सोमवार, 28 सितंबर 2015

राजा रानी मंदिर का मनमोहक शिल्प : कलिंग यात्रा

भुवनेश्वर की सुबह चमकीली थी और हमारी तासीर उनींदी। पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण क्वाटर हमारी शरणस्थली बना हुआ था। रात नींद तो बहुत देर बाद आई। सुबह उठने पर तय किया गया कि आज का दिन भुवनेश्वर के भ्रमण को अर्पित किया जाए। वैसे देखें तो भुवनेश्वर मंदिरों की नगरी कहा जा सकता है। वैसे भी इसे पूर्व का काशी भी कहा जाता है। इसके साथ यह भी जानना चाहिए कि यह एक प्रसिद्ध बौद्ध स्‍थल भी रहा है। 
राजा रानी मंदिर भुवनेश्वर
प्राचीन काल में 1000 वर्षों तक बौद्ध धर्म यहां फलता-फूलता रहा है। इसी तरह सातवीं शताब्‍दी में यहां प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों का निर्माण हुआ था। इस प्रकार भुवनेश्‍वर वर्तमान में एक बहुसांस्‍कृतिक शहर है। तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व यहीं प्रसिद्ध कलिंग युद्ध हुआ था। इसी युद्ध के परिणामस्‍वरुप अशोक एक लड़ाकू योद्धा से प्रसिद्ध बौद्ध अनुयायी के रुप में परिणत हो गया था। अशोक जीवन में इस युद्ध में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया।
मुख्य द्वार अलंकरण
किंवदन्ति है कि किसी समय भुवनेश्वर में सात हजार मंदिर थे, जिनका निर्माण सात सौ वर्षों में हुआ था। परन्तु अब छ: सौ  मंदिरों के बचे होने की सूचना है। यहां से सौ किमी की दूरी पर उत्खनन से तीन बौद्ध विहार, रत्नगिरि, उदयगिरि, ललितगिरि भी प्राप्त हुए हैं। इससे पता चलता है कि यहाँ 13 वीं सदी तक बौद्ध धर्म मुख्य रुप से प्रचलित था। बौद्ध धर्म की तरह यहाँ जैन धर्म के भी अवशेष मिलते हैं। जैनों के लिए भी यह स्थान काफी महत्‍वपूर्ण है। 
पाशुपत सम्प्रदाय के तपस्वी
प्रथम शताब्‍दी में यहां चेदी वंश का एक प्रसिद्ध जैन राजा खारवेल' हुए थे। राजधानी से छ: किमी की दूरी पर उदयगिरि खंडगिरि की गुफ़ाओं का निर्माण जैन राजा खारवेल ने करवाया था। यह गुफ़ाएं आज भी बहुत अच्छी अवस्था में हैं। यहाँ श्रावकों एवं श्रमणियों के रहने एवं उपासना करने के लिए इसका विकास हुआ था। इस तरह माना जा सकता है कि भुवनेश्वर अपने प्राचीन वैभवकाल में "कास्मोपोलेटिन सिटी" की तरह व्यवस्थित था। 
पुत्र वल्लभा
भुवनेश्वर भ्रमण हमने राजा रानी मंदिर से प्रारंभ किया। विशाल प्रारंण में स्थिति इस मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किया गया है और बगीचा भी बहुत शानदार बनाया गया है। यह बगीचा इतना सुंदर है कि शहर की भीड़ भाड़ वाली जगहों से बचकर नव प्रेमीजन प्रेमालाप संवाद हेतु इस स्थान की शरण लेना उचित समझते हैं। वृक्षों की छांव तले प्रेमिका की गोद में सिर रख कर सोना किसे नहीं भाएगा। मंदिर प्रांगण में पहुंचते ही हमें पहले यही दृश्य दिखाई दिया। कई जोड़े दुनिया की आँखों में धूल झोंक रहे थे या शतुरमुर्ग की तरह अपना सिर धूल में गड़ाए हुए थे। मन: स्थिति दोनो तरह की हो सकती है। खैर समय चक्र के अनुसार बदलाव संभव है और परिलक्षित भी हो रहा है। वैसे भी इस मंदिर को "प्रेम मंदिर" भी कहा जाता है।
शुक सारिका
लिंग राज मंदिर  एवं राजा रानी मंदिर के बीच एक सरोवर है, जहाँ लोग धार्मिक कर्मकांड सम्पन्न करने के लिए आते  हैं। राजा रानी मंदिर जैसा कि नाम से विदित होता है मैने सोचा था किसी राजा रानी की स्मृति में निर्मित होगा, परन्तु इसकी कथा कुछ अलग ही है। लौह द्वार से हमने परिसर में प्रवेश किया। दूर से ही रेड सेंड स्टोन से निर्मित भव्य मंदिर अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। बिकाश बाबू चित्र लेने लगे और हमने एक बार परिक्रमा करके मंदिर के शिल्प का निरीक्षण किया। मंदिर की भित्तियों में बहुतायत में सुंदर अलंकरणो के साथ बहुत सारी प्रतिमाएं है। जिनमें से कुछ के चित्र मैने लिए।
दिक्पाल यमराज
पंचरथ शैली के इस मंदिर का निर्माण 11 वीं सदी में सोमवंशी राजाओं ने किया था। मंदिर के मुख्य द्वार स्तंभों पर अर्धमानवाकृति में नाग-नागिन विराजमान हैं। द्वार शिला पर मध्य में लकुलिश एवं  प्रस्तरपाद पर नौग्रह अंकित हैं। द्वार पे दोनो तरफ़ तीन सिंह एवं उनके नीचे हाथी दिखाए गए हैं। यही संरचना कोणार्क के सूर्य मंदिर में भी दिखाई देती है। उड़ीसा के मंदिरों में द्वार पर मुझे नवग्रह लगाने की परम्परा दिखाई दी। मंदिर का निर्माण दो हिस्सों में पहला जगमोहन एवं दूसरा (विमान) गर्भगृह। गर्भगृह की ऊंचाई लगभग साठ फ़ुट होगी। अधिष्ठान की थरों पर कोई नक्काशी नहीं है। गर्भगृह की भित्तियों पर सुंदर प्रतिमा अलंकरण हैं और चारों दिशाओं में विशाल आमलक को थामें हुए भारवाहक दिखाई देते हैं। मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है परन्तु द्वार शिला एवं भित्तियों पर अंकित लकुलीश इसके शिवालय होने का स्पष्ट संकेत देता है।    
आत्म मुग्धा
मंदिर के शिल्प एवं भित्तियों के प्रतिमा अलंकरण किसी खजाने से कम नहीं है। गर्भगृह की भित्तियों में शिव, नटराज, पार्वती के विवाह के दृश्यों के अंकन के कृशकाय तपस्वी का अंकन भी दिखाई देता है। शाल भंजिका, मुग्धा, पुत्र वल्लभा, शुकसारिका आदि अप्सराओं के साथ शार्दूल का भी अंकन किया गया है। भित्तियों पर मैथुन की भिन्न भिन्न मुद्राओं में प्रतिमाओं का अंकन भी बहुतायत में है। कंदूक क्रीड़ा करती एवं शौचालय को जाती स्त्री का भी अंकन किया गया है। यहां की प्रतिमाओं की वेशभूषा, केश सज्जा एवं आभूषणों पर उड़ीसा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। एक प्रतिमा में स्त्री को एक हाथ में पायल लिए दिखाया गया है। यमराज, नटराज, शिव, पार्वती एवं दिक्पाल इत्यादि का शिल्पांकन किया गया है। 
पायल उतारती हुई अप्सरा
अन्य सजावटी प्रतिमाओं में व्याल, गज इत्यादि के साथ पत्र पुष्प एवं वृक्षों का भी अंकन नयनाभिराम है। लावण्यमयी नायिकाओं का पुष्ट यौवन प्रदर्शन दर्शकों का मन मोह लेता है। मैथुन शिल्पांकन की दृष्टि से यह इसकी प्रतिमाएं खजुराहो के मंदिरों से कम करके नहीं आंकी जा सकती। राजा रानी मंदिर के शिल्प का दर्शन करना बहुत ही अच्छा अनुभव था। शिल्प शास्त्रों में वर्णित अप्सराओं का शिल्पांकन कुशलता के साथ किया गया है। कोणार्क के मंदिर साथ तो बिसु महाराणा का नाम जुड़ा हुआ है, परन्तु इस मंदिर के शिल्पी का नाम कहीं पता नहीं चलता। राजा रानी मंदिर के दर्शन के पश्चात हम आगे चल पड़े। जारी है आगे पढे……

4 टिप्‍पणियां:

  1. उम्दा जानकारी। हमसे राजा रानी मंदिर बुचक गया था लेकिन आपने अपनी सुन्दर सुरुचिपूर्ण आलेख से आपूर्ति कर दी। आभार।

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  2. लेख के साथ चित्रों का सुन्दर संर्गह

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