधान स्वीकार किया गया था। इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र महासभा प्रतिवर्ष विश्व पर्यटन दिवस की विषय वस्तु तय करती है। विश्व पर्यटन दिवस मनाने का उद्देश्य पर्यटन एवं उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं आर्थिक मूल्यों के प्रति विश्व समुदाय को जागरुक करना है साथ इसका मुख्य उद्देश्य पर्यटन को बढावा देना और पर्यटन के द्वारा अपने देश की आय को बढाना है। पिछले दो दशकों में पर्यटन के प्रति लोग जागरुक होते दिखाई दे रहे हैं और पर्यटन के लिए देश दुनिया की सैर भी करने लगे हैं। एक तरह से देखा जाए तो पर्यटन धनी लोगों का ही शौक रहा है, परन्तु वर्तमान में मध्यम वर्गीय लोग एवं परिवार भी पर्यटन के प्रति आकर्षित हुए हैं।

मनोरंजन एवं फ़ुरसत के क्षणों का आनंद उठाने से की गई यात्रा को पर्यटन कहा जाता है तथा पर्यटक उन्हें कहा गया है जो मनोरंजन के लिए यात्राएं करते हैं और कहीं स्थाई रुप से निवास नहीं बनाते एवं इस यात्रा के दौरान कहीं कमाई का पेशा नहीं करते। फ़कत जेब में धन राशि लेकर आते हैं और आनंद एवं मनोरंजन के लिए खर्च करते हैं। वर्तमान में विश्व में कई ऐसे देश हैं जिनकी अर्थ व्यवस्था सिर्फ़ पर्यटन पर ही निर्भर है। मलेशिया, फ़िलिपिंस, सिंगापुर, मयामी इत्यादि स्थान पर्यटकों के भरोसे ही आबाद हैं। वर्तमान में पर्यटन एक बड़े उद्योग के रुप में उभर कर सामने आया है। यही एक मात्र ऐसा व्यवसाय है जहाँ एक रुपए लगाने पर सौ गुनी आमदनी होती है। 

संयुक्त राष्ट्र संघ को पर्यटन दिवस के साथ वर्ष में किसी एक दिन को घुमक्कड़ दिवस भी धोषित करना चाहिए। मैं ठहरा विशुद्ध घुमक्कड़ जो देश दर्शन कर ज्ञानार्जन करने के लिए यात्राएं करता है। मेरा मानना है कि सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टिकोण से यात्राएँ महत्वपूर्ण हैं, प्रत्येक यात्री अपनी यात्रा से कुछ न कुछ शिक्षा अवश्य ग्रहण करता है तथा अपने अनुभवों को समाज तक पहुंचाता है। सभी यात्री अपने विवेकानुसार यात्राओं से ज्ञान पाते हैं। जो जितना अधिक संवेदनशील होगा वो उतना अधिक ज्ञान पाता है। भ्रमण शब्द में भ्रम भी समाविष्ट है। मैंने यह पाया है एक जिज्ञासु व्यक्ति द्वारा भ्रमण करने से भ्रम दूर होता है और उसकी सोच का दायरा विस्तृत होता है। सोच-समझ विकसित होने पर परिपक्वता आती है। किताबी ज्ञान के अतिरिक्त यात्राएँ ज्ञान प्राप्ति का सरल एवं सहज साधन हैं।

जिज्ञासु यात्री जब यात्रा पर चलता है तो बहुत सारी सुनी हुई बातें, देखी हुई चीजें एवं स्थानों के विषय में जानकारी एकत्र करता है। जिससे अनुभव पाकर जीवन को सहज बनाने के प्रति अग्रसर होता है। यात्राएँ तो सभी करते हैं पर यात्राओं को संजोने के लिए दृष्टि की आवश्यकता होती है। हम किसी स्थान के विषय में किताबों में लिखी हुई बातों से अधिक उस स्थान पर स्वयं जाकर देखने से अधिक समझ पाते हैं। अगर चीनी यात्री व्हेनसांग का यात्रा वृत्तांत नहीं होता तो हमें अपने इतिहास के विषय में बहुत सारी जानकारी नहीं मिलती। उसने यात्राओं के दौरान देखे-सीखे को अपने यात्रा लेख के माध्यम से संजोया। शताब्दियों उपरांत आज भी उसका लाभ विश्व को मिल रहा है।

एक सैलानी हूँ मैं, मन से तन से कर्म से और स्वभाव से भी। कहा जाए तो "अहर्निश यात्रामहे" की सुक्ति चरितार्थ होती है। तीर्थाटन करने बजाए मुझे देशाटन करना पसंद है। भारत भूमि पर ऐतिहासिक गौरव के चिन्ह पग-पग पर मिलने के साथ ही अद्भुत अकल्पनीय प्राकृतिक सुंदरता के दर्शन होते हैं। इस देश में 12 महीनों के दौरान हमें सारे मौसम मिल जाते हैं तो 12 कोस पर भाषा के साथ सांस्कृतिक बदलाव भी दिखाई देने लगता है। मैं अपने आप को पर्यटक की जगह घुमक्कड़ मानता हूँ, जिसे यायावर कहा जाता है। कभी भी, कहीं भी, किसी भी वक्त, किसी भी मौसम में बस घुमक्कड़ी हो जाए। जीवन भी चलने का ही नाम है, अगर ठहर गए तो कहते हैं कि जीवन यात्रा सम्पन्न हो गयी। जिसकी जीवन यात्रा सम्पन्न हो गई, उसकी यात्रा पर पूर्ण विराम लग जाता है। इसलिए जब तक शरीर में प्राण हैं तब तक इस संसार को देखो। ईश्वर की बनाई इस अनुपम दुनिया को जानो, मेरा यही मानना है।

वर्तमान में घुमक्कड़ी के स्थान पर पर्यटन को अत्यधिक बढावा मिल रहा है। क्योंकि इससे नगद आमदनी होती है। इस अत्यधिक आमदनी को देखते हुए पर्यटन उद्योग में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी कूद पड़ी है। उनके पांच सितारा होटल बड़े पर्यटन स्थलों पर दिखाई देते हैं। पर्यटन का सीधा-सीधा अर्थ है कि जेब में पैसा होना चाहिए फ़िर आनंद करने लिए सारे सुख उपलब्ध होते हैं। वर्तमान में पर्यटन का यही स्वरुप सामने आया है। जो अपराधों को भी जन्म दे रहा है। विश्व में कई पर्यटन स्थल सिर्फ़ खाने-पीने जुए सट्टे एवं वेश्यवृत्ति के लिए बदनाम हैं। इससे सांस्कृतिक प्रदूषण भी फ़ैल रहा है। जहाँ धन आएगा वहाँ ये सब विकृतियाँ भी स्वत: पैदा हो जाती है। पर्यटन के साथ इस प्रदूषण के नियंत्रण करने का भी यत्न करना आवश्यक हो गया है। इसलिए सर्वश्रेष्ठ घुमक्क्डी को ही मानना चाहिए। 

12 टिप्‍पणियां:

  1. मन से तो हम भी घुमक्कड़ ही हैं जी, एक जगह टिकता ही नहीं।

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  2. बहुत बढ़िया पोस्ट! पर्यटन बनाम घुमक्कड़ी!

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  3. घुमक्कड़ी ज़िंदाबाद.... असली आनंद तो घुमक्कड़ी में ही है, जहाँ जब मन करे निकल पड़े। प्रकृति से आत्मीयता का सच्चा सुख। शुभकामनाएं व बधाई

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  4. बहुत बढ़िया लेख घुमक्कड़ी के लिए बस सोच चाहिए समय व धन का इन्तजाम खुद ब खुद हो जाता जी

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  5. आपकी यायावरी के और उससे एकत्र हुए ज्ञान के अथाह भंडार के तो हम मुरीद हैं ही प्रिय ललित जी।

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  6. सुंदर, मन प्रफुल्लित और यात्रा से अर्जित ज्ञान, बौद्धिक विकास की बात खाली कारतूस रूपी भेजे में घुस गई। साधुवाद..

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