सोमवार, 15 अप्रैल 2013

सीकर से भानगढ़ की ओर यायावर

सिरपुर की यात्रा में रात्रि विश्राम के दौरान जी टीवी पर फ़ीयर फ़ाईल कार्यक्रम चल रहा था जिसमें शुटिंग के लिए भानगढ़ गई हुई झांसी की रानी धारावाहिक की प्रोडक्शन टीम एवं कलाकारों के साथ बीती घटनाओं की कहानी बताई जा रही थी। वहाँ इनके साथ भूतिया वारदातें हुई, जिसके कारण इनकी टीम को वहाँ से शुटिंग छोड़ कर भागना पड़ा। इससे पहले भी मैने एक दो बार इस जगह के विषय में सुना था,  जिसने इसे डरावना बना रखा है। बस यहीं से भानगढ़ जाने की प्रबल इच्छा हो गई। जैसे तैसे सिरपुर की यात्रा सम्पन्न होने की प्रतीक्षा थी और भानगढ़ की ओर जाना था। इस दौरान रतनसिंह जी से मेरी चर्चा हुई। उन्होने भी भानगढ़ जाने का वादा कर लिया। बस 11 दिसम्बर का यह कार्यक्रम बन गया।
सीकर से जयपुर
10 दिसम्बर 2012 की रात मैं सीकर में था। वहीं से मुझे जयपुर आना था और उधर से रतनसिंह जी दिल्ली से सुबह जयपुर पहुंचने वाले थे। दोनों को सुबह 6-7 बजे जयपुर में मिलना था फ़िर वहाँ से भानगढ़ जाना था। रात को सीकर में मैने लोगों को जयपुर जाने के साधन के विषय में पूछो तो उन्होने बताया कि जहाँ पर मैं ठहरा था उसी बायपास से हर आधे घंटे में जयपुर के लिए बसें मिल जाती है। उनकी कहे अनुसार मैं 3 बजे बायपास पर आ गया। सुबह बहुत अधिक ठंड थी और मैने ठंड का कोई अधिक इंतजाम नहीं किया था। सिर्फ़ एक पतला सा स्वेटर ही ठंड से बचाने का साधन था क्योंकि इस समय भी छत्तीसगढ़ में कोई अधिक ठंड नहीं थी और स्वेटर पहनने की भी आवश्यकता नहीं थी। लेकिन राजस्थान में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। बायपास पर प्रतीक्षा करते एक घंटा हो गया लेकिन बस कहीं दिखाई नहीं दी, दूसरा घंटा भी बीत गया, लेकिन बस नहीं आई। अभी भी अंधेरा ही था, कोई चहल पहल नहीं थी। लोग अपने गुदड़ों से बाहर नहीं निकले थे। 
रामगढ़ बांध का हवाई चित्र
6 बजे मुझे एक बस आते हुए दिखाई दी। हाथ देने पर बस वाले ने दूर जाकर रोका और बैठा लिया, कंडेक्टर ने 70 रुपए की टिकिट काटी, जबकि सरकारी बस से सीकर आते हुए मुझे 80 रुपए की टिकिट लेनी पड़ी थी। मैं गाड़ी के बोनट पर बैठ गया क्योंकि सीटें खाली नहीं थी। ड्रायवर की पीछे की लम्बी सीट खाली थी जिसे उसने अन्य सवारियों के लिए खाली रखा था। थोड़ी देर बाद बस रुकी और स्कूल की कुछ मेडमें चढी। तब पता चला कि ड्रायवर ने यह सीट उनके लिए रिजर्व कर रखी थी। हमारे यहाँ भी ड्रायवर सामने वाली लम्बी सीटें मेडमों के लिए ही रिजर्व रखते हैं। उन पर मेडमों का ही अधिकार होता है। छत्तीसगढ़ की यह बीमारी राजस्थान में भी जारी थी, पता नहीं कि यह रोग राजस्थान से छत्तीसगढ़ आया या छत्तीसगढ़ से राजस्थान के ड्रायवर कंडेक्टरों को लगा।   
सूखा पड़ा बांध
बस शनै शनै बढती जा रही थी, रास्ते में तूड़े के भरे ट्रेक्टरों की लाईन लगी थी। आधी सड़क घेर कर ये जयपुर की ओर जा रहे थे। रास्ते में सड़क निर्माण का काम भी चालु था। इससे बस की स्पीड में बाधा आ रही थी। पलसाणा पहुंचने पर रतन सिंह जी शेखावत का फ़ोन आया। मैने उन्हे विलंब होने की जानकारी दी। पलसाना पहुंचते तक थोड़ा प्रकाश हुआ, लगा कि सूर्योदय हो जाएगा। जयपुर में काम करने वाले कुछ लड़के यहाँ से चढ़े, थैली में चाय और डिस्पोजल गिलास साथ लेकर आए थे। इससे यह जाहिर हुआ कि ये दैनिक यात्री हैं और ड्रायवर कंडेक्टर के लिए रोज चाय लेकर आते हैं। रींगस पहुच कर ड्रायवर ने ब्रेक लगाए, "जाओ भई जिसको पाणी पेशाब जाणा हो तो कर लो। बस 5 मिनट रुकेगी।" पाँच मिनट में हाजत वाले सभी निपट लिए। बस अब चौमू की तरफ़ बढ़ रही थी। रतनसिंह जी ने मुझे जयपुर पहुंच कर चौमू पूलिए पर उतरने कहा था। 
कछवाहों की कुलदेवी "जमवाय माता"
चौमू का पत्थर देखते ही पुरानी कहावत याद आ गई। "चौमू का चूतिया, घी बेच 'र तेल खाए"। कही गई होगी किसी वक्त में किसी कहानी को लेकर चौमू के विषय में ये कहावत। लेकिन अब ऐसा नहीं है, चौमू के लोग बहुत होशियार हो गए हैं। अब घी और तेल दोनो बेच देते हैं और मौज लेते हैं। चौमू बायपास से बस निकल गई। यहाँ पर तूड़े वाले ट्रेक्टरों की लाईन लगी हुई थी। जयपुर में प्रवेश करते ही ट्रैफ़िक पुलिस वालों ने बस रोक ली। ड्रायवर ने कंडेक्टर को कहा " ले इब भुगत इस फ़ूफ़्फ़े नै, परसों इसका प्लाई बोर्ड नहीं चढाया बस में, उसी की कसर लिकाड़ेगा"। सिपाही सड़क के बीचों बीच खड़ा रहा। न ड्रायवर उतरा बस से न कंडेक्टर। तीनों एक दूसरे को देखते रहे। सिपाही बोला - आज नही छोड़ूंगा तुम्हें, जीप में बैठा हुआ उसका अफ़सर बोला - छोड़ दे। तब भी उसने नहीं छोड़ा। गाड़ी खड़ी रही। मैने कहा- छोड़ने और न छोड़ने के चक्कर में सवारियों को क्यों फ़ंसा रखा है। छोड़ या पकड़ इसे। थोड़ी देर बाद उसने बस छोड़ दी।
बांध का सूचना पट्ट
रतनसिंह जी चौमू पुलिया पे इंतजार कर रहे थे, उन्होने फ़ोन किया। थोड़ी देर बाद मैं चौमू पुलिया पर पहुंच चुका था। अब बाईक पर उनके साथ घर चले। वहाँ स्नान ध्यान किया। फ़िर गर्मा गरम रोटी खाई। तब तक जयपुर के युवा पत्रकार प्रदीप सिंह जी अपनी कार से आ गए अब हमें भानगढ़ जाना था। हमारे साथ रतन सिंह जी का इटली रिटर्न जिज्ञासु भतीजा भरत सिंह भी साथ था। हम भानगढ़ के लिए जमवा रामगढ़ होते हुए चल पड़े। सबसे पहले हम बांध पर पहुंचे, इस बांध को आमेर के राजाओं ने जयपुर में जलापूर्ति के लिए बनवाया था। बांध का जल संग्रहण क्षेत्र काफ़ी विस्तार लिए हुए है। लेकिन दुर्भाग्य यह स्थान अभी सूखे की चपेट में है। जिस बांध से आस-पास के सैकड़ों गाँवों की प्यास बुझाई जाती थी, वह आज स्वयं प्यासा है। सरकार का इस बांध के संरक्षण की ओर कोई ध्यान नहीं है। वहीं स्थानीय नेता इस बांध के जल संग्रहण क्षेत्र पर कब्जा करने का मंसूबा पाल रहे हैं।
जमवाय माता का मंदिर
बांध पर जगह जगह चेतावनी लिखी हुई है - शाम 7 बजे के बाद बाँध में नहाना, तैरना और घुमना दंडनीय अपराध है। कितना हास्यास्पद लगता है। जिस बाँध में एक बूंद पानी नहीं वहाँ ऐसी चेतावनी पढकर। खैर हमारा कोई ईरादा नहीं था इस बाँध में तैरकर गोडे फ़ुड़वाने का, इसलिए हम आगे बढ़ गए। कुछ दूर चलने पर कछवाहा शासकों की कुल देवी जमवाय माता का मंदिर है। इसका निर्माण राजा सोढ़देव के पुत्र दुल्हे राय ने करवाया था। कछवाहा वंशजों की कुलदेवी होने के कारण इनकी बहुत मान्यता है। हम मंदिर में पहुंच कर पुजारी से मिलते हैं। उनका कहना है कि इस मंदिर पर हम बोर्ड लगाते हैं तो वन विभाग के अधिकारी उखाड़ देते हैं और कहते हैं कि यह स्थान अभ्यारण में आता है इसलिए यहाँ कोई भी निर्माण नहीं कर सकते। तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम प्रतिभा पाटिल के आर्थिक सहयोग से यहाँ एक छोटी सी धर्मशाला का निर्माण भी हुआ है। राजस्थान सरकार की अकर्मण्यता के चलते इस मंदिर की भूमि को अभ्यारण से ट्रस्ट को स्थानांतरित नहीं किया गया है। जिससे यहाँ पर श्रद्धालू कुछ निर्माण कर सकें। यहाँ से दर्शन करके हम भानगढ़ की ओर चल पड़े।  आगे पढ़ें .........

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! शानदार यात्रा वर्णन !
    जमवाय माता मंदिर की स्थापना सोढ्देव के पुत्र दुल्हेराय ने की थी !

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  2. बांध में पानी देखना हो तो इधर कोटा आ जाओ, कोटा बैराज, जवाहर सागर, राणाप्रताप सागर और गांधी सागर एक साथ देखेंगे।

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  3. देखा तो नहीं है मगर शायद इस बार बारिश में पानी बचा हो रामगढ में !
    अगली किश्त में देखेंगे भानगढ़ के भूत भूतनी :)

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  4. बहुत बढिया यात्रा
    और यात्रा वृतांत

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  5. मनोरंजक यात्रा विवरण. हम तो भानगढ़ की प्रतीक्षा कर रहे थे और इतने में मधांतर आ गया.

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  6. सदा की भांति यायावरी का संतुलित तड़का इस बार स्टील चित्रों की कमी खली

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  7. आपका यात्रा वृतांत बहुत सुंदर शैळी में लिखा गया है. हम तो परसों ही भानगढ के भूत भूतनियों से मिलकर लौटे हैं, हाल खराब होगया ह्मारा तो.

    रामराम.

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  8. सुंदर यात्रा वृतांत ...मुझे भी घर की याद दिला दी

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  9. " ले इब भुगत इस फ़ूफ़्फ़े नै, परसों इसका प्लाई बोर्ड नहीं चढाया बस में, उसी की कसर लिकाड़ेगा" यायावर का नया यात्रा वृत्तान्त पढ़ बहुत ही अच्छा लगा। सबसे बड़ी खासियत उस स्थान की बोली वहां की संस्कृति से भी जीवंत चित्रण कराना ...बहुत बहुत बहुत बधाई ललित भाई

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