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मंगलवार, 7 जून 2011

मन करता है मोहन तु्मसे, पुछूं एक सवाल

मन करता है मोहन तु्मसे, पुछूं एक सवाल
सत्ता के मद में तुम्हारे,कैसे बीते हैं दो साल?

मोहन बोला क्या बताऊं,कैसे बीते है दो साल।
खलमाड़ी, राजा,कनिमोड़ी,हो गए मालामाल॥

मन करता है मोहन तु्मसे, पुछूं एक सवाल।
जनता दू:ख भोग रही,पर क्या है तेरा हाल?

मोहन बोला क्या बताऊँ कैसा है मेरा हाल।
समझो रबर स्टैम्प, मेरी गलती नही दाल॥

मन करता है मोहन तु्मसे, पुछूं एक सवाल।
लोकतंत्र में डंडे चला कर,कैसे किया बवाल?

मोहन बोला क्या बताऊं, कैसे हुआ बवाल।
सुबह हुई तो पता चला, पिटे हुओं का हाल॥

मन करता है मोहन तु्मसे, पुछूं एक सवाल।
स्त्रियों की हुई पिटाई,क्यों घायल बाल गोपाल?

मोहन बोला क्या बताऊँ,क्यों घायल बाल गोपाल।
या तो पूछो मेडम जी से,या बाबा जी बताएं हाल॥

मन करता है मोहन तु्मसे, पुछूं एक सवाल।
जब रक्षक ही भक्षक बने, कौन रहे रखवाल?

मोहन बोला क्या बताऊँ, कौन रहे रखवाल।
भगवान चला रहा देश को, वही रहे रखवाल॥

मन करता है मोहन तु्मसे, पुछूं एक सवाल।
बाबा की इनकम का कैसे,तुम्हे आया ख्याल?

मोहन बोला क्या बताऊँ,कैसे आया ख्याल।
साम-दाम-गुरु मंत्र मैने,रखा था खूब संभाल॥

मन करता है मोहन तु्मसे, पुछूं एक सवाल।
अगले चुनाव में पार्टी,कैसे बचाएगी खाल ?

मोहन बोला क्या बताऊँ,कैसे बचाएगी खाल।
नेहरु गांधी बापू के नाम की,फ़िर बनेगी ढाल॥

मंगलवार, 8 मार्च 2011

निर्मला पुत्तुल की कविता

आज "एक बार फिर" से आदिवासी कवियत्री निर्मला पुत्तुल जी की एक कविता पेश कर रहा हूँ, जो इन्होने "अंतर राष्ट्रीय महिला दिवस का आमंत्रण" पाकर लिखी थी.

इस  कविता को अर्चना  चावजी ने अपना स्वर दिया है। आप सुन भी सकते हैं।


एक बार फिर
हम इकट्ठे होंगे 
विशाल सभागार में
किराये की भीड़ के बीच 
 
एक बार फिर
ऊँची नाक वाली 
अधकटे ब्लोउज पहनी महिलाएं
करेंगी हमारे जुलुस का नेतृत्त्व 
और प्रतिनिधित्व के नाम पर
मंचासीन होंगी सामने
 
एक बार फिर 
किसी विशाल बैनर के तले
मंच से खड़ी माइक पर वे चीखेंगी
व्यवस्था के विरुद्ध 
और हमारी तालियाँ बटोरते
हाथ उठा कर देंगी साथ होने का भरम

एक बार फिर
शब्दों के उड़न खटोले पर बिठा
वे ले जाएँगी हमे संसद के गलियारों में
जहाँ पुरुषों के अहम से टकरायेंगे हमारे मुद्दे
और चकनाचूर हो जायेंगे 
उसमे निहित हमारे सपने

एक बार फिर
हमारी सभा को सम्बोधित करेंगे 
माननीय मुख्यमंत्री
और हम गौरवान्वित होंगे हम पर 
अपनी सभा में उनकी उपस्थिति से
 
 एक बार फिर
बहस की तेज आंच पर पकेंगे नपुंसक विचार
और लिए जायेंगे दहेज़-हत्या, बलात्कार, यौन उत्पीडन
वेश्या वृत्ति के विरुद्ध मोर्चाबंदी कर
लड़ने के कई-कई संकल्प

एक बार फिर
अपनी ताकत का सामूहिक प्रदर्शन करते
हम गुजरेंगे शहर की गालियों से
पुरुष सत्ता के खिलाफ 
हवा में मुट्ठी बांधे  हाथ लहराते 
और हमारे उत्तेजक नारों की ऊष्मा से
गरम हो जायेगी शहर की हवा

एक बार फिर 
सड़क के किनारे खडे मनचले सेकेंगे अपनी ऑंखें
और रोमांचित होकर बतियाएंगे आपस में कि
यार शहर में बसंत उतर आया है

एक बार फिर
जहाँ शहर के व्यस्ततम चौराहे पर
इकट्ठे होकर हम लगायेंगे उत्तेजक नारे 
वहीं दीवारों पर चिपके पोस्टरों में
ब्रा पेंटी वाली सिने तारिकाएँ
बेशर्मी से नायक की बांहों में झूलती
दिखाएंगी हमें ठेंगा
धीर-धीरे ठंडी पड़ जायेगी भीतर की आग
 
और एक बार फिर 
छितरा जायेंगे हम चौराहे से
अपने-अपने पति और बच्चों के 
दफ्तर व स्कूल से लौट आने की चिंता में 

मंगलवार, 1 मार्च 2011

भूख लगे तो मोबाईल चबाओ--आम बजट

प्रनब दादा ने अपनी बाजीगरी दिखाई, 
आम बजट में कम नहीं हुई मंहगाई,
मोबाईल, प्रिंटर, गाड़ी, टीवी साबुन, 
फ़्रीज, रेशम आदि सस्ता।
दाल-भात, गैस, कपड़ा, इलाज में 
बढाई मंहगाई हालत खस्ता।
भूख लगे तो मोबाईल चबाओ।
बीमार पड़े तो घर द्वार बेचाओ, 
टीवी पर देखो रोटी के विज्ञापन
कर चुकाने वालों को प्रोत्साहन
मुन्नी बदनाम का टी वी पर देखो डांस
अगले बजट का क्या पता ले लो चांस
न चुकाने वालों को कब भेजेगें जेल।
आम आदमी का नही बजट तो फ़ेल
80 साल के होने तक करो इंतजार छूट लेने का।
इससे पहले चल दिए तो पछताओगे, 
इस बजट की छूट कैसे ले पाओगे। 
आम आदमी को चाहिए दाल रोटी, 
लेकिन बजट में हो गयी खोटी, 
गरीबों को छूट दी जाएगी नगद
सुना है 700 रुपए गैस का रेट होगा 
आम जरुरत की चीजों पर वेट होगा
मध्यमवर्ग को चाट जाएगी मंहगाई
सेठों की तिजौरी भर जाएगी भाई
मंहगाई कम कैसे होगी प्रश्न है बड़ा
जनता के सामने जिन्न बनके है खड़ा।

बुधवार, 18 अगस्त 2010

दही के धोखे में कपास

ह सत्य घटना है, इसका नजारा हमने देखा है. इस घटना का किसी जीवित या मृतक के साथ कोई संबंध नहीं है. कभी-कभी आदमी ज्यादा होशियारी के चक्कर में दही के धोखे में कपास खा जाता है और ऐसा सबक मिलता है कि जीवन भर याद रखता है. इसी तरह की एक घटना का वर्णन इन पंक्तियों में है. 

एक दिन की बात है 
हम चौक के पान ठेले पर शाम को खड़े थे 
और भी दो चार लोग बतिया रहे थे. 
बातों के घूँसे चला रहे थे
और सरकार को लतिया रहे थे. 
बगल में कुछ शोहदे भी खड़े थे 
जो अभी नए-नए अंडे फोड़ कर बाहर निकले थे.
नए पंखों से उड़ने को बेकरार 
पंख फडफड़ा कर एकदम हुए तैयार, 
मर्दानगी का जोश उफान पर था, 
इसलिए उनका जमघट पान की दुकान पर था.
हम पहले भी ऐसे कईयों को पीट चुके थे
उनको सबक सिखा चुके थे. 
अब हमने सोचा कि आज तमाशा ही देखें, 
हमें भी कुछ लिखने का सामान मिल जायेगा 
नही तो चाय पानी का ही खर्चा निकल जायेगा.
इतने में देखा कि हीरो होंडा पर 
दो पुरुष जैसी नारियां सवार होकर सामने से निकली, 
तभी एक लड़के की जबान फिसली, 
उसने जोर से सीटी बजाई, 
बाकी लड़कों ने भी साथ दिया 
और हाँ में हाँ मिलाई,
मतलब क्रम से सीटी बजाई,
वो सवार कुछ दूर चले गए थे
उन्हें सीटी की आवाज दी सुनाई,
सुनते ही अपनी मोटर सायकिल घुमाई,
जैसे ही वो पास आए 
सारे लड़के रह गए हक्के-बक्के
वो ना नर थे, ना नारी थे, वो थे छक्के. 
एक बोला बताओ किसने सीटी बजाई,
हम हैं बहन जैसे भाई 
आज किसकी शामत है आई,
क्या तुमको चाहिए माँ जैसी लुगाई
इतना सुनते ही वो दल खिसक गया 
सीटी बजाने वाला लड़का फँस गया. 
क्या बताऊँ वहां का आँखों देखा हाल,
दोनों छक्कों ने उस "नवोदित मर्द" का 
मार-मार कर दिया बुरा हाल. 
बीच चौराहे पर उसका तमाशा बना डाला,
कपडे फाड़ कर नंगा कर डाला, 
वो मर्द बार-बार छक्कों से कर रहा था गुहार,
एक छक्का उसे पीछे से था पकडे 
दूसरा कर रहा था प्रहार,
लड़का बोल रह था मुझे छोड़ दो
सीटी जिसने मारी थी वो तो भाग गया
उसे पकडो और उसका सर फोड़ दो,
तभी एक छक्का बोला 
क्यों फिर लेगा छक्कों से पंगा
साले बड़ा मर्द बनता फिरता है 
हो गया ना नंगा,
मर्दानगी का नशा उतर गया 
की थोडा और उतारू 
तेरी सलमान कट जुल्फे 
थोडी उस्तरे से सुधारू
उस लड़के को सांप सूंघ गया 
वो थूक गटक के लील गया 
सर-ए-आम मार खा-खा के
पूरा अन्दर तक हिल गया.
फिर हिम्मत करके बोला 
माई-बाप अब तो छोड़ दो 
फिर कभी किसी को देख के 
सीटी नहीं बजाऊंगा 
अब मैं समझ गया, अब मैं समझ गया
एक छोटी सी सीटी की इतनी बड़ी सजा 
कभी भी नहीं पाई है
क्या पता कौन सा सवार
बहन जैसा भाई है........
बहन जैसा भाई है.........

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

मैं खामोश बस्तर हूँ भाई साहब-लेकिन बोल रहा हूँ

राजकुमार सोनी संचालन करते हुए
विगत दिनों साधना न्युज चैनल के सौजन्य से कारगिल विजय दिवस के अवसर पर कवि सम्मेलन रखा गया था। जिसमें देश के नामी-गिरामी कवियों ने कविता पाठ किया। शहीद स्मारक रायपुर में आयोजित इस कवि सम्मेलन का लाभ उठाने के लिए मुझे एक बार फ़िर आना पड़ा। लगातार बरसात की झड़ी लगी हुई थी। बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। जब राजकुमार सोनी ने फ़ोन किया तो पता चला कि रायपुर में बारिश नहीं हो रही है। लेकिन मेरे यहां पर बारिश हो रही थी। जाने का मन नहीं था लेकिन मित्रों के आग्रह पर मैं पहुंच ही गया। जैसे ही पचपेड़ी नाका पार किया,यहां भी बरसात प्रारंभ हो गयी।

कुलदीप जुनेजा और अशोक बजाज
राजकुमार सोनी भीगते हुए मुझे कालीबाड़ी लेने पहुंचे,उस समय 8बज रहे थे। कवि सम्मेलन साढे 9बजे प्रारंभ होना था। सम्मेलन स्थल पर भाई रमेश शर्मा जी भी मिल गए। बात चीत होते रही। तभी अशोक बजाज भाई साहब एवं रायपुर के विधायक कुलदीप जुनेजा जी भी उपस्थित हो गये। अशोक भाई ने आवाज देकर मुझे बुला लिया और कहा कि आप भी कवि सम्मेलन सुनने का शौक रखते है:)मैने कहा कि बस ऐसे ही पहुंच गए। कुलदीप जुनेजा जी से भी चर्चा हूई,कभी इनके विषय में विस्तार से लिखुंगा। इनकी कहानी भी बहुत रोचक है। अलग ही तरह के विधायक हैं। हमेशा जनता के बीच में ही रहते हैं। सदा जनसाधारण को उपलब्ध रहते हैं। 

मंचासीन कविगण
रायपुर नगर की मेयर श्रीमति किरण नायक भी पहुंच चुकी थी। सांसद नंदकुमार साय,हरिभूमि के प्रबंध। संपादक हिमांशु द्विवेदी, आईबीएन 7 के आशुतोष, एवं एन के सिंग भी उपस्थित हो चुके थे।हमारे 36गढ के कवि पद्मश्री सुरेन्द्र दुबे जी पहले ही पधार चुके थे। मंची्य औपचारिकताओं के बाद कवि सम्मेलन प्रारंभ हुआ। बरसात होने के कारण सभागार में श्रोताओं की उपस्थिति कम ही थी। फ़िर भी कवि सम्मेलन तो करना ही था। पद्मश्री सुरेन्द्र दुबे जी ने एक कविता बस्तर के विषय में पढी। इस कविता में कवि ने बस्तर के दर्द को उड़ेलकर रख दिया। यह कविता आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हुँ।















पद्मश्री सुरेन्द्र दुबे जी कविता 


मैं खामोश बस्तर हूँ

आप क्या जाने सी आर पी एफ़ के जवानों की 
माताएं और पत्नियां कैसे दिन बिताती हैं।
जब तक बस्तर से कुशलता का संदेश पहुंच जाता है,
राजकुमार सोनी-रमेश शर्मा
तब दो रोटी मुस्किल से खाती है।
मै बस्तर पर बात करना चाहता हूँ साहब।
केन्द्र सरकार कहती है कि हम नक्सलवाद 
के खिलाफ़ ऐसी बहादुरी दिखा रहे हैं।
जिन रास्तों में नक्सली ट्रेन उड़ाते हैं 
उन रास्तों में हम ट्रेन ही नहीं चला रहे है।
भाई साहब तब बस्तर पर बात करना चाहता हूँ।
मैं एक बात पूछना चाहता हूँ,
जब बस्तर के जलने की बात दिल्ली तक जाती है
तो वहां पहुंचते पहुंचते ठन्डी क्यों हो जाती है,
तब मैं बस्तर पर बात करना चाहता हूँ।

मैं खामोश बस्तर हूँ,लेकिन आज बोल रहा हूँ।
अपना एक-एक जख्म खोल रहा हूँ।
मैं उड़ीसा,आंध्र,महाराष्ट्र की सीमा से टकराता हूँ।
चर्चारत-कार्यक्रम में देर है
लेकिन कभी नहीं घबराता हूँ
दरिन्दे सीमा पार करके मेरी छाती में आते हैं।
लेकिन महुआ नहीं लहू पीकर जाते हैं।
मैं अपनी खूबसूरत वादियों को टटोल रहा हूँ
मैं खामोश बस्तर हूँ भाई साहब
लेकिन आज बोल रहा  हूँ।

गुंडाधूर को आजादी के लिए मैने ही जन्म दिया था।
इंद्रावती का पानी तो भगवान राम ने पीया था।
भोले आदिवासी तो भाला और धनुष बाण चलाना जानते थे।
विदेशी हथियार तो उनकी समझ में भी नहीं आते थे।
ये विकास की कैसी रेखा खींची गयी,
मेरी छाती पे लैंड माईन्स बीछ गयी।
मैं खामोश बस्तर हूँ भाई साहब बोल रहा हूँ

मेरी संताने एक कपड़े से तन ढकती थी।
विधायक कुलदीप जुनेजा-ललित शर्मा
हंसती थी,गाती थी,मुस्कुराती थी।
बस्तर दशहरा में रावण नहीं मरता है।
मुझे तो पता ही नहीं था
रावण मेरे चप्पे चप्पे में पलता है।
भाई साहब अब तो मेरी संताने भी
मुखौटे लगाने लगी हैं।
लेकिन ये नहीं जानती हैं कि
बहेलियों ने जाल फ़ेंका है।
मैने कल मां दंतेश्वरी को भी
रोते हुए देखा है।
मैं लाशों के टुकड़ों को जोड़ रहा हूँ
मैं खामोश बस्तर हूँ भाई साहब
लेकिन आज बोल रहा हूँ।

नक्सलवाद मेरी आत्मा का एक छाला था
फ़िर धीरे-धीर नासूर हुआ।
और इतना बढा-इतना बढा कि
अशोक बजाज-ललित शर्मा
बढकर इतना क्रूर हुआ
चित्रकूट कराह रहा है,कुटुमसर चुप है
बारसूर में अंधेरा घुप्प है,क्योंकि हर पेड़ के पीछे एक बंदुक है।
और बंदुक नहीं है तो उन्होने कोई रक्खी है।
अरे उन्होने तो अंगुलियों को भी
पिस्तौल की शक्ल में मोड़ रखी है।
सन 1703 में मैथिल पंडित भगवान मिश्र ने
जिस दंतेश्वरी का यशगान लिखा।
उसका शब्द शब्द मौन है।
अरे कांगेरघाटी,दंतेवाड़ा,बीजापूर,ओरछा,सुकुमा में
छुपे हुए लोग कौन हैं?
मेरी संताने क्यों उनके झांसे में आती हैं।
ये इतनी बात इनकी समझ में क्युं नहीं आती है।
सड़क और बिजली काट देने से तरक्की कभी गांव में नहीं आती है।
मैं अपने पुत्रों की आंखे खोल रहा हूँ
मैं खामोश बस्तर हूं भाई साहब लेकिन आज बोल रहा हूँ।

6अप्रेल को 76जवान दंतेवाड़ा में शहीद होते हैं,
8मई को 8लोग शहादत से नाता जोड़ते हैं।
23जून को 29जवान शहीद होते हैं,
27जून को 21जवान शहीद होते हैं।
मैं शहीदों की माताओं के आगे हाथ जोड़ रहा हूँ
मैं खामोश बस्तर हूँ भाई साहब लेकिन बोल रहा हूँ।




शुक्रवार, 11 जून 2010

ताऊ शेखावाटी से रायपुर में मिलन

कई दिनों पहले ताऊ शेखावाटी ने मुझे फ़ोन पर बताया था कि वे रायपुर पहुंच रहे हैं 7 तारीख को प्रखर समाचार वालों ने धमतरी में कवि सम्मेलन में बुलाया है। हमें भी इंतजार था कि ताऊ जी से पुन: मुलाकात होगी।  

ताऊ जी से मेरी मुलाकात 7 तारीख को दोपहर में हुयी। वे अपने साथ स्वरचित सभी किताबे एवं ग्रंथ भी लेकर आए थे मेरे लिए। जिसमें हम्मीर महाकाव्य (माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान की कक्षा 10वीं की अनिवार्य हिंदी पाठ्यक्रम में पढाया जाता है),

सेर को सवा सेर मिल गया (बाल कथा संग्रह), एक और देवयानी (कहानी संग्रह), सोरठां री सौरभ (नीतिपरक संबोधन काव्य),कह ताऊ कविराय (राजस्थानी हास्य व्यंग्य काव्य) साळाहेली (व्यंग्य काव्य), सुण ळे ताई बावळी ( (व्यंग्य काव्य) हेली सतक सवाई (आत्मबोध परक संबोधन गीत, इस गीत संग्रह में 135 गीत हेली संबोधन से हैं) मुझे भेंट किए। राजस्थानी एवं हिंदी भाषा के मुर्धन्य साहित्यकार एवं हस्ताक्षर से एक माह के अंतराल में पुन: मिलन अच्छा रहा।

ताऊ जी ने एक बात और बताई कि सम्पूर्ण भारत में हरिवंश राय बच्चन जी के पश्चात वे दूसरे कवि हैं जिन्हे जीते जी पाठ्यक्रम में पढाया जा रहा है। नहीं तो मरने के बाद ही कवि्यों का नम्बर आता है। यह भी इन्हो्ने सच ही कहा।

एक बार की घटना बताते हुए कहा कि एक मास्टर उत्तरपुस्तिकाएं जांच रहा था। तो उसने मुझे कहा कि देखिए ताऊ जी आपके जीवन परि्चय में इस लड़के ने क्या लिखा है?

कवि ताऊ शेखावाटी का जन्म 17 सितम्बर 1942को हुआ था और मृत्यु.............सन् में हुयी थी। अब वो बच्चा भी यही मानसिकता लिए बैठा था कि जीवित कवि को तो पाठ्यक्रम में पढाया नहीं जाता, इसलिए मृत्यु तो अवश्य हुयी होगी, झुठी तारीख ही लिख दो शायद सही हो जाए और 5 नम्बर मिल जाए।

ताउ जी से चर्चा के बीच मैने गिरीश भैया को भी फ़ोन करके होटल में बु्ला लिया। अब दो साहित्यकारों की चर्चा का आनंद लेने का मुझे अवसर मिला। प्रतीत हो रहा था जैसे तुलसी दास और रहीम कवि मिले हों।

यह दो साहित्यकारों का मिलन था। साहित्य की चर्चा के साथ साहित्यकारों की चर्चा भी हो रही थी। इस बी्च ताउ जी ने पत्नी महात्म सुनाया। जिसे मैने रिकार्ड कर लिया ।

यह रिकार्ड आपके लिए प्रस्तुत है। यदि चाहें तो डाउनलोड भी कर सकते हैं। काफ़ी चर्चा हुयी, 4बज रहे थे, ताउ को कवि सम्मेलन के लिए जाना था। चाय के पश्चात चर्चा को विराम दिया गया। सब पुन: मिलने का वादा करके विदा ली। 

ताऊ की कविताई

काल के प्रकार

बुद्धि चक्कर खायगी,मिल्यो ना हल तत्काल
छोरो आयो स्कूल स्युं, ले' की एक सवाल

ले' की एक सवाल,  जरा पापा बतलाओ
कितना होवे काल,  जरा सावळ समझाओ

मैं बोल्यो-बेटा! जीवन में तीन काल है
पति-काल, पत्नी-काल, फ़िर कळह काल।

पति-काल

ब्याह होतां'ई सुण सरु,हो ज्यावै पति-काल
होय पति निज पत्नी री, सेवा स्युं खुशहाल

सेवा स्युं खुसहाल, छींक भी जे आ ज्यावे
एक मिनट में पत्नी ल्या झट चाय पिलावे

क्युं जी तबियत ठीक नहीं तो पांव दबा दयुं
बार बार पूछै माथा पर 'बाम' लगा दयुं ।

पत्नी-काल

एक दो टाबर हो गया, पैदा तो तत्काल
आवै पत्नी काल तद, खत्म होय पति-काल

खत्म होय पति-काल, अगर पति चाय मंगावै
"छोरो रोवै है ठहरो!" पत्नी समझावै

या तो छोरै नै थ्हे थोड़ी देर खिलाल्यो
या खुद जाकी आप किचन में चाय बणाल्यो।

कळह-काल

अर फ़िर कुछ दिन बाद में, पूरो जीवन सेस
कळह-काल में ही कटै, ईं में मीन ना मेख

ईं में मीन ना मेख, कळह रो बजे नंगाड़ो
रोज लड़ाई झगड़ो, घर बण जाए अखाड़ो

कह ताऊ कविराय, कदै भी चैन न पावै
तेल,लूण,लकड़ी रै, चक्कर में फ़ंस ज्यावे।


सुनिए पत्नी म्हात्तम-ताऊ द्वारा



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