शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

मल्हार : पातालेश्वर मंदिर

ल्हार जाने के लिए सुबह का 6 बजे का वक्त तय हुआ। सुबह की शीतलता के साथ मल्हार दर्शन हो जाएगें वरना इस मौसम में सूरज दादा इतने भन्ना जाते हैं कि झुलसा कर ही छोड़ते हैं। द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी सपत्नी (माधुरी जी) के साथ मुकर्रर वक्त पर होटल पहुंच गए। मैं भी अपने औजार (कैमरा, टोपी, पानी की बोतल इत्यादि) लेकर तैयार था। हम मल्हार की ओर चल पड़े। 
बिलासपुर की सुबह
मल्हार नगर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में अक्षांक्ष 21 90 उत्तर तथा देशांतर 82 20 पूर्व में 32 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। बिलासपुर से रायगढ़ जाने वाली सड़क पर 18 किलोमिटर दूर मस्तूरी है। वहां से मल्हार, 14 कि. मी. दूर है। मस्तुरी पहुंचने पर मल्हार जाने वाले मार्ग पर एक बड़ा द्वार बना हुआ है और यहीं से तारकोल की इकहरी सड़क मल्हार की ओर जाती है।
मल्हार का मड फ़ोर्ट
पुरातात्विक दृष्टि से मल्हार महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ कई एकड़ में फ़ैला हुआ मृदा भित्ति दुर्ग भी है। मल्हार के मृदा भित्ती दुर्ग  (मड फ़ोर्ट) सर्वप्रथम जिक्र जे. डी. बेगलर ने 1873-74 के अपने भ्रमण के दौरान किया। परन्तु उन्होने इस मड फ़ोर्ट में विशेष रुचि नहीं दिखाई। उन्होने इस शहर में मंदिरों के 2 खंडहरों का जिक्र किया।
पंचमुखी गणेश
के. डी. बाजपेयी मानते हैं कि पुराणों में वर्णित मल्लासुर दानव का संहार शिव ने किया था। इसके कारण उनका नाम मलारि, मल्लाल प्रचलित हुआ। यह नगर वर्तमान में मल्हार कहलाता है। मल्हार से प्राप्त कलचुरीकालीन 1164 ईं के शिलालेख में इन नगर को मल्लाल पत्त्न कहा गया है। विशेष तौर पर इस नगर का प्रचार तब अधिक हुआ जब यहाँ से डिडनेश्वरी देवी की प्राचीन प्रतिमा चोरी हो गई थी। तब समाचार पत्रों में इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता रहा। मैने भी तभी इसका नाम सुना था, पर इस स्थान पर जाना कभी न हो सका था।
पातालेश्वर मंदिर का प्रवेश द्वार एवं स्थानक विष्णु लक्ष्मी :)
चर्चा के दौरान द्वारिका प्रसाद जी ने भी कहा था कि सारी उम्र बिलासपुर में गुजारने के बाद भी वे मल्हार नहीं जा सके। आज आपके साथ जाना हो जाएगा। अब हम मल्हार से अनजान तीन लोग इस नगर की ओर बढ रहे थे। धीमी रफ़्तार से चलते हुए हम लगभग 7 बजे मल्हार पहुंच गए। सूर्य देवता भी अपना हल्का प्रभाव दिखाने लगे थे। मल्हार में प्रवेश करते समय छत्तीसगढ़ पर्यटन के सूचना पट पर पातालेश्वर मंदिर का रास्ता दिखाया गया था। हम भी इसी मंदिर में जाकर रुके। 
नदी देवियाँ एवं अनुचर
मंदिर परिसर की सुरक्षा चार दिवारी बना कर की गई है। लोहे का गेट खुला मिला और हम प्रवेश कर गए। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है, गेट से प्रवेश करते समय 18 अप्रेल विश्व धरोहर दिवस का बैनर टंगा हुआ दिखाई दिया। वैसे तो उदयपुर वाले श्री कृष्ण जुगनु जी ने फ़ेसबुक पर पूछ ही लिया था कि आज आप क्या करने वाले हैं। हमने उन्हें बताया कि मल्हार जाने वाले हैं।
जय भोले शंकर-कांटा गड़े न कंकर
द्वार से प्रवेश करने पर बांई ओर टीन के छत से ढकी मंदिर की विशाल संरचना दिखाई दे रही थी। इसे देखते ही अपुन समझ गए कि यही पातालेश्वर मंदिर है। पालेश्वर मंदिर का मंडप अधिष्ठान ऊंचा है पर गर्भ गृह में जाने के लिए 5-6 पैड़ियाँ उतरना पड़ता है अर्थात गर्भगृह धरातल पर ही है। द्वार के बांई तरफ़ कच्छप वाहिनी यमुना एवं दांई तरफ़ मकर वाहिनी गंगा देवी की स्थानक मुद्रा में आदमकद प्रतिमा है। इनके साथ ही शिव के अन्य अनुचर भी स्थापित हैं। 
गौमुखी पातालेश्वर शिव
गर्भ गृह में जाने के लिए पैड़ियों का प्रयोग होने के कारण इस मंदिर का नाम पातालेश्वर प्रचलन में आया तथा शिवलिंग का गौमुखी होना भी इसे विशेष मान्यता देता है। जब हम लोग मंदिर में पहुंचे तो कुछ लोग पूजा पाठ कर रहे थे। माधुरी जी ध्यान करती हैं, उन्होने शिवलिंग के दर्शन करने के पश्चात बताया कि इस स्थान पर उर्जा का स्तर काफ़ी ऊंचा है।
ई हमार कौनो जनम के भाई बंधू हैं मूंछधारी
द्वार पर स्थापित प्रतिमाओं को देखने के बाद मन प्रसन्न हो गया। शिल्पकार ने इन्हें सुडौल बनाया। प्रतिमा निहारने पर कहीं पर भी निगाहें अटकती नहीं हैं। कहा जाए तो सब कुछ "सूत" में निर्मित किया है सूत्रधार ने। इस मंदिर का निर्माण कलचुरी राजा पृथ्वीदेव के पुत्र जाजल्लदेव द्वितीय के समय में सोमराज नामक ब्राह्मण ने कराया, जिसे केदारेश्वर नाम दिया जो वर्तमान में पातालेश्वर प्रसिद्ध है। 
राम जी की सेना चली - हस्तिदल
मंदिर की भित्तियों में हस्ति दल, सिंह संघाट प्रतिमा, गणेश, पुष्प वल्लरियों का सुंदर अंकन है। मंदिर की दाईं भित्ति पर मूंछधारी सिंह का अंकन भी मनोहारी दिखाई देता है। मंदिर के सामने ऊंचे अधिष्ठान पर नंदी सजग मुद्रा में विराजमान हैं। कान खड़े हुए और आँखे शिव की ओर एक टक लगी हुई। जैसे आदेश होते ही त्वरित कार्यवाही करने को तत्पर दिखाई देते हैं।
नंदी बाबा तैयार हैं कार्यवाही के लिए- आदेश की प्रतीक्षा
मंदिर के समक्ष ही हनुमान जी की आदमकद प्रतिमा विराजमान है। स्थानक मुद्रा में हनुमान जी ने एक स्त्री पर बांया पैर धर रखा है। एक हाथ सिर पर है तथा दूसरा हाथ अभय मुद्रा में दिखाई देता है। यह प्रतिमा किस पौराणिक आख्यान पर आधारित है, स्मरण नहीं हो पा रहा। मंदिर के आस पास कई आमलक बिखरे पड़े हैं।  इसके साथ ही मडफ़ोर्ट की परिखा के तरफ़ पंचमुखी गणेश की आदमकद प्रतिमा भी रखी हुई है। 
भग्न मंदिरों के खंडहर
मंदिर परिसर में उत्खनन में प्राप्त कई मंदिरों के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं इससे जाहिर होता है कि इस स्थान  पर मंदिरों का समूह रहा होगा। मंदिर के सामने ही कई जैन प्रतिमाएं पड़ी हुई हैं। सामने ही संग्रहालय भी बना हुआ है। परन्तु इस संग्रहालय में इतनी जगह नहीं है कि सभी प्रतिमाएं रखी जा सकें। संग्रहालय में मौजूद प्रतिमाओं का अवलोकन करने लिए हमने संग्रहालय में प्रवेश किया। 

11 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर पोस्ट सुंदर चित्रों के साथ आभार !

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  2. अब्बर बने लिखे गा, मंजा आ गे।

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  3. मंदिरों के भग्नावशेष आकर्षित करते हैं और नई खोजों को !
    रोचक !

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  4. वसई फोर्ट के बारे में कब लिखोगे -- -- इन्तजार ----

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  5. विस्‍तृत विवरण की प्रतीक्षा. मल्‍हार की हस्तियों से भी अवश्‍य मिलें.

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  6. मूर्ति और वास्तुकला की विशेषताओं का सुन्दर सजीव चित्रण …नई खोजों और जानकारियों की प्रतीक्षा के साथ आपका बहुत-बहुत आभार …

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  7. विस्‍तृत विवरण चित्रों के साथ

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