मंगलवार, 15 नवंबर 2011

देशाटन, तीर्थाटन और पर्यटन - मथुरा की ओर -- ललित शर्मा

घड़ी चौक रायपुर
जिज्ञासु प्रवृत्ति मनुष्य को देशाटन, तीर्थाटन को प्रेरित करती है, वह अज्ञात को जानना चाहता है। यही अज्ञात को जानने की ललक उससे यात्राएं करवाती हैं। पहले लोग जीवन के उत्तरार्ध में तीर्थाटन करते थे, बैलगाड़ी, घोड़े एवं पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। सुरक्षा की दृष्टि से ये यात्राएं समूहों में होती थी, यदा कदा ही कोई यायावर अकेले यात्रा करता था। लोग जब तीर्थाटन को जाते थे तो गाँव के लोग उन्हे विदा करते और गाँव की सीमा तक गाजे-बाजे के साथ छोड़कर आते। तीर्थाटन निर्विघ्न समपन्न होने पर सकुशल घर लौटते तो उन्हे गाजे बाजे से ही परघाया जाता। सकुशल वापस आने की खुशी में पूजा-पाठ करके सामुहिक भोज का आयोजन भी किया जाता। वैसे अभी भी तीर्थ करके आने पर प्रसादी की जाती है, जिसमें इष्ट मित्रों को आमंत्रित किया जाता है और खुशी मनाई जाती है। अब किसी भी उम्र में, कभी भी तीर्थयात्रा की जा सकती है,यात्रा के तीव्रतम साधन उपलब्ध हैं, अगर कहीं दुर्घटना न हो तो तीर्थ यात्राएं कम समय में सकुशल सम्पन्न हो जाती हैं।
रास्ते का स्टेशन (सवाल जाट जी के लिए)
ऐसी ही एक सामुहिक तीर्थ यात्रा के सुत्रधार थे रामसजीवन चौरसिया जी। शांतिकूंज हरिद्वार के आमंत्रण पर दो-तीन माह से यात्रा की तैयारियाँ हो रही थी। चौरसिया जी का आग्रह था कि मैं भी उनके साथ यात्रा पर चलुं। आगामी कार्यक्रमों को देखते हुए मेरे मन में इस यात्रा को करने का विचार कम ही था। मैने अनमने मन से हाँ तो कर दी थी, पर पूर्ण रुप से यात्रा के लिए मन नहीं बना पाया था। चौरसिया जी ने 117 यात्रियों का दल बताया था। अब इतने सारे लोगों को एक साथ लेकर यात्रा कराना भी कठिन कार्य है। जिसमें बच्चों से लेकर उम्र दराज सभी शामिल हों। सामुहिक यात्रा कि अपनी कठिनाईयाँ भी हैं। हमारी यात्रा 5 नवम्बर से प्रारंभ होने वाली थी, मैने दो दिन पहले ही जाने का विचार त्याग दिया था क्योंकि 18 नवम्बर को छत्तीसगढ के राज्योत्सव कार्यक्रम में दिल्ली जाने का विचार था। 

सामुहिक चित्र
यात्रा के एक दिन पहले चौरसिया जी ने साथ चलने का विशेष आग्रह किया तो टाल न सका और यात्रा की तैयारी हो गयी।सभी की टिकिट एक ही ट्रेन में न होने के कारण 29 यात्रियों को गोंडवाना एक्सप्रेस से सुबह जाना था और बाकी बचे यात्रियों को समता एक्सप्रेस से शाम को निकलना था। यात्रा का पहला पड़ाव मथुरा था। दिल्ली रुट पर ट्रेन द्वारा छत्तीसगढ से जाने के लिए मेरी पहली पसंद गोंडवाना एक्सप्रेस ही है। क्योंकि रायपुर से सुबह 7/50 पर चलकर अगली सुबह 7/30 बजे दिल्ली पहुंचा देती है। एक ही दिन यात्रा में लगता है और दिल्ली पहुंच कर दिन भर काम करने के लिए मिल जाता है। समता एक्सप्रेस से जाने पर 2 दिन और 2 रात खराब होती है। सफ़र लम्बा लगने लगता है। सभी लोगों को 4 बजे तक स्टेशन पहुंचना था, मैं और गिलहरे गुरुजी घर से एक साथ ही चले थे और स्टेशन पहुंचने पर सभी लोग वहाँ मिल गए। सभी के मित्र मंडली के हिसाब से अलग-अलग ग्रुप बने थे। कुछ विशुद्ध तीर्थ यात्री थे तो कुछ विशुद्ध पर्यटक, घुमने का नजरिया अलग-अलग था। यात्रा करने का उल्लास सभी के चेहरे से प्रतीत हो रहा था। कुछ तो पहली बार इतनी लम्बी यात्रा पर जा रहे थे।
भजन यात्रा
समता एक्सप्रेस प्लेटफ़ार्म पर पहुंची, साथियों ने टूर आपरेटर (चौरसिया जी) के बताए अनुसार बोगियों में चढ कर सीटें संभाल ली। इस ट्रेन में हरिद्वार जाने वाले अन्य गायत्री परिजन भी थे। फ़ुल हाऊस चल रहा था। टिकिट चेक कराने पर मालूम हुआ कि लगभग 30 टिकिटें कन्फ़र्म नहीं हुई हैं। इसलिए जितनी सीटें हैं उन पर ही सभी को समायोजित हो कर जाना है। कुछ सहयात्री ऐसे थे कि वे अपनी सीट पर किसी और को बैठाने के लिए तैयार नहीं थे। अपनी सीटें संभालते ही उन्होने बिस्तर लगा लिया। हम तीन चार बोगियों में घूम कर उन्हे सीट दिलाते रहे। मेरी सीट पर भी कोई अन्य जम गए थे। सहयात्रियों में महिलाओं की संख्या अधिक थी, महिलाओं की सीट मिल जाए तो पुरुष कहीं पर भी रात का समय निकाल सकते हैं। पर कुछ महापुरुष थे जो अपनी सीट छोड़ने को ही तैयार नहीं थे। जैसे-तैसे करके सभी को स्थान दिलाया। सहयात्रियों ने डफ़ली लेकर भजन शुरु कर दिए। बड़ा ही अच्छा माहौल बन गया था। भजन कीर्तन में लग गए, बंछोर जी ने बढिया भजन सुनाए।

मथुरा जंक्शन
कुछ फ़ोर्स के भी जवान थे उस बोगी में, उन्होने दरवाजा बंद करके वहीं पर अपना डेरा लगा लिया और बोतल खोल ली। ट्रेन में ही कार्यक्रम शुरु कर दिया, शायद फ़ोर्स के जवानों के लिए ट्रेन में शराबखोरी की छूट है। ये ट्रेन में शराबखोरी करते हुए गाहे-बगाहे मिल ही जाते हैं। ट्रेन मंजिल की ओर दौड़ रही थी, मेरी सीट पर एक सज्जन सोए हुए थे। मैने सोचा कि इन्हे सोने दिया जाए, रात 1 बजे के बाद इन्हे उठाकर दो चार घंटे के लिए आराम कर लेगें। 1 बजे मैने अपनी सीट संभाली। नींद का समय निकल जाने पर बुलाने से भी नहीं आ रही थी। करवटे बदलते रहा, जैसे ही नींद आने लगी तो कुछ सवारीयाँ जोर-जोर से बातें करने लगी। उनके वार्तालाप से नींद में व्यवधान हो रहा था। जैसे-तैसे करके एकाध झपकी ली और भोपाल आ गया। चे गरम, चे गरम की आवाज सुनकर उठना पड़ा। चाय के साथ अखबार लिया पर थकान काफ़ी हो गयी थी। चाय पीकर पुन: लेट गया। सहयात्रियों ने अपनी नींद पूरी कर ली थी। शाम को तीन बजे हम मथुरा स्टेशन पर पहुंचे। सारी सवारियों के उतरने के बाद जाँच की गयी, कोई ट्रेन में छूट तो नहीं गया है।

ऑटो रिक्शा की सवारी भूखनलाल जी के साथ
प्लेटफ़ार्म के बाहर निकलते ही ऑटो वालों ने घेर लिया। सब के अलग-अलग रेट थे, तपोभूमि तक जाने के 10 सवारियों के कोई 250 कह रहा था कोई 200 रुपए। हमने थोड़ा इंतजार किया तो प्रति सवारी 15 रुपए के हिसाब से ऑटो तय हुआ। 8 ऑटो रिक्शा करके हम तपोभूमि की ओर चल पड़े। राजस्थान जैसे इधर के ऑटो में भी पीछे डिक्की तरफ़ भी एक सीट लगा रखी थी। जिस पर 4 सवारियाँ बैठ जाती हैं, अगल-बगल और पीछे लटकाकर 20 सवारी तो ले ही जाते हैं। ट्रैफ़िक वाले चौक पर खड़े देखते रहते हैं। किसी ऑटो वाले को बाहर लटकी सवारियाँ देखकर भी रोकते-टोकते नहीं। तपोभूमि पहुंच कर आमद दी और स्नान ध्यान कर मथुरा घूमने का कार्यक्रम बनाया। मैने और गिलहरे गुरुजी ने अलग ही जाने का विचार किया। तपोभूमि की सड़क पर ही ऑटो मिल जाते हैं, डीग गेट से कृष्ण जन्मभूमि जाने के लिए। हमसे ऑटो वाले ने 3 रुपए प्रति सवारी लिए।  आगे पढें 

23 टिप्‍पणियां:

  1. आपके ब्लॉग के साथ हमारी भी तीर्थ यात्रा हो रही है !

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  2. वाह यात्री हो तो आपके जैसा हम भी तीर्थ कर रहे हैं..आपके साथ

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  3. जय हो किशन कन्हैया की.....
    जय हो नीली छतरी वाले की....
    शुभ यात्रा....
    सादर...

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  4. आपकी देशाटनीयता , तीर्थाटनोत्सुकता को लेकर कतिपय जिज्ञासायें हैं समुचित अवसर पर आपके समक्ष समाधानार्थ उपस्थित होंगे :)

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  5. घूम रहे हैं साथ साथ में......

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  6. सारे चित्र लग रहे हैं, जाने पहचाने।

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  7. केल्ला चल देसे गुरू मोला साथ नई लेगतेस जी

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  8. रोचक यात्रा वृतांत...काफी जिज्ञासाएं भी हैं... आगे की पोस्ट का इंतजार है...

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  9. बड़ी रोमांचक लग रही है आपकी यात्रा.आगे की कड़ी का इंतज़ार है.

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  10. भूखनलालजी के साथ की फोटो मे थकान चेहरे पर पूरी तरह हावी दिख रही है।
    उधर फिर भाटियाजी का निमंतरण है, 24दिसंबर का, क्या ख्याल है?

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  11. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

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  12. यात्रा का रोचक वर्णन किया है |
    आशा

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  13. बढ़िया संस्मरण ... मथुरा के ऑटो रिक्शा(डग्गा)के पछीते बैठने का आनंद ही कुछ और है ... हा हा हा

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  14. रोचक यात्रा वर्णन --- हम भी हरी की नगरी धूम लेगे जी ....साथ ही रखना !

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  15. बहुत रोचक वर्णन है। क्रमशः लिखा आता है तो लगता है क्यों आ गया।

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  16. आपकी यात्रा का वर्णन रोचक | मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है |

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